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Monday, August 24, 2009

पतवार पहन जाना... ये आग का दरिया है....गीत संगीत के माध्यम से चेता रहे हैं विशाल और गुलज़ार.

ताजा सुर ताल (16)

ताजा सुर ताल में आज पेश है फिल्म "कमीने" का एक थीम आधारित गीत.

सजीव - मैं सजीव स्वागत करता हूँ ताजा सुर ताल के इस नए अंक में अपने साथी सुजॉय के साथ आप सब का...

सुजॉय - सजीव क्या आप जानते हैं कि संगीतकार विशाल भारद्वाज के पिता राम भारद्वाज किसी समय गीतकार हुआ करते थे। जुर्म और सज़ा, ज़िंदगी और तूफ़ान, जैसी फ़िल्मों में उन्होने गानें लिखे थे..

सजीव - अच्छा...आश्चर्य हुआ सुनकर....

सुजॉय - हाँ और सुनिए... विशाल का ज़िंदगी में सब से बड़ा सपना था एक क्रिकेटर बनने का। उन्होप्ने 'अंडर-१९' में अपने राज्य को रीप्रेज़ेंट भी किया था। हालाँकि उनके पिता चाहते थे कि विशाल एक संगीतकार बने, उन्होने अपने बेटे को क्रिकेट खेलने से नहीं रोका।

सजीव - ठीक है सुजॉय मैं समझ गया कि आज आप विशाल की ताजा फिल्म "कमीने" से कोई गीत श्रोताओं को सुनायेंगें, तभी आप उनके बारे में गूगली सवाल कर रहे हैं मुझसे....चलिए इसी बहाने हमारे श्रोता भी अपने इस प्रिय संगीतकार को करीब से जान पायेंगें...आप और बताएं ...

सुजॉय - जी सजीव, जाने माने गायक और सुर साधक सुरेश वाडकर ने विशाल भारद्वाज को फ़िल्मकार गुलज़ार से मिलवाया। गुलज़ार साहब उन दिनों अपनी नई फ़िल्म 'माचिस' पर काम कर रहे थे। सोना सोने को पहचान ही लेता है, और गुलज़ार साहब ने भी विशाल के प्रतिभा को पहचान लिया और उन्हे 'माचिस' के संगीत का भार दे दिया। "छोड़ आए हम वो गलियाँ", "चप्पा चप्पा चरखा चले" तथा "पानी पानी रे" जैसे इस फ़िल्म के गीतों ने अपार लोकप्रियता हासिल की, और विशाल भारद्वाज रातों रात सुर्खियों में आ गए।

सजीव - कहते हैं ना कि जब तक कोई सफल नहीं हो जाता, उसे कोई नहीं पूछता। 'फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड' मिलने से पहले तक हर कोई विशाल भारद्वाज से मुँह फेरते रहे और जैसे उन्हे अवार्ड मिला, वही लोग शुभकामनायों के साथ गुल्दस्ते भेजने लगे। ख़ैर, ये तो दुनिया का नियम है, और इसलिए विशाल ने भी इसे अपने दिल पे नहीं लिया बिल्कुल अपने ही बनाए उस गीत की तरह "दिल पे मत ले यार"। पर यही चुभन जोश बन कर विशाल भारद्वाज में पनपने लगी, और कुछ कर दिखाने की चाहत सदा उनके मन में रहने लगी। 'माचिस' के अद्‍भुत संगीत से प्रभावित हो कर कमल हासन ने उन्हे 'चाची ४२०' के संगीत का दायित्व दे दिया। उपरवाला जब देता है तब छप्पड़ फाड़ के देता है। राम गोपाल वर्मा ने विशाल को दिया 'सत्या' का संगीत और गुलज़ार ने एक बार फिर अपनी फ़िल्म 'हु तु तु' के संगीत की ज़िम्मीदारी उन्हे सौंपी। और इस तरह से विशाल भारद्वाज का संगीत जलधारा की तरह बहने लगी "छई छपा छई छप्पाक छई" करती हुई।

सुजॉय - हाँ और विशाल भारद्वाज की ताजातरीन प्रस्तुति है फिल्म 'कमीने' का संगीत, जो इन दिनों ख़ूब पसंद किए जा रहा हैं। आज 'ताज़ा सुरताल' में इसी फ़िल्म का एक बड़ा ही महत्वपूर्ण गीत आप को सुनवा रहे हैं। विशाल की यह फ़िल्म है, ज़ाहिर है संगीत भी उन्ही का है और गानें लिखे हैं उनके चहेते गीतकार गुलज़ार साहब ने। कमाल की बात देखिए, कभी गुलज़ार ने अपनी बनायी फ़िल्म 'माचिस' में विशाल को ब्रेक दिया था, आज वही विशाल जब एक सुप्रतिष्ठित फ़िल्मकार व संगीतकार बन गए हैं, तो उनकी निर्मित फ़िल्म में वही गुलज़ार साहब गानें लिख रहे हैं। तो हाँ, 'कमीने' के जिस गीत की हम आज बात कर रहे हैं उसे इन दिनों आप हर चैनल पर देख और सुन रहे होंगे, "फ़टाक"। सुखविंदर सिंह, कैलाश खेर और साथियों के गाए इस गीत में आज की एक ज्वलंत समस्या और उसके हल की तरह हमारा ध्यान आकृष्ट किया गया है। HIV virus को काले भंवरे का रूप दे कर इससे होने वाली जान लेवा बिमारी AIDS की रोक थाम के लिए ज़रूरी प्रयासों की बात की गई है इस गीत में। भले ही गीत के फ़िल्मांकन में रेड लाइट अरिया को दर्शाया गया है, लेकिन आज की युवा पीढ़ी जिस खुले विचारों से यौन संबंधों में बंध रही है, यह गीत सिर्फ़ वेश्यालयो के लिए ही नहीं बल्कि सभी के लिए समान मायने रखता है।

सजीव - अगर मैं अपने विचार रखूं, तो इस एल्बम का सबसे उत्कृष्ट गीत है, जहाँ शब्द गायिकी और संगीत सभी कुछ परफेक्ट है. सबसे अच्छी बात है ये है कि ये एक सामान्य प्रेम गीत आदि न होकर आज के सबसे ज्वलंत मुद्दे को केंद्र में रख कर बनाया गया है. मेरे ख्याल से इस गीत एक बहुत बढ़िया माध्यम बनाया जा सकता है AIDS के प्रति लोगों को जगुरुक बनाने में. गुलज़ार साहब के क्या कहने, ग़ालिब के मशहूर शेर "ये इश्क नहीं आसाँ..." का इस्तेमाल गुलज़ार साहब ने शानदार तरीके से किया है कि बस मुँह से वाह वाह ही निकलती है -

"ये इश्क नहीं आसाँ,
अजी AIDS का खतरा है,
पतवार पहन जाना,
ये आग का दरिया है...
."

गीत के बोल यदि इस गीत की जान है तो गायक सुखविंदर और कैलाश ने इतना बढ़िया गाया है जिससे गीत को एक अलग ही स्तर मिल गया है, ये दोनों ही आज के सबसे हरफनमौला गायकों में हैं जो सिर्फ गले से नहीं दिल से गाते हैं.(सुखविंदर जब कहते हैं "कि आया रात का जाया रे ..." सुनियेगा) और विशाल के संगीत की भी जितनी तारीफ की जाए कम है..."फाटक" शब्द को जिस खूबी से इस्तेमाल किया है वो गीत में आम आदमी की रूचि को बरकरार रखता है साथ ही ये एक प्रतीक भी है इस बिमारी से शरीर और मन पर होने वाली मार का (जैसे ध्वनि हों कोडों की). गीत का फिल्माकन भी भी बेहद शानदार है, एक बार फिर विशाल और उनके नृत्य संयोजक बधाई के पात्र हैं. आपका क्या ख्याल है सुजॉय...

सुजॉय - दोस्तों, आप ने फ़िल्म 'मनचली' का वो गीत तो सुना होगा ना, लता जी की आवाज़ में, "कली कली चूमे, गली गली घूमें, भँवरा बे-इमान, कभी इस बाग़ में, कभी उस बाग़ में"। बे-इमान भँवरे की इसी स्वभाव को बड़ी ही चतुराई से गुलज़ार साहब ने यह संदेश देने के लिए इस्तेमाल किया है कि भँवरे की तरह फूल फूल पे मत न मंडराओ, यानी कि एकाधिक यौन संबंध मत रखो, और अगर रखो तो सुरक्षा को ध्यान में रख कर। दोस्तों, अब आगे इससे ज़्यादा कुछ कहने की ज़रूरत नहीं, आप गीत सुनिए। दहेज, शोषण, बाल मज़दूरी, आदि तमाम सामाजिक मुद्दों पर कई गानें बने हैं, लेकिन आज की इस ज्वलंत समस्या पर पहली बार किसी फ़िल्मकार ने बीड़ा उठाया है, जिसकी तारीफ़ किए बिना हम नहीं रह सकते। विशाल भारद्वाज और गुलज़ार साहब को थ्री चीयर्स!!! गीत के बोल कुछ यूं है -

भवंरा भवंरा आया रे,
गुनगुन करता आया रे,
फटाक फटाक.....
सुन सुन करता गलियों से अब तक कोई न भाया रे
सौदा करे सहेली का,
सर पे तेल चमेली का,
कान में इतर का भाया रे....
फटाक फटाक...

गिनती न करना इसकी यारों में,
आवारा घूमे गलियारों में
चिपकू हमेशा सताएगा,
ये जायेगा फिर लौटा आएगा,
फूल के सारे कतरे हैं,
जान के सारे खतरे हैं...
कि आया रता का जाया रे...
फटाक फटाक.....

जितना भी झूठ बोले थोडा है,
कीडों की बस्ती का मकौड़ा है,
ये रातों का बिच्छू है कटेगा,
ये जहरीला है जहर चाटेगा...
दरवाजों पे कुंडे दो,
दफा करो ये गुंडे,
ये शैतान का साया रे....
फटाक फटाक...

ये इश्क नहीं आसाँ,
अजी AIDS का खतरा है,
पतवार पहन जाना,
ये आग का दरिया है...
ये नैया डूबे न
ये भंवरा काटे न.....

और अब सुनिए ये गीत -




आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 4.5 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

क्या आप जानते हैं ?
आप नए संगीत को कितना समझते हैं चलिए इसे ज़रा यूं परखते हैं.सुखविंदर और कैलाश खेर ने इस गीत से पहले रहमान के संगीत निर्देशन के एक मशहूर दोगाना गाया है, जानते हैं कौन सा है वो गीत ? बताईये और हाँ जवाब के साथ साथ प्रस्तुत गीत को अपनी रेटिंग भी अवश्य दीजियेगा.

पिछले सवाल का सही जवाब दिया नीलम जी ने बधाई...शमिख जी, शैलेश जी, नीलम जी और मंजू जी सभी ने रेटिंग देकर हौंसला बढाया आभार.


अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Thursday, August 13, 2009

ये बरकत उन हज़रत की है....मोहित चौहान ने किया कबूल गुलज़ार के शब्दों में

ताजा सुर ताल (14)

जीव - नमस्कार दोस्तों, मैं हूँ सजीव और मेरे साथ है, आवाज़ के हमकदम सुजॉय...

सुजॉय - सभी दोस्तों को मेरा नमस्कार...

सजीव - सुजॉय लगता है ताज़ा सुर ताल धीरे धीरे अपने उद्देश्य में कामियाब हो रहा है. बिलकुल वैसे ही जैसे ओल्ड इस गोल्ड का उद्देश्य आज की पीढी को पुराने गीतों से जोड़ना था, ताज़ा सुर ताल का लक्ष्य संगीत की दुनिया में उभरते नये नामों से बीती पीढी को मिलवाना है और देखिये पिछले अंक में शरद जी ने हमें लिखा कि उन्होंने मोहित चौहान का नाम उस दिन पहली बार सुना था हमें यकीं है शरद जी अब कभी इस नाम को नहीं भूलेंगे...

सुजॉय - हाँ सजीव, ये स्वाभाविक ही है. जैसा कि उन्होंने खुद भी लिखा कि जिन दिग्गजों को वो सुनते आ रहे हैं उनके समक्ष उन्हें इन गायकों में वो दम नज़र नहीं आता. पर ये भी सच है कि आज की पीढी इन्हीं नए कलाकारों की मुरीद है तो संगीत तो बहता ही रहेगा...फनकार आते जाते रहेंगें...

सजीव - बिलकुल सही....इसलिए ये भी ज़रूरी है कि हम समझें आज के इस नए दौर के युवाओं के दिलों पर राज़ कर रहे फनकारों को भी. तो सुजॉय जैसा कि हमने वादा किया था कि हम मोहित के दो गीत एक के बाद एक सुनवायेंगे, तो आज कौन सा गीत लेकर आये हैं आप मोहित का...कहीं ये वो तो नहीं जो इन दिनों हर किसी की जुबां पर है ?

सुजॉय - बिलकुल सही पहचाना....पहले प्यार का पहला पहला नजराना...

सजीव - पहले प्यार की बहुत अहमियत है जीवन में....कहते हैं प्यार बस एक ही बार होता है....यानी जो पहला है वही आखिरी भी....क्या मैं सही कह रहा हूँ ?

सुजॉय - १९९३ में जब "हम आपके हैं कौन" प्रर्दशित हुई थी तो उसका एक गीत "पहला पहला प्यार है..." इतना लोकप्रिय हो गया था कि युवा दिलों का एक एंथम जैसा बन गया था...कुछ वैसा ही अब है २००९ में आये फिल्म "कमीने" के इस गीत की बात. बहुत कुछ इस दरमियाँ बदल गया बस नहीं बदला तो यही पहला पहला प्यार....जहाँ अब ये मोहर भी लग गयी है कि यही आखिरी प्यार भी है....

सजीव - इस पहले और आखिरी प्यार को अभिव्यक्ति दी है गुलज़ार साहब ने....उनका लेखन सबसे अलहदा है -

याद है पीपल कि जिसके घने साए थे,
हमने गिलहरी के झूठे मटर खाए थे,
ये बरकत उन हज़रत की है...

सुजॉय - हाँ "ख्वाब के बोझ से....पलकों का कंपकपाना" भी बहुत खूब है, एक बात और ये जो शब्द है "टीपना" (गाल पे), ये बंगला में हम लोग बहुत इस्तेमाल करते हैं, पर हिंदी में इस शब्द का अधिक इस्तेमाल नहीं होता, पर गुलज़ार साहब ने यहाँ बहुत बढ़िया ढंग से पिरोया है गाने में.

सजीव - अब कोई ऐसे शब्द लिखे तो हम तारीफ कैसे न करें भाई....पर जितने सुंदर शब्द है उतना ही सूथिंग और मन लुभावना संगीत है विशाल का और इस तरह के गीत मोहित के फोर्टे हैं जैसा कि हम पहले भी बता चुके हैं. पिछली बार हमने श्रोताओं से पुछा था कि मोहित का सबसे पहला गीत कौन सा था.....हमें सही जवाब नहीं मिला....सुजॉय आप बताएं कि सही जवाब क्या था.

सुजॉय - फ़िल्म संगीत में मोहित चौहान ने क़दम रखा एक 'लो बजट' फ़िल्म 'लेट्स एंजोय' में एक गीत गा कर, जिसके शुरूआती बोल थे "सब से पीछे"। इस गीत ने भले ही उन्हे सब से आगे ला कर खड़ा नहीं किया लेकिन उनकी गाड़ी चल पड़ी थी। थोड़े ही समय में उन्होने फ़िल्म 'रोड' का मशहूर गीत "पहली नज़र में करी थी" गा कर रातों रात सब की नज़र में आ गये। उसके बाद तो जे. ओम प्रकाश मेहरा की क्रांतिकारी फ़िल्म 'रंग दे बसंती' में रहमान ने उनसे गवाया ऐसा गीत जिसने बॉलीवुड के पार्श्वगायक समुदाय में हलचल पैदा कर दी। जी हाँ, वह गीत था "ख़ून चला"। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि मोहित चौहान को किसी तरह की संघर्ष नहीं करना पड़ा, उन्होने इस संगीत की दुनिया में कई कई बार वापसी की और फिर से गुमनामी में खो गये। लेकिन पिछले कुछ महीनों में उनके गाये हुए गीतों को सुनकर अब ऐसा लगने लगा है कि मोहित भाई साहब यहाँ एक लम्बी पारी खेलने वाले हैं।

सजीव - हाँ बिलकुल, वैसे मुझे उनका गाया फिल्म "मैं मेरी पत्नी और वोह" का "गुंचा कोई" सबसे अधिक पसंद है. पर कमीने का ये गीत भी दोस्तों कुछ कम नहीं है. हालाँकि शुरू के बोलों को सुन कर कुछ कुछ "माँ" गीत जो कि फिल्म "तारे ज़मीन पर" का है उसकी याद आती है पर बाद में गीत का अपना एक मोल्ड बन जाता है. आवाज़ की टीम ने इस गीत को भी दिए हैं ४ अंक ५ में से. अब आप सुनें और बतायें कि आपके हिसाब से इस ताज़ा गीत को कितने अंक मिलने चाहिए.

सुजॉय - हाँ बोल कुछ इस प्रकार हैं -

थोड़े भीगे भीगे से थोड़े नम हैं हम,
कल से सोये वोए भी कम हैं हम,
दिल ने कैसी हरकत की है,
पहली बार मोहब्बत की है...
आखिरी बार मोहब्बत की है....

ऑंखें - डूबी डूबी सी सुरमई मध्यम...
झीलें - पानी पानी बस तुम और हम....
बात बड़ी हैरत की है....
पहली बार.....

ख्वाब के बोझ से कंपकपाती हुई,
हल्की पलकें तेरी, याद आता है सब,
तुझे गुदगुदाना, सताना,
यूहीं सोते हुए,
गाल पे टीपना, मीचना ,
बेवजह, बेसबब...
याद है पीपल कि जिसके घने साए थे,
हमें गिलहरी के झूठे मटर खाए थे...
ये बरकत उन हज़रत की है...
पहली बार....



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 4 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

क्या आप जानते हैं ?
आप नए संगीत को कितना समझते हैं चलिए इसे ज़रा यूं परखते हैं. गीतकार पियूष मिश्रा ने गुलाल के बाद एक ताजा तरीन फिल्म में एक दिग्गज संगीतकार के साथ काम किया है, कौन सी है ये फिल्म और कौन हैं वो संगीतकार ? बताईये और हाँ जवाब के साथ साथ प्रस्तुत गीत को अपनी रेटिंग भी अवश्य दीजियेगा.

पिछले सवाल का सही जवाब हम दे ही चुके हैं, हमारे श्रोताओं में से कोई इसे सही नहीं पकड़ पाया. पर ख़ुशी इस बात की है कि लगभग सभी श्रोताओं ने रेटिंग देकर हमारा हौंसला बढाया है. जमे रहिये आवाज़ के सगीत सफ़र में यूहीं....


अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Thursday, July 23, 2009

एक दिल से दोस्ती थी ये हुज़ूर भी कमीने...विशाल भारद्वाज का इकरारनामा

ताजा सुर ताल (12)

त्मावलोकन यानी खुद के रूबरू होकर बीती जिंदगी का हिसाब किताब करना, हम सभी करते हैं ये कभी न कभी अपने जीवन में और जब हमारे फ़िल्मी किरदार भी किसी ऐसी अवस्था से दोचार होते हैं तो उनके ज़ज्बात बयां करते कुछ गीत भी बने हैं हमारी फिल्मों में, अक्सर नतीजा ये निकलता है कि कभी किस्मत को दगाबाज़ कहा जाता है तो कभी हालतों पर दोष मढ़ दिया जाता है कभी दूसरों को कटघरे में खडा किया जाता है तो कभी खुद को ही जिम्मेदार मान कर इमानदारी बरती जाती है. रेट्रोस्पेक्शन या कन्फेशन का ही एक ताजा उदाहरण है फिल्म "कमीने" का शीर्षक गीत. फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ जिंदगी को तो बा-इज्ज़त बरी कर दिया है और दोष सारा बेचारे दिल पर डाल दिया गया है, देखिये इन शब्दों को -

क्या करें जिंदगी, इसको हम जो मिले,
इसकी जाँ खा गए रात दिन के गिले....
रात दिन गिले....
मेरी आरजू कामिनी, मेरे ख्वाब भी कमीने,
एक दिल से दोस्ती थी, ये हुज़ूर भी कमीने...


शुरू में ये इजहार सुनकर लगता है कि नहीं ये हमारी दास्तान नहीं हो सकती, पर जैसे जैसे गीत आगे बढता है सच आइना लिए सामने आ खडा हो जाता है और कहीं न कहीं हम सब इस "कमीनेपन" के फलसफे में खुद को घिरा हुआ पाते हैं -

कभी जिंदगी से माँगा,
पिंजरे में चाँद ला दो,
कभी लालटेन देकर,
कहा आसमान पे टांगों.
जीने के सब करीने,
थे हमेशा से कमीने,
कमीने...कमीने....
मेरी दास्ताँ कमीनी,
मेरे रास्ते कमीने,
एक दिल से दोस्ती थी, ये हुज़ूर भी कमीने...

शायद ही किसी हिंदी गीत में "कमीने" शब्द इस तरह से प्रयोग हुआ हो, शायद ही किसी ने कभी गीत जिंदगी का इतना बोल्ड अवलोकन किया हो. इस डार्क टेक्सचर के गीत में तीन बातें है जो गीत को सफल बनाते है. विशाल ने इस गीत के जो पार्श्व बीट्स का इस्तेमाल किया है वो एकदम परफेक्ट है गीत के मूड पर, अक्सर स्वावलोकन में जिंदगी बेक गिअर में भागती है, कई किरदार कई, किस्से और संगीत संयोजन शब्दों के साथ साथ एक अनूठा सफ़र तय करता है, दूसरा प्लस है विशाल की खुद अपनी ही आवाज़ जो एक दम तटस्थ रहती है भावों के हर उतार चढावों में भी इस आवाज़ में दर्द भी है और गीत के "पन्च" शब्द 'कमीने' को गरिमापूर्ण रूप से उभारने का माद्दा भी और तीसरा जाहिर है गुलज़ार साहब के बोल, जो दूसरे अंतरे तक आते आते अधिक व्यक्तिगत से हो जाते हैं -

जिसका भी चेहरा छीला,
अन्दर से और निकला,
मासूम सा कबूतर,
नाचा तो मोर निकला,
कभी हम कमीने निकले,
कभी दूसरे कमीने,
मेरी दोस्ती कमीनी,
मेरे यार भी कमीने...
एक दिल से दोस्ती थी,
ये हुज़ूर भी कमीने....

अब हमारा अवलोकन किस हद तक सही है ये तो आप गीत सुनकर ही बता पायेंगें.चलिए अब बिना देर किये सुन डालिए ताजा सुर ताल में फिल्म "कमीने" का ये गीत -



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 4 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

क्या आप जानते हैं ?
आप नए संगीत को कितना समझते हैं चलिए इसे ज़रा यूं परखते हैं. फिल्म "ओमकारा" में भी संगीतकार विशाल ने एक युगल गीत को आवाज़ दी थी, कौन सा था वो गीत, बताईये और हाँ जवाब के साथ साथ प्रस्तुत गीत को अपनी रेटिंग भी अवश्य दीजियेगा.

पिछले सवाल का सही जवाब था अध्ययन सुमन जो कि टेलीविजन ऐक्टर शेखर सुमन के बेटे हैं. दिशा जी ने एकदम सही जवाब दिया जी हाँ उन्होंने फिल्म राज़ (द मिस्ट्री) में भी काम किया था, और तभी से महेश भट्ट कैम्प के स्थायी सदस्य बन चुके हैं. तनहा जी ने फिल्म "हाले-ए- दिल" का भी जिक्र किया. त्रुटि सुधार के लिए आप दोनों का धन्येवाद. मंजू जी, मनीष जी, निर्मला जी, प्रज्ञा जी ने भी गीत को पसंद किया. मनु जी रेटिंग आपने लिख कर बतानी है जैसे 5 में से 3, २ या १ इस तरह.:) वर्ना हम कैसे जान पायेंगें कि आपकी रेटिंग क्या है.


अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Wednesday, July 15, 2009

आजा आजा दिल निचोड़े....लौट आई है गुलज़ार और विशाल की जोड़ी इस जबरदस्त गीत के साथ

ताजा सुर ताल (9)

रसों पहले मनोज कुमार की फिल्म आई थी- "रोटी कपडा और मकान", यदि आपको ये फिल्म याद हो तो यकीनन वो गीत भी याद होगा जो जीनत अमान पर फिल्माया गया था- "हाय हाय ये मजबूरी...". लक्ष्मीकांत प्यारेलाल थे संगीतकार और इस गीत की खासियत थी वो सेक्सोफोन का हौन्टिंग पीस जो गीत की मादकता को और बढा देता है. उसी पीस को आवाज़ के माध्यम से इस्तेमाल किया है विशाल भारद्वाज ने फिल्म "कमीने" के 'धन ताना न" गीत में जो बज रहा है हमारे ताजा सुर ताल के आज के अंक में. पर जो भी समानता है उपरोक्त गीत के साथ वो बस यहीं तक खत्म हो जाती है. जैसे ही बीट्स शुरू होती है एक नए गीत का सृजन हो जाता है. गीत थीम और मूड के हिसाब से भी उस पुराने गीत के बेहद अलग है. दरअसल ये धुन हम सब के लिए जानी पहचानी यूं भी है कि आम जीवन में भी जब हमें किसी को हैरत में डालना हो या फिर किसी बड़े राज़ से पर्दा हटाना हो, या किसी को कोई सरप्राईस रुपी तोहफा देना हो, तो हम भी इस धुन का इस्तेमाल करते है, हमारी हिंदी फिल्मों में ये पार्श्व संगीत की तरह खूब इस्तेमाल हुआ है, शायद यही वजह है कि इस धुन के बजते ही हम स्वाभाविक रूप से गीत से जुड़ जाते हैं. "ओमकारा" और "नो स्मोकिंग" के बाद विशाल भारद्वाज और गुलज़ार साहब की हिट जोड़ी लौटी है इस गीत के साथ -

आजा आजा दिल निचोड़े,
रात की मटकी फोडें,
कोई गुड लक् निकालें,
आज गुल्लक तो फोडें...


सुखविंदर की ऊर्जा से भरी हुई आवाज़ को सुनकर यूं भी जोश आ जाता है, साथ में जो गायक हैं उनका चयन एक सुखद आश्चर्य है, ये हैं विशाल शेखर जोड़ी के विशाल दादलानी. जब एक संगीतकार किसी दूसरे संगीतकार की आवाज़ का इस्तेमाल अपने गीत के लिए करे तो ये एक अच्छा चिन्ह है.

दिल दिलदारा मेरा तेली का तेल,
कौडी कौडी पैसा पैसा पैसे का खेल....
धन ताना ताना न न.....


गुलज़ार साहब अपने शब्द चयन से आपको कभी निराश नहीं करते, बातों ही बातों में कई बड़े राज़ भी खोल जाते हैं वो जिन्दगी के. गौर फरमाएं -

आजा कि वन वे है ये जिन्दगी की गली
एक ही चांस है....
आगे हवा ही हवा है अगर सांस है तो ये रोमांस है....
यही कहते हैं यही सुनते हैं....
जो भी जाता है जाता है, वो फिर से आता नहीं....

आजा आजा....

संगीत संयोजन विशाल का अद्भुत है जो पूरे गाने में आपको चूकने नहीं देता. बेस गीटार की उठती हुई धुन, और ताल का अनोखा संयोजन गीत को ऐसी गति देता है जो उसके मूड को पूरी तरह जचता है -

कोई चाल ऐसी चलो यार अब कि समुन्दर भी
पुल पे चले,
फिर मैं चलूँ उसपे या तू चले शहर हो अपने पैरों तले...
कई खबरें हैं, कहीं कब्रे हैं,
जो भी सोये हैं कब्रों में उनको जगाना नहीं.....

आजा आजा....


शहर की रात और सपनों की उठान, मस्ती और जीने की तेज़ तड़प, बहुत कम समय में बहुत कुछ पाने की ललक, ये गीत इस सभी जज्बातों को एकदम सटीक अभिव्यक्ति देता है. आर डी बर्मन साहब के बाद यदि कोई संवेदनात्मक तरीके गुलज़ार साहब की काव्यात्मक लेखनी को परवाज़ दे सकता है तो वो सिर्फ और सिर्फ विशाल भारद्वाज ही हैं. ख़ुशी की बात ये है कि फिल्म "कमीने" के संगीत ने इस जोड़ी की सफलता में एक पृष्ठ और जोड़ दिया है, अन्य गीतों का जिक्र आगे, अभी सुनते हैं फिल्म "कमीने" से ये दमदार गीत.



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 4 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

क्या आप जानते हैं ?
आप नए संगीत को कितना समझते हैं चलिए इसे ज़रा यूं परखते हैं. विशाल के संगीत निर्देशन में एक सूफी गीत दिलेर मेहंदी ने गाया है, गुलज़ार साहब का लिखा. क्या याद है आपको वो गीत ? और हाँ जवाब के साथ साथ प्रस्तुत गीत को अपनी रेटिंग भी अवश्य दीजियेगा.



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

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