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Friday, September 17, 2010

भर के गागर कलियों से, ज्यों ढलके हों मोगरे....ब्रिज भाषा की मिठास और क्लास्सिकल पाश्चात्य संगीत का माधुर्य जब मिले

Season 3 of new Music, Song # 20

दोस्तों आज का हमारा नया गीत एकदम खास है, क्योंकि इसमें पहली बार ब्रिज भाषा की मिठास घुल रही है. नए प्रयोगों के लिए जाने जाने वाले हमारे इन हॉउस गीतकार विश्व दीपक लाए है एक बहुत मधुर गीत जिसे एक बेहद मीठी सी धुन देकर संवारा है सतीश वम्मी ने जो इससे पहले इसी सत्र में "जीनत" देकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर चुके हैं. गायिका हैं "बुलबुला" में जिंदगी का फलसफा देने वाली आवाज़ की शान गायिका ह्रिचा देबराज नील मुखर्जी. तो दोस्तों अब और अधिक भूमिका में आपको न उलझाते हुए सीधे गीत की तरफ़ बढते हैं. ऑंखें मूँद के सुनिए और खो जाईये, इस ताज़ा तरीन गीत की रुमानियत में....और हाँ हमारे युवा संगीतकार सतीश जी को विवाह की बधाईयां भी अवश्य दीजियेगा, क्योंकि कहीं न कहीं उनके जीवन में आये इस नए प्रेम का भी तो योगदान है इस गीत में. हैं न ?

गीत के बोल -


ढाई आखर अंखियों से
जब झलके हैं तो मोहे
मिल जावे चैना.... मोरे सांवरे!!

भर के गागर कलियों से
ज्यों ढलके हों मोगरे
बिछ जावें भौंरे..... होके बावरे!!

तोसे पुछूँ
तू नैनन से
यूँ पल-पल छल कर... लूटे है मोहे..
कि पक्की है... ये प्रीत रे!!!

ढाई आखर अंखियों से
जब झलके हैं तो मोहे
मिल जावे चैना.... मोरे सांवरे!!

भर के गागर कलियों से
ज्यों ढलके हों मोगरे
बिछ जावें भौंरे..... होके बावरे!!

काहे तू
हौले-हौले
कनखियों से खोले है घूँघट मोरी लाज-शरम के..

अब ना संभले मोसे,
सजना बीरहा तोसे,
धर ले सीने में तू,
मोहे टुकड़े कर के.....

ढाई आखर अंखियों से
जब झलके हैं तो मोहे
मिल जावे चैना.... मोरे सांवरे!!

भर के गागर कलियों से
ज्यों ढलके हों मोगरे
बिछ जावें भौंरे..... होके बावरे!!




मेकिंग ऑफ़ "ढाई आखर" - गीत की टीम द्वारा

सतीश वम्मी: "ढाई आखर" हिन्द-युग्म पर मेरा दूसरा गाना है और ह्रिचा देबराज के साथ पहला। ह्रिचा के बारे में मुझे जानकारी मुज़िबु से हासिल हुई थी। उनके साथ काम करने का मेरा अनुभव बड़ा हीं सुखद रहा। सच कहूँ तो अंतर्जाल के माध्यम से किसी गाने पर काम करना आसान नहीं होता क्योंकि उसमें आप खुलकर यह बता नहीं पाते कि आपको गीतकार या गायक/गायिका से कैसी अपेक्षाएँ हैं, लेकिन ह्रिचा के साथ बात कुछ अलग थी। उन्हें जैसे पहले से पता था कि गाना कैसा बनना है और इस कारण मेरा काम आसान हो गया। ह्रिचा ने गाने में एक नई जान डाल दी और इसके लिए मैं उनका शुक्रगुजार हूँ। विश्व भाई तो मेरे लिए फुल-टाईम गीतकार हो चुके हैं.. उनके साथ पहले "ज़ीनत" आई और अब "ढाई आखर"। अभी भी इनके लिखे ४ गाने मेरे पास पड़े हैं, जिन्हें मैं जल्द हीं खत्म करने की उम्मीद करता हूँ। "ढाई आखर" दर-असल एक मेल-सॉंग (निगाहें, जिसे बाद में "झीनी झालर" नाम दिया गया) होना था, लेकिन हमें लगा कि इस धुन पर फीमेल आवाज़ ज्यादा सुट करेगी। ऐसे में नए बोलों के साथ यह गाना "ढाई आखर" बन गया। बोल और धुन तैयार हो जाने के बाद मैंने ह्रिचा से बात की और अच्छी बात यह है कि उन्होंने पल में हीं हामी भर दी। अब चूँकि मैं कोई गायक नहीं, इसलिए डेमो तैयार करना मेरे लिए संभव न था। मैंने ह्रिचा के पास धुन और बोल भेजकर उनसे खुद हीं धुन पर बोल बैठाने का आग्रह किया। मेरी खुशी का ठिकाना तब न रहा जब मैंने ह्रिचा की आवाज़ में पहला ड्राफ्ट सुना। मुझे वह ड्राफ़्ट इतना पसंद आया कि अभी फाईनल प्रोडक्ट में भी मैने पहले ड्राफ्ट का हीं मुखरा हू-ब-हू रखा है। हाँ, अंतरा में बदलाव हुए क्योंकि हमें कई सारे हार्मोनिज़ एवं लेयर्स के साथ प्रयोग करने पड़े थे। अभी आप जो गीत सुन रहे हैं, उसमें एक हीं लिरिक़्स को छह अलग-अलग वोकल ट्रैक्स पर अलग-अलग धुनों पर गाया गया है। इस गाने की धुन रचने में मुझे ५ मिनट से भी कम का समय लगा था... मुझे उस वक़्त जो भी ध्यान में आया, मैंने उसे गाने का हिस्सा बना डाला। इससे मेरा काम तो आसान हो गया, लेकिन विश्व के लिए मुश्किलें बढ गईं। कई जगहॊं पर धुन ऐसी थी, जहाँ शब्द सही से नहीं समा रहे थे और मैं धुन बदलने को राज़ी नहीं था। हालांकि, विश्व ने मुझे बाद में बताया कि ऐसी स्थिति से उनका हीं फायदा होता है क्योंकि उन्हें नई सोच और नए शब्द ढूँढने होते हैं। गाना बनकर तैयार होने में ४-५ महिनों का वक़्त लग गया और इसमें सारा दोष मेरा है, क्योंकि मैं कुछ व्यक्तिगत मामलों में उलझ गया था। दर-असल, इसी बीच मेरी शादी हुई थी :) शुक्रिया.. बधाईयों के लिए शुक्रिया। यह गाना हमारा संयुक्त प्रयास है और हमने यथासंभव इसमें रूह डालने की कोशिश की है। आशा करता हूँ कि आपको हमारी यह छोटी पेशकश पसंद आएगी। आपकी टिप्पणियों का इंतज़ार रहेगा।

ह्रिचा देबराज नील मुखर्जी: गीत "ढाई आखर अंखियों से" बड़ा हीं प्रयोगात्मक गीत है.. शुरूआत में यह नज़्म सतीश की कल्पना-मात्र थी। उन्होंने ऐसे हीं पियानो पर एक टीज़र बना कर मुझे यह धुन भेजी और मुझे इस गीत में हिस्सा बनने के लिए पूछा, जिसके लिए मैने तुरंत हामी भर दी। लेकिन कहीं मैं इस सोच में थी कि यह धुन गीत से अधिक एक अच्छी खासी थीम म्युज़िक साउंड कर रही है, क्या इसकी रचना ठीक ढंग से हो भी पाएगी या नहीं.. इस के लिए विश्व जी की जितनी तारीफ़ की जाए कम है क्योंकि जिस तरह से सतीश ने इस गीत में पाश्चात्य बैले संगीत और कर्नाटिक अंग के साथ प्रयोग किया है उसी तरह विश्व जी ने शुद्ध हिन्दी के शब्दों में गीत के बोलों की रचना कर इसे और खूबसूरत बनाने में अपना सफल योगदान दिया है। आशा करती हूँ कि यह गीत सभी को पसंद आएगा।

विश्व दीपक: इस गीत के पीछे के कहानी बताते वक़्त सतीश जी ने "निगाहें" और "झीनी झालर" का ज़िक्र किया, लेकिन वो उससे भी पहले की एक चीज बताना भूल गए। जैसा कि ह्रिचा ने कहा कि यह धुन वास्तव में एक थीम म्युज़िक या इन्स्ट्रुमेन्टल जैसी प्रतीत हो रही थी तो असलियत भी यही है। लगभग चार महिने पहले सतीश जी ने इसे "क्लोज़ योर आईज़" नाम से मुज़िबु पर पोस्ट किया था और श्रोताओं की राय जाननी चाही थी कि क्या इसे गाने के रूप में विस्तार दिया जा सकता है। फिर मेरी सतीश जी से बात हुई और हमने यह निर्णय लिया कि इसे एक मेल सॉंग बनाते हैं। मेल सॉंग बनकर तैयार भी हो गया, लेकिन गायक की गैर-मौजूदगी के कारण इस गाने को पेंडिंग में डालना पड़ा। दर-असल सतीश जी चाहते थे कि यह गाना जॉर्ज गाएँ, लेकिन उसी दौरान जॉर्ज की कुछ जाती दिक्कतें निकल आईं, जिस कारण वे दो-तीन महिनों तक गायन से दूर हीं रहें। हमें लगने लगा था कि यह गीत अब बन नहीं पाएगा, लेकिन हम इस धुन को गंवाना नहीं चाहते थे। तभी सतीश जी ने यह सुझाया कि क्यों न इसे किसी गायिका से गवाया जाए, लेकिन उसके लिए बोलों में बदलाव जरूरी था। अमूमन मैं एक धुन पर एक से ज्यादा बार लिखना पसंद नहीं करता, क्योंकि उसमें आप न चाहते हुए भी कई सारे शब्द या पंक्तियाँ दुहरा देते हैं, जिससे उस गीत में नयापन जाता रहता है। लेकिन यहाँ कोई और उपाय न होने के कारण मुझे फिर से कलम उठानी पड़ी। कलम उठ गई तो कुछ अलग लिखने की जिद्द भी साथ आ गई और देखते-देखते मैने अपनी सबसे प्रिय भाषा "ब्रिज भाषा" (इसमें कितना सफल हुआ हूँ.. पता नहीं, लेकिन कोशिश यही थी कि उर्दू के शब्द न आएँ और जितना हो सके उतना ब्रिज भाषा के करीब रहूँ) में "ढाई आखर" लिख डाला। कहते हैं कि गीत तब तक मुकम्मल नहीं होता जब तक उसे आवाज़ की खनक नहीं पहनाई जाती, इसलिए मैं तो इतना हीं कहूँगा कि सतीश जी और मैने "ढाई आखर" के शरीर का निर्माण किया था, इसमें रूह तो ह्रिचा जी ने डाली है। कुहू जी के बाद मैं इनकी भी आवाज़ का मुरीद हो चुका हूँ। उम्मीद करता हूँ कि ह्रिचा जी की आवाज़ में आपको यह गीत पसंद आएगा।

सतीश वम्मी
सतीश वम्मी मूलत: विशाखापत्तनम से हैं और इन दिनों कैलिफ़ोर्निया में रहते हैं। बिजनेस एवं बायोसाइंस से ड्युअल मास्टर्स करने के लिए इनका अमेरिका जाना हुआ। 2008 में डिग्री हासिल करने के बाद से ये एक बहुराष्ट्रीय बायोटेक कम्पनी में काम कर रहे हैं। ये अपना परिचय एक संगीतकार के रूप में देना ज्यादा पसंद करते हैं लेकिन इनका मानना है कि अभी इन्होंने संगीत के सफ़र की शुरूआत हीं की है.. अभी बहुत आगे जाना है। शुरू-शुरू में संगीत इनके लिए एक शौक-मात्र था, जो धीरे-धीरे इनकी ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा बनता जा रहा है। इन्होंने अपनी पढाई के दिनों में कई सारे गाने बनाए जो मुख्यत: अंग्रेजी या फिर तेलगु में थे। कई दिनों से ये हिन्दी में किसी गाने की रचना करना चाहते थे, जो अंतत: "ज़ीनत" के रूप में हम सबों के सामने है। सतीश की हमेशा यही कोशिश रहती है कि इनके गाने न सिर्फ़ औरों से बल्कि इनके पिछले गानों से भी अलहदा हों और इस प्रयास में वो अमूमन सफ़ल हीं होते हैं। इनके लिए किसी गीत की रचना करना एक नई दुनिया की खोज करने जैसा है, जिसमें आपको यह न पता हो कि अंत में हमें क्या हासिल होने वाला है, लेकिन रास्ते का अनुभव अद्भुत होता है।

ह्रिचा देबराज नील मुखर्जी
२००२ में ह्रिचा लगातार ७ बार जी के सारेगामापा कार्यक्रम में विजेता रही है, जो अब तक भी किसी भी महिला प्रतिभागी की तरफ़ से एक रिकॉर्ड है. स्वर्गीय मास्टर मदन की याद में संगम कला ग्रुप द्वारा आयोजित हीरो होंडा नेशनल टेलंट हंट में ह्रिचा विजेता रही. और भी ढेरों प्रतियोगिताओं में प्रथम रही ह्रिचा ने सहारा इंडिया के अन्तराष्ट्रीय आयोजन "भारती" में ३ सालों तक परफोर्म किया और देश विदेश में ढेरों शोस् किये. फ़्रांस, जर्मनी, पोलेंड, बेल्जियम, इस्राईल जैसे अनेक देशों में बहुत से अन्तराष्ट्रीय कलाकारों के साथ एक मंच पर कार्यक्रम देने का सौभाग्य इन्हें मिला और साथ ही बहुत से यूरोपियन टीवी कार्यक्रमों में भी शिरकत की. अनेकों रेडियो, टी वी धारावाहिकों, लोक अल्बम्स, और जिंगल्स में अपनी आवाज़ दे चुकी ह्रिचा, बौलीवुड की क्रोस ओवर फिल्म "भैरवी" और बहुत सी राजस्थानी फ़िल्में जैसे "दादोसा क्यों परणाई", "ताबीज", "मारी तीतरी" जैसी फिल्मों में पार्श्वगायन कर चुकी हैं.

विश्व दीपक
विश्व दीपक हिन्द-युग्म की शुरूआत से ही हिन्द-युग्म से जुड़े हैं। आई आई टी, खड़गपुर से कम्प्यूटर साइंस में बी॰टेक॰ विश्व दीपक इन दिनों पुणे स्थित एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। अपनी विशेष कहन शैली के लिए हिन्द-युग्म के कविताप्रेमियों के बीच लोकप्रिय विश्व दीपक आवाज़ का चर्चित स्तम्भ 'महफिल-ए-ग़ज़ल' के स्तम्भकार हैं। विश्व दीपक ने दूसरे संगीतबद्ध सत्र में दो गीतों की रचना की। इसके अलावा दुनिया भर की माँओं के लिए एक गीत को लिखा जो काफी पसंद किया गया।
Song - Dhaayi Aakhar
Vocals - Hricha Debraj
Music - Satish Vammi
Lyrics - Vishwa Deepak "Tanha"
Graphics - Prashen's media


Song # 19, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

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Friday, June 11, 2010

जीवन एक बुलबुला है, मानते हैं बालमुरली बालू, ह्रिचा मुखर्जी और सजीव सारथी

Season 3 of new Music, Song # 09

तीसरे सत्र के नौवें गीत के साथ हम हाज़िर हैं एक बार फिर. सजीव सारथी की कलम का एक नया रंग है इसमें, तो इसी गीत के माध्यम से आज युग्म परिवार से जुड रहे हैं दो नए फनकार. अमेरिका में बसे संगीतकार बालामुरली बालू और अपने गायन से दुनिया भर में नाम कमा चुकी ह्रिचा हैं ये दो मेहमान. वैश्विक इंटरनेटिया जुगलबंदी से बने इस गीत में जीवन के प्रति एक सकारात्मक रुख रखने की बात की गयी है, लेकिन एक अलग अंदाज़ में.

गीत के बोल -


रोको न दिल को,
उड़ने दो खुल के तुम,
जी लो इस पल को,
खुश होके आज तुम,
कोशिश है तेरे हाथों में मेरे यार,
हंसके अपना ले हो जीत या हार,
बुलबुला है बुलबुला / दो पल का है ये सिलसिला/
तू मुस्कुरा गम को भुला अब यार,
सिम सिम खुला / हर दर मिला, होता कहाँ ऐसा भला /
तो क्यों करे कोई गिला मेरे यार,

सपनें जो देखते हों तो,
सच होंगें ये यकीं रखो,
just keep on going on and on,
एक दिन जो था बुरा तो क्या,
आएगा कल भी दिन नया,
don't think that u r all alone,
कोई रहबर की तुझको है क्यों तलाश,
जब वो खुदा है हर पल को तेरे पास,
कुछ तो है तुझमें बात ख़ास,
बुलबुला है बुलबुला / दो पल का है ये सिलसिला/
तू मुस्कुरा गम को भुला अब यार,
सिम सिम खुला / हर दर मिला, होता कहाँ ऐसा भला /
तो क्यों करे कोई गिला मेरे यार,

रोको न दिल को,
उड़ने दो खुल के तुम,
जी लो इस पल को,
खुश होके आज तुम,
कोशिश है तेरे हाथों में मेरे यार,
हंसके अपना ले हो जीत या हार,
बुलबुला है बुलबुला / दो पल का है ये सिलसिला/
तू मुस्कुरा गम को भुला अब यार,
सिम सिम खुला / हर दर मिला, होता कहाँ ऐसा भला /
तो क्यों करे कोई गिला हम यार..
.



बुलबुला है मुजिबू पर भी, जहाँ श्रोताओं ने इसे खूब पसंद किया है

मेकिंग ऑफ़ "बुलबुला" - गीत की टीम द्वारा

बालामुरली बालू शुरू में मैंने सोचा था कि एक "निराश" गीत बनाऊं, उनके लिए जो जीवन से हार चुके है या किसी कारणवश बेहद दुखी हैं, फिर सोचा कि क्यों न इसी बात को दुखी अंदाज़ में कहने की बजाय जरा अपबीट अंदाज़ में कहा जाए. तो इस तरह ये धुन बनी, उसके बाद मैंने इसका डेमो सजीव को भेजा. मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब मैंने उनका लिखा गीत पढ़ा, उन्होंने मेरे एक एक नोट इतने सुन्दर शब्दों से सजा दिया था, पर मुझे लगा कि शब्दों के मूल धुन से अधिक उर्जा है, तो उसे समतुल्य करने के लिए मैंने एक बार फिर गीत के अरेंजमेंट का निरिक्षण किया और जरूरी बदलाव किये. उसके बाद ये गीत ह्रिचा के पास गया, अब ७ बार सा रे गा मा पा की विजेता से आप यही तो उम्मीद करेंगें न कि वो आपके गीत एक नयी ऊंचाई दे, और यही ह्रिचा ने किया भी...

ह्रिचा नील मुखर्जी: जब बाला ने पहली बार मुझसे इस गीत के लिए संपर्क किया तो जो चीज मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित कर रही थी वो था, उनका बहुआयामी व्यक्तित्त्व. मेरे अनुसार उन्होंने अपने अत्यधिक व्यस्त जीवनचर्या में भी जिस तरह संगीत की साधना की है वह बहुत प्रशंसनीय है. उनके इस गीत में मुझे दक्षिण भारतीय फिल संगीत शैली की झलक मिलती है जो सरल है और अत्यधिक सरस है. और इस गीत को जिस तरह लिखा गया है आज भी सार्थिक और भावप्रवल गीतों को तथाकथित अपबीट सुरों में कैसे पिरोया जा सकता है, इसकी एक मिसाल है, इसके लिए मैं सजीव को बधाई प्रेषित करती हूँ. उम्मीद है मेरा गायन भी आप सब को पसंद आएगा.

सजीव सारथी:"दिल यार यार" की मेकिंग के दौरान ही मेरी मुलाक़ात बाला से हुई, वो चाहते थे कि मैं उनके लिए एक युगल गीत लिखूं जिसका पूरा ट्रेक उनके पास तैयार था, और मैंने लिखा भी....पर जाने क्यों बाला उस गीत के संगीत संयोजन से संतुष्ट नहीं हो पा रहे थे, तभी उन्होंने इस धुन पर काम करने की सोची, व्यक्तिगत तौर पे कहूँ तो मुझे ये धुन उनके युगल गीत से अधिक अच्छी लगी, बाला की धुनें बेहद सरल होती है, इस गीत में भी जरुरत बस एक कैच वर्ड की थी जो बुलबुला के रूप में जब मुझे मिला तो फिर गीत लिखने में जरा भी समय नहीं लगा. "सिम सिम खुला" मैं रखना चाहता था, हालाँकि ये मूल धुन पर एक नोट ज्यादा था, पर बाला ने मेरी भावनाओं का ख्याल रखते हुए उसे बहुत खूबसूरती से इन्कोपरेट किया है गाने में. "अलीबाबा चालीस चोर" वाले किस्से के लिया है ये सिम सिम खुला :), ह्रिचा के बारे में क्या कहूँ, उनकी आवाज़ में ये छोटा सा गाना मेरे लिए एक मिनी कैप्सूल है जिसे जब भी सुनता हूँ नयी उर्जा मिल जाती है

ह्रिचा देबराज नील मुखर्जी
२००२ में ह्रिचा लगातार ७ बार जी के सारेगामापा कार्यक्रम में विजेता रही है, जो अब तक भी किसी भी महिला प्रतिभागी की तरफ़ से एक रिकॉर्ड है. स्वर्गीय मास्टर मदन की याद में संगम कला ग्रुप द्वारा आयोजित हीरो होंडा नेशनल टेलंट हंट में ह्रिचा विजेता रही. और भी ढेरों प्रतियोगिताओं में प्रथम रही ह्रिचा ने सहारा इंडिया के अन्तराष्ट्रीय आयोजन "भारती" में ३ सालों तक परफोर्म किया और देश विदेश में ढेरों शोस् किये. फ़्रांस, जर्मनी, पोलेंड, बेल्जियम, इस्राईल जैसे अनेक देशों में बहुत से अन्तराष्ट्रीय कलाकारों के साथ एक मंच पर कार्यक्रम देने का सौभाग्य इन्हें मिला और साथ ही बहुत से यूरोपियन टीवी कार्यक्रमों में भी शिरकत की. अनेकों रेडियो, टी वी धारावाहिकों, लोक अल्बम्स, और जिंगल्स में अपनी आवाज़ दे चुकी ह्रिचा, बौलीवुड की क्रोस ओवर फिल्म "भैरवी" और बहुत सी राजस्थानी फ़िल्में जैसे "दादोसा क्यों परणाई", "ताबीज", "मारी तीतरी" जैसी फिल्मों में पार्श्वगायन कर चुकी हैं.

बालमुरली बालू
दिन में रिसर्चर बालामुरली बालू रात में संगीतकार का चोला पहन लेते हैं. १५ साल की उम्र से बाला ने धुनों का श्रृंगार शुरू कर दिया था. एक ड्रमर और गायक की हैसियत से कवर बैंडों के लिए १० वर्षों तक काम करने के बाद उन्हें महसूस हुआ उनकी प्रतिभा का सही अर्थ मूल गीतों को रचने में है. बाला मानते हैं कि उनकी रचनात्मकता और कुछ नया ईजाद करने की उनकी क्षमता ही उन्हें भीड़ से अलग साबित करती है. ये महत्वकांक्षी संगीतकार इन दिनों एक पॉप अल्बम "मद्रासी जेनर" पर काम रहा है, जिसके इसी वर्ष बाजार में आने की सम्भावना है

सजीव सारथी
हिन्द-युग्म के 'आवाज़' मंच के प्रधान संपादक सजीव सारथी हिन्द-युग्म के वरिष्ठतम गीतकार हैं। हिन्द-युग्म पर इंटरनेटीय जुगलबंदी से संगीतबद्ध गीत निर्माण का बीज सजीव ने ही डाला है, जो इन्हीं के बागवानी में लगातार फल-फूल रहा है। कविहृदयी सजीव की कविताएँ हिन्द-युग्म के बहुचर्चित कविता-संग्रह 'सम्भावना डॉट कॉम' में संकलित है। सजीव के निर्देशन में ही हिन्द-युग्म ने 3 फरवरी 2008 को अपना पहला संगीतमय एल्बम 'पहला सुर' ज़ारी किया जिसमें 6 गीत सजीव सारथी द्वारा लिखित थे। पूरी प्रोफाइल यहाँ देखें।

Song - Bulbula
Voice - Hricha Neel Mukherjee
Music - Balamurli Balu
Lyrics - Sajeev Sarathie
Graphics - puffwazz


Song # 09, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

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