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Tuesday, June 16, 2009

आता है तेरा नाम मेरे नाम से पहले..."निकाह" और "तलाक" के बीच उलझी एक फ़नकारा

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #२१

वैसे देखें तो पहेलियाँ महफ़िल-ए-गज़ल की पहचान बन गई हैं, और इन पहेलियों के कारण हीं हम और आप एक दूसरे से इस तरह जुड़ पाते हैं। लेकिन आज मैं "गज़ल से गुमशुदा शब्द पहचानो" वाली पहेली की बात नहीं कर रहा,बल्कि मैं उस पहेली की बात कर रहा हूँ, जो "फ़नकार" की शिनाख्त करने के लिए अमूमन पहले पैराग्राफ़ में पूछी जाती है|उसी पहेली को एक नए अंदाज में मैं अभी पेश करने जा रहा हूँ। पहेली पूछने से पहले यह बता दूँ कि हम आज जिनकी बात कर रहे हैं, वो एक "फ़नकारा" हैं,एक गज़ल गायिका और हिंदी फ़िल्मों से उनका गहरा ताल्लुक है। पहेली यह है कि नीचे दिए गए दो कथनों (उन्हीं के क़ोट्स) से उन फ़नकारा की शिनाख्त करें:

१.मैं जब नई-नई गायिका हुई थी तो बहुत सारे लोग मुझे मोहतरमा नूरजहाँ की बेटी समझते थे।हम दोनों ने हीं क्लासिकल म्युज़िक में तालीम ली हैं और ऐसी आवाज़ें बाकी की आवाज़ों से ज्यादा खुली हुई होती हैं। मेरी आवाज़ की पिच और क्वालिटी उनकी आवाज़ से बहुत ज्यादा मिलती है। शायद यही कारण है कि लोगों द्वारा हमारे बीच यह रिश्ता करार दिया गया था।

२. मेरी बेटी "ज़ाहरा" की म्युजिक एलबम कुछ हीं दिनों में रिलीज होने वाली है और उसे हिंदी फ़िल्मों में काम करने के कई सारे आफ़र भी मिले हैं। मेरी दादी अनवरी बेगम पारो, दादा रफ़ीक़ गज़नवी, अम्मी ज़रिना और खुद मेरा फ़िल्मों से गहरा नाता रहा है और मेरे लिए खुशी की बात है कि मेरी अगली पीढी भी इसी क्षेत्र में भविष्य आजमाने जा रही है।


तो ये रहे आपके लिए दो सुराग, बूझिये और हमें सुझाईये कि हम किनकी बात कर रहे हैं। वैसे आप ईमानदारी बरतेंगे ,इसका मुझे यकीन है, नहीं तो उन फ़नकारा के नाम की जानकारी इस आलेख के शीर्षक में हीं है।

बात तब की है, जब राज कपूर साहब अपने शहजादे "ऋषि कपूर" और "नीतू सिंह" की शादी के अवसर पर लंदन में एक रिसेप्शन की तैयारी कर रहे थे। इस रिसेप्शन में उन्होंने अपनी चचेरी बहन "ज़रिना" को भी न्योता दिया था। रिसेप्शन में कई सारे जानेमाने निर्देशकों की मंडली मौजूद थी, जिनमें "बी० आर० चोपड़ा" भी एक थे। संयोग की बात यह है कि चोपड़ा साहब ने कुछ हीं दिनों पहले "ज़ीनत अमान" को लेकर "इंसाफ़ की तराज़ू" पूरी की थी और अपनी अगली फ़िल्म के लिए उन्हें किसी मुसलमान नायिका की तलाश थी। यूँ तो "ज़ीनत" भी मुसलमान हीं हैं, लेकिन चोपड़ा साहब के अनुसार उनमें एक शहरीपन झलकता है,जिस कारण वो "नीलोफ़र" के किरदार में सही नहीं रहेंगी। उसी दौरान राज कपूर साहब भी "हिना" बनाने की जुगत में थे और उन्हें भी ऐसी हीं किसी मुसलमान नायिका की तलाश थी,जिन्हें वो "पाकिस्तान" का वाशिंदा दिखा सकें। तो उसी महफ़िल में बातों हीं बातों में राज साहब को अपनी बहन "ज़रिना" की बेटी के बारे में पता चला, जो न सिर्फ़ अच्छा गाती थी, बल्कि अच्छी दिखती भी थी। राज साहब ने अपने दिल की बात "ज़रिना" को बता दी। लेकिन "हिना" बनती , उससे पहले हीं राज साहब की नज़र "ज़ेबा बख्तियार" पर गई और उन्होंने "ज़ेबा" को अपने फ़िल्म के लिए साईन कर लिया। वैसे बदकिस्मती देखिए कि "राज" साहब "हिना" को अपने जीते-जी पूरा भी नहीं कर पाए और फिल्म की बागडोर "रणधीर कपूर" को संभालनी पड़ी। वैसे राज साहब और हिना की बातें आने से पहले हीं देव आनंद साहब ने इन फ़नकारा को लेकर फ़िल्म बनाने की योजना बना डाली थी,लेकिन जैसे हीं उन्हें यह पता चला कि इनकी माँ "ज़रिना" और "राज कपूर" भाई-बहन हैं और राज कपूर इन्हें लेकर "हिना" बनाने वाले हैं तो देव आनंद साहब पीछे हट गए। नियति का यह खेल देखिए कि "हिना" बनी लेकिन इन्हें लेकर नहीं। राज साहब जब इन्हें "हिना" में ले न सके तो उन्होंने "बी० आर० चोपड़ा" पर दवाब डालना शुरू कर दिया ताकि चोपड़ा साहब अपनी आने वाली फ़िल्म "तलाक तलाक तलाक" में इन्हें साईन कर लें। आखिरकार हुआ यही और फ़िल्म उद्योग को मिला एक नया चेहरा । इस फ़िल्म के रीलिज होने से पहले हीं इसके गाने खासे चर्चित हो गए। फ़िल्म अपने नाम के कारण समय पर रीलिज़ न हो सकी और इसके रीलिज की अनुमति तभी मिली जब इसका नाम बदलकर "निकाह" कर दिया गया। "निकाह" सुनने के बाद तो आपको पता चल हीं गया होगा कि हम किनकी बात कर रहे हैं।

"निकाह" बनने से पहले हीं "सलमा आग़ा" जी ने अपनी बहन "सबीना" के साथ मिलकर "एबीबीए एंड आग़ा" नाम से अपनी म्युज़िक एलबम रीलिज की थी। आपकी जानकारी के लिये यह बता दें कि "एबीबीए" एक स्वीडिश पौप म्युज़िक ग्रुप है, जो १९७८ में अपने वजूद में आया था। यूँ तो यह एक ग्रुप का नाम है,लेकिन यह ग्रुप इतना मकबूल हो गया कि आजकल इसे एक संगीत की एक विधा(ज़ौनर) के रूप में स्वीकार कर लिया गया है। "एबीबीए" की खासियत यह है कि इसमें सीधे-सादे बोल और लुभावने और लोकप्रिय संगीत तो होते हीं है,साथ हीं साथ अलग-अलग हार्मोनी में गायिकाओं की आवाज़ की ओवरडबिंग की जाती है,जिसे "वाल औफ़ साउंड" भी कहा जाता है। तो हाँ जब संगीतकारों ने उस एलबम में "सलमा आग़ा" की आवाज़ को सुना तो उन्होंने "निकाह" के गानों को उनसे हीं गवाने का फ़ैसला कर लिया। वैसे एक इंटरव्यू में "चोपड़ा" साहब ने कहा था कि उस फ़िल्म का सबस मशहूर गाना "दिल के अरमां" किसी और गायिका की आवाज़ में रिकार्ड होने वाला था। लेकिन इस बात से "आग़ा" बेहद नाराज़ हो गईं। उनका मानना था कि लोग इस बात को स्वीकार नहीं करेंगे कि मैं एक गायिका होकर भी अपने गाने को नहीं गा रही। आखिरकार "चोपड़ा" साहब को "आग़ा" की जिद्द के आगे झुकना पड़ा और आगे क्या हुआ यह कहने की कोई जरूरत नहीं है। "सलमा आग़ा" के बारे में और भी बहुत सारी बातें कहने की हैं,लेकिन आलेख की लंबाई इज़ाज़त नहीं दे रही,इसलिए बाकी बातें किसी अगले आलेख में। अब हम आज की गज़ल की ओर रूख करते हैं। "वीनस रिकार्ड्स एंड टेप्स" ने १९९८ में "हुस्न" नाम की एक एलबम रीलिज की थी, जिसमें कुल मिलाकर नौ गज़लें थी। संयोग देखिए कि आज की गज़ल को छोड़कर बाकी सारी गज़लों के गज़लगो के नाम की जानकारी मुझे मिल गई, बस यही गज़ल है,जिसे किसने लिखा है मुझे नहीं पता। हाँ संगीत किसका है, यह मुझे पता है। इस गज़ल में संगीत दिया है "बौबी एम०" ने।

तो चलिए हम और आप मिलकर आनंद लेते हैं इस गज़ल का।कहने की ज़रूरत नहीं है कि इस गज़ल में पाश्चात्य वाद्ययंत्रों का भरपूर प्रयोग हुआ है।वैसे जिसने भी बोल लिखे हैं,उसने बड़ा हीं उम्दा काम किया है। हाँ अगर आपको उस शायर की जानकारी है तो हमें इत्तेला ज़रूर कीजिएगा।:

क्या कुछ न कहा था दिल-ए-नाकाम से पहले,
वाकिफ़ थे मोहब्बत के हम अंजाम से पहले।

काटी हैं मोहब्बत में तो हर तरह की रातें,
दिल आज धड़कने लगा क्यों शाम से पहले।

अफ़साना किसी तरह मुकम्मल नहीं होता,
आता है तेरा नाम मेरे नाम से पहले।

नाकामि-ए-उल्फ़त हमें जीने नहीं देगी,
मरना भी नहीं है तेरे पैगाम से पहले।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

कहकहा ___ का बरताव बदल देता है,
हंसने वाले तुझे आंसू नज़र आये कैसे...

आपके विकल्प हैं -
a) चेहरे, b) बात, c) शख्स, d) आँख

इरशाद ....

पिछली महफ़िल के साथी-
पिछली महफिल का सही शब्द था -"लकीरों" और सही शेर कुछ यूं था -

मेरे इन हाथों की चाहो तो तलाशी ले लो,
मेरे इन हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं....

सबसे पहले सही जवाब दिया शरद तैलंग जी ने एक बार फिर साथ में अर्ज किया ये शेर भी -

हाथों की लकीरों का भी विश्वास क्य़ा करें
जो खुद उलझ रहीं हैं उनसे आस क्य़ा करें

वाह...
कुलदीप अंजुम जी ने फरमाया -

कहीं मुझसे जुदा न कर दे उसे कोई लकीर,
इस वजह से वो हाथ मेरा देखता न था..

क्या बात है...
सुमित जी भी कूद पड़े महफ़िल में -

जिन के हाथो मे लकीर नही होती,
जरूरी तो नही उनकी तकदीर नही होती ?

सही बात सुमित जी...
मंजू जी, शमिख फ़राज़ जी, मनु जी , तपन जी आप सभी का भी आभार, शोभा जी पीनाज़ की और भी ग़ज़लें आपको ज़रूर सुन्वएंगें, बने रहिये आवाज़ के साथ.

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर सोमवार और गुरूवार दो अनमोल रचनाओं के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Friday, January 2, 2009

कितना है दम नवम्बर के नम्बरदार गीतों में

अक्तूबर के अजयवीरों ने पहले चरण की समीक्षा का समर पार किया अब बारी है नवम्बर के नम्बरदार गीतों की. यहाँ हम आपके लिए, पहले और दूसरे समीक्षक, दोनों के फैसलों को एक साथ प्रस्तुत कर रहे हैं, तो जल्दी से जान लेते हैं कि नवम्बर के इन नम्बरदारों ने समीक्षकों को क्या कहने पर मजबूर किया है.

उडता परिन्दा

पहले समीक्षक -
सुदीप यशराज के ऒल इन वन प्रस्तुति का संगीत पक्ष बेहद श्रवणीय है. संगीत के अरेंजमेंट को भी कम वाद्यों की मदत से मनचाहा इफ़ेक्ट पैदा कर रहा है. प्रख्यात प्रयोगधर्मी संगीतकार एस एम करीम इसी तरह के स्वरों का केलिडियोस्कोप बनाया करते है.

लोरी से लगने वाले इस गाने के कोमल बोलों का लेखन भी उतना ही अच्छा हो नहीं पाया है, क्योंकि कई अलग अलग ख्यालात एक ही गीत में डाल दिये गये है. मगर यही तो एक फ़ेंटासी और मायावी स्वप्न नगरी का सपना देख रही नई पीढी़ का यथार्थ है.

यही बात गायक सुदीप के पक्ष में जाती है. थोडा कमज़ोर गायन ज़रूर है, जो बेहतर हो सकता था, क्योंकि गायक की रचनाधर्मिता तो बेहद मौलिक और वाद से परे है.

गीत - ४, धुन व् संगीत संयोजन - ३.५, आवाज़ व गायकी - ३.५, ओवारोल प्रस्तुति - ३.५. कुल १४.५ : ७.५ /१०.

दूसरे समीक्षक -

गीत का संगीत पक्ष बहुत अच्छा है, लेकिन वह तब जब केवल संगीत को ही सुना जाय, क्योंकि गीत के बोलों में जिस तरह के भावों को डाला गया है, उस तरह का न तो संगीत-संयोजन रहा और न ही गायन। दूसरे अंतरे में ठहराव भी आ गया है। लगता है जैसे कि प्रवाह में कोई अवरोध आ गया। मुकम्मल गीत तभी बनता है जब गीत, संगीत और गायन तीनों उम्दा हों। जबकि इस गाने के तीनों महत्वपूर्व पहियों पर सुदीप का ही बल रहा था, इसलिए उनकी जिम्मेदारी ज्यादा थी। और मैं समझता हूँ कि इसे वो बेहतर कर भी सकते थे, क्योंकि भाव उनके थे, बोल उनके थी, आवाज़ उनकी थी, संगीत उनका था। फिर भी मैं इस प्रयास को १० में से ६ अंक दूँगा। ६/१०

कुल अंक (पहली और दूसरी समीक्षा को मिलकर) - १३.५ / २०.

ये हुस्न है क्या

पहले समीक्षक -
एक और सुरीली प्रस्तुति,जिसके धुन में,इन्टरल्य़ुड में काफ़ी प्रभावित करने वाले प्रयोग है. चैतन्य भट्ट की सुरों पर की पकड ज़बरदस्त लगती है. साथ ही उनके ग्रुप के अन्य वादक कलाकारों का आपसी सामंजस्य और आधुनिक हार्मोनी के साथ ही मेलोडी के मींड भरी लयकारी इसे बार बार सुनने की चाह्त पैदा करता है. रहमान के सुर और वाद्य संयोजन के काफ़ी करीब ले जाते इस संगीत रचना की तारीफ़ करने के किये शब्द नहीं.

संजय द्विवेदी के लिखे हुए शब्द भी ज़ज़बात से भरे हुए, युवा विद्रोही मन की उथल पुथल, खलबली कलम के ज़रिये दर्शाता है.शब्दों में मौलिकता भी कहीं कहीं दाद देने के लिये ललचा जाती है.

कृष्णा पंडित और साथियों के तराशे हुए गायन और सामंजस्य गीत को उचाईंयां प्रदान करता है.व्यवस्था के प्रति आक्रोश , युवा जोश और आसपास की समस्याओं के प्रति जागरूकता गीत के बोलों और धुन के माध्यम से, कहीं अधिक समूह गीत गायन के माध्यम से मेनिफ़ेस्ट करने में यह टीम पूर्ण रूप से सफ़ल मानी जा सकती है. कृष्णा पंडित गले से नहीं दिमाग़ से गाते हैं, इसलिये ये काम भी आसानी से पूरा हो जाता है.

गीत - ४, धुन व् संगीत संयोजन - ४, आवाज़ व गायकी - ४, ओवारोल प्रस्तुति -४. कुल १६ : ८ /१०

दूसरे समीक्षक -
इस महीने के इस गीत का संगीत पक्ष अच्छा है, लेकिन ७ मिनट ४१ सेकेण्ड के गीत में हर जगह एक तरह का ट्रीटमेंट है, इसलिए अलग-अलग अंतरे में एक से लगते हैं। हालांकि गीत के संगीत की अरेंज़िंग लाजवाब है, लेकिन हर जगह अपना रिपिटीशन दर्ज करा रही है। इसलिए बोल के अच्छे होने के बावजूद गीत बहुत अधिक प्रभाव नहीं छोड़ता। कहने का मतलब यह है कि यह गीत कहीं से ऐसा नहीं है, जिसे बारम्बार सुनने का मन करे। समूह गायन अपनी ओर आकर्षित ज़रूर करता है लेकिन फिर भी संगीतकार को अधिक मेहनत करनी होगी। मैं इस गीत को १० में से ८ अंक दूँगा. ८/१०

कुल अंक (पहली और दूसरी समीक्षा को मिलकर) - १६ / २०.

माहिया

पहले समीक्षक -
सीमा पार सी आये हमारे मुअज़्ज़ज़ मेहमानों नें ये जो प्रस्तुति दी है, उन्हे और आवाज़ को पहले बधाई !!
पाकिस्तान के आवारा बैंड़ नें इस सोफ़्ट रॊक गीत को ईमानदारी से गढा गया सुनाई देता है.गायकों के सुरों के समन्वय में भी सफ़ल हुई है इस गीत के सभी वादकों द्वारा बजाये गये हर वाद्य का अपना योगदान है- लीड़ गिटारिस्ट मोहम्मद वलीद मुस्तफ़ा (और गीत के मुख्य गायक भी),रिदम गिटारिस्ट अफ़ान कुरैशी,और ड्रमर वकास कादिर बालुच नें मेलोडी और पाश्चात्य शास्त्रीयता को अच्छे ढंग से फ़्युज़न किया है इस गीत में.

सुरीले गायक मंडली नें कहीं कहीं हार्मोनी को बेहद सुरीले अंदाज़ में गीत में पिरोया है, जो पूरी प्रस्तुति में एकाकार हो जाती है. इनकी आवाज़ में एक कशिश ज़रूर है.लीड़ गिटारिस्ट नें अपनी मौजूदगी से और कशिश बढा दी है.

पूरी धुन में हार्मोनी और कॊर्ड्स का प्रयोग प्रख्यात संगीतकार सलिल चौधरी की याद दिलाते है. इस समूह के उज्वल भविष्य की कामना करता हूं.

गीत - ४, धुन व् संगीत संयोजन - ४, आवाज़ व गायकी - ४, ओवारोल प्रस्तुति - ४. कुल १६ : ८ /१०

दूसरे समीक्षक
पहले तो इस बात का स्वागत कि हिन्द-युग्म पर अब पाकिस्तान से भी संगीतप्रेमी पधारने लगे हैं। इस गीत के संगीत, बोल और गायन में से किसी में भी ताजगी नहीं है। मिक्सिंग भी बहुत बढ़िया नहीं है। कम से कम लिरिक्स के स्तर पर भी इसमें नयापन होता तो यह सराहनीय गीत बन पड़ता। लेकिन यह ज़रूर कहा जा सकता है कि गायक में बहुत संभावनाएँ हैं, उसे कुछ बिलकुल ओरिजनल कम्पोजिशन पर गाकर खुद को परखना चाहिए। इसे मैं ४ अंक देना चाहूँगा। ४/ १०.

कुल अंक (पहली और दूसरी समीक्षा को मिलकर) - १२ / २०.

तू रुबरू:

पहले समीक्षक -
सजीव सारथी जी द्वारा गीत लिखा अच्छा गया है किंतु इस गीत की धुन में मधुरता या मेलोडी कम है. गीतकार की मेहनत,मौलिकता और शब्दों के सटीक चयन की वजह से इस गीत का साहित्यिक पक्ष बेहद सशक्त है.
जैसा कि प्रतीत हो रहा है, ये गीत पहले लिखा गया होगा और धुन बाद में बनी है. इसी वजह से धुन का संयोजन एक एब्स्त्रेक्ट पेंटिंग की तरह प्रस्तुत हो पाया है, जिसमें वेरिएशन और कॊर्डस का प्रयोग सीमित किया गया है, जो प्रभावित करने में कमज़ोर रहा है. अगर ये वही ऋषि है, जिन्होनें ऐसा नही के आज मुझे का कर्णप्रिय संगीत दिया है, तो ज़रूर कहूंगा कि इस गीत के संगीत को बड़ी ही ज़ल्दबाज़ी में मुकम्मल किया गया है, और श्रोता अपने आपको जब तक गाने के स्वरों से अपने आपको जोड़ पायेगा, तब तक गीत खत्म ही हो जाता है, एक अधूरेपन के एहसास को मन में छोडते हुए.
हालांकि विश्वजीत अच्चे गायक है,जो ओ साहिबा में साबित भी हो जाती है. मगर इस गीत में उनके गायन में मोनोटोनी सी लगती है, जो अधिकतर धुन की एकरसता की वजह से और बढ़ कर दुगनी हो जाती है. गायकी के स्वरों पर ठहराव भी नियंत्रित नहीं लगता.कहीं जल्दबाज़ी का भी गुमां सा होने लगता है.

गीत - ३.५, धुन व् संगीत संयोजन - ३.५, आवाज़ व गायकी - ३.५, ओवारोल प्रस्तुति - ३.५. कुल १४ : ७ /१०

दूसरे समीक्षक -
इस गीत के बोल बहुत बढ़िया हैं। ऋषि के संगीत में हमेशा की तरह ताज़गी है। बिस्वजीत दूर के सवार नज़र आते हैं। मुझे लगता है कि गीत की अधिक सराहना करने की बजाय मैं इसे १० में से ८॰५ अंक देकर अपनी भावनाएँ प्रदर्शित करना चाहूँगा। ८.५ /१०.

कुल अंक (पहली और दूसरी समीक्षा को मिलकर) - १५.५ / २०.

Friday, November 14, 2008

वो बुतखाना, ये मयखाना सब धोखा है...

भोपाल शहर की एक अलसाई सी दोपहर, एक सूनी गली का आखिरी मकान जहाँ जमा हैं "मार्तण्डया" संगीत समूह के सभी संगीत सदस्य. फिज़ा में विरक्ति के स्वर हैं, जैसे सब देखा जा चुका है, अनुभव किया जा चुका है महसूस किया जा चुका है हुस्न और इश्क जैसी सब बातों का खोखलापन, अब कहाँ दिल लगायें. मन बैरागी चाहता है कि कहीं दूर जंगल में डेरा डाला जाए और दरवेशों में बसर किया जाए. कुछ ऐसे ही भाव लिए है वर्तमान सत्र का ये २० वां गीत. संजय द्विवेदी ने लिखा है इसे और स्वरबद्ध किया है चेतैन्य भट्ट और कृष्णा पंडित ने. आवाजें हैं कृष्णा पंडित, रुद्र प्रताप और अभिषेक की. टीम के गिटारिस्ट हैं सागर और रिदम संभाला है हेमंत ने. सुनते हैं इस उभरते हुए जबरदस्त सूफी संगीत समूह का ये नया दमदार गीत. अपनी बेशकीमती राय देकर इन नए संगीत योद्धाओं का मार्गदर्शन अवश्य करें.

गीत को सुनने के लिए नीचे के प्लेयर पर क्लिक करें -



After the success of their first song "sooraj chand aur sitare" with us, this new upcoming sufi band from bhopal "martandya" is back again, with a completely different flavored song - "husn". under the guidance of Krishana Pandit and Chaitanya Bhatt, Rudra Pratap and Abhishek done the vocals. supported by Hemant and Sagar, this song has again penned by Sanjay Dwivedi. if you like the song do spare a few minutes to encourage/ guide these young talented musicians.

To listen to this brand new song, please click on the player.




Lyrics - गीत के बोल

ये हुस्न है क्या, ये इश्क है क्या,
सब धोखा है, सब धोखा है,
ये चाँदनी शब्, ये ठंडी हवा,
सब धोखा है, सब धोखा है...

वो कैस की लैला धोखा थी,
वो हीर का राँझा धोखा था,
ये ताज महल, ये लाल किला,
सब धोखा है, सब धोखा है ....

वहां शेख ठगी में माहिर है,
यहाँ साकी चालें चलता है,
वो बुतखाना, ये मयखाना,
सब धोखा है, सब धोखा है ...

अब दरवेशों में काट उमर,
यहाँ दौलत शोहरत छोड़ भी आ,
क्या फरक हुआ, जब जान लिया,
सब धोखा है, सब धोखा है ...

दूसरे सत्र के २० वें गीत का विश्वव्यापी उदघाटन आज

SONG # 20, SEASON # 02, "HUSN", OPENED ON AWAAZ ON 14/11/2008.
Music @ Hind Yugm, Where music is a passion.


The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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