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Saturday, March 16, 2013

स्वाधीनता संग्राम और फिल्मी गीत (भाग – 2)


विशेष अंक : भाग 2


भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में फिल्म संगीत की भूमिका 



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का नमस्कार! मित्रों, पिछले शनिवार से हमने 'सिने पहेली' के स्थान पर एक विशेष श्रृंखला 'भारत के स्वाधीनता संग्राम में फ़िल्म-संगीत की भूमिका' आरम्भ की है। पिछले सप्ताह हमने इस विशेष श्रृंखला का प्रथम भाग प्रस्तुत किया था। आज प्रस्तुत है, इस श्रृंखला का दूसरा भाग।


गतांक से आगे...

तिमिर बरन
30 के दशक के आख़िरी साल, यानी 1939 में, बहुत से देशभक्ति गीत फ़िल्मों में सुनाई पड़े हैं। इस वर्ष ‘वनराज पिक्चर्स, बम्बई’ की एम. उदवाडिया निर्देशित फ़िल्म अई थी ‘वतन के लिए’। इस फ़िल्म के लिए पराधीन भारत के लोगों में देशभक्ति के जस्बे को जगाने के लिए मुन्शी दिल ने दो देशभक्ति गीत लिखे; पहला “ईतहाद करो, ईतहाद करो, तुम हिन्द के रहने वालों” और दूसरा “भारत के रहने वालों, कुछ होश तो संभालो, ये आशियाँ हमारा”। इन दोनों गीतों को गुलशन सूफ़ी और बृजमाला ने गाया था। उधर 'न्यू थिएटर्स' के संगीतकार तिमिर बरन के करीयर की सबसे बड़ी उपलब्धि 1939 में उनकी कम्पोज़ की हुई ‘वन्देमातरम’ रही। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस इस गीत के लिए एक ऐसी धुन चाहते थे जो समूहगान के रूप में गाई जाए और जिससे जोश पैदा हो मातृभूमि के लिए मर-मिटने की। तिमिर बरन ने राग दुर्गा में नेताजी की मनोकामना को पूरा किया और जब नेताजी ने अपनी ‘आज़ाद हिन्द फ़ौज’ का निर्माण किया तो सिंगापुर रेडियो से ‘वन्देमातरम’ के इसी संस्करण को बजवाया।

खेमचन्द प्रकाश
40 के दशक के आते-आते देशभक्ति विचारधारा वाली फ़िल्मों की संख्या में भी निरन्तर वृद्धि होती गई। सन 1940 की बात करें तो ‘रणजीत मूवीटोन’ के बैनर तले निर्मित ‘आज का हिन्दुस्तान’ में दीनानाथ मधोक के लिखे और खेमचन्द प्रकाश (सहायक: बन्ने ख़ाँ) द्वारा स्वरबद्ध गीतों में ईश्वरलाल और साथियों का गाया एक देशभक्ति गीत था “चरखा चलाओ बहनों, कातो ये कच्चे धागे, धागे ये कह रहे हैं…”। इस गीत में गांधीवादी स्वदेशी विचारधारा साफ़ झलकती है। ‘ई. पी. कंगा प्रोडक्शन्स’ की वेशभूषा प्रधान फ़िल्म ‘आज़ादी-ए-वतन’ के संगीतकार का पता तो नहीं चल सका, पर मुन्शी दिल का लिखा इस फ़िल्म का एक देशभक्ति गीत था “सर करो वतन पे क़ुरबान, मुल्क के सारे नौजवान सर करो क़ुरबान”। यह फ़िल्म दरसल विदेशी भाषा के किसी फ़िल्म को डब कर के बनाई गई थी। ‘रेक्स पिक्चर्स’ की फ़िल्म ‘देशभक्त’ भी इसी श्रेणी की फ़िल्म थी जिसके संगीतकार थे वसन्त कुमार नायडू तथा गीतकार थे वाहिद क़ुरैशी और शेफ़्ता। पर इस फ़िल्म के गीतों की सूची में कोई देशभक्ति गीत की जानकारी नहीं मिल पाई है। वसन्त कुमार नायडू का संगीत ‘चन्द्रा आर्ट प्रोडक्शन्स’ की फ़िल्म ‘जंग-ए-आज़ादी’ में भी गूंजा था और इस फ़िल्म में वाहिद क़ुरैशी का लिखा देशभक्ति गीत था “वीरों, वीरों, हो जाओ क़ुरबान, अपनी इज़्ज़त ग़ैरत का हम लें दुश्मन से बदला”। ‘मोहन पिक्चर्स’ के बैनर तले निर्मित और अनिल कुमार और अमीरबाई कर्नाटकी के अभिनय से सजी फ़िल्म ‘हमारा देश’ में गीतकार मुन्शी नायाब ने एक देशभक्ति गीत लिखा था “हम देश के हैं परवाने मस्ताने दीवाने, आज़ादी के अफ़साने…”। फ़िल्म में संगीत था भगतराम बातिश का। ‘वाडिआ मूवीटोन’ की फ़िल्म ‘हिन्द का लाल’ में मधुलाल दामोदर मास्टर का संगीत था, जिसमें ज्ञान के लिखे देशभक्ति गीत “भारत की पत राखो भगवन्त, भारत की पत राखो” और “मुबारक़ हो, मुबारक़ हो, ये हिन्द का लाल मुबारक़ हो” शामिल थे। “मुबारक हो” गीत अहमद दिलावर का गाया हुआ था। वाडिआ की ही फ़िल्म ‘जय स्वदेश’ में भी मधुलाल का ही संगीत था, और जिसमें ज्ञान ने एक बार फिर एक देशभक्ति गीत लिखा “जय स्वदेश, जय जय स्वदेश, हम भारत के गुण गायेंगे”। सरदार मन्सूर, अहमद दिलावर और साथियों के गाये इस गीत के अलावा वाहिद क़ुरैशी का लिखा एक और देशभक्ति गीत भी था इस फ़िल्म में। वत्सला कुमठेकर और अहमद दिलावर का गाया यह गीत था “भारत पे काले बादल छाए रहेंगे कब तक”। भीष्मदेव चटर्जी के संगीत में ‘फ़िल्म कॉर्पोरेशन ऑफ़ इण्डिया, कलकत्ता’ की 1940 में फ़िल्म आई ‘हिन्दुस्तान हमारा’ जिसमें आरज़ू लखनवी का लिखा एक देश भक्ति गीत था “हिन्दोस्तां के हम हैं हिन्दोस्तां हमारा, है ये ज़मीं हमारी है आसमां हमारा”। कुछ-कुछ इसी शैली में 1944 की फ़िल्म ‘पहले आप’ में एक गीत था “हिन्दोस्तां के हम हैं और हिन्दोस्तां हमारा, हिन्दू मुस्लिम दोनों की आँखों का तारा”। ‘हिन्दुस्तान हमारा’ में भी स्वदेशी विचारधारा का एक गीत था “चर्खा चल के काम बनाए, चर्खा आए ग़रीबी जाए, निकले चर्खे से जब तार...”। इसी साल संगीतकार ख़ान मस्ताना के संगीत में ‘मिनर्वा’ की फ़िल्म ‘वसीयत’ प्रदर्शित हुई जिसमें मस्ताना के अलावा शीला और प्रमिला ने गीत गाए। फ़िल्म में अब्दुल वकील के लिखे हुए गीत थे। शीला और साथियों का गाया हुआ एक देशभक्ति गीत भी था – “हिन्दमाता की तुम्हीं सन्तान हो, नौजवानों तुम वतन की शान हो”। 1941 में ‘सिरको प्रोडक्शन्स’ की गुंजल निर्देशित फ़िल्म ‘तुलसी’ में हरिश्चन्द्र बाली का संगीत था और गीत पंडित फ़ानी ने लिखे। इसमें एक देशभक्ति गीत था “स्वर्ग है भारत देश हमारा”, जो “जननी जन्मभूमि स्वर्गादपि गरियसी” के विचार को व्यक्त करता है। देशप्रेम से ओत-प्रोत इन सभी फ़िल्मों और इन फ़िल्मों में शामिल देशभक्ति गीतों ने स्वाधीनता संग्राम में राष्ट्रीयता की भावना को जगाने में उल्लेखनीय योगदान दिया। ‘तुलसी’ के बाद 1942 में ‘सिरको प्रोडक्शन्स’ ने फिर एक बार हरिश्चन्द्र बाली को संगीतकार लेकर ‘अपना घर’ फ़िल्म बनाई। शान्ता आप्टे, चन्द्रमोहन, माया बनर्जी अभिनीत इस फ़िल्म के सभी गीत शान्ता आप्टे ने गाये। पंडित नरोत्तम व्यास गीतकार थे। फ़िल्म देशभक्ति मिज़ाज का था, जिसका शीर्षक गीत था “अपना घर, अपना घर, अपना देश है अपना घर”। बरसों बाद राज कपूर की फ़िल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ के एक मशहूर देशभक्ति गीत में कुछ-कुछ इसी भाव को व्यक्त करती पंक्ति “लाख लुभाये महल पराये, अपना घर फिर अपना घर है” सुनाई पड़ी।

अमीरबाई कर्नाटकी
1943 के आते-आते “अंग्रेज़ों, भारत छोड़ो” के नारे देश की गली-गली में गूंजने लगे। पिछले साल शुरू हुए ‘भारत छोड़ों आंदोलन’ ने स्वाधीनता संग्राम को एक नया मोड़ दे दिया था। फ़िल्मों में भी आज़ादी का जुनून बढ़ता दिखाई दिया। ऐसे में इस वर्ष ‘बॉम्बे टॉकीज़’ की फ़िल्म आई ‘क़िस्मत’ जिसने अब तक के सभी फ़िल्मों के रेकॉर्ड तोड़ दिए। कलकत्ते के ‘चित्र प्लाज़ा’ थिएटर में यह फ़िल्म लगातार साढ़े तीन साल तक चली और बॉक्स ऑफ़िस के सारे रेकॉर्ड तोड़ दिए, और ‘किस्मत’ के इस रेकॉर्ड को आगे चलकर 70 के दशक में फ़िल्म ‘शोले’ ने तोड़ा। ‘क़िस्मत’ अनिल बिस्वास की ‘बॉम्बे टॉकीज़’ की सब से कामयाब फ़िल्म थी। फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत एक देशभक्ति गीत था अमीरबाई और साथियों का गाया हुआ - “आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है, दूर हटो ऐ दुनियावालों हिन्दुस्तान हमारा है”। इस गीत ने स्वाधीनता-संग्राम की अग्नि को ऐसी हवा दी कि इसकी लपटें बहुत उपर तक उठीं और बहुत दूर तक इन लपटों ने राष्ट्रीयता की रोशनी बिखेरी। गीत का रिदम और ऑरकेस्ट्रेशन भी ऐसा ‘मार्च-पास्ट’ क़िस्म का था कि सुनते ही मन जोश से भर जाए! एक तरफ़ अनिल बिस्वास, जो ख़ुद एक कट्टर देशभक्त थे और जो फ़िल्मी दुनिया में आने से पहले चार बार जेल भी जा चुके थे, तो दूसरी तरफ़ इस गीत के गीतकार कवि प्रदीप, जिनकी झनझनाती राष्ट्रवादी कविताएँ लहू में उर्जा पैदा कर देती; इस देशभक्त गीतकार-संगीतकार की जोड़ी से उत्पन्न होने की वजह से ही शायद यह देशभक्ति गीत अमर हो गया। साथ ही ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान इसके आने से इस गीत का प्रकोप और ज़्यादा बढ़ गया। 

गीतकार प्रदीप
उस वक़्त देश की राजनैतिक अवस्था अच्छी नहीं थी क्योंकि उस समय के सभी बड़े नेता जेल में थे। गीतकार प्रदीप ने बहुत ही चतुराई से इस गीत को लिखा जिससे कि अंग्रेज़ों को यह लगे कि यह गीत ‘ऐक्सिस पावर्स’ (Axis powers – Germany, Italy, Japan etc) के ख़िलाफ़ लिखा गया है, पर भारतीयों को इस गीत का असली अर्थ समझने में तनिक भी असुविधा नहीं हुई। ऐसा कहा जाता है कि यह गीत इतना ज़्यादा लोकप्रिय हो गया था कि थिएटर में दर्शकों की माँग पर इस गीत को बार-बार रीवाइण्ड करके दिखाया जाता। और यह हाल पूरे देश भर के सिनेमाघरों का था। भले इस गीत को ‘ऐक्सिस पावर्स’ के विरुद्ध दिखा कर सेन्सर बोर्ड से पास करवा लिया गया था, पर जल्दी ही ब्रिटिश सरकार को गीत का अर्थ समझ में आ गया और कवि प्रदीप के नाम गिरफ़्तारी का वारण्ट जारी कर दिया गया। यह ख़बर सुनते ही प्रदीप भूमिगत हो गए। इस तरह से “आज हिमालय की छोटी से...” गीत हमारे स्वाधीनता संग्राम के इतिहास का एक अभिन्न अंग बन गया। आइए, चलते-चलते इस चर्चित गीत को अमीरबाई कर्नाटकी और साथियों के स्वर में सुनते हैं।


फिल्म किस्मत : ‘आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है...’ : अमीरबाई कर्नाटकी व साथी

 


आपको हमारा यह विशेष अंक कैसा लगा, हमे अवश्य लिखिए। आपका प्रिय साप्ताहिक स्तम्भ ‘सिने-पहेली’ बहुत जल्द नई साज-धज के साथ पुनः आरम्भ होगा। आज के इस विशेष अंक के बारे में आप अपने विचार हमे radioplaybackindia@live.com के पते पर अवश्य अवगत कराएँ। 

Thursday, January 24, 2013

गणतन्त्र दिवस पर विशेष : ‘बॉम्बे टॉकीज़’, ‘क़िस्मत’ और अनिल विश्वास


भारतीय सिनेमा के सौ साल –33 
स्मृतियों का झरोखा  : गणतन्त्र दिवस पर विशेष

‘दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिन्दुस्तान हमारा है...’


भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘स्मृतियों का झरोखा’ में आप सभी सिनेमा प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का चौथा गुरुवार है और आज से प्रत्येक माह के दूसरे और चौथे गुरुवार को हम ‘स्मृतियों का झरोखा’ के अन्तर्गत ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल के सदस्य सुजॉय चटर्जी की प्रकाशित पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ से किसी रोचक प्रसंग का उल्लेख किया करेंगे। आज के अंक में हम ‘बॉम्बे टॉकीज़’ की फ़िल्म ‘क़िस्मत’ की निर्माण-प्रक्रिया और उसकी सफलता के बारे में कुछ विस्मृत यादों को ताजा कर रहे हैं।


बॉम्बे टॉकीज़’ की दूसरी फ़िल्म ‘क़िस्मत’ तो एक ब्लॉकबस्टर सिद्ध हुई। अशोक कुमार और मुमताज़ शान्ति अभिनीत इस फ़िल्म ने बॉक्स ऑफ़िस के पहले के सारे रेकॉर्ड्स तोड़ दिए। पूरे देश में कई जगहों पर जुबिलियाँ मनाने के अलावा कलकत्ते के ‘चित्र प्लाज़ा’ थिएटर में यह फ़िल्म लगातार 196 हफ़्ते (तीन साल) तक नियमित रूप से चली। इस रेकॉर्ड को आगे चलकर रमेश सिप्पी की फ़िल्म ‘शोले’ ने तोड़ा। ‘क़िस्मत’ एक ट्रेण्डसेटर फ़िल्म थी क्योंकि इसमें बचपन में दो भाइयों के बिछड़ जाने और बाद में मिल जाने वाले फ़ॉरमूले को आज़माया गया था। फ़िल्म की सफलता ने इस विषय को काफ़ी लोकप्रिय बनाया और फ़िल्मकारों ने इस फ़ॉरमूले को बार-बार आज़माया।

‘क़िस्मत’ अनिल बिस्वास की ‘बॉम्बे टॉकीज़’ की सबसे कामयाब फ़िल्म थी। पार्श्वगायन की तकनीक अब विकसित हो चली थी और अनिल बिस्वास को अशोक कुमार के गायन में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं थी, इसीलिए इस फ़िल्म में अरूण कुमार ने उनका शत-प्रतिशत पार्श्वगायन किया (इससे पहले अरूण कुमार एक-आध गीत ही गाया करते थे, जबकि बाक़ी गीत अशोक कुमार ख़ुद गाते थे)। मुमताज़ शान्ति की आवाज़ बनीं अमीरबाई कर्नाटकी। फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत एक देशभक्ति गीत था अमीरबाई और साथियों का गाया हुआ - “आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है, दूर हटो ऐ दुनियावालों हिन्दुस्तान हमारा है...”। इस गीत ने स्वाधीनता-संग्राम की अग्नि में घी का काम किया। गीत का रिदम और ऑरकेस्ट्रेशन भी ऐसा ‘मार्च-पास्ट’ क़िस्म का था कि सुनते ही मन जोश से भर जाए। एक तरफ़ अनिल बिस्वास, जो ख़ुद एक कट्टर देशभक्त थे और जो फ़िल्मी दुनिया में आने से पहले चार बार जेल भी जा चुके थे, तो दूसरी तरफ़ इस गीत के गीतकार कवि प्रदीप, जिनकी झनझनाती राष्ट्रवादी कविताएँ लहू में उर्जा पैदा कर देती। इस देशभक्त गीतकार-संगीतकार की जोड़ी से उत्पन्न होने की वजह से ही शायद यह देशभक्ति गीत अमर हो गया। दो दिन बाद हम सब अपना राष्ट्रीय पर्व, गणतंत्र दिवस मनाएँगे। इस उपलक्ष्य में आइए सुनते है, यही चर्चित गीत। 

फिल्म ‘किस्मत’ : ‘आज हिमालय की चोटी से...’ : अमीरबाई कर्नाटकी और साथी



अमीरबाई का गाया फ़िल्म का एक अन्य हिट गीत था “ऐ दिल यह बता हमने बिगाड़ा है क्या तेरा, घर घर में दीवाली है मेरे घर में अन्धेरा”। उन्हीं का गाया “अब तेरे सिवा कौन मेरा कृष्ण कन्हैया, भगवान किनारे पे लगा दे मेरी नैया...” भी फ़िल्म की एक लोकप्रिय रचना थी। केवल इन तीन गीतों से ही ‘क़िस्मत’ के गीत-संगीत की चर्चा समाप्त नहीं हो जाती। एक और गीत जिसने चारों तरफ़ लोकप्रियता के परचम लहरा दिए थे, वह थी कालजयी लोरी “धीरे-धीरे आ रे बादल धीरे धीरे आ, मेरा बुलबुल सो रहा है, शोरगुल न मचा...”। इस गीत के दो वर्ज़न थे – पहला अमीरबाई का गाया एकल गीत जबकि दूसरे में मुख्य आवाज़ अरूण कुमार की थी और अमीरबाई गीत ने आख़िर में अपनी आवाज़ मिलाई थी। कहते हैं कि इस गीत के ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड पर अरूण कुमार के बदले अशोक कुमार की ही आवाज़ थी और अनिल बिस्वास ने मज़ाक में कहा था कि शायद यही एक ऐसा गीत है जिसे अशोक कुमार ने सुर में गाया है। जो भी है, हक़ीक़त यही है कि यह लोरी फ़िल्म-संगीत के इतिहास की एक सदाबहार लोरी है जिसकी चर्चा लोग आज भी करते हैं।

फिल्म ‘किस्मत’ : ‘धीरे धीरे आ रे बादल...’ : अरुण कुमार और अमीरबाई कर्नाटकी



‘क़िस्मत’ का शीर्षक गीत भी अमीरबाई और अरूण कुमार का गाया हुआ था, जिसके बोल थे “हम ऐसी क़िस्मत को क्या करें हाय, ये जो एक दिन हँसाए, एक दिन रुलाए”। अरूण कुमार ने एकल आवाज़ में “तेरे दुख के दिन फिरेंगे, ले दुआ मेरी लिए जा...” गीत गाया था। इस फ़िल्म का एक और बेहद सुंदर और लोकप्रिय गीत रहा “पपीहा रे, मेरे पिया से कहियो जाए...” जिसे पारुल घोष ने गाया था। यह गीत पारुल घोष का गाया सबसे लोकप्रिय गीत सिद्ध हुआ। इस गीत का असर कैसा रहा होगा, इसका अंदाज़ा हम इस बात से लगा सकते हैं कि लता मंगेशकर ने अपनी ‘श्रद्धांजलि’ एल्बम में पारुल घोष को श्रद्धांजलि स्वरूप उनके इसी गीत को गाया था और पारुल घोष को याद करते हुए लता जी ने कहा था, “पारुल घोष, जानेमाने संगीतकार अनिल बिस्वास जी की बहन, और प्रसिद्ध बाँसुरी वादक पण्डित पन्नालाल घोष की पत्नी थीं। फ़िल्म गायिका होने के बावजूद वो घर संसार सम्भालने वाली गृहणी भी थीं। उनके जाने के बाद महसूस हुआ कि वक़्त की गर्दिश ने हमसे कैस-कैसे फ़नकार छीन लिए।” जब मैंने पारुल घोष की परपोती श्रुति मुर्देश्वर कार्तिक से इस गीत के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने बताया, “इस गीत के साथ तो न जाने कितनी स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैं। जब मैं बहुत छोटी थी, तब सब से पहला पहला गीत जो मैंने सीखा था, वह यही गीत था। और जब भी कोई मुझे गीत गाने को कहता, मैं यही गीत गाती रहती। और आज तक यह मेरा पसंदीदा गीत रहा है”

फिल्म ‘किस्मत’ : ‘पपीहा रे, मेरे पिया से कहियो जाए...’ : पारुल घोष



हिमांशु राय की मृत्यु के बाद से ही ‘बॉम्बे टॉकीज़’ विवादों और परेशानियों से घिर गया था। सरस्वती देवी, जिन्हें हिमांशु राय की वजह से वहाँ जगह मिली थी, के लिए भी वहाँ काम करना मुश्किल हो गया। उपर से रामचन्द्र पाल, पन्नालाल घोष और अनिल बिस्वास जैसे संगीतकार वहाँ शामिल हो चुके थे। ऐसे में सरस्वती ने वहाँ से इस्तीफ़ा देना ही बेहतर समझा। उनकी प्रतिष्ठा और उनका अनुभव इतना था कि ‘मिनर्वा मूवीटोन’ के सोहराब मोदी ने उन्हें अपनी कम्पनी में काम करने के लिए आमन्त्रित किया। इस तरह से ‘बॉम्बे टॉकीज़’ की कुल 20 फ़िल्मों में संगीत देने के बाद सरस्वती देवी इस कम्पनी से अलग हो गईं और आने वाले वर्षों में ‘मिनर्वा मूवीटोन’ की कुछ 6 फ़िल्मों में संगीत दिया।

‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भ ‘स्मृतियों का झरोखा’ के अन्तर्गत आज हमने सुजॉय चटर्जी की पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के कुछ पृष्ठ उद्धरित किये हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘स्मृतियों का झरोखा’ के आगामी अंक में आपके लिए हम इस पुस्तक के कुछ और रोचक पृष्ठ लेकर उपस्थित होंगे। सुजॉय चटर्जी की पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ प्राप्त करने के लिए तथा अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव हमें भेजने के लिए radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेजें।  

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

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