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Saturday, November 8, 2014

इसकी टोपी उसके सर - प्रसिद्ध ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड कलेक्टर वी. एस. दत्ता बता रहे हैं पुराने ज़माने के कुछ इन्स्पायर्ड गीतों के बारे में




स्मृतियों के स्वर - 12

प्रसिद्ध ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड कलेक्टर वी. एस. दत्ता बता रहे हैं पुराने ज़माने के कुछ इन्स्पायर्ड गीतों के बारे में

इसकी टोपी उसके सर





'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों से साक्षात्कार करवाये जाते थे और जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत के इन हस्तियों की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकिया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर, महीने के हर दूसरे और चौथे शनिवार को इसी ख़ज़ाने में से मैं निकाल लाता हूँ कुछ अनमोल मोतियाँ हमारे इस स्तम्भ में, जिसका शीर्षक है - स्मृतियों के स्वर। इस स्तम्भ के अन्तर्गत हम और आप साथ मिल कर गुज़रते हैं स्मृतियों के इन हसीन गलियारों से। आज हम आपकी मुलाक़ात करवा रहे हैं प्रसिद्ध ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड कलेक्टर वी. एस. दत्ता से। दत्ता साहब बता रहे हैं गुज़रे ज़माने के कुछ ऐसे मशहूर गीतों के बारे में जो प्रेरित थे अन्य फ़िल्मी गीतों से ही। यानी कि इसकी टोपी उसके सर। आनन्द लीजिये, ऐसे गीतों के साथ।





सूत्र: जुबिली झंकार, विविध भारती, 3 सितंबर 2008


1. "लेके पहला पहला प्यार, भरके आँखों में ख़ुमार..." (सी.आई.डी. 1956)

देखिये, यह तो नौशाद साहब ने आपको 'विविध भारती' में ही बताया था कि वो जो गाना है "जादू नगरी से आया है कोई जादूगर", उसकी ट्यून मेरे गीत से नकल की हुई है। वह जो एक उनकी फ़िल्म आयी थी 'नमस्ते', शायद 1943 में, उसमें एक गाना था "दिल ना लगे मोरा, जिया ना लगे, मन ना लगे, नेक-टाई वाले बाबू को बुलाते कोई रे..."। इस गीत की धुन हू-ब-हू "जादू नगरी से आया है कोई जादूगर" जैसा है। तो यह 'नमस्ते' फ़िल्म आई थी 1942-43 में, और 'CID' आयी थी 1956 में, यानी इसके 13 साल बाद। तो नय्यर साहब ने नौशाद की धुन को उठा लिया। लीजिए, पहले आप फिल्म सी. आई. डी. का और फिर फिल्म 'नमस्ते' का गाना सुनिए। 


फिल्म - सी. आई. डी. : 'लेके पहला पहला प्यार भरके आँखों में खुमार...' : शमशाद बेगम और मोहम्मद रफी : संगीत - ओ. पी. नैयर




फिल्म - नमस्ते : 'दिल न लगे मोरा जिया न लगे...' : संगीत - नौशाद : गीत - दीनानाथ मधोक




2. "आये भी अकेला जाये भी अकेला" (दोस्त, 1954)

तलत महमूद साहब का फ़िल्म 'दोस्त' का गीत "आये भी अकेला जाये भी अकेला, दो दिन की ज़िन्दगी है दो दिन का मेला" एक बहुत मशहूर गीत है, आपने सुना होगा। हंसराज बहल का संगीत था। इसका जो है पंजाबी फ़िल्म 'लच्छी' (1949) से लिफ़्ट किया गया था। सिर्फ़ धुन ही नहीं बल्कि बोल भी। और 'लच्छी' में जो है इसको मोहम्मद रफ़ी साहब ने गाया था, और बेहतरीन गाना था, "जगवाला मेला यारों थोड़ी देर दा, हँस दे या रात लंगी पता नहीं सवेर दा..."। यह गाना पीछे रह गया और वह गाना आगे निकल गया। यह संगीतकार शार्दूल क्वात्रा के करीयर का शुरुआती गीत था; उस समय वो हंसराज बहल साहब के सहायक हुआ करते थे। मतलब बहल साहब ने अपने सहायक की धुन को बाद में इस्तेमाल किया अपने गीत में। कहा जाता है कि एक बार हंसराज बहल बम्बई से बाहर गये थे, तब गीतकार नाज़िम पानीपती ने क्वात्रा को एक गीत की धुन बनाने को कहा, और तभी उन्होंने इस गीत की धुन बनाई थी। अब आप इन इन दोनों गीतों को सुनिए।


फिल्म - दोस्त : 'आए भी अकेला जाए भी अकेला...' : तलत महमूद : संगीत - हंसराज बहल




फिल्म - लच्छी (पंजाबी) : 'जगवाला मेला यारों थोड़ी देर दा...' : मोहम्मद रफी : संगीत शार्दूल क्वात्रा 


 
3. "ख़ुशी का ज़माना गया रोने से अब काम है" (छोटी भाभी, 1950)

इसी तरह से और भी गाने थे जो पंजाबी में थे। एक गाना था जिसे नूरजहाँ ने गाया था, "हूक मेरी क़िस्मत सो गई जागो हुज़ूर रे...", इसे फिर फ़िल्म 'छोटी भाभी' में हुस्नलाल-भगतराम ने लिफ़्ट किया और बना दिया "ख़ुशी का ज़माना गया रोने से अब काम है, प्यार इसका नाम था जुदाई इसका नाम है..." जिसे रफ़ी साहब और लता जी ने गाया। तो ऐसे लोग धुन एक दूसरे की लिफ़्ट करते आये हैं और यह परम्परा आज भी जारी है। नूरजहाँ का गाया गीत उपलब्ध नहीं पाया है, फ़िल्म 'छोटी भाभी' का गीत अब आप सुनें।


फिल्म - छोटी भाभी : 'खुशी का जमाना गया रोने से अब काम है...' : मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर : संगीत - हुस्नलाल भगतराम 



4. "तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा" (आख़िरी दाव, 1958)

आज इसको लेकर काफ़ी चर्चा होती है, कानून तक में जाने की भी बात भी होती रहती है, लेकिन उस वक़्त तो कितना अनायास होता था और इस बात को लेकर कोई किसी से कुछ कहता तक नहीं था। पर एक गाना था जिसके लिफ़्ट करने पर सज्जाद हुसैन काफ़ी बिगड गये थे मदन मोहन पर। तलत महमूद का जो गाना था ना "ये हवा ये रात ये चांदनी", फ़िल्म 'संगदिल' का, इसके आधार पर मदन मोहन साहब ने गाना बना दिया "तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा...", इसमें क्या हुआ कि सज्जाद साहब जिन्होंने "ये हवा ये रात" बनाया था, वो बिगड़ गये थे मदन मोहन पे, "तुमने कैसे मेरे गाने से लिफ़्ट किया?" मदन मोहन ने कहा कि हुज़ूर, मैंने सोचा कि उसी धुन को थोड़ा सा बदलकर देखें तो कैसा लगेगा। पर उसके बाद मदन मोहन ने कहा कि मैंने ऐसी गुस्ताख़ी फिर कभी नहीं की।


फिल्म - आखिरी दाव : 'तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा...' मोहम्मद रफी : संगीत - मदन मोहन : गीत मजरूह सुल्तानपुरी




फिल्म - संगदिल : 'ये हवा ये रात ये चाँदनी...' : तलत महमूद : संगीत - सज्जाद हुसैन



5. "हमारी गली आना" (मेमसाहिब, 1956)

एक 'शुक्रिया' फ़िल्म आयी थी, जिसमें एक गाना था "हमारी गली आना अच्छा जी, हमें ना भुलाना अच्छा जी...", जिसे बाद में 'मेमसाहिब' फ़िल्म में तलत महमूद और आशा भोसले ने गाया। इसको 'मेमसाहिब' में बिल्कुल सेम टू सेम लिफ़्ट किया गया है संगीतकार मदन मोहन ने। लेकिन ऑरिजिनल 'शुक्रिया' फ़िल्म का गाना था, पुराना, 1944 की फ़िल्म, जिसमें रमोला हीरोइन थीं, पर वह वाला गाना हिट नहीं हो पाया। इसके संगीतकार थे जी. ए. चिश्ती। इन दोनों गीतों को आप सुनिए और अन्तर खोजिए।


फिल्म - मेमसाहिब : 'हमारी गली आना अच्छा जी...' : तलत महमूद और आशा भोसले : संगीत - मदन मोहन 




फिल्म - शुक्रिया : 'हमारी गली आना अच्छा जी...' : नसीम अख्तर और अमर : संगीत - जी.ए. चिश्ती 




कॉपीराइट: विविध भारती



तो दोस्तों, आज बस इतना ही। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आयी होगी। अगली बार ऐसे ही किसी स्मृतियों की गलियारों से आपको लिए चलेंगे उस स्वर्णिम युग में। तब तक के लिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार! इस स्तम्भ के लिए आप अपने विचार और प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में व्यक्त कर सकते हैं, हमें अत्यन्त ख़ुशी होगी।


प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 





Saturday, April 16, 2011

ओल्ड इस गोल्ड - शनिवार विशेष - जब गुड्डो दादी नें बताया पंडित बागा राम व पंडित हुस्नलाल के परिवार के साथ उनके पारिवारिक संबंध के बारे में

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार! फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के गानें रेकॉर्ड/ कैसेट्स/ सीडी'ज़ के ज़रिये अनंतकाल तक सुरक्षित रहेंगे, इसमें कोई शक़ नहीं है, और इसमें भी कोई संदेह नहीं कि सुनहरे दौर के फ़नकार भी अमर रहेंगे। लेकिन जब हम इन अमर फ़नकारों के बारे में आज जानना चाहते हैं तो कुछ किताबों, पत्र-पत्रिकाओं और विविध भारती के संग्रहालय में उपलब्ध कुछ साक्षात्कारों के अलावा कोई और ज़रिया नहीं है। इन कलाकारों के परिवार वालों से भी जानकारी मिल सकती है लेकिन उन तक पहुँचना हमेशा संभव नहीं होता। ऐसे में अगर हमें कोई मिल जाये जिन्होंने उस ज़माने के कलाकार को या उनके परिवार को करीब से देखा है, जाना है, तो उनसे बातचीत करनें में भी एक अलग ही रोमांच हो आता है। यह हमारा सौभाग्य है कि 'हिंद-युग्म आवाज़' परिवार के श्रोता-पाठकों में भी कई मित्र ऐसे हैं जिन्होंने न केवल उस ज़माने से ताल्लुख़ रखते हैं बल्कि स्वर्णिम युग के कुछ कलाकारों के संस्पर्श में भी आने का उन्हें सौभाग्य प्राप्त हुआ है। ऐसी ही एक शख़्स हैं हमारी गुड्डो दादी।

अभी हाल ही में जब मुझे सजीव जी से पता चला कि गुड्डो दादी बहुत साल पहले पंडित हुस्नलाल के घर गई थीं, मुझे रोमांच हो आया, और मैंने दादी से गुज़ारिश की अपनी यादों के उजालों को 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में बिखेरने की। बड़े ही उत्साह के साथ दादी नें न केवल उस अनुभव के बारे में हमें लिख भेजा, बल्कि अमरीका से ख़ुद मुझे टेलीफ़ोन भी किया। ७२ वर्ष की उम्र में भी टेलीफ़ोन पर उनकी आवाज़ में जिस तरह का उत्साह मुझे मेहसूस हुआ, उससे हम नौजवान बहुत कुछ सीख सकते हैं। बहुत साल पहले की बात होने की वजह से दादी को बहुत ज़्यादा तो याद नहीं, लेकिन जितना भी याद है, वो हमारे लिये कुछ कम नहीं है। तो आइए रोशन करते हैं आज की यह महफ़िल गुड्डो दादी की सुनहरी यादों के उजाले से।

सुजॉय - गुड्डो दादी, एक बार फिर स्वागत है आपका 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में। यकीन मानिए, आप जैसी वरिष्ठ मित्रों के संस्पर्श में आकर हमें बहुत अच्छा लगता है, और एक रोमांच भी हो आता है यह जानकर कि आप सहगल साहब, पं. हुस्नलाल-भगतराम, और सुरिंदर कौर जैसी कलाकारों से मिली हैं, या उन्हें सामने से देखा है। आज हम आपसे जानना चाहेंगे पं. हुसनाल-भगतराम के बारे में। मैंने सुना है कि आपके परिवार का संबंध है उनके परिवार के साथ?

गुड्डो दादी - जी हाँ! पंडित बागा राम जी के साथ हमारा पारिवारिक सम्बन्ध है। मेरे पैदा होने से भी पहले हमारे परिवार का काफी आना जाना था।

सुजॉय - ये पंडित बागा राम जी कौन हैं?

गुड्डो दादी - पं. बागा राम जी हुस्नलाल जी के ससुर थे। और वो ख़ुद भी संगीतकार थे। मेरे ख़याल में उन्होंने कुछ फ़िल्मों में भी संगीत दिया है। और हुस्नलाल भगतराम को भी बहुत कुछ सिखाया है। पंडित बागा राम जी बहुत सीधे सादे किस्म के इंसान थे, बढ़ी सफ़ेद दाढ़ी, खुली कंधे पर लाल कपडे का अंगोछा डाले रखते थे।

सुजॉय - अच्छा!! क्या आप बता सकती हैं कि बागा राम जी नें किन फ़िल्मों में संगीत दिया था?

गुड्डो दादी - पंडित बागा राम जी ने कौन सी फिल्म में संगीत दिया या लिखा मुझे जानकारी नहीं हैं, क्योंकि उन दिनों हमें दूर ही रखा जाता था गीत आदि से, और दूर संचार के साधन भी कम थे। रेडियो तो १९४७ तक किसी किसी के घर में ही होता था।

सुजॉय - मैंने इंटरनेट पर काफ़ी ढूंढा पर बागा राम जी के बारे मे कोई जानकारी प्राप्त नहीं कर सका, और न ही उनके किसी फ़िल्म या गीत की। ऐसे में आप से उनके बारे में सुन कर बहुत ही अच्छा लग रहा है। दादी, मैंने सुना है कि आप हुस्नलाल जी के घर गई थीं। कहाँ पे था उनका घर?

गुड्डो दादी - मुझे जितना याद है या पता है, वह बागा राम जी का घर था। हुस्नलाल जी का वहाँ ख़ूब आना जाना था। उनका घर था दिल्ली के पहाड़गंज में इम्पीरियल सिनेमा के पीछे। एक पारिवारिक वातावरण था, सबसे मिलते थे आदर के साथ, हंस मुख भी थे। हुस्नलाल-भगतराम जी नया गीत अपने मित्र मंडली के साथ तैयार करते थे, जिसमे पंडित बागा राम जी बहुत सहायता करते थे। बहुत से गीत और धुनें दुसरे संगीतकारों ने चोरी कर अपनी फिल्मो में शामिल कर लिया, नाम तो नहीं लिखूँगी। हम भी दिल्ली में रहते थे। बेटी और पति के साथ बहुत बार गई उनके घर। वहाँ एक कमरा वाद्यों से सुज्जित रहता था जिसमें सितार, हारमोनियम, घड़ा, तबला शामिल थे। मसंद गोल तकिये, उन पर सफ़ेद कवर, ज़मीन पर कालीन और कालीन पर सफ़ेद चादर भी बिछी होती थी। उनके घर हमनें खाना भी खाया, बहिन के हाथों बना चाय भी पी, बड़ी बहिन ने खाने पर आमन्त्रण दिया था। बहिन, यानी हुसनाल जी की पत्नी, जिनको मैं बड़ी बहन बोलती हूँ सम्मान के साथ, उन्होंने भी फ़िल्म में गीत गाया है। मुझे जितना याद है फ़िल्म 'चाकलेट' में उन्होंने गीत गाया था।

सुजॉय - अच्छा! हुस्नलाल जी की पत्नी, यानी कि बागा राम जी की बेटी! यह जो फ़िल्म 'चाकलेट' की बात बतायी आपने, इस फ़िल्म में संगीत था मोहन शर्मा का और गीतकार थे सी. एम. कश्यप। यह १९५० की फ़िल्म थी। अच्छा दादी, गायिकाओं की बात करें तो सुरैया जी के साथ हुस्नलाल-भगतराम के सब से ज़्यादा लोकप्रिय गीत हुए। इस बारे में कुछ कहना चाहेंगी?

गुड्डो दादी - गायिका सुरैया की बहुत इज्ज़त करते थे दोनों। एक दूसरी मशहूर गायिका नें जब अपनी गीतों की 'श्रद्धांजली' सी.डी. बनायी तो उन्होंने हुस्न लाल जी के गीत एक भी नहीं शामिल किये। और आप यकीन नहीं करेंगे कई गायक गायिकाओं नें भी उनकी धुनें चुराकर दूसरे संगीतकारों को दी। गायक महेंदर कपूर जी ने भी गायन की शिक्षा हुसनलाल जी से ली थी।

सुजॉय - अच्छा दादी, आप तो उनके परिवार के करीब थीं, आप बता सकती हैं कि हुस्नलाल जी के निकट के मित्रों में कौन कौन से कलाकार हुआ करते थे?

गुड्डो दादी - गीतकार पंडित सुदर्शन जी, अभिनेता सोहराब मोदी, जयराज सहगल जी, जिल्लो बाई, जुबैदा, बोराल जी, डी एन मधोक, वाई बी चोहान, कारदार साहब, हरबंस, डायरेक्टर मुकंद लाल और बहुत से फिल्म के लोग थे उनकी मित्र मंडली में। एक साल पहले तलत अज़ीज़ से फोन पर बात हुई थी हुस्नलाल जी के विषय में, उनके मुख से यही निकला कि चित्रमय संसार में हम उन्हें बहुत याद करते हैं, और बहुत नाम है उनका | कभी कहते भी थे आपके बनाये हुए गीत फलाना फिल्म में बज रहे है, तो उनके मुख से यही निकलता था बजने दो मेरे मन को बहुत शान्ति मिलती है, यहीं सभी कुछ छोड़ जाना है, सभी कुछ!

सुजॉय - हुस्नलाल जी के अंतिम दिनों के बारे में आप कुछ बता सकती हैं?

गुड्डो दादी - उनके अंतिम दिन बहुत ही खराब व दयनीय दशा में निकले। आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। लेकिन किसी के आगे अपना हाथ नहीं फैलाया। कुछ भी हो सुबह के वक़्त सैर अवश्य करने जाते थे। और एक दिन सुबह दिल्ली के ताल कटोरा बाग में दिल की धडकन रूकने से वहीं उनका देहांत हो गया। धुन बनाने वाले, चुराने वाले, गाने वाले, कोई भी कुछ नहीं ले गया, सब कुछ यहीं रह गया, फिल्म 'मेला' का गीत "ये जिंदगी के मेले" दरअसल फिल्म 'मोती महल' का गीत था "जाएगा जब यहाँ से कुछ भी ना साथ होगा"।

सुजॉय - वाक़ई दिल उदास जाता है ऐसे शब्द सुन कर। अच्छा दादी, चलते चलते आप अपनी पसंद का कोई गीत पंडित हुस्नलाल-भगतराम जी का सुनवाना चाहेंगे हमारे श्रोताओं को?

गुड्डो दादी - "वो पास रहे या दूर रहे नज़रों में समाये रहते हैं"

सुजॉय - वाह! आइए सुना जाये यह गीत सुरैया की आवाज़ में, फ़िल्म 'बड़ी बहन' का यह गीत है, क़मर जलालाबादी के बोल और यह वर्ष १९४९ की तस्वीर है।

गीत - वो पास रहे या दूर रहे (बड़ी बहन)


सुजॉय - दादी, आपका बहुत बहुत शुक्रिया, बागा राम जी और हुस्नलाल जी के जीवन और संगीत सफ़र के बारे में युं तो किताबों और पत्रिकाओं से जानकारी प्राप्त की जा सकती है, लेकिन आपनें जो बातें हमें बताईं, वो सब कहीं और से प्राप्त नहीं हो सकती थी। यह हमारा सौभाग्य है आप से बातचीत करना। आगे भी हम आप से सम्पर्क बनाये रखेंगे, आप भी 'आवाज़' पर हाज़िरी लगाते रहिएगा, बहुत बहुत शुक्रिया, नमस्कार!

गुड्डो दादी - मेरी तरफ़ से आप को बहुत बहुत आशिर्वाद और धन्यवाद!

Thursday, February 3, 2011

तेरे नैनों ने चोरी किया....सुर्रैया का नटखट अंदाज़ इस मधुर और सदाबहार गीत में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 585/2010/285

सुरैया के गाये गीतों से सजी लघु शृंखला 'तेरा ख़याल दिल से भुलाया ना जाएगा' लेकर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में हम फिर उपस्थित हैं। आज इस शृंखला की पाँचवी कड़ी है। जैसा कि कल हमने बताया था कि सुरैया जी ने संगीत की कोई विधिवत शिक्षा नहीं ली थी; लेकिन सुर को, लय को, बहुत आसान दक्षता से पकड़ लिया करती थीं। उन्होंने नूरजहाँ, ख़ुरशीद, ज़ोहराबाई, अमीरबाई जैसी उस दौर की गायिकाओं के बीच अपनी ख़ास जगह और पहचान बनाई। उनकी मधुर आवाज़ को दुनिया के सामने लाये थे नौशाद, लेकिन बाद में पंडित हुस्नलाल-भगतराम ने उनसे एक से बढ़कर एक गीत गवाया। ४० से लेकर ५० के दशक के बीच उनका फ़िल्मी सफ़र बुलंदियों पर था। उनकी अदाकारी और गायकी परवान चढ़ती गई। हुस्नलाल भगतराम के ज़िक्र से याद आया कि १९४८ में एक फ़िल्म आयी थी 'प्यार की जीत'। 'बड़ी बहन' की तरह इस फ़िल्म के गीतों ने भी अपार कामयाबी हासिल की। इस फ़िल्म को याद करते हुए सुरैया ने 'जयमाला' में कहा था - "फ़ौजी भाइयों, फ़िल्म 'प्यार की जीत' आप लोगों में से बहुतों ने देखी होगी, और इस फ़िल्म का वह गीत भी याद होगा, "एक दिल के टुकड़े हज़ार हुए, कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा" (हँसते हुए)। मुझे और रहमान साहब को इस गीत के बोलों पर बड़ी हँसी आती थी। ख़ैर, रहमान साहब की तो बात ही निराली थी, बड़े पुर-मज़ाक हैं वो, ख़ास कर सीरियस सीन से पहले तो मुझे ज़रूर हँसाते थे। अच्छा, सुनिए उसी फ़िल्म का एक गीत"। और दोस्तों, उस दिन सुरैया जी ने बजाया था "कोई दुनिया में हमारी तरह बरबाद ना हो, दिल तो रोता है मगर होठों पे फ़रियाद ना हो"। लेकिन आज हम यह ग़मज़दा गीत नहीं सुनेंगे, बल्कि इसी फ़िल्म का एक ख़ुशरंग गीत, "तेरे नैनों ने चोरी किया मेरा छोटा सा जिया, परदेसिया"। अपने ज़माने का एक बेहद लोकप्रिय गीत, जो आज भी बेहद चाव से सुना जाता है।

पंडित हुस्नलाल-भगतराम का संगीत १९४७ में नज़रंदाज़ ही रहा। 'मोहन', 'रोमियो ऐण्ड जुलियट' जैसी फ़िल्में असफल रही थी। १९४८ में 'आज की रात' फ़िल्म में सुरैया ने हुस्नलाल-भगतराम के लिए कुछ गीत गाये थे फिर इन गीतों को भी ज़्यादा मक़बूलीयत हासिल नहीं हुई। और यही हाल मीना कपूर के गाये गीतों वाली १९४८ की फ़िल्म 'लखपति' का भी हुआ। लेकिन इसी साल 'प्यार की जीत' में सुरैया के गाये लाजवाब गीतों ने असफलता के इस क्रम को तोड़ा और हुस्नलाल-भगतराम लोकप्रियता के शिखर पर पहुँच गये। आइए इस फ़िल्म के गीतों की थोड़ी चर्चा करें। "कोई दुनिया में हमारी तरह बर्बाद न हो" और आज का गीत "तेरे नैनों ने चोरी किया" तो लिस्ट में सब से उपर हैं ही, इनके अलावा राग पीलू पर आधारित "ओ दूर जाने वाले, वादा ना भूल जाना" भी एक लाजवाब गीत रहा है। इस फ़िल्म में सुरैया ने मीना कपूर, सुरिंदर कौर और साथियों के साथ मिलकर एक दुर्लभ गीत गाया था "इतने दूर हैं हुज़ूर"। गीतकार थे राजेन्द्र कृष्ण और कमर जलालाबादी. आज के प्रस्तुत गीत के बारे में यही कह सकते हैं कि "तेरे नैनों ने" के बाद का हल्का अंतराल तथा ढोलक-तबले के ठेकों ने गीत की सुंदरता में चार चाँद लगाये। और इस ट्रेण्ड को हुस्नलाल भगतराम ने फिर अपनी आगे की फ़िल्मों में भी किया। तो आइए सुनते हैं यह गीत.



क्या आप जानते हैं...
कि अभिनेता धर्मेन्द्र सुरैया के ज़बरदस्त फ़ैन थे। वो उन दिनों मीलों का फ़ासला तय करके सुरैया की फ़िल्में देखने जाया करते थे। 'दिल्लगी' उन्होंने कुछ ४० बार देखी थी।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 06/शृंखला 09
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -बेहद आसान.

सवाल १ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - गीतकार कौन हैं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह एक बार फिर अमित जी और अंजाना जी एक साथ...प्रतिभा जी और किश संपत जी से बहुत दिनों बाद मुलाकात हुई स्वागत है....

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, December 20, 2010

हाथ सीने पे जो रख दो तो क़रार आ जाये....और धीरे धीरे प्रेम में गुजारिशों का दौर शुरू हुआ

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 552/2010/252

'एक मैं और एक तू' - फ़िल्म संगीत के सुनहरे दशकों से चुने हुए युगल गीतों से सजी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला की शुरुआत कल हमने की थी 'अछूत कन्या' फ़िल्म के उस युगल गीत से जो फ़िल्म संगीत इतिहास का पहला सुपरहिट युगल गीत रहा है। आज आइए इस शृंखला की दूसरी कड़ी में पाँव रखें ४० के दशक में। सन् १९४७ में देश के बंटवारे के बाद बहुत से कलाकार भारत से पाक़िस्तान चले गये, बहुत से कलाकार वहाँ से यहाँ आ गये, और बहुत से कलाकार अपने अपने जगहों पर कायम रहे। ए. आर. कारदार और महबूब ख़ान यहीं रह जाने वालों में से थे। लेकिन नूरजहाँ जैसी गायिका अभिनेत्री को जाना पड़ा। लेकिन जाते जाते १९४७ में वो दो फ़िल्में हमें ऐसी दे गईं जिनकी यादें आज धुंधली ज़रूर हुई हैं, लेकिन आज भी इनका ज़िक्र छिड़ते ही हमें ऐसा करार मिलता है कि जैसे किसी बहुत ही प्यारे और दिलअज़ीज़ ने अपना हाथ हमारे सीने पर रख दिया हो! शायद आप समझ रहे होंगे कि आज हम आपको कौन सा गाना सुनवाने जा रहे हैं। जी हाँ, नूरजहाँ और जी. एम. दुर्रानी की युगल आवाज़ों में १९४७ की फ़िल्म 'मिर्ज़ा साहिबाँ' का "हाथ सीने पे जो रख दो तो क़रार आ जाये, दिल के उजड़े हुए गुलशन में बहार आ जाये"। एक फ़िल्म 'मिर्ज़ा साहिबाँ' का ज़िक्र तो हमने किया, दूसरी फ़िल्म थी 'जुगनु'। ये दोनों ही फ़िल्में बेहद मक़बूल हुईं थी। 'मधुकर पिक्चर्स' के बैनर तले निर्मित और के. अमरनाथ निर्देशित 'मिर्ज़ा साहिबाँ' फ़िल्म में नूरजहाँ के नायक बने थे त्रिलोक कपूर। संगीतकार पंडित अमरनाथ की यह अंतिम फ़िल्म थी। उनकी असामयिक मृत्यु के बाद उन्हीं के संगीतकार भाइयों की जोड़ी हुस्नलाल और भगतराम ने इस फ़िल्म के गीतों को पूरा किया। अज़ीज़ कशमीरी और क़मर जलालाबादी ने इस फ़िल्म के गानें लिखे जो उस ज़माने में बेहद चर्चित हुए। ख़ास कर आज का प्रस्तुत गीत तो गली गली गूंजा करता था। इसी गायक-गायिका जोड़ी ने इस फ़िल्म में एक और युगल गीत भी गाया था, जिसके बोल थे "तुम आँखों से दूर हो, हुई नींद आँखों से दूर", हालाँकि यह एक ग़मज़दा डुएट था। नूरजहाँ के गाये एकल गीतों में शामिल थे "आजा तुझे अफ़साना जुदाई का सुनाएँ, जो दिल पे गुज़रती है वह आँखों से बतायें" और "क्या यही तेरा प्यार था, मुझको तो इंतज़ार था"। ज़ोहराबाई ने अपनी पंजाबी अंदाज़ में "सामने गली में मेरा घर है, पता मेरा भूल ना जाना" गाया जो चरित्र अभिनेत्री कुक्कू पर फ़िल्माया गया था। नूरजहाँ, शम्शाद बेग़म और ज़ोहराबाई ने भी दो अनूठे गीत गाये थे, "हाये रे उड उड़ जाये मोरा रेशमी दुपट्टा" और "रुत रंगीली आई चांदनी छायी चांद मेरे आजा"।

दोस्तों, नूरजहाँ की बातें तो हमने बहुत की है पहले भी, हाल में भी, और आगे भी करेंगे, क्यों ना आज दुर्रानी साहब की बातें की जाए। हम क्या बातें करेंगे उनकी, लीजिए उन्हीं से सुनिए उनकी दास्तान जो उन्होंने कहे थे अमीन सायानी साहब के एक इंटरव्यु में। "उस वक़्त प्लेबैक सिस्टेम नहीं था। ऐक्टर को ख़ुद ही गाना पड़ता था। बात यह हुई कि जब मैंने अपने आप को फ़िल्म के पर्दे पर हीरो हीरोइन और लड़कियों के आगे पीछे दौड़ते भागते देखा तो मुझे यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। और दो एक फ़िल्मों में काम करने के बाद मैंने फ़िल्मों में काम करने से मना कर दिया, भई हम काम नहीं करेंगे। मतलब यह हुआ कि काम ठुकराने का मतलब भूखों मरना हुआ। अब अपने साथ भी यही मामला हुआ। ख़ैर, मरता क्या ना करता! घर वापस लौटकर जा नहीं सकते, क्योंकि घरवाले बहुत ही पुराने ख़यालात के थे, और फिर नाचाकी भी थी, वो सब इस तरह के काम करने वालों को कंजर कहा करते थे, यानी कि कंजर, 'अरे यार, फ़लाने आदमी का लड़का कंजर हो गया, फ़िल्म-लाइन में काम करता है'। ख़ैर साहब, हम ऐक्टर तो नहीं बन सके, पर गाना हमें बहुत भाया। और हम किसी भी सूरत हाथ पैर मारकर बम्बई रेडियो स्टेशन में ड्रामा आर्टिस्ट की हैसियत से नौकर हो गये"। फिर इसके बाद रेडियो से प्लेबैक सिंगर कैसे बने जी. एम. दुर्रानी साहब, यह कहानी हम फिर किसी रोज़ आपको बताएँगे, आइए फ़िल्हाल सुनते हैं दुर्रानी साहब के साथ नूरजहाँ का गाया फ़िल्म 'मिर्ज़ा साहिबाँ' का यह युगल गीत। आगामी २३ दिसंबर को नूरजहाँ जी की पुण्यतिथि के अवसर पर यह 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की श्रद्धांजली भी है उनके नाम।



क्या आप जानते हैं...
कि जी. एम. दुर्रानी का पूरा नाम ग़ुलाम मुस्तफ़ा दुर्रानी था। १९३५ में ३० रुपय महीने पर सोहराब मोदी की कंपनी 'मिनर्वा' में उन्हें नौकरी मिल गई। उनका गाया हुआ पहला मशहूर गाना था "नींद हमारी ख़्वाब तुम्हारे" (नई कहानी, १९४३)।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 3/शृंखला 06
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -संगीतकार हैं नाशाद.

सवाल १ - किस किस की आवाजें हैं गीत में - १ अंक
सवाल २ - अजीत और गीता बाली पर फिल्माए इस गीत के गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह श्याम जी, कुछ मुश्किल थी कल की पहेली, पर आपके क्या कहने.....शरद जी और अमित जी भी सही जवाब लाये, इंदु जी और दादी की हजारी सलामत

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, September 15, 2010

न जाना न जाना मेरे बाबू दफ़्तर न जाना....सुनिए लता का शरारती अंदाज़ इस दुर्लभ गीत में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 484/2010/184

'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर इन दिनों आप सुन रहे हैं श्री अजय देशपाण्डेय जी के चुने हुए लता मंगेशकर के कुछ बेहद दुर्लभ गीतों पर केन्द्रित लघु शृंखला 'लता के दुर्लभ दस'। ये वो गानें हैं दोस्तों जिन्हें लता जी ने अपने पार्श्वगायन करीयर के शुरुआती सालों में गाया था। अभी तक हमने इस शृंखला में 'हीर रांझा' ('४८), 'मेरी कहानी' ('४८) और 'गर्ल्स स्कूल' ('४९) फ़िल्मों के गानें सुनें। आज हम क़दम रख रहे हैं साल १९५० में। आपको यह बता दें कि अगले पाँच अंकों तक हमारे क़दम जमे रहेंगे इसी साल १९५० में और एक के बाद एक हम सुनेंगे कुल पाँच दुर्लभ गीत जिन्हें लता जी ने अपनी कमसिन आवाज़ से सजाया था इस साल। आज के गीत में लता जी के जिस अंदाज़ का मज़ा आप लेंगे, वह है छेड़-छाड़ वाला अंदाज़। फ़िल्म 'छोटी भाभी' का यह गीत है "न जाना न जाना मेरे बाबू दफ़्तर न जाना"। फ़िल्मकार के बैनर तले निर्मित इस फ़िल्म के निर्देशक थे शांति कुमार। फ़िल्म में अभिनय किया करण दीवान, नरगिस, श्याम, कुलदीप कौर, गुलाब, श्यामा, सुरैया, याकूब और बेबी तबस्सुम ने। आपको याद दिलाना चाहेंगे कि इसके पिछले साल, १९४९ की मशहूर फ़िल्म 'लाहौर' में भी करण दीवान और नरगिस साथ में नज़र आए थे और जिस फ़िल्म में लता जी के गाए गानें काफ़ी मक़बूल हुए थे। कल पूछे गए पहेली के पहले प्रश्न में इसी फ़िल्म का उल्लेख था। ख़ैर, वापस आते हैं 'छोटी भाभी' पर। इस फ़िल्म में संगीत दिया था पंडित हुस्नलाल-भगतराम ने और गीत लिखे क़मर जलालाबादी नें। क़मर साहब और हुस्नलाल-भगतराम का उस दौर में अच्छी ट्युनिंग् जमी थी। 'प्यार की जीत' और 'बड़ी बहन' की कामयाबी के अलावा भी बहुत सारी फ़िल्मों में इन्होंने एक साथ काम किया था। साल १९५० में इस तिकड़ी ने 'मीना बज़ार', 'छोटी भाभी' और 'गौना' जैसी फ़िल्मों में गीत संगीत का पक्ष संभाला था।

दोस्तों, जब बात क़मर जलालाबादी और हुस्नलाल भगतराम की चल ही पड़ी है आज, तो क्यों ना अमीन सायानी को दिए क़मर साहब के उस इंटरव्यु पर झाँक कर देखें जिसमें क़मर साहब ने इस संगीतकार जोड़ी के बारे में अनमोल जानकारी दी थी।

अमीन सायानी: अच्छा क़मर भाई, अब हुस्नलाल-भगतराम के बारे में कुछ बताएँ।

क़मर जलालाबादी: पंडित हुस्नलाल भगतराम के साथ मैंने बहुत सी फ़िल्मों के गानें लिखे, जैसे 'चाँद', 'प्यार की जीत', 'बड़ी बहन', 'आदिल-ए-जहाँगिर', बहुत सी फ़िल्मों के गानें लिखे। इनको क्या आदत थी, दोनों भाइयों को, ये जब म्युज़िक पर बैठते थे तो पहले तो ख़ुद दो तीन लतीफ़े सुनाते थे, और ज़ोर ज़ोर से हँसते थे, दोनों। उसके बाद म्युज़िशियन्स से और शायर से दो तीन लतीफ़े सुनते थे, और ख़ूब ज़ोर ज़ोर से हँसते थे, दूर दूर तक उनके कहकहों की आवाज़ जाती थी। और उसके बाद कहते थे 'हाँ जी, बताइए क्या गाना लिखा है!'।

अमीन सायानी: अरे वाह!

क़मर जलालाबादी: ज़ाहिर है उस मूड में बड़े अच्छे गानें बन जाते थे।

अमीन सायानी: और क़मर भाई, जिन चार फ़िल्मों के नाम आपने लिए, उनमें तीन फ़िल्मों के गानें तो बेहद मक़बूल हुए, फ़िल्म 'चाँद' का मशहूर गाना "दो दिलों को ये दुनिया मिलने ही नहीं देती", और 'प्यार की जीत' का वह गीत "एक दिल के टूकड़े हज़ार हुए", जो कि मेरे ख़याल से मोहम्मद रफ़ी साहब के पहले पहले हिट गीतों में से एक था। अच्छा क़मर भाई, हुस्नलाल भगतराम दोनों भाई थे, बड़े ही ग़ज़ब के संगीतकार, लेकिन उनके बड़े भाई पंडित अमरनाथ भी बड़े महान संगीतकार रहे हैं, बड़ी प्यारी प्यारी तर्ज़ें उन्होंने दी। क्या आप ने अमरनाथ जी के लिए भी कोई गाना लिखा था?

क़मर जलालाबादी: जी हाँ, फ़िल्म 'मिर्ज़ा साहेबाँ' में मैंने गानें लिखे थे, नूरजहाँ ने गाए थे, जैसे "आजा अफ़साना जुदाई का सुनाएँ" वगेरह।

तो दोस्तों, लीजिए सुनिए क़मर जलालाबादी और हुस्नलाल भगतराम की तिकड़ी का यह भूला बिसरा हास्य रस और शरारती अंदाज़ वाला गाना लता जी की चंचल शोख़ आवाज़ में। अगर आप ने इस गीत को इससे पहले कभी सुना हो तो टिप्पणी या हमारे ईमेल पते पर ज़रूर लिखिएगा। नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि पंडित हुस्नलाल वायलिन के उस्ताद थे और उन्होंने यह फ़न पटियाला के उस्ताद बशीर ख़ाँ से सीखा था।

विशेष सूचना:

लता जी के जनमदिन के उपलक्ष्य पर इस शृंखला के अलावा २५ सितंबर शनिवार को 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ानें' में होगा लता मंगेशकर विशेष। इस लता विशेषांक में आप लता जी को दे सकते हैं जनमदिन की शुभकामनाएँ बस एक ईमेल के बहाने। लता जी के प्रति अपने उदगार, या उनके गाए आपके पसंदीदा १० गीत, या फिर उनके गाए किसी गीत से जुड़ी आपकी कोई ख़ास याद, या उनके लिए आपकी शुभकामनाएँ, इनमें से जो भी आप चाहें एक ईमेल में लिख कर हमें २० सितंबर से पहले oig@hindyugm.com के पते पर भेज दें। हमें आपके ईमेल का इंतज़ार रहेगा।


अजय देशपांडे जी ने लता जी के दुर्लभ गीतों को संगृहीत करने के उद्देश्य से एक वेब साईट का निर्माण किया है, जरूर देखिये यहाँ.

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. कल जो गीत बजेगा वह उस फ़िल्म का है जिस शीर्षक से 'एच.एम.वी सा रे गा मा' पुराने गानों की सीरीज़ निकालती रहती है। फ़िल्म का नाम बताएँ। १ अंक।
२. इस फ़िल्म के गीतकार वो हैं जिन्होंने १९४४ के उस ब्लॊकबस्टर फ़िल्म के भी गानें लिखे थे जिसका शीर्षक प्रस्तुत गीत के फ़िल्म के शीर्षक का दूसरा शब्द है। गीतकार बताएँ। ३ अंक।
३. संगीतकार वो हैं इस गीत के जिन्होंने १९४९ में लता और दो अन्य गायकों से अपने करीयर का सब से लोकप्रिय गीत गवाया था। संगीतकार बताएँ। ४ अंक।
४. गीत के मुखड़े में चाँद तारों का ज़िक्र है। पूरा मुखड़ा बताएँ। २ अंक।

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह क्या बात है, पवन जी को बहुत बधाई कई गलत जवाबों के बाद हमें सही जवाब मिला, और प्रतिभा जी भी एकदम सही रहीं...जी हाँ शरद जी, अवध जी अब लक्ष्य के बेहद करीब है, एक और सही जवाब देकर

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Friday, September 25, 2009

चाहे चोरी चोरी आओ चाहे चुप चुप आओ....सुनिए लता का ये दुर्लभ अंदाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 213

जारी है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर लता मंगेशकर के गाए हुए कुछ बेहद दुर्लभ और भूले बिसरे गीतों की एक बेहद ख़ास शृंखला 'मेरी आवाज़ ही पहचान है'। १९४७ और १९४८ की दो फ़िल्मों के गीत सुनने के बाद आज हम एक साल और आगे बढ़ते हैं, यानी कि १९४९ में। लता जी के संगीत सफ़र का शायद सब से महत्वपूर्ण साल रहा होगा यह। क्यों ना हो, 'महल', 'बरसात', 'बाज़ार', 'एक थी लड़की', 'लाहौर', और 'बड़ी बहन' जैसी फ़िल्मों में एक से एक सुपरहिट गीत गा कर लता जी एक दम से अग्रणी पार्श्व गायिका बन गईं। उनके इस तरह से छा जाने पर जैसे फ़िल्म संगीत की धारा ने एक नया मोड़ ले लिया हो! इन तमाम फ़िल्मों के संगीतकार थे खेमचंद प्रकाश, शंकर जयकिशन, विनोद, श्यामसुंदर, और हुस्नलाल भगतराम। १९४९ में फ़िल्म जगत की पहली संगीतकार जोड़ी हुस्नलाल भगतराम के संगीत से सज कर कुल १० फ़िल्में प्रदर्शित हुईं, जिनके नाम हैं - अमर कहानी, बड़ी बहन, बलम, बंसरिया, हमारी मंज़िल, जल तरंग, जन्नत, नाच, राखी, और सावन भादों। 'बड़ी बहन' में तो लता जी के गाए "चले जाना नहीं" और "चुप चुप खड़े हो ज़रूर कोई बात है" ने सफलता के कई झंडे गाढ़े, लेकिन फ़िल्म 'बंसरिया' का एक गीत ज़रा कम सुना सा रह गया। जिस गीत की हम बात कर रहे हैं, उसे भी कुछ कुछ "चुप चुप खड़े हो" के अंदाज़ में ही बनाया गया था, लेकिन इसे वह कामयाबी नहीं मिली जितना की उस गीत को मिली थी। फ़िल्म 'बंसरिया' का प्रस्तुत गीत है "चाहे चोरी चोरी आओ चाहे छुप छुप आओ, पर हमको पिया आज ज़रूर मिलना"। फ़िल्म 'बंसरिया' का निर्माण 'निगारिस्तान फ़िल्म्स' ने किया था, जिसे निर्देशित किया राम नारायण दवे और मुख्य भूमिकाओं में थे रणधीर और गीता बाली। फ़िल्म के गानें लिखे मुल्कराज भाकरी ने।

दोस्तों, आज का यह गीत सुनने से पहले आइए लता जी के बारे में कुछ ऐसे कलाकारों के उद्‍गार जान लेते हैं जो आज के इस दौर के कलाकार हैं। इस नई पीढ़ी के कलाकारों के दिलों में भी लता जी के लिए उतनी ही इज़्ज़त और सम्मान है जितने कि पिछले सभी पीढ़ियों के दिलों में हुआ करती है। ये तमाम बातें हम विविध भारती के अलग अलग 'जयमाला' और 'सरगम के सितारे' कार्यक्रमों से मिला-जुला कर प्रस्तुत कर रहे हैं।

प्रसून जोशी - मुझे याद है कि बचपन में एक प्रतियोगिता में मैने इस गीत को गाने की कोशिश की थी, लेकिन बीच में ही मैं बेसुरा हो गया और गा नहीं पाया। तब मुझे अहसास हुआ कि यह गीत कितना मुश्किल है और लता जी ने इसे कितनी आसानी से गाया है। यह गीत है "रसिक बलमा", बहुत सुंदर गीत है, बहुत सुंदर संगीत है, और इस गीत को सुनकर आप समझ सकते हैं कि लता जी लता जी क्यों है!!!

सोनू निगम - मुझे याद है वह १ अप्रैल १९९९ का दिन था, यानी कि 'अप्रैल फ़ूल्स डे'। लता जी पहले पहले गा रही थी ("ख़ामोशियाँ गुनगुनाने लगी"), और मुझे उनके ख़तम होने के बाद गाना था। वो गाने का अपना पोर्शन ख़तम कर जब बाहर आयीं तो मुझे कहने लगीं कि उन्होने मेरा 'सा रे गा मा पा' शो टी.वी पर देखा था जिसमें मैने तलत महमूद साहब का गाया एक गीत गाया था और वह उन्हे बहुत पसंद आया था। फिर उन्होने कहा कि वो मुझे सुनना चाहती हैं जब मैं अपना हिस्सा रिकार्ड करूँ। लेकिन उस दिन काफ़ी देर हो गई थी, इसलिए उन्हे निकलना पड़ा। उस दिन का एक्स्पेरियन्स मेरे लिए एक बहुत 'फ़ैन्टास्टिक एक्स्पेरियन्स' था।

श्रेया घोषाल - एक बार मैं किसी स्टुडियो में रिकार्डिंग कर रही थी, और वहाँ पर एक रिकार्डिस्ट को यह पता था कि मैं लता जी की बहुत बड़ी फ़ैन हूँ। नसीब से उस दिन लता जी भी उसी स्टुडियो में उपस्थित थीं। वो संगीतकार के साथ बैठी हुईं थीं। उस रिकार्डिस्ट ने मुझे कहा आ कर कि लता जी आई हुईं हैं, क्या मैं मिलना चाहूँगी? मैने कहा 'औफ़कोर्स'। फिर वो मुझे लता जी के पास ले गए। मैं कभी नहीं भूल सकती उस दिन को। लता जी के चेहरे पर एक नूर है। उनकी ऊंचाई ज़्यादा नहीं है लेकिन उनमें एक कमाल का व्यक्तित्व है। उनके सामने मैं गूँगी हो गई और एक शब्द मेरे मुँह से नहीं निकला। तब वो बोलीं 'श्रेया, मैने तुम्हारी एक इंटरव्यू देखा है, मैं माफ़ी चाहती हूँ लेकिन तुम्हारी बंगला प्रोनन्सिएशन अच्छा नहीं है।' मुझे इतनी ख़ुशी हुई यह सोच कर कि मुझ जैसी नई और छोटे सिंगर को उन्होने सुना है और मेरे बारे में इतना कुछ नोटिस भी किया है। वो महान हैं। फिर वहाँ बैठे संगीतकार ने मुझे कहा कि अभी अभी लता जी मेरी तारीफ़ कर रहीं थीं। यह सुनकर तो मैं सातवें आसमान पर उड़ने लगी। इससे ज़्यादा मैं क्या माँग सकती हूँ!

सुनिधि चौहान - लता जी तो भगवान हैं। तो उनके मुख से सिर्फ़ मेरा नाम निकलना ही बहुत बड़ी बात है। तो अगर वो मेरी तारीफ़ करती हैं तो इससे बड़ी बात मेरे लिए और कोई हो नहीं सकती। उनको तो मैं शुक्रिया अदा भी नहीं कर सकती। यही बोलूँगी कि अगर वो मुझे चाहती हैं तो बस उनका आशिर्वाद रहे और मैं अपनी तरफ़ से उनको निराश नहीं करूँगी। उनकी अगर उम्मीदें हैं मुझ से तो मैं ज़रूर कोशिश करूँगी। शुरु से ही उनके साथ एक अजीब सा रिश्ता रहा है, 'मेरी आवाज़ सुनो' के टाइम से, जब मैने ट्राफ़ी उनके हाथ से ली थी। कौम्पिटिशन में हिस्सा ही इसलिए लिया था कि एक दिन लता जी के दर्शन हो जाए। दिल्ली से थी तो मेरे लिए तो सपना सा था कि उनको छू के देखूँ कि वो कैसी दिखती हैं सामने से, और सोचा भी नहीं था कि जीतूँगी, बस यह कोशिश थी कि काफ़ी राउंड्स क्लीयर कर लूँ और मेगा फ़ाइनल तक पहुँच जाऊँ ताकि लता जी से मिल सकूँ। जीती तो ख़ुशी का कोई अंदाज़ा ही नहीं था, फिर उनका मुझे ट्राफ़ी देना, मेरे आँसू पोंछ कर मुझसे बोलना कि 'अगर तुमको किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो मैं हूँ'। मेरे लिए तो उससे बड़ा दिन ही नहीं था, सब से बड़ा ज़िंदगी का दिन वह था, और उसके बाद, वो सब हो जाने के बावजूद मेरी हिम्मत भी नहीं होती कि उनको फ़ोन करूँ, बात करूँ, तो दीदी से आज तक इतने सालों में मेरे ख़याल से ३ या ४ बार बात की होगी।

महालक्ष्मी अय्यर - अब मैं एक ऐसी गायिका का गाया गीत सुनाने जा रही हूँ जिनका गाना जितना सुरीला है उनकी बातें उससे भी मीठी। मेरे इस 'सिंगिंग लाइन' में आने का एक कारण भी वो ही हैं। जी हाँ, लता मंगेशकर जी। मैं हमेशा चाहती हूँ कि अगर लता जी के ५००० गानें हैं तो मेरा सिर्फ़ एक गाना उनके जैसा
हो।

तो दोस्तों, आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में लता जी के ज़िक्र के द्वारा हमने गुज़रे दौर और आज के दौर का संगम महसूस किया। यानी कि गुज़रे दौर के लता जी का गाया गीत बज रहा है और साथ में इस दौर के फ़नकारों के दिलों में लता जी के लिए प्यार और इज़्ज़त के चंद अंदाज़-ए-बयाँ आप ने पढ़े। कल कौन सा गीत बजने वाला है उसका आप अंदाज़ा लगाइए नीचे दिए गए पहेली के सुत्रों से, और अब मुझे आज के लिए इजाज़त दीजिए, नमस्कार!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. ३ अंकों की बढ़त पाने के लिए बूझिये लता का एक बेहद दर्द भरा नगमा.
२. पंडित गोविन्दराम और आई सी कपूर थे इस गीत में गीत-संगीत के जोडीदार.
३. मुखड़े की पहली पंक्ति में शब्द है -"आसमाँ"

पिछली पहेली का परिणाम -
लगता है बेहद मुश्किल पहेली थी कल वाली....चलिए कोई बात नहीं आज कोशिश कीजिये....शुभकामनाएँ

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, March 16, 2009

चुप चुप खड़े हो ज़रूर कोई बात है...पहली मुलाकात है जी...पहली मुलाकात है...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 24

दोस्तों, आज पहली बार 'ओल्ड इस गोल्ड' में हम एक ऐसे संगीतकार जोडी को याद कर रहे हैं जिनकी जोडी फिल्म संगीत की दुनिया की पहली संगीतकार जोडी रही है. और यह जोडी है हुस्नलाल और भगतराम की. साल 1949 हुस्नलाल भगतराम के संगीत सफ़र का एक महत्वपूर्ण साल रहा. इस साल उनके संगीत से सजी कुल 10 फिल्में आईं - अमर कहानी, बड़ी बहन, बालम, बाँसुरिया, हमारी मंज़िल, जल तरंग, जन्नत, नाच, राखी, और सावन भादों. इनमें से फेमस पिक्चर्स के 'बॅनर' तले बनी फिल्म बड़ी बहन ने जैसे पुर देश भर में हंगामा मचा दिया. इस फिल्म के गीत इतने ज़्यादा प्रसिद्ध हुए कि हर गली गली में गूंजने लगे, इनके चर्चे होने लगे. डी डी कश्यप द्वारा निर्देशित इस फिल्म में सुरैय्या और गीता बाली ने दो बहनों की भूमिका अदा की, और नायक बने रहमान. चाँद (1944), नरगिस (1946), मिर्ज़ा साहिबां (1947), और प्यार की जीत (1948) जैसी कामियाब फिल्मों के बाद गीतकार क़मर जलालाबादी और हुस्नलाल भगतराम की जोडी बड़ी बहन में एक साथ आए और एक बार फिर चारों तरफ छा गये. हुस्नलाल भगतराम का संगीत संयोजन इस फिल्म में कमाल का था. छाली और ठेकों का ऐसा निपूर्ण प्रयोग हुआ कि गाने जैसे लोगों की ज़ुबान पर ही थिरकने लगे.

सुरैय्या उस दौर की सबसे कामयाब और सबसे महंगी अदाकारा थी. इस फिल्म में उनका गाया "वो पास रहे या दूर रहे नज़रों में समाए रहते हैं" उनके सबसे लोकप्रिय गीतों में माना जाता है. लेकिन उस समय लता मंगेशकर एक उभरती हुई गायिका थी, जिन्होंने इस फिल्म में गीता बाली का पार्श्वगायन किया. "चले जाना नहीं नैना मिलाके" लताजी की आवाज़ में इस फिल्म का एक मशहूर गीत था जो गीता बाली पर फिल्माया गया था. लेकिन इसी फिल्म में लता मंगेशकर, प्रेमलता और साथियों की आवाज़ों में एक ऐसा गीत भी था जो ना तो गीता बाली पर फिल्माया गया और ना ही सुरैय्या पर. फिल्म की 'सिचुयेशन' ऐसी थी कि सुरैय्या रहमान से रूठी हुई थी. तभी गानेवाली लड़कियों की एक टोली वहाँ से गुज़रती है और यह गीत गाती हैं. पहले पहले प्यार की पहली पहली मुलाक़ात का यह अंदाज़-ए-बयान लोगों को खूब खूब पसंद आया और यह गीत बेहद मक़बूल हुया. लेकिन यह गीत क़मर जलालाबादी ने नहीं, बल्कि राजेंदर कृष्ण ने लिखा था. ऐसा कहा जाता है कि फिल्म के निर्माता इस गीत से इतने खुश हुए कि उन्होने राजेंदर कृष्ण साहब को एक ऑस्टिन गाडी भेंट में दे दी. तो आप भी इस गीत का आज आनंद उठाइये 'ओल्ड इस गोल्ड' में.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. लता मुकेश के स्वर.
२. राजेंद्र कृष्ण के बोल और मदन मोहन का संगीत.
३. स्थायी में पंक्ति है -"इसको भी कुछ मिला है...".

कुछ याद आया...?

पिछली पहली का परिणाम -
वाह वाह दिलीप जी, नीरज जी, और मनु जी ने एक बार फिर सही गीत पकडा है, बहुत बहुत बधाई. अनिल सेठ जी भी पहेली में रुचि लेने लगे हैं और बिलकुल ठीक जवाब दिया है।

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




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