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Tuesday, March 6, 2018

चित्रकथा - 58: श्रीदेवी के होठों पर कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़

अंक - 58

श्रीदेवी के होठों पर कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़


"तुम्हें क्या मर जाऊँ तो मर जाऊँ मैं तुम किस काम के..."




चली गईं श्रीदेवी! बॉलीवूड की पहली फ़ीमेल सुपरस्टार का दर्जा रखने वाली इस ख़ूबसूरत अभिनेत्री के अचानक इस तरह चले जाने से पूरी दुनिया स्तब्ध रह गई है। आज ’चित्रकथा’ में श्रीदेवी की ही बातें। श्रीदेवी की लोकप्रियता का अंदाज़ा केवल इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके अंतिम संस्कार में 25,000 से भी अधिक लोग शामिल हुए। श्रीदेवी एक सशक्त अदाकारा तो थीं ही, उनकी एक ख़ास बात यह भी थी कि उन पर जो गीत फ़िल्माए जाते, उनमें से अधिकतर अपने ज़माने के सुपरहिट गीत बन जाते। यूं तो उनके लिए सबसे अधिक पार्श्वगायन आशा भोसले ने किया है, लेकिन श्रीदेवी का नाम लेते ही जिस गीत की याद सबसे पहली आती है, वह है "हवा हवाई", जिसकी गायिका हैं कविता कृष्णमूर्ति। कविता जी ने भी श्रीदेवी के लिए बहुत से गाने गायी हैं। तो क्यों ना आज के इस अंक में हम उन गीतों की चर्चा करें जो कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़ में सजे थे श्रीदेवी के होठों पर! प्रस्तुत है यह विशेषालेख ’श्रीदेवी के होठों पर कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़’। आजे के ’चित्रकथा’ का यह अंक समर्पित है अभिनेत्री श्रीदेवी की पुण्य स्मृति को!




नायकों पर किसी एक पार्श्वगायक की आवाज़ (स्क्रीन वॉइस) का चलन शुरु से ही रहा है। राज कपूर के लिए मुकेश, शम्मी कपूर के लिए मोहम्मद रफ़ी, राजेश खन्ना के लिए किशोर कुमार, फिर बाद के वर्षों में ॠषि कपूर के लिए पहले शैलेन्द्र सिंह और बाद में सुरेश वाडकर, सलमान ख़ान के लिए एस. पी. बालसुब्रह्मण्यम, आमिर ख़ान के लिए उदित नारायण और शाहरुख़ ख़ान के लिए अभिजीत की आवाज़ के बारे में हम सभी को पता है। लेकिन नायिकाओं के लिए ऐसी कोई बात नहीं थी, कारण चाहे जो भी हो। श्रीदेवी की बात करें तो उनकी शुरुआती फ़िल्मों में बप्पी लाहिड़ी का संगीत होता था और उन फ़िल्मों में अधिकतर गीत आशा भोसले गाया करती थीं। लेकिन फ़िल्म ’Mr India’ के "हवा हवाई" के बाद कविता कृष्णामूर्ति बन गईं श्रीदेवी की आवाज़। यह सच है कि 80 के दशक में आशा भोसले, अलका याग्ञ्निक और अनुराधा पौडवाल ने भी उनके लिए गीत गाए, लेकिन उनके लिए कविता कृष्णमूर्ति के गाए गीत भीड़ से अलग सुनाई दिए। पहली बार श्रीदेवी पर कविता की आवाज़ सुनाई पड़ी थी 1986 की फ़िल्म ’नगीना’ में। फ़िल्म के पाँच गीतों में केवल एक गीत कविता की आवाज़ में था - "बलमा आख़िर बलमा हो मेरे ख़ाली नाम के, तुम्हें क्या मर जाऊँ तो मर जाऊँ मैं तुम किस काम के"। मीठी शिकायत वाले इस गीत में जो अनजाने में मर जाने की बात कही गई थी, वह अब श्रीदेवी के जाने के बाद जैसे और भी ज़्यादा जीवित हो उठी है। फ़िल्म ’नगीना’ के ज़बरदस्त हिट होने के बाद 1989 में इस फ़िल्म का सीक्वील ’निगाहें’ बनी। हिन्दी फ़िल्म इतिहास में इसे पहला सीक्वील माना जाता है। ’निगाहें’ में भी कविता कृष्णमूर्ति का गाया एक महत्वपूर्ण गीत था। ’नगीना’ में लता मंगेशकर का गाया "मैं तेरी दुश्मन दुश्मन तू मेरा, मैं नागिन तू सपेरा" सर्वाधिक लोकप्रिय गीत था। इसलिए ’निगाहें’ में भी इसी धुन पर एक गीत रचा गया जिसे कविता ने गाया। इस गीत के बोल थे "खेल वही तू फिर आज खेला, पहले गुरु आया अब चेला, ओ पागल नादान शिकारी, जान अगर है तुझको प्यारि, तो छोड़ दे मेरी गलियों का फेरा, मैं नागन तू सपेरा..."। ’नगीना’ में लता के गाए इस एक गीत के अलावा ’नगीना’ और ’निगाहें’ के अन्य सभी गीत अनुराधा पौडवाल ने गाए थे। आनन्द बक्शी और लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल दोनों फ़िल्मों के गीतकार और संगीतकार थे।

1987 में श्रीदेवी-कविता की जोड़ी का गीत आया फ़िल्म ’वतन के रखवाले’ में। मिथुन और श्रीदेवी पर फ़िल्माया यह गीत था "तेरे मेरे बीच में कौन आएगा, आएगा तो जगह नहीं पाएगा"। कहना ज़रूरी है कि जीतेन्द्र-श्रीदेवी की सुपरहिट जोड़ी बनने के बाद मिथुन और श्रीदेवी की भी कामयाब जोड़ी बनी थी जो ख़ूब हिट रही। ’वक़्त की आवाज़’ और ’गुरु’ इस जोड़ी की सर्वाधिक हिट फ़िल्में हैं। मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे और लक्ष्मी-प्यारे की धुन पर मोहम्मद अज़ीज़ और कविता कृष्णमूर्ति का गाया यह डुएट अपने ज़माने का मशहूर गीत रहा और रेडियो पर ख़ूब ख़ूब बजे। इसी फ़िल्म में श्रीदेवी-कविता जोड़ी का एक और गीत था "टनाटन बज गई घण्टी सजन, प्यार रुकता है कहाँ करे कोई लाख जतन"। मनहर उधास और मोहम्मद अज़ीज़ के साथ गाया यह गीत चल्ताऊ किस्म का गीत था जो हिट नहीं हुआ। फ़िरोज़ नडियाडवाला निर्मित इस फ़िल्म के अलावा 1987 में ही के. सी. बोकाडिया की फ़िल्म आई ’जवाब हम देंगे’ जिसमें श्रीदेवी के नायक बने जैकी श्रॉफ़। गीत-संगीत का भार इस बार समीर और लक्ष्मी-प्यारे पर था। फ़िल्म में दो गीत कविता ने गाए जिनमें से एक श्रीदेवी पर फ़िल्माया गया। भगवान को कोसता हुआ यह दर्द भरा गीत था "मेरे किस कुसूर पर तू मालिक मुझे रुलाए, मेरे आँसुओं में एत्रा संसार बह ना जाए"। श्रीदेवी को हम उन दिनों ग्लैमरस किरदारों और रंगीन किस्म के गीतों में देखते आए थे, ऐसे में यह गीत इस तरह का दर्द भरा शुरुआती गीत रहा उन पर फ़िल्माए जाने वाला। 1987 में ही विजय सदानाह की फ़िल्म आई ’औलाद’। इस फ़िल्म में लक्ष्मी-प्यारे के संगीत पर गाने लिखे एस. एच. बिहारी ने। यूं तो फ़िल्म के कई गीतों में कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़ थी, लेकिन उनमें से केवल दो गीत श्रीदेवी पर फ़िल्माए गए थे। पहला गीत था शास्त्रीय संगीत आधारित भक्ति रचना "जीवन ज्योत जले"। लाल-सफ़ेद साड़ी और सिंदूर की बिंदी में श्रीदेवी बहुत ख़ूबसूरत दिखाई देती हैं इस गीत में और गीत भी बहुत ही प्यारा है - "हुआ सवेरा पंछी जागे, शीतल पवन चले, डाल डाल से किरणें छलके, जीवन ज्योत जले, भोर भये जो मन से पुकारे, प्रभु जाने उसके द्वारे, वो घर फूले फले..."। फ़िल्म का दूसरा गीत एक मस्ती भरा डुएट था किशोर कुमार के साथ - "धक धक धक धड़के किया पास नहीं आना, दिल का लगाना पिया क्या है नहीं जाना, जानू ना वो रातें ना प्यार भरी बातें, तेरी बातों से दिल मेरा घबराये, तो फिर हो जाए, हो जाए..."। जीतेन्द्र-श्रीदेवी की हिट जोड़ी पर फ़िल्माया यह गीत भी उस दौर में ख़ूब लोकप्रिय हुआ था। 1987 में राजेश खन्ना और शबाना आज़मी के साथ दूसरी नायिका के रूप में श्रीदेवी ने अभिनय किया था फ़िल्म ’नज़राना’ में। फ़िल्म में कविता का गाया एक गीत था "ए बाबा रिका..."। हालाँकि यह गीत नहीं चला, लेकिन इस गीत में श्रीदेवी का अभिनय और नृत्य देखने लायक है। माइकल जैक्सन जैसा गेट-अप लिए जिस तरह से उन्होंने डान्स किया है, कमाल है बस! और उस दौर की सफलतम अभिनेत्रियों में इस तरह का डान्स शायद ही कोई और कर पातीं। "ए बाबा रिका रिका रिका रिका, हमने जो सीखा वो दुनिया से सीखा, जीने का तरीका तरीका तरीका, दिल दो किसी को दिल लो किसी का..."।


लेकिन 1987 की जिस फ़िल्म ने सही अर्थ में श्रीदेवी और कविता कृष्णमूर्ति की जोड़ी को यादगार बना दिया, वह फ़िल्म थी ’Mr. India’। "हवा हवाई" गीत आज एक अमर गीत बन चुका है श्रीदेवी के कमाल के अभिनय और अदाओं की वजह से। इस गीत के बारे में कुछ कहने की आवश्यक्ता नहीं है सिवाय इसके कि इस गीत में कविता से एक ग़लती हो गई थी। गड़बड़ी पर आने से पहले आपको इस गीत के निर्माण से जुड़ी एक दिलचस्प जानकारी देना चाहेंगे। इस गीत के शुरुआती जो बोल हैं, जिसमें "होनोलुलु, हॊंगकॊंग, किंगकॊंग, मोमबासा" जैसे अर्थहीन शब्द बोले जाते हैं, दरसल ये शब्द डमी के तौर पर लिखे गये थे गीत को कम्पोज़ करने के लिए। लेकिन ये शब्द आपस में इस तरह से जुड़ गये और गीत में हास्य रस के भाव को देखते हुए सभी को ये शब्द इतने भा गये कि इन्हें गीत में रख लेने का तय हो गया। जावेद अख़्तर ने यह गीत लिखा और संगीतकार थे लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल। अब आते हैं इस गीत में हुई ग़लती पर। इस गीत का एक अंतरा कुछ इस तरह का है -



"समझे क्या हो नादानों, 
मुझको भोली ना जानो,
मैं  हूँ सपनों की रानी,
काटा माँगे ना पानी,
सागर से मोती छीनूँ, 
दीपक से ज्योति छीनूँ,
पत्थर से आग लगा दूँ, 
सीने से राज़ चुरा लूँ,
जीना जो तुमने बात छुपाई,
जानू जो तुमने बात छुपाई,
कहते हैं मुझको हवा हवाई"।

इस अंतरे में सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था, लेकिन "जीना जो तुमने बात छुपाई" कुछ अजीब सा नहीं लग रहा आपको? कविता कृष्णमूर्ति ने एक साक्षात्कार में बताया कि उन्होंने ग़लती से "जानू" को "जीना" गा गईं, लेकिन अगले ही अन्तरे में जब इसी पंक्ति को दोबारा गाना था, उसमें उन्होंने ग़लती को सुधारते हुए "जानू" ही गाया। सभी को लगा कि इतनी छोटी ग़लती किसी के ध्यान में नहीं आएगी, इसलिए गीत को दोबारा रिकार्ड नहीं किया गया। कविता की गायकी और श्रीदेवी के चुलबुले अंदाज़ में अभिनीत यह गीत आज सदाबहार गीत बन गया है और इस गीत के बाद श्रीदेवी "हवा हवाई गर्ल" के नाम से जानी जाती रहीं। इस गीत के कम से कम दो रीमेक बने। पहला रीमेक 2011 की फ़िल्म ’शैतान’ में था जिसे सुमन श्रीधर की आवाज़ में रिकार्ड किया गया, और दूसरी बार 2017 की फ़िल्म ’तुम्हारी सुलु’ में था जिसमें मूल गीत और कविता की आवाज़ को रखा गया था लेकिन संगीतकार तनिष्क बागची के अतिरिक्त संगीत और गायिका शाशा तिरुपति के अतिरिक्त गायकी ने इस गीत को एक नया जामा पहनाया। वापस आते हैं ’Mr. India' पर। फ़िल्म का शीर्षक गीत किशोर कुमार और कविता ने गाया - "करते हैं हम प्यार मिस्टर इण्डिया से"। रोमान्टिक डुएट होते हुए भी इस गीत में हास्य और मस्ती भरा अंदाज़ है और अनिल कपूर व श्रीदेवी के जीवन्त, चुलबुले और शरारती अभिनय ने गीत में जान डाल दी। 1989 में जब के. सी. बोकाडिया ने जया प्रदा और श्रीदेवी को लेकर ’मैं तेरा दुश्मन’ बनाने की योजना बनाई तब उनके मन में भी "हवा हवाई" जैसे एक गीत रखने की इच्छा थी। उनका यह सपना साकार हुआ जब अनजान और लक्ष्मी-प्यारे लेकर आए "जुगनी डिस्को", एक बार फिर कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़ में। यह गीत भी हिट हुआ लेकिन "हवा हवाई" के मुक़ाबले टिक नहीं सका। गीत की ख़ास बात यह है कि जया प्रदा और श्रीदेवी, दोनों ही नज़र आती हैं इस गीत में। इस गीत में लोक-संगीत और पाश्चात्य रिदम, दोनों का फ़्युज़न है। हास्य का पुट भी है तथा पंजाबी और बांग्ला शब्दों के प्रयोग से गीत और भी ज़्यादा मज़ेदार बन पड़ा है। 


क्वांटिटी और क्वालिटी के पैमाने पर अगर एक साथ तोला जाए तो श्रीदेवी और कविता की जोड़ी की जो फ़िल्म सबसे पहले याद की जाएगी, वह है ’चालबाज़’। 1989 की इस फ़िल्म के सभी गीतों में श्रीदेवी के होठों पर कविता की ही आवाज़ सुनाई दी, फिर चाहे वह किरदार अंजु का हो या मंजु का। सीता और गीता की तरह अंजु-मंजु वाले डबल रोल में श्रीदेवी ने इस फ़िल्म में अदाकारी के वो नमूने पेश किए कि फ़िल्म उन्हीं की बन कर रह गई। फ़िल्म के दोनों नायक सनी देओल और रजनीकान्त जैसे बाजु हट गए उनके अभिनय की चमक से। आनन्द बक्शी और लक्ष्मी-प्यारे के गीतों ने भी तहल्का मचा दिया। फ़िल्म के सभी पाँच गीतों में श्रीदेवी-कविता मौजूद थीं। मोहम्मद अज़ीज़ के साथ युगल गीत "तेरा बीमार मेरा दिल, मेरा जीना हुआ मुश्किल" में श्रीदेवी और सनी देओल के बीच का रोमान्स और सेन्सुअल अंदाज़ सर चढ़ कर बोला, तो अमित कुमार के साथ "न जाने कहाँ से आई है" गीत तो बारिश और सड़क वाले गीतों की पहली श्रेणी में शुमार है। "बड़ी छोटी है मुलाक़ात, बड़े अफ़सोस की है बात, किसी के हाथ ना आएगी ये लड़की..." - ये पंक्तियाँ जैसे कानों में गूंज उठी जिस दिन श्रीदेवी के इस दुनिया से चले जाने की ख़बर मिली। कविता और साथियों की आवाज़ों में "नाम मेरा प्रेम कली... रस्ते में वो खड़ा था, कब से मेरे पीछे पड़ा था" भी एक चुल्बुली लड़की का अंदाज़-ए-बयाँ था, यह गीत उतना मशहूर नहीं हुआ पर लक्ष्मी-प्यारे के ज़बरदस्त म्युज़िकल कम्पोज़िशन का यह भी एक अच्छा उदाहरण था। फ़िल्म का चौथा गीत हास्य पैरोडी गीत है जिसमें कविता के साथ अमित कुमार और जॉली मुखर्जी की भी आवाज़ें हैं। "सोचा था क्या, क्या हो गया, गड़बड़ हो गई, सीटी बज गई" में श्रीदेवी, अनुपम खेर, रोहिणी हत्तंगड़ी, अन्नु कपूर और शक्ति कपूर के अभिनय की जितनी तारीफ़ें की जाए कम है। ये सभी चार गीत मंजु के किरदार पर फ़िल्माया गया था। बस एक आख़िरी पाँचवाँ गीत अंजु पर फ़िल्माया गया। यह भी एक हास्य रस का गीत था जिसे कविता, सूदेश भोसले, जॉनी लीवर और साथियों ने गाया - "ओ भूत राजा, जल्दी से आजा.... कोई बताए समझ में ना आए के हाय ये क्या है पहेली, अरे फँस गई मुश्किल में भूतों की महफ़िल में, मैं एक लड़की अकेली..."। हास्य गीत होते हुए भी इसमें श्रीदेवी के चमत्कृत कर देने वाले नृत्य का स्वाद चखने को मिला दर्शकों को। कुल मिलाकर ’चालबाज़’ के गीतों ने अपने ज़माने में धूम मचा दी थी और आज भी लोग इन गीतों को सुनते ही झूम उठते हैं।


90 के दशक में भी श्रीदेवी-कविता का जादू बरकरार रहा। 1991 की फ़िल्म ’पत्थर के इंसान’ में इंदीवर के गीत और बप्पी लाहिड़ी का संगीत था। नृत्य प्रधान संगीत वाले इस फ़िल्म के गीतों में महिला कंठ की अगर बात करें तो कई गायिकाओं ने फ़िल्म के गीत गाए जैसे कि अलका याज्ञ्निक, अनुराधा पौडवाल, कविता कृष्णमूर्ति, एस. जानकी, अलिशा चिनॉय और सपना मुखर्जी। इस वजह से श्रीदेवी-कविता की जोड़ी का बस एक ही गीत था "सूरज नाचे सागर नाचे, सारा जग गीतों पर नाचे, गीत बिना ज़िन्दगी क्या..."। इस गीत की ख़ास बात यह है कि इसे एक स्टेज शो के रूप में फ़िल्माया गया है। सितार हाथ में लिए पूनम ढिल्लों इस गीत को गा रही हैं और उस पर श्रीदेवी नृत्य कर रही हैं। अक्सर डिस्को और पाश्चात्य संगीत के अधिकाधिक प्रयोग की वजह से बदनाम बप्पी लाहिड़ी ने इस शास्त्रीय संगीत आधारित रचना को इतनी ख़ूबसूरती से सजाया है कि एक ही झटके में उन्होंने सभी आलोचकों के मुख पर ताले लटका दिए थे। गीत के अगले हिस्से में पूनम ढिल्लों भी नृत्य करती नज़र आती हैं और दोनों में जैसे एक जुगलबन्दी हो रही हो। इन दोनों ख़ूबसूरत अभिनेत्रियों ने इस गीत को जीवन्त कर दिया, लेकिन दुर्भाग्यवश यह गीत बहुत ज़्यादा सुना नहीं गया, और अब तो हर कोई इसे भूल चुका है। वैसे 1991 की जो उल्लेखनीय फ़िल्म थी, वह है ’ख़ुदा गवाह’ जिसमें अमिताभ बच्चन और श्रीदेवी की जोड़ी दूसरी बार नज़र आई। पहली बार यह जोड़ी नज़र आई थी फ़िल्म ’आख़िरी रास्ता’ में। ’ख़ुदा गवाह’ एक ब्लॉक बस्टर सिद्ध हुई और एक बार फिर श्रीदेवी ने अपने डबल रोल से यह सिद्ध किया कि अभिनेत्रियों में वो ही सर्वोपरि हैं। अफ़्ग़ानिस्तान की पृष्ठभूमि पर बनी इस फ़िल्म में गीत-संगीत का पक्ष आनन्द बक्शी और लक्ष्मी-प्यारे ने संभाला था। फ़िल्म के सभी गीत ख़ूब हिट हुए जिनमें तीन गीत कविता कृष्णमूर्ति और मोहम्मद अज़ीज़ के गाए युगल गीत थे। फ़िल्म का शीर्षक गीत "तू मुझे क़ुबूल, मैं तुझे क़ुबूल, इस बात का गवाह ख़ुदा, ख़ुदा गवाह" सर्वाधिक लोकप्रिय रहा। बाकी के दो गीत थे "रब को याद करूं, इक फ़रियाद करूं, बिछड़ा यार मिला दे, ओय रब्बा..." और "मैं ऐसी चीज़ नहीं जो घबरा के पलट जाऊँगी..."। इसके अगले ही साल 1992 में फिर एक बार अनिल कपूर के साथ श्रीदेवी नज़र आईं अमर प्रेम कहानी ’हीर रांझा’ में। फ़िल्म फ़्लॉप रही लेकिन आनन्द बक्शी और लक्ष्मी-प्यारे के गीतों की वजह से लोगों ने इस फ़िल्म को लम्बे समय तक याद रखा। फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत "रब ने बनाया तुझे मेरे लिए" लता मंगेशकर-अनवर की आवाज़ों में था, लेकिन कविता कृष्णमूर्ति का गाया "ओ रांझा रांझा करते करते हीर दीवानी हुई" का भी अपना अलग अंदाज़ था। मोहम्मद अज़ीज़ के साथ कविता का गाया युगल गीत "यह पेड़ है पीपल का, तू है खरा सोना, सारा जग पीतल का..." चर्चा में नहीं आई। फ़िल्म के पिट जाने की वजह से इस फ़िल्म के गीतों पर कुछ ख़ास तवज्जु किसी ने नहीं दिया।

1993 में बोनी कपूर की महत्वाकांक्षी फ़िल्म ’रूप की रानी चोरों का राजा’ बन कर प्रदर्शित हुई। इसे उस ज़माने की सबसे महंगी फ़िल्म मानी गई। ’Mr. India’ के निर्देशक शेखर कपूर ने इस फ़िल्म को निर्देशित करना शुरु तो किया लेकिन बीच में उन्होंने फ़िल्म छोड़ दी जिसके बाद सतिश कौशिक ने कमान संभाला। अनिल-श्रीदेवी के अलावा जैकी श्रॉफ़, अनुपम खेर, जॉनी लीवर अभिनीत यह फ़िल्म ’Mr India' के तुरन्त बाद 1978 में बनना शुरु होने के बावजूद किसी ना किसी वजह से देर होती गई, और 1993 में जब यह रिलीज़ हुई तो दुर्भाग्यवश पिट गई। इस फ़िल्म के अत्यधिक प्रचार की वजह से लोगों की उम्मीदें इतनी बढ़ गई कि जब लोगों ने फ़िल्म देखी तो फ़िल्म में कहानी और आत्मा, दोनों ही कमज़ोर लगी। उस पर जैकी श्रॉफ़ को कम फ़ूटेज देना भी दर्शकों को रास नहीं आया। जावेद अख़्तर - लक्ष्मी-प्यारे ने जो कमाल ’Mr. India’ के पाँच गीतों में दिखाए थे, वह कमाल वे इस फ़िल्म के दस गीतों में भी दिखा नहीं पाए। ना फ़िल्म चली ना इसे गाने कुछ ख़ास चले। इन दस गीतों में से सात गीतों में श्रीदेवी और कविता की जोड़ी दिखाई व सुनाई दी। विनोद राठौड़ के साथ सेन्सुअस "जाने वाले ज़रा रुक जा", अमित कुमार के साथ फ़िल्म का हिट शीर्षक गीत "तू रूप की रानी, तू चोरों का राजा, सुन प्रेम कहानी, तू आके सुना जा", ROFL करवाने वाला चीनी शैली में "चीनी में चाय चीनी में चाय, चनाली ची मेरी चि चि चाय", बॉलीवूड टिपिकल डुएट "मैं एक सोने की मूरत हूँ" और दुश्मन के डेरे में गाए जाने वाले गीतों के जौनर का "करले तू हौसला, परदा उठा", तथा कविता की एकल आवाज़ में "हवा हवाई" के गेट-अप जैसा "दुश्मन दिल का जो है मेरे, सुना है आज आएगा" और "यारों को जान है प्यारी, मैं हूँ रूप की रानी" कब आए कब गए पता भी नहीं चला। इसी साल 1993 में संजय दत्त के साथ श्रीदेवी नज़र आईं फ़िल्म ’गुमराह’ में। इस फ़िल्म में श्रीदेवी-कविता का एक ही गीत था - "ये ज़िन्दगी का सफ़र मुश्किल बड़ा था मगर, तुम राह में मिल गए, हम बन गए हमसफ़र"। फ़िल्म के फ़्लॉप हो जाने के बावजूद आनन्द बक्शी - लक्ष्मी-प्यारे का रचा तलत अज़ीज़ के साथ कविता का गाया यह गीत हिट हुआ था। 1993 में ही सभी को चकित कर श्रीदेवी नज़र आईं सलमान ख़ान के साथ। फ़िल्म ने साबित किया कि वक़्त का कोई असर नहीं श्रीदेवी की ख़ूबसूरती पर। गीतकार-संगीतकार की जोड़ी के रूप में अगली पीढ़ी आ गई लेकिन श्रीदेवी के माथे पर जैसे वक़्त की कोई भी शिकन नहीं। समीर के लिखे गीत और आनन्द-मिलिन्द के संगीत में श्रीदेवी पर फ़िल्माए कविता के गाए कुल तीन गीत इस फ़िल्म में शामिल हुए। ये सभी युगल गीत हैं जिनमें से दो में एस. पी. बालसुब्रह्मण्यम और एक में आनन्द की आवाज़ें हैं। कविता - एस.पी के गाए गीतों में पहला गीत है फ़िल्म का शीर्षक गीत "चन्द्रमुखी, आ पास आ तो ज़रा, तू है मेरी अपसरा"। इस गीत में समूह स्वरों में "चन्द्रमुखी चन्द्रमुखी" और अन्तराल संगीत में आलाप के अलावा इस गीत के बारे में बताने लायक कुछ नहीं है।  दूसरा गीत "तेरी ही आरज़ू है, तेरा इन्तज़ार है, कैसे बताऊँ तुझसे मुझे कितना प्यार है" भी एक बेहद साधारण 90 के दशक के स्टाइल का गीत है। आनन्द कुमार के साथ डुएट में शुरुआती संगीत को सुन कर भले ही आगे कुछ अच्छा सुन पाने का आभास होता है, लेकिन जब कविता "मेरे होठों पे एक ऐसी कहानी है..." गाने लगती हैं, तब पता चल जाता है कि यह भी अन्य दो गीतों ही की तरह औसत स्तर का गीत है। यह सच है कि श्रीदेवी और सलमान ख़ान की जोड़ी को दर्शक हज़म नहीं कर सके, कारण चाहे जो भी हो, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अगर इस फ़िल्म के गाने हिट हो जाते तो हो सकता है कि सलमान-श्री की जोड़ी को भी लोकप्रियता मिलती!

ॠषि कपूर और श्रीदेवी की जोड़ी एक कामयाब जोड़ी रही है। ’नगीना’, ’बंजारन’, ’गुरुदेव’ और ’चांदनी’ के बाद 1997 में ॠषि-श्रीदेवी की जोड़ी की अन्तिम फ़िल्म आई ’कौन सच्चा कौन झूठा’। राकेश रोशन निर्मित इस फ़िल्म में समीर और राजेश रोशन ने गीत-संगीत की रचना की, लेकिन फ़िल्म फ़्लॉप रही। फ़िल्म के गीतों में महिला कंठ के लिए अलका, कविता और प्रीति उत्तम को लिया गया। कविता और अभिजीत का गाया "हम दो दीवाने मिले इश्क़ में दुनिया भुलाए" में ऋषि कपूर और श्रीदेवी दुश्मनों की गोलियों से अपने आप को बचते बचाते हुए भाग रहे हैं और यह गीत पार्श्व में बज रहा है। सिचुएशन के अनुरूप गीत की अगली पंक्ति है "गोलियाँ चलाए चाहे पहरे लगाए, कोई दिलवालों को जुदा कर ना पाए। श्रीदेवी और कविता कृष्णमूर्ति की जोड़ी की आख़िरी फ़िल्म आई 2005 में - ’मेरी बीवी का जवाब नहीं’। ऐसा प्रतीत होता है कि अक्षय कुमार और श्रीदेवी अभिनीत यह फ़िल्म बनी 90 के दशक में बनी होगी, लेकिन प्रदर्शित हुई देर से। एस. एम. इक़बाल निर्मित व निर्देशित इस फ़िल्म में आनन्द बक्शी ने गीत लिखे और लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने संगीत दिया। फ़िल्म के तीन गीतों में कविता की आवाज़ थी जो फ़िल्माए गए श्रीदेवी पर। पहला गीत अभिजीत के साथ गाया हुआ युगल गीत है "तारों की छाँव में, फूलों के गाँव में, इक छोटा सा घर होगा..." जो फ़िल्म के पहले ही सीन में नामावली के दौरान पार्श्व में गाया जाता है। गीत में नायक-नायिका के चेहरे तो नज़र नहीं आते, कैमरा उनके पीछे ही रहता है। ना यह फ़िल्म चली और ना ही यह गीत चल पाया। दूसरा गीत कविता ने कुमार सानू के साथ गाया है जो फ़िल्म का शीर्षक गीत है "ऐसा तो कोई दूजा जनाब नहीं, ओ मेरी बीवी का जवाब नहीं"। बेहद औसत स्तर का गीत। तीसरा गीत कविता का गाया एकल गीत है "सब प्यार मोहब्बत झूठ, शूट, हर वादा जाए टूट..." जिसमें हास्य का एक अंग है। ख़ास तौर से "शूट" वाला अंदाज़ फ़िल्मी गीतों में एक नया प्रयोग था। इस तरह से यहाँ आकर पूरी होती है श्रीदेवी पर फ़िल्माए कविता कृष्णमूर्ति के गाए गीतों की बातें। इतने सारे गीतों में से श्रीदेवी और कविता की इस जोड़ी को अगर याद किया जाएगा तो मुखत: ’Mr. India' और ’चालबाज़’ के गीतों के लिए। ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ की ओर से श्रीदेवी की पुण्य स्मृति को नमन!



आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, July 2, 2016

"तू मेरा कौन लागे?" क्या सम्बन्ध है इस गीत का किशोर कुमार से?


एक गीत सौ कहानियाँ - 85
 

'तू मेरा कौन लागे...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना
रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 85-वीं कड़ी में आज जानिए 1989 की फ़िल्म ’बटवारा’ के लोकप्रिय गीत "तू मेरा कौन लागे..." के बारे में जिसे अनुराधा पौडवाल, अलका याज्ञनिक और कविता कृष्णमूर्ति ने गाया था। गीत लिखा है हसन कमाल ने और संगीत दिया है लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने।  


 मारी फ़िल्मों में एकल और युगल गीतों की कोई कमी नहीं है। तीन, चार या उससे अधिक गायकों के गाये
गीतों की भी फ़ेहरिस्त काफ़ी लम्बी है। लेकिन अगर ऐसे गानें छाँटने के लिए कहा जाए जिनमें कुल तीन गायिकाओं की आवाज़ें हैं तो शायद गिनती उंगलियों पर ही की जा सकती है। दूसरे शब्दों में ऐसे गीत बहुत कम संख्या में बने हैं। आज हम एक ऐसे ही गीत की चर्चा कर रहे हैं जो बनी थी 1989 की फ़िल्म ’बटवारा’ के लिए। अलका याज्ञनिक, अनुराधा पौडवाल और कविता कृष्णमूर्ति का गाया "तू मेरा कौन लागे" गीत अपने ज़माने में काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। इस गीत की चर्चा शुरू करने से पहले जल्दी जल्दी एक नज़र डाल लेते हैं तीन गायिकाओं के गाए फ़िल्मी गीतों के इतिहास पर। पहला गीत तो वही है जो फ़िल्म संगीत इतिहास का पहला पार्श्वगायन युक्त गीत है। 1935 की फ़िल्म ’धूप छाँव’ के गीत "मैं ख़ुश होना चाहूँ..." में संगीतकार रायचन्द बोराल ने तीन गायिकाओं - पारुल घोष, सुप्रभा सरकार और हरिमति दुआ को एक साथ गवाया था। 40 के दशक में 1945 की फ़िल्म ’ज़ीनत’ में एक ऐसी क़व्वाली बनी जिसमें केवल महिलाओं की आवाज़ें थीं, फ़िल्म संगीत के इतिहास में यह पहली बार था। मीर साहब और हाफ़िज़ ख़ाँ के संगीत में "आहें ना भरी शिकवे ना किए...", इस क़वाली में आवाज़ें थीं नूरजहाँ, ज़ोहराबाई अम्बालेवाली और कल्याणीबाई की। 50 के दशक में नौशाद साहब ने तीन गायिकाओं को गवाया महबूब ख़ान की बड़ी फ़िल्म ’मदर इण्डिया’ में। तीन मंगेशकर बहनों - लता, उषा और मीना ने इस गीत को गाया, बोल थे "दुनिया में हम आये हैं तो जीना ही पड़ेगा..."। 60 के दशक में पहली बार संगीतकार रवि ने लता, आशा और उषा को एक साथ गवाकर इतिहास रचा, फ़िल्म थी ’गृहस्थी’ और गाना था "खिले हैं सखी आज..."। इसके पाँच साल बाद 1968 में कल्याणजी-आनन्दजी ने फिर एक बार इन तीन बहनों को गवाया ’तीन बहूरानियाँ’ फ़िल्म के गीत "हमरे आंगन बगिया..." में। इसी साल कल्याणजी-आनन्दजी भाइयों ने मुबारक़ बेगम, सुमन कल्याणपुर और कृष्णा बोस की आवाज़ों में ’जुआरी’ फ़िल्म में एक गीत गवाया "नींद उड़ जाए तेरी चैन से सोने वाले" जो काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। 70 के दशक में शंकर-जयकिशन ने एक कमचर्चित फ़िल्म ’दिल दौलत दुनिया’ के लिए एक दीपावली गीत रेकॉर्ड किया आशा भोसले, उषा मंगेशकर और रेखा जयकर की आवाज़ों में, "दीप जले देखो..."। और 80 के दशक में लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने 1982 की फ़िल्म ’जीवन धारा’ में पहली बार अनुराधा-अलका-कविता की तिकड़ी को पहली बार साथ में माइक के सामने ला खड़ा किया, गीत था "जल्दी से आ मेरे परदेसी बाबुल..."। और जब 1989 में ’बटवारा’ में एक ऐसे तीन गायिकाओं वाले गीत की ज़रूरत आन पड़ी तब लक्ष्मी-प्यारे ने फिर एक बार इसी तिकड़ी को गवाने का निर्णय लिया। 90 के दशक में इस तिकड़ी को राम लक्ष्मण ने ’हम साथ साथ हैं’ फ़िल्म के कई गीतों में गवाया जैसे कि "मय्या यशोदा...", "मारे हिवड़ा में नाचे मोर...", "हम साथ साथ हैं..."। इसी दशक में यश चोपड़ा की फ़िल्म ’डर’ में शिव-हरि ने लता मंगेशकर के साथ कविता कृष्णमूर्ति और पामेला चोपड़ा को गवाकर एक अद्‍भुत गीत की रचना की, बोल थे "मेरी माँ ने लगा दिये सोलह बटन मेरी चोली में..."। 2000 के दशक में भी तीन गायिकाओं के गाए गीतों की परम्परा जारी रही, अनु मलिक ने ’यादें’ फ़िल्म में अलका याज्ञनिक, कविता कृष्णमूर्ति और हेमा सरदेसाई से गवाया "एली रे एली कैसी है पहेली..."।

"तू मेरा कौन लागे" गीत में डिम्पल कपाडिया के लिए अलका याज्ञनिक, अम्रीता सिंह के लिए कविता
किशोर के साथ अनुराधा की दुर्लभ तसवीर, साथ में अमित कुमार और आशा
कृष्णमूर्ति और पूनम ढिल्लों के लिए अनुराधा पौडवाल की आवाज़ निर्धारित हुई। गाना रेकॉर्ड होकर सेट पर पहुँच गया शूटिंग् के लिए। पर फ़िल्मांकन में हो गई गड़बड़। अभिनेत्री-गायिका की जोड़ियों में गड़बड़ हो गई। शुरुआती मुखड़े में अम्रीता सिंह ने अनुराधा पौडवाल के गाए हिस्से में होंठ मिला दी जबकि अनुराधा को पूनम के लिए गाना था। गीत का अन्त तो और गड़बड़ी वाला है। डिम्पल गीत को ख़त्म करती हैं "तू मारो कोण लागे" पंक्ति को चार बार गाते हुए। पर पहली दो लाइनें अलका की आवाज़ में है और अगली दो लाइनें अनुराधा की आवाज़ में। और तो और अनुराधा जो पूनम के लिए "तू मेरा कौन लागे" गा रही थीं, अब डिम्पल के लिए "तू मारो कोण लागे" गाती हैं। ऐसा क्यों है, पता नहीं! ख़ैर, अब ज़िक्र करते हैं कि इस गीत का किशोर कुमार के साथ क्या सम्बन्ध है। गीत के रेकॉर्डिंग् के दिन की बात है। तीनों गायिकाएँ तैयार थीं, दवाब भी था उन पर क्योंकि तीनों में उन दिनों प्रतियोगिता थी। इसलिए इस दवाब में थीं कि कहीं मुझसे इस गीत में कोई ग़लती ना हो जाए! गीत रेकॉर्ड हो गया, तीनों गायिकाएँ काँच के कमरे से बाहर आ गईं। लक्ष्मी-प्यारे भी उनकी तरफ़ चले आ रहे थे कन्डक्टिंग् रूम की तरफ़ से, पर किसी के चेहरे पर कोई मुस्कुराहट नहीं थी जो आम तौर पर होता है अगर गीत अच्छा रेकॉर्ड हो जाए तो। लक्ष्मी-प्यारे के उतरे हुए चेहरे देख कर तीनों गायिकाएँ घबरा गईं यह सोच कर कि कहीं उनसे कोई ग़लती तो नहीं हो गई इस गीत में? पास आने पर अलका याज्ञनिक ने प्यारेलाल जी से पूछा कि क्या बात है? प्यारेलाल जी ने बताया, "किशोर दा नहीं रहे!" दिन था 13 अक्टुबर 1987। इसी दिन किशोर दा चले गए और इसी दिन रेकॉर्ड हुआ था ’बटवारा’ का यह गीत, हालाँकि फ़िल्म 1989 में रिलीज़ हुई थी। 



फिल्म - बँटवारा : "तू मेरा कौन लागे..." : अनुराधा पौडवाल, अलका याज्ञिक, कविता कृष्णमूर्ति



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Sunday, July 15, 2012

वर्षा ऋतु के रंग : मल्हार अंग के रागों का संग- 2


स्वरगोष्ठी – ७९ में आज

मियाँ की मल्हार : ‘बोले रे पपीहरा...’


‘स्वरगोष्ठी’ के अन्तर्गत जारी लघु श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के रंग : मल्हार अंग के रागों का संग’ के दूसरे अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का स्वागत, आज राग ‘मियाँ की मल्हार’ की स्वर-वर्षा के साथ करता हूँ। मल्हार अंग के रागों में राग मेघ मल्हार, मेघों का आह्वान करने, मेघाच्छन्न आकाश का चित्रण करने और वर्षा ऋतु की आहट देने में सक्षम राग माना जाता है। वहीं दूसरी ओर राग मियाँ की मल्हार, वर्षा ऋतु की चरम अवस्था के सौन्दर्य की अनुभूति कराने पूर्ण समर्थ है। यह राग वर्तमान में वर्षा ऋतु के रागों में सर्वाधिक प्रचलित और लोकप्रिय है। सुप्रसिद्ध इसराज और मयूरी वीणा वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के अनुसार- राग मियाँ की मल्हार की सशक्त स्वरात्मक परमाणु शक्ति, बादलों के परमाणुओं को झकझोरने में समर्थ है।

राग मियाँ की मल्हार तानसेन के प्रिय रागों में से एक है। कुछ विद्वानों का मत है कि तानसेन ने कोमल गान्धार तथा शुद्ध और कोमल निषाद का प्रयोग कर इस राग का सृजन किया था। अकबर के दरबार में तानसेन को सम्मान देने के लिए उन्हें ‘मियाँ तानसेन’ नाम से सम्बोधित किया जाता था। इस राग से उनके जुड़ाव के कारण ही मल्हार के इस प्रकार को ‘मियाँ की मल्हार’ कहा जाने लगा। इस राग के बारे में चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले आइए सुनते हैं, राग मियाँ की मल्हार में एक भावपूर्ण रचना। आपके लिए हम प्रस्तुत कर रहे हैं, विदुषी किशोरी अमोनकर के स्वर में द्रुत एक ताल में निबद्ध, मियाँ की मल्हार की एक रचना-

मियाँ की मल्हार : ‘उमड़ घुमड़ गरज गरज...’ : किशोरी अमोनकर



राग मियाँ की मल्हार के बारे में हमें जानकारी देते हुए जाने-माने इसराज और मयूरी वीणा वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र ने हमें बताया कि यह राग काफी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। आरोह और अवरोह में दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। राग मियाँ की मल्हार के स्वरों का ढाँचा कुछ इस प्रकार बनता है कि कोमल निषाद एक श्रुति ऊपर लगने लगता है। इसी प्रकार कोमल गान्धार, ऋषभ से लगभग ढाई श्रुति ऊपर की अनुभूति कराता है। इस राग में गान्धार स्वर का प्रयोग अत्यन्त सावधानी से करना पड़ता है। राग की कुछ अन्य विशेषताओं पर हम चर्चा जारी रखेंगे, परन्तु आइए, पहले सुनते हैं, सारंगी पर उस्ताद अब्दुल लतीफ़ खाँ का बजाया राग मियाँ की मल्हार का एक अंश।

मियाँ की मल्हार : सारंगी वादन : उस्ताद अब्दुल लतीफ़ खाँ



राग मियाँ की मल्हार को गाते-बजाते समय राग बहार से बचाना पड़ता है। परन्तु कोमल गान्धार का सही प्रयोग किया जाए तो इस दुविधा से मुक्त हुआ जा सकता है। इन दोनों रागों को एक के बाद दूसरे का गायन-वादन कठिन होता है, किन्तु उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने एक बार यह प्रयोग कर श्रोताओं को चमत्कृत कर दिया था। इस राग में गमक की तानें बहुत अच्छी लगती है। आइए यहाँ थोड़ा विराम लेकर राग मियाँ के मल्हार का एक और उदाहरण सुनते हैं। विश्वविख्यात फ़िल्मकार सत्यजीत रे ने १९५९ में भारतीय संगीत की दशा-दिशा को रेखांकित करती बांग्ला फिल्म ‘जलसाघर’ का निर्माण किया था। इस फिल्म में गायन, वादन और नर्तन के कई उत्कृष्ट कलासाधकों की प्रस्तुतियाँ शामिल की गईं थीं। इन्हीं में एक थे, उस्ताद सलामत अली खाँ, जिन्होने फिल्म में राग मियाँ की मल्हार की एक रचना तीनताल में निबद्ध कर प्रस्तुत की थी। लीजिए, आप भी सुनिए-

मियाँ की मल्हार : ‘जलरस बूँदन बरसे...’ : फिल्म – जलसाघर : उस्ताद सलामत अली खाँ



वर्षा ऋतु के प्राकृतिक सौन्दर्य को स्वरों के माध्यम से अभिव्यक्त करने की अनूठी क्षमता राग मियाँ की मल्हार में होती है। इसके साथ ही इस राग का स्वर-संयोजन, पावस के उमड़ते-घुमड़ते मेघ द्वारा विरहिणी नायिका के हृदय में मिलन की आशा जागृत होने की अनुभूति भी कराते हैं। कई फिल्म- संगीतकारों ने इस राग पर आधारित कुछ यादगार गीत तैयार किये हैं। इन्हीं में से आज हम आपके लिए दो गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। ये गीत राग मियाँ की मल्हार के स्वरों पर आधारित तो हैं ही, इन गीतों के बोल में वर्षा ऋतु का सार्थक चित्रण भी हुआ है। पहले प्रस्तुत है- १९९८ में प्रदर्शित फिल्म ‘साज’ का गीत, जिसे कविता कृष्णमूर्ति ने तीनताल में गाया है। इसके बाद सुनिए- १९७१ की फिल्म ‘गुड्डी’ का बेहद लोकप्रिय गीत, जिसे बसन्त देसाई ने स्वरबद्ध किया है और वाणी जयराम ने कहरवा ताल में गाया है। आप ये दोनों गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक से यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।

मियाँ की मल्हार : ‘बादल घुमड़ घिर आए...’ : फिल्म – साज : कविता कृष्णमूर्ति



मियाँ की मल्हार : ‘बोले रे पपीहरा...’ : फिल्म – गुड्डी : वाणी जयराम



आज की पहेली

आज की संगीत-पहेली में हम आपको सुनवा रहे हैं, कण्ठ-संगीत का एक अंश। इसे सुन कर आपको हमारे दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ८०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले पाठक/श्रोता हमारी तीसरी पहेली श्रृंखला के ‘विजेता’ होंगे।



१ - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

२ – इस गीत की गायिका कौन हैं?


आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ८१वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा swargoshthi@gmail.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के ७७वें अंक में हमने आपको फिल्म चश्मेबद्दूर का गीत- ‘कहाँ से आए बदरा...’ का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मेघ मल्हार और दूसरे का उत्तर है- गायिका हेमन्ती शुक्ला। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर मीरजापुर (उ.प्र.) के डॉ. पी.के. त्रिपाठी, जबलपुर की क्षिति तिवारी और लखनऊ के प्रकाश गोविन्द ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, इस वर्ष मानसून का आगमन कुछ विलम्ब से हुआ है, किन्तु देश के अधिकतर भागों में अच्छी वर्षा हो रही है। इधर आपके प्रिय स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में भी मल्हार अंग के रागों की स्वर-वर्षा जारी है। अब तक आपने मेघ मल्हार और मियाँ की मल्हार का आनन्द प्राप्त किया है। अगले अंक से हम मल्हार का एक और प्रकार लेकर आपकी महफिल में उपस्थित होंगे। रविवार को प्रातः ९-३० बजे आप और हम ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में पुनः मिलेंगे। तब तक के लिए हमें विराम लेने की अनुमति दीजिए।

कृष्णमोहन मिश्र

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