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Saturday, November 8, 2014

इसकी टोपी उसके सर - प्रसिद्ध ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड कलेक्टर वी. एस. दत्ता बता रहे हैं पुराने ज़माने के कुछ इन्स्पायर्ड गीतों के बारे में




स्मृतियों के स्वर - 12

प्रसिद्ध ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड कलेक्टर वी. एस. दत्ता बता रहे हैं पुराने ज़माने के कुछ इन्स्पायर्ड गीतों के बारे में

इसकी टोपी उसके सर





'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों से साक्षात्कार करवाये जाते थे और जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत के इन हस्तियों की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकिया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर, महीने के हर दूसरे और चौथे शनिवार को इसी ख़ज़ाने में से मैं निकाल लाता हूँ कुछ अनमोल मोतियाँ हमारे इस स्तम्भ में, जिसका शीर्षक है - स्मृतियों के स्वर। इस स्तम्भ के अन्तर्गत हम और आप साथ मिल कर गुज़रते हैं स्मृतियों के इन हसीन गलियारों से। आज हम आपकी मुलाक़ात करवा रहे हैं प्रसिद्ध ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड कलेक्टर वी. एस. दत्ता से। दत्ता साहब बता रहे हैं गुज़रे ज़माने के कुछ ऐसे मशहूर गीतों के बारे में जो प्रेरित थे अन्य फ़िल्मी गीतों से ही। यानी कि इसकी टोपी उसके सर। आनन्द लीजिये, ऐसे गीतों के साथ।





सूत्र: जुबिली झंकार, विविध भारती, 3 सितंबर 2008


1. "लेके पहला पहला प्यार, भरके आँखों में ख़ुमार..." (सी.आई.डी. 1956)

देखिये, यह तो नौशाद साहब ने आपको 'विविध भारती' में ही बताया था कि वो जो गाना है "जादू नगरी से आया है कोई जादूगर", उसकी ट्यून मेरे गीत से नकल की हुई है। वह जो एक उनकी फ़िल्म आयी थी 'नमस्ते', शायद 1943 में, उसमें एक गाना था "दिल ना लगे मोरा, जिया ना लगे, मन ना लगे, नेक-टाई वाले बाबू को बुलाते कोई रे..."। इस गीत की धुन हू-ब-हू "जादू नगरी से आया है कोई जादूगर" जैसा है। तो यह 'नमस्ते' फ़िल्म आई थी 1942-43 में, और 'CID' आयी थी 1956 में, यानी इसके 13 साल बाद। तो नय्यर साहब ने नौशाद की धुन को उठा लिया। लीजिए, पहले आप फिल्म सी. आई. डी. का और फिर फिल्म 'नमस्ते' का गाना सुनिए। 


फिल्म - सी. आई. डी. : 'लेके पहला पहला प्यार भरके आँखों में खुमार...' : शमशाद बेगम और मोहम्मद रफी : संगीत - ओ. पी. नैयर




फिल्म - नमस्ते : 'दिल न लगे मोरा जिया न लगे...' : संगीत - नौशाद : गीत - दीनानाथ मधोक




2. "आये भी अकेला जाये भी अकेला" (दोस्त, 1954)

तलत महमूद साहब का फ़िल्म 'दोस्त' का गीत "आये भी अकेला जाये भी अकेला, दो दिन की ज़िन्दगी है दो दिन का मेला" एक बहुत मशहूर गीत है, आपने सुना होगा। हंसराज बहल का संगीत था। इसका जो है पंजाबी फ़िल्म 'लच्छी' (1949) से लिफ़्ट किया गया था। सिर्फ़ धुन ही नहीं बल्कि बोल भी। और 'लच्छी' में जो है इसको मोहम्मद रफ़ी साहब ने गाया था, और बेहतरीन गाना था, "जगवाला मेला यारों थोड़ी देर दा, हँस दे या रात लंगी पता नहीं सवेर दा..."। यह गाना पीछे रह गया और वह गाना आगे निकल गया। यह संगीतकार शार्दूल क्वात्रा के करीयर का शुरुआती गीत था; उस समय वो हंसराज बहल साहब के सहायक हुआ करते थे। मतलब बहल साहब ने अपने सहायक की धुन को बाद में इस्तेमाल किया अपने गीत में। कहा जाता है कि एक बार हंसराज बहल बम्बई से बाहर गये थे, तब गीतकार नाज़िम पानीपती ने क्वात्रा को एक गीत की धुन बनाने को कहा, और तभी उन्होंने इस गीत की धुन बनाई थी। अब आप इन इन दोनों गीतों को सुनिए।


फिल्म - दोस्त : 'आए भी अकेला जाए भी अकेला...' : तलत महमूद : संगीत - हंसराज बहल




फिल्म - लच्छी (पंजाबी) : 'जगवाला मेला यारों थोड़ी देर दा...' : मोहम्मद रफी : संगीत शार्दूल क्वात्रा 


 
3. "ख़ुशी का ज़माना गया रोने से अब काम है" (छोटी भाभी, 1950)

इसी तरह से और भी गाने थे जो पंजाबी में थे। एक गाना था जिसे नूरजहाँ ने गाया था, "हूक मेरी क़िस्मत सो गई जागो हुज़ूर रे...", इसे फिर फ़िल्म 'छोटी भाभी' में हुस्नलाल-भगतराम ने लिफ़्ट किया और बना दिया "ख़ुशी का ज़माना गया रोने से अब काम है, प्यार इसका नाम था जुदाई इसका नाम है..." जिसे रफ़ी साहब और लता जी ने गाया। तो ऐसे लोग धुन एक दूसरे की लिफ़्ट करते आये हैं और यह परम्परा आज भी जारी है। नूरजहाँ का गाया गीत उपलब्ध नहीं पाया है, फ़िल्म 'छोटी भाभी' का गीत अब आप सुनें।


फिल्म - छोटी भाभी : 'खुशी का जमाना गया रोने से अब काम है...' : मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर : संगीत - हुस्नलाल भगतराम 



4. "तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा" (आख़िरी दाव, 1958)

आज इसको लेकर काफ़ी चर्चा होती है, कानून तक में जाने की भी बात भी होती रहती है, लेकिन उस वक़्त तो कितना अनायास होता था और इस बात को लेकर कोई किसी से कुछ कहता तक नहीं था। पर एक गाना था जिसके लिफ़्ट करने पर सज्जाद हुसैन काफ़ी बिगड गये थे मदन मोहन पर। तलत महमूद का जो गाना था ना "ये हवा ये रात ये चांदनी", फ़िल्म 'संगदिल' का, इसके आधार पर मदन मोहन साहब ने गाना बना दिया "तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा...", इसमें क्या हुआ कि सज्जाद साहब जिन्होंने "ये हवा ये रात" बनाया था, वो बिगड़ गये थे मदन मोहन पे, "तुमने कैसे मेरे गाने से लिफ़्ट किया?" मदन मोहन ने कहा कि हुज़ूर, मैंने सोचा कि उसी धुन को थोड़ा सा बदलकर देखें तो कैसा लगेगा। पर उसके बाद मदन मोहन ने कहा कि मैंने ऐसी गुस्ताख़ी फिर कभी नहीं की।


फिल्म - आखिरी दाव : 'तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा...' मोहम्मद रफी : संगीत - मदन मोहन : गीत मजरूह सुल्तानपुरी




फिल्म - संगदिल : 'ये हवा ये रात ये चाँदनी...' : तलत महमूद : संगीत - सज्जाद हुसैन



5. "हमारी गली आना" (मेमसाहिब, 1956)

एक 'शुक्रिया' फ़िल्म आयी थी, जिसमें एक गाना था "हमारी गली आना अच्छा जी, हमें ना भुलाना अच्छा जी...", जिसे बाद में 'मेमसाहिब' फ़िल्म में तलत महमूद और आशा भोसले ने गाया। इसको 'मेमसाहिब' में बिल्कुल सेम टू सेम लिफ़्ट किया गया है संगीतकार मदन मोहन ने। लेकिन ऑरिजिनल 'शुक्रिया' फ़िल्म का गाना था, पुराना, 1944 की फ़िल्म, जिसमें रमोला हीरोइन थीं, पर वह वाला गाना हिट नहीं हो पाया। इसके संगीतकार थे जी. ए. चिश्ती। इन दोनों गीतों को आप सुनिए और अन्तर खोजिए।


फिल्म - मेमसाहिब : 'हमारी गली आना अच्छा जी...' : तलत महमूद और आशा भोसले : संगीत - मदन मोहन 




फिल्म - शुक्रिया : 'हमारी गली आना अच्छा जी...' : नसीम अख्तर और अमर : संगीत - जी.ए. चिश्ती 




कॉपीराइट: विविध भारती



तो दोस्तों, आज बस इतना ही। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आयी होगी। अगली बार ऐसे ही किसी स्मृतियों की गलियारों से आपको लिए चलेंगे उस स्वर्णिम युग में। तब तक के लिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार! इस स्तम्भ के लिए आप अपने विचार और प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में व्यक्त कर सकते हैं, हमें अत्यन्त ख़ुशी होगी।


प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 





Saturday, October 18, 2014

"क़िस्मत ने हमें रोने के लिए दुनिया में अकेला छोड़ दिया...", क्यों आँखें भर आईं सुरैया की इस गीत को फ़िल्माते हुए?


एक गीत सौ कहानियाँ - 43
 

‘क़िस्मत ने हमें रोने के लिए दुनिया में अकेला छोड़ दिया...






'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 43-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'मोतीमहल' के गीत "क़िस्मत ने हमें रोने के लिये दुनिया में अकेला छोड़ दिया" के बारे में।




फ़िल्मों में कलाकार अपना अपना किरदार निभाते हैं, कई रिश्तों को पर्दे पर साकार करना होता है, जैसे कि पति-पत्नी, माँ-बेटा, पिता-पुत्री, भाई-बहन, दो बहनें आदि। पर्दे पर भले दो कलाकारों के बीच का रिश्ता बिल्कुल पक्का दिखाई दे, पर यह तो हक़ीक़त नहीं। शूटिंग ख़त्म होते ही सब अपनी अपनी राह पर आगे बढ़ निकलते हैं। लेकिन कई बार ऐसा भी हुआ कि फ़िल्मों में एक साथ अभिनय करते-करते दो कलाकार असली ज़िन्दगी में भी बहुत क़रीब आ गये हों। जी नहीं, मैं उन कलाकारों की बात नहीं कर रहा जिन्होंने एक दूसरे से शादी कर ली। बल्कि मेरा इशारा है उन दो अभिनेत्रियों की तरफ़ है, जिनका एक साथ अभिनय करते हुए आपस में बहनों जैसा रिश्ता बन गया था। बल्कि यूँ कहें कि वो दो बहनें बन चुकी थीं। ज़िक्र हो रहा है सिंगिंग स्टार सुरैया और प्यारी सी बेबी तबस्सुम का। सन् 1950 की फ़िल्म 'बड़ी बहन' और 1952 की फ़िल्म 'मोती महल' में बेबी तबस्सुम और सुरैया जी ने एक साथ काम किया। इसमें तबस्सुम ने सुरैया की छोटी बहन का रोल निभाया था। और यह दोनो किरदार निभाते-निभाते हक़ीक़त में एक दूसरे से बहनों जैसा प्यार करने लगीं। बेबी तबस्सुम सुरैया को आपा कह कर बुलाने लगी। एक अजीब सा अपनापन दोनो एक दूसरे में महसूस करने लगीं। फ़िल्म 'मोती महल' की कहानी ऐसी थी कि जिसमें तबस्सुम के किरदार को मरना होता है। यह जानकर सुरैया काँप उठीं; उनके हाथ-पाँव ठंडे हो गये यह सोच कर कि यह सीन वो कैसे करेंगी। वो ऐसा हक़ीक़त में तो दूर फ़िल्म की कहानी में भी नहीं सोच सकती थी कि तबस्सुम की बेजान शरीर उनके सामने रखी है। उस पर से फ़िल्म के निर्देशक रवीन्द्र दवे ने सुरैया को बताया कि तबस्सुम के किरदार के मरने वाले सीन में एक गाना रखा गया है जो उन्हें गाना है। और वह गीत था "क़िस्मत ने हमें रोने के लिए दुनिया में अकेला छोड़ दिया, "। सुरैया सोच में पड़ गईं कि 3 मिनट तक तबस्सुम के मरने के इस सीन को वो कैसे झेल पायेंगी?

असद भोपाली व हंसराज बहल
ख़ैर, फ़िल्म की कहानी और निर्देशक के फ़ैसले को ध्यान में रखते हुए सुरैया ने अपनी निजी परेशानी का ज़िक्र किसी से नहीं किया और यह सीन करने के लिए तैयार हो गईं और प्रोफ़ेशन के साथ अन्याय नहीं होने दिया। इस सीन के शूटिंग का दिन आ ही गया। इस ईमोशनल सीन के लिए जब सुरैया जी को ग्लिसरीन दी गई आँखों में डालने के लिए, तो सुरैया जी ने आँखों में ग्लिसरीन डालने से मना कर दिया। बेबी तबस्सुम की तरफ़ देखते हुए उससे कहा, "बस इस गाने में शॉट के समय तुम मेरे सामने रहना। तुम मेरी बहन की तरह हो, तुम्हे देख कर सच में मुझे लगेगा कि मेरी बहन मेरे सामने है और मुझे अपने आप ही रोना आ जायेगा। ग्लिसरीन की कोई ज़रूरत नहीं है"। गाना शुरू हुआ, गीतकार असद भोपाली ने ऐसे दिल को छू लेने वाले बोल लिखे और संगीतकार हंसराज बहल ने ऐसी करुण धुन बनाई कि सुरैया की आँखें भर आईं और सीन बिल्कुल जीवन्त लगने लगा। यह एक ग़ज़लनुमा गीत था जिसके अन्तरों के शेर थे "सुख चैन लुटा दुख दर्द मिला बेचैन है दिल मजबूर है हम, दुनिया ने हमारे जीने का हर एक सहारा तोड़ दिया" और "बेदर्द ख़िज़ाँ की नज़रों से मासूम बहारें बच ना सकीं, लो आज चमन में आँधी ने डाली से कली को तोड़ दिया"। गाने की शूटिंग्‍ के दौरान सुरैया जी के सामने तबस्सुम रहीं और सुरैया जी बस तबस्सुम को देखतीं गईं और ज़ार-ज़ार रोती रहीं। और इस तरह से अपनी छोटी बहन के मरने के सीन को सुरैया ने पर्दे पर निभाया।

सुरैया व तबस्सुम
फ़िल्म 'मोती महल' में ही सुरैया और तबस्सुम पर फ़िल्माया हुआ एक और गाना था जिसके बोल थे "छी छी छी रोना नहीं..."। सुरैया के साथ गीत में आवाज़ थी शमशाद बेग़म की जिन्होंने तबस्सुम के लिए गाया। तबस्सुम जी के अनुसार इस फ़िल्म के बाद वो सुरैया जी के और भी ज़्यादा क़रीब आ गईं। जैसा कि सभी को मालूम है कि सुरैया और देव आनन्द के बीच एक प्रेम का रिश्ता बना था और वो दोनों एक दूसरे से शादी भी करना चाहते थे, पर सुरैया की नानी को इस रिश्ते से ऐतराज़ होने की वजह से सुरैया और देव आनन्द का आपस में मिलना-जुलना तक बन्द हो गया था। ऐसी स्थिति में वह तबस्सुम ही थीं जो इन दोनो के बीच की कड़ी बनी। यानी कि तबस्सुम के माध्यम से ही सुरैया और देव आनन्द एक दूसरे को ख़ैर-ख़बर पहुँचाया करते थे। तबस्सुम जी ने सुरैया जी को बहुत क़रीब से जाना है। देव आनन्द ने तो शादी कर ली, पर सुरैया आजीवन अविवाहित ही रहीं और अपनी नानी के आगे नहीं झुकीं। उन्होंने अपनी नानी को साफ़ कह दिया था कि आपने देव आनन्द के साथ रिश्ते को स्वीकारा नहीं, इसलिए मैं भी किसी और रिश्ते को नहीं स्वीकार करूँगी। सुरैया की यह सफल प्रेम की दास्तान इतनी सशक्त है कि किसी फ़िल्मकार की आज तक हिम्मत नहीं हुई इसे पर्दे पर साकार करने की। सुरैया जी के अन्तिम दिनों में उन्होंने सबसे खु़द को अलग कर लिया था, किसी से वो मिलती नहीं थीं। तब ये तबस्सुम जी ही थीं जो उनके सम्पर्क में रहीं। वो बताती हैं कि सुरैया ने अपने आप को जैसे घर में क़ैद कर लिया हो। किसी के लिए दरवाज़ा तक नहीं खोलती थीं। जब जब तबस्सुम उनसे मिलने जाती तो बाहर रखे दूध के पैकेट और बहुत दिनों के अख़बार उठाकर अन्दर ले जाती। फोन पर अपनी आपा से हुई आख़िरी बातचीत को याद करते हुए तबस्सुम कहती हैं कि उन्होंने जब पूछा सुरैया जी से "आपा आप कैसी हैं?", तो सुरैया जी का जवाब था "कैसी गुज़र रही है सब पूछते हैं मुझसे, कैसे गुज़ारती हूँ कोई नहीं पूछता"। और इस बातचीत के कुछ ही दिनों बाद आपा इस दुनिया से चली गईं। सुरैया जैसी स्टार का अन्त भी बहुत दुर्भाग्यपूर्ण था। कोई सोच सकता था कि एक ज़माने में सारी दुनिया की चहेती, सारी दुनिया से घिरी रहने वाली सुरैया का आख़िरी वक़्त तनहा बीतेगा? उनके पास कोई नहीं होगा, न उनका कोई अपना, न पराया। सुरैया का इन्तकाल हुआ था साल 2004 में। और इससे 52 साल पहले सुरैया ने पर्दे पर तबस्सुम के किरदार के मरने पर गीत गाया था "क़िस्मत ने हमें रोने के लिए दुनिया में अकेला छोड़ दिया", और 52 साल बाद जब सुरैया हक़ीक़त में इस फ़ानी दुनिया को अल्विदा कह गईं तब जाकर तबस्सुम जी को अहसास हुआ कि 52 साल पहले अपनी बहन के मरने के सीन को करते हुए सुरैया जी को कितनी तक़लीफ़ हुई होगी।

फिल्म - मोती महल - 1952 : 'किस्मत ने हमें रोने के लिए दुनिया में अकेला छोड़ दिया...' : गायिका - सुरैया : गीत - असद भोपाली : संगीत - हंसराज बहल 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर। 





अपना मनपसन्द स्तम्भ पढ़ने के लिए दीजिए अपनी राय



नए साल 2015 में शनिवार के नियमित स्तम्भ रूप में आप कौन सा स्तम्भ पढ़ना सबसे ज़्यादा पसन्द करेंगे?

1.  सिने पहेली (फ़िल्म सम्बन्धित पहेलियों की प्रतियोगिता)

2. एक गीत सौ कहानियाँ (फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया से जुड़े दिलचस्प क़िस्से)

3. स्मृतियों के स्वर (रेडियो (विविध भारती) साक्षात्कारों के अंश)

4. बातों बातों में (रेडियो प्लेबैक इण्डिया द्वारा लिये गए फ़िल्म व टीवी कलाकारों के साक्षात्कार)

5. बॉलीवुड विवाद (फ़िल्म जगत के मशहूर विवाद, वितर्क और मनमुटावों पर आधारित श्रृंखला)


अपनी राय नीचे टिप्पणी में अथवा cine.paheli@yahoo.com या radioplaybackindia@live.com पर अवश्य बताएँ।



खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
 प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

Saturday, February 6, 2010

मैं तेरी हूँ तू मेरा है....मधुबाला जावेरी का नटखट अंदाज़ निखारा हंसराज बहल ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 337/2010/37

'हमारी याद आएगी' के आज के अंक में गूंजने वाली है एक और बेहद मधुर गायिका की आवाज़। वक़्त के साथ साथ इस गायिका की यादें ज़रा धुंधली सी हो गई है और आज शायद ही आम ज़िंदगी में हम रोज़ इन्हे याद करते हैं, लेकिन किसी ज़माने में इनके गाए गीतों से संगीत रसिक काफ़ी मुतासिर हुआ करते थे। फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर की एक और कमचर्चित गायिका मधुबाला ज़वेरी हैं आज के इस कड़ी की आवाज़। चर्चित कलाकारों के बारे में तो बहुत सारे तथ्य हमें कहीं ना कहीं से मिल ही जाते हैं, लेकिन इन कमचर्चित फ़नकारों के बारे में जानकारी इकट्ठा करना कभी कभी बेहद मुश्किल सा हो जाता है। मधुबाला ज़वेरी के बारे में भी बहुत ज़्यादा जानकारी तो हम एकत्रित नहीं कर सके, लेकिन यहाँ वहाँ से कुछ कुछ बातें हमने मालूम ज़रूर किए हैं ख़ास इस कड़ी को संवारने के लिए। मधुबाला जी का जन्म सन् १९३२ के करीब हुआ था। 'करीब' हम इसलिए कह रहे हैं दोस्तों क्योंकि उनकी जन्म तिथि हम मालूम नहीं कर पाए, लेकिन ३० जुलाई २००६ को मुंबई के चार्नी रोड हॊल में मधुबाला जी के सम्मान में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था जिसमें उनकी ७४ वर्ष की आयु होने की बात कही गई थी। इसी से हम यह अदाज़ा लगा रहे हैं कि उनका जन्म १९३२-३३ के आसपास हुआ होगा! दोस्तों, ज़िंदगी की नाव को आगे बढ़ाने के लिए सांसों के पतवार की ज़रूरत पड़ती है, कली को फूल बनकर खिलने के लिए सूरज के रोशनी की ज़रूरत पड़ती है। दीये में चाहे कितना भी तेल क्यों ना हो, अगर उसकी लौ को समय समय पर उपर की तरफ़ बढ़ाया ना जाए तो दीया बुझ जाता है। कहने का तात्पर्य यही है कि किसी नई प्रतिभा को पहचान कर उसे मौका देनेवाला संगीतकार का उसकी सफलता के पीछे बहुत बड़ा हाथ होता है। और मधुबाला ज़वेरी के लिए यह हाथ था संगीतकार हंसराज बहल का। जी हाँ, इन्होने ही सब से ज़्यादा गानें मधुबाला जी से गवाये। इसलिए आज के इस कड़ी के लिए हमने इसी जोड़ी का गीत चुना है। फ़िल्म 'जग्गु' का गीत है "मैं तेरी हूँ तू मेरा है, दिल तेरा है ये लेता जा "। गीतकार असद भोपाली। बड़ा ही नटखट गीत है और नायिका ही इसमें अपना प्रेम निवेदन कर रही है। फ़िल्म 'जग्गु' का निर्माण जगदीश सेठी ने सन् १९५२ में किया था, जिसके मुख्य कलाकार थे श्यामला और कमल कपूर। जगदीश सेठी ने भी एक भूमिका अदा की थी और अभिनेत्री नंदा बाल कलाकार के रूप में इस फ़िल्म में नज़र आईं थीं। इसी फ़िल्म से गीतकार नक्श ल्यालपुरी ने अपना फ़िल्मी गीत लेखन का सफ़र शुरु किया था, लेकिन आज का गीत असद भोपाली साहब का लिखा हुआ है।

दोस्तों, सन् १९८१ में विविध भारती के किसी कार्यक्रम में संगीतकार हंसराज बहल ने शिरकत की थी, जिसका अभी हाल ही में विविध भारती के स्वर्ण जयंती के उपलक्ष्य पर आयोजीत शृंखला 'स्वर्ण-स्मृति' के अंतरगत दोहराव किया गया था। उस इंटरव्यू में बहल साहब ने बताया था कि उन्होने ही पहली बार मधुबाला ज़वेरी को अपनी फ़िल्म में गवाया था। तो आज हम यहाँ पर उसी इंटरव्यू का वही हिस्सा पेश कर रहे हैं। हंसराज बहल से विविध भारती की तरफ़ से बात कर रहीं हैं अनुराधा जोशी:

प्र: और आप ने अपने संगीतकार होने के नाते कई कलाकारों को मौका दिया होगा, उनके बारे में आप कुछ बताएँगे? उन कलाकारों के बारे में?

उ: देखिए, ये तो, जब हम काम करते हैं तो बहुत आर्टिस्ट्स आए हमारे पास, हम ने भी कोशिश यही की है कि जो अच्छे कलाकार हैं, उनको आगे आने ही चाहिए, जैसे जैसे चांस मिलता रहा, हम कोशिश करते रहे। उनको गवाए भी हैं।

प्र: मधुबाला ज़वेरी को आप ने सब से पहले गवाया था?

उ: जी हाँ, 'अपनी इज़्ज़त', 'जग्गु', 'मोती महल' जैसी फ़िल्मों में मैंने उनको गवाया था।

और दोस्तों, इन फ़िल्मों के अलावा भी 'शाह बहराम', 'दोस्त', 'हनुमान जन्म', 'राजपूत', 'नक़ाबपोश', आदि कई फ़िल्मों में बहल साहब ने मधुबाला जी को गवाया था। और बहल साहब के अलावा जिन संगीतकारों ने उनसे गानें गवाए उनमें शामिल हैं जमाल सेन, इक़बाल क़ुरेशी, विनोद, अविनाश व्यास, राम गांगुली, शिवराम कृष्ण, बिपिन-बाबुल, हुस्नलाल-भगतराम, बुलो. सी. रानी, ए. आर. क़ुरेशी, शंकर दासगुप्ता, नारायण दत्ता, और शंकर जयकिशन ने भी। जी हाँ, फ़िल्म 'बूट पॊलिश' का वह गीत आपको याद है ना "ठहर ज़रा ओ जानेवाले", उस गीत में रफ़ी और आशा के साथ आवाज़ मिलाई थी मधुबाला ज़वेरी ने ही। ख़ैर, ये तो थी चंद बातें मधुबाला ज़वेरी से संबंधित, आइए अब आज का गीत सुना जाए और गीत को सुनते हुए सलाम कीजिए मधुबाला ज़वेरी और हंसराज बहल की जोड़ी को!



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

सूनी सेज फिर महकेगी,
सूना आंगन गूंजेगा,
झांझर की झनकारों से,
मेरा सोहणा यार जब आएगा...

अतिरिक्त सूत्र- पंजाब की मिटटी की महक है साहिर के लिखे इस गीत में

पिछली पहेली का परिणाम-
सुबह ८ बजे तक तो कोई जवाब नहीं आया, वैसे गीत मुश्किल भी था बूझना....खैर

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, May 12, 2009

भूल जा सपने सुहाने भूल जा....रचने वाले हंसराज बहल को भूला दिया दुनिया ने...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 78

दोस्तों, फ़िल्म जगत में बहुत से ऐसे संगीतकार हुए हैं जिन्होने काम तो बहुत किया है लेकिन उनकी क़िस्मत ने उनका इतना साथ नहीं दिया कि वो भी शोहरत की बुलन्दियों को छू पाते। ऐसे ही एक संगीतकार रहे हैं हंसराज बहल। राजधानी, मिलन, मिस बाम्बे, चंगेज़ ख़ान, सावन, और सिकंदर-ए-आज़म उनकी कुछ चर्चित फ़िल्में रही हैं। गायिका आशा भोंसले ने अपना पहला हिन्दी फ़िल्मी गीत इन्ही के संगीत निर्देशन में १९४८ में फ़िल्म 'चुनरिया' के लिए गाया था। हंसराज बहल ने गायिका मधुबाला ज़वेरी को भी उनका पहला ब्रेक दिया था। हंसराज बहल के छोटे भाई गुलशन बहल के साथ मिलकर वो निर्माता भी बने और अपने बैनर का नाम रखा अपने पिता निहाल चन्द्र के नाम पर, एन. सी. फ़िल्म्स। इस बैनर के तले पहली फ़िल्म बनी थी 'लाल परी' और आगे चलकर कुछ २० के आसपास फ़िल्में इन दोनो भाइयों ने बनाये और इन सभी फ़िल्मों में हंसराज का संगीत था। इसी बैनर के तले बनी थी १९५६ की फ़िल्म 'राजधानी' जिसका एक बड़ा ही मशहूर गीत आज हम आपके लिए लेकर आए हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में। "भूल जा सपने सुहाने भूल जा" तलत महमूद और लता मंगेशकर के गाये युगल गीतों में एक ख़ास जगह रखता है।

फ़िल्म 'राजधानी' के मुख्य कलाकार थे सुनिल दत्त और निम्मी और इस फ़िल्म का निर्देशन किया था नरेश सहगल ने। प्रस्तुत गीत में सुनिल दत्त को जेल के बंधनों में जकड़े हुए दिखाया गया है, जो ज़िन्दगी से निराश होकर अपने सारे सपनों को भुला देने की बात करता है। उधर दूसरी तरफ़ उनकी प्रेमिका (निम्मी) भी अपने प्रेमी से मिलने को बेचैन होकर पुकार उठती है "कैसे तुझको भुलाऊं साजना"। तूफ़ानी रात का दृश्य है, नदी में उफ़ान आया हुआ है, ऐसे में निम्मी भटकती हुई अपने प्रेमी की तलाश में पहाड़ों, नदी-नालों से होते हुए अपनी जान हथेली पे लेकर भागती चली जाती है। "आयी लहरों का सीना सनम चीर के, जीतना है तुझे तक़दीर से", क़मर जलालाबादी के ऐसे बोल हैं इस गीत में सजे। दर्दभरे सदाबहार युगल गीतों की श्रेणी में इस गीत का शुमार होता है और आज भी इस गीत का वही असर क़ायम है। सुनिए लता-तलत का गाया "भूल जा सपने सुहाने भूल जा"। इस गीत के संगीत सयोजन पर भी ग़ौर कीजिएगा, स्थान, काल, पात्र और गीत के बोलों को एक साथ लेकर चलता है इस गीत का 'और्केस्ट्रेशन'।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. आनंद बख्शी और एल पी की जोड़ी का शायद सबसे पहला गीत.
२. ये सुपरहिट गीत किशोर के जबरदस्त हिट्स में से एक है.
३. एक अंतरे की अंतिम पंक्ति में शब्द है -"वहशत".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम-
कल की पहेली के साथ ही एक और नयी विजेता हमें मिल गयी हैं....रचना जी बहुत बहुत बधाई...एक मुश्किल गीत को सही पहचाना आपने. नीलम जी आपने तो खुद ही लिख दिया कि आपका जवाब गलत क्यों है, और मनु जी ने भी स्पष्ट कर दिया. पराग जी काफी जबर्दस्त जानकार हमें मिले हैं, आपकी जानकारियों से सभी लाभान्वित होते हैं. मनु जी और पी एन साहब आप दोनों का ही नहीं ये गीत ढेरों संगीतप्रेमियों का पसंदीदा गीत है. आपको पसंद आये और इसी बहाने कुछ बीती यादें ताज़ी हो जाए यही हमारा उद्देश्य है.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


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