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Sunday, February 16, 2020

राग पूरिया कल्याण : SWARGOSHTHI – 456 : RAG PURIYA KALYAN






स्वरगोष्ठी – 456 में आज

मारवा थाट के राग – 5 : राग पूरिया कल्याण

कौशिकी चक्रवर्ती से राग पूरिया कल्याण और शंकर महादेवन व महेश काले से मराठी फिल्मी नाट्यगीत सुनिए




शंकर महादेवन
कौशिकी चक्रवर्ती
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “मारवा थाट के राग” की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार उस समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से छठा थाट मारवा है। इस श्रृंखला में हम मारवा थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम मारवा थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। आज के अंक में मारवा थाट के जन्य राग पूरिया कल्याण पर चर्चा करेंगे। आज श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध विदुषी कौशिकी चक्रवर्ती के स्वर में राग पूरिया कल्याण की एक रचना का रसास्वादन कराएंगे और फिर इसी राग पर आधारित एक मराठी फिल्म का गीत पहले शंकर महादेवन से और फिर यही गीत विस्तार से युवा गायक महेश काले के स्वर में प्रस्तुत करेंगे। 2015 में प्रदर्शित मराठी फिल्म “कटयार कालजात घुसली” से पारम्परिक मराठी नाट्य संगीत संगीतज्ञ पण्डित जितेन्द्र अभिषेकी संगीतबद्ध किया और शंकर एहसान लाय द्वारा फिल्म में शामिल किया गया एक नाट्य गीत; “मुरलीधर श्याम...” का रसास्वादन भी आप करेंगे।


राग पूरिया कल्याण को मारवा थाट जन्य माना जाता है। इसमें ऋषभ स्वर कोमल मध्यम स्वर तीव्र प्रयोग किया जाता है। राग का वादी स्वर गान्धार संवादी स्वर निषाद होता है। सायंकाल सन्धिप्रकाश का समय इस राग के गायन-वादन के लिए सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। स्वयं राग के नाम से ही स्पष्ट है कि इस राग में दो रागों, पूरिया और कल्याण का मिश्रण है। राग के पूर्वांग में पूरिया और उत्तरांग में कल्याण होता है। इस राग में षडज की उपेक्षा करते हुए इसका चलन अधिकतर निषाद से प्रारम्भ करते हैं। इसी प्रकार उत्तरांग में तीव्र मध्यम और धैवत के बीच पंचम स्वर की उपेक्षा की जाती है। यह राग सन्धिप्रकाश तो है ही, परमेल प्रवेशक राग भी है। कारण स्पष्ट है कि यह राग मारवा थाट से कल्याण थाट के रागों में प्रवेश करता है। शास्त्रीय दृष्टि से इसका गायन-वादन समय सायंकाल सात बजे से पूर्व होना चाहिए, किन्तु प्रायः गायक और वादक रात्रि के दस बजे के आसपास तक कल्याण के समय में इसे गाते-बजाते है। राग पूरिया कल्याण के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन कराने के लिए अब हम आपके लिए सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित अजय चक्रवर्ती की सुपुत्री और योग्य गायिका कौशिकी चक्रवर्ती के स्वर में दो खयाल रचनाएँ 'फेसबुक' के सौजन्य से प्रस्तुत कर रहे हैं।

राग पूरिया कल्याण : खयाल – “ओ मन रसिया...” और “लाखों में एक...” : कौशिकी चक्रवर्ती


महेश काले 
राग पूरिया कल्याण का ऋषभ राग मारवा के समान स्वतंत्र नहीं लगता, बल्कि पूरिया के समान इसमें गान्धार प्रमुख और ऋषभ गौड़ रहता है। ऋषभ बढ़ाने पर पूरिया कल्याण के स्थान पर मारवा कल्याण की सृष्टि होगी। इस राग में ऋषभ, पंचम और धैवत स्वरों का बड़ा महत्त्व है। बीच-बीच में इन स्वरों का प्रयोग आवश्यक है। ये स्वर पूरिया और कल्याण रागों का सुन्दर समन्वय करते हैं। कल्याण राग से बचाने के लिए कोमल ऋषभ स्वर का प्रयोग आवश्यक है, पूरिया से बचाने के लिए पंचम स्वर और पूरिया धनाश्री से बचाने के लिए शुद्ध धैवत स्वर का प्रयोग आवश्यक है। कुछ लोग पूर्वा कल्याण और पूरिया कल्याण को एक ही समझते हैं, किन्तु दोनों बिलकुल अलग है। पूर्वा कल्याण में पूरिया, मारवा और कल्याण रागों का मिश्रण होता है, जबकि पूरिया कल्याण राग में पूरिया और कल्याण रागों का मिश्रण होता है। इस राग में कोमल ऋषभ, पंचम और धैवत ये तीन स्वर बड़े महत्त्व के हैं। इन तीनों स्वरों के उचित प्रयोग से राग पूरिया कल्याण की रक्षा की जा सकती है और उसे किसी समप्रकृति राग से बचाया जा सकता है। राग पूरिया कल्याण के फिल्मी उदाहरण के लिए हमने 2015 में प्रदर्शित मराठी फिल्म “कटयार कालजात घुसली” का एक गीत चुना है। यह गीत मूलतः सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित जितेन्द्र अभिषेकी का संगीतबद्ध किया मराठी नाट्य संगीत है। राग पूरिया कल्याण, तीनताल में निबद्ध यह गीत फिल्म में गायक और संगीतकार शंकर महादेवन के स्वर में प्रस्तुत किया गया है। मिल्म में संगीत संयोजन शंकर, एहसान, लाय ने किया है। इसी गीत का एक अन्य वीडियो संस्करण फेसबुक के सौजन्य से युवा गायक महेश काले के स्वर में हम प्रस्तुत कर रहे हैं। आप इस गीत के दोनों संस्करण सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग पूरिया कल्याण : “मुरलीधर श्याम...” : शंकर महादेवन : फिल्म – कटयार कालजात घुसली



राग पूरिया कल्याण : “मुरलीधर श्याम...” : महेश काले : अलबम – नाट्यभक्तिरंग





संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 456वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1963 में प्रदर्शित एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 460वें अंक की पहेली तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें वर्ष के प्रथम सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायक का स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 23 फरवरी, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 458 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 454वें अंक में हमने आपसे 1959 में प्रदर्शित फिल्म “चाचा ज़िन्दाबाद” से एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – ललित, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मन्ना डे और लता मंगेशकर

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, खण्डवा, मध्यप्रदेश से रविचन्द्र जोशी, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को दो दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “मारवा थाट के राग” की पाँचवीं कड़ी में आज आपने मारवा थाट के जन्य राग पूरिया कल्याण का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने सुविख्यात गायिका विदुषी कौशिकी चक्रवर्ती के स्वर में इस राग के दो खयाल प्रस्तुत किये। राग पूरिया कल्याण के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत के उदाहरण के लिए हमने आपके लिए मराठी फिल्म “कटयार कालजात घुसली” का एक गीत शंकर महादेवन के स्वर में प्रस्तुत किया। साथ ही सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित जितेन्द्र अभिषेकी का स्वरबद्ध किया, युवा गायक महेश काले के स्वर में मूल गीत भी सुना। फिल्म के संगीतकार शंकर एहसान लाय हैं। अगले अंक से हम एक नई श्रृंखला आरम्भ करेंगे। कुछ तकनीकी समस्या के कारण अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग पूरिया कल्याण : SWARGOSHTHI – 456 : RAG PURIYA KALYAN : 16 फरवरी, 2020

Sunday, August 16, 2015

प्रातःकाल के राग : SWARGOSHTHI – 232 : MORNING RAGA




स्वरगोष्ठी – 232 में आज


रागों का समय प्रबन्धन – 1 : दिन के प्रथम प्रहर के राग

‘जग उजियारा छाए, मन का अँधेरा जाए...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से हम एक नई श्रृंखला- ‘रागों का समय प्रबन्धन’ आरम्भ कर रहे हैं। श्रृंखला की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। है। उत्तर भारतीय रागदारी संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं या प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों को गाने-बजाने की एक निर्धारित समयावधि होती है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर, दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर, रात्रि के प्रहर कहलाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा करेंगे। श्रृंखला की पहली कड़ी में आज हम आपसे दिन के प्रथम प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के प्रमुख राग बिलावल की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती और उनकी सुपुत्री कौशिकी चक्रवर्ती के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही राग भैरव पर आधारित, फिल्म ‘जागते रहो’ का एक गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में सुनवा रहे हैं।



भारतीय कालगणना सिद्धान्तों के अनुसार नये दिन का आरम्भ सूर्योदय के साथ होता है। सूर्योदय से लेकर तीन घण्टे तक प्रथम प्रहर माना जाता है। भारत में सूर्योदय का समय ऋतु और स्थान के अनुसार चार से सात बजे के बीच बदलता रहता है। संगीत के प्रथम प्रहर का निर्धारण समान्यतः प्रातःकाल 6 से 9 बजे के बीच किया गया है। रागों का समय निर्धारण कुछ प्रमुख सिद्धान्तों के आधार पर किया गया है। इन सिद्धान्तों की चर्चा हम अगली कड़ी से करेंगे। सामान्यतः प्रातःकाल के रागों में शुद्ध मध्यम वाले राग और ऋषभ और धैवत कोमल स्वर वाले राग होते हैं। प्रथम प्रहर के कुछ मुख्य राग हैं- बिलावल, अल्हैया बिलावल, अरज, भैरव, अहीर भैरव, आनन्द भैरव, आभेरी, आभोगी, गुणकली, जोगिया, देशकार, रामकली, विभास, वैरागी और भैरवी आदि। आज हम पहले राग बिलावल का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

बिलावल राग, बिलावल थाट का आश्रय राग है। यह सभी शुद्ध स्वरों वाला सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात इसके आरोह और अवरोह सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। राग बिलावल का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। अब हम आपके लिए इस राग की एक बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं। तीनताल में निबद्ध इस रचना के बोल है- ‘रब सों नेहा लगाओ रे मनवा...’। यह बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं, पटियाला (कसूर) घराने की गायकी में सिद्ध पण्डित अजय चक्रवर्ती। इस प्रस्तुति में उनका साथ दे रही हैं, अजय जी की ही सुपुत्री कौशिकी चक्रवर्ती।


राग बिलावल : रब सों नेहा लगाओ रे मनवा...’ : अजय चक्रवर्ती और कौशिकी चक्रवर्ती





आज का दूसारा प्रातःकालीन भैरव थाट का आश्रय राग भैरव है। इस राग का गायन-वादन सन्धिप्रकाश काल में भी किया जाता है। राग भैरव भी सम्पूर्ण जाति का राग है किन्तु इसमें ऋषभ और धैवत स्वर कोमल प्रयोग होता है। इसका वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग ‘भैरव’ पर आधारित फिल्मी गीतों में से एक अत्यन्त मनमोहक गीत आज हमने चुना है। 1956 में विख्यात फ़िल्मकार राज कपूर ने महत्वाकांक्षी फिल्म ‘जागते रहो’ का निर्माण किया था। इस फिल्म के संगीतकार सलिल चौधरी का चुनाव स्वयं राज कपूर ने ही किया था, जबकि उस समय तक शंकर-जयकिशन उनकी फिल्मों के स्थायी संगीतकार बन चुके थे। फिल्म ‘जागते रहो’ बांग्ला फिल्म ‘एक दिन रात्रे’ का हिन्दी संस्करण था और बांग्ला संस्करण के संगीतकार सलिल चौधरी को ही हिन्दी संस्करण के संगीत निर्देशन का दायित्व दिया गया था। सलिल चौधरी ने इस फिल्म के गीतों में पर्याप्त विविधता रखी। इस फिल्म में उन्होने एक गीत ‘जागो मोहन प्यारे, जागो...’ की संगीत रचना ‘भैरव’ राग के स्वरों पर आधारित की थी। शैलेन्द्र के लिखे गीत जब लता मंगेशकर के स्वरों में ढले, तब यह गीत हिन्दी फिल्म संगीत का मीलस्तम्भ बन गया। आइए, आज हम राग ‘भैरव’ पर आधारित, फिल्म ‘जागते रहो’ का यह गीत सुनते हैं। आप इस गीत का रसास्वादन करें और हमें श्रृंखला की पहली कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भैरव : ‘जागो मोहन प्यारे...’ : लता मंगेशकर : फिल्म - जागते रहो : संगीत - सलिल चौधरी





संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 232वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 240वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – गायिका के स्वर को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 22 अगस्त, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 234वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 230 की संगीत पहेली में हमने आपको उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई पर प्रस्तुत कजरी का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य शहनाई, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल दादरा और कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ। इस बार की पहेली में पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने सही उत्तर दिये हैं। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। तीसरी श्रृंखला के विजेताओं के प्राप्तांक हम अगले अंक में प्रकाशित करेंगे।


अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘रागों का समय प्रबन्धन’ का यह पहला अंक था। अगले अंक में हम दिन के दूसरे प्रहर के रागों पर आधारित चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 



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