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Sunday, February 1, 2015

धमार के रंग : राग केदार के संग : SWARGOSHTHI – 205 : DHAMAR



स्वरगोष्ठी – 205 में आज

भारतीय संगीत शैलियों का परिचय : ध्रुपद – 3

‘चोरी चोरी मारत हो कुमकुम सम्मुख हो क्यों न खेलो होरी...’ 




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ की तीसरी कड़ी मे मैं कृष्णमोहन मिश्र हार्दिक स्वागत करता हूँ। पाठकों और श्रोताओं के अनुरोध पर आरम्भ की गई इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की उन परम्परागत शैलियों का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे बीच उपस्थित हैं। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से जो भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धांतों के अनुकूल धारा थी उसे स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। भारतीय संगीत की सबसे प्राचीन और वर्तमान में उपलब्ध संगीत शैली है, ध्रुपद अथवा ध्रुवपद। पिछली कड़ी में हमने ध्रुपद बन्दिश के विषय में चर्चा की थी। आज के अंक में हम आपसे ध्रुपद शैली के अन्तर्गत धमार गीत पर चर्चा करेंगे और सुप्रसिद्ध युगल गायक गुण्डेचा बन्धुओं की आवाज़ में एक राग केदार का एक रसपूर्ण धमार प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके अलावा पार्श्वगायक मन्ना डे का गाया एक फिल्मी ध्रुपद भी प्रस्तुत करेंगे। 


ध्रुपद अंग की गायकी में निबद्ध गीतों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। निबद्ध गीतों के विषयवस्तु में ईश्वर की उपासना, साकार और निराकार, दोनों प्रकार से की गई है। इसके अलावा ध्रुपद गीतों में आश्रयदाता राजाओं और बादशाहों की प्रशस्ति, पौराणिक आख्यान, प्रकृति चित्रण और विविध पर्वों और सामाजिक उत्सवों का उल्लेख भी खूब मिलता है। सुप्रसिद्ध संगीत चिन्तक और दार्शनिक ठाकुर जयदेव सिंह ने ‘भारतीय संगीत के इतिहास’ विषयक पुस्तक में यह भी उल्लेख किया है कि सोलहवीं शताब्दी से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक तक ध्रुपद गीतों के साथ नृत्य और अभिनय का चलन भी था। इस उल्लेख का सीधा सा अर्थ है कि उस काल में ध्रुपद शैली लोकजीवन से गहराई तक जुड़ी हुई थी। ध्रुपद शैली के अन्तर्गत ही गीत का एक प्रकार है, जिसे आज हम ‘धमार’ के नाम से जानते हैं। धमार नाम का उल्लेख ‘संगीत शिरोमणि’ में मिलता है। इस ग्रन्थ में ‘धम्माली’ नाम का उल्लेख है। धमाल, धम्माल अथवा धम्माली शब्द से उल्लास से परिपूर्ण नृत्य का स्पष्ट आभास होता है। इस गीत शैली के साहित्य में आज भी होली पर्व के उमंग और उल्लास की अभिव्यक्ति की जाती है। लोक शैली का स्पर्श होने और पर्व विशेष के परिवेश का यथार्थ चित्रण होने के कारण ‘धमार’ या ‘धमाल’ नामकरण इस गीत शैली के लिए सार्थक है। ब्रज के गोप-गोपिकाओं के साथ कृष्ण के होली खेलने का प्रसंग धमार गीतों में प्रमुख रूप से उकेरा जाता है। यह गीत शैली चौदह मात्रा के ताल में गायी जाती है। धमार एक प्रकार की गायकी भी है और एक ताल विशेष का नाम भी है। यह पखावज पर बजने वाला १४ मात्रा का ताल है, जिसकी संगति धमार गायन में होती है। धमार की रचनाओं में अधिकतर राधा-कृष्ण की होली और फाल्गुनी परिवेश का चित्रण होता है। गम्भीर प्रवृत्ति के रागों की अपेक्षा चंचल प्रवृत्ति के रागों में धमार की प्रस्तुतियाँ मन को अधिक लुभातीं हैं। आज हम आपको चर्चित युगल गायक रमाकान्त और उमाकान्त गुण्डेचा बन्धुओं द्वारा राग केदार में प्रस्तुत धमार सुनवा रहे हैं। पखावज पर अखिलेश गुण्डेचा ने धमार ताल में संगति की है। हमारे अनुरोध पर ‘स्वरगोष्ठी’ के श्रोताओं के लिए गुण्डेचा बन्धुओं ने इस धमार गीत को स्वयं हमे उपलब्ध कराया है।


धमार राग केदार : ‘चोरी चोरी मारत हो कुमकुम...’ : रमाकान्त और उमाकान्त गुण्डेचा




धमार गीतों में उपज का काम अधिक होता है। यह लय-प्रधान शैली है। इसके विपरीत ध्रुपद बन्दिश की गायकी ध्रुपद बन्दिश में गम्भीरता होती है, जबकि धमार गायकी में चंचलता होती है। पिछले अंक में हमने आपको 1943 की फिल्म ‘तानसेन’ में शामिल किये गए एक प्राचीन ध्रुपद का गायन प्रसिद्ध गायक-अभिनेता कुन्दनलाल सहगल के स्वर मे सुनवाया था। तानसेन के गुरु और प्रसिद्ध सन्त-संगीतज्ञ स्वामी हरिदास की यह रचना 1962 में बनी फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ में भी शामिल किया गया था। दोनों फिल्मों के इस गीत का स्थायी तो समान है, किन्तु अन्तरे के शब्दों में थोड़ा परिवर्तन किया गया है। फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ के संगीतकार थे एस.एन. त्रिपाठी और यह गीत पार्श्वगायक मन्ना डे की आवाज़ में है। फिल्म का यह ध्रुपद गीत राग यमन कल्याण की अनुभूति कराता है। आप इस फिल्मी ध्रुपद गीत का आनन्द लीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


ध्रुपद राग यमन कल्याण : “सप्तसुरन तीन ग्राम...’ : मन्ना डे : फिल्म – संगीत सम्राट तानसेन






संगीत पहेली



‘स्वरगोष्ठी’ के 205वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक वाद्य संगीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन प्रश्नों में से कोई दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 210 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – यह कौन सा वाद्य है? वाद्य का नाम बताइए।

2 – संगीत वाद्य पर यह कौन सा राग बजाया जा रहा है? राग का नाम बताइए।

3 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए। 
 


आप उपरोक्त तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 7 फरवरी, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 207वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 203वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको गुण्डेचा बन्धुओं की आवाज़ में एक ध्रुपद बन्दिश का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भूपाली और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- सूल ताल। इस बार की पहेली में पूछे गए दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ जारी है। श्रृंखला पहले हिस्से में हम ध्रुपद शैली का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की विभिन्न शैलियों का सोदाहरण परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं। इस श्रृंखला में आप भी योगदान कर सकते हैं। भारतीय संगीत की किसी शैली पर अपना परिचयात्मक आलेख अपने नाम और परिचय के साथ हमारे ई-मेल पते पर भेज दें। आप अपनी फरमाइश या अपनी पसन्द का आडियो क्लिप भी हमें भेज सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी। 



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

Wednesday, January 15, 2014

रागमाला गीत – 1 : प्लेबैक इण्डिया ब्रोडकास्ट



 


प्लेबैक इण्डिया ब्रोडकास्ट



रागो के रंग, रागमाला गीत के संग – 1


राग बहार, बागेश्री, यमन कल्याण, केदार, भैरव और मेघ मल्हार के रंग बिखेरता रागमाला गीत

‘मधुर मधुर संगीत सुनाओ...’


फिल्म : संगीत सम्राट तानसेन 
संगीतकार : एस.एन. त्रिपाठी 
गायक : पूर्णिमा सेठ, पंढारीनाथ कोल्हापुरे और मन्ना डे

आलेख : कृष्णमोहन मिश्र 
स्वर एवं प्रस्तुति : संज्ञा टण्डन







Sunday, December 8, 2013

राग जोगिया में भक्तिरस


  

स्वरगोष्ठी – 145 में आज

रागों में भक्तिरस – 13 

‘हे नटराज गंगाधर शम्भो भोलेनाथ...’ 



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की तेरहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीतानुरागियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, जारी श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस राग पर आधारित फिल्म संगीत के उदाहरण भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे राग जोगिया में उपस्थित भक्तिरस पर चर्चा करेंगे। आपके समक्ष इस राग के भक्तिरस-पक्ष को स्पष्ट करने के लिए हम तीन भक्तिरस से पगी रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे। सबसे पहले हम 1965 में प्रदर्शित फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ का राग जोगिया पर आधारित एक शिव-स्तुति और इसके बाद विदुषी कला रामनाथ का वायलिन पर बजाया राग जोगिया प्रस्तुत करेंगे। अन्त में इसी राग पर आधारित कन्नड के सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ और सन्त पुरन्दर दास की भक्ति रचना नचिकेता शर्मा के स्वरों में आप सुनेगे।
  


महेन्द्र कपूर 
कमाल बारोट 
भारतीय संगीत में भक्तिरस की धारा का अजस्र प्रवाह वैदिककाल से ही होता आया है। ग्यारहवीं शताब्दी से लेकर सोलहवीं शताब्दी के बीच अनेक सन्त कवियों और संगीतकारों ने इस परम्परा को पुष्ट किया है। आज के इस अंक में हम आपको कन्नड के सुप्रसिद्ध सन्तकवि और संगीतकार सन्त पुरन्दर दास की एक भक्तिरचना सुनवाने के साथ उनका संक्षिप्त परिचय भी देंगे। परन्तु उससे पहले भारतीय संगीत के एक भक्तिरस प्रधान राग जोगिया की चर्चा करेंगे। भक्तिरस के वैराग्य भाव को उभारने में राग जोगिया एक आदर्श राग है। प्रथम प्रहर अर्थात सूर्योदय के समय गाया-बजाया जाने वाला यह राग भैरव थाट के अन्तर्गत माना जाता है। कर्नाटक संगीत पद्यति का राग सावेरी, इस राग के समतुल्य होता है। राग जोगिया के आरोह में गान्धार और निषाद स्वर वर्जित होता है। आरोह में ऋषभ और धैवत कोमल और मध्यम स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है। अवरोह के दो रूप प्रचलित है। अवरोह के पहले रूप में गान्धार और निषाद स्पष्ट होता है। यह रूप कर्नाटक पद्यति के राग सावेरी के निकट होता है। दूसरे रूप में कोमल गान्धार स्वर केवल अवरोह में प्रयोग होता है, वह भी मात्र कण रूप में। यह रूप राग गुणकली के निकट हो जाता है। अवरोह में सात स्वर का प्रयोग होता है। इस प्रकार यह राग औड़व-सम्पूर्ण जाति का है। राग जोगिया में शुद्ध मध्यम स्वर पर न्यास अर्थात ठहराव दिया जाता है, जबकि राग भैरव में ऐसा नहीं होता। इसी प्रकार राग जोगिया में कोमल ऋषभ और कोमल धैवत स्वरों का आन्दोलन नहीं होता, जबकि राग भैरव में ऐसा होता है। इस राग का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर मध्यम होता है।

राग जोगिया पर आधारित एक बेहद आकर्षक शिव वन्दना का उपयोग फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ में किया गया था। 1962 में प्रदर्शित इस फिल्म के संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी ने राग जोगिया के स्वरों का आधार लेकर यह वन्दना गीत स्वरबद्ध किया था। इसे पार्श्वगायक महेन्द्र कपूर और गायिका कमल बारोट ने स्वर दिया है। पहले प्रस्तुत है, यही शिव-वन्दना।


राग जोगिया : ‘हे नटराज गंगाधर शम्भो...’ : फिल्म संगीत सम्राट तानसेन : महेन्द्र कपूर और कमल बारोट



कला रामनाथ 
नचिकेता शर्मा 
राग जोगिया भक्तिरस के आध्यात्मिक और वैराग्य भाव की अनुभूति कराने में सक्षम है। राग के इस भाव की सार्थक अनुभूति कराने के लिए अब हम आपको दो रचनाएँ सुनवाते हैं। पहले आप सुनेगे वायलिन पर राग जोगिया में निबद्ध एक भावपूर्ण रचना, जिसे प्रस्तुत कर रही हैं, विदुषी कला रामनाथ। आज की इस कड़ी के अन्त में आप कन्नड का एक भक्तिगीत भी सुनेगे जिसे युवा गायक नचिकेता शर्मा प्रस्तुत कर रहे हैं। राग जोगिया के स्वरों पिरोया यह भजन सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ सन्त पुरन्दर दास की रचना है। कर्नाटक संगीत पद्यति के शीर्षस्थ संगीतज्ञ सन्त पुरन्दर दास का जन्म कर्नाटक राज्य के शिवमोगा जनपद में स्थित क्षेमपुर नामक स्थान में एक सम्पन्न रत्न-व्यवसायी वरदप्पा नायक के घर 1484 ई. में हुआ था। बचपन में माता-पिता ने इनका नाम श्रीनिवास नायक रखा था। उन्होने कन्नड, संस्कृत भाषा और संगीत शास्त्र का गहन अध्ययन किया था। कर्नाटक संगीत पद्यति में उनकी असंख्य कृतियाँ और भगवान विट्ठल के प्रति समर्पित भजन भारतीय संगीत की अनमोल धरोहर हैं। इस अंक में गायक नचिकेता शर्मा के स्वरों में प्रस्तुत किये जा रहे कन्नड भाषा के इस भजन के गायन में तबला-संगति रवि गुटाला ने और हारमोनियम-संगति विवेक दातार ने की है। आप पहले वायलिन पर राग जोगिया फिर इसी राग में पिरोया सन्त पुरन्दर दास का भजन सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग जोगिया : वायलिन वादन : विदुषी कला रामनाथ




राग जोगिया : सन्त पुरन्दर दास रचित भक्तिपद : नचिकेता शर्मा




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ की 145वीं संगीत पहेली में हम आपको एक गीत का आरम्भिक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 150वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि इस रचना में किस राग की झलक है?

2 – इस रचना में ताल के मात्राओं की संख्या कितनी है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 147वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 143वीं संगीत पहेली में हमने आपको पण्डित जसराज के गायन और पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया के बाँसुरी वादन की एक जुगलबन्दी रचना का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग केदार और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- तीनताल। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी और जबलपुर की क्षिति तिवारी ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी है, लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’, जिसके अन्तर्गत हमने आज की कड़ी में आपसे राग जोगिया में भक्तिरस के तत्त्व विषयक चर्चा की। अगले अंक में आप एक ऐसी भक्ति-रचना का रसास्वादन करेंगे जिसे अनेक शीर्षस्थ कलासाधकों ने अलग-अलग रागों का आधार लेकर भक्तिरस को सम्प्रेषित किया है। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के भक्तिरस प्रधान रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

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