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Sunday, November 13, 2016

राग देसी : SWARGOSHTHI – 292 : RAG DESI




स्वरगोष्ठी - 292 में आज

नौशाद के गीतों में राग-दर्शन – 5 : रागदारी संगीत की सुगन्ध बिखेरता दौर

“आज गावत मन मेरो झूम के, तेरी तान भगवान...”



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला – “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय फिल्म संगीत के शिखर पर विराजमान नौशाद अली के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की विभिन्न कड़ियों में हम आपको फिल्म संगीत के माध्यम से रागों की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के कुछ राग-आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इस श्रृंखला का समापन हम आगामी 25 दिसम्बर को नौशाद अली की 98वीं जयन्ती के अवसर पर करेंगे। 25 दिसम्बर, 1919 को सांगीतिक परम्परा से समृद्ध शहर लखनऊ के कन्धारी बाज़ार में एक साधारण परिवार में नौशाद का जन्म हुआ था। नौशाद जब कुछ बड़े हुए तो उनके पिता वाहिद अली घसियारी मण्डी स्थित अपने नए घर में आ गए। यहीं निकट ही मुख्य मार्ग लाटूश रोड (वर्तमान गौतम बुद्ध मार्ग) पर संगीत के वाद्ययंत्र बनाने और बेचने वाली दूकाने थीं। उधर से गुजरते हुए बालक नौशाद घण्टों दूकान में रखे साज़ों को निहारा करता था। एक बार तो दूकान के मालिक गुरबत अली ने नौशाद को फटकारा भी, लेकिन नौशाद ने उनसे आग्रह किया की वे बिना वेतन के दूकान पर रख लें। नौशाद उस दूकान पर रोज बैठते, साज़ों की झाड़-पोछ करते और दूकान के मालिक का हुक्का तैयार करते। साज़ों की झाड़-पोछ के दौरान उन्हें कभी-कभी बजाने का मौका भी मिल जाता था। उन दिनों मूक फिल्मों का युग था। फिल्म प्रदर्शन के दौरान दृश्य के अनुकूल सजीव संगीत प्रसारित हुआ करता था। लखनऊ के रॉयल सिनेमाघर में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान एक लद्दन खाँ थे जो हारमोनियम बजाया करते थे। यही लद्दन खाँ साहब नौशाद के पहले गुरु बने। नौशाद के पिता संगीत के सख्त विरोधी थे, अतः घर में बिना किसी को बताए सितार नवाज़ युसुफ अली और गायक बब्बन खाँ की शागिर्दी की। कुछ बड़े हुए तो उस दौर के नाटकों की संगीत मण्डली में भी काम किया। घर वालों की फटकार बदस्तूर जारी रहा। अन्ततः 1937 में एक दिन घर में बिना किसी को बताए माया नगरी बम्बई की ओर रुख किया।


खनऊ से बम्बई (अब मुम्बई) आकर कुछ समय तक नौशाद अपने एक मित्र के परिचित डॉ. अब्दुल अलीम नामी के यहाँ रहे। परन्तु जब उन्हें ‘न्यू पिक्चर कम्पनी’ में पियानो वादक की नौकरी मिल गई तब वह लखनऊ के एक अखतर साहब के साथ दादर में रहने लगे। अख्तर साहब एक दूकान में सेल्समैन थे और उसी दूकान में रहा करते थे। रात को दूकान में जब गर्मी लगती तब दोनों मित्र बाहर फुटपाथ पर अपना बिस्तर लगा लेते। सड़क के दूसरी ओर ‘ब्राडवे सिनेमाघर’ था। जब बरसात होती तो उन्हे शिवाजी भवन की सीढ़ियों के नीचे शरण लेनी पड़ती। उसी सीढ़ियों पर खट-खट करती उस जमाने की मशहूर हीरोइन लीला चिटनिस अपने निवास में जाया करती थी। ‘ब्राडवे सिनेमाघर’ में ही वर्षों बाद नौशाद की फिल्म ‘बैजू बावरा’ ने गोल्डन जुबली मनाई थी। इस अवसर पर सामने के फुटपाथ को देख कर नौशाद ने अपने कड़की के दिनों के फुटपाथ के दिनों को याद कर नम आँखों से फिल्म के निर्देशक विजय भट्ट से कहा था –“इस सड़क को पार करने में मुझे पन्द्रह वर्ष लग गए”।

उस्ताद अमीर खाँ 
अपने संगीत निर्देशन के आरम्भिक दशक में नौशाद के गीतों की विशेषता थी कि इनमें अवधी लोक संगीत का मनोहारी मिश्रण मिलता है। इस पहले दशक के गीतों में जहाँ भी रागों का स्पर्श उन्होने किया, उनकी धुनें सुगम और गुनगुनाने लायक थीं। नौशाद की छठें दशक की फिल्मों में रागदारी संगीत का प्रभुत्व बढ़ता गया। अब हम वर्ष 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘बैजू बावरा’ और उसके गीतों की चर्चा करते हैं, जिसमें नौशाद ने रागों के प्रति अपने अगाध श्रद्धा को सिद्ध किया और राग आधारित गीतों को संगीतबद्ध करने की अपनी क्षमता को उजागर किया। इस वर्ष प्रदर्शित फिल्म ‘बैजू बावरा’ में नौशाद ने कई कालजयी गीतो की रचना की थी। फिल्म के गीतों के लिए उनके पास कई लोकप्रिय पार्श्वगायक और गायिकाओं की आवाज़ का साथ तो था ही, रागों का शुद्ध रूप में प्रस्तुत करने की ललक के कारण उन्होने उस समय के प्रख्यात शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ और पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर को भी फिल्म गीत गाने के लिए राजी किया। खाँ साहब और पण्डित पलुस्कर द्वारा प्रस्तुत राग देशी के स्वरों में जुगलबन्दी वाला गीत- ‘आज गावत मन मेरो...’ तो फिल्म संगीत के इतिहास में एक अमर गीत बन चुका है। इसके अलावा उस्ताद अमीर खाँ ने अपने एकल स्वर में राग पूरिया धनाश्री में गीत- ‘तोरी जय जय करतार...’ भी गाया था।

पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर
अकबर के समकालीन कुछ ऐतिहासिक तथ्यों और कुछ दन्तकथाओं के मिश्रण से बुनी 1953 में एक फिल्म- ‘बैजू बावरा’ प्रदर्शित हुई थी। ऐतिहासिक कथानक और उच्चस्तर के संगीत से युक्त अपने समय की यह एक सफलतम फिल्म थी। इस फिल्म को आज छह दशक बाद भी केवल इसलिए याद किया जाता है कि इसका गीत-संगीत भारतीय संगीत के रागों पर केन्द्रित था। फिल्म के कथानक के अनुसार अकबर के समकालीन सन्त-संगीतज्ञ स्वामी हरिदास के शिष्य तानसेन सर्वश्रेष्ठ संगीतज्ञ थे। परन्तु उनके संगीत पर दरबारी प्रभाव आ चुका था। उन्हीं के समकालीन स्वामी हरिदास के ही शिष्य माने जाने वाले बैजू अथवा बैजनाथ थे, जिसका संगीत मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण था। फिल्म के कथानक का निष्कर्ष यह था कि संगीत जब राज दरबार की दीवारों से घिर जाता है, तो उसका लक्ष्य अपने स्वामी की प्रशस्ति तक सीमित हो जाता है, जबकि मुक्त प्राकृतिक परिवेश में पनपने वाला संगीत ईश्वरीय शक्ति से परिपूर्ण होता है। राग देसी के स्वरों से पगा जो गीत आज हमारी चर्चा में है, उसका फिल्मांकन बादशाह अकबर के दरबार में किया गया था। तानसेन और बैजू बावरा के बीच एक सांगीतिक प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। अकबर बादशाह ने श्रेष्ठता के निर्णय के लिए यह शर्त रखी कि जिसके संगीत के असर से पत्थर पिघल जाएगा वही गायक सर्वश्रेष्ठ कहलाएगा। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस प्रतियोगिता में तानसेन की तुलना में बैजू बावरा की श्रेष्ठता सिद्ध हुई थी। आज का गीत फिल्म के इसी प्रसंग में प्रस्तुत किया गया था। इस गीत में अपने समय के दो दिग्गज गायक उस्ताद अमीर खाँ और पण्डित दत्तात्रेय विष्णु (डी.वी.) पलुस्कर ने अपना स्वर दिया था।

राग देसी : ‘आज गावत मन मेरो झूम के...’: पण्डित डी.वी. पलुस्कर और उस्ताद अमीर खाँ



संगीतकार नौशाद को भारतीय संगीत के रागों के प्रति कितनी श्रद्धा थी, इस गीत को सुन कर स्पष्ट हो जाता है। अपने समय के जाने-माने संगीतज्ञों को फिल्म संगीत के मंच पर लाने में नौशाद अग्रणी रहे हैं। आज की ‘स्वरगोष्ठी’ में हम फिल्म ‘बैजू बावरा’ के एक गीत के माध्यम से प्रकृति के रंगों को बिखेरने में सक्षम राग ‘देसी’ अथवा ‘देसी तोड़ी’ पर चर्चा करेंगे। अभी आपने जो युगल गीत सुना, वह तीनताल में निबद्ध है। परदे पर तानसेन के लिए उस्ताद अमीर खाँ ने और बैजू बावरा के लिए पण्डित पलुस्कर जी ने स्वर दिया था। मित्रों, इन दोनों कलासाधकों का व्यक्तित्व और कृतित्व इतना विशाल है कि ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक में मात्र कुछ पंक्तियों में समेटा नहीं जा सकता। इस गीत के गीतकार, शकील बदायूनी और संगीतकार, नौशाद हैं। अपने समय के इन दो दिग्गज संगीतज्ञों की उपस्थिति में नौशाद साहब किस प्रकार उन्हें निर्देशित कर पाए होंगे यह भी एक विचारणीय प्रश्न है। वर्षों पहले एक साक्षात्कार में नौशाद जी ने स्वयं इस गीत की चर्चा करते हुए बताया था कि उन्होने दोनों दिग्गज संगीतज्ञों को फिल्म के प्रसंग की जानकारी दी, राग पर चर्चा हुई और गाने के बोल दिये गए। उन्होने आपस में सलाह-मशविरा किया और फिर रिकार्डिंग शुरू हो गई। इस गीत के आरम्भिक लगभग 1 मिनट 45 सेकेण्ड की अवधि में दोनों गायकों ने ‘तुम्हरे गुण गाउँ...’ पंक्तियों के माध्यम से विलम्बित खयाल की झलक और शेष भाग में द्रुत खयाल का रूप प्रदर्शित किया है। गीत के अन्तिम भाग में तानसेन के तानपूरा का तार टूट जाता है, जबकि बैजू द्रुत लय की तानें लगाते रहते हैं। फिल्म में उनकी तानों के असर से काँच के पात्र में रखा पत्थर पिघलने लगता है।

उस्ताद  फ़ैयाज़  खाँ
आइए, अब कुछ चर्चा राग देसी के बारे में करते है। दिन के दूसरे प्राहर में गाये-बजाये जाने वाले इस राग को देसी के अलावा देसी तोड़ी अथवा देस तोड़ी भी कहते हैं। यह आसावरी थाट का राग है। इसकी जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वरों का प्रयोग होता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल होते है, जबकि धैवत और निषाद स्वर शुद्ध रूप में भी प्रयोग किया जाता है। इसमे शुद्ध धैवत के स्थान पर कोमल धैवत का प्रयोग किया जाता है, शेष सभी स्वर राग देस के समान ही प्रयोग किया जाता है। फिल्म ‘बैजू बावरा’ में इस राग का संक्षिप्त किन्तु अत्यन्त मुखर प्रयोग किया गया था। आइए, अब हम आपको इस राग का एक समृद्ध आलाप उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वरों में सुनवा रहे हैं। भारतीय संगीत के प्रचलित घरानों में जब भी आगरा घराने की चर्चा होगी तत्काल एक नाम जो हमारे सामने आता है, वह है, आफताब-ए-मौसिकी उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ का। पिछली शताब्दी के पूर्वार्द्ध के जिन संगीतज्ञों की गणना हम शिखर-पुरुष के रूप में करते हैं, उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ उन्ही में से एक थे। ध्रुपद-धमार, खयाल-तराना, ठुमरी-दादरा आदि सभी शैलियों की गायकी पर उन्हें कुशलता प्राप्त थी। प्रकृति ने उन्हें घन, मन्द्र और गम्भीर कण्ठ का उपहार तो दिया ही था, उनके शहद से मधुर स्वर श्रोताओं पर रस की वर्षा कर देते थे। फ़ैयाज़ खाँ का जन्म ‘आगरा रँगीले घराना’ के नाम से विख्यात ध्रुवपद गायकों के परिवार में हुआ था। दुर्भाग्य से फ़ैयाज़ खाँ के जन्म से लगभग तीन मास पूर्व ही उनके पिता सफदर हुसैन खाँ का इन्तकाल हो गया। जन्म से ही पितृ-विहीन बालक को उनके नाना गुलाम अब्बास खाँ ने अपना दत्तक पुत्र बना लिया और पालन-पोषण के साथ ही संगीत के शिक्षा की व्यवस्था भी की। यही बालक आगे चल कर आगरा घराने का प्रतिनिधि बना और भारतीय संगीत के अर्श पर आफताब बन कर चमका। फ़ैयाज़ खाँ की विधिवत संगीत शिक्षा उस्ताद ग़ुलाम अब्बास खाँ से आरम्भ हुई, जो फ़ैयाज़ खाँ के गुरु और नाना तो थे ही, गोद लेने के कारण पिता के पद पर भी प्रतिष्ठित हो चुके थे। फ़ैयाज़ खाँ के पिता का घराना ध्रुपदियों का था, अतः ध्रुवपद अंग की गायकी इन्हें संस्कारगत प्राप्त हुई। आगे चल कर फ़ैयाज़ खाँ ध्रुवपद के आलाप में इतने दक्ष हो गए थे कि संगीत समारोहों में उनके समृद्ध आलाप की फरमाइश हुआ करती थी। अब हम उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वरों में राग देसी का आलाप प्रस्तुत कर रहे हैं। आप यह रचना सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग देसी : ध्रुपद अंग में आलाप : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 292वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1954 में प्रदर्शित एक हिन्दी भाषा की फिल्म के एक गीत का अंश सुनवाते हैं। इस गीत को एक उस्ताद गायक ने स्वर दिया है। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 297वें अंक की पहेली का उत्तर सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा। 



  

1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – गीत के इस अंश में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप इस महान गायक की आवाज़ को पहचान सकते हैं? हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 19 नवम्बर 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 294वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 290 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1944 में प्रदर्शित फिल्म ‘रतन’ से एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका – ज़ोहराबाई अम्बालेवाली

इस बार की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागियों में से चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया। सभी चार प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर अपने सैकड़ों पाठकों के अनुरोध पर जारी लघु श्रृंखला “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” के आज के अंक में राग देसी या देसी तोड़ी के स्वरों में पिरोये गीत का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला के लिए हमने संगीतकार नौशाद के आरम्भिक दो दशकों की फिल्मों के गीत चुने हैं। श्रृंखला के आलेख को तैयार करने के लिए हमने फिल्म संगीत के जाने-माने इतिहासकार और हमारे सहयोगी स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। गीतों के चयन के लिए हमने अपने पाठकों की फरमाइश का ध्यान रखा है। यदि आप भी किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




Saturday, September 5, 2015

"बिन गुरु ज्ञान कहाँ से पाऊँ..." - शिक्षक दिवस के उपलक्ष्य पर बैजु बावरा और उनके गुरु स्वामी हरिदास का स्मरण


एक गीत सौ कहानियाँ - 65

 
शिक्षक दिवस पर गुरु का स्मरण

'मन तड़पत हरि दर्शन को आज...' 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 65-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म ’बैजु बावरा’ के सदाबहार भक्ति रचना "मन तड़पत हरि दर्शन को आज..." के बारे में जिसे मोहम्मद रफ़ी ने गाया था।

Rai Mohan as Swami Haridas
गुरु शिष्य की परम्परा सदियों से हमारे देश में चली आ रही है। गुरु द्रोण से लेकर आज के दौर में भी गुरु और शिष्य का रिश्ता बरकरार है। आज शिक्षक दिवस के उपलक्ष्य में ’एक गीत सौ कहानियाँ’ के माध्यम से याद करते हैं बैजु बावरा और उनके गुरु स्वामी हरिदास जी को। 1952 की फ़िल्म ’बैजु बावरा’ में एक दृश्य है जिसमें बैजु के गुरु हरिदास जी बीमार हैं और बिस्तर से उठ नहीं पा रहे। पर बैजु की आवाज़ में "मन तड़पत हरि दर्शन को आज" सुन कर वो इतने प्रभावित हो जाते हैं, उन पर इस भजन का ऐसा असर होता है कि वो अपने पाँव पर खड़े हो जाते हैं और चल कर अपने शिष्य को गले लगा लेते हैं। "बिन गुरु ज्ञान कहाँ से पाऊँ, दीजो दान हरि गुण गाऊँ, सब गुणी जन पे तुम्हरा राज, तड़पत हरि दर्शन को आज"। बैजु बावरा का जन्म गुजरात सलतनत के चम्पानेर में एक ग़रीब ब्राह्मण के घर हुआ था। उनका नाम बैजनाथ मिश्र था। पिता की मृत्यु के बाद उनकी माँ, जो एक कृष्ण भक्त थीं, बैजनाथ को साथ लेकर वृन्दावन चली गईं। वहीं पर बैजु की मुलाक़ात स्वामी हरिदास से हुई जिनके गुरुकुल में बैजु की शिक्षा-दीक्षा हुई। बैजु ने एक अनाथ बालक गोपाल को गोद लिया और उसे संगीत में पारंगत बनाया। समय के साथ-साथ बैजु और गोपाल की प्रसिद्धि बढ़ी और चन्देरी के राज दरबार में दोनों को गाने का अवसर मिला। गोपाल ने अपनी शिष्या प्रभा से विवाह कर एक पुत्री मीरा को जन्म दिया। एक दिन जब बैजु कहीं गए हुए थे, गोपाल अपनी पत्नी और पुत्री के साथ चन्देरी को हमेशा के लिए छोड़ कर कुछ कश्मीरी व्यवसायी लोगों के दिए लालच में पड़ कर कश्मीर चले गए। जब बैजु ने वापस आकर देखा कि उसका परिवार बिखर गया है, वह एक भिखारी बन गया और पागलों की तरह यहाँ-वहाँ भटकने लगा। और तभी उनके नाम के आगे "बावरा" लग गया। तानसेन, जो स्वामी हरिदास के ही शिष्य थे, उन्होंने अपने गुरु से बैजु के बारे में सुन रखा था। उनसे मिलने की चाह तानसेन के मन में जागी और उन्होंने अपने रीवा के संरक्षक राजा रामचन्द्र बघेला से एक संगीत प्रतियोगिता आयोजित करने का अनुरोध किया क्योंकि उन्हें यकीन था कि बैजु ज़रूर इसमें भाग लेने आएगा। बैजु आया और ऐसा राग मृगरंजिनि गाया कि हिरण सम्मोहित हो गए। राग मालकौंस गाकर बैजु बावरा ने एक पत्थर को भी पिघला दिया था। और फ़िल्म ’बैजु बावरा’ का प्रस्तुत भजन भी राग मालकौंस पर ही आधारित है। यह भजन फ़िल्मी भजनों में एक बहुत ऊँचा स्थान रखता है। फ़िल्म-संगीत में इतना दिव्य और अलौकिक काम बहुत कम देखने को मिलता है। और सबसे महत्वपूर्ण जो बात है इस भजन में वह यह कि इस शुद्ध हिन्दी/संस्कृत आधारित भजन के रचयिता तीन मुसलमान कलाकार हैं - शक़ील बदायूंनी, नौशाद अली और मोहम्मद रफ़ी। साम्प्रदायिक सदभाव का इससे बेहतर उदाहरण और कोई नहीं हो सकता! ’बैजु बावरा’ फ़िल्म में बैजु, तानसेन और स्वामी हरिदास की भूमिकाओं में थे क्रम से भारत भूषण, सुरेन्द्रनाथ और राय मोहन।

Vijay Bhatt
’बैजु बावरा’ विजय भट्ट और शंकर भट्ट के ’प्रकाश पिक्चर्स’ की फ़िल्म थी। नौशाद को उनका पहला बड़ा ब्रेक इसी बैनर ने दिया था साल 1940 में। उन दिनों डी. एन. मधोक फ़िल्म ’माला’ की कहानी और संवाद लिख रहे थे, और उन्होंने ही यह सुझाव दिया कि इस फ़िल्म के संगीत के लिए एक युवा संगीतकार की आवश्यक्ता है। भट्ट भाइयों ने नौशाद की पहली फ़िल्म ’प्रेम नगर’ की कुछ धुनों को सुन रखा था। मधोक के कहने पर नौशाद को 250 रुपये महीने पर रख लिया गया। विविध भारती के ’उजाले उनकी यादों के’ शृंखला में ’नौशाद-नामा’ शीर्षक से प्रस्तुत कार्यक्रम में नौशाद साहब ने ’बैजु बावरा’ के निर्माण से जुड़ी बहुत सी बातें बताई थी, उसी बातचीत से सम्पादित अंश प्रस्तुत है। "विजय भट्ट और शंकर भट्ट भाई थे, बहुत पढ़े-लिखे थे। ’स्टेशन मास्टर’ के बाद मैं ’कारदार प्रोडक्श्न्स’ में आ गया। एक दिन दोनो भाई मेरे पास आकर कहने लगे कि ’प्रकाश पिक्चर्स’ कंपनी को बन्द करने की नौबत आ गई है। मैंने पूछा कि क्या मैं कोई मदद कर सकता हूँ? वो बोले कि आप आइए, दिलीप कुमार और नरगिस को ले आइए, ताकि ’प्रकाश पिक्चर्स’ का कर्ज़ अदा हो जाए। मैंने उनसे हर सम्भव मदद करने का वादा किया और पूछा कि क्या उनके पास कोई कहानी है? फिर अगले छह महीने तक हमने ’बैजु बावरा’ की कहानी पर काम किया। पैसे और पेमेण्ट की कोई बात नहीं हुई, हम बस कहानी को डेवेलप करते चले गए। फिर मैंने एक सुझाव दिया विजु भाई को कि चैरेक्टर चलता है ऐक्टर नहीं चलता। विजु भाई ने पूछा कि क्या मतलब है इसका? मैंने समझाया कि अगर आप दिलीप कुमार या राज कपूर को बैजु बावरा के रोल के लिए लेंगे तो दर्शक उसे दिलीप कुमार या राज कपूर के रूप में ही पहचानेगी, कोई नहीं कहेगा कि बैजु आया है। ऐसे लड़के को लीजिए जो बैजु लगे और ऐसी किसी लड़की को लीजिए जो गौरी लगे।"

Naushad, Rafi & Shaqeel
नौशाद साहब ने आगे बताया कि मीना कुमारी के वालिद अली बक्श अपनी बेटियों के साथ दादर में रहते थे नौशाद के घर के आसपास ही। उन दिनों मीना वाडिया की एक जादू-टोने की पिक्चर में काम कर रही थी। मैंने अली बक्श से कहा कि मीना को मेरे साथ प्रकाश पिक्चर्स भेज दे ताकि उसे अच्छी फ़िल्म में काम करने का मौका मिल सके। और आख़िरकार भारत भूषण और मीना कुमारी बैजु और गौरी के रोल के लिए सीलेक्ट किए गए। वो अपना काम करते थे और मैं अपना। गाना रेकॉर्ड करके साउन्डट्रैक भेज देते थे पिक्चराइज़ करने के लिए। इस तरह से ’बैजु बावरा’ बनी। जब शंकर भाई ने यह सुना कि फ़िल्म के गीतों में शास्त्रीय संगीत और रागों का भरमार है तो उन्हें इस बात से थोड़ा ऐतराज़ हुआ। उन्होंने कहा कि लोगों के सर में दर्द हो जाएगा और वो भाग जाएँगे थिएटरों से। पर मैं अपने बात पे कायम था। मुझे पब्लिक का टेस्ट बदलना था। पब्लिक को क्यों हमेशा वही चीज़ें दी जाए जो उन्हें हर वक़्त पसन्द आते हैं? हमने पब्लिक को उन्हीं की संस्कृति के संगीत से रु-ब-रु करवाया, और हम कामयाब भी हुए। विजय भट्ट को इस फ़िल्म के लिए काफ़ी तारीफ़ें मिली और मुझे भी अपने हिस्से का इनाम मिला। फ़िल्म की सिल्वर जुबिली हुई, पर आज तक मेरा इस फ़िल्म के लिए कोई ऐग्रीमेण्ट नहीं बना। मुझे अब तक याद है वह जुमला जो विजय भट्ट ने मुझसे कहा था कि प्रकाश में ताला लगाना है। मैंने उनसे कहा था कि अगर वो मुझे इस फ़िल्म के लिए पैसे नहीं भी देगा तो भी मुझे कोई ऐतराज़ नहीं है।" और अब आप यही गीत सुनिए - 

'मन तड़पत हरिदर्शन को आज...' : फिल्म - बैजू बावरा : मुहम्मद रफी : नौशाद : शकील बदायूनी 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Sunday, May 10, 2015

पूर्वी थाट के राग : SWARGOSHTHI – 218 : PURVI THAAT



स्वरगोष्ठी – 218 में आज

दस थाट, दस राग और दस गीत – 5 : पूर्वी थाट

राग पूर्वी की मनोहारी रचना - 'कर कपाल लोचन त्रय...'  



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के रागों का वर्गीकरण करने में समर्थ मेल अथवा थाट व्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को वर्गीकृत किया जाता है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे पूर्वी थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग पूर्वी में निबद्ध एक खयाल रचना प्रस्तुत करेंगे। साथ ही पूर्वी थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत राग पूरिया धनाश्री के स्वरों में निबद्ध एक फिल्मी गीत का उदाहरण भी प्रस्तुत करेंगे।



धुनिक भारतीय संगीत में प्रचलित थाट पद्धति पर केन्द्रित श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ में हम पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे द्वारा प्रवर्तित उन दस थाटों की चर्चा कर रहे हैं, जिनके माध्यम से रागों का वर्गीकरण किया जाता है। उत्तर और दक्षिण भारतीय संगीत की दोनों पद्धतियों में संगीत के सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र, अर्थात कुल बारह स्वरों के प्रयोग में समानता है। दक्षिण भारत के ग्रन्थकार पण्डित व्यंकटमखी ने सप्तक में 12 स्वरों को आधार मान कर 72 थाटों की रचना गणित के सिद्धान्तों पर की थी। भातखण्डे जी ने इन 72 थाटों में से केवल उतने ही थाट चुन लिये, जिनमें उत्तर भारतीय संगीत के प्रचलित सभी रागों का वर्गीकरण होना सम्भव हो। इस विधि से वर्तमान उत्तर भारतीय संगीत को उन्होने पक्की नींव पर प्रतिस्थापित किया। साथ ही उन सभी विशेषताओं को भी, जिनके आधार पर दक्षिण और उत्तर भारतीय संगीत पद्धति पृथक होती है, उन्होने कायम किया। भातखण्डे जी ने पं॰ व्यंकटमखी के 72 थाटों में से 10 थाट चुन कर प्रचलित सभी रागों का वर्गीकरण किया। थाट सिद्धान्त पर भातखण्डे जी ने ‘लक्ष्य-संगीत’ नामक एक ग्रन्थ की रचना भी की थी।

पण्डित अजय चक्रवर्ती 
आइए, अब हम आज के थाट ‘पूर्वी’ के विषय में थोड़ी जानकारी प्राप्त करते हैं। इस थाट में प्रयोग होने वाले स्वर हैं- सा, रे॒, ग, म॑, प ध॒, नि। इस थाट में मध्यम स्वर तीव्र और ऋषभ तथा धैवत स्वर कोमल प्रयोग किया जाता है। शेष सभी शुद्ध स्वर होते हैं। पूर्वी थाट का आश्रय राग पूर्वी है। यह सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं। राग पूर्वी के आरोह के स्वर- सारे, ग, म॑प, , निसां और अवरोह के स्वर- सांनिप, म॑ ग, रेसा होते हैं। इस राग में कोई भी स्वर वर्जित नहीं होता। ऋषभ और धैवत कोमल तथा मध्यम के दोनों प्रकार प्रयोग किये जाते हैं। राग ‘पूर्वी’ का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है तथा इसे दिन के अन्तिम प्रहर में गाया-बजाया जाता है। आज हमारी चर्चा में थाट और राग पूर्वी है। इस राग का प्रत्यक्ष अनुभव कराने के लिए अब हम आपके समक्ष एक रचना प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसे पंडित अजय चक्रवर्ती ने प्रस्तुत किया है। वर्तमान में भारतीय संगीत की हर शैली पर समान रूप से अधिकार रखने वाले संगीतज्ञ पण्डित अजय चक्रवर्ती ने राग पूर्वी की इस रचना को ध्रुपद के अन्दाज में प्रस्तुत किया है। अजय जी को पटियाला, कसूर घराने की संगीत-शिक्षा उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के सुपुत्र उस्ताद मुनव्वर अली खाँ से प्राप्त हुई है। आइए, सुनते है, पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वरों में राग पूर्वी की यह रचना। इस प्रस्तुति में सारंगी पर भारतभूषण गोस्वामी ने और पखावज पर माणिक मुंडे ने संगति की है। कुछ विद्वान इस ध्रुपद को तानसेन की रचना मानते हैं।


राग पूर्वी : ‘कर कपाल लोचन त्रय...’ : पण्डित अजय चक्रवर्ती 



उस्ताद अमीर खाँ 
इस थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ प्रमुख राग हैं- ‘पूरिया धनाश्री’, ‘जैतश्री’, ‘परज’, ‘श्री’, ‘गौरी’, ‘वसन्त’ आदि। पूर्वी थाट के विभिन्न रागों में राग पूरिया धनाश्री एक अत्यन्त लोकप्रिय राग है। राग पूर्वी की तरह राग पूरिया धनाश्री भी सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इस राग के आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर इस्तेमाल किये जाते हैं। इसका ऋषभ और धैवत स्वर कोमल होता है तथा मध्यम स्वर तीव्र होता है। आरोह के स्वर- निरे गम॑प प निसां और अवरोह के स्वर- रे निप म॑ग म॑रेगरेसा होते हैं। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग पूरिया धनाश्री के गायन-वादन का समय सायंकाल माना जाता है। आइए, अब आप राग पूरिया धनाश्री पर केन्द्रित एक गीत सुनिए। यह गीत हमने फिल्म ‘बैजू बावरा’ से लिया है। अकबर के समकालीन कुछ ऐतिहासिक तथ्यों और कुछ दन्तकथाओं के मिश्रण से बुनी 1952 में फिल्म- ‘बैजू बावरा’ प्रदर्शित हुई थी। ऐतिहासिक कथानक और उच्चस्तर के संगीत से युक्त अपने समय की यह एक सफलतम फिल्म थी। इस फिल्म को आज छह दशक बाद भी केवल इसलिए याद किया जाता है कि इसका गीत-संगीत भारतीय संगीत के रागों पर केन्द्रित था। फिल्म के कथानक के अनुसार अकबर के समकालीन सन्त-संगीतज्ञ स्वामी हरिदास के शिष्य तानसेन सर्वश्रेष्ठ थे। परन्तु उनके संगीत पर दरबारी प्रभाव आ चुका था। उन्हीं के समकालीन स्वामी हरिदास के ही शिष्य माने जाने वाले बैजू अथवा बैजनाथ थे, जिसका संगीत मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण था। फिल्म के कथानक का निष्कर्ष यह था कि संगीत जब राज दरबार की दीवारों से घिर जाता है, तो उसका लक्ष्य अपने स्वामी की प्रशस्ति तक सीमित हो जाता है, जबकि मुक्त प्राकृतिक परिवेश में पनपने वाला संगीत ईश्वरीय शक्ति से परिपूर्ण होता है। राग पूरिया धनाश्री के स्वरों से पगा जो गीत आज हमारी चर्चा में है, उसका फिल्मांकन अकबर के दरबारी संगीतज्ञ तानसेन को अपने महल में रियाज़ करते दिखाया गया था। यह फिल्म का शुरुआती प्रसंग है। इसी गीत पर फिल्म की नामावली प्रस्तुत की गई है। राग पूरिया धनाश्री में निबद्ध यह गीत सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद अमीर खाँ ने गाया है। फिल्म के संगीतकार नौशाद थे। इस रचना में भी तानसेन का नाम आया है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग पूरिया धनाश्री : ‘तोरी जय जय करतार...’ : उस्ताद अमीर खाँ : फिल्म बैजू बावरा





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 218वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको पाँच दशक से भी अधिक पुरानी ऐतिहासिक हिन्दी फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इस गीत के अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 220वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस अंश में किस राग की झलक है।

2 – गीत के अंश में प्रयोग किये गए ताल को ध्यान से सुनिए और हमें ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत के पार्श्वगायक के स्वर को पहचानिए और उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 16 मई, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 218वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 216वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा गया था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग जोगिया, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल खेमटा (6 मात्रा) और कहरवा (8 मात्रा) तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका कमल बारोट (और महेन्द्र कपूर)। इस बार पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने दिया हैं। तीन में से दो प्रश्न के सही उत्तर हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ जारी है। इसके अन्तर्गत हम प्रत्येक अंक में भारतीय संगीत के प्रचलित दस थाट और उनके आश्रय रागों की चर्चा कर रहे हैं। साथ ही थाट से जुड़े अन्य रागों पर आधारित फिल्मी गीत भी प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें अवश्य लिखिएगा। ‘स्वरगोष्ठी’ पर आगामी लघु श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के रागों’ पर केन्द्रित होगा। यदि आपने वर्षा ऋतु के रागों पर कोई आलेख तैयार किया है या इन रागों की कोई रचना आपको पसन्द है, तो हमें swargoshthi@gmail.com पर शीघ्र भेजें। हम उसे आपके नाम और परिचय के साथ प्रकाशित / प्रसारित करेंगे। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

Sunday, November 9, 2014

‘आज गावत मन मेरो झूम के...’ : SWARGOSHTHI – 193 : RAG DESI


स्वरगोष्ठी – 193 में आज

शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत – 2 : राग देसी

पण्डित पलुस्कर और उस्ताद अमीर खाँ ने राग देसी के स्वरों में गाया फिल्म बैजू बावरा का युगल गीत





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी नई लघु श्रृंखला, जिसका शीर्षक है- ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत’। फिल्म संगीत के क्षेत्र में चौथे से लेकर आठवें दशक के बीच शास्त्रीय संगीत के कई विद्वानों और विदुषियों ने अपना योगदान किया है। इस श्रृंखला में हमने कुछ ऐसे ही फिल्मी गीतों का चुनाव किया है, जिन्हें रागदारी संगीत के विशेषज्ञों ने रचा है। इन रचनाओं में राग के स्पष्ट स्वरूप की उपस्थिति मिलती है। श्रृंखला के दूसरे अंक में आज हम आपसे 1953 की फिल्म ‘बैजू बावरा’ के एक गीत- ‘आज गावत मन मेरो...’ पर चर्चा करेंगे। इस श्रेष्ठतम संगीत रचना का सृजन अपने समय की दो दिग्गज सांगीतिक विभूतियों, पण्डित डी.वी. (दत्तात्रेय विष्णु) पलुस्कर और उस्ताद अमीर खाँ द्वारा किया गया था। यह गीत राग देसी अथवा देसी तोड़ी के फिल्मी प्रयोग का अच्छा उदाहरण है। इसके साथ ही राग देसी के स्वरूप को समझने के लिए इस अंक में हम आपको शाम चौरासी घराने के शीर्षस्थ युगल गायक उस्ताद सलामत अली खाँ और उस्ताद नज़ाकत अली खाँ की आवाज़ में राग देसी की एक मोहक खयाल रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं। 
 


हिन्दी फिल्मों के संगीत का इतिहास 1953 में प्रदर्शित संगीत-प्रधान फिल्म ‘बैजू बावरा’ के उल्लेख के बिना अधूरा ही रहेगा। संगीतकार नौशाद को भारतीय संगीत के रागों के प्रति कितनी श्रद्धा थी, इस फिल्म के गीतों को सुन कर स्पष्ट हो जाता है। अपने समय के जाने-माने संगीतज्ञों को फिल्म संगीत के मंच पर लाने में नौशाद अग्रणी रहे हैं। आज की ‘स्वरगोष्ठी’ में हम फिल्म ‘बैजू बावरा’ के एक गीत के माध्यम से प्रकृति के रंगों को बिखेरने में सक्षम राग ‘देसी’ अथवा ‘देसी तोड़ी’ पर चर्चा करेंगे।

पण्डित डी.वी. पलुस्कर 
उस्ताद अमीर खाँ 
अकबर के समकालीन कुछ ऐतिहासिक तथ्यों और कुछ दन्तकथाओं के मिश्रण से बुनी 1953 में एक फिल्म- ‘बैजू बावरा’ प्रदर्शित हुई थी। ऐतिहासिक कथानक और उच्चस्तर के संगीत से युक्त अपने समय की यह एक सफलतम फिल्म थी। इस फिल्म को आज छह दशक बाद भी केवल इसलिए याद किया जाता है कि इसका गीत-संगीत भारतीय संगीत के रागों पर केन्द्रित था। फिल्म के कथानक के अनुसार अकबर के समकालीन सन्त-संगीतज्ञ स्वामी हरिदास के शिष्य तानसेन सर्वश्रेष्ठ थे। परन्तु उनके संगीत पर दरबारी प्रभाव आ चुका था। उन्हीं के समकालीन स्वामी हरिदास के ही शिष्य माने जाने वाले बैजू अथवा बैजनाथ थे, जिसका संगीत मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण था। फिल्म के कथानक का निष्कर्ष यह था कि संगीत जब राज दरबार की दीवारों से घिर जाता है, तो उसका लक्ष्य अपने स्वामी की प्रशस्ति तक सीमित हो जाता है, जबकि मुक्त प्राकृतिक परिवेश में पनपने वाला संगीत ईश्वरीय शक्ति से परिपूर्ण होता है। राग देसी के स्वरों से पगा जो गीत आज हमारी चर्चा में है, उसका फिल्मांकन बादशाह अकबर के दरबार में किया गया था। तानसेन और बैजू बावरा के बीच एक सांगीतिक प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। अकबर बादशाह ने श्रेष्ठता के निर्णय के लिए यह शर्त रखी कि जिसके संगीत के असर से पत्थर पिघल जाएगा वही गायक सर्वश्रेष्ठ कहलाएगा। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस प्रतियोगिता में तानसेन की तुलना में बैजू बावरा की श्रेष्ठता सिद्ध हुई थी। आज का गीत फिल्म के इसी प्रसंग में प्रस्तुत किया गया था। इस गीत में अपने समय के दो दिग्गज गायक उस्ताद अमीर खाँ और पण्डित दत्तात्रेय विष्णु (डी.वी.) पलुस्कर ने अपना स्वर दिया था। आइए पहले इस गीत को सुनते हैं, फिर इस चर्चा को आगे बढ़ाएँगे।


राग – देसी : फिल्म – बैजू बावरा : ‘आज गावत मन मेरो झूम के...’: स्वर – पण्डित डी.वी. पलुस्कर और उस्ताद अमीर खाँ





अभी आपने जो युगल गीत सुना, वह तीनताल में निबद्ध है। परदे पर तानसेन के लिए उस्ताद अमीर खाँ ने और बैजू बावरा के लिए पण्डित पलुस्कर जी ने स्वर दिया था। मित्रों, इन दोनों कलासाधकों का व्यक्तित्व और कृतित्व इतना विशाल है कि ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक में मात्र कुछ पंक्तियों में समेटा नहीं जा सकता। भविष्य में इन संगीतज्ञों पर हम अलग से चर्चा करेंगे। फिल्मी परम्पराओं के अनुसार इस गीत के रिकार्ड पर गीतकार, शकील बदायूनी और संगीतकार, नौशाद के नाम अंकित हैं। अपने समय के इन दो दिग्गज संगीतज्ञों की उपस्थिति में नौशाद साहब किस प्रकार उन्हें निर्देशित कर पाए होंगे यह भी एक विचारणीय प्रश्न है। वर्षों पहले एक साक्षात्कार में नौशाद जी ने स्वयं इस गीत की चर्चा करते हुए बताया था कि उन्होने दोनों दिग्गज संगीतज्ञों को फिल्म के प्रसंग की जानकारी दी और गाने के बोल दिये। उन्होने आपस में सलाह-मशविरा कर राग-ताल तय किये और फिर रिकार्डिंग शुरू हो गई। इस गीत के आरम्भिक लगभग 1 मिनट 45 सेकेण्ड की अवधि में दोनों गायकों ने ‘तुम्हरे गुण गाउँ...’ पंक्तियों के माध्यम से विलम्बित खयाल की झलक और शेष भाग में द्रुत खयाल का रूप प्रदर्शित किया है। गीत के अन्तिम भाग में तानसेन के तानपूरा का तार टूट जाता है, जबकि बैजू द्रुत लय की तानें लगाते रहते हैं। फिल्म में उनकी तानों के असर से काँच के पात्र में रखा पत्थर पिघलने लगता है।

उस्ताद सलामत और नज़ाकत अली खाँ 
आइए, अब कुछ चर्चा राग देसी के बारे में करते है। दिन के दूसरे प्राहर में गाये-बजाये जाने वाले इस राग को देसी के अलावा देसी तोड़ी अथवा देस तोड़ी भी कहते हैं। यह आसावरी थाट का राग है। इसकी जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वरों का प्रयोग होता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल होते है, जबकि धैवत और निषाद स्वर शुद्ध रूप में भी प्रयोग किया जाता है। इसमे शुद्ध धैवत के स्थान पर कोमल धैवत का प्रयोग किया जाता है, शेष सभी स्वर राग देस के समान ही प्रयोग किया जाता है। फिल्म ‘बैजू बावरा’ में इस राग का संक्षिप्त किन्तु अत्यन्त मुखर प्रयोग किया गया था। आइए, अब हम आपको शाम चौरासी घराने के संवाहक उस्ताद सलामत अली और नज़ाकत अली खाँ के युगल स्वरों में राग देसी में एक खयाल सुनवाते हैं। शाम चौरासी ध्रुपदियों का घराना रहा है। अविभाजित पंजाब का होशयारपुर ज़िला शाम चौरासी घराने का मुख्य केन्द्र था। सोलहवीं शताब्दी में मियाँ चाँद खाँ और मियाँ सूरज खाँ ने इस घराने की बुनियाद रखी थी। यह दोनों तानसेन के समकालीन थे। इसी घराने के उस्ताद विलायत अली खाँ के सुपुत्र थे, उस्ताद सलामत अली और नज़ाकत अली खाँ। इन दोनों भाइयों को युगल गायन में खूब प्रसिद्धि मिली। विभाजन के बाद यह दोनों भाई लाहौर चले गए। रागदारी संगीत की इस मशहूर जोड़ी की आवाज़ में अब आप सुनिए राग देसी का खयाल। तीनताल में निबद्ध इस खयाल के बोल हैं- ‘म्हारे घर आयो जी साँवरे...’। आप यह रचना सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग - देसी : ‘म्हारे घर आयो जी साँवरे...’ : तीनताल : उस्ताद सलामत अली खाँ और नज़ाकत अली खाँ






आज की पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 193वें अंक की पहेली में आज हम आपको लगभग छः दशक पुरानी एक फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 200वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का और सभी पाँच श्रृंखलाओं में सर्वाधिक अंक पाने वाले प्रतिभागी को वर्ष 2014 का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की झलक है?

2 – यह रचना किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 15 नवम्बर, 2014 को मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 195वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर अपनी प्रतिक्रिया भी व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 191वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1943 में प्रदर्शित फिल्म ‘रामराज्य’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भीमपलासी और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल कहरवा। इस बार की पहेली में पूछे गए दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


पिछली श्रृंखला के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की पिछली श्रृंखला (अंक 181 से 190 तक) की संगीत पहेली के विभिन्न प्रतिभागियों के प्राप्तांकों का विवरण निम्नलिखित है। सर्वाधिक अंक के प्राप्तकर्त्ता इस श्रृंखला के विजेता घोषित किए जाते हैं।

1 – विजया राजकोटिया, पेंसिलवानिया, अमेरिका – 20 अंक – प्रथम

2 – क्षिति तिवारी, जबलपुर, मध्य प्रदेश – 20 अंक – प्रथम

3 – डी. हरिणा माधवी, हैदराबाद – 17 अंक – द्वितीय

4 - दिनेश कृष्णजोइस, मिन्नेसोटा, अमेरिका – 8 अंक – तृतीय

उपरोक्त सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हम भारतीय शास्त्रीय संगीत के विद्वानों द्वारा फिल्मों के लिए गाये गए गीतों पर चर्चा कर रहे हैं। वर्ष 2015 से ‘स्वरगोष्ठी’ की श्रृंखलाओं के बारे में हमे अनेक पाठकों और श्रोताओ के बहुमूल्य सुझाव प्राप्त हो रहे हैं। इन सभी सुझाव पर विचार-विमर्श कर हम नये वर्ष से अपनी प्रस्तुतियों में आवश्यक संशोधन करने जा रहे हैं। यदि आपने अभी तक अपने सुझाव और फरमाइश नहीं भेजी हैं तो आविलम्ब हमें भेज दें। अगले रविवार 16 नवम्बर 2014 को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 


 

Sunday, September 29, 2013

‘मन तड़पत हरिदर्शन को आज...’

   
स्वरगोष्ठी – 139 में आज

रागों में भक्तिरस – 7

राग मालकौंस का रंग : पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के संग


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सब संगीत-रसिकों का स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस राग पर आधारित फिल्म संगीत के उदाहरण भी आपको सुनवा रहे हैं। आज माह का पाँचवाँ रविवार है और इस दिन ‘स्वरगोष्ठी’ का अंक हमारे अतिथि संगीतज्ञ द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। आज का यह अंक प्रस्तुत कर रहे हैं, मयूर वीणा और इसराज के सुप्रसिद्ध वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र। श्रृंखला के आज के अंक में श्रीकुमार जी आपसे अत्यन्त लोकप्रिय राग मालकौंस पर चर्चा करेंगे। आज हम आपको राग मालकौंस के भक्तिरस के पक्ष को स्पष्ट करने के लिए तीन रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे। सबसे पहले हम आपको सुनवाएँगे, 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘बैजू बावरा’ का भक्तिरस से परिपूर्ण एक गीत, जो राग मालकौंस के स्वरों पर आधारित है। इसके साथ ही संगीत-मार्तण्ड ओंकारनाथ ठाकुर द्वारा इसी राग में प्रस्तुत किया गया मीरा का एक भक्तिपद और यही रचना पण्डित जी की शिष्या विदुषी एन. राजम् वायलिन पर गायकी अंग में प्रस्तुत करेंगी।


थाट भैरवी, वादी म सा, रखिए रे प वर्ज्य,

तृतीय प्रहर निशि गाइए, मालकौंस का अर्ज।

पं. श्रीकुमार मिश्र 
राग भैरवी के कोमल ऋषभ और पंचम को हटा देने पर बचे हुए भैरवी के स्वरों- कोमल गान्धार, मध्यम, कोमल धैवत और कोमल निषाद में मध्य व तार सप्तक के षडज का संयोग कर देने से जिस राग का रूप निर्मित होता है वह मालकौंस है। औड़व जाति के इस इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग मालकौंस सागर की भाँति है। विविध नदियों का मानों इसमें समागम है। इसके मन्द्र धैवत को षडज मान कर यदि मालकौंस के स्वरों का प्रयोग किया जाए तो राग भूपाली का दर्शन होने लगता है। मन्द्र निषाद को जब षडज मान कर मालकौंस के स्वरों का प्रयोग किया जाता है तब राग मेघ मल्हार का आभास होने लगता है। इसी प्रकार गान्धार स्वर को यदि षडज मान कर प्रयोग किया जाए तो राग दुर्गा और मध्यम को षडज मान कर चलने पर राग धानी की झलक मिलने लगती है। राग भूपाली का आत्मनिवेदन, मेघ मल्हार का नैसर्गिक गाम्भीर्य, राग दुर्गा में व्याप्त भक्तिभाव की विनयपूर्ण अभिव्यक्ति और राग धानी का वैचित्र्य भाव, इन सभी के समागम से राग मालकौंस का गम्भीर चिन्तनशील स्वरूप कायम होता है। राग मालकौंस में षडज स्वर आधार है। कोमल गान्धार स्वर से पुकार का भाव और मध्यम स्वर पर ठहराव से मन व्यापक चिन्तन की दिशा में अग्रसर होने लगता है।

नौशाद और रफी
पण्डित श्रीकुमार मिश्र द्वारा प्रस्तुत राग मालकौंस पर यह चर्चा हम जारी रखेंगे, पहले आपको सुनवाते है, राग मालकौंस का एक आकर्षक फिल्मी रूपान्तरण। संगीतकार नौशाद ने फिल्म ‘बैजू बावरा’ के लिए एक कालजयी भक्तिगीत रचा था। नौशाद की भक्तिरस प्रधान गीतों की रचनात्मक कुशलता के बारे में फिल्म संगीत के इतिहासकार पंकज राग, अपनी पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ में लिखते हैं- “नौशाद के संगीत के दो पहलू रहे हैं- एक तो शास्त्रीय आधार का सरस, सुगम्य रूपान्तरित लोकसंगीत और दूसरा शास्त्रीय आधारित आभिजात्य संगीत जिसमें कभी मुगलिया या लखनऊ की नवाबी संस्कृति की खूबसूरत भंगिमाएँ रहती थीं, तो कभी ईश्वर की आराधना करता उदात्त भक्ति-संगीत। साहित्य में भक्ति-साहित्य भले ही लोकरंजक और लोकसंस्कृति से प्रेरित रहा हो, पर नौशाद के भक्ति-गीतों में शुद्ध, गम्भीर शास्त्रीय सुर ही लगे हैं। नौशाद के संगीत की मूल प्रवृत्ति भारतीय शास्त्रीय संगीत-परम्परा की तरह ही कलावादी रही है।” फिल्म ‘बैजू बावरा’ के भक्तिपरक गीत यदि नौशाद को शिखर तक ले जाते हैं, वहीं गायक मुहम्मद रफी को उनके भावपूर्ण गायन के लिए प्रथम श्रेणी के गायकों में शामिल कराते हैं। प्रस्तुत है, गीतकार शकील बदायूनी, संगीतकार नौशाद और गायक मुहम्मद रफी द्वारा सृजित आस्था, समर्पण और पुकार से युक्त फिल्म ‘बैजू बावरा’ का यह गीत।


राग मालकौंस : ‘मन तड़पत हरिदर्शन को आज...’ : मुहम्मद रफी : फिल्म ‘बैजू बावरा’



पं. ओंकारनाथ ठाकुर 
राग मालकौंस की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए पण्डित श्रीकुमार मिश्र आगे लिखते हैं- राग मालकौंस में कोमल ऋषभ और पंचम स्वर के न होने से मध्यम के साथ शेष तीनों कोमल स्वर गान्धार, धैवत और निषाद के मिलाप से गाम्भीर्य कायम होता है। कोमल ऋषभ के विषाद भाव और पंचम की जागृति दोनों ही दार्शनिक गाम्भीर्य निर्मित करने में व्यवधान उत्पन्न न करें, इसीलिए इनका प्रयोग निषिद्ध है। राग मालकौंस में प्रयुक्त स्वरों को निरन्तर दुहराने से राग भूपाली, मेघ मल्हार, दुर्गा और धानी झलक जाएँगे। इसलिए राग मालकौंस को बरतना सरल नहीं होता। मध्यम के साथ मिल कर स्वरात्मक व सहयोगी क्रियाकलाप होंगे तो मालकौंस का स्वरूप कायम रहेगा। 
 

विदुषी एन. राजम्
अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, राग मालकौंस के यथार्थ स्वरूप को प्रदर्शित करती दो रचनाएँ। पहले आप सुनेंगे संगीत-मार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर का गाया, राग मालकौंस में गूँथा मीरा का एक पद। पण्डित जी के मालकौंस में राग की गम्भीर व संवेदनशील भावाभिव्यक्ति पूर्णरूप से विद्यमान है। इस पद के बाद आप विदुषी एन. राजम् से वायलिन पर गायकी अंग में मीरा के इसी पद का भावपूर्ण और संवेदनशील वादन। यहाँ यह उल्लेख करना आवश्यक है कि विदुषी एन. राजम् पण्डित जी की प्रमुख शिष्या रही हैं। राजम् जी ने पण्डित जी के साथ अनेक संगीत सभाओं में वायलिन पर संगति भी की है। पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर द्वारा प्रस्तुत मीरा के पद की जो रिकार्डिंग आप इस अंक में सुन रहे हैं, इसमें भी राजम् जी ने वायलिन संगति की है। आप इन रचनाओं के भक्तिरस का आस्वादन करें और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की की अनुमति दें।


राग मालकौंस : गायन : ‘पग घुँघरू बाँध कर नाची रे...’ : पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर

राग मालकौंस : वायलिन वादन : ‘पग घुँघरू बाँध कर नाची रे...’ : विदुषी एन. राजम्




आज की पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ की 139वीं संगीत पहेली में हम आपको वाद्य संगीत पर एक राग रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 140वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह रचना किस राग में निबद्ध है?

2 – यह रचना किस ताल में प्रस्तुत की गई है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 141वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 137वीं संगीत पहेली में हमने आपको विदुषी लक्ष्मी शंकर के स्वरों में एक खयाल रचना का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग धानी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल झपताल। इस अंक के दोनों प्रश्नो के उत्तर मिन्नेसोटा, U.S.A से दिनेश कृष्णजोइस और जबलपुर की क्षिति तिवारी ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का

   
 मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी है, लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’, जिसके अन्तर्गत हमने आज की कड़ी में आपसे अतिथि संगीतज्ञ पण्डित श्रीकुमार मिश्र के साथ राग मालकौंस की चर्चा की और इस राग की तीन रचनाओं का रसास्वादन कराया। अगले अंक में हम आपको एक अत्यधिक प्रचलित राग में गूँथी रचनाएँ सुनवाएँगे जिनमें भक्ति और श्रृंगार, दोनों रसों की रचनाएँ प्रस्तुत की जाती हैं। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के भक्तिरस प्रधान रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 


आलेख : श्रीकुमार मिश्र 
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

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