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Sunday, July 11, 2010

वृष्टि पड़े टापुर टुपुर...टैगोर की कविता से प्रेरित होकर दादू रविन्द्र जैन ने रचा ये सदाबहार गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 436/2010/136

मस्कार दोस्तों! सावन की रिमझिम फुहारों का आनंद इन दिनों आप ले रहे होंगे अपनी अपनी जगहों पर। और अगर अभी तक बरखा रानी की कृपा दृष्टि आप के उधर नहीं पड़ी है, तो कम से कम हमारी इस लघु शॄंखला के गीतों को सुन कर ही बारिश का अनुभव इन दिनों आप कर रहे होंगे, ऐसा हमारा ख़याल है। युं तो बारिश की फुहारों को "टिप-टिप" या "रिमझिम" के तालों से ही ज़्यादातर व्यक्त किया जाता है, लेकिन आंचलिक भाषाओं में और भी कई इस तरह के विशेषण हो सकते हैं। जैसे कि बंगला में "टापुर टुपुर" का ख़ूब इस्तेमाल होता है। मेरे ख़याल से "टापुर टुपुर" की बारिश "टिप टिप" के मुक़ाबले थोड़ी और तेज़ वाली बारिश के लिए प्रयोग होता है। तो दोस्तों, धीरे धीरे आप समझने लगे होंगे कि हम किस गीत की तरफ़ बढ़ रहे हैं आज की इस कड़ी में। जी हाँ, रवीन्द्र जैन की लिखी और धुनों से सजी सन् १९७७ की फ़िल्म 'पहेली' का एक बड़ा ही ख़ूबसूरत गीत, सुरेश वाडकर और हेमलता की युगल आवाज़ों में - "सोना करे झिलमिल झिलमिल, रूपा हँसे कैसे खिलखिल, आहा आहा बॄष्टि पड़े टापुर टुपुर, टिप टिप टापुर टुपुर"। दोस्तों, हम एक तरह से आप से क्षमा ही चाहेंगे कि 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के ४३५ कड़ियाँ पूरे हो चुके हैं और अब तक हमने रवीन्द्र जैन जी की कोई भी रचना आपको नहीं सुनवाई है। ऐसे गुणी कलाकार के गीतों से हमने आपको अब तक वंचित रखा, इसके लिए हमें अफ़सोस है। लेकिन देर आए पर दुरुस्त आए! हमारा मतलब है कि एक ऐसा गीत लेकर आए जिसे सुन कर मन यकायक प्रसन्न हो जाता है। पता नहीं इस गीत में ऐसा क्या ख़ास है कि सुनते ही जैसे मन पुलकित हो उठता है। शायद इस गीत की सरलता और सादगी ही इसकी विशेषता है।

रवीन्द्र जैन जी ने ये जो "टापुर टुपुर" का प्रयोग इस गीत में किया है, क्या आप जानते हैं इसकी प्रेरणा उन्हे कहाँ से मिली? आप को शायद मालूम हो कि जैन साहब एक लम्बे अरसे तक कलकत्ता में रहे थे, इसलिए उन्हे बंगला भाषा भी मालूम है, और एक बेहद गुणी इंसान होने की वजह से उन्होने वहाँ के साहित्य को पढ़ा है, वहाँ की संस्कृति को जाना है। उन्हे दरअसल "टापुर टुपुर" शब्दों को इस्तेमाल करने की प्रेरणा कविगुरु रबीन्द्रनाथ ठाकुर की एक बेहद लोकप्रिय कविता (या फिर नर्सरी राइम भी कह सकते हैं) से मिली, जिसकी शुरुआती पंक्ति है "बॄष्टि पौड़े टापुर टुपुर नोदे एलो बान, शिब ठाकुरेर बिये हौबे, तीन कोन्ने दान"। अर्थात, टापुर टुपुर बारिश हो रही है, नदी में बाढ़ आई हुई है, ऐसे में शिव जी का ब्याह होने वाला है। विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में सन् २००७ में रवीन्द्र जैन जी से अमरकांत दुबे की बातचीत सुनवाई गई थी। उसमें नए गायक गायिकाओं के ज़िक्र के दौरान यकायक इस फ़िल्म का उल्लेख उभर आया था। आइए वही अंश यहाँ पर प्रस्तुत करते हैं।

प्र: दादु, ये जो बातचीत हमारी जारी है गायकों की, और इसमें आप ने बताया कि नए कलाकारों को कैसे आपने मौका दिया, और जो स्थापित कलाकार थे, उन्होने किस तरह से आपके साथ सहयोग किया, और किस तरह से आपकी रचनाओं ने उनको भी प्रसिद्धि दिलाई...

उ: नहीं, ऐसा अगर नहीं किया होता तो शायद नए कलाकार नहीं आए होते, उनके सहयोग ने ही ऐसा रास्ता खोला

प्र: अच्छा इसमें, इसी सिलसिले में आपकी एक फ़िल्म याद आती है दादु, 'पहेली'।

उ: जी जी, सुरेश वाडकर

प्र: सुरेश वाडकर को आप ने इसी फ़िल्म में पहली बार गवाया था।

उ: इसका एक गाना 'पॊपुलर' हुआ था।

प्र: वही "बृष्टि पड़े टापुर टुपुर"।

उ: ये, जैसे हमारी इंडस्ट्री में राइमिंग्स हैं ना, उसी तरह से बंगला में भी राइमिंग् है, उसको वहाँ "छौड़ा" बोलते हैं। "बॄष्टि पौड़े टापुर टुपुर नोदे एलो बान, शिब ठाकुरेर बिये हौबे, तीन कोन्ने दान"। एक पंच लाइन, तो वही इस्तेमाल किया। बहुत अच्छा गाया उन्होने, और साथ में हेमलता है। सुरेश को हम इसमें लेकर आए थे। बहुत ही गुणी और सीखे हुए कलाकार हैं, गुरु-शिष्य की परंपरा से सीखते हैं। सुरेश ने बृज मोहन जी की 'सुर सिंगार' प्रतियोगिता में भाग लिया था और उसमें विनर बने थे। फिर जयदेव जी ने उनको 'गमन' में गवाया "सीने में जलन" और हमने 'पहेली' में।

तो दोस्तों, अब वक्त है फ़िल्म 'पहेली' के इस गीत को सुनने का और गीत सुन कर आज की पहेलियों के जवाबों का अंदाज़ा लगाना ना भूलिएगा! फिर मिलेंगे कल की कड़ी में, धन्यवाद!



क्या आप जानते हैं...
कि १९६९ में निर्माता राधेश्याम झुनझुनवाला रवीन्द्र जैन को बम्बई ले आए फ़िल्म 'लोरी' में संगीत देने के लिए। यह फ़िल्म तो नहीं बनी लेकिन कुछ गीत अवश्य रिकार्ड किए गए जिनमें मुकेश के गाए दो अति सुंदर और अति दुर्लभ गीत थे "दुख तेरा हो कि मेरा हो" और "पल भर जो बहला दे"।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. राग पहाड़ी पर आधारित है ये गीत, संगीतकार बताएं -३ अंक.
२. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से "आँचल", गीतकार बताएं - २ अंक.
३. फिल्म के इस गीत के कई संस्करण हैं, गायिका बताएं - २ अंक.
४. फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी को ३ और अवध जी, इंदु जी को २-२ अंक बधाई सहित.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Friday, June 4, 2010

महान फनकारों के सुरों से सुर मिलते आज हम आ पहुंचे हैं रिवाईवल की अंतिम कड़ी में ये कहते हुए - तू भी मेरे सुर में सुर मिला दे...

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # ४५

पिछले ४५ दिनों से, यानी डेढ़ महीनों से आप 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुन रहे हैं रिवाइवल सुनहरे दौर के सदाबहार नग़मों का, जिन्हे हमारे कुछ जाने पहचाने साथियों की आवाजों में। आज हम आ पहुँचे हैं इस विशेष शृंखला की अंतिम कड़ी पर। इस शृंखला में जिन जिन गायक गायिकाओं ने हमारे सुर में सुर मिला कर इस शृंखला को इस सुरीले अंजाम तक पहुँचाया है, हम उन सभी कलाकारों का तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करते हैं, और साथ ही साथ हम आप सभी सुधी श्रोताओं का भी आभार व्यक्त करते हैं जिन्होने इन गीतों को सुन कर अपनी राय और तारीफ़ें लिख भेजी। तो आइए आज इस सुरीली शृंखला को एक सुरीला अंजाम प्रदान करते हैं और सुनते हैं फ़िल्म 'चितचोर' से "तू जो मेरे सुर में सुर मिला ले, संग गा ले, तो ज़िंदगी हो जाए सफल"। आपको बता दें कि इस गीत के लिए हेमलता को उस साल का फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड मिला था। इससे पहले कि आप यह गीत सुनें, इस गीत की रिकार्डिंग् की कहानी सुनिए ख़ुद हेमलता से जो उन्होने विविध भारती के एक इंटरव्यू में कहे थे। "इस गीत की रिकार्डिंग् के दिन मैं स्टुडियो लेट पहुँची। किस कारण से लेट हुई थी यह अब तो याद नहीं, बस लेट हो गई थी। वहाँ येसुदास जी आ चुके थे। गाने की रिकार्डिंग् के बाद दादा ने मुझसे कहा कि अगर तुम मेरे गुरु की बेटी नहीं होती तो वापस कर देता। यह सुन कर मैं इतना रोयी उस दिन। मुझे उन पर बहुत अभिमान हो गया, कि वो मुझे सिर्फ़ इसलिए गवाते हैं क्योंकि मैं उनके गुरु की बेटी हूँ? बरमन दादा, कल्याणजी भाई, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, ये सब भी तो मुझसे गवाते हैं, तो फिर उन्होने ऐसा क्यों कह दिया! मुझे बहुत बुरा लगा और मैं दिन भर बैठके रोयी। मैं दादा से जाकर यह कहा कि देर से आने के लिए अगर आप मुझे बाहर निकाल देते तो मुझे एक सबक मिलता, बुरा नहीं लगता, पर आप ने ऐसा क्यों कहा कि अगर गुरु की बेटी ना होती तो बाहर कर देता। तो उन्होने मुझसे बड़े प्यार से कहा कि एक दिन ऐसा आएगा कि जब तुम्हारे लिए सारे म्युज़िक डिरेक्टर्स वेट करेंगे, तुम नहीं आओगी तो रिकार्डिंग् ही नहीं होगी'।" तो दोस्तों, आइए अब 'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' की अंतिम कड़ी के इस गीत को सुना जाए और आपको यह बताते चलें कि सोमवार से हम वापस लौटेंगे अपनी उसी पुराने स्वरूप में और दोबारा शुरु होगा गोल्डन दौर के गोल्डन गीतों का कारवाँ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की कड़ी नंबर ४११ के साथ। साथ ही पहेली प्रतियोगिता और 'क्या आप जानते हैं' स्तंभ भी हम वापस ले आएँगे। तो ज़रूर पधारिएगा 'आवाज़' के मंच पर सोमवार यानी ७ जून को। एक बार फिर से उन सभी गायक गायिकाओं का शुक्रिया अदा करते हुए जिन्होने 'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' की इस शृंखला को मुकम्मल बनाया, हम ले रहे हैं इजाज़त, नमस्कार!

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत -तू जो मेरे सुर में...
कवर गायन -रश्मि नायर और एन वी कृष्णन




ये कवर संस्करण आपको कैसा लगा ? अपनी राय टिप्पणियों के माध्यम से हम तक और इस युवा कलाकार तक अवश्य पहुंचाएं


रश्मि नायर
इन्टरनेट पर बेहद सक्रिय और चर्चित रश्मि मूलत केरल से ताल्लुक रखती हैं पर मुंबई में जन्मी, चेन्नई में पढ़ी, पुणे से कॉलेज करने वाली रश्मि इन दिनों अमेरिका में निवास कर रही हैं और हर तरह के संगीत में रूचि रखती हैं, पर पुराने फ़िल्मी गीतों से विशेष लगाव है. संगीत के अलावा इन्हें छायाकारी, घूमने फिरने और फिल्मों का भी शौक है
एन वी कृष्णन
मधुर आवाज़ के धनी एन वी कृष्णन साहब मूल रूप से कालीकट केरल के हैं और मुंबई में रहते हैं, जीवन यापन की दौड धूप में उन्हें अपने जूनून संगीत को समय देने के मौका नहीं मिला, पर इन्टरनेट क्रांति ने उनके गायन को आज एक नया आकाश दे दिया है, कृष्णन साहब अपनी इस दूसरी पारी को खूब एन्जॉय कर रहे हैं इन दिनों


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

Friday, May 7, 2010

दादा रविन्द्र जैन ने इंडस्ट्री को कुछ बेहद नयी और सुरीली आवाजों से मिलवाया, जिसमें एक हेमलता भी है

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # १७

'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' की आज की कड़ी में आप सुनेंगे रवीन्द्र जैन के गीत संगीत में फ़िल्म 'अखियो के झरोखों से' का वही मशहूर शीर्षक गीत जिसे हेमलता ने गाया था और फ़िल्म में रंजीता पर फ़िल्माया गया था। गीत सुनने से पहले थोड़ी हेमलता की बातें हो जाए, जो उन्होने विविध भारती के एक मुलाक़ात में कहे थे। "कलकत्ता के रवीन्द्र सरोवर स्टेडियम में एक बहुत बड़ा प्रोग्राम हुआ था। डॊ. बिधान चन्द्र रॊय आए थे उसमें, दो लाख की ऒडियन्स थी। उस शो के चीफ़ कोर्डिनेटर गोपाल लाल मल्लिक ने मुझे एक गाना गाने का मौका दिया। उस शो में लता जी, रफ़ी साहब, उषा जी, हृदयनाथ जी, किशोर दा, सुबीर सेन, संध्या मुखर्जी, आरती मुखर्जी, हेमन्त दादा, सब गाने वाले थे। मुझे इंटर्वल में गाना था, ऐज़ बेबी लता (हेमलता का असली नाम लता ही था उन दिनों) ताकि लोग चाय वाय पी के आ सके। मेरे गुरु भाई चाहते थे कि इस प्रोग्राम के ज़रिए मेरे पिताजी को बताया जाए कि उनकी बेटी कितना अच्छा गाती है (हेमलता के पिता को यह मालूम नहीं था कि उनकी बेटी छुप छुप के गाती है)। तो वो जब जाकर मेरे पिताजी को इस फ़ंक्शन में आने के लिए कहा तो वो बोले कि मैं वहाँ फ़िल्मी गीतों के फ़ंक्शन में जाकर क्या करूँगा! बड़ी मुश्किल से मनाकर उन्हे लाया गया। तो ज़रा सोचिए, बिधान चन्द्र रॊय, सारे मिनिस्टेरिएल लेवेल के लोग, दो लाख ऒडियन्स, इन सब के बीच मेरे पिताजी बैठे हैं और उनकी बेटी गाने वाली है और यह उनको पता ही नहीं। उस समय मेरा आठवाँ साल लगा था। मैंने "जागो मोहन प्यारे", फ़िल्म 'जागते रहो', यह गाना गाया। जैसे ही मैंने वह आलाप लिया, पब्लिक ज़ोर से शोर करने लगी। मैंने सोचा कि क्या हो गया, फिर पता चला कि वो "आर्टिस्ट को ऊँचा करो" कह रहे हैं। फिर टेबल लाया गया और मैंने फिर से गाया, वन्स मोर भी हुआ। कलकत्ता की ऒडियन्स, दुनिया में ऐसी ऒडियन्स आपको कहीं नहीं मिलेगी, वाक़ई! फिर उस दिन मैंने एक एक करके १२ गीत गाए, सभी बंगला में, हिंदी में, जो आता था सब गा दिया। फिर शोर हुआ कि दीदी (लता जी) आ गईं हैं। बी. सी. रॊय ने बेबी लता के लिए गोल्ड मेडल अनाउन्स किया। पिता जी भी मान गए, उनको भी लगा कि उसकी प्रतिभा को रोकने का मुझे कोई अधिकार नहीं है, फिर राशी देख कर 'ह' से हेमलता नाम रखा गया और मैं लता से हेमलता बन गई।"

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत - अखियों के झरोखों से...
कवर गायन - रश्मि नायर




ये कवर संस्करण आपको कैसा लगा ? अपनी राय टिप्पणियों के माध्यम से हम तक और इस युवा कलाकार तक अवश्य पहुंचाएं


रश्मि नायर
इन्टरनेट पर बेहद सक्रिय और चर्चित रश्मि मूलत केरल से ताल्लुक रखती हैं पर मुंबई में जन्मी, चेन्नई में पढ़ी, पुणे से कॉलेज करने वाली रश्मि इन दिनों अमेरिका में निवास कर रही हैं और हर तरह के संगीत में रूचि रखती हैं, पर पुराने फ़िल्मी गीतों से विशेष लगाव है. संगीत के अलावा इन्हें छायाकारी, घूमने फिरने और फिल्मों का भी शौक है


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

Tuesday, April 6, 2010

आ दो दो पंख लगा के पंछी बनेंगे...आईये लौट चलें बचपन में इस गीत के साथ

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 396/2010/96

पार्श्वगायिकाओं के गाए युगल गीतों पर आधारित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला 'सखी सहेली' की आज की कड़ी में हमने जिन दो आवाज़ों को चुना है, वो दोनों आवाज़ें ही हिंदी फ़िल्म संगीत के लिए थोड़े से हट के हैं। इनमें से एक आवाज़ है गायिका आरती मुखर्जी की, जो बंगला संगीत में तो बहुत ही मशहूर रही हैं, लेकिन हिंदी फ़िल्मों में बहुत ज़्यादा सुनाई नहीं दीं हैं। और दूसरी आवाज़ है गायिका हेमलता की, जिन्होने वैसे तो हिंदी फ़िल्मों के लिए बहुत सारे गीत गाईं हैं, लेकिन ज़्यादातर गीत संगीतकार रवीन्द्र जैन के लिए थे, और उनमें से ज़्यादातर फ़िल्में कम बजट की होने की वजह से उन्हे वो प्रसिद्धी नहीं मिली जिनकी वो सही मायने में हक़दार थीं। ख़ैर, आज हम इन दोनों गायिकाओं के गाए जिस गीत को सुनवाने के लिए लाए हैं, वह गीत इन दोनों के करीयर के शुरूआती दिनों के थे। यह फ़िल्म थी १९६९ की फ़िल्म 'राहगीर', जिसका निर्माण गीतांजली चित्रदीप ने किया था। बिस्वजीत और संध्या अभिनीत इस फ़िल्म में हेमन्त कुमार का संगीत था और गीत लिखे गुलज़ार साहब ने। इसमें आरती मुखर्जी और हेमलता ने साथ में एक बच्चों वाला गीत गाया था "आ दो दो पंख लगा के पंछी बनेंगे"। बड़ा ही प्यारा सा गीत है और आजकल यह गीत ना के बराबर सुनाई देता है। बहुत ही दुर्लभ गीत है, और इस गीत को हमें उपलब्ध करवाया मेरे एक ऐसे दोस्त ने जो समय समय पर हमें दुर्लभ से दुर्लभ गीत खोज कर भेजती रहती हैं लेकिन अपना नाम दुनिया के सामने आए ये वो यह नहीं चाहतीं। आज जहाँ छोटे से छोटे काम के लिए इंसान चाहता है कि उसका नाम आगे आए, वहीं मेरी यह दोस्त गुमनाम रह कर हमारे प्रयासों में अद्वितीय सहयोग दे रही हैं। मैं उनका नाम बता कर उन्हे चोट नहीं पहुँचाउँगा, लेकिन उनका तह-ए-दिल से शुक्रिया ज़रूर अदा करूँगा। उनके सहयोग के बिना हम बहुत से ऐसे गीतों को बजाने की कल्पना भी नहीं कर पाते, और आज का गीत भी उन्ही दुर्लभ गीतों में से एक है।

आरती मुखर्जी ने फ़िल्म 'राहगीर' का यह गीत १९६९ में गाया था। उसके बाद जिन हिंदी फ़िल्मों में उनके हिट गीत आए उनमें शामिल हैं 'गीत गाता चल' (१९७५), 'तपस्या' ('१९७६), 'मनोकामना' (१९८३) और 'मासूम' (१९८३)। फ़िल्म 'मासूम' में उनके गाए गीत "दो नैना और एक कहानी" के लिए उन्हे उस साल सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायिका का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था। दूसरी तरफ़ हेमलता के गाए हिंदी गेतों की फ़ेहरिस्त तो काफ़ी लम्बी चौड़ी है, इसलिए उस तरफ़ ना जाते हुए हम सीधे उन्ही की ज़ुबानी कुछ जानकारी देना चाहेंगे जो उन्होने विविध भारती के श्रोताओं के साथ बाँटे थे एक मुलाक़ात में। दोस्तों, क्योंकि आज हम हेमलता जी के गाए एक बच्चों वाले गीत को सुनने जा रहे हैं हेमन्त दा के संगीत में, तो क्यों ना हम उस मुलाक़ात के उस अंश को पढ़ें जिसमें वो बता रहीं हैं उनके पहले पहले स्टेज गायन के बारे में जिसमें हेमन्त दा, जी हाँ हेमन्त दा भी मौजूद थे। "कलकत्ता के रवीन्द्र सरोवर स्टेडियम में एक बहुत बड़ा प्रोग्राम हुआ था। डॊ. बिधान चन्द्र रॊय आए थे उसमें, दो लाख की ऒडियन्स थी। उस शो के चीफ़ कोर्डिनेटर गोपाल लाल मल्लिक ने मुझे एक गाना गाने का मौका दिया। उस शो में लता जी, रफ़ी साहब, उषा जी, हृदयनाथ जी, किशोर दा, सुबीर सेन, संध्या मुखर्जी, आरती मुखर्जी, हेमन्त दादा, सब गाने वाले थे। मुझे इंटर्वल में गाना था, ऐज़ बेबी लता (हेमलता का असली नाम लता ही था उन दिनों) ताकि लोग चाय वाय पी के आ सके। मेरे गुरु भाई चाहते थे कि इस प्रोग्राम के ज़रिए मेरे पिताजी को बताया जाए कि उनकी बेटी कितना अच्छा गाती है (हेमलता के पिता को यह मालूम नहीं था कि उनकी बेटी छुप छुप के गाती है)। तो वो जब जाकर मेरे पिताजी को इस फ़ंक्शन में आने के लिए कहा तो वो बोले कि मैं वहाँ फ़िल्मी गीतों के फ़ंक्शन में जाकर क्या करूँगा! बड़ी मुश्किल से मनाकर उन्हे लाया गया। तो ज़रा सोचिए, बिधान चन्द्र रॊय, सारे मिनिस्टेरिएल लेवेल के लोग, दो लाख ऒडियन्स, इन सब के बीच मेरे पिताजी बैठे हैं और उनकी बेटी गाने वाली है और यह उनको पता ही नहीं। उस समय मेरा आठवाँ साल लगा था। मैंने "जागो मोहन प्यारे", फ़िल्म 'जागते रहो', यह गाना गाया। जैसे ही मैंने वह आलाप लिया, पब्लिक ज़ोर से शोर करने लगी। मैंने सोचा कि क्या हो गया, फिर पता चला कि वो "आर्टिस्ट को ऊँचा करो" कह रहे हैं। फिर टेबल लाया गया और मैंने फिर से गाया, वन्स मोर भी हुआ। कलकत्ता की ऒडियन्स, दुनिया में ऐसी ऒडियन्स आपको कहीं नहीं मिलेगी, वाक़ई! फिर उस दिन मैंने एक एक करके १२ गीत गाए, सभी बंगला में, हिंदी में, जो आता था सब गा दिया। फिर शोर हुआ कि दीदी (लता जी) आ गईं हैं। बी. सी. रॊय ने बेबी लता के लिए गोल्ड मेडल अनाउन्स किया। पिता जी भी मान गए, उनको भी लगा कि उसकी प्रतिभा को रोकने का मुझे कोई अधिकार नहीं है, फिर राशी देख कर 'ह' से हेमलता नाम रखा गया और मैं लता से हेमलता बन गई।" तो दोस्तों, यह थी हेमलता से जुड़ी एक दिलचस्प जानकारी। और अब वक़्त है दो दो पंख लगा के पंछी बनने की, सुनते हैं दो सखियों आरती मुखर्जी और हेमलता की आवाज़ें फ़िल्म 'राहगीर' के इस मासूम गीत में।



क्या आप जानते हैं...
कि हेमलता कुल ३८ भाषाएँ पढीं हैं, और १२ देशों की मुख्य भाषा को बाकायदा सीखा है। उन्होने ख़ुद यह विविध भारती पर कहा था।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. एक मुहावरे से शुरू होता है ये गीत, फिल्म का नाम बताएं -३ अंक.
2. शैलेन्द्र के लिखे इस गीत की संगीतकार जोड़ी कौन सी है - २ अंक.
3. मुबारक बेगम के साथ किस गायिका ने इस गीत में आवाज़ मिलायी है -२ अंक.
4. राज कपूर अभिनीत इस फिल्म की नायिका कौन हैं -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी, पदम जी, इंदु जी और अवध जी बधाई, इंदु जी लगता है आपको बच्चों वाले गीत पसंद नहीं...भाई जिस गीत के साथ हेमंत दा, गुलज़ार, आरती मुखर्जी और हेमलता जुडी हों उसे गोल्ड मानने से हम तो इनकार नहीं कर सकते :)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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