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Sunday, May 1, 2016

राग रागेश्री : SWARGOSHTHI – 268 : RAG RAGESHRI





स्वरगोष्ठी – 268 में आज

मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन -1 : मन्ना डे को जन्मदिन पर स्मरण

‘कौन आया मेरे मन के द्वारे पायल की झंकार लिये...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से हमारी नई श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ का शुभारम्भ हो रहा है। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का भी सहयोग लिया है। आप सब संगीत-प्रेमियों का मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ श्रृंखला के प्रवेशांक में हार्दिक स्वागत करता हूँ। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर आधारित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हम मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की और फिर उस राग की जानकारी देंगे। श्रृंखला की पहली कड़ी में आज हमने राग रागेश्री में उनका स्वरबद्ध किया, फिल्म ‘देख कबीरा रोया’ का एक गीत चुना है। इस गीत को पार्श्वगायक मन्ना डे ने स्वर दिया था। इस गीत को चुनने का एक कारण यह भी है कि आज के ही दिन वर्ष 1919 में मन्ना डे का जन्म हुआ था। आज मन्ना डे के 98वें जन्मदिन पर हम उन्हीं के गाये गीत से उनको स्वरांजलि अर्पित कर रहे हैं। राग रागेश्री पर आधारित फिल्म ‘देख कबीरा रोया’ के गीत के साथ राग का स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम उस्ताद शाहिद परवेज का सितार पर बजाया राग रागेश्री भी प्रस्तुत कर रहे हैं। 


"बहारें हमको ढूंढेंगी न जाने हम कहाँ होंगे...", संगीतकार मदन मोहन द्वारा स्वरबद्ध इस गीत के बोल उन्हीं पर किस शिद्दत से लागू होती है, यह बताने की ज़रूरत नहीं। आज उनके गाये हुए इतने दशक बीत जाने के बाद भी उनके गीतों के ज़रिए उनके अफ़साने बयाँ होते रहे हैं और आगे भी होते रहेंगे। मदन मोहन के फ़िल्मी गीतों की ख़ासियत यह रही है कि फ़िल्म संगीत को शास्त्रीय संगीत के रंग से ऐसे सजाया है कि एक एक रचना को सुन कर जैसे आत्मा तृप्त हो जाती है। इसी उद्देश्य से हम ’स्वरगोष्ठी’ में आज से शुरु कर रहे हैं संगीतकार मदन मोहन द्वारा स्वरबद्ध शास्त्रीय संगीत आधारित गीतों की एक श्रृंखला। शुरुआत किस गीत से की जाए? आज 1 मई है, सुविख्यात गायक मन्ना डे का जन्मदिवस। तो क्यों ना मदन मोहन और मन्ना डे के सुरीले संगम से उत्पन्न एक अनमोल मोती प्रस्तुत किया जाए। हिन्दी फ़िल्मी गीतों में शास्त्रीय संगीत पर आधारित गीत गाने वाले पुरुष गायकों में मन्ना डे का कोई सानी नहीं। ना उस ज़माने में कोई था, और इस ज़माने में तो सवाल ही नहीं। जब भी कभी शास्त्रीय राग आधारित रचना की सिचुएशन किसी फ़िल्म में आती, तब मन्ना डे ही संगीतकारों की पहली पसन्द होते। मदन मोहन ने भी उनसे कई गीत गवाए हैं। 1957 में एक फ़िल्म बनी थी ’देख कबीरा रोया’ जिसमें लगभग सभी गीत शास्त्रीय रागों पर आधारित थे। तीन गीत तो एक के बाद एक फ़िल्म में आते हैं, पहला "मेरी वीणा तुम बिन रोये" (लता), दूसरा "अश्कों से तेरी हमने तसवीर बनायी है" (आशा) और तीसरा गीत है "तू प्यार करे या ठुकराये" (लता)। ये तीन गीत क्रम से राग अहीर भैरव, पहाड़ी और भैरवी पर आधारित थे, और ये फ़िल्माये गये, क्रम से, अमिता, अनीता गुहा और शुभा खोटे पर। लता की आवाज़ में फ़िल्म का एक अन्य गीत "लगन तोसे लगी बलमा" भी एक सुन्दर रचना थी राग तिलंग पर आधारित। मदन मोहन के शुरुआती सफ़र में उन पर यह आरोप लगा था कि वो हमेशा गायिका-प्रधान गीतों की रचना करते हैं। सारे इलज़ामों को शान्त करते हुए जब उन्होंने ’देख कबीरा रोया’ में "कौन आया मेरे मन के द्वारे" (मन्ना डे) और "हमसे आया ना गया" (तलत महमूद) जैसे गीतों की रचना की तब सभी आलोचकों ने चुप्पी साध ली।

"कौन आया मेरे मन के द्वारे" गीत तो बेहद लोकप्रिय हुआ था जिसे मन्ना डे के श्रेष्ठ गीतों में भी माना जाता है। एक साक्षात्कार में मन्ना दा ने राग रागेश्री पर आधारित इस गीत के बारे में कहा था कि मदन मोहन ने उनसे इस गीत को गाते समय विशेष ध्यान रखने को कहा था क्योंकि यह रचना उनके दिल के बहुत क़रीब थी। मन्ना डे की आवाज़ में इसी फ़िल्म में एक और उल्लेखनीय रचना थी "बैरन हो गई रैना" जो राग जयजयवन्ती का एक बहुत उत्कृष्ट उदाहरण है। इस गीत को सुनते हुए ऐसा लगता है कि यह कोई फ़िल्मी गीत ना होकर शास्त्रीय संगीत की कोई रचना हो। मदन मोहन की मृत्यु के बाद उनको समर्पित एक कार्यक्रम में उन्हें याद करते हुए मन्ना डे ने कहा था - एक महान संगीतकार, मदन साहब, मदन मोहन। मदन मोहन गाने तो लाजवाब बनाते ही थे, साथ ही साथ खाना भी बहुत अच्छा पका लेते थे। और ख़ास कर के एक चीज़ जो बनाते थे, लाजवाब, वह शायद आप भी खाये होंगे, वह है भिंडी-मटन। यानी कि भिंडी और मटन, दोनों को मिला कर मदन साहब बनाते थे। एक मरतबा मुझे टेलीफ़ोन करके कहा कि मन्ना, क्या कर रहा है? मैंने कहा कि कुछ भी नहीं कर रहा हूँ, बैठा हूँ। कहने लगे, क्या बैठा है, चल आजा मेरे घर। उन दिनों मैं रहता था बान्द्रे में, मदन मोहन साहब रहते थे पेडर रोड पे। तो गाड़ी निकाल कर मैं चला गया मदन साहब के पास। और मदन साहब बना रहे थे मटन के साथ भिंडी। मैंने बोला कि यह क्या कम्बिनेशन है भई, मटन के साथ भिंडी? कहा कि खा के तो देख, फिर मालूम पड़ेगा! वाक़ई, बहुत बहुत बढ़िया भिंडी-मटन खिलाया उन्होंने। साथ ही साथ उन्होंने कहा कि एक गाना है। और वह गाना था "कौन आया मेरे मन के द्वारे...”। मदन मोहन का भिंडी-मटन जितना स्वादिष्ट बना था, उतना ही मधुर बना था ’देख कबीरा रोया’ का यह गीत। लीजिए, अब आप यह गीत सुनिए।


राग रागेश्री : ‘कौन आया मेरे मन के द्वारे...’ : मन्ना डे : फिल्म – देख कबीरा रोया



फिल्म ‘देख कबीरा रोया’ के इस गीत के बारे में सुप्रसिद्ध संगीत विदुषी अलका देव मारुलकर ने कहा था- ’देख कबीरा रोया’ में रागेश्री राग पर आधारित एक गीत है जिसमें switch-overs भी नाट्यपूर्ण तरीके से आया है। रागेश्री और बागेश्री दोनों बहने हैं, जिनमें थोड़ा फ़र्क है। फ़र्क यह है कि बागेश्री में कोमल गान्धार के साथ पंचम लगता है और रागेश्री में कोमल गान्धार तो होता है लेकिन पंचम वर्जित होता है, कोई कोई इसमें शुद्ध निषाद भी लगाते हैं। मन्ना डे के गाए इस गीत के दूसरे अन्तरे में तीव्र मध्यम का सुन्दर प्रयोग मन्ना दा ने किया है, जिसमें मिश्र गारा की छाया भी दिखाई पड़ती है।

यह गीत राग रागेश्री पर आधारित है। भारतीय संगीत में राग रागेश्री को खमाज थाट के अन्तर्गत माना जाता है। राग की जाति औड़व-षाड़व होती है, अर्थात, आरोह में पाँच और अवरोह में छः स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग में निषाद स्वर कोमल होता है। पंचम स्वर वर्जित होता है। आरोह में पंचम के साथ ऋषभ स्वर भी वर्जित होता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। इसमें गान्धार स्वर वादी और निषाद स्वर संवादी होता है। राग रागेश्री के गायन-वादन का समय रात्रि का दूसरा प्रहर माना गया है। राग रागेश्री का एक दूसरा प्रकार भी प्रचलित है। इस प्रकार के आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। परन्तु मन्द्र सप्तक में हमेशा कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। कोमल निषाद की रागेश्री अधिक प्रचलित है। अब हम आपको उस्ताद शाहिद परवेज़ से सितार पर राग रागेश्री की तीनताल में निबद्ध एक गत सुनवाते है। आप इसे सुनिए और फिल्म ‘देख कबीरा रोया’ के गीत के स्वरों को इस सितार की रचना में पहचानने का प्रयास कीजिए। साथ ही इसी प्रस्तुति के साथ हमें आज के इस अंक को यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।


राग रागेश्री : सितार पर तीनताल में निबद्ध गत : उस्ताद शाहिद परवेज़




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 268वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको संगीतकार मदन मोहन के संगीत से सजे एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 270वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को ध्यान से सुनिए और बताइए कि आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका को पहचान सकते हैं? इस गायिका का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 7 मई, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 270वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 266 की संगीत पहेली में हमने आपको 1964 में प्रदर्शित भोजपुरी फिल्म ‘बिदेशिया’ से चैती शैली पर आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – दीपचन्दी और कहरवा, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- मात्राएं – 14 और 8 या 4 तथा तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायिका – सुमन कल्याणपुर

लगता है इस बार की पहेली हमारे प्रतिभागियों के लिए कुछ कठिन थी। इस बार मात्र तीन प्रतिभागियों ने उत्तर दिया है। इनमे से दो प्रतिभागियों ने केवल पहले और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर दिया है। तीसरी प्रतिभागी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने ही गायिका सुमन कल्याणपुर की आवाज़ को पहचाना है, किन्तु पहले और दूसरे प्रश्नों का अधूरा जवाब दिया है। इस प्रकार हरिणा जी को दो अंक दिये जाते हैं। दो अंक पाकर हमारे अन्य विजेता हैं- पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आज से हमारी नई श्रृंखला ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ का शुभारम्भ हो रहा है। इस श्रृंखला में हम फिल्म संगीतकार मदन मोहन के कुछ राग आधारित गीतों को चुन कर आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। श्रृंखला के इस अंक में हमने आपसे राग रागेश्री पर चर्चा की। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। ‘स्वरगोष्ठी’ पर आप भी अपने सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते है। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को श्रृंखला के नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



Sunday, June 22, 2014

संगीतकार मदनमोहन के राग आधारित गीत




स्वरगोष्ठी – 173 में आज

व्यक्तित्व – 3 : फिल्म संगीतकार मदनमोहन

‘भूली हुई यादों मुझे इतना न सताओ अब चैन से रहने दो मेरे पास न आओ...’ 
 




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ की तीसरी कड़ी में, मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, जारी लघु श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ के अन्तर्गत हम आपसे संगीत के कुछ असाधारण संगीत-साधकों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं, जिन्होंने मंच, विभिन्न प्रसारण माध्यमों अथवा फिल्म संगीत के क्षेत्र में लीक से हट कर उल्लेखनीय योगदान किया है। हमारी आज की कड़ी के व्यक्तित्व हैं, फिल्म संगीत-प्रेमियों के बीच “गजल-सम्राट” की उपाधि से विभूषित यशस्वी संगीतकार, मदनमोहन। उनके संगीतबद्ध गीत अत्यन्त परिष्कृत हुआ करते थे। आभिजात्य वर्ग के बीच उनके गीत बड़े शौक से सुने और सराहे जाते थे। वे गज़लों को संगीतबद्ध करने में सिद्ध थे। गज़लों के साथ ही अपने गीतों में रागों का प्रयोग भी निपुणता के साथ करते थे। विभिन्न रागों पर आधारित उनके अनेक गीत आज भी सदाबहार बने हुए हैं। उनके अधिकतर राग आधारित गीतों को लता मंगेशकर और मन्ना डे स्वर प्रदान किए हैं। आज के अंक में हम मदनमोहन के शास्त्रीय राग आधारित रचनाओं के सन्दर्भ में उनकी विलक्षण प्रतिभा को रेखांकित करेंगे। यह भी सुखद संयोग है कि आज से तीसरे दिन अर्थात 25 जून को मदनमोहन का 91वाँ जन्मदिवस है। इस अवसर पर ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार इस महान संगीत-साधक की स्मृतियों को उन्हीं के स्वरबद्ध गीतों के माध्यम से स्वरांजलि अर्पित करता है। 
 



फिल्म संगीत के क्षेत्र में मदनमोहन का नाम एक ऐसे संगीतकार के रूप में लिया जाता है, जिनकी रचनाएँ सभ्रान्त और संगीत रसिकों के बीच चाव से सुनी जाती है। उनका संगीत जटिलताओं से मुक्त होते हुए भी हमेशा सतहीपन से भी दूर ही रहा। उनका जन्म 25 जून, 1924 को बगदाद में हुआ था। फिल्मी संस्कार उन्हें विरासत में मिला था। मदनमोहन के पिता रायबहादुर चुन्नीलाल, विख्यात फिल्म निर्माण संस्था ‘फिल्मिस्तान’ के संस्थापक थे। मुम्बई में उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई। बचपन से ही संगीत के प्रति लगाव होते हुए भी शिक्षा पूर्ण होने के बाद आश्चर्यजनक रूप से मदनमोहन ने सेना की नौकरी की। परन्तु लम्बे समय तक वे सेना की नौकरी में नहीं रहे और वहाँ से मुक्त होकर लखनऊ रेडियो के संगीत विभाग में नियुक्त हो गए। यहाँ रह कर जिस सांगीतिक परिवेश और संगीत की विभूतियों से उनका सम्पर्क हुआ, उसका प्रभाव उनकी रचनाओं पर स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। लखनऊ रेडियो केन्द्र पर कार्य करते हुए मदनमोहन का सम्पर्क विख्यात गायिका बेगम अख्तर और उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ से हुआ। आगे चलकर मदनमोहन के फिल्म संगीत पर इन विभूतियों का असर हुआ। फिल्मों में गजल गायकी का एक मानक स्थापित करने में मदनमोहन का योगदान प्रशंसनीय रहा है। निश्चित रूप से यह प्रेरणा उन्हें बेगम अख्तर से ही मिली थी। इसी प्रकार उनके अनेक गीतों में रागों की विविधता के दर्शन भी होते हैं। फिल्म संगीत को रागों के परिष्कृत और सरलीकृत रूप प्रदान करने की प्रेरणा उन्हें उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ और लखनऊ के तत्कालीन समृद्ध सांगीतिक परिवेश से ही मिली थी। ‘स्वरगोष्ठी’ की इस कड़ी में हम मदनमोहन के संगीतबद्ध कुछ राग आधारित गीतों पर चर्चा कर रहे हैं। सबसे पहले हम जिस गीत की चर्चा करेंगे वह 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘देख कबीरा रोया’ से लिया गया है। मदनमोहन ने इस फिल्म के प्रायः सभी गीत विविध शास्त्रीय रागों पर आधारित करते हुए रचे थे। फिल्म के सभी गीत गुणबत्ता और लोकप्रियता की दृष्टि से अद्वितीय थे। इन्हीं गीतों में से हमने आपके लिए राग जैजैवन्ती के स्वरों से अलंकृत गीत- ‘बैरन हो गई रैना...’ चुना है। इस गीत में नायिका के विरह भाव का चित्रण किया गया है। रात्रि के दूसरे प्रहर में मध्यरात्रि के निकट गाया-बजाया जाने वाला राग जैजैवन्ती के स्वरों में प्रतीक्षा और विरह का भाव खूब मुखर होता है। ऐसे गीतों के लिए पुरुष पार्श्वगायकों में मन्ना डे, मदनमोहन की पहली पसन्द थे। तीनताल में निबद्ध इस गीत को मन्ना डे ने बड़े ही भावपूर्ण ढंग से गाया है।


राग जैजैवन्ती : ‘बैरन हो गई रैन...’ : स्वर – मन्ना डे : संगीत – मदनमोहन : फिल्म – देख कबीरा रोया

 



मदनमोहन के संगीत में लता मंगेशकर के स्वरों का योगदान हमेशा महत्त्वपूर्ण रहा है। पाँचवें दशक के अन्तिम वर्षों में लता मंगेशकर पार्श्वगायन के क्षेत्र में अवसर पाने के लिए संघर्षरत थीं। उन्हीं दिनों मदनमोहन भी अपनी रेडियो की नौकरी छोड़ कर फिल्मों में प्रवेश का मार्ग खोज रहे थे। यूँतो उनके पिता रायबहादुर चुन्नीलाल तत्कालीन फिल्म जगत के प्रतिष्ठित व्यक्तित्व थे, किन्तु मदनमोहन अपनी प्रतिभा के बल पर ही फिल्म संगीत के क्षेत्र में अपना स्थान बनाना चाहते थे। उन्हीं दिनों संगीतकार गुलाम हैदर फिल्म ‘शहीद’ के लिए नई आवाज़ खोज रहे थे। उन्होने स्वर-परीक्षा के लिए मदनमोहन और लता मंगेशकर की आवाज़ों में एक युगल गीत रिकार्ड किया। एस. मुखर्जी ने इस रिकार्डिंग को सुन कर दोनों आवाज़ों को खारिज कर दिया। उन्हें क्या पता था कि आगे चल कर इनमें से एक आवाज़ विश्वविख्यात गायिका का और दूसरी आवाज़ उच्चकोटि के संगीतकार की है। आगे चल कर मदनमोहन और उनकी मुँहबोली बहन लता मंगेशकर की जोड़ी ने फिल्म संगीत जगत को अनेक मधुर गीतों से समृद्ध किया। 1950 में मदनमोहन के संगीत निर्देशन में बनी देवेन्द्र गोयल की फिल्म ‘आँखें’ का संगीत काफी लोकप्रिय हुआ, किन्तु इन गीतों में लता मंगेशकर की आवाज़ नहीं थी। फिल्म में मीना कपूर, शमशाद बेगम और मुकेश की आवाज़ें थी। फिल्म ‘शहीद’ के लिए की गई स्वर-परीक्षा के दौरान मदनमोहन ने लता मंगेशकर से वादा किया था कि अपनी पहली फिल्म में वे लता से गीत गवाएंगे, किन्तु अपनी पहली फिल्म ‘आंखे’ में वे अपना संकल्प पूरा न कर सके। परन्तु 1951 में बनी देवेंद्र गोयल की ही अगली फिल्म ‘अदा’ में मदनमोहन और लता मंगेशकर का साथ हुआ और यह साथ लम्बी अवधि तक जारी रहा। इस दौरान लता मंगेशकर ने मदनमोहन के संगीत निर्देशन में अनेक उत्कृष्ट गीत गाये। मदनमोहन के संगीत से सजा दूसरा गीत, जो हम प्रस्तुत कर रहे हैं, वह एक युगल गीत है। 1959 में प्रदर्शित फिल्म ‘चाचा ज़िन्दाबाद’ में मदनमोहन का संगीत था। इस फिल्म के गीतों में भी उन्होने रागों का आधार लिया और आकर्षक संगीत रचनाओं का सृजन किया। फिल्म में राग ललित के स्वरों में पिरोया एक मधुर गीत- ‘प्रीतम दरश दिखाओ...’ था, जिसे मन्ना डे और लता मंगेशकर ने स्वर दिया। आइए, तीनताल मे निबद्ध यह गीत सुनते हैं। 


राग ललित : ‘प्रीतम दरश दिखाओ...’ : स्वर – मन्ना डे और लता मंगेशकर : संगीत – मदनमोहन : फिल्म – चाचा ज़िन्दाबाद





मदनमोहन को ‘गजलों का बादशाह’ कहा जाता है। नौशाद जैसे वरिष्ठ संगीतकार भी उनकी गज़लों के प्रशंसक रहे हैं। मदनमोहन के संगीतबद्ध अधिकतर गजलों में पुरुष कण्ठस्वर तलत महमूद के और नारी स्वर के लिए तो एकमात्र लता मंगेशकर ही थीं। पिछले दिनों हमारे साथी स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी ने अपने ‘एक गीत सौ कहानियाँ’ स्तम्भ में मदनमोहन के गज़लों की विशेषताओं को रेखांकित किया था। (पढ़ने और सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें) मदनमोहन के स्वरबद्ध गज़लों को अन्य पार्श्वगायकों ने भी गाया है, किन्तु तलत महमूद के स्वर में उनकी गज़लें कुछ अधिक मुखर हुई हैं। मदनमोहन के गीतकारों में राजेन्द्र कृष्ण और राजा मेंहदी अली खाँ के गीतों को जनसामान्य ने खूब सराहा। उनके संगीत में सितार का श्रेष्ठतम उपयोग हुआ। इसके लिए उस्ताद रईस खाँ ने उनके सर्वाधिक गीतों में सितार बजाया था। इसके अलावा कुछेक गीतों में बाँसुरी वादक पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया और सन्तूर वादक पण्डित शिवकुमार शर्मा जैसे दिग्गज संगीतज्ञों का योगदान मिलता है। मदनमोहन द्वारा संगीतबद्ध पहली फिल्म ‘आँखें’ में पार्श्वगायक मुकेश ने सदाबहार गीत- ‘प्रीत लगाके मैंने ये फल पाया...’ गाया था। एक लम्बे अन्तराल के बाद मुकेश की वापिसी मदनमोहन के साथ फिल्म ‘दुनिया न माने’ में हुई। इसके बाद 1961 में प्रदर्शित फिल्म ‘संजोग’ में मुकेश ने मदनमोहन के संगीत निर्देशन में एक बेहद गम्भीर और असरदार गीत- ‘भूली हुई यादों मुझे इतना न सताओ...’ गाया। मदनमोहन ने यह गीत राग कल्याण अर्थात यमन के स्वरों में बाँधा था। फिल्मों में प्रायः राग आधारित गीतों को तैयार करने वाले संगीतकारों ने प्रायः मुकेश को प्राथमिकता देने में परहेज किया, किन्तु मदनमोहन ने मुकेश की गायकी से रागानुकूल तत्त्वों को किस प्रकार उभारा है, यह अनुभव आप गीत सुन कर स्वयं कर सकते हैं। तीव्र मध्यम के साथ सभी शुद्ध स्वरों वाले राग यमन के गायन-वादन का उपयुक्त समय गोधूलि बेला अर्थात पाँचवें प्रहर का आरम्भिक समय होता है। गीत में उदासी का जो भाव है वह यमन के स्वरों में खूब उभरता है। मुकेश ने दादरा ताल में निबद्ध इस गीत को पूरी संवेदना के साथ गाया है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग यमन : ‘भूली हुई यादों मुझे इतना न सताओ...’ : स्वर – मुकेश : संगीत – मदनमोहन : फिल्म – संजोग 






आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 173वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वाद्य संगीत प्रस्तुति का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 180वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत के इस अंश को सुन कर राग पहचानिए और हमें उसका नाम लिख भेजिए।

2 – यह संगीत रचना किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 175वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 171वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1953 में प्रदर्शित फिल्म ‘अनारकली’ से एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- गायक हेमन्त कुमार। सुनवाए गए गीतांश में केवल हेमन्त कुमार की आवाज़ है, किन्तु पूरा गीत हेमन्त कुमार और लता मंगेशकर ने युगल रूप में गाया है। पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग बागेश्री। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी, चंडीगढ़ के हरकीरत सिंह तथा पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात




मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर ‘व्यक्तित्व’ शीर्षक से जारी श्रृंखला के आज के अंक में हमने यशस्वी फिल्म संगीतकार मदनमोहन के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा की है। इसके साथ ही उनके राग आधारित कुछ गीतों की रंजकता का अनुभव भी किया। आप भी यदि ऐसे किसी संगीतकार की जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पते पर भेज दें। अपने पाठको/श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित/प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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