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Monday, June 15, 2009

वक़्त ने किया क्या हसीं सितम...तुम रहे न तुम हम रहे न हम

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 112

ज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड' बड़ा ही ग़मगीन है दोस्तो, क्यूँकि आज हम इसमें एक बेहद प्रतिभाशाली और कामयाब फ़िल्मकार और एक बहुत ही मशहूर और सुरीली गायिका के दुखद अंत की कहानी आप को बताने जा रहे हैं। अभिनेता और निर्माता-निर्देशक गुरुदत्त साहब की एक महत्वाकांक्षी फ़िल्म थी 'काग़ज़ के फूल' (१९५९)। इस फ़िल्म से गुरुदत्त को बहुत सारी उम्मीदें थीं। लेकिन व्यावसायिक रूप से फ़िल्म बुरी तरह से पिट गयी, जिससे गुरु दत्त को ज़बरदस्त झटका लगा। 'काग़ज़ के फूल' की कहानी कुछ इस तरह से थी कि सुरेश सिन्हा (गुरु दत्त) एक मशहूर फ़िल्म निर्देशक हैं। उनकी पत्नी बीना (वीणा) के साथ उनके रिश्ते में अड़चनें आ रही हैं क्यूँकि बीना के परिवार वाले फ़िल्म जगत को अच्छी दृष्टि से नहीं देखते। आगे चलकर सुरेश को अपनी बच्ची पम्मी (बेबी नाज़) से भी अलग कर दिया जाता है। तभी सुरेश के जीवन में एक नयी लड़की शांति (वहीदा रहमान) का आगमन होता है जिसमें सुरेश एक बहुत बड़ी अभिनेत्री देखते हैं। सुरेश उसे अपनी फ़िल्म 'देवदास' में पारो का किरदार देते हैं और रातों रात शांति एक मशहूर नायिका बन जाती हैं। लोग सुरेश और शांति के संबधों को लेकर अफ़वाहें फैलाते हैं जिसका असर सुरेश की बेटी पम्मी तक पड़ती है। पम्मी के अनुरोध से शांति फ़िल्म जगत छोड़ देती है और एक स्कूल टीचर बन जाती है। शांति के चले जाने से सुरेश को भारी नुकसान होता है और फ़िल्म जगत से अलग-थलग पड़ जाता है। इंडस्ट्री उसे भूल जाता हैं और वो बिल्कुल अकेला रह जाता है। अपनी अनुबंधों (कॉन्ट्रेक्टों) के कारण शांति को फ़िल्मों में वापस आना तो पड़ता है लेकिन वो सुरेश की कोई मदद नहीं कर पाती क्यूँकि सुरेश तो बरबादी की तरफ़ बहुत आगे को निकल चुका होता है। आख़िरकार अपने बीते हुए स्वर्णिम दिनों को याद करते हुए सुरेश अपनी स्टूडियो मे निर्देशक की कुर्सी पर बैठे-बैठे दम तोड़ देता है। यह फ़िल्म गुरुदत्त की सब से बेहतरीन फ़िल्म मानी जाती है जिसे बाद में 'वर्ल्ड क्लासिक्स' में गिना जाने लगा। लेकिन दुखद बात यह है कि जब यह फ़िल्म बनी थी तो फ़िल्म बुरी तरह से फ़्लाप हो गयी थी। और आज जब भी यह फ़िल्म किसी थियटर में लगती है तो 'हाउसफ़ुल' हुए बिना नहीं रहती। तक़नीकी दृष्टि से भी यह उनकी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म रही। रोशनी और छाया के ज़रिये कैमरे का जो काम इस फ़िल्म में हुआ है वह सचमुच जादूई है। ब्लैक ऐंड वाइट में इससे बेहतर सिनीमाटोग्राफी संभव नहीं। तभी तो फ़िल्म के सिनेमाटोग्राफर वी. के. मूर्ती को उस साल का फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार भी मिला था। आज फ़िल्म निर्देशन और निर्माण के पाठ्यक्रम में इस फ़िल्म को शामिल किया जाता है। फ़िल्म के संगीतकार थे सचिन देव बर्मन और गाने लिखे थे कैफ़ी आज़मी ने। 'काग़ज़ के फूल' के पिट जाने का असर गुरु दत्त पर इतना ज़्यादा हुआ कि इस फ़िल्म के बाद उन्होने फ़िल्में निर्देशित करना ही छोड़ दिया। उनकी अगली महत्वपूर्ण फ़िल्म 'साहब बीवी और ग़ुलाम' को अबरार अल्वी ने निर्देशित किया था। गुरुदत्त लगातार मानसिक अवसाद से भुगतने लगे, और १९६४ में एक रात नशे की हालत में उन्होने ख़ुदकुशी कर ली। केवल ४० वर्ष की आयु में एक बेहतरीन फ़िल्मकार का दुखद अंत हो गया।

कुछ लोगों का मानना है कि 'काग़ज़ के फूल' की कहानी गुरुदत्त के निजी जीवन से मिलती जुलती थी। उनकी पसंदीदा अभिनेत्री कुछ हद तक कारण बनीं उनके पारिवारिक जीवन में चल रही अशांति का। एक तरफ़ गुरुदत्त का मानसिक अवसाद और दूसरी तरफ़ गीता दत्त का नर्वस ब्रेकडाउन। कुल मिलाकर उनका घर संसार महज़ एक सामाजिक कर्तव्य बन कर रह गया। पति के देहांत के बाद गीता दत्त और भी ज़्यादा दुखद पारिवारिक जीवन व्यतीत करती रहीं। उनकी निजी ज़िंदगी भी उनकी वेदना भरे गीतों की तरह हो गयी थी। वे संगीत निर्देशिका भी बनना चाहती थीं, लेकिन २० जुलाई १९७१ को उनका यह सपना हमेशा के लिए टूट गया - वक़्त ने किया क्या हसीं सितम, तुम रहे न तुम, हम रहे न हम...। गीताजी भी हमेशा के लिए चली गयीं और पीछे छोड़ गयीं अपने असंख्य अमर गीत। मृत्यु से केवल दो वर्ष पहले उन्होने विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में शिरक़त की थीं जिसमें उन्होंने कुछ ऐसे शब्द कहे थे जो उस समय उनकी मानसिक स्थिति बयान करते थे। जैसे कि "सपनों की उड़ान का कोई अंत नहीं, कोई सीमा नहीं, न जाने यह मन क्या क्या सपने देख लेता है। जब सपने भंग होते हैं तो कुछ और ही हक़ीक़त सामने आती है।" अपने पति को याद करते हुए वो कहती हैं - "अब मेरे सामने है फ़िल्म 'प्यासा' का रिकार्ड, और इसी के साथ याद आ रही है मेरे जीवन की सुख भरी-दुख भरी यादें, लेकिन आपको ये सब बताकर क्या करूँगी! मेरे मन की हालत का अंदाज़ा आप अच्छी तरह लगा सकते हैं। इस फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक थे मेरे पतिदेव गुरु दत्त जी। मेरे पतिदेव सही अर्थ में कलाकार थे। वो जो कुछ भी करते बहुत मेहनत और लगन से करते। फ़िल्मों के ज़रिए अपने विचारों को व्यक्त करते। आज अंतिम गीत भी मैं अपने पतिदेव की फ़िल्म 'साहब बीवी और ग़ुलाम' से सुनवाने जा रही हूँ। इस गीत के भाव पात्रों से भी ज़्यादा मेरे अपने भावों से मिलते-जुलते हैं।" पता है दोस्तों कि उन्होने 'साहब बीवी और ग़ुलाम' फ़िल्म के किस गीत को सुनवाया था? जी हाँ, "न जायो सैयाँ छुड़ा के बैयाँ"। लेकिन आज हम आपको सुनवा रहे हैं "वक्त ने किया क्या हसीं सितम"। यह गीत गीताजी की सब से यादगार गीतों में से एक है। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' श्रद्धांजली अर्पित कर रही है फ़िल्म जगत के इस सदाबहार फ़नकार दम्पति को जिन्होंने फ़िल्म जगत में एक ऐसी छाप छोड़ी है कि जिस पर वक़्त का कोई भी सितम असर नहीं कर सकता। गुरु दत्त और गीता दत्त की स्मृति को हिंद-युग्म की तरफ़ से श्रद्धा सुमन!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें २ अंक और २५ सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के ५ गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. गीत के दो वर्जन हैं - लता और रफी की एकल आवाजों में.
२. इस फिल्म में थे धर्मेन्द्र और शर्मीला टैगोर. संगीत शंकर जयकिशन का.
३. मुखड़े में शब्द है -"सपने".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
पराग जी को बधाई। इनका स्कोर 2 से 4 हो गया है। स्वप्न मंजूषा जी, राज जी और पराग जी, आपकी शिकायत लाज़िमी है, हमने इसके स्वरूप को बदलने के बारे में विचार किया था, लेकिन ब्लॉगर तकनीक की अपनी सीमाओं की वज़ह से यह सम्भव नहीं हो पा रहा। जल्द ही कोई न कोई और रास्ता निकालेंगे। अपना प्रेम बनाये रखें। फिलहाल तो सबसे पहले जवाब देने का ही गेम खेलते हैं। मंजु जी को भी बधाई।

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.



Friday, October 10, 2008

गुरु दत्त , एक अशांत अधूरा कलाकार !


महान फिल्मकार गुरुदत्त की पुण्यतीथी पर एक विशेष प्रस्तुति लेकर आए हैं दिलीप कवठेकर


कुछ दिनों पहले मैंने एक सूक्ति कहीं पढ़ी थी -

To make simple thing complicated is commonplace.
But ,to make complicated things awesomely simple is Creativity.

गुरुदत्त की अज़ीम शख्सियत पर ये विचार शत प्रतिशत खरे उतरते है. वे महान कलाकार थे , Creative Genre के प्रायः लुप्तप्राय प्रजाति, जिनके सृजनात्मक और कलात्मक फिल्मों के लिए उन्हें हमेशा याद किया जायेगा.

आज से ४४ साल पहले १० अक्टुबर सन १९६४ को, उन्होंने अपने इस कलाजीवन से तौबा कर ली. रात के १ बजे के आसपास उनसे विदा लेने वाले आख़िरी शख्स थे अबरार अल्वी. उनके निधन से हमें उन कालजयी फिल्मों से मरहूम रहना पडा, जो उनके Signature Fims कही जाती है.


वसंथ कुमार शिवशंकर पदुकोने के नाम से इस दुनिया में आँख खोलने वाले इस महान कलाकार नें एक से बढ़कर एक ऐसी फिल्मों से हमारा त,अर्रूफ़ करवाया जो विश्वस्तरीय Masterpiece थीं. गुरुदत्त नें गीत संगीत की चासनी में डूबी, यथार्थ से एकदम नज़दीक खट्टी मीठी कहानियों की पर बनी फ़िल्मों से, उन जीवंत सीधे सच्चे संवेदनशील चरित्रों से हमें मिलवाया,जिनसे हम आम ज़िन्दगी में रू-ब-रू होते है. परिणाम स्वरूप हम मंत्रमुग्ध हो, उनके बनाए फिल्मी मायाजाल में डूबते उबरते रहे.

गुरुदत्त अपने आपमें एक संपूर्ण कलाकार बनने की पूरी पात्रता रखते थे. वे विश्व स्तरीय फ़िल्म निर्माता और निर्देशक थे. साथ ही में उनकी साहित्यिक रूचि और संगीत की समझ की झलक हमें उनके सभी फिल्मों में दिखती ही है. वे एक अच्छे नर्तक भी थे, क्योंकि उन्होंने अपने फिल्मी जीवन का आगाज़ किया था प्रभात फिल्म्स में एक कोरिओग्राफर की हैसियत से. अभिनय कभी उनकी पहली पसंद नही रही, मगर उनके सरल, संवेदनशील और नैसर्गिक अभिनय का लोहा सभी मानते थे .(उन्होने प्यासा के लिये पहले दिलीप कुमार का चयन किया था).वे एक रचनात्मक लेखक भी थे, और उन्होंने पहले पहले Illustrated Weekly of India में कहानियां भी लिखी थी.

संक्षेप में , वे एक संपूर्ण कलाकार होने की राह पर चले ज़रूर थे. मगर, उनके व्यक्तित्व में एक अधूरापन रहा हर समय, एक अशांतता रही हर पल, जिसने उन्हें एक अशांत, अधूरे कलाकार और एक भावुक प्रेमी के रूप में, दुनिया नें जाना, पहचाना.

देव साहब जो उनके प्रभात फिल्म कन्पनी से साथी थे, जिन्होंने नवकेतन के बैनर तले अपनी फिल्म 'बाजी' के निर्देशन का भार गुरुदत्त पर डाला था, नें अभी अभी कहीं यह माना था की गुरुदत्त ही उनके सच्चे मित्र थे. जितने भावुक इंसान वे थे, उसकी वजह से हमें इतनी आला दर्जे की फिल्मों की सौगात मिली, मगर उनकी मौत का भी कारण वही भावुकता ही बनी .

उनकी व्यक्तिगत जीवन पर हम अगर नज़र डालें तो हम रू-बी-रू होंगे एक त्रिकोण से जिसके अहाते में गुरुदत्त की भावनात्मक ज़िंदगी परवान चढी.

ये त्रिकोण के बिन्दु थे गीता दत्त , वहीदा रहमान और लेखक अबरार अल्वी , जिन्होंने गुरुदत्त के जीवन में महत्वपूर्ण भुमिका निभाई.

गीता दत्त रॉय, पहले प्रेमिका, बाद में पत्नी.सुख और दुःख की साथी और प्रणेता ..
वहीदा रहमान जिसके बगैर गुरुदत्त का वजूद अधूरा है, जैसे नर्गिस के बिना राज कपूर का. जो उनके Creative Menifestation का ज़रिया, या केन्द्र बिन्दु बनीं.
और फ़िर अबरार अल्वी, उतने ही प्रतिभाशाली मगर गुमनाम से लेखक, जिन्होंने गुरुदत्त के "आरपार" से लेकर "बहारें फ़िर भी आयेंगी" तक की लगभग हर फ़िल्म्स में कहानी, या पटकथा का योगदान दिया.



आज भी विश्व सिनेमा का इतिहास अधूरा है गुरुदत्त के ज़िक्र के बगैर. पूरे जहाँ में लगभग हर फ़िल्म्स संस्थान में ,जहाँ सिनेमा के तकनीकी पहलू सिखाये जाते है, गुरुदत्त की तीन क्लासिक फिल्मों को टेक्स्ट बुक का दर्जा हासिल होता है. वे है " प्यासा ", " कागज़ के फ़ूल ", और "साहिब , बीबी और गुलाम ".

इनके बारे में विस्तार से फ़िर कभी..

गुरुदत्त नें अपने फिल्मी कैरियर में कई नए तकनीकी प्रयोग भी किए.
जैसे, फ़िल्म बाज़ी में दो नए प्रयोग किए-

1, १०० एमएम के लेंस का क्लोज़ अप के लिए इस्तेमाल पहली बार किया - करीब १४ बार. इससे पहले कैमरा इतने पास कभी नही आया, कि उस दिनों कलाकारों को बड़ी असहजता के अनुभव से गुज़रना पडा. तब से उस स्टाईल का नाम ही गुरुदत्त शॉट पड़ गया है.

२. किसी भी फ़िल्म्स में पहली बार गानों का उपयोग कहानी कोई आगे बढ़ाने के लिए किया गया.

वैसे ही फ़िल्म ' काग़ज़ के फूल ' हिन्दुस्तान में सिनेमा स्कोप में बनी पहली फ़िल्म थी. दरअसल , इस फ़िल्म के लिए गुरुदत्त कुछ अनोखा ,कुछ हटके करना चाहते थे , जो आज तक भारतीय फ़िल्म के इतिहास में कभी नही हुआ.

संयोग से तभी एक हालीवुड की फ़िल्म कंपनी 20th Century Fox नें उन दिनों भारत में किसी सिनेमास्कोप में बनने वाली फ़िल्म की शूटिंग ख़त्म की थी और उसके स्पेशल लेंस बंबई में उनके ऑफिस में छूट गए थे. जब गुरुदत्त को इसका पता चला तो वे अपने सिनेमाटोग्राफर वी के मूर्ति को लेकर तुंरत वहाँ गए, लेंस लेकर कुछ प्रयोग किये , रशेस देखे और फ़िर फ़िल्म के लिए इस फार्मेट का उपयोग किया.

चलिए अब हम इस फ़िल्म के एक गाने का ज़िक्र भी कर लेते है -

वक्त नें किया क्या हसीं सितम .. तुम रहे ना तुम , हम रहे ना हम...

गीता दत्त की हसीं आवाज़ में गाये, और फ़िल्म में स्टूडियो के पृष्ठभूमि में फिल्माए गए इस गीत में भी एक ऐसा प्रयोग किया गया, जो बाद में विश्वविख्यात हुआ अपने बेहतरीन लाइटिंग की खूबसूरत संयोजन की वजह से.

आप ख़ुद ही देख कर लुत्फ़ उठाएं .



गुरुदत्त इस क्लाईमेक्स की सीन में कुछ अलग नाटकीयता और रील लाईफ़ और रियल लाईफ का विरोधाभास प्रकाश व्यवस्था की माध्यम से व्यक्त करना चाहते थे. ब्लेक एंड व्हाईट रंगों से नायक और नायिका की मन की मोनोटोनी ,रिक्तता , यश और वैभव की क्षणभंगुरता के अहसास को बड़े जुदा अंदाज़ में फिल्माना चाहते थे.

जिस दिन उन्होंने नटराज स्टूडियो में शूटिंग शुरू की, तो उनके फोटोग्राफर वी के मूर्ति नें उन्हें वेंटिलेटर से छन कर आती धूप की एक तेज़ किरण दिखाई, तो गुरुदत्त बेहद रोमांचित हो उठे और उनने इस इफेक्ट को वापरने का मन बना लिया. वे मूर्ति को बोले,' मैं शूटिंग के लिए भी सन लाईट ही वापरना चाहता हूँ क्योंकि वह प्रभाव की मै कल्पना कर रहा हूँ वह बड़ी आर्क लाईट से अथवा कैमरे की अपर्चर को सेट करके नहीं आयेगा. '

तो फ़िर दो बड़े बड़े आईने स्टूडियो के बाहर रखे गये, जिनको बडी़ मेहनत से सेट करके वह प्रसिद्ध सीन शूट किया गया जिसमें गुरु दत्त और वहीदा के बीच में वह तेज रोशनी का बीम आता है. साथ में चेहरे के क्लोज़ अप में अनोखे फेंटम इफेक्ट से उत्पन्न हुए एम्बियेन्स से हम दर्शक ठगे से रह जाते है एवं उस काल में, उस वातावरण निर्मिती से उत्पन्न करुणा के एहसास में विलीन हो जाते है, एकाकार हो जाते है.

और बचता है .., गुरुदत्त के प्रति एक दार्शनिक सोच...,मात्र एक विचार , एक स्वर...

वक्त नें किया क्या हसीं सितम...

प्रस्तुति - दिलीप कवठेकर

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