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Friday, September 25, 2009

क्या टूटा है अन्दर अन्दर....इरशाद के बाद महफ़िल में गज़ल कही "शहज़ाद" ने...साथ हैं "खां साहब"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #४८

पिछली कड़ी में पूछे गए दो सवालों में से एक सवाल था "गुलज़ार" साहब के उस मित्र का नाम बताएँ जिसने गुलज़ार साहब के बारे में कहा था कि "कहीं पहले मिले हैं हम"। जहाँ तक हमें याद है हमने महफ़िल-ए-गज़ल की ३६वीं कड़ी में उन महाशय का परिचय "मंसूरा अहमद" के रूप में दिया था। जवाब के तौर पर सीमा जी, शरद जी और शामिख जी में बस सीमा जी ने हीं "मंसूरा अहमद" लिखा, बाकियों ने "मंसूरा" को शायद टंकण में त्रुटि समझकर "मंसूर" कर दिया। चाहते तो हम "मंसूर" को गलत उत्तर मानकर अंकों में कटौती कर देते, लेकिन हम इतने भी बुरे नहीं। इसलिए आप दोनों को भी पूरे अंक मिल रहे हैं। लेकिन आपसे दरख्वास्त है कि आगे से ऐसी गलती न करें। वैसे अगर आपने कहीं "मंसूर अहमद" पढ रखा है तो कृप्या हमें भी अवगत कराएँ ताकि हमें उनके बारे में और भी जानकारी मिले। अभी तो हमारे पास उन कविताओं के अलावा कुछ नहीं है। हाँ तो इस बात को मद्देनज़र रखते हुए पिछली कड़ी के अंकों का हिसाब कुछ यूँ बनता है: सीमा जी: ४ अंक, शरद जी: २ अंक, शामिख जी: १ अंक। अब बारी है आज के प्रश्नों की| तो ये रहे प्रतियोगिता के नियम और उसके आगे दो प्रश्न: ५० वें अंक तक हम हर बार आपसे दो सवाल पूछेंगे जिसके जवाब उस दिन के या फिर पिछली कड़ियों के आलेख में छुपे होंगे। अगर आपने पिछली कड़ियों को सही से पढा होगा तो आपको जवाब ढूँढने में मुश्किल नहीं होगी, नहीं तो आपको थोड़ी मेहनत करनी होगी। और हाँ, हर बार पहला सही जवाब देने वाले को ४ अंक, उसके बाद २ अंक और उसके बाद हर किसी को १ अंक मिलेंगे। इन १० कड़ियों में जो भी सबसे ज्यादा अंक हासिल करेगा, वह महफ़िल-ए-गज़ल में अपनी पसंद की ५ गज़लों की फरमाईश कर सकता है, वहीं दूसरे स्थान पर आने वाला पाठक अपनी पसंद की ३ गज़लों को सुनने का हक़दार होगा। इस तरह चुनी गई आठ गज़लों को हम ५३वीं से ६०वीं कड़ी के बीच पेश करेंगे। और साथ हीं एक बात और- जवाब देने वाले को यह भी बताना होगा कि "अमुक" सवाल किस कड़ी से जुड़ा है। तो ये रहे आज के सवाल: -

१) अपनी बहन "दिना" की जगह पर एक कार्यक्रम पेश करके संगीत की दुनिया में उतरने वाली एक फ़नकारा जिसे १९७४ में रीलिजे हुई एक फ़िल्म के टाईटल ट्रैक ने रातोंरात स्टार बना दिया। फ़नकारा के साथ-साथ उस फिल्म की भी जानकारी दें।
२) दो गायक बंधु जिनकी प्रसिद्धि के साथ भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का भी नाम जुड़ा है और जिनके बारे में कई लोगों को लगता है कि हसरत जयपुरी उनके पिता है। उन दोनों के साथ-साथ उनके पिता का भी नाम बताएँ।


आज हम जिस गज़ल को लेकर इस महफ़िल में हाज़िर हुए हैं, उस गज़ल को अपनी सधी हुई आवाज़ से सजाने वाले फ़नकार की तबियत आजकल कुछ नासाज़ चल रही है। यूँ तो इस फ़नकार की एक गज़ल हम आपको पहले हीं सुनवा चुके हैं, लेकिन उस समय हमने इनके बारे में ज्यादा बातें नहीं की थी या यूँ कहिए कि हम उस कड़ी में बस उनका जीवन-वृंतात हीं समेट पाए थे। हमने सोचा कि क्यों न आज कुछ हटकर बातें की जाए। इस लिहाज़ से उनके स्वास्थ्य के बारे में बात करना सबसे जरूरी हो जाता है। २९ मार्च २००९ को उनके बारे में नवभारत टाईम्स में यह खबर आई थी: १९२७ में राजस्थान के लूना में जन्मे मेहदी हसन नौ बरस पहले पैरलाइसिस के चलते मौसिकी से दूर हो गए थे। फिलहाल, वह फेफड़ों के संक्रमण के कारण पिछले डेढ़ महीने से कराची के आगा खान यूनिवर्सिटी अस्पताल में भर्ती हैं, लेकिन जल्दी ही उन्हें छुट्टी मिलने वाली है क्योंकि उनका परिवार मेडिकल बिल भरने में असमर्थ है। उनके बेटे आरिफ हसन ने कराची से को दिए इंटरव्यू में कहा, एक बार हिन्दुस्तान आना चाहते हैं। लता से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी गजल के इस बादशाह के मुरीदों में शामिल हैं। आरिफ ने बताया, लताजी को उनकी बीमारी के बारे में पता चला तो उन्होंने मुंबई आकर इलाज कराने की पेशकश की। उन्होंने खुद सारा खर्च उठाने की भी बात कही। उनके भतीजे आदिनाथ ने हमें फोन किया था। उन्होंने बताया कि २००२ में तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी ने भी पत्र लिखकर हसन के जल्दी ठीक होने की कामना की थी। उन्होंने भी हिन्दुस्तान सरकार की ओर से हरसंभव मदद का प्रस्ताव रखा था। आरिफ ने कहा, हसन साहब ने फन की सौदेबाजी नहीं की लिहाजा पैसा कभी जोड़ नहीं पाए। रेकॉर्डिंग कंपनियों से मिलने वाला पैसा ही आय का मुख्य जरिया था जो उस समय बहुत कम होता था। शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचने पर भी उन्हें सीखने का जुनून रहा। उनका कहना है कि संगीत तो एक समंदर की तरह है जितना इसमें उतरा, उतना ही अपने अज्ञान का पता चलता है। अफज़ल सुभानी ,जो अपने बारे में कहते हैं कि "पाकिस्तान से बाहर का मैं पहला शागिर्द हूं, जिसे मेहदी हसन साहब ने गंडा बांध कर विधिवत शिष्य बनाया है", मेहदी साहब की हालत से बड़े हीं परेशान नज़र आते हैं। मेहदी साहब की बात चलने पर कुछ याद करके वो कहते हैं: मुझे आज भी याद है, जब हमने उनके लकवाग्रस्त होने के बाद फोन पर बात की थी। मैं उनकी महान आवाज़ नहीं पहचान पाया। मैं रो पड़ा। लकवा ने उनके वोकल कॉर्डस पर असर डाला था. पर बहुत ही कम समय में वो समय भी आया जब उन्होंने अपनी उसी आवाज़ में घोषणा की “मेरी आवाज़ वापस आ गई है”, मैंने उन्हें इतना खुश कभी नहीं सुना।" आखिर कौन होगा जिसे मेहदी साहब की फ़िक्र न होगी। हमारे हिन्दुस्तान, पाकिस्तान या यूँ कहिए कि पूरे विश्व के लिए वे एक धरोहर के समान हैं। हमारी तो यही दुआ है कि वे फिर से उसी रंग में वापस आ जाएँ, जिसके लिए उन्हें जाना जाता है।

आकाशवाणी से प्रकाशित एक भेंटवार्ता के दौरान मन्ना डे साहब से जब यह पूछा गया कि "इतनी अधिक सफलता, लोकप्रियता, पुरस्कार, मान-सम्मान सभी कुछ मिलने के बाद भी क्या आपके मन में कोई इच्छा ऐसी है जो अभी भी पूरी नहीं हुई है"। तो उनका उत्तर कुछ यूँ था: हां! दो इच्छाएं अभी भी मेरे मन में हैं। एक तो यह कि मैं अपने अंतिम समय में मोहम्मद रफ़ी के गाये गीतों को सुनता रहूं, और दूसरी यह कि मैं कभी मेहदी हसन की तरह ग़ज़ल गा सकूं| संगीत की देवी के दो लाडले बेटों को इस कदर याद करना खुद मन्ना दा की संगीत-साधना को दर्शाता है। इसी तरह की एक भेंटवार्ता में मेहदी साहब से जब यह पूछा गया था कि "क्या मुल्कों को बाँटने वाली सरहदें बेवजह हैं?" तो उन्होंने कहा था कि "हाँ बेकार की चीज़े हैं ये सरहदें, पर जो अल्लाह को मंज़ूर होता है वही होता है"। वैसे भी संगीत-प्रेमियों के लिए सरहद कोई मायने नहीं रखती और यही कारण है कि हम भी फ़नकारों से यही उम्मीद रखते हैं कि उनकी गायकी में सरहदों की सोच उभरती नहीं होगी। यूँ तो कई जगहों पर और कई बार मेहदी साहब ने यह तमन्ना ज़ाहिर की है कि वे हिन्दुस्तान आना चाहते हैं(क्योंकि हिन्दुस्तान उनकी सरजमीं है, उनका अपना मुल्क है जिसकी गोद में उन्होंने अपना बचपन गुजारा है), फिर भी कुछ लोग यह कहते हैं कि मेहदी साहब तरह-तरह के विवादास्पद बयान देकर हिंदुस्तान के कुछ श्रेष्ठतम कलाकारों की बेइज्जती का प्रयास करते रहे हैं। हम यहाँ पर कोई निष्कर्ष नहीं निकालना चाहते लेकिन उन घटनाओं को लोगों के सामने रखनें में कोई बुराई नहीं है। "शहंशाहे-गज़ल - मेहदी हसन" शीर्षक से प्रकाशित एक आलेख में ऐसे हीं कुछ वाक्यात जमा हैं(सौजन्य: सृजनगाथा): उनका एक बयान कि "हिंदुस्तान में किसी को गाना ही नहीं आता है", विश्व प्रसिद्ध गायक मोहम्मद रफ़ी को आहत कर गया था; जबकि उनका दूसरा बयान कि "हिंदुस्तान की गायिकाएं कोठेवाली गायिकाएं हैं", स्वर-सम्राज्ञी लता मंगेश्कर को भी दुखी कर गया था। प्रख्यात संगीतकार निर्देशक ख़्य्याम से तो मेहदी हसन की ज़बरदस्त झड़प अनगिनत प्रतिष्ठित कलाकारों के सामने ही हो गयी थी। मेहदी हसन ने ख़य्याम से मशहूर गायक मुकेश के बारे में कह दिया था कि "ख़य्याम साहब, आप जैसे गुणी म्यूज़िक डायरेक्टर को एक बेसुरे आदमी से गीत गवाने की क्या ज़रूरत है"। ख़य्याम ने सरेआम मेहदी हसन को बहुत बुरी तरह डांट दिया था और बात बिगड़ती देखकर कुछ महत्वपूर्ण कलाकारों ने ख़य्याम और मेहदी हसन को एक-दूसर से काफ़ी दूर हटा दिया।" हमारा मानना है कि हर फ़नकार के साथ अच्छी और बुरी दोनों तरह की बातें जुड़ी होती हैं। फ़नकार का व्यक्तित्व जिस तरह का भी हो, हमें बस उसकी फ़नकारी से मतलब रखना चाहिए। अगर फ़नकार दिल से अच्छा हो तो वह एक तरह से अपना हीं भला करता है, नहीं तो सभी जानते हैं कि प्रशंसकों की याद्दाश्त कितनी कम होती है! चलिए, हसन साहब (खां साहब) के बारे में बहुत बातें हो गईं। हम अब आज की गज़ल के गज़लगो को याद कर लेते हैं। इस गज़ल को लिखा है "फ़रहत शहज़ाद" ने, जिनकी कई सारी गज़लें मेहदी हसन साहब ने गाई हैं। हम जल्द हीं इनके बारे में भी आलेख लेकर हाज़िर होंगे। आज बस उनके लिखे इस शेर से काम चला लेते हैं:

फ़ैसला तुमको भूल जाने का,
एक नया ख्वाब है दीवाने का।


और यह रही आज़ की गज़ल। "नियाज़ अहमद" के संगीत से सनी इस गज़ल को हमने लिया है "कहना उसे" एलबम से। तो आनंद लीजिए हमारी आज की पेशकश का:

क्या टूटा है अन्दर अन्दर क्यूँ चेहरा कुम्हलाया है
तन्हा तन्हा रोने वालो कौन तुम्हें याद आया है

चुपके चुपके सुलग़ रहे थे याद में उनकी दीवाने
इक तारे ने टूट के यारो क्या उनको समझाया है

रंग बिरंगी इस महफ़िल में तुम क्यूँ इतने चुप चुप हो
भूल भी जाओ पागल लोगो क्या खोया क्या पाया है

शेर कहाँ है ख़ून है दिल का जो लफ़्ज़ों में बिखरा है
दिल के ज़ख़्म दिखा कर हमने महफ़िल को गर्माया है

अब 'शहज़ाद' ये झूठ न बोलो वो इतना बेदर्द नहीं
अपनी चाहत को भी परखो गर इल्ज़ाम लगाया है




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

मुसीबत का पहाड़ आखिर किसी दिन कट ही जायेगा
मुझे सर मार कर ___ के मर जाना नहीं आता ...


आपके विकल्प हैं -
a) दीवार , b) पत्थर, c) तेशे, d) आरी

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "आईना" और शेर कुछ यूं था -

वो मेरा आईना है मैं उसकी परछाई हूँ,
मेरे ही घर में रहता है मुझ जैसा ही जाने कौन....

निदा फ़ाज़ली साहब के इस शेर को सबसे पहले सही पहचाना सीमा जी ने। सीमा जी, आप पिछली न जाने कितनी कड़ियों से हमारी महफ़िल की शान बनी हुई हैं। आगे भी ऐसा हीं हो, यही दुआ है। आपने कुछ शेर महफ़िल के सुपूर्द किए:

हर एक चेहरे को ज़ख़्मों का आईना न कहो|
ये ज़िन्दगी तो है रहमत इसे सज़ा न कहो| (राहत इन्दौरी)

यही कहा था मेरे हाथ में है आईना
तो मुझपे टूट पड़ा सारा शहर नाबीना। (अहमद फ़राज़)

क्या कोई नई बात नज़र आती है हम में
आईना हमें देख के हैरान सा क्यूँ है। (शहरयार)

सीमा जी के बाद महफ़िल में हाज़िरी लगाई शरद जी ने। आपने अपने विशेष अंदाज में दो शेर पेश किए:

पुराने आइने में शक्ल कुछ ऐसी नज़र आई
कभी तिरछी नज़र आई कभी सीधी नज़र आई
लुटी जब आबरु उसकी तो मैं भी चुप लगा बैठा
मग़र फिर ख्वाब में अपनी बहन बेटी नज़र आई। (आह!!!)

शामिख जी, आपकी पेशकश भी कमाल की रही। ये रही बानगी:

बस उसी दिन से खफा है वो मेरा इक चेहरा
धूप में आइना इक रोज दिखाया था जिसे। (कुँवर बेचैन)

अब मोहब्बत की जगह दिल में ग़मे-दौरां है
आइना टूट गया तेरी नज़र होने तक। (कृष्ण बिहारी नूर)

मंजु जी, वाकई चेहरा ज़िंदगी का सच बतलाता है। आप अपनी बात कहने में सफ़ल हुई हैं:

चेहरा है आईना जिन्दगी का ,
सच है बतलाता जिन्दगी का।

अवध जी, आपने महफ़िल में पहली मर्तबा तशरीफ़ रखा, इसलिए आपका विशेष स्वागत है। आपने "अनवर" और "आशा सचदेव" के बारे में जो कुछ हमसे पूछा है, उसका जवाब देने में हम असमर्थ हैं। कारण यह कि अनवर साहब के व्यक्तिगत साईट पर भी ऐसा कुछ नहीं लिखा। आप यहाँ देखें। साथ हीं पेश है आपका यह शेर:

आइना देख अपना सा मुंह ले कर रह गए.
साहेब को दिल न देने पे कितना गुरूर था.

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए विदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Sunday, September 20, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और एक फीचर्ड एल्बम पर बात, दीपाली दिशा के साथ (१६)

"क्या लिखूं क्या छोडूं, सवाल कई उठते हैं, उस व्यक्तित्व के आगे मैं स्वयं को बौना पाती हूँ" लताजी का व्यक्तित्व ऐसा है कि उनके बारे में लिखने-कहने से पहले यही लगता है कि क्या लिखें और क्या छोडें. वो शब्द ही नहीं मिलते जो उनके व्यक्तित्व की गरिमा और उनके होने के महत्त्व को जता सकें. 'सुर सम्राज्ञी' कहें, 'भारत कोकिला' कहें या फिर संगीत की आत्मा, सब कम ही लगता है. लेकिन मुझे इस बात पर गर्व है कि लता जी जैसा रत्न भारत में उत्पन्न हुआ है. लता जी को 'भारत रत्न' पुरूस्कार का मिलना इस पुरूस्कार के नाम को सत्य सिद्ध करता है. उनकी प्रतिभा के आगे उम्र ने भी अपने हथियार डाल दिए हैं. लता जी की उम्र का बढ़ना ऐसा लगता है जैसे कि उनके गायन क्षमता की बेल दिन-प्रतिदिन बढती ही जा रही है. और हम सब भी यही चाहते हैं कि यह अमरबेल कभी समाप्त न हो, इसी तरह पीढी दर पीढी बढती ही रहे-चलती ही रहे.

वर्षों से लताजी फिल्म संगीत को अपनी मधुर व जादुई आवाज से सजाती आ रही हैं. कोई फिल्म चली हो या न चली हो परन्तु ऐसा कोई गीत न होगा जिसमें लताजी कि आवाज हो और लोगों ने उसे न सराहा हो. लता, एक ऐसा नाम और प्रतिभा है जो बीते ज़माने में भी मशहूर था, आज भी है और आने वाले समय में भी वर्षों तक इस नाम कि धूम मची रहेगी. उनके गाये गीतों को गाकर तथा उन्हीं को अपना आदर्श मानकर न जाने कितने ही लोगों ने गायन क्षेत्र में अपना सिक्का जमाया है और आज भी सैकडों बच्चे बचपन से ही उनके गाये गीतों का रियाज करते हैं तथा अपने कैरियर को एक दिशा प्रदान करने की कोशिश में लगे हैं.

लताजी ने अपनी जिंदगी में इतना मान सम्मान पाया है कि उसको तोला नहीं जा सकता. कितनी ही उपाधियाँ और कितने ही पुरुस्कारों से उनकी झोली भरी हुई है. लेकिन अब तो लगता है कोई पुरुस्कार, कोई सम्मान उनकी प्रतिभा का मापन नहीं कर सकता. लता जी इन सब से बहुत आगे हैं. पुरूस्कार देना या उनकी प्रतिभा को आंकना 'सूरज को दिया दिखाने' जैसा है. शोहरत की बुलंदियों पर विराजित होने के बावजूद भी घमंड और अकड़ ने उन्हें छुआ तक नहीं है. कहते हैं की 'फलदार वृक्ष झुक जाता है' यह कहावत लताजी पर एकदम सटीक बैठती है. उन्होंने जितनी सफलता पायी है उतनी ही विनम्रता और शालीनता उनके व्यक्तित्व में झलकती है. वह सादगी की मूरत हैं तथा उनकी आवाज के सादेपन को हमेशा से लोगों ने पसंद किया है.

फ़िल्मी गीतों के अलावा लता जी ने बीच बीच में कुछ ग़ज़लों की एल्बम पर भी काम किया है, "सादगी" इस श्रेणी में सबसे ताजा प्रस्तुति है. लताजी का मानना है कि जिंदगी में सरल व सादी चीजें ही सभी के दिल को छूती हैं, और इस एल्बम में उन्हीं लम्हों के बारे में बात कही गयी है, इसीलिए इस एल्बम का नाम 'सादगी' रखा गया है. यह एल्बम 'वर्ल्ड म्यूजिक डे' पर प्रख्यात गायक जगजीत सिंह द्वारा जारी किया गया. पूरे १७ वर्षों बाद लता जी का कोई एल्बम आया है. इस एल्बम के संगीत निर्देशक मयूरेश हैं तथा ज्यादातर ग़ज़लें लिखी हैं जावेद अख्तर, मेराज फैजाबादी, फरहत शहजाद, के साथ चंद्रशेखर सानेकर ने. एल्बम में शास्त्रीय संगीत तथा लाईट म्यूजिक के बीच संतुलन बिठाने की कोशिश की गयी है. इसमें कुल आठ गजलें हैं. 'मुझे खबर थी' और 'वो इतने करीब हैं दिल के' गजल पहली बार सुनने पर ही असर करती हैं. दिल को छूती हुई रचनायें है. बाकी की गजलों का भी अपना एक मजा है लेकिन उन्हें दिल तक पहुंचने में दो तीन बार सुनने तक का समय लगेगा. एल्बम में ज्यादातर परंपरागत संगीत वाद्य यंत्रों का प्रयोग हुआ है तथा सेक्सोफोन, गिटार और पश्चिमी धुन का भी प्रयोग सुनाई पड़ता है.

चलते-चलते यही कहेंगे कि लता जी की आवाज में नदी की तरह ठहराव और शांति का भाव समाहित है. एक मधुर और भावपूर्ण संगीतमय तोहफे के लिए हम उनके आभारी है. ईश्वर करे वो आने वाले दशकों तक हमें संगीत की सौगातें देती रहे और हम इस सरिता में यूं ही डुबकी लगाते रहे.

मुझे खबर थी - फरहत शहजाद


इश्क की बातें - जावेद अख्तर


रात है - जावेद अख्तर


चाँद के प्याले से - जावेद अख्तर


अंधे ख्वाबों को - मेराज फैजाबादी


जो इतने करीब हैं - जावेद अख्तर


मैं कहाँ अब जिस्म हूँ - चंद्रशेखर सानेकर


फिर कहीं दूर से - मेराज फैजाबादी


ये ऑंखें ये नम् ऑंखें - गुलज़ार


प्रस्तुति - दीपाली तिवारी "दिशा"


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

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