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Saturday, July 2, 2016

"तू मेरा कौन लागे?" क्या सम्बन्ध है इस गीत का किशोर कुमार से?


एक गीत सौ कहानियाँ - 85
 

'तू मेरा कौन लागे...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना
रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 85-वीं कड़ी में आज जानिए 1989 की फ़िल्म ’बटवारा’ के लोकप्रिय गीत "तू मेरा कौन लागे..." के बारे में जिसे अनुराधा पौडवाल, अलका याज्ञनिक और कविता कृष्णमूर्ति ने गाया था। गीत लिखा है हसन कमाल ने और संगीत दिया है लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने।  


 मारी फ़िल्मों में एकल और युगल गीतों की कोई कमी नहीं है। तीन, चार या उससे अधिक गायकों के गाये
गीतों की भी फ़ेहरिस्त काफ़ी लम्बी है। लेकिन अगर ऐसे गानें छाँटने के लिए कहा जाए जिनमें कुल तीन गायिकाओं की आवाज़ें हैं तो शायद गिनती उंगलियों पर ही की जा सकती है। दूसरे शब्दों में ऐसे गीत बहुत कम संख्या में बने हैं। आज हम एक ऐसे ही गीत की चर्चा कर रहे हैं जो बनी थी 1989 की फ़िल्म ’बटवारा’ के लिए। अलका याज्ञनिक, अनुराधा पौडवाल और कविता कृष्णमूर्ति का गाया "तू मेरा कौन लागे" गीत अपने ज़माने में काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। इस गीत की चर्चा शुरू करने से पहले जल्दी जल्दी एक नज़र डाल लेते हैं तीन गायिकाओं के गाए फ़िल्मी गीतों के इतिहास पर। पहला गीत तो वही है जो फ़िल्म संगीत इतिहास का पहला पार्श्वगायन युक्त गीत है। 1935 की फ़िल्म ’धूप छाँव’ के गीत "मैं ख़ुश होना चाहूँ..." में संगीतकार रायचन्द बोराल ने तीन गायिकाओं - पारुल घोष, सुप्रभा सरकार और हरिमति दुआ को एक साथ गवाया था। 40 के दशक में 1945 की फ़िल्म ’ज़ीनत’ में एक ऐसी क़व्वाली बनी जिसमें केवल महिलाओं की आवाज़ें थीं, फ़िल्म संगीत के इतिहास में यह पहली बार था। मीर साहब और हाफ़िज़ ख़ाँ के संगीत में "आहें ना भरी शिकवे ना किए...", इस क़वाली में आवाज़ें थीं नूरजहाँ, ज़ोहराबाई अम्बालेवाली और कल्याणीबाई की। 50 के दशक में नौशाद साहब ने तीन गायिकाओं को गवाया महबूब ख़ान की बड़ी फ़िल्म ’मदर इण्डिया’ में। तीन मंगेशकर बहनों - लता, उषा और मीना ने इस गीत को गाया, बोल थे "दुनिया में हम आये हैं तो जीना ही पड़ेगा..."। 60 के दशक में पहली बार संगीतकार रवि ने लता, आशा और उषा को एक साथ गवाकर इतिहास रचा, फ़िल्म थी ’गृहस्थी’ और गाना था "खिले हैं सखी आज..."। इसके पाँच साल बाद 1968 में कल्याणजी-आनन्दजी ने फिर एक बार इन तीन बहनों को गवाया ’तीन बहूरानियाँ’ फ़िल्म के गीत "हमरे आंगन बगिया..." में। इसी साल कल्याणजी-आनन्दजी भाइयों ने मुबारक़ बेगम, सुमन कल्याणपुर और कृष्णा बोस की आवाज़ों में ’जुआरी’ फ़िल्म में एक गीत गवाया "नींद उड़ जाए तेरी चैन से सोने वाले" जो काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। 70 के दशक में शंकर-जयकिशन ने एक कमचर्चित फ़िल्म ’दिल दौलत दुनिया’ के लिए एक दीपावली गीत रेकॉर्ड किया आशा भोसले, उषा मंगेशकर और रेखा जयकर की आवाज़ों में, "दीप जले देखो..."। और 80 के दशक में लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने 1982 की फ़िल्म ’जीवन धारा’ में पहली बार अनुराधा-अलका-कविता की तिकड़ी को पहली बार साथ में माइक के सामने ला खड़ा किया, गीत था "जल्दी से आ मेरे परदेसी बाबुल..."। और जब 1989 में ’बटवारा’ में एक ऐसे तीन गायिकाओं वाले गीत की ज़रूरत आन पड़ी तब लक्ष्मी-प्यारे ने फिर एक बार इसी तिकड़ी को गवाने का निर्णय लिया। 90 के दशक में इस तिकड़ी को राम लक्ष्मण ने ’हम साथ साथ हैं’ फ़िल्म के कई गीतों में गवाया जैसे कि "मय्या यशोदा...", "मारे हिवड़ा में नाचे मोर...", "हम साथ साथ हैं..."। इसी दशक में यश चोपड़ा की फ़िल्म ’डर’ में शिव-हरि ने लता मंगेशकर के साथ कविता कृष्णमूर्ति और पामेला चोपड़ा को गवाकर एक अद्‍भुत गीत की रचना की, बोल थे "मेरी माँ ने लगा दिये सोलह बटन मेरी चोली में..."। 2000 के दशक में भी तीन गायिकाओं के गाए गीतों की परम्परा जारी रही, अनु मलिक ने ’यादें’ फ़िल्म में अलका याज्ञनिक, कविता कृष्णमूर्ति और हेमा सरदेसाई से गवाया "एली रे एली कैसी है पहेली..."।

"तू मेरा कौन लागे" गीत में डिम्पल कपाडिया के लिए अलका याज्ञनिक, अम्रीता सिंह के लिए कविता
किशोर के साथ अनुराधा की दुर्लभ तसवीर, साथ में अमित कुमार और आशा
कृष्णमूर्ति और पूनम ढिल्लों के लिए अनुराधा पौडवाल की आवाज़ निर्धारित हुई। गाना रेकॉर्ड होकर सेट पर पहुँच गया शूटिंग् के लिए। पर फ़िल्मांकन में हो गई गड़बड़। अभिनेत्री-गायिका की जोड़ियों में गड़बड़ हो गई। शुरुआती मुखड़े में अम्रीता सिंह ने अनुराधा पौडवाल के गाए हिस्से में होंठ मिला दी जबकि अनुराधा को पूनम के लिए गाना था। गीत का अन्त तो और गड़बड़ी वाला है। डिम्पल गीत को ख़त्म करती हैं "तू मारो कोण लागे" पंक्ति को चार बार गाते हुए। पर पहली दो लाइनें अलका की आवाज़ में है और अगली दो लाइनें अनुराधा की आवाज़ में। और तो और अनुराधा जो पूनम के लिए "तू मेरा कौन लागे" गा रही थीं, अब डिम्पल के लिए "तू मारो कोण लागे" गाती हैं। ऐसा क्यों है, पता नहीं! ख़ैर, अब ज़िक्र करते हैं कि इस गीत का किशोर कुमार के साथ क्या सम्बन्ध है। गीत के रेकॉर्डिंग् के दिन की बात है। तीनों गायिकाएँ तैयार थीं, दवाब भी था उन पर क्योंकि तीनों में उन दिनों प्रतियोगिता थी। इसलिए इस दवाब में थीं कि कहीं मुझसे इस गीत में कोई ग़लती ना हो जाए! गीत रेकॉर्ड हो गया, तीनों गायिकाएँ काँच के कमरे से बाहर आ गईं। लक्ष्मी-प्यारे भी उनकी तरफ़ चले आ रहे थे कन्डक्टिंग् रूम की तरफ़ से, पर किसी के चेहरे पर कोई मुस्कुराहट नहीं थी जो आम तौर पर होता है अगर गीत अच्छा रेकॉर्ड हो जाए तो। लक्ष्मी-प्यारे के उतरे हुए चेहरे देख कर तीनों गायिकाएँ घबरा गईं यह सोच कर कि कहीं उनसे कोई ग़लती तो नहीं हो गई इस गीत में? पास आने पर अलका याज्ञनिक ने प्यारेलाल जी से पूछा कि क्या बात है? प्यारेलाल जी ने बताया, "किशोर दा नहीं रहे!" दिन था 13 अक्टुबर 1987। इसी दिन किशोर दा चले गए और इसी दिन रेकॉर्ड हुआ था ’बटवारा’ का यह गीत, हालाँकि फ़िल्म 1989 में रिलीज़ हुई थी। 



फिल्म - बँटवारा : "तू मेरा कौन लागे..." : अनुराधा पौडवाल, अलका याज्ञिक, कविता कृष्णमूर्ति



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Thursday, September 9, 2010

चेहरा छुपा लिया है किसी ने हिजाब में....मजलिस-ए-कव्वाली के माध्यम से सभी श्रोताओं को ईद मुबारक

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 480/2010/180

प सभी को 'आवाज़' परिवार की तरफ़ से ईद-उल-फ़ित्र की दिली मुबारक़बाद। यह त्योहार आप सभी के जीवन में ख़ुशियाँ लेकर आए ऐसी हम कामना करते हैं। ईद-उल-फ़ित्र के साथ रमज़ान के महीने का अंत होता है और इसी के साथ क़व्वालियों की इस ख़ास मजलिस को भी आज हम अंजाम दे रहे हैं। ४० के दशक से शुरु कर क़व्वालियों का दामन थामे हर दौर के बदलते मिज़ाज का नज़ारा देखते हुए आज हम आ गए हैं ८० के दशक में। जिस तरह से ८० के दशक में फ़िल्म संगीत का सुनहरा दौर ख़त्म होने की कगार पर था, वही बात फ़िल्मी क़व्वालियों के लिए भी लागू थी। क़व्वालियों की संख्या भी कम होती जा रही थी। फ़िल्मों में क़व्वालियों के सिचुएशन्स आने ही बंद होते चले गए। कभी किसी मुस्लिम सबजेक्ट पर फ़िल्म बनती तो ही उसमें क़व्वाली की गुंजाइश रहती। कुछ गिनी चुनी फ़िल्में ८० के दशक की जिनमें क़व्वालियाँ सुनाई दी - निकाह, नूरी, परवत के उस पार, फ़कीरा, नाख़ुदा, नक़ाब, ये इश्क़ नहीं आसाँ, ऊँचे लोग, दि बर्निंग्‍ ट्रेन, अमृत, दीदार-ए-यार, आदि। इस दशक की क़व्वालियों का प्रतिनिधि मानते हुए आज की कड़ी के लिए हमने चुनी है फ़िल्म 'निकाह' की क़व्वाली "चेहरा छुपा लिया है किसी ने हिजाब में"। फ़िल्मी क़व्वलियों की बात चलती है तो आशा जी का नाम गायिकाओं में सब से उपर आता है। क़व्वाली गायन में गायिका के गले में जिस तरह की हरकत होनी चाहिए, जिस तरह की शोख़ी, अल्हड़पन और एक आकर्षण होनी चाहिए, उन सभी बातों का ख़्याल आशा जी ने रखा और शायद यही वजह है कि उन्होंने ही सब से ज़्यादा फ़िल्मी क़व्वालियाँ गाई हैं। तो आज का यह एपिसोड भी कल की तरह आशा जी के नाम, और उनके साथ इस क़व्वली में आप आवाज़ें सुनेंगे महेन्द्र कपूर, सलमा आग़ा और साथियों की। हसन कमाल के बोल और रवि का संगीत।

फ़िल्म 'निकाह' एक मुस्लिम सामाजिक फ़िल्म थी और बेहद कमयाब भी साबित हुई थी। बी. आर. चोपड़ा की यह फ़िल्म थी जो डॊ. अचला नागर की लिखी एक नाटक पर आधारित थी। २४ सितंबर १९८२ को प्रदर्शित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे राज बब्बर, दीपक पराशर, सलमा आग़ा, हिना कौसर प्रमुख। यह फ़िल्म तो आपने देखी ही होगी, फ़िल्म की कहानी तलाक़ और मुस्लिम पुनर्विवाह के मसलों के इर्द गिर्द घूमती है। इस्लामिक मैरिज ऐक्ट के मुताबिक़, किसी तलाक़शुदा महिला से उसका पूर्व पति तभी दुबारा शादी कर सकता है जब वो किसी और से शादी कर के तलाक़ ले आए। बस इसी बात को केन्द्रबिंदु में रख कर लिखी गई थी नाटक 'निकाह' की कहानी, जिस पर आगे चलकर यह फ़िल्म बनी। इस फ़िल्म को बहुत सराहना मिली थी और आज भी मुस्लिम सामाजिक फ़िल्मों के जौनर की सब से मक़बूल फ़िल्म मानी जाती है। फ़िल्म में गायिका अभिनेत्री सलमा आग़ा ने कुछ ऐसे दिल को छू लेने वाले गीत गाए कि वो गानें सदाबहार नग़मों में दर्ज हो चुके हैं। "दिल के अरमाँ आसुओं में बह गए" के लिए उन्हें उस साल फ़िल्मफ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका के ख़िताब से नवाज़ा गया था। इसके अलावा "फ़ज़ा भी है जवाँ जवाँ, हवा भी है रवाँ रवाँ" तथा महेन्द्र कपूर के साथ गाया युगल गीत "दिल की यह आरज़ू थी कोई दिलरुबा मिले" भी ख़ासा लोकप्रिय हुए थे। वैसे इस क़व्वाली में आशा भोसले और महेन्द्र कपूर की आवाज़ें ही मुख्य रूप से सुनाई देती है, सलमा आग़ा बस एक लाइन गाती हैं आख़िर की तरफ़ - "यह झूठ है कि तुमने हमें प्यार किया है, हमने तुम्हे ज़ुल्फ़ों में गिरफ़्तार किया है"। आइए सुना जाए यह दिलकश क़व्वाली जिसमें है प्यार मोहब्बत के खट्टे मीठे गिले शिकवे और तकरारें हैं। और इसी के साथ 'मजलिस-ए-क़व्वाली' शृंखला पूरी होती है। आपको यह शृंखला कैसी लगी, क्या ख़ामियाँ रह गईं, आप अपने विचार हमारे ईमेल पते oig@hindyugm.com पर लिख भेजें। और अगर कोई और क़व्वाली आप सुनना चाहते हैं 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' में, तो उसका भी ज़िक्र आप कर सकते हैं। तो अब आपसे अगली मुलाक़ात होगी शनिवार की शाम, तब तक के लिए इजाज़त दीजिए, और एक बार फिर से आप सभी को ईद-उल-फ़ित्र की हार्दिक शुभकामनाएँ।



क्या आप जानते हैं...
कि हाल ही में आशा भोसले का नाम दुनिया के सब से लोकप्रिय १० कलाकारों में शामिल हुआ है। यह सर्वे सी.एन.एन के तरफ़ से आयोजित किया गया है।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. यह गीत एक अमर प्रेमिक और प्रेमिका की प्रेम कहानी पर बनी फ़िल्म का है जिसका निर्माण ४० के दशक के आख़िर के तरफ़ के किसी साल में हुआ था। फ़िल्म का नाम बताएँ। १ अंक।
२. फ़िल्म में कुल तीन संगीतकार हैं, जिनमें दो जोड़ी के रूप में हैं। इस जोड़ी के एक सदस्य आगे चलकर एक सफल संगीतकार सिद्ध हुए लेकिन एक अन्य नाम से। बताइए इस गीत के तीनों संगीतकारों के नाम। ४ अंक।
३. यह गीत एक पारम्परिक रचना है जिसका इस्तेमाल उसी सफल संगीतकार ने आगे चलकर अपनी एक बेहद उल्लेखनीय फ़िल्म में किया है और जिनसे गवाया है वो भी उनके ही परिवार की एक सदस्या हैं। इस पारम्परिक रचना को पहचानिए। ३ अंक।
४. इस गीत की गायिका का नाम बताएँ जिन्होंने इसी फ़िल्म में जी. एम. दुर्रानी के साथ मिलकर युगल गीत भी गाया है। २ अंक।

पिछली पहेली का परिणाम -
पवन जी और इंदु जी एकदम सही हैं, प्रतिभा जी आपने हसन कमाल को देखिये तो जरा क्या लिख दिया :), रोमेंद्र जी एकदम सही हैं. सभी मित्रों को ईद की बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, August 11, 2010

किसी नज़र को तेरा इंतज़ार आज भी है...हसन कमाल ने कुछ यूँ रंगा ये हिज्र और वस्ल का समां कि आज भी सुनें तो एक टीस सी उभर आती है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 459/2010/159

'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर इन दिनों जारी है ८० के दशक के दस चुनिंदा फ़िल्मी ग़ज़लों पर आधारित लघु शृंखला 'सेहरा में रात फूलों की'। ये दस ग़ज़लें दस अलग अलग शायरों के कलाम हैं। अब तक हमने इसमें जिन शायरों के कलाम सुनें हैं, वो हैं हसरत जयपुरी, शहरयार, नक्श ल्यालपुरी, इंदीवर, आरिफ खान, जावेद अख़्तर, इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दिक़ी और कल आपने निदा फ़ाज़ली साहब की लिखी हुई ग़ज़ल सुनी। आज इस शृंखला की नवी कड़ी में पेश है शायर और गीतकार हसन कमाल का कलाम फ़िल्म 'ऐतबार' से। आशा भोसले और भूपेन्द्र की युगल आवाज़ों में यह ग़ज़ल है। और दोस्तों, पहली बार इस ग़ज़ल के बहाने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुनाई दे रहा है संगीतकार बप्पी लाहिड़ी का संगीत। युं तो बप्पी दा डिस्को किंग् का इमेज रखते हैं, और ८० के दशक में फ़िल्म संगीत का स्तर गिराने वालों में उन्हे एक मुख्य अभियुक्त करार दिया जाता है, लेकिन यह बात भी सच है कि भले ही वो डिस्को और पाश्चात्य संगीत पर आधारित गानें ही ज़्यादा बनाए, लेकिन शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत और सुगम संगीत पर भी उनकी पकड़ मज़बूत रही है। कुछ ऐसे गीतों की याद दिलाएँ आपको? फ़िल्म - 'आँगन की कली', गीत - "सइयां बिना घर सूना सूना", फ़िल्म - 'झूठी', गीत - "चंदा देखे चंदा तो ये चंदा शरमाए", फ़िल्म - 'मोहब्बत', गीत - "नैना ये बरसे मिलने को तरसे", फ़िल्म - 'अपने पराए', गीत - "हल्के हल्के आई चल के, बोले निंदिया रानी" और "श्याम रंग रंगा रे", फ़िल्म - 'टूटे खिलौने', गीत - "माना हो तुम बेहद हसीं", फ़िल्म - 'सत्यमेव जयते', गीत - "दिल में हो तुम आँख में तुम", फ़िल्म - 'लहू के दो रंग', गीत - "ज़िद ना करो अब तो रुको" और "माथे की बिंदिया बोले"। ऐसे और भी न जाने कितने गानें हैं बप्पी दा के जो बेहद सुरीले हैं और इस देश की ख़ुशबू लिये हुए है। आज फ़िल्म 'ऐतबार' के जिस ग़ज़ल की हम बात कर रहे हैं वह है - "किसी नज़र को तेरा इंतेज़ार आज भी है, कहाँ हो तुम के ये दिल बेक़रार आज भी है"। हसन कमाल की यह एक बेहद मक़बूल फ़िल्मी ग़ज़ल है, और उनके लिखे फ़िल्म 'निकाह' के ग़ज़लों के भी तो क्या कहने! नौशाद साहब की दूसरी आख़िरी फ़िल्म 'तेरी पायल मेरे गीत' में हसन कमाल ने गीत लिखे थे जिन्हे लता जी ने गाया था। और फिर फ़िल्म 'सिलसिला' का वह ख़ूबसूरत गीत भी तो है "सर से सरकी सर की चुनरिया लाज भरी अखियों में"। इसमें हसन कमाल ने "सरकी" और "सर की" का कितनी सुंदरता से प्रयोग किया था।

'ऐतबार' सन् १९८५ की रोमेश शर्मा की फ़िल्म थी जिसका निर्देशन किया था मुकुल आनंद ने। डिम्पल कपाडिया, राज बब्बर, सुरेश ओबेरॊय और डैनी अभिनीत इस फ़िल्म में हसन कमाल के अलावा फ़ारुख़ कैसर ने भी गीत लिखे थे। यह फ़िल्म १९५४ में ऐल्फ़्रेड हिचकॊक की थ्रिलर फ़िल्म 'डायल एम फ़ॊर मर्डर' का रीमेक है। इस हिदी वर्ज़न में थोड़ी सी फेर बदल की गई है। फ़िल्म में सुरेश ओबेरॊय एक ग़ज़ल गायक हैं और उन्ही पर फ़िल्म के दो बेहतरीन गीत - प्रस्तुत ग़ज़ल और "लौट आ गईं फिर से उजड़ी बहारें" फ़िल्माया गया है। इस ग़ज़ल की बात करें तो इसके शायर हसन कमाल ने सच में कमाल ही किया है इसमें। कुल ६ शेर हैं इस ग़ज़ल में और उसके बाद ग़ज़ल को एक आख़िरी सातवें शेर से ख़त्म किया जाता है जिसका मीटर अलग है। ज़्यादातर इस तरह का शेर ग़ज़ल के शुरुआती शेर के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन यहाँ ग़ज़ल के अंत में इसका प्रयोग हुआ है और वह भी फ़िल्म के शीर्षक को शेर में लाकर हसन साहब ने अपनी दक्षता का परिचय दिया है। हसन कमाल साहिर लुधियानवी के अनन्य भक्त थे और उन्हे बहुत मानते थे। हसन साहब सन् १९९९ में विविध भारती पर "मेरी यादों में साहिर लुधियानवी" शीर्षक से एक कार्यक्रम प्रस्तुत किया था और साहिर साहब से जुड़ी उनकी तमाम यादों पर से परदा उठाया था। आइए उसी कार्यक्रम में से कुछ अंश यहाँ पेश करते हैं। हसन कमाल बता रहे हैं साहिर लुधियानवी से उनकी पहली मुलाक़ात के बारे में। "साहिर लुधियानवी साहब से मेरी पहली मुलाक़ात लखनऊ में हुई थी, जब मैं लखनऊ यूनिवर्सिटी का स्टुडेण्ट था, और वो यूनिवर्सिटी के एक मुशायरे में पहली बार लखनऊ आ रहे थे। ये वो ज़माना था जब साहिर लुधियानवी का वो क्रेज़ था कि लोग कहते थे कि अगर कोई साहिर लुधियानवी का नाम नहीं जानता, तो या तो वो शायरी के बारे में कुछ नहीं जानता, या फिर वो नौजवान नहीं, क्योंकि साहिर साहब उस ज़माने में नौजवानों के मेहबूबतरीन शायर हुआ करते थे। मुझे अच्छी तरह याद है कि मैं उन्हे रिसीव करने के लिए दूसरे स्टुडेण्ट्स के साथ चारबाग़ पहुँचा, तो मेरी ख़ुशी का यह हाल था कि जैसे न जाने ये मेरी ज़िंदगी का कौन सा दिन है और किस हस्ती के दीदार होने वाले हैं कि जिसके दीदार के बग़ैर हमें यह लग रहा था कि ज़िंदगी अधूरी रहेगी। वो तशरीफ़ लाए, हम लोग उन्हे वहाँ से रिसीव करके लाए, और उन्हे एक होटल में ठहराया गया, और मेरा उनसे तारुफ़ यह कह कर करवाया गया कि 'साहिर साहब, ये हसन कमाल हैं, हमारे बहुत ही तेज़ और तर्रार क़िस्म के तालीबिल्मों में, स्टुडेण्ट्स में, और इनकी सब से बड़ी ख़ुसूसीयत यह है कि इन्हे आप की नज़्म 'परछाइयाँ', जो १९ पेजेस लम्बी नज़्म है, ज़बानी याद है'। साहिर साहब बहुत ख़ुश हुए, और शाम को जब हम उन्हे लेने गए तो वक़्त से कुछ पहले पहुँच गए थे, तो उन्होनें बात करते करते अचानक कहा कि 'भई, किसी ने मुझे बताया कि तुम्हे 'परछाइयाँ' पूरी याद है?' मैंने अर्ज़ किया कि 'जी हाँ'। कहने लगे कि 'अच्छा, सुनाओ'। और मैंने पूरी 'परछाइयाँ' नज़्म उनको एक ही नशिस्त में पढ़ कर सुना दी। और वो सुनते रहे। और जब नज़्म ख़त्म हुई तो उनका कमेण्ट यह था कि 'भई ऐसा है, कि मैं पंजाबी हूँ, और शेर बहुत बुरा पढ़ता हूँ, और आज जब तुमको अपनी नज़्म पढ़ते सुना, तो मुझे यह महसूस हो रहा है कि आज के मुशायरे में मेरे बजाए मेरी शायरी तुम ही सुनाना'।" कॊलेज स्टुडेण्ट हसन कमाल के लिए यह बहुत बड़ी बात थी कि साहिर जैसे शायर अपनी शायरी उनसे पढ़वाना चाहते थे। तो दोस्तों, आइए सुना जाए भूपेन्द्र और आशा भोसले की गाई इस जोड़े की सब से प्यारी ग़ज़ल "किसी नज़र को तेरा इंतेज़ार आज भी है"। शायद 'ओल्ड इज़ गोल्ड' को भी इस ग़ज़ल का बहुत दिनों से इंतेज़ार था।

किसी नज़र को तेरा इंतेज़ार आज भी है,
कहाँ हो तुम के ये दिल बेक़रार आज भी है।

वो वादियाँ वो फ़ज़ाएँ के हम मिले थे जहाँ,
मेरी वफ़ा का वहीं पर मज़ार आज भी है।

न जाने देख के क्यों उनको ये हुआ अहसास,
के मेरे दिल पे उन्हे इख़्तियार आज भी है।

वो प्यार जिसके लिए हमने छोड़ दी दुनिया,
वफ़ा की राह में घायल वो प्यार आज भी है।

यकीं नहीं है मगर आज भी ये लगता है,
मेरी तलाश में शायद बहार आज भी है।

ना पूछ कितने मोहब्बत के ज़ख़्म खाए हैं,
के जिनके सोच में दिल सौगवार आज भी है।

ज़िंदगी क्या कोई निसार करे, किससे दुनिया में कोई प्यार करे,
अपना साया भी अपना दुश्मन है, कौन अब किसका ऐतबार करे।



क्या आप जानते हैं...
कि बप्पी लाहिड़ी ने केवल १६ वर्ष की आयु में एक बंगला फ़िल्म 'दादू' में संगीत दिया था जिसमें तीनों मंगेशकर बहनों (लता, आशा, उषा) से उन्होने गाने गवाए थे।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. शायर बताएं इस बेहद खूबसूरत गज़ल के - ३ अंक.
२. खय्याम साहब के संगीत से सजी इस गज़ल को किस फनकार ने अंजाम दिया है लता के साथ - २ अंक.
३. मतले में शब्द है -"बारात", फिल्म बताएं - १ अंक.
४. निर्देशक बताएं फिल्म के - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
३ अंक पवन कुमार जी लूट गए, शरद जी, प्रतिभा जी और किशोर जी भी सही जवाब के साथ मिले. शरद जी नेट पर डी गयी हर जानकारी सही नहीं होती. रोमेंद्र जी आप लेट हो गए. मनु जी, सुमित जी, शेयाला जी, और इंदु जी आप सब को यहाँ देख अच्छा लगा, और दिलीप जी, इंदु जी की शिकायत में हम अपनी भी आवाज़ मिलते हैं. :)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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