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Monday, December 14, 2009

पंखों को हवा जरा सी लगने दो....जयदीप सहानी जगाते हैं एक उम्मीद अपनी हर फिल्म, हर रचना से

ताजा सुर ताल TST (39)

दोस्तो, ताजा सुर ताल यानी TST पर आपके लिए है एक ख़ास मौका और एक नयी चुनौती भी. TST के हर एपिसोड में आपके लिए होंगें तीन नए गीत. और हर गीत के बाद हम आपको देंगें एक ट्रिविया यानी हर एपिसोड में होंगें ३ ट्रिविया, हर ट्रिविया के सही जवाब देने वाले हर पहले श्रोता की मिलेंगें २ अंक. ये प्रतियोगिता दिसम्बर माह के दूसरे सप्ताह तक चलेगी, यानी 5 अक्टूबर से १४ दिसम्बर तक, यानी TST के ४० वें एपिसोड तक. जिसके समापन पर जिस श्रोता के होंगें सबसे अधिक अंक, वो चुनेगा आवाज़ की वार्षिक गीतमाला के 60 गीतों में से पहली 10 पायदानों पर बजने वाले गीत. इसके अलावा आवाज़ पर उस विजेता का एक ख़ास इंटरव्यू भी होगा जिसमें उनके संगीत और उनकी पसंद आदि पर विस्तार से चर्चा होगी. तो दोस्तों कमर कस लीजिये खेलने के लिए ये नया खेल- "कौन बनेगा TST ट्रिविया का सिकंदर"

TST ट्रिविया प्रतियोगिता में अब तक-

पिछले एपिसोड में,वैसे तो आज की कड़ी में भी ३ सवाल हैं आपके जेहन की कसरत के लिए. पर फैसला तो आ ही चुका है. सीमा जी अपने सबसे नजदीकी प्रतिद्वंदी से भी कोसों आगे हैं, बहुत बहुत बधाई आपको...आपके सर है TST ट्रिविया के सिकंदर का ताज. सीमा जी अपनी पसंद के १० गीत लेकर आपके लिए हाज़िर होंगी, इस वर्ष यानी २००९ की सबसे अंतिम पेशकश के रूप में....श्रोताओं तैयार रहिये....

सजीव - आज 'ताज़ा सुर ताल' में हम पाँच के बदले सिर्फ़ तीन गीत सुनेंगे।

सुजॉय - वह क्यों भला? ऐसी ज्यादती क्यों?

सजीव - दरअसल बात ऐसी है कि आज हम जिस फ़िल्म की बातें करने जा रहे हैं उस फ़िल्म में हैं ही केवल तीन गीत।

सुजॉय - मैं समझ गया, आप Rocket Singh - Salesman of the Year फ़िल्म की बात कर रहे हैं ना?

सजीव - बिल्कुल ठीक समझे। आज हम इसी फ़िल्म के तीनों गानें सुनेंगे।

सुजॉय - लेकिन सजीव, इस फ़िल्म में भले ही तीन गानें हों, लेकिन इस फ़िल्म के साउड ट्रैक में यश राज बैनर की पुरानी फ़िल्मों के कुछ गीतों को भी शामिल किया गया है। तो क्यों ना हम उनमें से दो गानें सुन लें।

सजीव - आइडिया तो अच्छा है, इससे पाँच के पाँच गानें भी हो जाएँगे और दो हिट गानें भी अपने श्रोताओं को एक बार फिर से सुनने का मौका मिल जाएगा! उन दो गीतों की बात हम बाद में करेंगे, चलो जल्दी से सुनते हैं इस फ़िल्म का पहला गीत, उसके बाद बातचीत आगे बढ़ाएँगे।

गीत - पॉकेट में रॉकेट...pocket men rocket


सुजॉय - फ़िल्म का शीर्षक गीत हमने सुना, बेनी दयाल और साथियों की आवाज़ें थीं। इन दिनों इसी गीत के ज़रिए इस फ़िल्म के प्रोमोज़ चलाए जा रहे हैं हर टीवी चैनल पर। सजीव, क्या ख़याल है इस गीत के बारे में आपका?

सजीव - देखो इस फ़िल्म के तीनों गीतों की अच्छी बात यह है कि बहुत ही अलग हट के है और ताज़े सुनाई देते हैं। इन दिनों सलीम सुलेमान अपना एक स्टाइल डेवलोप करने की कोशिश कर रहे हैं। क़ुर्बान के गानें भी पसंद किए गए और इस फ़िल्म के गानें भी अच्छे हैं।

सुजॉय - इस फ़िल्म में गानें लिखे हैं जयदीप साहनी ने और जयदीप ने इस फ़िल्म की कहानी भी लिखी है। पिछले साल अक्षय कुमार 'सिंह इज़ किंग्' में तथा सलमान ख़ान 'हीरोज़' फ़िल्म में सरदार की भूमिका निभाने के बाद बॊलीवुड में सरदार हीरो की एक ट्रेंड चल पड़ी है, और इस बार रणबीर कपूर बने हैं सरदार रॊकेट सिंह। और उनकी नायिका बनी हैं शज़ान पदमसी।

सजीव - इस फ़िल्म का दूसरा गीत अब सुना जाए विशाल दादलानी की आवाज़ में, जिसके बोल हैं "गड़बड़ी हड़बड़ी"। विशाल दादलानी जहाँ एक तरफ़ विशाल-शेखर की जोड़ी में हिट म्युज़िक देते है, वहीं वो दूसरे संगीतकारों के लिए बहुत से गानें भी गाते हैं। यह एक बहुत ही हेल्दी ऐप्रोच है आज के कलाकारों में, वर्ना एक समय ऐसा भी था कि अगर कोई संगीतकार बन जाए तो फिर दूसरे संगीतकार उससे अपने गानें नहीं गवाया करते थे।

सुजॉय - सही कहा आप ने कुछ हद तक। चलिए अब गीत सुनते हैं।

गीत - गड़बड़ी हड़बड़ी...hadbadi gadbadi


सजीव - तीसरा गीत इन दोनों गीतों से बिल्कुल अलग है, बड़ा ही नर्मोनाज़ुक है और जयदीप साहनी ने अच्छे गीतकारी का मिसाल पेश किया है। यह गीत है "पंखों को हवा ज़रा सी लगने दो"।

सुजॉय - हाँ, सलीम मर्चैंट की आवाज़ है इस गीत में और सलीम भी आजकल कई गानों में अपनी आवाज़ मिला रहे हैं। 'कुर्बान' के मशहूर गीत "अली मौला" में भी उन्ही की आवाज़ थी।

गीत - पंखों को हवा ज़रा सी...pankhon ko


सजीव - यश चोपड़ा और आदित्य चोपड़ा ने इस फ़िल्म को प्रोड्युस किया है और निर्देशक हैं शिमित अमीन। शिमित ने बहुत ज़्यादा फ़िल्में तो नहीं की हैं लेकिन उनका निर्देशन ज़रा हट के होता है। 'चक दे इडिया' उन्होंने हीं निर्देशित की थी और वह क्या फ़िल्म थी!’अब तक छप्पन’ उनकी पहली फिल्म थी और उसमें भी उनके काम को काफी सराहा गया था। 'भूत' और 'अब तक छप्पन' में उन्होने एडिटर की भूमिका निभाई।

सुजॉय - और सजीव, जैसा कि हमने शुरु में कहा था कि इस फ़िल्म के तीन ऒरिजिनल गीतों के बाद हम यश राज की पुरानी फ़िल्मों के दो ऐसे गानें सुनवाएँगे जिन्हे 'रॊकेट सिह' के साउंड ट्रैक में शामिल किया गया है, तो सब से पहले तो मैं उन सभी गीतों के नाम बताना चाहूँगा जिन्हे फ़िल्म में शामिल किया गया है। ये गानें हैं "चक दे चक दे इंडिया" (चक दे इंडिया), "छलिया छलिया" और "दिल हारा" (टशन), "डैन्स पे चांस मार ले" और "हौले हौले से" (रब ने बना दी जोड़ी), "ख़ुदा जाने के", "जोगी माही" और "लकी बॊय" (बचना ऐ हसीनों)।

सजीव - तो इनमें से कौन से दो गीत सुनवाना चाहोगे?

सुजॉय - एक तो निस्संदेह "ख़ुदा जाने के मैं फ़िदा हूँ" और दूसरा आप बताइए अपनी पसंद का।

सजीव - चलो "चक दे इंडिया" यादें भी ताज़ा कर लिया जाए। वैसे भी भारत हॊकी में ना सही पर क्रिकेट में इन दिनों चर्चा में है ICC Ranking में नंबर-१ आने के लिए। चलो ये दोनों गानें सुनते हैं एक के बाद एक बैक टू बैक, वैसे ये गीत सुनवाने का मौका भी एकदम सटीक है. दोस्तों ये TST की अंतिम कड़ी है २००९ के लिए. जाहिर है नए गीतों की महफ़िल हम नए साल में फिर से सजायेंगें. इस साल के गीतों पर हमारा पूरा का पूरा पैनल अपनी अपनी राय लेकर उपस्थित होगा २५ दिसंबर से ३० दिसम्बर तक, और ३१ तारीख़ को हम सुनेंगें हमारी विजेता सीमा जी की पसंद के १० सुपर हिट गीत, तो एक बार फिर TST की तरफ से नव वर्ष की शुभकामनाएं, आईये २००९ को विदा कहें एक अच्छी सोच के साथ. नए साल में हम अपने देश को हर स्तर पर और अधिक समृद्ध करने में अपना योगदान दे सके, तो एक बार फिर जयदीप सहानी के साथ हम सब भी मिल कर कहें -"चक दे इंडिया..."

गीत - ख़ुदा जाने के मैं फ़िदा हूँ (बचना ऐ हसीनों)


गीत - चक दे इंडिया (चक दे इंडिया)


और अब बारी साल के अंतिम ट्रिविया की

TST ट्रिविया 39- निर्देशक शिमित अमीन का जन्म अफ़्रीका महाद्वीप के किस देश में हुआ था?

TST ट्रिविया 40- आज ज़िक्र हो रही है यश राज के फ़िल्म की। तो बताइए यश चोपड़ा के किस फ़िल्म का निर्देशन अर्जुन सबलोक ने किया था?

TST ट्रिविया 41- इस फ़िल्म के किसी एक अभिनेता/अभिनेत्री को आप किस तरह से १९८५ की फ़िल्म 'भवानी जंकशन' के गीत "आए बाहों में" से जोड़ सकते हैं?

"रॉकेट सिंह" एल्बम को आवाज़ रेटिंग ***

चूँकि फिल्म एक अच्छी सोच के साथ बनायीं गयी है और कहानी को अधिक अहमियत दी गयी है, व्यवहारिक दृष्टि से गीतों की संख्या कम रखी गयी है. पर शीर्षक गीत देखने में और "पंखों को" सुनने में बहुत अच्छा है. इस के आलावा एल्बम में यश राज बैनर के कुछ सुपर डुपर हिट गीतों को एक साथ सुनने का मौका भी है....तो ऑल इन ऑल इस अल्बम पर पैसा लगाया जा सकता है, वैसे भी नववर्ष करीब है और भारतीय क्रिकेट टीम भी पूरे जोश में है तो झूमने और नाचने के पर्याप्त मौके हैं आपकेपास.

आवाज़ की टीम ने इस अल्बम को दी है अपनी रेटिंग. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसे लगे? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत अल्बम को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

शुभकामनाएँ....


अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Monday, August 31, 2009

फ़िक्र करे फुकरे....मिका ने दिया खुश रहने का नया मन्त्र

ताजा सुर ताल (18)

ताजा सुर ताल में आज सुनिए प्रीतम और जयदीप सहानी का रचा ताज़ा हिट गीत

सजीव - सुजॉय, कभी कभी मन करता है कि कुछ ऐसे मस्ती भरे गीत सुनें की सारे गम और फ़िक्र दूर हट जाएँ...क्या आपका भी मन होता है ऐसा कभी...

सुजॉय - पंजाबी धुन और बोलों से सजे ढेरों गीत है ऐसे हिंदी फिल्मों में जिसमें मस्ती जम कर भरी है...."नि तू रात खड़ी थी छत पे कि मैं समझा कि चाँद निकला", "ये देश है वीर जवानों का", "नि मैं यार मनाना नी चाहे लोग बोलियाँ बोले", और हाल के बरसों में तो जैसे हिट गीत बनाने का फ़ार्मूला जैसे बन गया है पंजाबी संगीत का आधार.

सजीव - बिल्कुल! 'जब वी मेट' के "मौजा ही मौजा" और "नगाड़ा नगाड़ा" के बाद तो जैसे पंजाबी लोक धुनों के साथ रीमिक्स फ़िल्म संगीत पर छा सा गया है।

सुजॉय - 'जब वी मेट' से याद आया सजीव कि इन दिनों शाहीद कपूर के नए फ़िल्म की प्रोमो ज़ोर शोर से हर चैनल पर चल रहा है।

सजीव - कहीं तुम्हारा इशारा 'दिल बोले हड़िप्पा' की तरफ़ तो नहीं?

सुजॉय - बिल्कुल! शाहीद और पंजाबी धुनों का तो जैसे चोली दामन का साथ रहा है। 'जब वी मेट' के अलावा बरसों पहले आयी फ़िल्म 'फ़िदा' में भी एक गीत था "अज वे माही लेट्स डू बल्ले बल्ले" जो काफ़ी चला था।

सजीव - सुजॉय, ऐसे थिरकते नग़में भले ही बहुत लम्बी रेस के घोड़े न हों, लेकिन जब फ़िल्म रिलीज़ होती है तो ऐसे गानें फ़िल्म को प्रोमोट करने में काफ़ी हद तक सहायक होते हैं। कुछ दिनों के लिए ही सही लेकिन ये गानें लोगों की ज़ुबान पर चढ़ते हैं और फ़िल्म को भी कामयाब बनाते हैं। और फ़िल्म निर्माण एक कला होने के साथ साथ व्यवसाय भी है, इसलिए इस पक्ष को भी नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता।

सुजॉय - ख़ैर! आज हम बात कर रहे हैं 'दिल बोले हड़िप्पा' की। पहली बार रानी मुखर्जी और शाहीद कपूर की जोड़ी बनी है, और इस फ़िल्म से लोगों को काफ़ी सारी उम्मीदें भी हैं।

सजीव - सुजॉय, क्या तुम्हे 'हड़िप्पा' शब्द का अर्थ पता है?

सुजॉय - अब तक तो पता नहीं था, लेकिन क्योंकि मैं चंडीगढ़ में रहता हूँ, इसलिए मेरे काफ़ी सारे पंजाबी दोस्त हैं, जिन्होने मुझे बताया कि 'हड़िप्पा' का क्या मतलब है। दरसल 'हड़िप्पा' भंगड़ा में इस्तेमाल होने वाला एक शब्द है, ठीक वैसे ही जैसे 'बल्ले बल्ले' का इस्तेमाल होता है। जिस तरह से 'बल्ले बल्ले' का अर्थ होता है 'hurray', उसी तरह से 'हड़िप्पा' का अर्थ होता है 'bravo'! 'चक दे' भी कुछ कुछ इसी तरह का शब्द है।

सजीव - वाह! ये तो तुमने बड़ी अच्छी जानकारी दी। वैसे मैने सुना है कि पहले इस फ़िल्म का नाम सिर्फ़ 'हड़िप्पा' सोचा गया था। लेकिन बाद में फ़िल्म के निर्माता आदित्य चोपड़ा को पता चला कि 'हड़िप्पा' शीर्षक संजय लीला भंसाली ने पहले से ही अपने नाम दर्ज कर चुके हैं। इसलिए इसे बदल कर 'दिल बोले हड़िप्पा' कर दिया गया।

सुजॉय - यह तो बड़ी नई बात पता चली। इसका मतलब यह कि भंसाली जी की भी फ़िल्म आने वाली है 'हड़िप्पा'। अच्छा सजीव, इससे पहले कि हम आज के गीत जो कि है इस फ़िल्म का शीर्षक गीत, सुनवाएँ, क्या आप को कोई ऐसा हिंदी फ़िल्मी गीत याद आ रहा है जिसमें 'हड़िप्पा' शब्द का इस्तेमाल हुआ था?

सजीव - बिल्कुल सुजॉय, मुझे कम से कम एक गीत तो ज़रूर याद है। लता जी और किशोर दा ने ज़ीनत अमान और देव आनंद की फ़िल्म 'वारैंट' में एक गीत गाया था "लड़ी नजरिया लड़ी, चली रे फुलझड़ी, पड़ी शुभ घड़ी, ये घड़ी खड़ी है हाथों में लिए प्रेम हथकड़ी, हड़िप्पा लड़ी हड़िप्पा लड़ी"।

सुजॉय - बिल्कुल, मैं भी इसी गीत की ओर इशारा कर रहा था। अब आइए बात करते हैं 'दिल बोले हड़िप्पा' के टाइटल गीत की। मिका सिंह, सुनिधि चौहान और साथियों का गाया यह गीत है। जयदीप साहनी ने लिखा है। सजीव, जयदीप साहनी आज के दौर के एक ऐसे फ़िल्म लेखक और गीतकार हैं जो इस पीढ़ी के चंद अग्रणी लेखकों में से एक हैं।

सजीव - हाँ, प्रसून जोशी के बाद तो मुझे जयदीप ही ऐसे हैं जो कहानी, संवाद, स्क्रीनप्ले और साथ ही गीतकारिता भी बाख़ूबी निभा रहे हैं। क्या तुम जयदीप के करीयर की महत्वपूर्ण फ़िल्मों के बारे में कुछ बता सकते हो?

सुजॉय -सन् २००० में 'जंगल', २००२ में 'कंपनी' जैसी फ़िल्में लिख कर जयदीप का काफ़ी नाम हो गया था। लेकिन सब से ज़्यादा ख्याति उन्हे जिन तीन फ़िल्मों से मिली, वो फ़िल्में हैं सन् २००५ की 'बण्टी और बबली' (स्क्रीनप्ले व संवाद), २००६ का 'खोंसला का घोंसला' (कहानी, स्क्रीनप्ले व संवाद), २००७ की सुपरहिट फ़िल्म 'चक दे इंडिया' (कहानी, गीतकार)। इन सब के अलावा 'आजा नचले', 'ब्लफ़ मास्टर', 'जॉनी ग़द्दार' और 'रब ने बना दी जोड़ी' में उनके लिखे गानें ख़ूब पसंद किए गए। और अब 'दिल बोले हड़िप्पा'।

सजीव - इस गीत के बोल हैं "भूल फ़िकरा, है जिगरा, तो संग मेरे बोल हड़िप्पा"।

सुजॉय - यानी कि अगर जिगरवाले हो तो सब फ़िक्र छोड़ कर मेरे साथ साथ बोल 'हड़िप्पा'। मैनें इस फ़िल्म की कहानी पढ़ी है, लेकिन मैं यहाँ नहीं बताउँगा क्योंकि जो लोग थियटर में जा कर इस फ़िल्म को देखने की सोच रहे हैं वो शायद मुझ से नाराज़ हो जाएँ, और होना भी चाहिए।

सजीव - इस फ़िल्म के संगीतकार हैं प्रीतम, जो कि इस तरह के पंजाबी धुनों के लिए जाने जाते हैं। जब भी कोई फ़िल्म निर्माता उन्हे अपनी फ़िल्म के साइन करवाते हैं तो उनसे इस तरह का एक गीत ज़रूर बनवा लेते हैं। पता है प्रीतम जब विविध भारती पर इन्टरव्यू देने के लिए आए थे तो उन्होने उसमें कहा था कि जब 'जब वी मेट' के बाद वो पंजाब गए तो वहाँ बैनर पर उनका नाम लिखा गया था 'प्रीतम सिंह'। लोग अक्सर भूल जाते हैं कि इस तरह का चुस्त पंजाबी धुनें बनाने वाले संगीतकार प्रीतम सिंह नहीं बल्कि बंगाली बाबूमोशाय प्रीतम चक्रबर्ती हैं।

सुजॉय - तो चलिए, अब देर किस बात की, सुनते हैं 'दिल बोले हड़िप्पा', जो आज कल लोगों के होठों की शान बना हुआ है।

सजीव - बोलों में बहुत ही गूढ़ पंजाबी भाषा का इस्तेमाल हुआ है. मुझे और सुजॉय दोनों को पंजाबी तो नहीं आती है, इसलिए यदि प्रस्तुत बोलों में कोई गलती रह गयी हो तो हमें बताएं -

दुनिया फिरंगी स्यापा है,
फ़िक्र ही गम का पापा है,
अपना तो बस ये जापा है
फ़िक्र करे फुकरे,
चुन्गम है चब्बी जा,
हैण्ड पम्प है डब्बी जा,
लाइफ का जूस कड्डी जा,
फ़िक्र करे फुकरे,
खुश रहने का नहीं लगता कोई टैक्स ओये रब्बा,
ओये भूल फिकरा है जिगरा, तो संग मेरे बोल हडिप्पा,
ओये भूल फिकरा है जिगरा, तो संग मेरे बोल हडिप्पा...

कोठी न माल हडिप्पा,
न गोरे गाल हडिप्पा,
नहीं जाने तेरे नाल, चाहे जितना संभाल,
छड़ मिटटी डाल हडिप्पा,
खुशियाँ तू घर कर ले,
हाथ दोनों विच भर ले,
अरे खब्बा हो या सज्जा, (कोई इसके माने बताएं हमें :)

नज़रों से बोल हडिप्पा,
कोई जो कोल हडिप्पा,
न करी ज्यादा गोल मोल,
तेरी खुल जानी पोल,
ये दिल का ढोल हडिप्पा,
डर्बी हो या ढाका,
रब तेरा हो राखा,
पड़ने दे तू टिप्पा (कोई इस लाइन के माने भी बताएं )

ओये भूल फिकरा...

और अब सुनिए ये गीत -



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 3 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

क्या आप जानते हैं ?
आप नए संगीत को कितना समझते हैं चलिए इसे ज़रा यूं परखते हैं.किस नयी फिल्म में जावेद अख्तर और शंकर एहसान लॉय की जोड़ी लौटी है, कौन सी है वो जल्द आने वाली फिल्म? बताईये और हाँ जवाब के साथ साथ प्रस्तुत गीत को अपनी रेटिंग भी अवश्य दीजियेगा.

पिछले सवाल का सही जवाब दिया विश्व दीपक तनहा जी, बधाई. आप सब श्रोताओं का रेटिंग देने के लिए बहुत बहुत आभार.


अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Thursday, January 1, 2009

सरताज गीत 2008 - आवाज़ की वार्षिक गीतमाला में

वर्ष 2008 के श्रेष्ट 50 फिल्मी गीत (हिंद युग्म के संगीत प्रेमियों द्वारा चुने हुए),पायदान संख्या 10 से 01 तक

पिछले अंक में हम आपको 20वें पायदान से 11वें पायदान तक के गीतों से रूबरू करा चुके हैं। उन गीतों का दुबारा आनंद लेने के लिए यहाँ जाएँ।

10वें पायदान - है गुजारिश - फ़िल्म गजिनी

अगर इस गीत को आप ध्यान से सुनें तो तो शुरू में और बीच बीच में एक गुनगुनाहट (हम्मिंग) सुनाई देती है, जो सोनू निगम की याद दिलाते हैं, जी हाँ ये हिस्सा सोनू ने ही गाया है, दरअसल इस धुन पर रहमान ने एक गीत बनाया था जिसे सोनू की आवाज़ में रिकॉर्ड किया गया था, पर अफ़सोस वो फ़िल्म नही बन पायी, जब फ़िल्म गजिनी के लिए इसी धुन पर जब प्रसून ने नए शब्द बिठाये, तब सोनू को फ़िर तलब किया गया, पर निगम उन दिनों विदेश में होने के कारण रिकॉर्डिंग के लिए उपलब्ध नही हो पाये तो रहमान ने जावेद अली से गीत को मुक्कमल करवाया पर हम्मिंग सोनू वाली (जो मूल गाने में थी) ही उन्होंने रहने दी. यकीं न हो गीत दुबारा सुनें.



9वें पायदान - इन लम्हों के दामन में - फ़िल्म -जोधा अकबर
एक बार रहमान का जादू है यहाँ, कितना खूबसूरत है ये गाना ये आप सुनकर ही जान पाएंगे. गीत में विविध भाव हैं, उतार चढाव हैं, जिसे मधु श्री और सोनू निगम ने अपनी आवाजों से बखूबी पेश किया है, शब्दों से कमाल किया है एक बार जावेद साहब ने. जावेद साहब ने एक तरफ़ इस पीरीअड फ़िल्म के लिए बोल लिखे वहीँ रॉक ऑन के लिए नए ज़माने के गीत लिखे. वाकई उनकी रैंज कमाल की है


8वें पायदान - डांस पे चांस- फ़िल्म- रब ने बना दी जोड़ी

अब अगर आपको नाचना नही आता तो फ़िक्र करने कि कोई जरुरत नही. बस ये मदमस्त गीत सुनिए और 5 मिनट में नाचना सीख जाईये, गीत की खासियत इसके अलहदा से सुनिए देते बोल ही हैं और सुनिधि की झूमा देने वाली आवाज़ भी, उस पर बीच बीच में देसी ठसका लिए आते हैं लाभ जंजुआ. सलीम सुलेमान ने इस फ़िल्म एक लम्बी छलांग लगायी है...आप भी सीखिए नाचने के गुर इस गीत को सुन.


7वें पायदान - तू मुस्कुरा - फ़िल्म - युवराज
शुक्र है सुनने को मिली हमारी अलका की भी आवाज़ टॉप १० में आकर, दरअसल नए कलाकारों की भीड़ में पुराने गायक गायिकाओं की आवाज़ कहीं सुनने को मिले अचानक तो बेहद सुखद लगता है, और इसी गीत के साथ पहली बार इस गीतमाला में शामिल हुए हैं हमारे गुलज़ार साहब भी. सुंदर बोल पर रहमान का मधुर संगीत और जावेद अली के साथ अलका याग्निक की मन को छूती ये आवाज़ यही है फ़िल्म युवराज के "तू मुस्कुरा" गीत की खूबियाँ.


6वें पायदान - मर जावां- फ़िल्म- फैशन

इरफान सिद्दीक का जिक्र हम पहले भी कर चुके हैं, उनके लिखे इस गीत में और सलीम सुलेमान के रचे इस संगीत में मिटटी की खुशबू है. स्क्रीन पर इसे एक फैशन शो का हिस्सा दिखाया गया है. जाहिर सी बात, दृश्य प्राथमिक थे और गीत को सिर्फ़ उसे सहयोग देना था पर श्रुति पाठक के गाये इस गीत ने संगीत प्रेमियों पर ऐसा जादू किया कि ये फ़िल्म का सबसे लोकप्रिय गीत बन कर उभर कर सामने आया. निश्चित ही इस गीत लंबे समय तक संगीत के चाहने वालों के दिल में अपनी जगह बनाये रखने की समर्थता है.....मर जावां ...


5वें पायदान - कहीं तो कहीं तो - फ़िल्म - जाने तू या जाने न

इस फ़िल्म की और इसके संगीत की हम पहले भी इस गीतमाला में खूब चर्चा कर चुके हैं, ये पांचवां गीत है इस फ़िल्म का जो हमारे टॉप 50 का हिस्सा है, और किसी फ़िल्म को ये सम्मान नही मिला जोधा अकबर के हालाँकि 4 गीत हैं. पर फ़िर भी जाने तू या जाने न के हर गीत युवा प्रेमियों के दिल की बात कहता प्रतीत होता है. पांचवीं पायदान पर इस फ़िल्म का सबसे मीठा और सबसे खूबसूरत गीत है. ज़रा सुनिए रशीद अली और वसुंधरा दास ने कितना डूब कर गाया है इसे. "कहीं तो कोई तो है नशा तेरी मेरी हर मुलाकात में...." जैसे बोल लिखकर अब्बास टायरवाला ने साबित किया है वो सिर्फ़ चालू किस्म के नही ज़ज्बाती गीत भी बखूबी लिख सकते हैं....सुनिए....और डूब जाईये ...


चौथे पायदान - आज वे हवाओं में - फ़िल्म - युवराज

आवाज़ का दरिया हूँ, बहता हूँ मैं नीली रातों में, मैं जागता रहता हूँ नींद भरी झील सी आँखों में....बताईये ज़रा ऐसे बोल किसकी निशानी है, जी हाँ गुलज़ार साहब के कलम की बूँद बूँद छाप है इस शानदार गीत में, शुरू का अलाप लिया है ख़ुद रहमान ने बाद का मोर्चा संभाला है बेन्नी दयाल और श्रेया घोषाल ने पर ये गुलज़ार साहब के शब्द ही हैं जो इस गीत को बरसों बाद भी हमें गुनगुनाने के लिए मजबूर करेगा. ये रहमान का अन्तिम गीत है इस गीतमाला में तो पेश हैं ये नग्मा उसी संगीत सम्राट के नाम... आजा वे हवाओं में...


तीसरे पायदान - तेरी और - फ़िल्म - सिंग इस किंग
राहत साहब की उडानों वाली आवाज़ को कहीं कहीं थाम कर रोकती श्रेया की मधुर पुकार..."एक हीर थी और एक राँझा...कहते हैं मेरे गाँव में...", गीत में प्रीतम ने बेहद भारतीय वाद्यों से कमाल का समां बांधा है, ये सच है चोरी के आरोपों ने प्रीतम की छवि ख़राब की है पर इस संगीतकार में गजब की प्रतिभा भी है ख़ास कर जब ये देसी अंदाज़ के गीत बनाते हैं तो ऐसा मौहौल रच देते हैं की सुनने वाला बस खो सा जाता है याद कीजिये फ़िल्म जब वी मेट का "नगाडा" गीत, ये गीत भी बेहद खूबसूरत है. मयूर पुरी ने लिखे हैं इसके बोल, और यकीनन बहुत कमाल के शब्द चुने हैं उन्होंने. ऑंखें बंद कर सुनें राहत फतह अली खान को गाते हुए...तेरी ओर...


दूसरे पायदान - रॉक ऑन - फ़िल्म -रॉक ऑन

कहते हैं मात्र 5 दिन साथ रह कर शंकर, एहसान, लोय, फरहान, और जावेद साहब ने मिलकर इस फ़िल्म 9 ट्रेक रच डाले. जिसमें से 8 ही एल्बम में शामिल हो पाये. 6 गीतों को स्वर दिया ख़ुद फरहान ने. दरअसल रॉक संगीत को भारत में स्थापित करने की कोशिश इससे पहले भी कई बार हुई है, पर ख़ुद के रचे गानों में दम न होने के जब रॉक बैंड नाकाम होकर कवर वर्जन गाने लगे तो कहा जाने लगा कि हिंदुस्तान में रॉक का कोई भविष्य नही. पर इस फ़िल्म के गीतों ने हिन्दी रॉक संगीत को एकदम से रोक्किंग बना दिया है. दरअसल रॉक संगीत में कविता का बहुत बढ़िया इस्तेमाल हो सकता है, जैसा कि इस फ़िल्म के कई गीतों में देखने को मिला है तो आगे भी इस तरह के प्रयोग होते रहें तो अच्छा है. ये गीत मन में एक नई आशा भरता है. अपने ख्वाबों को दबाना छोड़ दें और खुल कर पंख फैलाएं ऊंची उडानों के लिए.....शायद नए साल पर रॉक ऑन आपको यही संदेश देना चाहता है....आपके सपनें है आपके अपने..रॉक ऑन .



सरताज गीत २००८ - हौले हौले - फ़िल्म -रब ने बना दी जोड़ी

आम आदमी की जीवनचर्या और उसकी सोच को परिभाषित करता है ये हमारा नम्बर 1 गीत "हौले हौले सब कुछ होता है...तू सब्र तो कर सब्र का फल मीठा होता है". अब आप कहेंगे ये तो पुरानी सीख है, पर दोस्तों दरअसल इस गीत के माध्यम से ये गीत सही समय पर आया है, अंधी दौड़ में भागते हर मध्यम वर्गीय आदमी ने अचानक जल्द से जल्द अमीर बनने का सपना देखा. बाज़ार बदला बहुत से दिल बैठ गए....सेंसेक्स की मार से घायल आम आदमी जो अपने मेहनत की जमा पूँजी को डूबता देख रहा था उसके लिए राहत और सबक बन कर आया जयदीप सहानी का लिखा ये गीत. "चक दे" के बाद जयदीप का ये एक और बड़ा गीत है जो शीर्ष स्थान तक पहुँचा है. संगीत सलीम सुलेमान का और आवाज़ है सुखविंदर सिंह जिन्होंने इस गीत को गाकर अपने सभी आलोचकों के मुँह बंद कर दिए हैं....सरताज गीत 2008 ...हौले हौले से सुनिए ज़रा....






साल 2008 के 5 गैर फिल्मी गीत -

5. आसमान - के के
4. आवेगी या नही - रब्बी शेरगिल
3. दौलत शोहरत - कैलाश खेर
2. सोचता हूँ मैं - सोनू निगम
1. सांवरे - रूप कुमार राठोड


सुनिए इन गीतों को भी -



वर्ष २००९ भी इसी प्रकार संगीतमय गुजरे इसी कमाना के साथ हम विदा लेते हैं, नव वर्ष की शुभकामनाओं के साथ. यदि आपने आज की हमारी विशेष प्रस्तुति नही सुनी तो यहाँ सुनिए.


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