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Monday, December 20, 2010

हाथ सीने पे जो रख दो तो क़रार आ जाये....और धीरे धीरे प्रेम में गुजारिशों का दौर शुरू हुआ

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 552/2010/252

'एक मैं और एक तू' - फ़िल्म संगीत के सुनहरे दशकों से चुने हुए युगल गीतों से सजी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला की शुरुआत कल हमने की थी 'अछूत कन्या' फ़िल्म के उस युगल गीत से जो फ़िल्म संगीत इतिहास का पहला सुपरहिट युगल गीत रहा है। आज आइए इस शृंखला की दूसरी कड़ी में पाँव रखें ४० के दशक में। सन् १९४७ में देश के बंटवारे के बाद बहुत से कलाकार भारत से पाक़िस्तान चले गये, बहुत से कलाकार वहाँ से यहाँ आ गये, और बहुत से कलाकार अपने अपने जगहों पर कायम रहे। ए. आर. कारदार और महबूब ख़ान यहीं रह जाने वालों में से थे। लेकिन नूरजहाँ जैसी गायिका अभिनेत्री को जाना पड़ा। लेकिन जाते जाते १९४७ में वो दो फ़िल्में हमें ऐसी दे गईं जिनकी यादें आज धुंधली ज़रूर हुई हैं, लेकिन आज भी इनका ज़िक्र छिड़ते ही हमें ऐसा करार मिलता है कि जैसे किसी बहुत ही प्यारे और दिलअज़ीज़ ने अपना हाथ हमारे सीने पर रख दिया हो! शायद आप समझ रहे होंगे कि आज हम आपको कौन सा गाना सुनवाने जा रहे हैं। जी हाँ, नूरजहाँ और जी. एम. दुर्रानी की युगल आवाज़ों में १९४७ की फ़िल्म 'मिर्ज़ा साहिबाँ' का "हाथ सीने पे जो रख दो तो क़रार आ जाये, दिल के उजड़े हुए गुलशन में बहार आ जाये"। एक फ़िल्म 'मिर्ज़ा साहिबाँ' का ज़िक्र तो हमने किया, दूसरी फ़िल्म थी 'जुगनु'। ये दोनों ही फ़िल्में बेहद मक़बूल हुईं थी। 'मधुकर पिक्चर्स' के बैनर तले निर्मित और के. अमरनाथ निर्देशित 'मिर्ज़ा साहिबाँ' फ़िल्म में नूरजहाँ के नायक बने थे त्रिलोक कपूर। संगीतकार पंडित अमरनाथ की यह अंतिम फ़िल्म थी। उनकी असामयिक मृत्यु के बाद उन्हीं के संगीतकार भाइयों की जोड़ी हुस्नलाल और भगतराम ने इस फ़िल्म के गीतों को पूरा किया। अज़ीज़ कशमीरी और क़मर जलालाबादी ने इस फ़िल्म के गानें लिखे जो उस ज़माने में बेहद चर्चित हुए। ख़ास कर आज का प्रस्तुत गीत तो गली गली गूंजा करता था। इसी गायक-गायिका जोड़ी ने इस फ़िल्म में एक और युगल गीत भी गाया था, जिसके बोल थे "तुम आँखों से दूर हो, हुई नींद आँखों से दूर", हालाँकि यह एक ग़मज़दा डुएट था। नूरजहाँ के गाये एकल गीतों में शामिल थे "आजा तुझे अफ़साना जुदाई का सुनाएँ, जो दिल पे गुज़रती है वह आँखों से बतायें" और "क्या यही तेरा प्यार था, मुझको तो इंतज़ार था"। ज़ोहराबाई ने अपनी पंजाबी अंदाज़ में "सामने गली में मेरा घर है, पता मेरा भूल ना जाना" गाया जो चरित्र अभिनेत्री कुक्कू पर फ़िल्माया गया था। नूरजहाँ, शम्शाद बेग़म और ज़ोहराबाई ने भी दो अनूठे गीत गाये थे, "हाये रे उड उड़ जाये मोरा रेशमी दुपट्टा" और "रुत रंगीली आई चांदनी छायी चांद मेरे आजा"।

दोस्तों, नूरजहाँ की बातें तो हमने बहुत की है पहले भी, हाल में भी, और आगे भी करेंगे, क्यों ना आज दुर्रानी साहब की बातें की जाए। हम क्या बातें करेंगे उनकी, लीजिए उन्हीं से सुनिए उनकी दास्तान जो उन्होंने कहे थे अमीन सायानी साहब के एक इंटरव्यु में। "उस वक़्त प्लेबैक सिस्टेम नहीं था। ऐक्टर को ख़ुद ही गाना पड़ता था। बात यह हुई कि जब मैंने अपने आप को फ़िल्म के पर्दे पर हीरो हीरोइन और लड़कियों के आगे पीछे दौड़ते भागते देखा तो मुझे यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। और दो एक फ़िल्मों में काम करने के बाद मैंने फ़िल्मों में काम करने से मना कर दिया, भई हम काम नहीं करेंगे। मतलब यह हुआ कि काम ठुकराने का मतलब भूखों मरना हुआ। अब अपने साथ भी यही मामला हुआ। ख़ैर, मरता क्या ना करता! घर वापस लौटकर जा नहीं सकते, क्योंकि घरवाले बहुत ही पुराने ख़यालात के थे, और फिर नाचाकी भी थी, वो सब इस तरह के काम करने वालों को कंजर कहा करते थे, यानी कि कंजर, 'अरे यार, फ़लाने आदमी का लड़का कंजर हो गया, फ़िल्म-लाइन में काम करता है'। ख़ैर साहब, हम ऐक्टर तो नहीं बन सके, पर गाना हमें बहुत भाया। और हम किसी भी सूरत हाथ पैर मारकर बम्बई रेडियो स्टेशन में ड्रामा आर्टिस्ट की हैसियत से नौकर हो गये"। फिर इसके बाद रेडियो से प्लेबैक सिंगर कैसे बने जी. एम. दुर्रानी साहब, यह कहानी हम फिर किसी रोज़ आपको बताएँगे, आइए फ़िल्हाल सुनते हैं दुर्रानी साहब के साथ नूरजहाँ का गाया फ़िल्म 'मिर्ज़ा साहिबाँ' का यह युगल गीत। आगामी २३ दिसंबर को नूरजहाँ जी की पुण्यतिथि के अवसर पर यह 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की श्रद्धांजली भी है उनके नाम।



क्या आप जानते हैं...
कि जी. एम. दुर्रानी का पूरा नाम ग़ुलाम मुस्तफ़ा दुर्रानी था। १९३५ में ३० रुपय महीने पर सोहराब मोदी की कंपनी 'मिनर्वा' में उन्हें नौकरी मिल गई। उनका गाया हुआ पहला मशहूर गाना था "नींद हमारी ख़्वाब तुम्हारे" (नई कहानी, १९४३)।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 3/शृंखला 06
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -संगीतकार हैं नाशाद.

सवाल १ - किस किस की आवाजें हैं गीत में - १ अंक
सवाल २ - अजीत और गीता बाली पर फिल्माए इस गीत के गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह श्याम जी, कुछ मुश्किल थी कल की पहेली, पर आपके क्या कहने.....शरद जी और अमित जी भी सही जवाब लाये, इंदु जी और दादी की हजारी सलामत

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Saturday, December 19, 2009

नज़र फेरो ना हम से, हम है तुम पर मरने वालों में...जी एम् दुर्रानी साहब लौटे हैं एक बार फिर महफ़िल में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 295

र आज बारी है पराग सांकला जी के पसंद के पाँचवे और फिलहाल अंतिम गीत को सुनने की। अब तक आप ने चार अलग अलग गायक, गीतकार और संगीतकारों के गानें सुने। पराग जी ने अपने इसी विविधता को बरक़रार रखते हुए आज के लिए चुना है दो और नई आवाजों और एक और नए गीतकार - संगीतकार जोड़ी को। सुनवा रहे हैं फ़िल्म 'दीदार' से जी. एम. दुर्रानी और शम्शाद बेग़म की आवाज़ों में शक़ील बदायूनी की गीत रचना, जिसे सुरों में ढाला है नौशाद साहब ने। और गीत है "नज़र फेरो ना हम से, हम है तुम पर मरने वालों में, हमारा नाम भी लिख लो मोहब्बत करने वालों में"। पाश्चात्य संगीत संयोजन सुनाई देती है इस गीत में। लेकिन गीत को कुछ इस तरह से लिखा गया है और बोल कुछ ऐसे हैं कि इस पर एक बढ़िया क़व्वाली भी बनाई जा सकती थी। लेकिन शायद कहानी की सिचुयशन और स्थान-काल-पात्र क़व्वाली के फ़ेवर में नहीं रहे होंगे। फ़िल्म 'दीदार' १९५१ की नितिन बोस की फ़िल्म थी जिसमें अशोक कुमार और दिलीप कुमार पहली बार आमने सामने आए थे। फ़िल्म की नायिकाएँ थीं नरगिस और निम्मी। इस फ़िल्म के युं तो सभी गानें हिट हुए थे लेकिन लता और शम्शाद की आवाज़ों में "बचपन के दिन भुला ना देना" ख़ासा लोकप्रिय हुआ था और आज भी लोग इसे चाव से सुनते हैं। इन दो गायिकाओं के गाए युगल गीतों में यह गीत एक बहुत ऊँचा मुकाम रखता है।

आज दूसरी बार हम इस महफ़िल पर दुर्रानी साहब की आवाज़ सुन रहे हैं। इससे पहले फ़िल्म 'दिलरुबा' में हमने उनकी आवाज़ सुनी थी गीता दत्त के साथ "हमने खाई है जवानी में मोहब्बत की क़सम" गीत में। आइए आज दुर्रानी साहब से जुड़ी कुछ बातें आपको बताएँ। जी. एम दुर्रानी साहब का जन्म सन् १९१९ में पेशावर में हुआ था। १६ साल की उम्र में ही वो अपनी क़िस्मत आज़माने बम्बई चले आए। दो चार फ़िल्मों में उन्होने अभिनय किया लेकिन अभिनय का काम उन्हे अच्छा नहीं लगा। वापस घर नहीं लौटना चाहते थे, इसलिए बम्बई में ही हाथ पैर मार कर रेडियो में ड्रामा आर्टिस्ट बन गए। उन्होने फ़िल्म संगीत में क़दम रखना शुरु किया जाने पहचाने निर्माता निर्देशक और अभिनेता सोहराब मोदी के मिनर्वा कंपनी में। लेकिन यह कंपनी भी बंद हो गई और वो वापस रेडियो से जुड़े रहे। क़िस्मत एक बार फिर उन्हे फ़िल्म संगीत में खींच लाई जब नौशाद साहब ने उन्हे अपनी फ़िल्म 'दर्शन' में गीत गाने का मौका दिया। 'दर्शन' की हीरोइन थीं ज्योति जिनका असली नाम था सितारा बेग़म। और सितारा जी इस मधूर आवाज़ वाले हैंडसम पठान पर मर मिटीं और दोनों की हो गई शादी। और फिर कुछ ही बरसों में शुरु हुआ जी. एम. दुर्रानी साहब के गाए गीतों का वह ज़बरदस्त कामयाब दौर जिसमें उनका नाम चमकता ही गया। उनकी आवाज़ कई फ़िल्मों में सुनाई देने लगी। मगर उनके गाए हुए गीतों की कामयाबी का यह दौर करीब ६-७ साल ही चला, यानी कि १९४३ से लेकर १९५१ तक। और फिर न जाने क्या हुआ कि फ़िल्मी दुनिया उनसे दूर होती चली गई। बरसों बरस पहले १९७८ में दुर्रानी साहब ने अमीन सायानी को एक इंटरव्यू दिया था। उसी इंटरव्यू के अंश संजो कर अमीन भाई ने 'संगीत के सितारों की महफ़िल' में दुर्रानी साहब के गीतों की महफ़िल सजाई थी। कार्यक्रम शुरु करते हुए अमीन भाई ने कुछ इस तरह से कहा था - "दुर्रानी साहब सितारे थे एक नहीं तीन तीन दायरों के थे। जी हाँ, गायन भी, ऐक्टिंग् भी और ब्रॊडकास्टिंग् भी। जी हाँ, आप ही का जो वह रेडियो है ना, उसके भी वो बादशाह हुआ करते थे किसी ज़माने में। मुझे याद है बहनों और भाइयों कि १९७८ में जब वो हमारे स्टुडियो में आए थे तब उनके शोहरत का ज़माना बीत चुका था, और दुर्रानी साहब ने एक आह सी भर के अपने बारे में यह शेर मुझे सुनाया था - "जला है जिस्म मगर दिल भी जल गया होगा, क़ुरेदते हो जब राख़ जुस्तजु क्या है?" मैने दुर्रानी साहब को यक़ीन दिलाया था कि उनके गीतों की गूँज शायद कम हो गई हो, मगर जनता के दिलों में उनकी आवाज़ अभी तक बसी हुई है।" तो दोस्तों, आइए आज का यह गीत सुनते हैं जो दुर्रानी साहब के करीयर के अंतिम गीतों में से एक है। शम्शाद बेग़म से जुड़ी बातें हम फिर किसी दिन करेंगे।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. दक्षिण के एक मशहूर संगीतकार का रचा एक अमर गीत.
२. फिल्म की नायिका भी संगीतकार की पत्नी थी.
३. भारत व्यास के लिखे इस युगल गीत में चार अलग अलग रागों का अद्भुत संगम है.

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह वाह इंदु जी आपको तो मानना पड़ेगा...सही जवाब भी देते हो और उस पर ये भोला पन :), सवाल में हमने ज़रा घुमा कर पुछा था, जो अब तक आप समझ चुकी होंगी. मात्र ५ जवाब दूर हैं अब आप.....बहुत बधाई....दिलीप जी आपका इनपुट बहुत बढ़िया लगा

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, November 12, 2009

हमने खायी है मोहब्बत में जवानी की क़सम....ज्ञान साहब का संगीतबद्ध एक दुर्लभ गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 260

फ़िल्म संगीत के इतिहास में अगर हम झाँकें तो ऐसे कई कई नाम ज़हन में आते हैं, जिन नामों पर जैसे वक़्त की धूल सी चढ़ गई है, और रोज़ मर्रा की ज़िंदगी में जिन्हे हम आज बड़ी मुश्किल से याद करते हैं। लेकिन एक वक़्त ऐसा था जब ये फ़नकार, कम ही सही, लेकिन अपनी प्रतिभा के जौहर से फ़िल्म संगीत के विशाल ख़ज़ाने को अपने अपने अनूठे ढंग से समृद्ध किया था। इनमें शामिल हैं फ़िल्म संगीत के पहली पीढ़ी के कई बड़े बड़े संगीतकार भी, जिन्हे आज की पीढ़ी लगभग भुला ही चुकी है। लेकिन संगीत के सच्चे रसिक आज भी उन्हे याद करते हैं, सम्मान करते हैं। और 'ओल्ड इज़ गोल्ड' एक ऐसा मंच है जो फ़िल्म संगीत के सुनहरे दशकों के हर दौर के कलाकारों को समर्पित है। आज एक ऐसे ही गुणी संगीतकार का ज़िक्र कर रहे हैं, आप हैं फ़िल्म संगीत के पहली पीढ़ी के संगीतकार ज्ञान दत्त। ज्ञान दत्त जी का नाम याद आते ही याद आते हैं सहगल साहब के गाए फ़िल्म 'भक्त सूरदास' के तमाम भजन। 'भक्त सूरदास' और ज्ञान दत्त जैसे एक दूसरे के पर्याय बन गए थे। यह ४० का दौर था। फिर धीरे धीरे बदलते दौर के साथ साथ ज्ञान दत्त भी पीछे पड़ते गए और सन् १९५० में उनकी अंतिम "चर्चित" फ़िल्म आई 'दिलरुबा'। हालाँकि इसके बाद भी उन्होने कुछ फ़िल्मों में संगीत दिए लेकिन वो नहीं चले। आज हम सुनवा रहे हैं फ़िल्म 'दिलरुबा' का एक युगल गीत जिसे गाया है गीता रॉय और जी. एम. दुर्रानी ने। इस फ़िल्म में ज्ञान दत्त के स्वरबद्ध गीतों को लिखे डी. एन. मधोक, बूटाराम शर्मा, नीलकंठ तिवारी, एस. एच, बिहारी और राजेन्द्र कृष्ण जैसे गीतकारों ने। इस फ़िल्म के ज़्यादातर गानें गीता रॉय की आवाज़ में थे, लेकिन दो दुर्लभ युगलगानें भी शामिल है। दुर्लभ इसलिए कि इन गीतों में बहुत ही रेयर आवाज़ें मौजूद हैं। गीता जी ने ये दोनों गानें प्रमोदिनी देसाई और जी. एम. दुर्रनी के साथ गाया है। दुर्रनी साहब वाला गीत आज आपकी नज़र कर रहे हैं जिसके बोल हैं "हमने खाई है मोहब्बत में जवानी की क़सम, न कभी होंगे जुदा हम"।

'दिलरुबा' द्वारका खोसला की फ़िल्म थी जिसमें मुख्य कलाकार थे देव आनंद और रेहाना। आज के प्रस्तुत गीत को लिखा था एस. एच. बिहारी ने। बिहारी साहब का पदार्पण फ़िल्म जगत में १९४९ में हुई थी जब अनिल बिस्वास ने उनसे लिखवाया था फ़िल्म 'लाडली' का एक गीत "मैं एक छोटी सी चिंगारी"। मीना कपूर की आवाज़ में इस गीत को फ़िल्म के खलनायिका पर फ़िल्माया गया था। उसके बाद सन् '५० में ज्ञान दत्त ने उनसे 'दिलरुबा' में यह गीत लिखवाया था। बिहारी साहब ने इसी फ़िल्म में एक और गीत भी लिखा था जिसे शमशाद बेग़म, प्रमोदिनी, गी. एम. दुर्रनी और साथियों ने गाया था और इस गाने की अवधि थी कुल ७ मिनट और ४० सेकन्ड्स। ख़ैर, बात करते हैं आज के प्रस्तुत गीत की। पाश्चात्य संगीत संयोजन से समृद्ध इस हल्के फुल्के युगल गीत में उस ज़माने की पीढ़ी का रोमांस दर्शाया गया है। इस भाव पर असंख्य गानें समय समय पर बने हैं। कुछ बातें हमारे समाज की कभी नहीं बदलती है चाहे उसका अंदाज़ बदल जाए। प्यार में क़समें खाने की परंपरा सदियों पहले भी थी, इस फ़िल्म के समय भी थी, और आज भी है। लेकिन अंदाज़ ज़रूर बदल गया है। कहाँ है वह मासूमियत जो प्यार में हुआ करती थी उस ज़माने में! आज सब कुछ इतना खुला खुला सा हो गया है कि वह शोख़ी, वह नाज़ुकी, वह मासूमियत कहीं ग़ायब हो गई है। लेकिन हम उसी मासूमियत भरे अंदाज़ का मज़ा आज लेंगे इस गीत को सुनते हुए।

इस गीत को सुनने के बाद आपको एक काम यह करना है कि ५० और ६० के दशकों से कम से कम १० गीत ऐसे चुनने हैं जिसमें प्यार में क़सम खाने की बात कही गई है। हो सकता है कि सब से पहले जवाब देने वाले को हम कोई इनाम भी दे दें, तो ज़रूर कोशिश कीजिएगा, और फिलहाल मुझे आज्ञा दीजिए, नमस्कार!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. कल से शुरू होगी नन्हे मुन्ने बच्चों को समर्पित श्रृंखला -"बचपन के दिन भुला न देना".
२. शैलेन्द्र ने लिखा था इस गीत को.
३. एक अंतरे की पहली पंक्ति में शब्द है -"रेल".

पिछली पहेली का परिणाम -

शरद जी लगता है बाकी सब पीछे हट गए हैं, क्योंकि शेर तो एक ही सकता है जंगल में....बधाई आप ४४ अंकों पर आ चुके हैं...अरे भाई कोई तो इन्हें टक्कर दो....

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, May 17, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (5)

पराग संकला से हमारे श्रोता परिचित हैं, आप गायिका गीता दत्त के बहुत बड़े मुरीद हैं और उन्हीं की याद में गीता दत्त डॉट कॉम के नाम से एक वेबसाइट भी चलते हैं. आवाज़ पर गीता दत्त के विविध गीतों पर एक लम्बी चर्चा वो पेश कर चुके हैं अपने आलेख "असली गीता दत्त की खोज में" के साथ. आज एक बार फिर रविवार सुबह की कॉफी का आनंद लें पराग संकला के साथ गीता दत्त जी के गाये कुछ दुर्लभ "प्रेम गीतों" को सुनकर.


गीता दत्त और प्रेम गीतों की भाषा

हिंदी चित्रपट संगीत में अलग अलग प्रकार के गीत बनाते हैं. लोरी, भजन, नृत्यगीत, हास्यगीत, कव्वाली, बालगीत और ग़ज़ल. इन सब गानों के बीच में एक मुख्य प्रकार जो हिंदी फिल्मों में हमेशा से अधिक मात्रा में रहता हैं वह हैं प्रणयगीत यानी कि प्रेम की भाषा को व्यक्त करने वाले मधुर गीत! फिल्म चाहे हास्यफिल्म हो, या भावुक या फिर वीररस से भरपूर या फिर सामजिक विषय पर बनी हो, मगर हर फिल्म में प्रेम गीत जरूर होते हैं. कई फिल्मों में तो छः सात प्रेमगीत हुआ करते हैं.

चालीस के दशक में बनी फिल्मों से लेकर आज की फिल्मों तक लगभग हर फिल्म में कोई न कोई प्रणयगीत जरूर होता हैं. संगीत प्रेमियोंका यह मानना है कि चालीस, पचास और साठ के दशक हिंदी फिल्म संगीत के स्वर्णयुग हैं. इन सालों में संगीतकार, गीतकार और गायाकों की प्रतिभा अपनी बुलंदियों पर थी.

गीता रॉय (दत्त) ने एक से बढ़कर एक खूबसूरत प्रेमगीत गाये हैं मगर जिनके बारे में या तो कम लोगों को जानकारी हैं या संगीत प्रेमियों को इस बात का शायद अहसास नहीं है. इसीलिए आज हम गीता के गाये हुए कुछ मधुर मीठे प्रणय गीतों की खोज करेंगे.

सबसे पहले हम सुनेंगे इस मृदु मधुर युगल गीत को जिसे गाया हैं गीता दत्त और किशोर कुमार ने फिल्म मिस माला (१९५४)के लिए, चित्रगुप्त के संगीत निर्देशन में. "नाचती झूमती मुस्कुराती आ गयी प्यार की रात" फिल्माया गया था खुद किशोरकुमार और अभिनेत्री वैजयंती माला पर. रात के समय इसे सुनिए और देखिये गीता की अदाकारी और आवाज़ की मीठास. कुछ संगीत प्रेमियों का यह मानना हैं कि यह गीत उनका किशोरकुमार के साथ सबसे अच्छा गीत हैं. गौर करने की बात यह हैं कि गीता दत्त ने अभिनेत्री वैजयंती माला के लिए बहुत कम गीत गाये हैं.



जब बात हसीन रात की हो रही हैं तो इस सुप्रसिद्ध गाने के बारे में बात क्यों न करे? शायद आज की पीढी को इस गाने के बारे में पता न हो मगर सन १९५५ में फिल्म सरदार का यह गीत बिनाका गीतमाला पर काफी मशहूर था. संगीतकार जगमोहन "सूरसागर" का स्वरबद्ध किया यह गीत हैं "बरखा की रात में हे हो हां..रस बरसे नील गगन से". उद्धव कुमार के लिखे हुए बोल हैं. "भीगे हैं तन फिर भी जलाता हैं मन, जैसे के जल में लगी हो अगन, राम सबको बचाए इस उलझन से".



कुछ साल और पीछे जाते हैं सन १९४८ में. संगीतकार हैं ज्ञान दत्त और गाने के बोल लिखे हैं जाने माने गीतकार दीना नाथ मधोक ने. जी हाँ, फिल्म का नाम हैं "चन्दा की चांदनी" और गीत हैं "उल्फत के दर्द का भी मज़ा लो". १८ साल की जवान गीता रॉय की सुमधुर आवाज़ में यह गाना सुनते ही बनता है. प्यार के दर्द के बारे में वह कहती हैं "यह दर्द सुहाना इस दर्द को पालो, दिल चाहे और हो जरा और हो". लाजवाब!



प्रणय भाव के युगल गीतों की बात हो रही हो और फिल्म दिलरुबा का यह गीत हम कैसे भूल सकते हैं? अभिनेत्री रेहाना और देव आनंद पर फिल्माया गया यह गीत है "हमने खाई हैं मुहब्बत में जवानी की कसम, न कभी होंगे जुदा हम". चालीस के दशक के सुप्रसिद्ध गायक गुलाम मुस्तफा दुर्रानी के साथ गीता रॉय ने यह गीत गाया था सन १९५० में. आज भी इस गीत में प्रेमभावना के तरल और मुलायम रंग हैं. दुर्रानी और गीता दत्त के मीठे और रसीले गीतों में इस गाने का स्थान बहुत ऊंचा हैं.



गीतकार अज़ीज़ कश्मीरी और संगीतकार विनोद (एरिक रॉबर्ट्स) का "लारा लप्पा" गीत तो बहुत मशहूर हैं जो फिल्म एक थी लड़की में था. उसी फिल्म में विनोद ने गीता रॉय से एक प्रेमविभोर गीत गवाया. गाने के बोल हैं "उनसे कहना के वोह पलभर के लिए आ जाए". एक अद्भुत सी मीठास हैं इस गाने में. जब वाह गाती हैं "फिर मुझे ख्वाब में मिलने के लिए आ जाए, हाय, फिर मुझे ख्वाब में मिलने के लिए आ जाए" तब उस "हाय" पर दिल धड़क उठता हैं.



जो अदा उनके दर्दभरे गीतों में, भजनों में और नृत्य गीतों में हैं वही अदा, वही खासियत, वही अंदाज़ उनके गाये हुए प्रेम गीतों में है. उम्मीद हैं कि आप सभी संगीत प्रेमियों को इन गीतों से वही आनंद और उल्लास मिला हैं जितना हमें मिला.

उन्ही के गाये हुए फिल्म दिलरुबा की यह पंक्तियाँ हैं:
तुम दिल में चले आते हो
सपनों में ढले जाते हो
तुम मेरे दिल का तार तार
छेड़े चले जाते हो!

गीता जी, आप की आवाज़ सचमुच संगीत प्रेमियों के दिलों के तार छेड़ देती है. और भी हैं बहुत से गीत, जिन्हें फिर किसी रविवार को आपके लिए लेकर आऊँगा.

प्रस्तुति - पराग संकला



"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Thursday, April 30, 2009

"लारा लप्पा लारा लप्पा...." - याद है क्या लता की आवाज़ में ये सदाबहार गीत आपको ?

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 66

'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आज तक हमने आपको ज़्यादातर मशहूर संगीतकारों के नग्में ही सुनवाये हैं। इसमें कोई शक़ नहीं कि इन मशहूर संगीतकारों का फ़िल्म संगीत के विकास में, इसकी उन्नती में महत्वपूर्ण योगदान रहा है, लेकिन इन बड़े संगीतकारों के साथ साथ बहुत सारे कमचर्चित संगीतकार भी इस 'इंडस्ट्री' मे हुए हैं जिन्होने बहुत ज़्यादा काम तो नहीं किया लेकिन जितना भी किया बहुत उत्कृष्ट किया। कुछ ऐसे संगीतकार तो अपने केवल एक मशहूर गीत की वजह से ही अमर हो गये हैं। आज हम एक ऐसे ही कमचर्चित संगीतकर का ज़िक्र इस मजलिस में कर रहे हैं और वो संगीतकार हैं विनोद। विनोद का नाम लेते ही जो गीत झट से हमारे जेहन में आता है वह है फ़िल्म 'एक थी लड़की' का "लारा लप्पा लारा लप्पा लाई रखदा". संगीतकार विनोद की पहचान बननेवाला यह गीत आज प्रस्तुत है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में। यह गीत न केवल विनोद के संगीत सफ़र का एक ज़रूरी मुक़ाम था बल्कि लताजी के कैरियर के शुरुआती लोकप्रिय गीतों में से भी एक था।

इससे पहले कि आप यह गीत सुनें, संगीतकार विनोद के बारे में कुछ कहना चाहूँगा। विनोद का जन्म २८ मई १९२२ को लाहौर में हुआ था। धर्म से इसाई, उनका असली नाम था एरिक रॉबर्ट्स । संगीत का शौक उन्हे बचपन से ही था, इसलिए उस ज़माने के मशहूर संगीतकार पंडित अमरनाथ के शिष्य बन गये जिन्होने शास्त्रीय रागों से उनका परिचय करवाया और वायलिन पर धुनें बनानी भी सिखाई. १९४५ में पंडित अमरनाथ के अचानक बीमार हो जाने पर उनकी अधूरी फ़िल्मों के संगीत को पूरा करने का ज़िम्मा आ पड़ा विनोद के कंधों पर। और इस तरह से 'ख़ामोश निगाहें', 'पराये बस में' और 'कामिनी' जैसी फ़िल्मों के संगीत से एरिक रॉबर्ट्स, अर्थात विनोद का फ़िल्मी सफ़र शुरु हो गया। देश के बँटवारे के बाद जब फ़िल्मकार रूप शोरे लाहौर से बम्बई चले आये तो वो अपने साथ विनोद और गीतकार अज़िज़ कश्मीरी को भी ले आये और यहाँ आ कर इन तीनों ने एक साथ कई फ़िल्मों में काम किया। १९४९ की 'एक थी लड़की' भी ऐसी ही एक फ़िल्म थी जिसमें इन तीनों का संगम था। इस फ़िल्म में रूप शोरे की पत्नी मीना शोरे नायिका थीं और नायक बने मोतीलाल। बदकिस्मती विनोद की, कि इस कामयाब फ़िल्म के बावजूद उन्हे कभी बड़ी बजट की फ़िल्मों में संगीत देने का मौका नहीं मिला और वो कमचर्चित फ़िल्मकारों के सहारे ही अपना काम करते रहे। केवल ३७ वर्ष की आयु मे ही गुर्दे की बीमारी से विनोद का देहान्त हो गया लेकिन अपनी छोटी सी इस ज़िन्दगी में उन्होने कुछ ऐसा सुरीला काम किया कि सदा के लिए अमर हो गये। आज विनोद को गये ५० साल गुज़र चुके हैं, लेकिन वो कहते हैं न कि कलाकार और उसकी कला कभी बूढ़ी नहीं होती, वो तो हमेशा जवान रहती है, सदाबहार रहती है, तो विनोद भी अमर हैं अपने संगीत के ज़रिये। आज भी जब फ़िल्म 'एक थी लड़की' का यह चुलबुला सा गीत हम सुनते हैं तो वही गुदगुदी एक बार फिर से हमें छू जाती है एक ताज़े हवा के झोंके की तरह। तो सुनते हैं लता मंगेशकर, जी. एम. दुर्रानी और साथियों की आवाज़ो में यह छेड़-छाड़ भरा नग्मा । यह गीत समर्पित है संगीतकार विनोद की स्मृति को।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. गीता दत्त का गाया एक बेमिसाल दर्दीला गीत.
२. गीतकार रजा मेहंदी अली खान साहब की पहली फिल्म का है ये गीत.
३. मुखड़े में शब्द है -"बेदर्द".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
एक और नए विजेता मिले हैं अटलांटा, अमेरिका से हर्षद जांगला के रूप में. एक दम सही जवाब है आपका. सुमित जी कल नीलम जी ने आपको वो कह दिया जो दरअसल हम बहुत दिनों से कहना चाह रहे थे. अगर आप लता की आवाज़ नहीं पहचानते, और लता- आशा की आवाजों में फर्क नहीं देख पाते तो वाकई कानों के इलाज की जरुरत है....वैसे ये नीलम जी की सलाह है जिसका हम समर्थन करते हैं, आपकी तलाश जोरों पर है संभल के रहिये...हा हा हा...
भरत पण्डया ने भी अंतोगत्वा अपना सर खुजलाते-खुजलाते सही जवाब दे ही दिया। बधाई

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


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