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Sunday, August 15, 2010

रविवार सुबह की कॉफी और जश्न-ए-आजादी पर जोश से भरने वाला एक अप्रकाशित दुर्लभ गीत रफ़ी साहब का गाया - लहराओ तिरंगा लहराओ

रात कुछ अजीब थी सच कहूँ तो रात चाँदनी ऐसे लग रही थी जैसे आकाश से फूल बरसा रही हो और बादल समय समय पर इधर उधर घूमते हुए सलामी दे रहे हों. और सुबह सुबह सूरज की किरणों की भीनी भीनी गर्मी एक अलग ही अंदाज़ मे अपनी चह्टा बिखेर रही थी. ऐसा लग रहा था के जैसे ये सब अलमतें हमें किसी ख़ास दिन का एहसास क़रना चाहते हैं. रात कुछ अजीब थी सच कहूँ तो रात चाँदनी ऐसे लग रही थी जैसे आकाश से फूल बरसा रही हो और बादल समय समय पर इधर उधर घूमते हुए सलामी दे रहे हों. और सुबह सुबह सूरज की किरणों की भीनी भीनी गर्मी एक अलग ही अंदाज़ मे अपनी छटा बिखेर रही थी. ऐसा लग रहा था के जैसे ये सब अलमतें हमें किसी ख़ास दिन का एहसास क़रना चाहते हैं. शायद आज सचमुच कोई ख़ास दिन ही तो है और ऐसा ख़ास दिन कि जिसकी तलाश करते हुए ना जाने कितनी आँखें पथरा गयीं, कितनी आँखें इसके इंतज़ार मे हमेशा के लिए गहरी नींद मे सो गयीं.

आज हमारे द्वारा 15 ऑगस्ट को मनाने का अंदाज़ सिर्फ़ कुछ भाषण होते हैं या फिर तिरंगे को फहरा देना कुछ देशभक्ति गीत बजाना जो सिर्फ़ इसी दिन के लिए होते हैं. मुझे याद आ रहा है के 90 के दशक की शुरुआत मे 1 हफ्ते पहले ही से देशभक्ति के गीत रेडियो टीवी पर गूंजने लगते थे. रविवार को प्रसारित होने वाली रंगोली 15 दिन पहले से ही इस दिन का एहसास लेकर आती थी, मगर आज क्या होता है कहने की ज़रूरत नहीं है समझना काफ़ी है. आज़ादी पाने के लिए क्या कुछ करना पड़ा कितनी क़ुर्बानियाँ दीं गयी इन पर लाखों किताबें लिखी जा चुकी हैं और भी शायद लिखी जाती रहेंगी. आज़ादी से पहले भी कुछ साहित्य छपता रहता था दैनिक, साप्ताहिक या मासिक पत्र निकाले जाते थे जिनमें क्रांतिकारियों के लिए संदेश या फिर उनमें जोश भरने के लेख होते थे. कई ऐसे पत्रों को अंग्रेज सरकार ने बंद करा दिया, जब्त कर लिया, उनकी प्रतिया बेचने और खरीदने पर पाबंदियाँ लगा दीं मगर इन सब के बावजूद भी वो उस सैलाब को नहीं रोक पाए. लेखन सामग्री के साथ साथ ही भारतीय फिल्मों ने भी इसमें योगदान किया लेकिन फिल्मों का दायरा पत्रों से ज़्यादा बड़ा था और ज़्यादा असर करता था दूसरे इस प्रकार की फ़िल्मे बनाना एक जोखिम का काम था क्योंकि इसमे पैसा ज़्यादा लगता था. लेकिन फिर भी समय समय पर इस प्रकार की फ़िल्मे बनीं जो अंग्रेज हुकूमत पर सीधे सीधे तो नहीं लेकिन शब्दों के बाणों को छुप छुप कर चलाते थे.

मुझे याद आ रहा है 1944 मे नौशाद अली के संगीत निर्देशन मे बनी “पहले आप” का गीत “हिन्दुस्तान के हम हैं हिन्दुस्तान हमारा, हिंदू मुस्लिम दोनो की आँखों का तारा” इस गीत मे सभी धर्मो को एक साथ मिलकर देश प्रेम की शिक्षा दी गयी है, जो अंगेजों की फुट डालो और शासन करो की नीति को चुनौती देता है यानी एक साथ मिलजुल के रहेंगे तो किसी भी मुसीबत का मुक़ाबला कर सकते हैं. इससे पहले भी 1936 मे आई फिल्म जन्मा भूमि के गीत “ जाई जाई प्यारी जन्मा भूमि” , “ माता ने जानम दिया” और ना जाने कितने ही…….

एक बात जो हम सब पर लागू होती है के जब कोई चीज़ हमें नयी नयी मिलती है तो उसका उन्माद कुछ ज़्यादा होता है जैसे जैसे वक़्त गुज़रता जाता है ये उल्लास कम होता जाता है मगर अपनी आज़ादी के बारे मे ऐसा नहीं है 63 साल गुज़र जाने के बाद भी ये उन्माद कम नहीं हुवा. आज़ादी के बाद जब 31 जनवरी 1948 को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी “बापू” वीरगति को प्राप्त हुए तो ‘हुसनलाल भगातराम’ के संगीत मे सुर मिलाए ‘राजेन्द्र कृष्णा’ ने और आवाज़ दी मोहम्मद रफ़ी ने. उसके बाद तो फिल्मकारों के जज़्बात ने ऐसा जोश मारा के आज़ादी और देश प्रेम को लेकर फिल्म की जो झड़ी लगी तो ये बारिश अब तक रुकने का नाम नहीं ले रही है शहीद (1948), हिन्दुस्तान हमारा (1950), जलियाँवाला बाग की ज्योति (1953), झाँसी की रानी (1953), शहीद ए आज़म भगत सिंह (1954), वतन (1954), शहीद भगत सिंह (1963), हक़ीक़त (1964), शहीद (1965), नेताजी सुभाष चंद्र बोस् (1966), क्रांति (1980) बॉर्डर (1997), लगान (2001), मंगल पांडे (2005) आदि फ़ेरहिस्त बहुत लंबी है वक़्त बहुत कम.

अच्छा दोस्तो कभी आपने गौर किया है के आज़ादी का पहला जनमदिन कैसे मनाया गया होगा. मैं कभी कभी सोचता हूँ के 15 आगस्त 1948 को आज़ाद देश मे साँस लेने वाले लोगों के लिए कितना सुखदाई होगा वो दिन, क्या जोश रहा होगा, क्या जज़्बात रहे होंगे, किस प्रकार से एक दूसरे को बधाइयाँ दीं गयीं होंगी.

उस वक़्त 15 आगस्त महज़ कोई छुट्टी का दिन नहीं रहा होगा बल्कि एक त्योहार के रूप मे मनाया गया होगा.. इसी से संबंधित एक गीत आज यहाँ पेश किया जा रहा है मोहम्मद रफ़ी साहब की आवाज़ मे इस गीत के बोल नीचे लिखे हैं इन पर ज़रा ध्यान देने की ज़रूरत है क्योंकि सुनते वक़्त इतना ध्यान नहीं दे पाते…

आओ एक बरस की आज़ादी का आओ सब त्योहार मनाओ
नगर नगर और डगर डगर लहराओ तिरंगा लहराओ

यही तिरंगा प्राण हमारा यही हमारी माया
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सब पर इसकी छाया
आज इसी झंडे के नीचे आए भारत के बेटों सोचो
आज़ादी के एक बरस मे क्या खोया क्या पाया
आज ईद है आज दीवाली आओ गले लग जाओ
तिरंगा लहराओ

आज के दिन तुम भूल ना जाना बापू जी की अमृत वाणी
दूर ले गयी हमसे उनको एक हमारी नादानी
कब समझोगे राम, मोहम्मद और नानक के बेटों
कब लाएगी रंग हमारे देश पिता की कुर्बानी
जिसने दिया तिरंगा तुमको उसको भूल ना जाओ
तिरंगा लहराओ

आओ आज तिरंगे के नीचे खा लें हम कसमे
प्यार की रीत से बदल डालेंगे नफ़रत की सब रस्मे
वीर जवाहर की सेना बन दुनिया पर छा जाओ
जय हिंद कहो- (4) लहराओ तिरंगा लहराओ
नगर नगर और डगर डगर लहराओ तिरंगा लहराओ


इतना तो तय है कि ये गीत 15 आगस्त 1948 से पहले गाया गया होगा इसकी पहली कड़ी पर ध्यान दें तो आखिरी पंक्ति मे क्या खोया क्या पाया एक बरस मे ही खोने और पाने की बात करने से पता चलता है कि शायर भारत को किस मुकाम पर देखना चाहता है. खैर अब मैं इस गीत के बारे मे ज़्यादा नहीं कहूँगा वरना सुनने का मज़ा कम हो जाएगा मगर इसके साथ ही एक वादा ज़रूर करूँगा के भविष्य मे गीतों की शायराना खूबसूरती को बाहर निकालूँगा, आज़ादी को लेकर फ़िल्मे तो बनती रहीं वहीं प्राइवेट गीत भी कम नहीं गाए गये मगर वो गीत आज श्रोताओं के कुछ ख़ास वर्ग के ही पास हैं और वो उनको आम श्रोताजन को नहीं पहुँचाते हैं इसकी एक ख़ास वजह जो मैं समझता हूँ वो ये हैं कि इन गीतो का मुकाम संगीत प्रेमियों की नज़र मे काफ़ी उँचा होता है और कुछ असामाजिक तत्व जिन्हें संगीत से ख़ास लगाव नहीं होता है इसकी कीमत वसूल करने लग जाते हैं वहीं एक संगीत प्रेमी कभी ये नहीं चाहेगा की इस धरोहर का गलत उपयोग किया जाए.

इस गीत के बारे मे ज़्यादा जानकारी मुझे नहीं मिल पर अगर किसी संगीत प्रेमी के पास हो तो बताएँ.

LAHRAAO TIRANGA LAHRAAO- UNRELEASED RARE SONG BY MD. RAFI



प्रस्तुति- मुवीन



"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Wednesday, July 21, 2010

ये कौन आता है तन्हाईयों में जाम लिए.. मख़्दूम मोहिउद्दीन के लफ़्ज़ औ' आबिदा की पुकार..वाह जी वाह!

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #९३

दिन से महीने और फिर बरस बीत गये
फिर क्यूं हर शब तन्हाई आंख से आंसू बनकर ढल जाती है
फिर क्यूं हर शब तेरे शे’र तेरी आवाज गूंजा करती है
फजाओं में आसमानों में
मुझे यूं महसूस होता है
जैसे तू हयात बन गया है
और मैं मर गया हूं।

अपने पिता "मख़्दूम मोहिउद्दीन" को याद करते हुए उनके जन्म-शताब्दी के मौके पर उनके पुत्र "नुसरत मोहिउद्दीन" की ये पंक्तियाँ मख़्दूम की शायरी के दीवानों को अश्कों और जज़्बातों से लबरेज कर जाती हैं। मैंने "मख़्दूम की शायरी के दीवाने" इसलिए कहा क्योंकि आज भी हममें से कई सारे लोग "मख़्दूम" से अनजाने हैं, लेकिन जो भी "मख्दूम" को जानते हैं उनके लिए मख़्दूम "शायर-ए-इंक़लाब" से कम कुछ भी नहीं। जिसने भी "मख़्दूम" की शायरी पढी या सुनी है, वह उनका दीवाना हुए बिना रह नहीं सकता। हैदराबाद से ताल्लुक रखने वाला यह शायर "अंग्रेजों" और "निज़ाम" की मुखालफ़त करने के कारण हमेशा हीं लोगों के दिलों में रहा है। उर्दू अदब में कई सारे ऐसे शायर हुए हैं, जिन्हें बस लिखने से काम था, तो कई ऐसे भी हुए हैं, जिन्होंने जहाँ अपनी लेखनी से आग लगाई, वहीं अपनी हरक़तों से "शासन" की नाक में दम तक कर दिया। "मख़्दूम" इसी दूसरी तरह के शायर थे। "तेलंगना" की माँग (यह माँग अभी तक चल हीं रही है) और "हैदराबाद" को "निज़ाम" से मुक्त कराने का जुनून इनकी आँखों में और इनके जज़्बो में बखूबी नज़र आता था। "तेलंगना" की स्त्रियों (जिन्हें तेलंगन कहा जाता है) को जगाने के लिए इनकी लिखी हुई यह नज़्म आज भी वही पुरजोर असर रखती है:

फिरने वाली खेत की मेड़ों पर बलखाती हुई,
नर्मो-शीरीं क़हक़हों के फूल बरसाती हुई,
कंगनों से खेलती, औरों से शरमाती हुई,

अजनबी को देखकर खामोश मत हो, गाए जा,
हाँ तेलंगन गाए जा, बाँकी तेलंगन गाए जा।

देखने आते हैं तारे शब में सुनकर तेरा नाम,
जलवे सुबह-ओ-शाम के होते हैं तुझसे हमकलाम,
देख फितरत कर रही है, तुझको झुक-झुककर सलाम,

अजनबी को देखकर खामोश मत हो, गाए जा,
हाँ तेलंगन गाए जा, बाँकी तेलंगन गाए जा।

ले चला जाता हूँ आँखों में लिए तस्वीर को,
ले चला जाता हूँ पहलू में छुपाए तीर को,
ले चला जाता हूँ फैला राग की तनवीर को,

अजनबी को देखकर खामोश मत हो, गाए जा,
हाँ तेलंगन गाए जा, बाँकी तेलंगन गाए जा।

मख़्दूम ऐसी आज़ादी का सपना देखते थे, जिसमें मज़दूरों का राज हो, जहाँ सही मायने में "स्वराज" हो। इस मुद्दे पर लिखी मख़्दूम की यह नज़्म "आजादी के मतवालों" के बीच बेहद मक़बूल थी, भले हीं गाने वालों को इसके "नगमानिगार" की जानकारी न हो:

वह जंग ही क्या वह अमन ही क्या
दुश्मन जिसमें ताराज़ न हो
वह दुनिया दुनिया क्या होगी
जिस दुनिया में स्वराज न हो
वह आज़ादी आज़ादी क्या
मज़दूर का जिसमें राज न हो

लो सुर्ख़ सवेरा आता है आज़ादी का आज़ादी का
गुलनार तराना गाता है आज़ादी का आज़ादी का
देखो परचम लहराता है आज़ादी का आज़ादी का

मख़्दूम का "बागी तेवर" देखकर आप सबको यह यकीन हो चला होगा कि ये बस इंक़लाब की हीं बोली जानते हैं.. इश्क़-मोहब्बत से इनका दूर-दूर का नाता नहीं। लेकिन ऐसा कतई नहीं है। दर-असल इश्क़े-मजाज़ी में इनका कोई सानी नहीं। प्यार-मोहब्बत की भाषा इनसे बढकर किसी ने नही पढी। कहने वाले यहाँ तक कहते हैं कि "मजाज़ लखनवी" "उर्दू अदब के कीट्स" न कहे जाते, अगर "मख्दूम" ने "मजाज़" के लिए "जमीन" न तैयार की होती। मजाज़ ने इश्क़िया शायरी के जलवे इन्हीं से सीखे हैं। इश्क़ में कोई कहाँ तक लिख सकता है, इसकी मिसाल मख़्दूम साहब का यह शेर है:

न माथे पर शिकन होती, न जब तेवर बदलते थे
खुदा भी मुस्‍कुरा देता था जब हम प्यार करते थे


मख़्दूम की इसी अनोखी अदा पर रीझ कर "ग़ालिब" के शागिर्द "मौलाना हाली" के नाती "ख्वाज़ा अहमद अब्बास" कहते हैं: ”मख्दूम एक धधकती ज्वाला थे और ओस की ठंडी बूंदे भी। वे क्रांतिकारी छापामार की बंदूख थे और संगीतकार का सितार भी। वे बारूद की गंध थे और चमेली की महक भी।”

मख़्दूम साहब की जन्म-शताब्दी के मौके पर नुसरत मोहिउद्दीन और "हिन्दी साहित्य संवाद" के संपादक शशिनारायण स्वाधीन के द्वारा संपादित की हुई पुस्तक "सरमाया - मख़्दूम समग्र" का विमोचन किया गया। इस पुस्तक में "बक़लम-मख़्दूम" नाम से एक अध्याय है,जिसमें मख़्दूम साहब ने "शेरो-शायरी" पर खुलकर चर्चा की है। खैर.. इस किताब की बात कभी बाद में करेंगे। वैसे क्या आपको पता है कि मख्दूम ने तेलंगाना में किसानों के साथ जो संघर्ष किया उसे लेकर उर्दू के महान उपन्यासकार कृषन चंदर ने ‘जब खेत जागे’ नाम का उपन्यास लिखा था, जिस पर गौतम घोष ने तेलुगू में ‘मां भूमि’ फिल्म बनाई। मख्दूम की प्रमुख कृतियों में सुर्ख सवेरा, गुल-ए-तर और बिसात-ए-रक्स हैं। इतना हीं नहीं, मख्दूम ने जार्ज बर्नाड शा के नाटक ‘विडोवर्स हाउस’ का उर्दू में ‘होष के नाखून’ नाम से और एंटन चेखव के नाटक ‘चेरी आर्चर्ड’ का ‘फूल बन’ नाम से रूपांतर किया। मख्दूम ने रवींद्रनाथ टैगोर और उनकी शायरी पर एक लंबा लेख भी लिखा। इसके अलावा मख़्दूम ने तीन कविताओं के अनुवाद किए, जिनमें एक कविता "तातरी शायर" जम्बूल जावर की है, तो दो कविताएँ अंग्रेजी कवयित्री इंदिरा देवी धनराजगीर की हैं। अगर जगह की कमी न होती, तो मैं आपका परिचय इन तीन कविताओं से जरूर करवाता।

बातें बहुत हो गईं, फिर भी कहने को कई सारी चीजें बची हैं। सब कुछ तो एक महफ़िल में समेटा नहीं जा सकता, इसलिए अगर आपकी जिज्ञासा शांत न हुई हो तो कृपया यहाँ और यहाँ हो आएँ। चलिए, अब आज की ग़ज़ल की ओर रूख करते हैं। आज की ग़ज़ल एक तरह से बड़ी हीं खास है। एक तरह से क्यों. दोनों हीं तरह से खास है. और वो इसलिए क्योंकि इस ग़ज़ल में आवाज़ें हैं "मुज़फ़्फ़र अली" और "आबिदा परवीन" की। आवाज़ों का ये संगम इससे पहले और इसके अलावा कहीं और सुनने को नहीं मिलता। मुज़फ़्फ़र साहब के आवाज़ की शोखी और आबिदा की आवाज़ का मर्दानापन "ग़ज़ल" को किसी और हीं दुनिया में ले जाता है। तो तैयार हो जाईये, इस अनूठी ग़ज़ल का लुत्फ़ उठाने को:

उसी अदा से, उसी बांकपन के साथ आओ,
फिर एक बार उसी अंजुमन के साथ आओ,
हम अपने एक दिल-ए-बेखता के साथ आएँ,
तुम अपने महशर-ए-दार-ओ-रसन के साथ आओ।

ये कौन आता है तन्हाईयों में जाम लिए,
दिलों में चाँदनी रातों का एहतमाम लिए।

चटक रही है किसी याद की कली दिल में,
नज़र में रक़्स-ए-बहारां की सुबहो-शाम लिए।

महक-महक के जगाती रही नसीम-ए-सहर,
लबों पे यार-ए-मसीहा नफ़स का नाम लिए।

किसी खयाल की खुशबू, किसी बदन की महक,
दर-ए-क़फ़स पे खड़ी है ____ पयाम लिए।

बजा रहा था कहीं दूर कोई शहनाई,
उठा हूँ आँखों में इक ख्वाब-ए-नातमाम लिए।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "क़यामत" और शेर कुछ यूँ था-

तेरा पहलू तेरे दिल की तरह आबाद रहे
तुझ पे गुज़रे न क़यामत शब-ए-तन्हाई की

कई हफ़्तों के बाद महफ़िल में पहली हाज़िरी लगाई शरद जी ने और इसलिए उन्हें "शान-ए-महफ़िल" से नवाज़ा जा रहा है। शरद जी के बाद महफ़िल में चहल-कदमी करती हुई शन्नो जी नज़र आईं.. आपने अपने शेर कहने शुरू हीं किए थे कि "जाने-अनजाने" नीलम जी की कही एक बात आपको चुभ गई.. फिर आगे चलकर अवनींद्र जी ने कुछ कहा और उनके कहे पर आपने अपना एक शेर डाल दिया जिससे अवनींद्र जी कुछ उदास हुए और आप परेशान हो गईं। अरे भाईयों, दोस्तों.. ये हो क्या रहा है? हम फिर से वही गलतियाँ क्यों कर रहे हैं, जिनसे सब के सब तौबा कर चुके हैं। यहाँ पर मैं किसी एक पर दोष नहीं डाल रहा, लेकिन इतना तो कहना हीं चाहूँगा कि ये "बचकानी" हरकतें "महफ़िल" में सही नहीं लगती। मेरे अग्रजों एवं मेरी अग्रजाओं(चूँकि आप सब मुझसे बड़े हैं.. उम्र में) ज़रा मेरा भी तो ध्यान करो.. मैं महफ़िल सजाऊँ या फिर महफ़िल पर निगरानी रखूँ। मैं पहले हीं कह चुका हूँ कि महफ़िल आपकी है, इसलिए लड़ना-झगड़ना या महफ़िल छोड़कर जाना (या फिर जाने की सोचना) तो अच्छा नहीं। आपको किसी की बात बुरी लगे तो नज़र-अंदाज़ कर दीजिए... लेकिन उससे बड़ा मसला तो ये है कि ऐसी बात कहीं हीं क्यों जाए। कभी-कभी कहने वाले की मंशा बुरी नहीं होती, लेकिन चूँकि वो खुलकर कह नहीं पाता या फिर "बात" को "आधे" पर हीं रोक देता है, ऐसी स्थिति में अन्य लोग उसका कुछ भी मतलब निकाल सकते हैं.. और अगर मतलब "अहितकारी" हुआ तो "बुरा" भी मान सकते हैं। इसलिए ऐसी बातें करने से बचें। मैंने अभी तक जो भी कहा, वो कोई आदेश नहीं, बल्कि "एक छोटे भाई" का आग्रह-मात्र है। अगर आप मानेंगे तो आपका अनुज "सही से" महफ़िल का संचालन कर पाएगा। चँकि आज इतना कुछ कह दिया, इसलिए दूसरे मित्रों, अग्रजों एवं अग्रजाओं का जिक्र नहीं कर पा रहा हूँ। इस गुस्ताखी के लिए मुझे मुआफ़ कीजिएगा। मैं यकीन दिलाता हूँ कि अगली महफ़िल में सारी "टिप्पणियाँ" सम्मिलित की जाएँगी... बशर्ते ऐसी हीं कोई विकट समस्या उत्पन्न न हो जाए। और हाँ, मेरी तबियत अब ठीक है, आप सबने मेरा ख्याल रखा, इसके लिए आपका तहे-दिल से आभार!

और अब पेश हैं आप सबके शेर:

ग़र खुदा मुझसे कहे कुछ माँग अय बन्दे मेरे
मैं ये माँगू महफ़िलों के दौर यूँ चलते रहें ।
हमनिवाला, हमपियाला, हमसफ़र, हमराज़ हों,
ता कयामत जो चिरागों की तरह जलते रहें ॥ (शरद जी)

माना के तबाही में कुछ हाथ है दुश्मन का
कुछ चाल कयामत की अपने भी तो चलते हैं (नीलम जी)

सुमन जो सेज पर सजे थे .
उन्ही से कयामत की अर्थी सजाई गई . (मंजु जी)

जाते हुए कहते हो क़यामत को मिलेंगे,
क्या ख़ूब ? क़यामत का है गोया कोई दिन और. (ग़ालिब)

ज़िंदगी की राहों में रंजो-ग़म के मेले हैं,
भीड़ है क़यामत की फिर भी हम अकेले हैं।

चेहरे पर झुर्रियों ने कयामत बना दिया
आईना देखने की भी हिम्मत नहीं रहीं (ख़ुमार बाराबंकवी)

जो दिल को ख़ुशी की आदत न होती
रूह में भी इतनी सदाक़त न होती !
ज़माने की लय पे जिए जाते होते
तेरी बेरुखी भी क़यामत न होती !! (अवनींद्र जी)

मेरी गुस्ताखियों को खुदा माफ़ करना
कि इसके पहले कोई क़यामत आ जाये. (शन्नो जी)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Saturday, August 15, 2009

ताक़त वतन की हमसे है, हिम्मत वतन की हमसे है.....जय भारत के वीर जवान,जय जय हिंदुस्तान...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 172

मारा देश आज अपना ६३-वाँ स्वाधीनता दिवस मना रहा है। इस ख़ास पर्व पर हम सभी श्रोताओं व पाठकों का हार्दिक अभिनंदन करते हैं। आज ही के दिन सन् १९४७ में दिल्ली के लाल क़िले की प्राचीर पर नेहरु जी ने पहली बार स्वतंत्र भारत में तिरंगा लहराया था। जिस तरह से तिरंगे की तीन रंगों, गेरुआ, सफ़ेद और हरा, का अपना अपना अर्थ है, महत्व है, इन्ही तीन रंगों के महत्व को उजागर करते हुए आज से अगले तीन दिनों की 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल सजेगी। पहला रंग है गेरुआ, यानी कि वीरता का, या वीर रस का। इतिहास गवाह है हम भारतीयों की वीरता का। जब जब देश पर विपदा आन पड़ी है, इस देश के वीर जवानों ने तब तब अपनी जान की परवाह किए बग़ैर देश को हर संकट से उबारा है। फिर चाहे वह दुश्मनों का आक्रमण हो या कोई प्राकृतिक विपदा। ज़्यादा पीछे जाने की ज़रूरत नहीं, हाल ही में मुंबई आतंकी हमलों के दौरान हमारे जवानों ने जो वीरता दिखायी है कि हमारा सर श्रद्धा से उनके आगे झुक जाता है। तो दोस्तों, वीरता हमारे देश की परंपरा रही है, लेकिन वीर होने का अर्थ हमारा कदापि यह नहीं कि दूसरों पर हम वार करें। इतिहास इस बात का भी गवाह है कि कभी भी हमने किसी मुल्क पर पहले वार नहीं किया है। अक्सर दुश्मनों ने हमारी इस प्रथा को हमारी कमज़ोरी समझने की ग़लती की है, और मात खायी है। ख़ैर, वीर रस पर आधारित हमने जिस गीत को चुना है आज की इस महफ़िल के लिए, वह है फ़िल्म 'प्रेम पुजारी' का। कवि नीरज का लिखा यह गीत है "ताक़त वतन की तुम से है, हिम्मत वतन की तुम से है, इज़्ज़त वतन की तुम से है, इंसान के हम रखवाले"। जहाँ एक ओर वीर रस कूट कूट कर भरा हुआ है गीत के एक एक शब्द में, वहीं दूसरी ओर इस बात पर भी ज़ोर दिया गया है कि चाहे उपर से कितने भी कठोर हम दिखें, हमारे अंदर एक कोमल दिल भी बसता है - "देकर अपना ख़ून सींचते देश के हम फुलवारी, बंसी से बंदूक बनाते हम वो प्रेम पुजारी"। पूरा गीत कुल ७ मिनट और २३ सेकन्ड्स का है, गीत दो भागों में बँटा हुआ है, दोनों भागों में तीन तीन अंतरें हैं, कौन सा अंतरा सब से बेहतर है, यह बताना संभव नहीं।

'प्रेम पुजारी' फ़िल्म आयी थी सन् १९७० में जिसका निर्माण व निर्देशन किया था देव आनंद ने। देव आनंद, वहीदा रहमान व नासिर हुसैन अभिनीत इस फ़िल्म के संगीतकार थे सचिन देव बर्मन। प्रस्तुत गीत मूलतः एक समूह गान है, लेकिन 'लीड सिंगर्स' हैं मोहम्मद रफ़ी और मन्ना डे। फ़िल्म में इस गीत की ख़ास जगह है। जैसे कि फ़िल्म के शीर्षक से ही प्रतीत होता है कि फ़िल्म का नायक शांति प्रिय पात्र होगा, जो दुनिया भर में प्यार लुटायेगा। तो फिर ऐसी कहानी में वीर रस और युद्ध पर जानेवाले फ़ौजियों का गीत क्यों? दरअसल कहानी कुछ ऐसी थी कि दुर्गाप्रसाद बक्शी (नासिर हुसैन) आर्मी के रिटायर्ड जनरल हैं जिन्होने अपने ज़माने में बहादुरी के कई झंडे गाढ़े और कई वीरता पुरस्कारों से सम्मानित हुए। लेकिन एक बार पड़ोसी मुल्क के साथ युद्ध में उन्हे अपनी एक टांग गवानी पड़ी और उन्हे नौकरी से रिटायर होना पड़ा। उधर उनके एकलौते बेटे रामदेव बक्शी (देव आनंद) अपने पिता के स्वभाव के बिल्कुल विपरीत है। वो है तो आर्मी में ही, लेकिन वो है प्रेम का पुजारी। किसी पर बंदूक चलाने से उसका हाथ कांपता है। ऐसी ही किसी कारण से वो गिरफ़तार हो जाता है और उसका 'कोर्ट-मार्शल' हो जाता है। अपने पिता को मुँह दिखाने के क़ाबिल नहीं रह जाता। युद्ध में विजय के बाद जहाँ एक तरफ़ दूसरे फ़ौजी जवान जश्न मनाते हुए प्रस्तुत देश भक्ति गीत गा रहे होते हैं, वहीं झाड़ियों के पीछे छुपकर रामदेव रो रहा होता है। इस फ़िल्म की कहानी भी देव साहब ने ही लिखी है, जिसमें उन्होने यही बताने की कोशिश की है कि वीरता का मतलब यह नहीं कि दुश्मनों को बंदूक की गोलियों से उड़ा दिया जाये। हमारी परंपरा, हमारी संस्कृति हमें यही सिखाती है कि हम दूसरों से प्यार करें और प्यार ही प्यार दुनिया में फैलायें। वीर वो है जो पहले प्रेम से दुश्मनों को जीतने का प्रयास करता है, अगर फिर भी दुश्मन न मानें, तो फिर हमें दूसरे तरीके भी आते हैं। लीजिए, आज का गीत सुनिए और सदैव यह याद रखें कि वीर होने का अर्थ जंग पे जाकर बंदूक से लोगों को मारना नहीं, बल्कि वीरता का अर्थ है लोगों की जानें बचाना। याद रखें कि हम प्रेम के पुजारी हैं।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. कल के गीत का थीम है "जय विज्ञान".
2. प्रेम धवन है गीतकार इस गीत के.
3. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से -"आज".

पिछली पहेली का परिणाम -
दिशा जी माफ़ी चाहेंगें कि अंतरे की जगह मुखडा लिखा गया...पर भूल सुधार कर दिया गया था, और आपको सूचित भी इसलिए रोहित जी को अंक मिलेंगें. रोहित जी अब आपके बराबर यानी १० अंकों पर आ चुके हैं. वैसे जो बाकी गीत आप लोगों ने सुझाये वो "जय जवान" थीम पर सटीक नहीं बैठते. वीरता और शौर्य का प्रदर्शन केवल इसी गीत में है...बहरहाल इस छोटी सी बहस से मज़ा दुगना ही हुआ...:)

और हाँ हमारी नियमित श्रोता स्वप्न मंजूषा जी ने देशभक्ति गीतों वाले रविवार विशेष जो कि दिशा जी के संचालन में हुआ था के लिए कुछ लिख भेजा था जो हमें बहुत देर में मिला...पर चूँकि उनके आलेख में आज के हमारे इस गीत का जिक्र था तो हमें लगा कि उसे हम आप सब के साथ आज बाँटें. स्वप्न जी लिखती हैं -

बात उन दिनों की है जब हम कनाडा आये ही थे ...हम अपना पहला १५ अगस्त कनाडा में मना रहे थे. ओटावा की छोटी सी इंडियन कम्युनिटी ने भी १५ अगस्त मनाने थी, एक हाल में सांस्कृतिक कार्क्रम का आयोजन किया गया था, क्योंकि सबको पता था कि मैं भी गाती हूँ इसलिए मुझसे गाने का अनुरोध किया गया था....जैसे ही नाम बुलाया गया स्टेज पर मेरे तीनो बच्चे, मैं और मेरे पति गिटार, और सुरेन जी तबले पर, आ गए...छोटे छोटे बच्चों को देखते ही तालियों की गड़गडाहट से हॉल गूँज उठा...हमने वो गीत गया 'ताक़त वतन की हमसे हैं हिम्मत वतन की हमसे है' मेरे दोनों बेटे सुर में और तन्मयता से गारहे थे, मात्र ६ साल और ७ साल के बच्चे बिटिया मात्र ३ साल की, इतना जोश था के पूरा हॉल गा रहा था और लोग फूट-फूट कर रो रहे थे आज भी सोचती हूँ तो रोमांच से रोंगटे खड़े हो जाते हैं गीत के ख़त्म होते ही मेरे बच्चे न जाने कितनो की गोद में समां गए... उसके बात परंपरा सी बन गयी हर १५ अगस्त और २६ जनवरी को हमारा परिवार ज़रूर ही गाता है, लेकिन इस बार यह नहीं हो पायेगा मेरा छोटा बेटा मेडिकल कॉलेज चला गया है...और बड़े बेटे की परीक्षा उसी दिन है.....
सिर्फ मेरी बेटी दोनों देशों के राष्ट्रीय गीत गाने वाली है...और हम साथ खड़े होंगे अपने तिरंगे को सलामी देने के लिए...
जय हिंद....

इस गीत को गाने के बाद मैंने 'वन्दे-मातरम' आनंद -मठ का गाया.....मुझे नहीं लगता की मैंने उस दिन जैसा गाया वैसा जीवन में फिर कभी गाया...लोग आज भी याद करते हैं मेरा परफॉर्मेंस......शायद देश से बिछड़ने का पहला-पहला अहसास था वो जो आह बन का निकला और वहां बैठे श्रोताओं के ह्रदय मैं समां गया...

आप की इच्छा में जो भी गीत हो सुना दीजियेगा... देशभक्ति का हर गीत सुहाना है मेरे लिए..


हमें यकीन है स्वप्न जी आज इस गीत को यहाँ सुनकर आपने इन सुहाने पलों को फिर से जी लिया होगा

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, August 14, 2008

कृष्णा...अल्लाह...जीसस...

आज़ादी दिवस पर दो नायाब वीडियो

खुदा ने इंसान को बनाया, इंसान ने मजहब. और फ़िर मजहबों, खुदाओं और इंसानों ने मिलकर बाँट ली जमीनें, और खींच दी सरहदें दिलों के दरमियाँ...कल ६१ वीं बार आज़ाद भारत में, लहराएगा तिरंगा लालकिले पर, मगर तमाम उपलब्धियों और भविष्य की असीम संभावनाओं के बीच सुलग रहा है, आज भी हिंद.

Religion is the reason, the world is breaking up into pieces….everybody wants control, don't hesitate to kill one another.... कहते है लुईस, इस महीने के हमारे विडीयो ऑफ़ दा मंथ में, और कितना सही कहते हैं, ये विडियो आज के हिंद के लिए एक प्रार्थना समान है.

Fusion music यानी दो या अधिक तरह के संगीत विधाओं को मिला कर एक नया संगीत रचना, यहाँ ये प्रयोग किया दो महान कलाकारों, हरिहरन और लेसली लुईस ने, भारतीय शास्त्रीय संगीत और वेस्टर्न पॉप को मिलाने का, जब राग यमन कल्याणी को गिटार पर गाया गया तो, युवाओं के मन पर छा गया.

गीत का संदेश, बहुत अच्छे रूप में सबके सामने रखने में हाथ रहा है इसके विडियो का भी, black and white फॉर्मेट में चित्रित हुए इस विडियो में एक मार्मिक कहानी बुनी गई है, इस कहानी में जो बच्चा अपनी राह से भटकता दिखाया गया है, क्या इस बच्चे में हम सब को अपनी तस्वीर नज़र नही आती. यही समय है की हम चेतें और हिंदू , मुस्लिम, दलित या ब्राह्मण कहलाने से पहले भारतीय कहलाने में गर्व महसूस करें....गीत के अंत में जब हरिहरन अपनी मखमली आवाज़ में " गोविन्द बोलो हरी गोपाल बोलो..." का जाप करते हैं, तो वो किसी खास धरम के अनुयायी बन कर नही, वरन इन्सान को इंसान समझने वाले हर हिन्दुस्तानी के मन की आशा का प्रतिनिधित्व करते नज़र आते हैं....देखते हैं ये विडियो और दुआ करें एक बार फ़िर अपने हिंदुस्तान के लिए, कि हर तरफ़ अमन हो, शान्ति हो, प्रेम हो और हो सदभाव....



मगर चूँकि आज हम एक दिन पहले मिल रहे हैं देश की आज़ादी की ६१ वीं वर्षगांठ से, तो एक और विशेष विडियो को आपके सामने रखना अवश्यक लग रहा है. आज से ठीक २० वर्ष पहले यानी कि १९८८ में, यह विडियो ओपन हुआ था, दूरदर्शन पर तत्कालिन प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम संदेश के बाद, लोक सेवा संचार परिषद् द्वारा निर्मित इस विडियो के लिए बोल लिखे थे पियूष पाण्डेय ने और स्वरबद्ध किया था एक बार फ़िर लुईस बैंक ने, १४ भाषाओँ में एक ही बात कही गई थी " मिले सुर मेरा तुम्हारा ". हिन्दी, कश्मीरी, पंजाबी, सिन्दी, उर्दू, तमिल, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम, बंगला, असामी, ओडिया, गुजरती और मराठी, हर आवाज़ में बस एक ही कामना, मिल कर बनी थी जो आवाज़ पूरे भारत की, वो आज भी हर भारतीय को अपने मन की आवाज़ ही लगती है. इस गीत का जादू इतने बरसों के बाद भी वैसा का वैसा ही है....ज़रा देखें तो कौन कौन दिखेंगे आपको इस नायाब विडियो में - पंडित भीमसेन जोशी, एम् बलामुरालिकृष्ण, और लता मंगेशकर जैसी आवाजें, फिल्मकार मृणाल सेन अगर है तो सैयद किरमानी, अरुण लाल, प्रकाश पादुकोण, नरेन्द्र हिरवानी, जैसे खिलाड़ी भी हैं, मल्लिका साराभाई जैसी नृत्यांगना है तो अमिताभ बच्चन, मिथुन, कमल हसन, रेवती, जीतेन्द्र, वहीदा रहमान, शर्मीला टैगोर, शबाना आज़मी, ओमपुरी, दीना पाठक और मीनाक्षी शेषाद्री, जैसे बड़े फिल्मी सितारों ने भी इस विडियो में अपना योगदान दिया...तो दोस्तो, क्यों न एक बार यादों के गलियारे में लौटें, और कामना करें कि, अलगाव का रास्ता छोड़, सब भारतीय फ़िर एक सुर में गायें, तमाम भारतीय भाषाओँ में, हम सब की आवाजें फ़िर से मिलें और बने एक नया सुर - पूरे भारत का सुर.


जय हिंद

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