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Wednesday, February 10, 2010

खुशबू उड़ाके लाई है गेशु-ए-यार की.. अपने मियाँ आग़ा कश्मीरी के बोलों में रंग भरा मुख्तार बेग़म ने

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #७०

मने अपनी महफ़िल में इस मुद्दे को कई बार उठाया है कि ज्यादातर शायर अपनी काबिलियत के बावजूद पर्दे के पीछे हीं रह जाते हैं। सारी की सारी मक़बूलियत इन नगमानिगारों के शेरों को, उनकी गज़लों को अपनी आवाज़ से मक़बूल करने वाले फ़नकारों के हिस्से में जाती है। लेकिन आज की महफ़िल में स्थिति कुछ अलग है। हम आज एक ऐसी फ़नकारा की बात करने जा रहे हैं जिनकी बदौलत एक अव्वल दर्ज़े की गायिका और एक अव्वल दर्ज़े की नायिका हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानी अवाम को नसीब हुई। इस अव्वल दर्ज़े की गायिका से हम सारे परिचित हैं। हमने कुछ महिनों पहले इनकी दो नज़्में आपके सामने पेश की थीं। ये नज़्में थीं- जनाब अतर नफ़ीस की लिखी "वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया" और जनाब फ़ैयाज हाशमी की "आज जाने की जिद्द न करो"। आप अब तक समझ हीं गए होंगे कि हम किन फ़नकारा की बातें कर रहे हैं। वह फ़नकारा जिनकी गज़ल से आज की महफ़िल सजी है,वो इन्हीं जानीमानी फ़नकारा की बड़ी बहन हैं। तो दोस्तों छोटी बहन का नाम है- "फ़रीदा खानुम" और बड़ी बहन यानि की आज की फ़नकारा का नाम है "मुख्तार बेग़म"। मुख्तार बेग़म यूँ तो उतना नाम नहीं कमा सकीं, जितना नाम फ़रीदा का हुआ, लेकिन फ़रीदा को फ़रीदा बनाने में इनका बड़ा हीं हाथ था। फ़रीदा जब महज सात साल की थीं तभी उन्होंने अपनी बड़ी बहन मुख्तार बेग़म से "खयाल" सीखना शुरू कर दिया था। अब यह तो सभी जानते हैं कि फ़रीदा के गायन में "खयाल" का क्या स्थान है। इतना हीं नहीं.. ऐसी कई सारी गज़लें(जैसे कि आज की गज़ल हीं) और नज़्में हैं जिन्हें पहले मुख्तार बेग़म ने गाकर एक रास्ते की तामीर की और बाद में उसी रास्ते पर और उस रास्ते पर बने इनके पद-चिह्नों पर चलकर फ़रीदा खानुम ने गायिकी के नए आयाम स्थापित किए। यह अलग बात है कि आज के संगीत-रसिकों को इनके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं ,लेकिन एक दौर था(१९३० और ४० के दशक में) जब इनकी गिनती चोटी के फ़नकारों में की जाती थी। मेहदी हसन साहब ने जिस वक्त गाना शुरू किया था, उस वक्त बेग़म अख्तर, उस्ताद बरकत अली खान और मुख़्तार बेग़म गज़ल-गायिकी के तीन स्तंभ माने जाते थे। इस बात से आप मुख्तार बेग़म की प्रतिभा का अंदाजा लगा सकते हैं। चलिए लगे हाथों हम मुख्तार बेग़म का एक छोटा-सा परिचय दिए देते हैं।

लोग इन्हें बस एक गायिका के तौर पर जानते हैं, लेकिन ये बँटवारे के पहले हिन्दुस्तानी फिल्मों की एक जानीमानी अभिनेत्री हुआ करती थीं। इन्होंने ३० और ४० के दशक में कई सारी फिल्मों में काम किया था, जिनमें "हठीली दुल्हन", "इन्द्र सभा", "हिन्दुस्तान" , "कृष्णकांत की वसीयत", "मुफ़लिस आशिक़", "आँख का नशा", "औरत का प्यार", "रामायण", "दिल की प्यास" और "मतवाली मीरा" प्रमुख हैं। १९४७ में पाकिस्तान चले जाने के बाद इन्होंने किसी भी फिल्म में काम नहीं किया, लेकिन ये गज़ल-गायिकी करती रहीं।

अभी हमने गायिका(फ़रीदा खानुम) की बात की, अब वक्त है उस नायिका की, जिसे लोग "रानी मुख्तार" के नाम से जानते हैं और वो इसलिए क्योंकि उस नायिका को नासिरा से रानी इन्होंने हीं बनाया था। नासिरा का जन्म इक़बाल बेग़म की कोख से ८ दिसम्बर १९४६ को लाहौर में हुआ था। नासिरा के अब्बाजान मुख्तार बेग़म के यहाँ ड्राईवर थे। अब चूँकि नासिरा के घर वाले उसका लालन-पालन करने में सक्षम नहीं थे इसलिए मुख्तार बेग़म ने उसे गोद ले लिया। मुख्तार बेग़म चाहती थीं कि नासिरा उन्हीं की तरह एक गायिका बने लेकिन नासिरा गायन से ज्यादा नृत्य की शौकीन थी। और इसलिए इन्होंने नासिरा को उस्ताद गु़लाम हुसैन और उस्ताद खुर्शीद से नृत्य की शिक्षा दिलवाई। एक दिन जब जानेमाने निर्देशक "अनवर कमाल पाशा" मुख्तार बेग़म के घर अपनी अगली फिल्म "सूरजमुखी" के फिल्मांकन के सिलसिले में आए तो उनकी नज़र नासिरा पर पड़ी और उन्होंने अपनी फिल्म में नासिरा से काम करवाने का निर्णय ले लिया। और इस तरह नासिरा फिल्मों में आ गईं। इस फिल्म में मुख्तार बेग़म ने गाने भी गाए थे। नासिरा को चूँकि मुख्तार बेग़म रानी बेटी कहकर पुकारती थीं, इसलिए नासिरा को रानी मुख्तार का नाम मिल गया। वैसे आपको शायद हीं यह पता हो कि जानीमानी अभिनेत्री और गायिका "नूर जहां" को यह नाम मुख्तार बेग़म ने हीं दिया था, जो कभी "अल्लाह वसई" हुआ करती थीं।

आज की फ़नकारा के बारे में ढेर सारी बातें हो गईं। अब क्यों न हम आज की गज़ल के गज़लगो से भी रूबरू हो लें। तो आज की गज़ल के गज़लगो कोई और नहीं "मुख्तार बेग़म" के पति जनाब "आग़ा हश्र कश्मीरी" हैं। "आग़ा" साहब का शुमार पारसी थियेटर के स्थापकों में किया जाता है। इन्होंने शेक्सपियर के "मर्चेंट आफ़ वेनीस" का जो उर्दू रूपांतरण किया था, वह आज भी उर्दू की एक अमूल्य कॄति के तौर पर गिनी जाती है.. और उस पुस्तक का नाम है "यहूदी की बेटी"। हमें इस बात का पक्का यकीन है कि आप इस पुस्तक से जरूर वाकिफ़ होंगे, भले हीं आप यह न जानते हों कि इसकी रचना "आग़ा" साहब ने हीं की थी। आग़ा साहब के बारे में बाकी बातें कभी अगली कड़ी में कड़ेंगे, अभी हम उनका लिखा एक शेर देख लते हैं:

वो मुक़द्दर न रहा और वो ज़माना न रहा
तुम जो बेगाने हुए, कोई यगाना न रहा।


इस शेर के बाद अब पेश है कि आज की वह गज़ल जिसके लिए हमने यह महफ़िल सजाई है। इस गज़ल को हमने "औरत का प्यार" फिल्म से लिया है, जिसका निर्देशन श्री ए० आर० करदर साहब ने किया था। यह गज़ल राग दरबारी में संगीतबद्ध की गई है। तो चलिए गज़ल की मासूमियत, गज़ल की रूमानियत के साथ-साथ इस राग की बारीकियों से भी रूबरू हो लिया जाए:

चोरी कहीं खुले ना नसीम-ए-बहार की,
खुशबू उड़ाके लाई है गेशु-ए-यार की।

गुलशन में देखकर मेरे मस्त-ए-शबाब को,
शरमाई जा रही है जवानी बहार की।

ऐ मेरे दिल के चैन मेरे दिल की रोशनी,
और सुबह कई दे शब-ए-इंतज़ार की।

जुर्रत तो देखिएगा नसीम-ए-बहार की,
ये भी बलाएँ लेने लगी जुल्फ़-ए-यार की।

ऐ ’हश्र’ देखना तो ये है चौदहवीं का चाँद,
या आसमां के हाथ में _____ यार की।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "मिज़ाज" और पंक्तियाँ कुछ इस तरह थीं -

मेरी ज़िन्दगी के चिराग का, ये मिज़ाज कुछ नया नहीं
अभी रोशनी अभी तीरगी, ना जला हुआ ना बुझा हुआ

बड़े हीं मिज़ाज से "मिज़ाज" शब्द की सबसे पहले शिनाख्त शरद जी ने की। शरद जी इस बार आपके अंदाज बदले-बदले से हैं। हर बार की तरह आपका खुद का लिखा शेर किधर है। चलिए कोई बात नहीं.. मुदस्सर हुसैन साहब का यह शेर भी किसी मामले में कम नहीं है:

गए दिनों में मुहब्बत मिज़ाज उसका था
मगर कुछ और ही अन्दाज़ आज उसका था।

निर्मला जी, हौसला-आफ़जाई के लिए आपका तहे-दिल से शुक्रिया। आप अपनी ये दुआएँ इसी तरह हमपे बनाए रखिएगा।

मंजु जी, क्या बात है! भला ऐसा कौन-सा हुजूर है, जिसका मिज़ाज इतनी खुशामदों के बाद भी नहीं बन रहा। अब और कितनी मिन्नतें चाहिए उसे:

मौहब्बत का मिजाज उनका अब तक ना बन सका ,
मेरे हजूर!क्या खता है हम से कुछ तो अर्ज कर . (स्वरचित)

सुमित जी, यह क्या... बस इसी कारण से आप हमारी महफ़िल से लौट जाते थे क्योंकि आपको दिए गए शब्द पर शेर नहीं आता था। आपको पता है ना कि यहाँ पर किनका लिखा शेर डालना है, ऐसी कोई पाबंदी नहीं है। जब आप खुद कुछ लिख न पाएँ तो दूसरे का शेर हीं पेश कर दिया करें। जैसा कि आपने इस बार किया है:

कोइ हाथ भी ना मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नये मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो।

ये रहे आपके पूछे हुए शब्दों के अर्थ:
पुख़्ताकार: निपुण
तीर ख़ता होना: तीर निशाने से चूक जाना

शन्नो जी, ऐसी क्या नाराज़गी थी कि आपने हमारी महफ़िल से मुँह हीं मोड़ लिया था। अब हम यह कितनी बार कितनों से कहें कि इस महफ़िल का जो संचालन कर रहा है (यानि कि मैं) वो खुद हीं इस लायक नहीं कि धुरंधरों के सामने टिक पाए.. फिर भी उसमें इतनी जिद्द है कि वो महफ़िल लेकर हर बार हाज़िर होता है। जब आपको किसी महफ़िल में शरीक होना हो तो इसमें कोई हानि नहीं कि आप खुद को भी एक धुरंधर मान बैठें, हाँ अगर आप किसी गज़ल की कक्षा में हैं तब आप एक शागिर्द बन सकती हैं। उम्मीद करता हूँ कि आप मेरी बात समझ गई होंगी। तो इसी खुशी में पेश है आपका यह ताज़ा-तरीन शेर:

जिन्दगी के मिजाज़ अक्सर बदलते रहते हैं
और हम उसे खुश करने में ही लगे रहते हैं.

लगता है कि पिछली महफ़िल में कही गई मेरी कुछ बातों से सीमा जी और शामिख साहब नाराज़ हो गएँ। अगर ऐसी बात है तो मैं मुआफ़ी चाहता हूँ। लौट आईये.. आप दोनों। आपके बिना यह महफ़िल अधूरी है।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Friday, August 21, 2009

आज जाने की जिद न करो......... महफ़िल-ए-गज़ल में एक बार फिर हाज़िर हैं फ़रीदा खानुम

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #३८

१४अगस्त को गोकुल-अष्टमी और १८ अगस्त को गुलज़ार साहब के जन्मदिवस के कारण आज की महफ़िल-ए-गज़ल पूरे डेढ हफ़्ते बाद संभव हो पाई है। कोई बात नहीं, हमारी इस महफ़िल का उद्देश्य भी तो यही है कि किसी न किसी विध भूले जा रहे संगीत को बढावा मिले। हाँ तो, डेढ हफ़्ते के ब्रेक से पहले हमने दिशा जी की पसंद की दो गज़लें सुनी थीं। आप सबको शायद यह याद हो कि अब तक हमने शरद जी की फ़ेहरिश्त से दो गज़लों का हीं आनंद लिया है। तो आज बारी है शरद जी की पसंद की अंतिम नज़्म की। आज हम जिस फ़नकारा की नज़्म को लेकर हाज़िर हुए हैं, उनकी एक गज़ल हमने पहले भी सुनी हुई है। जनाब "अतर नफ़ीस" की लिखी "वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया" को हमने महफ़िल-ए-गज़ल की २६वीं कड़ी में पेश किया था। उस कड़ी में हमने इन फ़नकारा की आज की नज़्म का भी ज़िक्र किया था और कहा था कि यह उनकी सबसे मक़बूल कलाम है। इन फ़नकारा के बारे में अपने ब्लाग सुख़नसाज़ पर श्री संजय पटेल जी कहते हैं कि ग़ज़ल गायकी की जो जागीरदारी मोहतरमा फ़रीदा ख़ानम को मिली है वह शीरीं भी है और पुरकशिश भी. वे जब गा रही हों तो दिल-दिमाग़ मे एक ऐसी ख़ूशबू तारी हो जाती है कि लगता है इस ग़ज़ल को रिवाइंड कर कर के सुनिये या निकल पड़िये एक ऐसी यायावरी पर जहाँ आपको कोई पहचानता न हो और फ़रीदा आपा की आवाज़ आपको बार बार हाँट करती रहे. तो अब तक आप समझ हीं गए होंगे कि हम मोहतरमा "मुख्तार बेग़म" की छोटी बहन "मल्लिका-ए-गज़ल" फ़रीदा खानुम जी की बात कर रहे हैं। चलिए इनसे थोड़ा और मुखातिब होते हैं।

फ़रीदा खानुम जी को २००५ में जब "हाफ़िज़ अली खां अवार्ड" से नवाज़ा गया था तो उन्होंने हिन्दुस्तान में अपने प्रवास के बारे में कुछ ऐसे विचार व्यक्त किए थे: मुझे अपने संगीत-कैरियर में हिन्दुस्तान आने के न जाने कितने आफ़र और अवसर मिलते रहे हैं, लेकिन हर बार मै बस इसी कारण से इन अवसरों को नकारती रही क्योंकि हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के संबंध अच्छे नहीं थे। चूँकि इन दिनों संबंधों में कुछ सुधार आता दिख रहा है पाकिस्तान सरकार भी इस बार थोड़ी सीरियस है, इसलिए हिन्दुस्तान आने का अंतत: मैने निर्णय कर लिया। पहली मर्तबा पाकिस्तान-हिन्दुस्तान फोरम की बदौलत तो दूसरी मर्तबा एक हिन्दुस्तानी संगठन एस०पी०आई०सी० के कारण मेरा हिन्दुस्तान आना हुआ। और अबकी बार हिन्दुस्तान ने मुझे क्लासिकल और सेमी-क्लासिकल संगीत के सर्वोच्च अवार्ड से सम्मानित किया है। यह सब देखकर मुझे महसूस होता है कि हिन्दुस्तान में मुझे चाहने वाले कम नहीं। सच हीं है, कोई भी फ़नकार नफ़रत नहीं चाहता और किसी भी फ़नकार का फ़न किसी भी सीमा में बँधकर नहीं रहता। तभी तो आज के नफ़रत भरे माहौल में फ़रीदा खानुम चाहकर भी गा नहीं पाती। हाल के दिनों में लिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था: इस माहौल में कौन गाना चाहेगा। मेरा तो दिल ही नहीं करता गाने को, जब दोनों मुल्कों में माहौल सुधरेगा तभी मैं गा सकूंगी। मैने पाकिस्तान में आखि़री बार स्टेज पर दो साल पहले कराची में गाया था और हिन्दुस्तान में करीब एक बरस पहले। पाकिस्तान में कला से जुड़ी सारी गतिविधियां ठप हो गई हैं। नेताओं को फ़न की फिक्र ही कहां है! फ़नकार मौसिक़ी से दूर होते जा रहे हैं। मुझे याद नहीं पड़ता कि पिछले दो साल में एक बार भी मेरा गाने का मन हुआ हो। जब तक मुहब्बत का माहौल नहीं हो तब तक सब कुछ बेमानी है। यदि यही हाल रहा तो पाकिस्तान में न तो फ़न बचेगा और न ही फ़नकार। मुझे हिन्दुस्तान में भी बहुत प्यार और इज्ज़त मिली। आज भी मैं नहीं भूल सकती कि मेरे कार्यक्रमों में किस क़दर भीड़ उमड़ती थी और कैसे लोग घंटों तक सुनते जाते थे। आखिरी बार तो मेरे कार्यक्रम में उस्ताद अमजद अली खान भी मौजूद थे। मेरी तो यही दुआ है कि अल्लाह रहमत करे और जल्दी माहौल ठीक हो। हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के कलाकार मिलकर ही संगीत की साझी विरासत को बचा सकते हैं, नहीं तो सब खत्म हो जाएगा। शायद हीं ऐसा कभी हो, फिर भी हम दुआ तो कर हीं सकते हैं। आमीन!

उस्ताद बड़े गुलाम अली खान और उस्ताद आशिक़ अली खान की शिष्या फ़रीदा खानुम के बाद हम रूख करते हैं आज के शायर की तरफ़। आज के शायर भी बाकी उन शायरों की तरह हैं जिनकी गज़ल या नज़्म हर किसी की जुबान पर है, लेकिन जिनका नाम शायद हीं कोई जानता हो। हिन्दुस्तान में आज की नज़्म को बहुतों ने आशा भोंसले की आवाज़ में सुना है जिसका संगीत खैय्याम साहब ने दिया था और यकीं मानिए हर किसी को यह नज़्म बस इन दोनों के कारण या फिर हमारी आज की फ़नकारा फ़रीदा खानुम के कारण याद है। लेकिन जिस शख्स ने इस नज़्म में अपने दिली जज़्बातों को पिरोया था उसे पूछने वाला कोई नहीं। १९६० की पाकिस्तानी फिल्म "सहेली" का उनका लिखा एक गाना "हम भूल गए हर बात मगर तेरा प्यार नहीं भूले" जिसे संगीत से सजाया था "ए हमीद" ने और आवाज़ दी थी "नसीम बेगम" ने, देखते-देखते हमारी एक फ़िल्म "सौतन की बेटी" में शामिल भी हो गया और स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने अपनी आवाज़ भी दे दी फिर भी हमने यह मालूम करने की कोशिश नहीं की कि यह गाना किसकी लेखनी की उपज है। अगर अभी तक आप उस शायर से अनभिज्ञ हैं तो लीजिए हम हीं बताए देते हैं। उस शायर का नाम है "फ़ैयाज़ हाशमी" जिसने "पैग़ाम", "औलाद", "सहेली", "सवेरा" ,"सवाल" ,"औलाद" और "तौबा" जैसी न जाने कितनी पाकिस्तानी फ़िल्मों में गीत लिखे थे। उनकी लिखी कुछ गज़लें जो उतना नाम न कर सकी, जितने की वो हक़दार थीं: "हमें कोई ग़म नहीं था ग़म-ए-आशिक़ी से पहले", "कम नहीं मेरी ज़िंदगी के लिए" , "ना तुम मेरे, ना दिल मेरा, ना जान-ए-नतावां मेरी", "टकरा हीं गई मेरी नज़र उनकी नज़र से" और "तस्वीर तेरी दिल मेरा बहला नहीं सकती" । इन्हीं गज़लों में कहीं वह शेर भी शामिल है जिसमें उन्होंने दीवानों की हालत का ब्योरा दिया है। आप खुद हीं देखिए:

"फ़ैयाज़" अब आया है जुनूं जोश पे अपना,
हँसता है जमाना, मैं गुजरता हूँ जिधर से।


"आज जाने की जिद न करो"- शायद हीं कोई होगा जिसने इस नज़्म को न सुना हो। और अगर किसी ने न भी सुना हो तो हम किस लिए हैं। लीजिए पेश है वह नज़्म आपकी खिदमत में। मुलाहजा फ़रमाईयेगा:

आज जाने की ज़िद न करो
यूँही पहलू में बैठे रहो
हाय, मर जायेंगे
हम तो लुट जायेंगे
ऐसी बातें किया न करो

तुम ही सोचो ज़रा, क्यों न रोकें तुम्हें?
जान जाती है जब उठ के जाते हो तुम
तुमको अपनी क़सम जान-ए-जाँ
बात इतनी मेरी मान लो
आज जाने की...

वक़्त की क़ैद में ज़िंदगी है मगर
चंद घड़ियाँ यही हैं जो आज़ाद हैं
इनको खोकर कहीं, जान-ए-जाँ
उम्र भर न तरसते रहो
आज जाने की...

कितना मासूम रंगीन है ये समा
हुस्न और इश्क़ की आज में राज है
कल की किसको खबर जान-ए-जाँ
रोक लो आज की रात को
आज जाने की...




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

मुझे पिला रहे थे वो कि खुद ही शम्मा बुझ गयी,
___ गुम, शराब गुम, बड़ी हसीन रात थी....


आपके विकल्प हैं -
a) सुराही, b) पैमाना, c) जाम, d) गिलास

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था "लुत्फ़" और शेर कुछ यूं था -

मुद्दत के बाद उस ने जो की लुत्फ़ की निगाह,
जी खुश तो हो गया मगर आंसू निकल पड़े..

सही जवाब के साथ साथ शरद जी ने जो शेर सुनाया वो भी गजब का था -

अपनी बातों में असर पैदा कर तू समन्दर सा जिगर पैदा कर
जीस्त का लुत्फ़ जो लेना हो ’शरद’,एक बच्चे सी नज़र पैदा कर...

नीलम जी धन्येवाद आपके वापस आने का, आपके शेर कुछ यूं था -

लुत्फ़ कोई भी रहा अब है न जीने में मजा
जाने वाला दे गया जाते हुए ऐसी सजा

क्या नीलम जी, अब लुत्फ़ जैसे शब्द पर भी इतना उदासी भरा शेर :). मंजू जी ने फ़रमाया-

मुद्दतों के बाद मन के आंगन में लुत्फ़ के बादल छाए
संदेश पिया के आने का कजरारे बादल लाए...

अदा जी ने खूब कहा -

लुत्फ़ जो उसके इंतज़ार में है
वो कहाँ मौसम-ए-बहार में है..

कुलदीप जी ये शेर कैफी साहब का है..आपने हमेशा की तरह बहुत शानदार शेर याद दिलाये, खासकर ये -

ज़िन्दगी का लुत्फ़ हो उड़ती रहे हरदम 'रिआज़'
हम हों शीशे की परी हो घर परीखाना रहे

वाह...रचना जी मगर कुछ यूं उदास दिखी -

लुत्फ़ सूरज के निकलने का उठा रहे थे
चाँद को दर्द ढलने का बता रहे थे

चलिए तो आप सब भी जिंदगी के लुत्फ़ यूहीं उठाते रहें इस दुआ के साथ अगली महफिल तक के लिए विदा कहते हैं और आपको छोड़ जाते हैं शमिख फ़राज़ जी के याद दिलाये फैज़ के इस शेर के साथ -

बहुत मिला न मिला ज़िन्दगी से ग़म क्या है
मता-ए-दर्द बहम है तो बेश-ओ-कम क्या है
हम एक उम्र से वाक़िफ़ हैं अब न समझाओ
के लुत्फ़ क्या है मेरे मेहरबाँ सितम क्या है...

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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