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Saturday, May 2, 2015

"यह कहाँ आ गए हम..." और "हम कहाँ खो गए..." गीतों का आपस में क्या सम्बन्ध है?


एक गीत सौ कहानियाँ - 58
 

यह कहाँ आ गए हम...’




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 58-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म ’सिलसिला’ के मशहूर गीत "ये कहाँ आ गए है..." के बारे में जिसे लता मंगेशकर और अमिताभ बच्चन ने गाया था। 


फ़िल्म ’सिलसिला’ यश चोपड़ा की एक महत्वाकांक्षी फ़िल्म थी जो बॉक्स ऑफ़िस पर असफल रही। पर फ़िल्म के गीत-संगीत का पक्ष ज़बरदस्त था। संगीतकार जोड़ी शिव-हरि ने पहली बार किसी फ़िल्म में बतौर संगीतकार काम किया इस फ़िल्म में। लता मंगेशकर और अमिताभ बच्चन के गाए इस असाधारण और अद्वितीय गीत के बारे में जानिए शिव-हरि के पंडित शिव कुमार शर्मा के मुख से - "आपने एक चीज़ पे ग़ौर किया होगा, यह एक ’अन-यूज़ुअल’ गीत है। मैं आपको इसका बैकग्राउण्ड बताऊँगा कि यह गाना कैसे बना। शुरू में यश जी ने कहा कि मैं कुछ ऐसा करना चाहता हूँ कि नायक अपने ख़यालों में बैठा हुआ है और कुछ पोएट्री लिख रहा है, या पोएट्री रीसाइट कर रहा है, शेर-ओ-शायरी कुछ, और बीच में कुछ आलाप ले आएँगे, लता जी की आवाज़ में कुछ आलाप ले आएँगे बीच बीच में, ऐसा कुछ। तो इस तरह का सोच कर के शुरू किया कि थोड़ा म्युज़िक रहेगा, थोड़ी शेर-ओ-शायरी होगी, और फिर कुछ बीच में आलाप आएगा। यह बिल्कुल नहीं सोचा था कि इस तरह का गाना बनेगा। बनते-बनते, जैसा होता है कि उस ज़माने में अमिताभ बच्चन, अभी भी उतने ही बिज़ी हैं, उस ज़माने की क्या बात कहें, कि वो बारह-एक बजे जब उनके शूटिंग्‍ की शिफ़्ट ख़त्म होती थी, तो वो आते थे, और फिर आकर के हमारे साथ बैठते थे क्योंकि उन्होंने गाने भी गाए हैं, होली का जो गाना है, और "नीला आसमाँ", तो यह गाना जब बनने लगा तो उसकी शुरुआत ऐसे ही हुई, बनते बनते कुछ उसमें धुन का ज़िक्र जब आया, तो जावेद अख़्तर इसमें गाने लिखे, जावेद अख़्तर साहब की यह पहली फ़िल्म थी बतौर गीतकार। तो वो बैठे हुए थे तो वो बीच में उनकी ही सारी नज़में हैं जो बच्चन साहब पढ़े हैं। तो जब एक धुन गुनगुना रहे थे हम लोग तो सोचा कि इसके उपर बोल आ जाएँ तो कैसा लगेगा! तो धीरे धीरे जब बोल आया तो लगा कि अस्थायी बन गई, ऐसा करते हैं कि यह जो नज़्म है, जो शेर पढ़ रहे हैं, उसको हम ऐसा इस्तमाल करते हैं जैसे इन्टरल्यूड म्युज़िक होता है, जैसे इन्ट्रोडक्शन म्युज़िक होता है। ऐसे करते करते इसकी शक्ल ऐसी बनी। और वह एक असाधारण गाना बन गया कि पोएट्री और गाना साथ में चल रहा है लेकिन वह एक के साथ एक जुड़ा हुआ है, और वह बात आगे बढ़ रही है। पोएट्री कह रही है, गाने में नायिका की जो सिंगिंग् है वह उसको आगे बढ़ाती है। तो यह इस क़िस्म से, मेरे ख़याल में इस क़िस्म का गाना फिर किसी ने दुबारा कोशिश ही नहीं की और इसमें जो इन्स्ट्रूमेन्टेशन हुआ था, कुछ कोरस आवाज़ें ली, तो वह पूरा जो उसका माहौल बना है, वह आज इस गाने को बने हुए इतने साल हो गए हैं, पर अभी भी वह फ़्रेश लगता है।"

जावेद अख़्तर का कहना है, "मैं गीतकार नहीं था, ज़बरदस्ती बना दिया गया। मैं तो फ़िल्में लिखा करता था। यश जी एक दिन मेरे घर आए, वो मुझसे उनकी फ़िल्म ’सिलसिला’ के लिए एक गीत लिखवाना चाहते थे। मैंने साफ़ इनकार कर दिया, कहा कि मैं पोएट्री सिर्फ़ अपने लिए करता हूँ, फ़िल्म के लिए नहीं लिख सकता। लेकिन वो तो पीछे ही पड़ गए। इसलिए ना चाहते हुए भी मैं एक गीत लिखने के लिए राज़ी हो गया। मैंने उनसे कहा कि मुझे इसके लिए कोई क्रेडिट नहीं चाहिए क्योंकि मैंने सोचा कि वो लोग मुझे एक ट्यून सुना देंगे और मुझसे उस पर गाना लिखने की उम्मीद करेंगे, अगर लिख ना पाया तो क्या होगा? मुझे फिर यश जीने शिव-हरि से एक दिन मिलवा दिया, वो धुन सुनाते गए और शाम तक मैं "देखा एक ख़्वाब तो ये सिलसिले हुए" लिख चुका था। फिर मैंने इस फ़िल्म में कुल तीन गीत लिखे, यूं कह सकते हैं कि मुंह में ख़ून लग गया था। बाक़ी के दो गीत थे "नीला आसमाँ सो गया" और "ये कहाँ आ गए हम"। शबाना जी को "यह कहाँ आ गए हैम" बहुत पसन्द है और वो अक्सर इसे गुनगुनाती हैं।"

फ़िल्म ’सिलसिला’ साल 1982 की फ़िल्म थी। इसी वर्ष एक फ़िल्म आई थी ’वक़ील बाबू’। निर्माता थे जवाहर कपूर। फ़िल्म में गीत लिख रहे थे आनन्द बक्शी और संगीतकार थे लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल। फ़िल्म की कहानी के मुताबिक तीन गीत बने और रेकॉर्ड हो चुके थे। पर ये सभी गीत बिल्कुल साधारण क़िस्म के बने। कोई ख़ास बात नहीं थी उनमें। जवाहर कपूर को इन गीतों से बहुत निराशा हुई, पर आनन्द बक्शी और लक्ष्मी-प्यारे से कहने में हिचकिचा रहे थे। पर उसी समय जैसे ही फ़िल्म ’सिलसिला’ के गाने रिलीज़ हुए, उनकी निराशा ग़ुस्सा बन कर उमड़ पड़ी। उनके मुख से निकल गया कि बेकार ही मैंने आनन्द बक्शी और लक्ष्मी-प्यारे जैसे दिग्गजों को फ़िल्म में लिया, इनसे बेहतर तो जावेद अख़्तर और शिव-हरि जैसे नए फ़नकार हैं जिन्होंने ’सिलसिला’ में कमाल का काम किया। इतना ही नहीं जवाहर कपूर ने बक्शी साहब और लक्ष्मी-प्यारे से साफ़ कह दिया कि उन्हें अपनी इस फ़िल्म में "यह कहाँ आ गए हम" जैसा एक गीत चाहिए। तब जाकर "हम कहाँ खो गए, तुम कहाँ खो गए" गीत बना जिसे लता मंगेशकर ने गाया और बीच बीच में शशि कपूर की शायरी डाली गई जिस तरह से ’सिलसिला’ के गीत में अमिताभ बच्चन पढ़ते हैं। गीत बहुत अच्छा बना और जवाहर कपूर का ग़ुस्सा ठण्डा हुआ। ’वकील बाबू’ फ़िल्म बुरी तरह असफल रही पर आज अगर इस फ़िल्म को याद किया जाता है तो सिर्फ़ इस गीत की वजह से। लीजिए, अब आप ये दोनों गीत सुनिए, पहले फिल्म 'वकील बाबू' का और फिर फिल्म 'सिलसिला' का गीत।

फिल्म - वकील बाबू : 'हम कहाँ खो गए...' : लता मंगेशकर और शशि कपूर


फिल्म - सिलसिला : 'ये कहाँ आ गए हम...' : लता मंगेशकर और अमिताभ बच्चन 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

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