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Wednesday, May 2, 2012

"क़स्मे, वादे, प्यार, वफ़ा, सब बातें हैं..." - जितना यादगार यह गीत है, उतनी ही दिलचस्प है इसके बनने की कहानी


यह बिलकुल ज़रूरी नहीं कि एक अच्छा गीत लिखने के लिए गीतकार को किसी पहाड़ पर या समुंदर किनारे जा कर अकेले में बैठना पड़े। फ़िल्म-संगीत का इतिहास गवाह है कि बहुत से कालजयी गीत यूंही बातों बातों में बन गए हैं। एक ऐसी ही कालजयी रचना है "क़स्मे, वादे, प्यार, वफ़ा, सब बातें हैं बातों का क्या"। रोंगटे खड़े कर देने वाला है यह गीत कैसे बना था, आज उसी विषय पर चर्चा 'एक गीत सौ कहानियाँ' की 18-वीं कड़ी में सुजॉय चटर्जी के साथ...


एक गीत सौ कहानियाँ # 18

1967 की मशहूर फ़िल्म 'उपकार' के गीतों की समीक्षा पंकज राग ने अपनी किताब 'धुनों की यात्रा' में कुछ इस तरह से की है - "'उपकार' का सबसे हिट गाना महेन्द्र कपूर की आवाज़ में सदाबहार देशभक्ति गीत "मेरे देश की धरती सोना उगले" बनकर गुलशन बावरा की कलम से निकला, पर गुलशन के इस गीत और "हर ख़ुशी हो वहाँ तू जहाँ भी रहे" तथा क़मर जलालाबादी के लिखे और विशेष तौर पर मुकेश के गले के लिए आसावरी थाट पर सृजित "दीवानों से ये मत पूछो दीवानों पे क्या गुज़री है" की अपार लोकप्रियता के बावजूद 'उपकार' का एक गीत यदि चुनना हो तो इंदीवर के शब्दों और मन्ना डे के स्वर में प्राण पर फ़िल्माया वह अमर गाना "क़स्मे वादे प्यार वफ़ा सब बातें हैं" ही चुना जाएगा। मन्ना डे अपने कुछ गानों में किस कदर सोज़ पैदा कर देते थे इसके उदाहरणों में 'काबुलीवाला' के "ऐ मेरे प्यारे वतन" के बाद "कस्मे वादे प्यार वफ़ा" का ही स्थान माना जाना चाहिए।" 

'उपकार' के संगीतकार कल्याणजी-आनन्दजी के कल्याणजी भाई जब विविध भारती के 'जयमाला' कार्यक्रम में तशरीफ़ लाए थे, तब उन्होंने अपने सेन्स ऑफ़ ह्यूमर को कायम रखते हुए फ़िल्मी गीतों को तीन भागों में बाँटा था - होमियोपैथिक, ऐलोपैथिक और आयुर्वेदिक। होमियोपैथिक में वे गानें आते हैं जिन्हें बनाते समय यह पता नहीं रहता कि गाना कैसा बनेगा, या तो बहुत अच्छा बनेगा या फिर बहुत ही बेकार बनेगा। ऐलोपैथिक  में वे गानें आते हैं जो पहले-पहले तो सुनने में बहुत अच्छे लगते हैं पर समय के साथ-साथ उनकी मधुरता कम होने लगती है जिस तरह से ऐलोपैथिक दवाइयों के बाद रीऐक्शन और साइड-ईफ़ेक्ट्स होते हैं। और आयुर्वेदिक गानें वो होते हैं जो पहले सुनने में उतना अच्छा नहीं भी लग सकता है, पर धीरे-धीरे उनकी मिठास बढ़ती चली जाती है। कल्याणजी भाई की नज़र में "क़स्मे वादे प्यार वफ़ा..." एक आयुर्वेदिक गीत है। उन्हीं के शब्दों में, "एक आयुर्वेदिक गीत प्रस्तुत है जिसके पीछे एक कहानी है। आनन्दजी, मेरा छोटा भाई, कई साल पहले इंदीवरजी ने एक गीत लिखा था जिसे आनन्दजी ने उस समय अपने पास रख लिया था। मनोज कुमार ने उस वक़्त कहा था कि मैं इस गीत को अपनी फ़िल्म में इस्तमाल करूँगा। फ़िल्म 'उपकार' में ऐसे ही एक गाने की सिचुएशन आ गई जो प्राण साहब पर पिक्चराइज़ होना था। उस समय प्राण साहब फ़िल्म में कभी गीत नहीं गाया करते थे, उनके रोल बड़े सीरियस किस्म के होते थे। 'उपकार' में पहली बार उन्होंने किसी गीत में अभिनय किया। मन्ना डे साहब ने इतनी ख़ूबसूरती के साथ गाया है कि लगता ही नहीं कि किसी ने प्लेबैक किया है। ऐसा लगता है जैसे प्राण साहब ख़ुद गा रहे हैं।"

कल्याणजी ने तो इस गीत की कहानी को बहुत ही संक्षिप्त में कह कर चले गए, पर बाद में जब आनन्दजी विविध भारती आए थे, तब उन्होंने इस गीत के बारे में विस्तार से बताया था। शुरू-शुरू में इस गीत को किशोर कुमार से गवाने की सब लोग सोच रहे थे। "सब लोग मिल के सोच रहे थे, यह एक नई बात थी, it was a new thing, एक बहुत बड़ा स्टेप लिया जा रहा था। प्राण साहब भी विलेन बनते थे, सब सोच में पड़ गए कि ये कैसे करेंगे, कैसे निभायेंगे। अब बोल भी नहीं सकते थे, मलंग बोले तो, हम बनिये लोगों को मलंग का मतलब भी समझ में नहीं आता, मलंग क्या होता है? तो हमने बोला कि मलंग क्या होता है? बोले कि फ़कीर जो होता है उसको मलंग बोलते हैं, तो वो विकलांग मलंग है, वो इस तरह से गाना गाएगा, इसकी एक लम्बी कहानी है कि गाना कैसे बना था पहले। This was a stock song, तैयार किया हुआ था। कई गानें होते हैं न जो कभी बन जाते हैं और सम्भाल कर रख लेते हैं! इस गीत के साथ क्या होता है कि मुखड़ा बन जाता है, फिर मुखड़े के बाद एक अंतरा भी बन गया था। देखिए क्या हुआ था कि मैं अफ़्रीका से आया हुआ था, ये अफ़्रीका में मेरा एक दोस्त था, वो यहाँ एक लड़की से प्यार करता था, उसने मुझे बोला कि उसको जाके बोलना कि मैं आ रहा हूँ। मैंने कहा कि बोल दूँगा। बंबई वापस आया तो मेरी एक टाँग टूटी हुई थी, तो थोड़ा फ़िलोसोफ़िकल मैं ऐसे ही हो गया था, ऐक्सिडेण्ट जब हुआ था तब मैं सोच रहा था होस्पिटल में बैठे-बैठे कि न मैंने अपनी माँ को याद किया, न बाप को याद किया, जब दर्द बढ़ा तो ईश्वर को मैंने यही कहा कि सबको सुखी रखना और मेरी जान निकाल ले। बाहर निकलने के बाद यह लगा कि आदमी अपने दुख के सामने सबको भूल जाता है, न बीवी याद आएगी, न छोटे बच्चे। तो मैं सब भूल गया, वहीं से "क़स्मे वादे प्यार वफ़ा सब बातें हैं बातों का क्या" का ख़याल आया। तो दिमाग़ में एक ऐसी बात बैठ गई थी। तो यहाँ आने के बाद पता चला कि वो इंदीवर जी के भी कॉमन फ़्रेण्ड थे, तो रस्ते में आते-आते मैंने कहा कि 'इंदीवर जी, क्या यार वो दोस्त बेचारा तो अभी भी उम्मीद कर रहा है कि बंबई आऊँगा और शादी करूँगा, और यहाँ लड़की ने तो शादी कर ली है, मैं उसको क्या कहूँगा?' इंदीवर जी ने कहा कि "अरे ये सब बातें हैं सब", तो ये सब सुना तो बोले कि यह एक अच्छा मुखड़ा बन सकता है, चलो घर चलते हैं। घर चले हम लोग और वहाँ बैठ कर रात भर गाना बन गया। वहाँ पर बैठे-बैठे मैंने एक सजेशन दी कि 'इंदीवर जी, आदमी की, दुनिया की दस्तूर क्या है देखो, कि एण्ड में उसका बेटा ही उसको जलाता है, यह कस्टम बनी हुई है, तो उन्होंने लिख दिया कि "तेरा अपना ख़ून ही आख़िर तुझको आग लगाएगा"; उसके बाद बोले कि 'क्या कर दिया तुमने?' बोले, 'अब मैं घर नहीं जाऊँगा, अब तो डर लगने लगा है मुझे'। हम लोग सारी रात बाहर बैठे हुए थे, और दूसरी बातें कर रहे हैं, वो बोले कि दूसरी बातें करो यार, ये तो बहुत हेवी हो गया यार! तो गाना यहीं छूट गया, इसको यहाँ तक करके छोड़ दिया, एक गाना बन गया।"

मन्ना दा के स्वर में यह गीत एक अमर गीत बन गया। मास और क्लास, दोनों ने इसे गले लगाया, आँखों में बिठाया। विविध भारती पर एक कार्यक्रम आता है 'फ़ेवरीट फ़ाइव' जिसमें फ़िल्मी दुनिया के कलाकार अपनी पसंद के पाँच गीत सुनवाते हैं। अनुप जलोटा और सुनिधि चौहान ने अपने पसंदीदा गीतों में इस गीत को शामिल किया है। सुनिधि के शब्दों में, "मन्ना दा का नाम लेना चाहूँगी। बहुत बड़े कलाकार हैं। उनके बारे में कहने के लिए शब्द नहीं है मेरे पास, क्योंकि वो एक, सुखविंदर जी से पहले वो एक सिंगर हैं मेरे ख़याल से जो गायकी से एक लेवल उपर हैं। उनका गाना सिर्फ़ गाना न सुनाई दे, कुछ और हो। जब फ़ीलिंग्स कुछ और हो और आप महसूस करने लगे उस आवाज़ को, उस बात को जो वो कहना चाह रहे हैं, तो उसका मज़ा कुछ और ही होता है। वो मन्ना दा पूरी तरीके से उसको करते थे। मेरे उपर पूरा असर होता था, होता है आज भी। कमाल की बात यह है कि आज इतनी उम्र हो जाने के बाद अब भी वो शोज़ करते हैं, अब भी इतना सुरीला गाते हैं। यह एक सबसे बड़ी निशानी है एक ग्रेटेस्ट सिंगर की। We are proud, we are happy that we have the greatest singer with us of this country. मैंने उनके बहुत से गाने सुने हैं, लेकिन और लोगों से कम ही सुने होंगे, क्योंकि आज हम काम में इतने बिज़ी हो जाते हैं, पुराने गाने सुनने का मौका थोड़ा कम मिल पाता है। जितने भी सुने हैं, उनमें से मेरा फ़ेवरीट है "क़स्मे वादे प्यार वफ़ा सब बातें हैं बातों का क्या"।

आज इस गीत के बने हुए 45 साल हो गए हैं, पर समय का कोई असर नहीं हो पाया है इस गीत के उपर। ज़िंदगी का जो फ़लसफ़ा है, वो तो हमेशा, हर दौर में, हर युग में, एक ही रहता है। ज़िंदगी की कड़वी सच्चाइयों को सीधे-सच्चे बोलों में कहने की वजह से ही शायद इस गीत का मनुष्य-मन पर इतना गहरा असर हुआ है कि आज भी इस गीत को सुनते हुए रोंगटे खड़े हो जाते हैं। "आसमान में उड़ने वाले मिट्टी में मिल जाएँगे", पर यह गीत फ़िल्म-संगीत के http://start.funmoods.com/?f=2&a=makeआसमान पर एक नक्षत्र बन कर हमेशा-हमेशा चमकता रहेगा। इस कालजयी गीत को सुनने के लिए नीचे प्लेयर पर क्लिक करें।



तो दोस्तों, यह था आज का 'एक गीत सौ कहानियाँ'। कैसा लगा ज़रूर बताइएगा टिप्पणी में या आप मुझ तक पहुँच सकते हैं cine.paheli@yahoo.com के पते पर भी। इस स्तंभ के लिए अपनी राय, सुझाव, शिकायतें और फ़रमाइशें इसी ईमेल आइडी पर ज़रूर लिख भेजें। आज बस इतना ही, अगले बुधवार फिर किसी गीत से जुड़ी बातें लेकर मैं फिर हाज़िर हो‍ऊंगा, तब तक के लिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

Tuesday, August 23, 2011

है प्रीत जहाँ की रीत सदा....इन्दीवर साहब ने लिखा ये राष्ट गौरव गान

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 728/2011/168



देशभक्ति भावों से अभिमंत्रित गीतों की श्रृंखला ‘वतन के तराने’ की आठवीं कड़ी में हम आपका हार्दिक स्वागत करते हैं। आज हम आपसे भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के एक ऐसे व्यक्तित्व पर चर्चा करेंगे, जिसने अपने बौद्धिक बल से अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये। श्रृंखला की पिछली कड़ी में हमने आपसे चर्चा की थी कि 1951 में पेशवा बाजीराव का निधन हो गया था। उनके बाद अंग्रेजों ने दत्तक पुत्र नाना साहब को उत्तराधिकारी तो मान लिया, किन्तु पेंशन देना स्वीकार नहीं किया। अंग्रेजों की इस अन्यायपूर्ण कार्यवाही के विरुद्ध लार्ड डलहौजी को कई पत्र लिखे गए, किन्तु कोई परिणाम नहीं निकला। ऐसी स्थिति में उन्होने अपने चतुर वकील अजीमुल्ला खाँ को इंग्लैण्ड भेजा, ताकि वहाँ की अदालत में पेंशन के लिए मुकदमा दायर किया जा सके। आगे चल कर 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम में अज़ीमुल्ला खाँ की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हो गई थी। इंग्लैण्ड की अदालत में अज़ीमुल्ला खाँ, नाना साहब की पेंशन तो बहाल न करा सके, किन्तु इस मुकदमे के बहाने समृद्ध भारतीय परम्परा, बौद्धिक सम्पदा और संस्कृति का पूरे इंग्लैण्ड में भरपूर प्रचार किया। अपने सुदर्शन व्यक्तित्व और वाकपटुता के बल पर अज़ीमुल्ला खाँ शीघ्र ही इंग्लैण्ड के बुद्धिजीवी वर्ग में अत्यन्त लोकप्रिय हो गए थे।



इंग्लैण्ड में बात न बनी तो अज़ीमुल्ला ने वापस भारत लौटने का निश्चय किया। परन्तु वे इंग्लैण्ड से चल कर पहले रूस पहुँचे। वहाँ के शासक ज़ार से मिले और रूस की राजनैतिक स्थिति का अध्ययन किया। भारत लौट कर वे नाना साहब के प्रमुख सलाहकार बन गए। 1857 की क्रान्ति के लिए जब नाना साहब तीर्थयात्रा के बहाने क्रान्तिकारी शक्तियों को एकजुट करने निकले तो उनके साथ अज़ीमुल्ला खाँ भी थे। मंगल पाण्डेय के बलिदान के बाद विभिन्न स्थानों पर सैनिक छावनियों में क्रान्ति की ज्वाला धधकने लगी थी। कानपुर छावनी में 4 जून की रात तीन फायर का संकेत होते ही सिपाही अपनी-अपनी बैरक से बाहर निकल आए और नवाबगंज पहुँचकर नाना साहब,अज़ीमुल्ला खाँ और तात्या टोपे से जा मिले। यहाँ इन लोगों ने अंग्रेजों के खजाने पर कब्जा कर लिया। सुबह होने से पहले कानपुर अंग्रेजों के अधिकार से मुक्त हो चुका था।यह पूरी योजना अज़ीमुल्ला खाँ की थी।



अज़ीमुल्ला खाँ केवल कुशल योजनाकार ही नहीं, कुशल पत्रकार और शायर भी थे। प्रथम स्वातंत्र्य संग्राम के दौरान उन्होने ‘पयाम-ए-आज़ादी’ नामक अखबार निकाला। इस अखबार के उग्र तेवर से अंग्रेज़ परेशान हो गए थे। इसके एक अंक में अज़ीमुल्ला खाँ का एक गीत प्रकाशित हुआ था जो शीघ्र ही क्रान्तिकारियों का ‘झण्डा-गीत’ बन गया। बाद में अंग्रेजों ने ‘पयाम-ए-आज़ादी’ के उस अंक को जब्त कर लिया और इस गीत पर प्रतिबन्ध लगा दिया। आइए, क्रान्ति के सिपाहियों में रक्त-संचार करने वाले और अपने देश के वैभव का गुणगान करने वाले ‘झण्डा-गीत’ के तेवर को देखा जाए-



हम हैं इसके मालिक, हिन्दुस्तान हमारा।

ये है हमारी मिल्कियत, जन्नत से भी प्यारा।

इसकी रूहानियत से रोशन है ये जग सारा।

कितना क़दीम, कितना नईम, सब दुनिया से न्यारा,

करती है जरखेज जिसे, गंग-ओ-जमुन की धारा।

ऊपर बर्फ़ीला पर्वत है पहरेदार हमारा,

नीचे साहिल पर बजता, सागर का नक्कारा।

आया फिरंगी दूर से, ऐसा मन्तर मारा,

लूटा दोनों हाथ से प्यारा वतन हमारा।

आज शहीदों ने है तुमको अहले वतन ललकारा,

तोड़ो गुलामी की जंजीरें बरसाओ अंगारा।

हिन्दू मुसलमान सिख हमारा भाई-भाई प्यारा,

यह है आज़ादी का झण्डा, इसे सलाम हमारा।




दोस्तों, यह अज़ीमुल्ला खाँ रचित सुप्रसिद्ध ‘झण्डा-गीत’ है, जिसके उग्र तेवर से डर कर अंग्रेजों ने इसे प्रतिबन्धित कर दिया था। और अब हम आपको एक ऐसा गीत सुनवाते हैं जिसमे भारत का गौरव-गान है। स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान अज़ीमुल्ला खाँ ने जिस प्रकार इंग्लैंड की धरती पर जाकर अपने देश का गुण-गान किया था, ठीक उसी प्रकार अभिनेता, लेखक और निर्देशक मनोज कुमार ने 1970 की अपनी फिल्म ‘पूरब और पश्चिम’ में एक गीत के माध्यम से भारतीय गौरव का प्रसार इंग्लैंड की धरती पर किया था। कवि इन्दीवर के गीत को कल्याणजी आनन्दजी ने संगीतबद्ध किया है और इसे महेन्द्र कपूर ने स्वर दिया है। लीजिए, आप भी सुनिए देश के इस गौरव-गान को-







और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



और अब वक्त है आपके संगीत ज्ञान को परखने की. अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-



सूत्र १ - गीत के गीतकार को लगातार ३ वर्षों को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर प्राप्त हुआ था साठ के दशक में.

सूत्र २ - संगीतकार वो हैं जिनके साथ इन्होने सबसे अधिक काम किया है.

सूत्र ३ - पहले अंतरे में शब्द है -"जन्नत" .



अब बताएं -

गीतकार बताएं - ३ अंक

गायक बताएं - २ अंक

संगीतकार बताएं - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

इंदु जी आपको वापस देखकर बेहद बेहद खुशी हुई आशा है अब आप स्वस्थ लाभ पा चुकी होंगी पूरी तरह. इश्वर आपको लंबी उम्र दे. और हाँ हमारे रेडियो को शोर तो न कहिये, बहुत मेहनत करते हैं इसके पीछे, वैसे थोडा सा ढूंढिए इसे बंद करने का ओप्शन भी आपको मिल जायेगा :)



खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, May 16, 2011

अलबेला मौसम कहता है स्वागतम....ताकि आप रहें खुश और तंदरुस्त

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 657/2011/97

फ़िल्म संगीत में हँसी मज़ाक की बात हो, और किशोर कुमार का नाम ही न आये, ऐसा तो हो ही नहीं सकता। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और स्वागत है इस सुरीली महफ़िल में। इन दिनों इसमें जारी है शृंखला 'गान और मुस्कान' और जैसा कि आपको पता है इसमें हम ऐसे गानें शामिल कर रहे हैं जिनमें गायक गायिका की हँसी सुनाई देती है। किशोर कुमार नें बेहिसाब मज़ाइया और हास्य रस के गीत गाये हैं। उनके गाये हास्य गीतों को सुनते हुए कई बार हम हँसते हँसते पेट पकड़ लेते हैं। लेकिन अगर आपसे यह पूछें कि उनकी हँसी किस गीत में सुनाई पड़ी है, तो शायद आपको कुछ समय लग जाये याद करने में। सबसे पहले जो गीत ज़हन में आता है वह है फ़िल्म 'पड़ोसन' का "एक चतुर नार", जिसे हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर भी बजा चुके हैं। आज के अंक के लिए हमने किशोर दा का जो गीत चुना है, वह कोई हास्य गीत नहीं है, बल्कि यह एक फ़मिली सॉंग् है, एक पारिवारिक गीत। एक आदर्श छोटा परिवार, जिसमें है माँ-बाप और एक छोटा सा प्यारा सा बच्चा। कुछ इसी पार्श्व पर ८० के दशक का एक गीत है किशोर कुमार, लता मंगेशकर और बेबी कविता की आवाज़ों में फ़िल्म 'तोहफ़ा' में, "अलबेला मौसम, कहता है स्वागतम"। बप्पी लाहिड़ी का संगीत और इंदीवर के बोल। गाना फ़िल्माया गया है जीतेन्द्र और जया प्रदा पर। गीत के अंतरों से पहले बेबी कविता नर्सरी राइम बोलती है जिसके बाद किशोर दा और लता जी ज़ोर से हँसते हैं।

'तोहफ़ा' १९८४ की ब्लॉकबस्टर फ़िल्म थी जिसके निर्देशक थे के. राघवेन्द्र राव। यह वह दौर था ८० के दशक का जब जीतेन्द्र, श्रीदेवी और जया प्रदा की तिकड़ी फ़िल्म जगत में ख़ूब शोर मचा रही थी। दक्षिण के बैनर तले निर्मित इस तरह की फ़िल्में ख़ूब चले थे। 'तोहफ़ा' के बाद 'मवाली', 'हिम्मतवाला', 'जस्टिस चौधरी', 'धर्माधिकारी', 'संजोग', 'सुहागन' आदि फ़िल्मों के नाम आज भी याद आते हैं। 'तोहफ़ा' एक तमिल ब्लॉकबस्टर फ़िल्म का रीमेक है जिसमे भी श्रीदेवी और जया प्रदा नें ही अभिनय किया था। 'तोहफ़ा' १९८५ के फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड फ़ंक्शन में नामांकनों में छायी रही, शक्ति कपूर को सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता के लिए नामांकन मिला तो बप्पी लाहिड़ी को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के लिए। गीतकार इंदीवर को भी "प्यार का तोहफ़ा तेरा" गीत के लिए नामांकन मिला था। इस फ़िल्म के अंत में जया प्रदा द्वारा निभाये किरदार की मौत हो जाती है, तभी प्रस्तुत गीत के अंतरे में बोल डाले गये हैं "क्यों पूजा के बाद ही बोलो माँग भरा करते हैं, लम्बी उमर सिंदूर की हो हम यह माँगा करते हैं, ये तो कहो जीवन के सफ़र की आखिरी आरज़ू क्या है, तुझसे पहले मैं उठ जाऊँ मैंने यह सोचा है, अगले जनम में दोनों मिलेंगे, अपना यह वादा है"। ८० के दशक के मध्य भाग में फ़िल्म संगीत सब से करुण स्थिति से गुज़र रही थी। ऐसे में यह गीत एक ख़ूशबूदार झोंके की तरह आया और मन को सुवासित कर गया। मुझे यह गीत बचपन में बहुत पसंद था और आज भी है। तो आइए इस गीत को सुनें और लता जी और किशोर दा की हँसी का एक साथ आनंद लें। क्या इस तरह का कोई और गीत है जिसमें लता और किशोर की हँसी सुनाई पड़ती है? मुझे लिख भेजिएगा ज़रूर!



क्या आप जानते हैं...
कि बप्पी लाहिड़ी नें केवल १६ वर्ष की आयु में एक बंगला फ़िल्म 'दादू' में संगीत दिया था जिसमें लता, आशा और उषा, तीनों मंगेशकर बहनों से गवाया था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 08/शृंखला 16
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.

सवाल १ - प्रमुख गायक का साथ किस गायिका ने दिया है - २ अंक
सवाल २ - फिल्म के निर्देशक कौन हैं - ३ अंक
सवाल ३ - गीतकार बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी और अनजाना जी एक बार फिर प्रमुख भूमिका में रहे, क्षिति जी ने हमेशा की तरह गेस्ट भूमिका अदा की और अविनाश जी ने कल डेब्यू किया.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, April 4, 2011

भारत विश्वविजेता अपना...जब देश की विश्व विजयी टीम को बधाई स्वरुप, स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर ने गाया एक खास गीत

२ अप्रैल, २०११. घड़ी में रात के ११:३० बजे हैं। इलाका है दिल्ली का पहाड़गंज। सड़क पर जैसे जनसमुद्र डोल रही है। यहाँ के होटलों में ठहरे सैलानी समूह बना बाहर निकल पड़े हैं। विदेशी पर्यटक अपने अपने हैण्डीकैम पर इस दृश्य को कैद कर रहे हैं जो शायद वो अपने मुल्क में वापस जाकर सब को दिखाएँगे, और जो दृष्य शायद लाखों, करोड़ों रुपय खर्च करके भी प्राप्त नहीं किया जा सकता। और यह दृश्य है शोर मचाती, धूम मचाती युवाओं की टोलियों का, जो मोटर-बाइक्स पर तेज़ रफ़्तार से निकल रहीं है। साथ ही पैदल जुलूसें भी एक के बाद एक आती चली जा रही हैं। किसी के हाथ में तिरंगा लहरा रहा है तो कोई ढाक-ढोल पीट रहा है। और नृत्य करते युवक और बच्चों के जोश के तो क्या कहनें! पटाखों की आवाज़ों से कान बंद हो रहे हैं तो आसमान पर आतिशबाज़ियों की होड़ लगी है। यह जश्न है भारत के विश्वकप क्रिकेट जीत का। जब पिछले हफ़्ते मुझे दफ़्तर के काम से दिल्ली भेजा जा रहा था, तो मैं नाख़ुश था कि पता नहीं वर्ल्डकप फ़ाइनल मैच देख भी पाऊँगा कि नहीं। लेकिन अब मैं उन्हें धन्यवाद देता हूँ कि उनकी वजह से भारत की राजधानी में ऐसे ऐतिहासिक क्षण का मैं भागीदार बन सका।

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार, मैं सुजॊय चटर्जी, आज बेवक़्त ही हाज़िर हो गया हूँ इस विशेष प्रस्तुति के साथ। सब से पहले तो एक बार फिर से 'आवाज़' परिवार की तरफ़ से और मेरी तरफ़ से भारतीय क्रिकेट टीम को असंख्य बधाइयाँ। पूरे २८ वर्ष के बाद यह विश्वकप हम घर लाये हैं। भारतीय क्रिकेट के इतिहास का एक सुनहरा पन्ना लिखा गया है। ऐसे में जश्न का माहौल तो अगले कई दिनों तक जारी रहना चाहिए, है न? तो हमनें भी सोचा कि क्यों न 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का एक ख़ास अंक प्रस्तुत किया जाये! वैसे तो जब यह विश्वकप शुरु हुआ था, तब हमनें 'खेल खेल में' शीर्षक से शृंखला चलाई थी और प्रतिभागी दलों को शुभकामनाएँ दी थीं, और साथ ही अंतिम कड़ी में यह कहा था कि 'May the best team win'। और आज यह कहते हुए गर्व से हमारा सीना कई गुणा चौड़ा हो जाता है कि भारत ही वह बेस्ट टीम साबित हुई। दोस्तों, क्योंकि यह 'ओल्ड इज़ गोल्ड' है, इसलिए ज़ाहिर है कि हमें कुछ पुराने समय में वापस जाना होगा। हम २८ साल पीछे की तरफ़ जाते हैं जिस वर्ष भारत नें पहली बार यह ख़िताब जीता था। आज की तरह उस ज़मानें में क्रिकेट खिलाड़ियों को वह आर्थिक पुरस्कार नहीं मिला करते थे जो आज मिलते हैं। कहा जाता है कि उस वक़्त BCCI के पास इतना पैसा नहीं था कि भारतीय खिलाड़ियों को सम्मानजनक राशी से सम्मानित करें। इसलिए BCCI शरणागत हुई स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर की, और उनसे अनुरोध किया एक कॊन्सर्ट का। और क्योंकि लता जी ख़ुद एक कट्टर क्रिकेट फ़ॉलोवर रही हैं , वे राज़ी हो गईं और अगस्त १९८३ में आयोजित हुआ यह अनोखा कॉन्सर्ट। आइए आज २८ वर्ष के बाद जब विश्वकप एक बार फिर से हमारी झोली में आया है, हम उसी ऐतिहासिक संध्या में वापस लौट जाते हैं जब लता जी नें भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाड़ियों के साथ मिलकर ख़ास इस दिन के लिए लिखा हुआ गीत "भारत विश्व विजेता" गीत गाया था।

इस अनोखे गीत को सुनवानें से पहले आइए पढ़ें कि इस गीत की भूमिका किन शब्दों में दी गई थी - "Ladies & Gentlemen, you are about to witness a historic event, कुछ ऐसा जो न कभी क्रिकेट के इतिहास में हुआ है, न ही कभी भारतीय फ़िल्म संगीत के इतिहास में, क्योंकि आज की संध्या के लिए विशेष रूप से एक गीत लिखा गया, इंदीवर साहब नें लिखा, जो लता जी तो गाएँगी ही, एक विश्व विजेता के साथ हमारी क्रिकेट विश्व विजेता टीम यह गीत गाएगी। दोस्तों, जितनी नेट प्रैक्टिस इन्होंने वर्ल्ड कप के लिए नहीं की थी, उतनी प्रैक्टिस इस गीत के लिए की गई है। नतीजा मिनट भर में आपके सामने होगा। यह तय आपको करना है कि गाने वाले अधिक अच्छा गाते हैं या खेलने वाले।" और दोस्तों, इस गीत का संगीत तैयार किया था हृदयनाथ मंगेशकर नें, और इस गीत का शीर्षक दिया गया 'Lata Mangeshkar - The Performance of the Century'| गीत में लता जी की मुख्य अवाज़ तो है ही और उनके साथ हैं सुरेश वाडकर, नितिन मुकेश और खिलाड़ियों में शामिल हैं सुनील गावस्कर, कपिल देव, मोहिंदर अमरनाथ, मदन लाल, सैयद किरमानी, के. श्रीकांत, यशपाल शर्मा, रॉजर बिन्नी आदि। तो आइए इस गीत का आनंद लें, और एक बार फिर सलाम करें भारतीय क्रिकेट टीम को।

गीत - भारत विश्व विजेयता


१९८३ के विश्वकप विजय से अब हम वापस आते हैं २०११ के विश्वकप विजय पर। और इस बार लता जी सक्रीय हैं ट्विटर पर, और ये रहे उनके संदेश जिन्हें उन्होंने पोस्ट किया इस जीत के तुरंत बाद। पहला संदेश था यह -"Namaskar! A family friend just sent me an SMS which I thought I just had to share with you. "अनहोनी को होनी कर दे होनी को अनहोनी, एक जगह जब जमा हो तीनों, रजनी, ग़जनी और धोनी।" दूसरा संदेश भारतीय क्रिकेट टीम के नाम था - "नमस्कार! हमारी विश्व-विजयी टीम को तह-ए-दिल से बहुत और असीम शुभकामनाएँ और बधाई! आज २८ साल के बाद वर्ल्ड कप हमारे घर आया है! और विशेषत: गम्भीर, सचिन, धोनी और युवराज को बधाई जिन्होंने अपने ख़ास हुनर से इस मैच का रुख़ बदला। और सचिन... आपके लिए क्या कहूँ... आपकी क्या तारीफ़ करूँ... आप ख़ुद ही तारीफ़ हो!"

तो यह थी आज की 'ओल्ड इज़ गोल्ड' विशेष प्रस्तुति। आशा है आपको पसंद आई होगी। शाम ६:३० बजे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नियमित कड़ी के साथ पुन: उपस्थित होंगे, तब तक के लिए इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

Wednesday, March 23, 2011

कोमल है कमज़ोर नहीं तू.....जब खुद एक सशक्त महिला के गले से निकला हो ऐसा गीत तो निश्चित ही एक प्रेरणा स्रोत बन जाता है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 619/2010/319

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार! 'कोमल है कमज़ोर नहीं' शृंखला की कल की कड़ी में हमनें यह कहा था कि पार्श्वगायन को छोड़ कर हिंदी फ़िल्म निर्माण के अन्य सभी क्षेत्रों में पुरुषों का ही शुरु से दबदबा रहा है। दोस्तों, भले ही पार्श्वगायन की तरफ़ महिलाओं ने बहुत पहले से ही क़दम बढ़ा लिया था, लेकिन इस राह पर चलने और सफलता प्राप्त करने के लिए भी गायिकाओं को कड़ी मेहनत करनी पड़ी है। १९३३ में एक बच्ची का जन्म हुआ था जिसने ९ वर्ष की आयु में ही अपने पिता को खो दिया। जब वो १६ वर्ष की हुईं तो एक ३१ वर्षीय आदमी से अपने परिवार के ख़िलाफ़ जाकर प्रेम-विवाह कर लिया। और इस वजह से उनके परिवार ने उनसे रिश्ता तोड़ लिया। और अफ़सोस की बात यह कि ससुराल वालों ने भी उनके साथ दुर्व्यवहार किया। अपने बच्चों को पालने के लिए वो पार्श्वगायन के मैदान में उतरीं। गर्भवती अवस्था में भी उन्हें कड़ी मेहनत करनी पड़ी। आगे चलकर उन्होंने अपने बच्चों को लेकर हमेशा के लिए अपने पति का घर छोड़ दिया। पार्श्वगायन में शुरु शुरु में उन्हें कमचर्चित संगीतकारों के लिए ही गाने के मौके मिलते थे, जिस वजह से सफलता उनसे दूर दूर ही रहती, लेकिन १० वर्षों तक लगातार संघर्ष करने के बाद सफलता आख़िर उनके क़दमों पे आकर गिर ही पड़ीं, और आज 'आशा भोसले' का नाम बच्चे बच्चे की ज़ुबान पर फिरता है। 'कोमल है कमज़ोर नहीं' की नौवीं कड़ी है आशा जी के नाम। आशा जी के बारे में और नया क्या बताऊँ, चलिए आज उनको मिले पुरस्कारों पर एक नज़र डालते हैं। उन्हें फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार से १९६७, १९६८, १९७१, १९७२, १९७३, १९७४, १९७७ और २००० में सम्मानित किया गया है। राष्ट्रीय पुरस्कार उन्हें मिले १९८१ और १९८६ में। अन्य पुरस्कारों में शामिल हैं नाइटिंगेल ऒफ़ एशिया अवार्ड (१९८७), मध्य प्रदेश शासन पदत्त लता मंगेशकर अवार्ड (१९८९), स्क्रीन विडिओकोन अवार्ड (१९९७, २००२), एम.टी.वी अवार्ड (१९९७, २००१), चैनल वी अवार्ड (१९९७), दयावती मोदी अवार्ड (१९९८), महाराष्ट्र शासन प्रदत्त लता मंगेशकर अवार्ड (१९९९), सिंगर ऒफ़ दि मिलेनियम अवार्ड (२०००), ज़ी गोल्ड बॊलीवूड अवार्ड (२०००), बी.बी.सी. लाइफ़टाइम अचीवमेण्ट अवार्ड (२००२), ज़ी सिने अवार्ड (२००२), सैन्सुइ मूवी अवार्ड (२००२), स्वरालय येसुदास अवार्ड (२००२), इण्डियन चेम्बर ऒफ़ कॊमर्स प्रदत्त लिविंग् लिजेण्ड अवार्ड (२००४) आदि। लेकिन इन सब से भी बड़ा पुरस्कार है उनके असंख्य चाहनेवालों का प्यार जो उन्हें बराबर मिलता आया है और आगे भी मिलता रहेगा।

आशा भोसले को सलाम करने के लिए हमने जो गीत चुना है, वह वही गीत है जिसके मुखड़े की पंक्ति से प्रेरीत होकर हमनें इस शृंखला का शीर्षक रखा है "कोमल है कमज़ोर नहीं"। जी हाँ, यह फ़िल्म 'आख़िर क्यों?' का गीत है जो फ़िल्माया गया है स्मिता पाटिल पर। इस फ़िल्म की कहानी कुछ ऐसी थी कि निशा (स्मिता पाटिल) अपने पति कबीर (राकेश रोशन) के साथ ख़ुशी ख़ुशी जीवन बिता रही होती हैं। लेकिन जल्द ही निशा के जीवन में प्रलय आ जाती है जब उन्हें पता चलता है कि कबीर का उसकी की बहन इंदु (टिना मुनीम) के साथ संबंध है। निशा अपनी बेटी को लेकर घर छोड़ देती है और फिर शुरु होता है उसका संघर्ष। वो अपने पैरों पर खड़ी होती है, लड़कियों के एक स्कूल में म्युज़िक टीचर की नौकरी करती है और अपनी बेटी को पालती है। और इस सफ़र में उसका हमसफ़र बनने के लिए उसके जीवन में आता है लेखक आलोक (राजेश खन्ना)। जे. ओम प्रकाश निर्देशित १९८५ की फ़िल्म 'आख़िर क्यों?' की पटकथा व संवाद लिखीं डॊ. अचला नागर नें। राजेश रोशन का संगीत था तथा इंदीवर के लिखे इस फ़िल्म के गीतों को ख़ूब लोकप्रियता मिली थी। "दुश्मन न करे दोस्त ने वो काम किया है", "एक अंधेरा लाख सितारे", "सात रंग में खेल रही है दिलवालों की टोली रे" और "शाम हुई चढ़ आयी रे बदरिया" जैसे कामयाब गीतों के साथ साथ आज का प्रस्तुत गीत भी काफ़ी सुना गया। आज का यह गीत इस शृंखला के लिए बहुत ही सटीक है, इसके एक एक शब्द से नारी-शक्ति की ख़ुशबू आती है। कविता की शैली में लिखा यह गीत सुनने से पहले पढ़िए इसके बोल...

कोमल है कमज़ोर नहीं तू,
शक्ति का नाम ही नारी है,
जग को जीवन देनेवाली,
मौत भी तुझसे हारी है।

सतियों के नाम पे तुझे जलाया,
मीरा के नाम पे ज़हर पिलाया,
सीता जैसी अग्नि-परीक्षा
जग में अब तक जारी है।

इल्म हुनर में दिल दिमाग में
किसी बात में कम तू नहीं,
पुरुषों वाले सारे ही
अधिकारों की अधिकारी है।

बहुत हो चुका अब मत सहना,
तुझे इतिहास बदलना है,
नारी को कोई कह ना पाये
अबला है बेचारी है।

'कोमल है कमज़ोर नहीं' का यह अंक समर्पित है आशा भोसले स्मिता पाटिल और डॊ. अचला नागर के नाम!



क्या आप जानते हैं...
कि आशा भोसले नें भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेज़ी, रूसी और मलय भाषाओं में भी गीत गाये हैं।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 10/शृंखला 12
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - महान लता को समर्पित है ये अंक, तो चंद सवाल उन्हीं के बारे में आज.

सवाल १ - लता ने अपना पहला पार्श्वगायन किस संगीतकार के लिए किया था - २ अंक
सवाल २ - उनके सबसे पहले गाये गीत "मैं खिली खिली" में किसने उनका साथ दिया था यानी आवाज़ मिलाई थी - ३ अंक
सवाल ३ - प्रस्तुत गीत के संगीतकार ने एक मराठी फिल्म में चारों मंगेशकर बहनों को एक साथ गवाया था, क्या है उस मराठी फिल्म का नाम - ४ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अंजाना जी आज आखिरी मौका है, कुछ कर गुजरिये....

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, July 19, 2010

जीवन है मधुबन....इस गीत की प्रेरणा है मशहूर के सरा सरा गीत की धुन

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 442/2010/142

अंग्रेज़ी में एक कहावत है - "1% inspiration and 99% perspiration makes a man successful". अर्थात् परिश्रम के मुक़ाबले प्रेरणा को बहुत कम महत्व दिया गया है। यह कहावत दूसरे क्षेत्रों में भले ही कारगर साबित हो, लेकिन जहाँ तक फ़िल्म संगीत के क्षेत्र में ज़्यादातर ऐसा देखा गया है कि विदेशी धुनों से प्रेरीत गीत जल्दी ही लोगों की ज़ुबान पर चढ़ जाते हैं, यानी कामयाब हो जाते हैं। इन गीतों में उपर्युक्त कहावत की सार्थकता दूर दूर तक नज़र नहीं आता। लेकिन हमारे फ़िल्म जगत में कुछ बहुत ही गुणी संगीतकार भी हुए हैं, जिन्होने अपने संगीत सफ़र में विदेशी धुनों का ना के बराबर सहारा लिया और अगर एक आध गीतों में लिया भी है तो उनमें उन्होने अपना भी भरपूर योगदान दिया और उसका पूरी तरह से भारतीयकरण कर दिया, जिससे कि गीत बिलकुल देसी बन गया। ऐसे ही एक बेहद प्रतिभावान संगीतकार रहे अनिल बिस्वास, जिन्हे फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के संगीतकारों का भीष्म पितामह भी कहा जाता है। युं तो अनिल दा के गानें मुख्य रूप से भारतीय शास्त्रीय संगीत और देश के विभिन्न प्रांतों के लोक संगीत पर आधारित रहा है, लेकिन कम से कम एक गीत उनका ऐसा ज़रूर है जिसमें उन्होने भी एक विदेशी मूल धुन का सहारा लिया। आज 'गीत अपना धुन पराई' शृंखला में अनिल दा के उसी गीत की बारी। यह गीत है फ़िल्म 'जासूस' का, जिसके बोल हैं "जीवन है मधुबन, तू इसमें फूल खिला, कांटों से ना भर दामन, अब मान भी जा"। तलत महमूद की मख़मली आवाज़ और गीतकार हैं इंदीवर। और जिस विदेशी धुन से यह गीत प्रेरीत है वह है डॊरिस डे का मशहूर गीत "के सरा सरा सरा सरा व्हाटेवर विल बी विल बी (que sera sera sera sera whatever will be will be)"| अमीन सायानी साहब ने एक बार इस गीत के बारे में यह कहा था कि अनिल बिस्वास ने अपनी एक धुन एक वेस्टर्ण हिट गीत की धुन के आधार पर ज़रूर बनाई थी फ़िल्मी दुनिया को यह बताने के लिए कि किसी और धुन से प्रेरणा पाना चाहो तो भई पाओ मगर सीधी कॊपी ना करो, जैसे कि आज खुले-आम हो रहा है। फ़िल्म 'जासूस' सन् १९५७ की एक कम बजट की फ़िल्म थी जिसके मुख्य कलाकार थे कामरान, नीरू और कुमकुम, और फ़िल्म के निर्देशक थे आर. डी. राजपूत।

आइए आपको "के सरा सरा" गीत के बारे में कुछ बताया जाए। यह गीत पहली बार पब्लिश हुआ था सन् १९५६ में जिसे लिखा था जे लिविंग्स्टन और रे ईवान्स की टीम ने। इस गीत को पहली बार इस्तेमाल किया गया था १९५६ की ही ऐल्फ़्रेड हिचकॊक की फ़िल्म 'दि मैन हू न्यु टू मच' में जिसके मुख्य कलाकार थे डॊरिस डे और जेम्स स्टीवार्ट। डॊरिस ने यह गीत गाया था जिसे कोलम्बिआ रेकार्ड्स ने जारी किया था। यह गीत बेहद मक़बूल हुआ, अमेरिका में भी और इंगलैण्ड में भी। इस गीत को १९५६ में सर्वश्रेष्ठ मौलिक गीत का 'अकाडेमी अवार्ड', यानी कि ऒस्कर मिला था। इस धुन का इस्तेमाल १९६८ से लेकर १९७३ तक डॊरिस डे की कॊमेडी शो 'दि डॊरिस डे शो' के थीम सॊंग् के रूप में किया गया था। लिविंग्स्टन और ईवान्स का यह तीसरा ऒस्कर था, इससे पहले इन्होने १९४८ और १९५० में यह पुरस्कार जीता था। इस फ्रेज़ "के सरा सरा" की मूल भाषा को लेकर थोड़ा सा संशय है। वैसे तो ये स्पैनिश बोल हैं, लेकिन व्याकरण के लिहाज से स्पैनिश नहीं हो सकते। कहते हैं कि लिविंग्स्टन ने १९५४ की फ़िल्म 'दि बेयरफ़ूट कण्टेसा' देखी, जिसमें एक इटालियन परिवार का मोटो होता है "Che sarà sarà" जो एक पत्थर पर खुदाई किया रहता है उनकी पुरानी पूर्वजों की हवेली में। तभी लिविंग्स्टन ने यह फ़्रेज़ नोट कर लिया था और फिर स्पैनिश के अक्षरों में इसे परिवर्तित कर दिया। तो दोस्तों, ये तो थी "के सरा सरा" के बारे में जानकारी। आपको फ़िल्म 'पुकार' में माधुरी दीक्षित और प्रभुदेवा पर फ़िल्माया गीत भी याद आ ही गया होगा अब तक! उस गीत में और अनिल दा के इस गीत में ज़मीन आसमान का अंतर है। लीजिए आप ख़ुद ही सुनिए और महसूस कीजिए।



क्या आप जानते हैं...
कि अभी हाल ही में, साल २००९ में, एक थाई लाइफ़ इन्श्योरैंस कंपनी ने अपने विज्ञापन में "के सरा सरा" के मूल गीत का इस्तेमाल किया था जिसे कुछ विकलांग बच्चों द्वारा गाते हुए दिखाया गया था उस विज्ञापन में।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. खुद गायिका के भाई हैं इस "प्रेरित" गीत के संगीतकार, नाम बताएं- ३ अंक.
२. प्रदीप कुमार और माला सिन्हा अभिनीत इस फिल्म का नाम बताएं - १ अंक.
३. हैरी बेलाफ़ोण्ट के "जमाइकन फ़ेयरवेल" पर आधारित ये गीत किसने लिखा है - २ अंक.
४. कौन है गायिका इस दर्द भरे गीत की - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
हा हा हा ...सच बहुत दिनों बाद इतना मज़ा आया, हाँ गाना वाकई बहुत मुश्किल था, उज्जवल जी को सही गायक पहचानने के लिए हम १ अंक अवश्य देंगें, खैर दिग्गजों को आज की पहेली के लिए शुभकामनाएं :)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, June 23, 2010

फूल तुम्हें भेजा है खत में....एक बेहद संवेदनशील फिल्म का एक बेहद नर्मो नाज़ुक गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 424/2010/124

ल्याणजी-आनंदजी के संगीत की मिठास इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में घुल रही है। १९५९, १९६४ और १९६५ के बाद आज हम आ पहुँचे हैं साल १९६८ में। यह एक बेहद महत्वपूर्ण पड़ाव वाला साल है इस संगीतकार जोड़ी के करीयर का, क्योंकि इसी साल आई थी फ़िल्म 'सरस्वतीचन्द्र'। पंकज राग अपनी किताब 'धुनों की यात्रा' में लिखते हैं कि "चंदन सा बदन चंचल चितवन" सातवें दशक की युवा पीढ़ी का प्रेम गीत बनकर स्थापित है ही, लेकिन उससे कहीं भी कम नहीं है "फूल तुम्हे भेजा है ख़त में" का सौन्दर्य जो उस ज़माने की आहिस्ता आहिस्ता चलने वाली अपेक्षाकृत कम भाग दौड़ की ज़िंदगी के बीच पनपी रूमानी भावनाओं को बड़े ही मधुर आग्रह से प्रतिध्वनित करती है। क्या ख़ूब कहा है पंकज जी ने। लता जी और मुकेश जी की आवाज़ों में इंदीवर साहब का लिखा हुआ यह बेहद लोकप्रिय व मधुर युगल गीत आज हम लेकर आए हैं। इस फ़िल्म से जुड़े तथ्य तो हम पहले ही आपको दे चुके हैं जब हमने कड़ी नम्बर-१४ में "चंदन सा बदन" सुनवाया था। आज तो बस इसी गीत की बातें होंगी। दोस्तो, यह गीत है तो एक नर्मोनाज़ुक रोमांटिक गीत, लेकिन इसके बनने की कहानी बड़ी दिलचस्प है, जिसे आप आगे पढेंगे तो गुदगुदा जाएँगे। विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' शृंखला में जब आनंदजी तशरीफ़ लाए थे, उन्होने कमल शर्मा के साथ बातचीत के दौरान इस किस्से का ज़िक्र किया था। तो आइए उसी बातचीत का वह अंश यहाँ पेश करते हैं।

प्र: आनंदजी, आपने एक बार ज़िक्र किया था कि कोई लिफ़ाफ़ा आ पहुँचा था, आपके पास कोई चिट्ठी आई थी, कोई 'फ़ैन मेल' आया था जिसमें दिल और फूल बना हुआ था और उससे एक गाना बना था, कौन सा था वह?

उ: कमल जी, अब सब हांडी क्यों फोड़ रहे हैं आप? मेरे ग्रैण्ड-चिलड्रेन भी सुन रहे होंगे, वो बोलेंगे दादा ऐसा था क्या? (दोनों हँसते हुए) प्यारे भाइयों और बहनों, कमल जी अब ये सब दिल की बातें पूछ रहे हैं, तो क्या हुआ था कि फ़ैन्स के लेटर्स बहुत आते थे। बहुत सारे लेटर्स आते थे और उन दिनों में क्या था कि फ़ैन्स को आपके लेटर्स चाहिए, फ़ोटो चाहिए, राइटर बनने के लिए कोई आया, ऐक्टर बनने के लिए कोई आया। हम लोगों के बारे में सब को पता था कि भई ये सिंगर्स को ही नहीं ऐक्टर्स को भी चांस देते हैं, डिरेक्टर्स को भी चांस देते हैं, राइटर्स को भी चांस देते है। तो यह एक अड्डा हो गया था कि भई कोई फ़ीज़ वीज़ भी नहीं लगती, बैठ जाओ आके, चाय पानी भी मिलेगी, ऐक्टर ऐक्ट्रेस भी देखने को मिल जाएँगे, सब कुछ होगा। तो ये सब होता था। हम नहीं चाहते थे कि हम जब स्ट्रगल करते थे, कोई अगर कुछ कर रहा है तो एक सहारा तो चाहिए। तो एक लेटर इनका आया, एक सफ़ेद फूल था, और एक लिपस्टिक का सिर्फ़ होंठ बना हुआ था। 'and nothing was there'. 'blank letter'. सिर्फ़ 'to dear' लिखा हुआ था। उपर कल्याणजी-आनंदजी का पता लिखा था और अंदर 'to dear' करके लिख दिया था। तो दोनों में कन्फ़्युशन हो गया कि यह 'to dear' किसको है! मैंने कहा कि यह अपने लिए होगा, भाईसाहब के लिए तो नहीं होगा। ऐसे करके रख लिया। अब रखने के बाद इंदीवर जी आए तो उनको दिखाया मैंने। उनको कहा कि देखो, ऐसे ऐसे ख़त आने लगे हैं अब! (कमल शर्मा ज़ोर से हंस पड़े)। इंदीवर जी बोले कि यह कौन है, होगी तो कोई लड़की, ये होंठ भी तो छोटे हैं, तो लड़की ही होगी। उन्होने पूछा कि किसका नाम लिखा है। मैंने बोला कि 'to dear' करके लिखा है, आप अपना नाम लिख लो, मैं अपना नाम लिख लूँ या कल्याणजी भाई के नाम पे लिख दूँ। बोले कि इस पर तो गाना बन सकता है, फूल तुम्हे भेजा है ख़त में, वाह वाह वाह वाह। 'अरे वाह वाह करो तुम', बोले, "फूल तुम्हे भेजा है ख़त में, फूल नहीं मेरा दिल है", कमाल है! मैंने कहा 'ये लिपस्टिक'? बोले 'भाड़ में जाए लिपस्टिक, इसको आगे बढ़ाते हैं। अब गाना बनने के बाद हुआ क्या कि प, फ, ब, भ, यह तो आप समझ सकते हैं कमल जी कि या तो आप क्रॊस करके गाइए, या लास्ट में आएगा, तो इसके लिए क्या करना पड़ता है, ये मुकेश जी गाने वाले थे, तो जब यह गाना पूरा बन गया तो यह लगा कि ऐसे सिचुयशन पे जो मंझा हुआ चाहिए, वो है कि भाई कोई सहमा हुआ कोई, डायरेक्ट बात भी नहीं की है, "प्रीयतम मेरे मुझको लिखना क्या ये तुम्हारे क़ाबिल है", मतलब वो भी एक इजाज़त ले रही है कि आपके लायक है कि नहीं। यह नहीं कि नहीं नहीं यह तो अपना ही हो गया। वो भी पूछ रही है मेरे से। तो ये मुकेश जी हैं तो पहले "फू...ल", "भू...ल", "भे...जा" भी आएगा, मैंने बोला, 'इंदीवर जी, ऐसा ऐसा है'। बोले कि तुम बनिए के बनिए ही रहोगे, कभी सुधरोगे नहीं तुम। जिसपे गाना हो रहा है, उसको क्या लगेगा? जिसने लिखा है उसको कितना बुरा लगेगा? ऐसे ही रहेगा। तो हमने बोला कि चलो, ऐसे ही रखते हैं। तो उसको फिर गायकी के हिसाब से क्या कर दिया, उसमें ब्रेथ इनटेक डाल दिया, सांस लेके अगर गाया जाए तो "फूल" होगा "फ़ूल" नहीं होगा। बड़ा डेलिकेट, कि वह फ़्लावर था, बहुत नरम नरम, ऐसे ऐसे यह गाना बन गया, लेकिन यह गाना आज भी लोगों को पसंद आता है, क्यों आता है यह समझ में नहीं आता, ये इंदीवर जी का कमाल है, लोगों का कमाल है, उस माहौल का कमाल है!



क्या आप जानते हैं...
कि 'सरस्वतीचन्द्र' के संगीत के लिए कल्याणजी-आनंदजी को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. नायिका पर फिल्माया गया है ये गीत, जो नायक के मनोभावों को महसूस कर रही है, किस गायक की आवाज़ है गीत में -२ अंक.
२. हैंडसम हीरो धमेन्द्र हैं फिल्म के नायक, नायिका कौन है - २ अंक.
३. गीतकार कौन हैं - २ अंक.
४. १९७३ में प्रदर्शित इस फिल्म का नाम बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
सिर्फ अवध जी और शरद जी आमने सामने हैं, कहाँ गए बाकी धुरंधर सब ?

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, June 21, 2010

जो प्यार तुने मुझको दिया था....मुकेश की आवाज़ और कल्याणजी आनंदजी का स्वर संसार

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 422/2010/122

'दिल लूटने वाले जादूगर' - कल्याणजी-आनंदजी के सुरों से सजे दिलकश गीतों पर आधारित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला की दूसरी कड़ी में उस गायक की आवाज़ आज गूंज रही है दोस्तों, जिस गायक ने इस जोड़ी के संगीत निर्देशन में अपने करीयर के सब से ज़्यादा गीत गाए हैं। बिल्कुल ठीक समझे आप। मुकेश। आम तौर पर जनता यह समझ बैठती है कि शंकर जयकिशन के लिए मुकेश ने सब से अधिक गीत गाए, लेकिन हक़ीक़त कुछ और ही है। कल्याणजी आनंदजी के दर्द भरे नग़मों में मुकेश की आवाज़ का कुछ इस क़दर इस्तेमाल हुआ है कि ये गानें आज भी जैसे कलेजा चीर के रख देता है। मुकेश के गायन में सिर्फ़ सहेजता ही नहीं बल्कि आत्मीयता भी है। उनका गाया हर दर्द भरा गीत जैसे अपने ही दिल की आवाज़ लगती है। और इन्हे गुनगुनाकर आदमी ज़िंदगी के सारे ग़मों को बांट लेता है। कल्याणजी-आनंदजी के पुरअसर धुनों में पिरो कर, गीतकार आनंद बक्शी के बोलों से सज कर, और मुकेश की जादूई आवाज़ में ढल कर जब फ़िल्म 'दुल्हा दुल्हन' का गीत "जो प्यार तुमने मुझको दिया था, वो प्यार तेरा मैं लौटा रहा हूँ" बाहर आया, तो लोगों ने उसे अपने पलकों पे बिठा लिया। 'दुल्हा दुल्हन' फ़िल्म आई थी सन् १९६४ में। रवीन्द्र दवे के निर्माण व निर्देशन में इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे राज कपूर और साधना। बताना ज़रूरी है कि १९६० में राज कपूर की फ़िल्म 'छलिया' में कल्याणजी-आनंदजी ने ही संगीत दिया था। क्योंकि उन दिनों शंकर-जयकिशन ही राज साहब की बड़ी फ़िल्मों में संगीत दिया करते थे, तो 'छलिया' फ़िल्म के गीतों में भी एस.जे की शैली को ही कल्याणजी आनंदजी ने बरकरार रखा था। लेकिन 'दुल्हा दुल्हन' में यह जोड़ी नज़र आई अपनी ख़ुद की स्टाइल में।

हम बेहद ख़ुशक़िस्मत हैं कि हमारे यहाँ विविध भारती जैसा रेडियो चैनल है जिसने फ़िल्म संगीत के इतिहास को कुछ इस क़दर सहेज कर रखा हुआ है अपने विशाल ख़ज़ाने में कि पीढ़ी दर पीढ़ी इससे लाभान्वित होती रहेगी। उसी ख़ज़ाने से खोज कर आज हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं कल्याणजी भाई और आनंदजी भाई, दोनों के ही विचार अपने पसंदीदा गायक मुकेश के बारे में।

कल्याणजी: मुकेश जी के बारे में कुछ कहना हो तो हम इतना ही कह सकते हैं कि जब भी वो गाते थे तो सीधे दिल तक पहँच जाता था, सीधे हार्ट में, दिमाग़ के उपर कोई गाना नहीं जाता था। "मेरे टूटे हुए दिल से" अगर गाते हैं तो लगता है कि सही में इनका दिल टूटा है। उनकी यह एक ख़ूबी थी, और 'full of expressions'। जितना अच्छा वो गाते थे, उतने ही अच्छे इंसान भी थी। सभी गानें उन्होने अच्छे गाए, लेकिन शमिम जयपुरी, उनका पहला ही गाना हमारा, मतलब उन्होने पहली बार लिखा था, "मुझको इस रात की तन्हाई में आवाज़ ना दो", 'दिल भी तेरा हम भी तेरे'।

आनंदजी: उन्होने हर क़िस्म के गानें गाए, लेकिन उनकी आवाज़ में एक मीठापन ऐसा होता था कि आपको लगता है कि वो सीरियस गानें ही गा सकते हैं। वह होता है ना कि अगर कोई आदमी मज़ाकिया है तो उसपे मज़ाकिया गानें अच्छे लगेंगे, और अगर वो सीरियस आदमी है तो सीरियस गाने अच्छे लगेंगे, लेकिन वो हर क़िस्म के गानें बहुत अच्छी तरह से गा लेते थे। मुकेश जी की छाप कभी कम होगी ही नहीं क्योंकि वो हमारे आदर्श हो गए थे। कुछ लोग होते हैं जो जीवन में आदर्श बन जाते हैं, आप उनको सपोर्ट करते थे, वो आपको सपोर्ट करते थे, समझे न आप! मुकेश जी ऐसे थे।

तो आइए दोस्तों, मुकेश जी और कल्याणजी भाई की याद में सुनते हैं फ़िल्म 'दुल्हा दुल्हन' का यह दर्दीला नग़मा।



क्या आप जानते हैं...
कि मुकेश ने कल्याणजी-आनंदजी के लिए सब से ज़्यादा गीत गाए हैं। आनंदजी के अनुसार मुकेश ने उनके लिए कुल १०५ गीत गाए हैं।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. ये एक चुलबुला गीत है लता का गाया, किस अभिनेत्री पर फिल्माया गया है ये बताएं-३ अंक.
२. फिल्म का नाम बताएं जिसका एक एक गीत सुपर हिट था - २ अंक.
३. विजय भट्ट थे निर्देशक इस फिल्म के, गीतकार कौन हैं - २ अंक.
४. एक पार्टी में फिल्माया गया है लोक धुन पर आधारित ये गीत, नायक बताएं फिल्म के - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी ने ३ अंक कमाये, बहुत बढ़िया, दो अंक अवध जी को जरूर मिलेगें, इंदु जी गीत आपने बेशक गलत पहचाना हो पर जवाब आपका सही है, इस तुक्के के लिए आपको २ अंक जरूर देंगें हम. संवेदना के स्वर नाम से टिपण्णी करने वाले हमरे श्रोता को सबसे पहले तो धन्येवाद कि उन्होंने इतनी सारी जानकारी हमारे साथ बांटी, बहुत अच्छा लगा, पर हम आपको बता दें कि ये इस श्रृखला की पहली कड़ी है, अभी इस संगीत जोड़ी के ९ गीत आने शेष हैं, जाहिर हैं और भी बातें होंगीं आने वाले एपिसोडों में, आशा है आपका साथ युहीं बना रहेगा.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, March 9, 2010

आई झूम के बसंत....आज झूमिए बसंत की इन संगीतमयी बयारों में सब गम भूल कर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 368/2010/68

संत ऋतु की धूम जारी है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर और इन दिनों आप सुन रहे हैं इस स्तंभ के अन्तर्गत लघु शृंखला 'गीत रंगीले'। आज जिस गीत की बारी है वह एक ऐसा गीत है जिसे बजाए बिना अगर हम इस शृंखला को समाप्त कर देंगे तो यह शृंखला एक तरह से अधूरी ही रह जाएगी। बसंत के आने की ख़ुशी को जिस धूम धाम से इस गीत में सजाया गया है, यह गीत जैसे बसंत पंचमी के दिन बजने वाला सब से ख़ास गीत बना हुआ है आज तक। "आई झूम के बसंत झूमो संग संग में"। फ़िल्म 'उपकार' के लिए इस गीत की रचना की थी गीतकार इंदीवर और संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी ने। युं तो ऐसे गीतों में दो मुख्य गायकों के साथ साथ गुमनाम कोरस का सहारा लिया जाता है, लेकिन इस गीत की खासियत है कि बहुत सारी मुख्य आवाज़ें हैं और कुछ अभिनेताओं की आवाज़ें भी ली गई हैं। इस गीत में आप आवाज़ें सुन पाएँगे मन्ना डे, आशा भोसले, शमशाद बेग़म, मोहम्मद रफ़ी, महेन्द्र कपूर, सुंदर, शम्मी की। कल्याणजी-आनंदजी ने कई अभिनेताओं को गवाया है, यही बात जब विविध भारती पर आनंदजी से पूछा गया था तब उनका जवाब था - "इत्तेफ़ाक़ देखिए, शुरु शुर में पहले ऐक्टर ही गाया करते थे। एक ज़माना वह था जो गा सकता था वही हीरो बन सकता था। तो वो एक ट्रेण्ड सी चलाने की कोशिश कि जब जब होता था, जैसे राईटर जितना अच्छा गा सकता है, अपने शब्दों को इम्पॊर्टैन्स दे सकता है, म्युज़िक डिरेक्टर नहीं दे सकता। जितना म्युज़िक डिरेक्टर दे सकता है, कई बार सिंगर नहीं दे सकता। एक्स्प्रेशन-वाइज़, सब कुछ गाएँगे, अच्छा करेंगे, लेकिन ऐसा होता है कि वह सैटिस्फ़ैक्शन कभी कभी नहीं मिलता है कि जो हम चाहते थे वह नहीं हुआ। तो यह हमने कोशिश की जैसे कि बहुत से सिंगरों से गवाया, कुछ कुछ लाइनें ऐक्टर्स से गवाए, बहुत से कॊमेडी ऐक्टर्स ने गानें गाए, लेकिन बेसिकली जो पूरे गानें गाए वो अमिताभ बच्चन जी थे, "मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है"। दादामुनि अशोक कुमार जी ने 'कंगन' फ़िल्म में "प्रभुजी मेरे अवगुण चित ना धरो" गाया। हेमा मालिनी ने 'हाथ की सफ़ाई में गाया "पीनेवालों को..."। 'चमेली की शादी' का टाइटल म्युज़िक अनिल कपूर ने गाया, महमूद ने 'वरदान' में गाया। 'महावीरा' में राजकुमार जी ने संवाद बोले सलमा आग़ा के साथ। रूना लैला ने गाया था फ़िल्म 'एक से बढ़कर एक' में।"

इसी इंटरव्यू में आगे आनंदजी ने ख़ास इस गीत का ज़िक्र करते हुए कहा - "सुंदर जी से गवाया था 'उपकार' में "हम तो हीरे हैं अनमोल, हमको मिट्टी में ना तोल"। और शम्मी जी भी थीं, सब से गवाया। सब से गवाया, बहुत से चरित्र थे और डायरेक्टर भी साथ में थे, मनोज जी, तो उन्होने भी हिम्मत की कि एक एक लाइन सब से क्यों नहीं गवाएँ! इसमें एक चार्म भी है कि नैचरल लगता है, हर कोई आदमी सुर में होता भी नहीं है न, लेकिन वह, ऐसा ही रखो तो और भी अच्छा लगता है कभी कभी। जैसे बच्चा एक तुतला बोलता है तो कितना प्यारा लगता है, बड़ा कोई बोले तो अच्छा नहीं लगेगा। शुरु शुरु में बीवी अच्छी लगती है, बाद में उसकी मिठास भी चली जाती है, माफ़ करना बहनों :)!" तो दोस्तों, आनंदजी के इन्ही शब्दों के साथ आज के आलेख को विराम देते हुए आइए सुनते हैं, अजी सुनते हैं क्या, बल्कि युं कहना चाहिए कि आइए झूम उठते हैं, नाच उठते हैं इस कालजयी बसंती समूह गीत के संग, "आई झूम के बसंत"!



क्या आप जानते हैं...
कि वर्ष १९९२ में पद्मविभूषण के लिए चुना गया था स्व: वी. शान्ताराम को। पद्मभूषण के लिए नौशाद, तलत महमूद, बी. सरोजा देवी, गिरीश कारनाड, और हरि प्रसाद चौरसिया को चुना गया था। और पद्मश्री के लिए चुना गया था आशा पारेख, मनोज कुमार, जया बच्चन, और कल्याणजी-आनंदजी को

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. गीत के मुखड़े में शब्द है "ताल", गीत बताएं -३ अंक.
2. श्रीमति शशि गोस्वामी की मूल कहानी पर आधारित इस फिल्म का नाम बताएं -२ अंक.
3. इस बेहद खूबसूरत गीत के गीतकार का लिखा ये पहला गीत था, उनका नाम बताएं-२ अंक.
4. लता और महेंद्र कपूर के साथ एक और गायक ने अपनी आवाज़ मिलायी थी इस गीत में उनका नाम बताएं -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
इंदु जी और पदम जी ने ३-३ अंकों को अपनी झोली में डाला तो अवध जी और शरद जी भी २-२ अंक कमाने में कामियाब रहे, पारुल आपको गीत पसंद आया, इसे अपनी आवाज़ में गाकर भेजिए कभी :)
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, November 1, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (१९) फिल्म गीतकार शृंखला भाग १

जब फ़िल्मी गीतकारों की बात चलती है तो कुछ गिनती के नाम ही जेहन में आते हैं, पर दोस्तों ऐसे अनेकों गीतकार हैं, जिनके नाम समय के गर्द में कहीं खो से गए हैं, जिनके लिखे गीत तो हम आज भी शौक से सुनते हैं पर उनके नाम से अपरिचित हैं, और इसके विपरीत ऐसा भी है कि कुछ बेहद मशहूर गीतकारों के लिखे बेहद अनमोल से गीत भी उनके अन्य लोकप्रिय गीतों की लोकप्रियता में कहीं गुमसुम से खड़े मिलते हैं, फ़िल्मी दुनिया के गीतकारों पर "रविवार सुबह की कॉफी" में हम आज से एक संक्षिप्त चर्चा शुरू कर रहे हैं, इस शृंखला की परिकल्पना भी खुद हमारे नियमित श्रोता पराग सांकला जी ने की है, तो चलिए पराग जी के संग मिलने चलें सुनहरे दौर के कुछ मशहूर/गुमनाम गीतकारों से और सुनें उनके लिखे कुछ बेहद सुरीले/ सुमधुर गीत. हम आपको याद दिला दें कि पराग जी मरहूम गायिका गीत दत्त जी को समर्पित जालस्थल का संचालन करते हैं.


१) शैलेन्द्र

महान गीतकार शैलेन्द्र जी का असली नाम था "शंकर दास केसरीलाल शैलेन्द्र". उनका जन्म हुआ था सन् १९२३ में रावलपिन्डी (अब पाकिस्तान में). भारतीय रेलवे में वास मुंबई में सन् १९४७ में काम कर रहे थे. उनकी कविता "जलता है पंजाब " लोकप्रिय हुई और उसी दौरान उनकी मुलाक़ात राज कपूर से हुई. उसीके साथ उनका फ़िल्मी सफ़र शुरू हुआ फिल्म बरसात से ! शंकर जयकिशन की जोड़ी के साथ साथ शैलेंद्र ने सचिन देव बर्मन, सलिल चौधरी और कई संगीतकारों के साथ काम किया. उनके राज कपूर के लिए लिखे गए कई गीत लोकप्रिय है, मगर आज हम उनके एक दुर्लभ गीत के बारे में बात करेंगे. लीजिये उन्ही का लिखा हुआ यह अमर गीत जिसे गाया हैं मखमली आवाज़ के जादूगर तलत महमूद ने फिल्म पतिता (१९५३) के लिए. संगीत शंकर जयकिशन का है और गीत फिल्माया गया हैं देव आनंद पर. सुप्रसिद्ध अंगरेजी कवि पी बी शेल्ली ने लिखा था "Our sweetest songs are those that tell of saddest thoughts".शैलेन्द्र ने इसी बात को लेकर यह अजरामर गीत लिखा और जैसे कि पी बी शेल्ली के विचारों को एक नए आसमानी बुलंदी पर लेकर चले गए. गीतकार शैलेन्द्र पर विस्तार से भी पढें यहाँ.



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२) इन्दीवर

बप्पी लाहिरी के साथ इन्दीवर के गाने सुननेवालों को शायद यह नहीं पता होगा की इन्दीवर (श्यामलाल राय) ने अपना पहला लोकप्रिय गीत (बड़े अरमानों से रखा हैं बलम तेरी कसम) लिखा था सन् १९५१ में फिल्म मल्हार के लिए. कहा जाता है की सन् १९४६ से १९५० तक उन्होंने काफी संघर्ष किया, मगर उसके बारे में कोई ख़ास जानकारी उपलब्ध नहीं है. रोशन के साथ इन्दीवर को जोड़ी बन गयी, मगर दूसरे लोकप्रिय संगीतकारों के साथ उन्हें गीत लिखने के मौके (खासकर पचास के दशक में) ज्यादा नहीं मिले. बाद में कल्यानजी - आनंद जी के साथ इन्दीवर की जोड़ी बन गयी. समय के साथ इन्दीवर ने समझौता कर लिया और फिर...

खैर, आज हम महान गायक मुकेश, संगीतकार रोशन और गीतकार इन्दीवर का एक सुमधुर गीत लेकर आये है जिसे परदे पर अभिनीत किया गया था संजीव कुमार (और साथ में मुकरी और ज़हीदा पर). फिल्म है अनोखी रात जो सन् १९६८ में आयी थी. यह फिल्म रोशन की आखरी फिल्म थी और इस फिल्म के प्रर्दशित होने से पहले ही उनका देहांत हुआ था.

इतना दार्शनिक और गहराई से भरपूर गीत शायद ही सुनने मिलता है.



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३) असद भोपाली

असद भोपाली (असद खान) ऐसे गीतकार हैं जिन्हें लगभग ४० सालके संघर्ष के बाद बहुत बड़ी सफलता मिली. उनका लिखा हुआ एक साधारण सा गीत "कबूतर जा जा जा " जैसे के देश के हर युवक युवती के लिए प्रेमगीत बन गया. यह गीत था फिल्म मैंने प्यार किया (१९८९) का जिसे संगीतबद्ध किया था राम- लक्ष्मण ने.

असद भोपाली की पहली फिल्मों में से एक थी बहुत बड़े बजट की फिल्म अफसाना (१९५१) जिसमे थे अशोक कुमार, वीणा, जीवन, प्राण, कुलदीप कौर आदि. संगीत था उस ज़माने के लोकप्रिय हुस्नलाल भगतराम का. इसके गीत (और फिल्म भी) लोकप्रिय रहे मगर असद चोटी के संगीतकारोंके गुट में शामिल ना हो सके. सालों साल तक वो एन दत्ता, हंसराज बहल, रवि, सोनिक ओमी, उषा खन्ना, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल आदि संगीतकारों के साथ करते रहे मगर वह कामयाबी हासिल न कर सके जो उन्हें फिल्म मैंने प्यार किया से मिली.

लीजिये फिल्म अफसाना (१९५१) का लता मंगेशकर का गाया हुआ यह गीत सुनिए जिसे असद भोपाली ने दिल की गहराईयों से लिखा है



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४) कमर जलालाबादी

अमृतसर के पास एक छोटा सा गाँव हैं जिसका नाम है जलालाबाद , जहां पर जन्म हुआ था ओमप्रकाश (कमर जलालाबादी) का. महान फिल्मकार दल्सुखलाल पंचोली ने उन्हें पहला मौका दिया था फिल्म ज़मीनदार (१९४२) के लिए. उन्होंने चालीस और पचास के दशक में सदाबहार और सुरीले गीत लिखे. उन्होंने सचिन देव बर्मन के साथ उनकी पहली फिल्म एट डेज़ (१९४६) में भी काम किया. उस ज़माने के लगभग हर संगीतकार के साथ (नौशाद और शंकर जयकिशन के अलावा) उन्होंने गीत लिखे.

उनका लिखा हुआ "खुश हैं ज़माना आज पहली तारीख हैं"(फिल्म पहली तारीख १९५४) का गीत आज भी बिनाका गीतमाला पर महीने की पहली तारीख को बजता है. रिदम किंग ओ पी नय्यर के साथ भी उन्होंने "मेरा नाम चीन चीन चू" जैसे लोकप्रिय गीत लिखे.

लीजिये उनका लिखा हुआ रेलवे की तान पर थिरकता हुआ गीत "राही मतवाले" सुनिए. इसे गाया है तलत महमूद और सुरैय्या ने फिल्म वारिस (१९५४) के लिए. मज़े की बात है कि गीत फिल्माया भी गया था इन्ही दो कलाकारों पर.



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५) किदार शर्मा

महान फिल्म निर्माता, निर्देशक और गीतकार किदार शर्मा की जीवनी "The one and lonely Kidar Sharma" हाल ही में प्रर्दशित हुई थी. जिस गीतकार ने सैंकडो सुरीले गीत लिखे उन्हें आज ज़माना भूल चूका है. कुंदन लाल सहगल की फिल्म "देवदास " के अजरामर गीत इन्ही के कलम से लिखे गए है. "बालम आये बसों मोरे मन में" और "दुःख के अब दीन बीतत नाही". उनके लिखे हुए लोकप्रिय गीत है इन फिल्मों मे : नील कमल (१९४७), बावरे नैन (१९५०), सुहाग रात (१९४८). फिल्म जोगन (१९५०) का निर्देशन भी किदार शर्मा का है.

आज की तारीख में किदार शर्मा को कोई अगर याद करता हैं तो इस बात के लिए की उन्होंने हिंदी फिल्म जगत को राज कपूर, मधुबाला, गीता बाली जैसे सितारे दिए. मुबारक बेग़म का गाया "कभी तनहाईयों में यूं हामारी याद आयेगी" भी इन्ही किदार शर्मा का लिखा हुआ है. इसे स्वरबद्ध किया स्नेहल भाटकर (बी वासुदेव) ने और फिल्माया गया हैं तनुजा पर. मुबारक बेग़म के अनुसार यह गीत अन्य लोकप्रिय गायिका गानेवाली थी मगर किसी कारणवश वह ना आ सकी और मुबारक बेग़म को इस गीत को गाने का मौका मिला. उन्होंने इस गीत के भावों को अपनी मीठी आवाज़ में पिरोकर इसे एक यादगार गीत बना दिया.



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प्रस्तुति -पराग सांकला


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Tuesday, September 29, 2009

दुखियारे नैना ढूँढ़े पिया को... इन्दीवर के बोल और लता के स्वर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 217

'मेरी आवाज़ ही पहचान है' के तहत इन दिनों आप सुन रहे हैं लता मंगेशकर के गाए कुछ बेहद दुर्लभ और भूले बिसरे गीत जिन्हे चुनकर हमें भेजा है नागपुर निवासी अजय देशपाण्डे ने। अब तक आप ने जिन संगीतकारों की रचनाएँ इस शृंखला में सुने, वे थे खेमचंद प्रकाश, मास्टर ग़ुलाम हैदर, हुस्नलाल भगतराम, पंडित गोबिन्दराम और सी. रामचन्द्र। आज जिस संगीतकार की बारी है, वो एक ऐसे संगीतकार रहे जिनके साथ लता जी का भाई बहन का गहरा रिश्ता बना और इन दोनों ने मिलकर फ़िल्म संगीत के ख़ज़ाने को कुछ इस तरह समृद्ध किया कि आज दशकों बाद भी उन तमाम सुरीली मोतियों से रोशन है यह ख़ज़ाना। इन दोनों ने ख़ास कर फ़िल्मी ग़ज़लों की धारा ही बदल दी और उन्हे आम गीतों की तरह लोकप्रिय बनाया। जी हाँ, हम आज संगीतकार मदन मोहन की ही बात कर रहे हैं। अपने मदन भ‍इया के बारे में लता जी ने समय समय पर कई इंटरव्यू में कहे हैं, आज भी हम ऐसी ही एक इंटरव्यू के अंश लेकर उपस्थित हुए हैं। लता जी का यह इंटरव्यू अमीन सायानी ने कुछ साल पहले लिया था। "मदन भ‍इया के बारे में मैं यही कहूँगी कि जब भी रिकार्डिंग होती थी तो उनका एक यही होता था कि रिहर्सल वगेरह करते रहते थे, तो वो गाते ही रहते थे, और मुझसे कहते थे कि इसमें से तुमको जो ठीक लगे वो उठा लो। घर की बात थी, मैं उनके घर जाती थी, कभी कभी मैं सारा सारा दिन उनके साथ रहती थी, खाना बहुत अच्छा बनाते थे, 'म्युज़िक डिरेक्टर' मेरे हिसाब से बहुत बड़े थे, जैसे ग़ज़लें उन्होने बनाई, फ़िल्मों के लिए, किसी ने नहीं बनाई। बहुत लोगों ने कोशिश की और आज भी लोग कोशिश कर रहे हैं कि मदन मोहन की स्टाइल की ग़ज़ल बनाएँ पर कोई बना नहीं सकता है। अब ये सुनिए कि उनको संगीत की कितनी बड़ी देन थी। आमद का यह हाल था कि हारमोनियम लेके बैठे और धुन युँही चुटकियों में बन जाती। कभी मोटर चलाते हुए, कभी लिफ़्ट में उपर या नीचे जाते हुए भी तो धुन तैयार हो जाती। मदन भ‍इया एक दो साल मिलिटरी में रहे थे। और शायद इसी वजह से उनकी उपरी बरताव में एक सख़ती हुआ करती थी। कई बार बड़े रफ़ से लगते थे। बातें खरी खरी मुँह पर सुना देते थे। प्यार भी उनका युं होता था कि बस हाथ उठाया और धम से मार दिया। मगर यह सख़ती सिर्फ़ उपर की थी, अंदर से तो वो बड़े भावुक थे और बड़े नरम। और यही नरमी, यह भावुकता, कभी कभी झलक दिखला जाती थी दिल को छू लेने वाली धुनों में ढलकर।"

लता मंगेशकर और मदन मोहन की जोड़ी का जो दुर्लभ नग़मा आज के लिए हमने चुना है वह है फ़िल्म 'निर्मोही' से। १९५२ में मदन मोहन के संगीत में इंटर्नेट से उपलब्ध जानकारी के अनुसार कुल ४ फ़िल्में परदर्शित हुईं थीं - अंजान, आशियाना, ख़ूबसूरत, और निर्मोही। 'निर्मोही' का निर्माण 'शीतल मूवीज़' के बैनर तले हुआ था, जिसके निर्देशक थे बृज शर्मा। सज्जन, नूतन, अमरनाथ, लीला मिश्रा अभिनीत यह फ़िल्म बड़ी बजट की फ़िल्म नहीं थी। शायद यही वजह थी कि मदन मोहन के रचे और लता जी के गाए इस फ़िल्म के गीतों को आज लोग कुछ भूल से गए हैं। लता जी ने इस फ़िल्म में कई गीत गाए, जिन्हे अलग अलग गीतकारों ने लिखे। लता जी की आवाज़ में पी. एन. रंगीन के लिखे दो गीत थे इस फ़िल्म में - "अब ग़म को बना लेंगे जीने का सहारा, दिल टूट गया छूट गया साथ हमारा" और "ये कहे चांदनी रात सुना दो अपने दिल की बात, आई रुत मस्तानी आई रुत मस्तानी"। उद्धव कुमार का लिखा गीत था "कल जलेगा चाँद सारी रात, रात भर होती रहेगी आग़ की बरसात"। लेकिन आज हम जिस गीत को सुनवा रहे हैं उसे लिखा है इंदीवर साहब ने - "दुखियारे नैना ढ़ूंढे पिया को, निसदिन करें पुकार"। इस गीत में "दुखियारे नैना" की धुन कुछ कुछ मदन मोहन साहब की ही फ़िल्म 'देख कबीरा रोया' की "मेरी वीणा तुम बिन रोये" की तरह सुनाई देती है। शास्त्रीय संगीत पर आधारित यह गीत फ़िल्म संगीत के ख़ज़ाने का एक अनमोल नगीना है। ऐसे न जाने लता - मदन मोहन के कितने गीत होंगे जिन्हे आज हम ज़्यादा याद नहीं करते, लेकिन जब भी कभी इन्हे सुनते हैं बस इनमें डूब से जाते हैं। भविष्य में लता-मदन मोहन के कमचर्चित गीतों पर एक शृंखला प्रस्तुत करने की हम ज़रूर कोशिश करेंगे, फिलहाल सुनिए आज का यह अनमोल गीत।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. साहिर है गीतकार लता के गाये इस दुर्लभ गीत के.
२. एस डी बर्मन की धुन से सजे इस गीत बूझकर पाईये 3 अंक.
३. इस प्रेरणात्मक गीत की पहली पंक्ति में शब्द है -"राही".

पिछली पहेली का परिणाम -
बिलकुल सही गीत है पूर्वी जी आपके ३१ शानदार अंक हो गए है और आप दूसरे स्थान पर हैं अब.....बधाई

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, September 28, 2009

मुस्कुराहट तेरे होंठों की मेरा सिंगार है....लता जी का हँसता हुआ चेहरा संगीत प्रेमियों के लिए ईश्वर का प्यार है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 216

ज २८ सितंबर का दिन फ़िल्म संगीत के लिए एक बेहद ख़ास दिन है। क्यों शायद बताने की ज़रूरत नहीं। लता जी को ईश्वर दीर्घायु करें, उन्हे उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करें, लता जी के जन्मदिन पर हम तह-ए-दिल से उन्हे मुबारक़बाद देते हैं। आज है साल २००९। आज से ८० साल पहले १९२९ को लता जी का जन्म हुआ था मध्य प्रदेश के इंदौर में। दोस्तों आज मौका है लता जी के जन्मदिन का, तो क्यों ना आज हम उन्ही से जानें उनकी जनम के बारे में। एक बार अमीन सायानी ने लता जी का एक इंटरव्यू लिया जिसमें उन्होने लता जी को कई 'कॊन्ट्रोवर्शियल' सवालों के जाल से घेर लिया था, लेकिन लता जी हर बार जाल को चीरते हुए बाहर निकल आईं थीं। उन सवालों में से एक सवाल यह भी था - "कुछ लोगों का ख़याल है कि कुछ सस्पेन्स सा आप ने क्रीएट किया हुआ है कि आप कहाँ पैदा हुईं थीं। कुछ कहते हैं गोवा में पैदा हुईं थीं, कुछ कहते हैं धुले में, कुछ इंदौर में, तो कुछ कहीं और का बताते हैं। तो आप बताइए कि आप कहाँ पैदा हुईं थीं?" लता जी का बेझिझक जवाब था - "नहीं, इसमें कोई सस्पेन्स नहीं है अमीन भाई, मेरा जनम इंदौर में हुआ है, क्योंकि मेरी मौसी वहाँ रहती थीं, और मेरी माँ जब, मतलब मैं पेट में थीं तो वहाँ गई, मौसी के वहाँ, पहला जो बच्चा होता है वो अपने मायके में होता है, तो वहाँ नहीं जा सकी जहाँ मेरी नानी रहती थीं, क्योंकि छोटा सा गाँव था, तो वो फिर इंदौर गईं और इंदौर में सिख मोहल्ले में मेरा जनम हुआ। और वहाँ वकील का बाड़ा था वह। मेरे पिताजी गोवा के थे, माँ धुले की तरफ़ छोटा सा गाँव है, और मेरी माँ की जो माँ थीं वो गुजराती नहीं थीं पर पिताजी गुजराती थे, मेरे नाना गुजराती थे, और उनको महाराष्ट्र से बड़ा प्यार था, महाराष्ट्र की भाषा से, और वो मराठी बोलते थे, गुजराती बहुत कम बोलते थे। और मैं सिख मोहल्ले में पैदा हुई, इसलिए मेरे बाल लम्बे हैं (यह कहकर लता जी ज़ोर से हँस पड़ीं)।"

लता जी के जन्मदिन पर हम उनकी शुभकामना करते हुए उनके जिस दुर्लभ गीत को प्रस्तुत करने जा रहे हैं वह है १९५२ की फ़िल्म 'शीशम' का। इस शृंखला में आप दस संगीतकारों के संगीतबद्ध किए दस बेहद दुर्लभ गीत सुन रहे हैं, तो आज के कड़ी के संगीतकार हैं रोशन। गीत इंदीवर का लिखा हुआ है। फ़िल्म 'शीशम' बनी थी 'अनिल पिक्चर्स' के बैनर तले। किशोर शर्मा निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे नासिर ख़ान और नूतन। इसके पिछले साल, १९५१ में फ़िल्म 'मल्हार' में लता-मुकेश के गाए सुपरहिट गीत "प्यार की दुनिया में यह पहला क़दम" के बाद 'शीशम' में रोशन ने एक बार फिर से लता-मुकेश से गवाया "सपनों में आना छेड़ छेड़ जाना सीखा कहाँ से मेरे बलम ने"। इस फ़िल्म में भी कई गीतकारों ने गीत लिखे जैसे कि इंदीवर, ज़िया सरहदी, उद्धव कुमार, नज़ीम पानीपती और कैफ़ इर्फ़ानी। आज का गीत है "मुस्कुराहट तेरे होंठों की मेरा सिंगार है, तू है जब तक ज़िंदगी में ज़िंदगी से प्यार है"। बेहद मीठा और सुरीला गाना है यह। सोचने वाली बात है कि क्या कमी रह गई होगी इस गीत में जो यह गीत बहुत ज़्यादा मशहूर नहीं हुआ, और ना ही आज कहीं से सुनाई देता है। आज लता जी के जन्मदिन पर उनकी तारीफ़ में भी हम इसी गीत के मुखड़े के आधार पर यही कहेंगे कि 'लता जी, आपकी आवाज़ ही फ़िल्म संगीत का सिंगार है, और जब तक आप के गाए गीत हमें कहीं ना कहीं से सुनाई देते रहेंगे, हम सब युंही जीते रहेंगे।" इससे ज़्यादा आपकी तारीफ़ में और क्या कहें!



मुस्कराहट तेरे होठों की मेरा सिंगार है
तू है जब तक ज़िन्दगी में ज़िन्दगी से प्यार है ।

मैनें कब मांगी मुहब्बत कब कहा तुम प्यार दो
प्यार तुमको कर सकूं इतना मुझे अधिकार दो
मेरे नैया की तुम्हारे हाथ में पतवार है ।

मेरे काजल में भरा है रंग तेरी तस्वीर का
सामने है तू मेरे एहसान है तक्दीर का
तेरी आँखों में बसाया मैनें इक संसार है ।


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. मदन मोहन की तर्ज पर लता के गाये इस गीत को बूझिये और जीतिए ३ अंक.
२. एक बार फिर गीतकार हैं इन्दीवर.
३. मुखड़े में शब्द है -"निसदिन"

पिछली पहेली का परिणाम -

शरद जी ६ अंकों पर पहुँच गए हैं आप....बधाई

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, September 16, 2009

जीवन से भरी तेरी आँखें....काव्यात्मक शैली में लिखा था इन्दीवर ने इस गीत को

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 204

ता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी, और आशा भोंसले के बाद, अदा जी की अगली फ़रमाइश में है किशोर कुमार की आवाज़। वैसे तो इन चारों गायकों ने इतने सारे मशहूर गानें गाए हैं कि किसी एक गीत को चुनना नामुमकिन सी बात हो जाती है। फिर भी अदा जी ने इनके एक एक गीत ऐसे चुन कर हमें भेजे हैं कि भई वाह! आप के पसंद की दाद देनी पड़ेगी। हर एक गीत लाजवाब है अपने अपने अंदाज़ का। तो आज जैसा कि हम ने कहा, किशोर दा की आवाज़ की बारी है, जो आवाज़ ज़िंदगी से हारे हुए लोगों को वापस जीने के लिए मजबूर कर देती है। जी हाँ, आज का गीत है फ़िल्म 'सफ़र' का, "जीवन से भरी तेरी आँखें मजबूर करे जीने के लिए, सागर भी तरसते रहते हैं तेरे रूप का रस पीने के लिए"। आँखों की ख़ूबसूरती पर असंख्य गीत बने हैं और आज भी बन रहे हैं। लेकिन इस गीत में जो काव्य है, जो जीवन दर्शन है, शॄंगार रस और जीवन दर्शन का ऐसा समावेश हर गीत में सुनाई नहीं देता। गीतकार इंदीवर का शुमार उन गीतकारों में होता है जिनके अनमोल गीत निराशा भरे मन में आशा का संचार करते हैं, उदास ज़िंदगी को जीवंत कर देते है, और इस दुनिया को समझने की दृष्टि प्रदान करते हैं, कुछ इस प्रस्तुत गीत की ही तरह। शुद्ध हिंदी का इस्तेमाल इस गीत में इंदीवर जी ने किया है। वो आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन बदलते वक़्त के इस शोरगुल भरे गीत संगीत के युग में जब भी मीठे, भावपूर्ण और अर्थपूर्ण गीतों की बात चलेगी, इंदीवर का नाम सदा सम्मान से याद किया जाएगा।

फ़िल्म 'सफ़र' बनी थी सन् १९७० में। १९६९ में 'आराधना' के साथ शुरु हो कर १९७२ तक राजेश खन्ना ने लगातार १५ सुपर हिट फ़िल्में दीं, जिसकी वजह से उन्हे फ़िल्म जगत का पहला सुपर स्टार निर्विरोध घोषित कर दिया गया। असित सेन निर्देशित फ़िल्म 'सफ़र' में राजेश खन्ना के साथ थीं शर्मीला टैगोर और थे दादामुनि अशोक कुमार और सह-नायक फ़ीरोज़ ख़ान। इस फ़िल्म में कुल पाँच गीत हैं, जो सभी के सभी कुछ हद तक दार्शनिक अंदाज़ में लिखे गए हैं। इंदीवर और कल्याणजी आनंदजी की तिकड़ी ने ऐसे कई फ़िल्मों में एक से बढ़कर एक दार्शनिक गीत हमे दिए हैं। इस फ़िल्म की ही अगर बात करें तो प्रस्तुत गीत के अलावा किशोर दा का ही गाया "ज़िंदगी का सफ़र है ये कैसा सफ़र", लता जी का गाया "हम थे जिनके सहारे वो हुए ना हमारे", और मन्ना डे का गाया "नदिया चले चले रे धारा" जीवन दर्शन अपने में समाए हुए हैं। फ़ीरोज़ ख़ान पर फ़िल्माया गया मुकेश का गाया गीत "जो तुम को हो पसंद वही बात करेंगे" में वैसे रोमांटिसिज़्म की ही अधिक झलक मिलती है। "जीवन से भरी तेरी आँखें मजबूर करे जीने के लिए" जैसे बोल लिखने वाले इंदीवर जी अपनी निजी ज़िंदगी में हमेशा प्यार के लिए तरसते रहे। बता रहे हैं और कोई नहीं बल्कि आनंदजी, जिनके साथ उन्होने एक लम्बी पारी खेली थी, "ये बेचारे इंदीवर जी, हमेशा प्यार के भूखे रहे। बचपन से उनको ज़िंदगी में, माँ बाप चले गए जल्दी तो अकेले रह गए। तो हमारा घर ही उनका घर था। वो हर वक़्त हम को बोलते थे कि 'तुम बनियों को तो कुछ आता नहीं है, ये है वो है, तो शोज़ पर भी जाते थे तो रहते थे साथ में, Indeevarji was like a 'father figure'।"

इस गीत का प्रील्युड म्युज़िक भी कमाल का है जो किसी हद तक पार्श्व संगीत (बैकग्राउंड म्युज़िक) की तरह सुनाई देता है। यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि कल्याणजी आनंदजी एक अच्छे संगीतकार होने के साथ साथ एक बहुत अच्छे पार्श्व संगीतकार भी रहे हैं। तो दोस्तों, आइए सुनते हैं इंदीवर, कल्याणजी-आनंदजी और किशोर कुमार का यह सदाबहार गीत, जो अब भी राह चलते अगर कहीं से थोड़ी सुनाई दे जाता है तो हमारे पाँवों को रुकने पर मजबूर कर देता है।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. गीतकार साहिर लुधियानवीं ने हिंदी शब्दों का इस्तेमाल किया है इस गीत में.
२. मीना कुमारी ने फिल्म में शीर्षक भूमिका निभाई थी.
३. एक अंतरे की दूसरी पंक्ति में ये शब्द है - "धर्म".

पिछली पहेली का परिणाम -
रोहित जी बहुत दिनों बाद सही जवाब के साथ आपकी आमद हुई है बधाई...२४ अंक हुए आपके....दिशा जी भी बहुत दिनों में आई, पर ज़रा सा पीछे रह गयीं. मंजू जी के क्या कहने :) वैसे ऐसा कोई गाना है क्या....पाबला जी नज़र नहीं आये बहुत दिनों से, और स्वप्न जी, आपकी पसंद बेशक लाजवाब है...मनु जी लगता है फिर सो गए.....और पराग जी के लिए एक गीत याद आ रहा है..."अजी रूठ कर अब कहाँ जाईयेगा...."

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, September 1, 2009

कोई जब तुम्हारा ह्रदय तोड़ दे....इन्दीवर साहब के शब्दों और मुकेश के स्वरों ने इस गीत अमर बना डाला

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 189

मुकेश के साथ राज कपूर और शंकर जयकिशन के नाम इस तरह से जुड़े हुए हैं कि ऐसा लगता है जैसे इन्ही के लिए मुकेश ने सब से ज़्यादा गानें गाये होंगे। लेकिन हक़ीक़त कुछ और ही है। मुकेश जी ने सब से ज़्यादा गानें संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी के लिए गाये हैं। ख़ास कर जब दर्द भरे मशहूर गीतों की बात चलती है तो कल्याणजी-आनंदजी के लिए गाए उनके गीतों की एक लम्बी सी फ़ेहरिस्त बन जाती है। आज एक ऐसा ही गीत आपको सुनवा रहे हैं जो मुकेश जी को बेहद पसंद था। मनोज कुमार की सुपर हिट देश भक्ति फ़िल्म 'पूरब और पश्चिम' का यह गीत है "कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे, तड़पता हुआ जब कोई छोड़ दे, तब तुम मेरे पास आना प्रिये, मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा तुम्हारे लिए"। इंदीवर जी ने इस गीत में प्यार करने का एक अलग ही तरीका इख्तियार किया है कि नायक का प्यार इतना गहरा है कि वह नायिका को जीवन के किसी भी मोड़ पर, किसी भी वक़त, किसी भी हालत में अपना लेगा, नायिका कभी भी उसके पास वापस लौट सकती है। "अभी तुमको मेरी ज़रूरत नहीं, बहुत चाहनेवाले मिल जाएँगे, अभी रूप का एक सागर हो तुम, कमल जितने चाहोगी खिल जाएँगे, दर्पण तुम्हे जब डराने लगे, जवानी भी दामन छुड़ाने लगे, तब तुम मेरे पास आना प्रिये, मेरा सर झुका है झुका ही रहेगा तुम्हारे लिए"। इससे बेहतरीन अभिव्यक्ति शायद ही कोई शब्दों में लिख सके। दोस्तों, इंदीवर जी का लिखा यह मेरा सब से पसंदीदा गीत रहा है। इस गीत के रिकार्डिंग से जुड़ा एक मज़ेदार क़िस्सा आनंदजी ने विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में बताया था। जब आनंदजी भाई से पूछा गया कि "मुकेश जी के साथ रिकार्डिंग कैसा रहता था? एक ही टेक में गाना रिकार्ड हो जाता था?", तो इसके जवाब में आनंदजी बोले, "मुकेश जी के केस में उल्टा था, बार बार वो रीटेक करवाते थे। किसी किसी दिन तो गाना बार बार सुनते सुनते लोग बोर हो जाते थे, म्युज़िशियन्स थक जाते थे। अब यह जो गाना है 'पूरब और पश्चिम' का, "कोई जब तुम्हारा...", यह हमने शुरु किया शाम ३ बजे, और रीटेक करते करते गाना जाके रिकार्ड हुआ अगले दिन सुबह ७ बजे। इस गाने में एक शब्द आता है "प्रिये", तो मुकेश जी को यह शब्द प्रोनाउंस करने में मुश्किल हो रही थी, वो 'परिये परिये' बोल रहे थे। एक समय तो वो गुस्से में आकर बोले कि 'यह क्या गाना बनाया है, यह मुझसे गाया नहीं जाएगा"। इस घटना को याद करते हुए आनंदजी की बार बार हँसी छूट रही थी उस कार्यक्रम में।

इस मज़ेदार किस्से के बाद आनंदजी ने मुकेश जी की तारीफ़ भी ख़ूब की थी, एक और अंश यहाँ प्रस्तुत है उस तारीफ़ की - "मुकेश जी इतने अच्छे थे, मैं एक क़िस्सा सुनाता हूँ आप को, एक बार बाहर जा रहे थे, दिल्ली जाना था उनको, और यहाँ पर शूटिंग आ गयी। तो गाना रिकार्ड करना था, हमने यह तय किया कि फ़िल्हाल किसी डबिंग आर्टिस्ट से गाना गवा लिया जाए, बाद में मुकेश जी की आवाज़ में कर देंगे। सुमन कल्याणपुर के साथ गाना था, तो हमने नया सिंगर मनहर उधास से गाना गवा लिया। बाद में सब कुछ मुकेश जी को बताया गया और गाना भी उन्हे सुनाया तो उन्होने कहा कि 'इसमें क्या बुरा है?' इसी को रख लो न, यह अच्छा है! इसमें बुरा क्या है! अभी तो नये आएँगे ही न? हम भी कभी नए थे कि नहीं!' इस तरह के, खुले दिल से, यह कहने के बाद भी उन्होने कभी किसी से नहीं कहा कि 'मैने गाना मनहर उधास को दे दिया, नहीं। वो गहरे आदमी थे, बड़े आदमी थे, इस तरह की सोच उनमें नहीं थी, इस तरह की बातें नहीं करते थे कभी।" दोस्तों, मनहर उधास के गाए जिस गीत का ज़िक्र अभी हमने किया वह फ़िल्म 'विश्वास' का था "आप से हमको बिछड़े हुए एक ज़माना बीत गया"। दोस्तों, अब वापस आते हैं मुकेश के गाए आज के गीत पर, सुनिए इंदीवर, कल्याणजी-आनंदजी और मुकेश की सदाबहार तिकड़ी के संगम से उत्पन्न यह 'एवरग्रीन सॊंग'।



गीत के बोल:

कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे
तड़पता हुआ जब कोई छोड़ दे
तब तुम मेरे पास आना प्रिये
मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा
तुम्हारे लिये, कोई जब ...

अभी तुमको मेरी ज़रूरत नहीं
बहुत चाहने वाले मिल जाएंगे
अभी रूप का एक सागर हो तुम
कंवल जितने चाहोगी खिल जाएंगे
दरपन तुम्हें जब डराने लगे
जवानी भी दामन छुड़ाने लगे
तब तुम मेरे पास आना प्रिये
मेरा सर झुका है झुका ही रहेग
तुम्हारे लिये, कोई जब ...

कोई शर्त होती नहीं प्यार में
मगर प्यार शर्तों पे तुमने किया
नज़र में सितारे जो चमके ज़रा
बुझाने लगीं आरती का दिया
जब अपनी नज़र में ही गिरने लगो
अंधेरों में अपने ही घिरने लगो
तब तुम मेरे पास आना प्रिये
ये दीपक जला है जला ही रहेग
तुम्हारे लिये, कोई जब ...

और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. जब भी मुकेश की याद आती है यही गीत सदा बन दिल से निकलता है.
२. आशा भोंसले की आवाज़ में इस फिल्म का और गीत अभी कुछ दिन पहले ही बजा था इस शृंखला में.
३. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से -"बचपन".

पिछली पहेली का परिणाम -
पूर्वी जी ने सही जवाब देकर कमाए २ और अंक और आपका स्कोर हुआ १८. दिलीप जी आपकी बात से हम भी बहुत हद तक सहमत हैं. पाबला जी आपका हुक्म सर आँखों पर....अन्य सभी श्रोताओं का भी आभार

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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