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Sunday, July 4, 2010

ओ वर्षा के पहले बादल...सावन की पहली दस्तक को आवाज़ सलाम इस सुमधुर गीत के माध्यम से

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 431/2010/131

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी चाहने वालों का एक बार फिर से हार्दिक स्वागत है इस स्तंभ में। अगर आप हम से आज जुड़ रहे हैं, तो आपको बता दें कि आप इस वक़्त शामिल हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' स्तंभ है 'हिंद-युग्म' के साज़-ओ-आवाज़ विभाग, यानी कि 'आवाज़' का एक हिस्सा। हर हफ़्ते रविवार से लेकर गुरुवार तक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल सजती है और हर अंक में हम आपको सुनवाते हैं हिंदी सिनेमा के गुज़रे ज़माने का एक अनमोल नग़मा। कभी ये नग़में कालजयी होते हैं तो कभी भूले बिसरे, कभी सुपर हिट तो कभी कमचर्चित। लेकिन हर एक नग़मा बेमिसाल, हर एक गीत नायाब। तभी तो इस स्तंभ को हम कहते हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड'। तो उन सभी भाइयों और बहनों का, जो हम से आज जुड़ रहे हैं, हम एक बार फिर से इस महफ़िल में हार्दिक स्वागत करते हैं। दोस्तों, भारत में इस साल के मानसून का आगमन हो चुका है। देश के कई हिस्सों में बरखा रानी छम छम बरस रही हैं इन दिनों, तो कई प्रांत ऐसे भी हैं जो अभी भी भीषण गरमी से जूझ रहे हैं। उनके लिए तो हम यही कामना करते हैं कि आपके वहाँ भी जल्द से जल्द फुहारें आरंभ हो। दोस्तों, बारिश के ये दिन, सावन का यह महीना, रिमझिम की ये फुहारें, काले बादलों की गर्जन करती हुई फ़ौज, नई कोंपलें, चारों तरफ़ हरियाली ही हरियाली, किसे नहीं अच्छा लगता होगा। प्रकृति के इस अनुपम वातावरण का मानव हृदय पर असर होना लाजमी है। तभी तो सावन की ॠतु पर असंख्य कविताएँ और गीत लिखे जा चुके हैं और अब भी लिखे जाते हैं। सावन को मिलन का मौसम भी कहा जाता है। जो प्रेमी अपनी प्रेमिका से इस समय दूर होते हैं, उनके लिए यह मौसम बड़ा कष्ट दायक बन जाता है। तभी तो जुदाई के दर्द को और भी ज़्यादा पुर असर तरीके से चित्रित करने के लिए हमारे फ़िल्मकार बरसात का सहारा लेते हैं। "सावन के झूले पड़े तुम चले आओ", "अब के सजन सावन में, आग लगेगी बदन में", "सावन आया बादल छाए, आने वाले सब आए हैं बोलो तुम कब आओगे", और भी न जाने कितने ऐसे गीत हैं जिनमें सावन के साथ जुदाई के दर्द को मिलाया गया है। ख़ैर, यह तो एक पहलु था। सावन और बरसात का आज हमने इसलिए ज़िक्र छेड़ा क्योंकि आज से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर हम शुरु कर रहे हैं इसी सुहाने मौसम को समर्पित हमारी नई लघु शृंखला 'रिमझिम के तराने'। यानी कि इस भीगे भीगे मौसम को और भी ज़्यादा रोमांटिक, और भी ज़्यादा सुहावना बनाने के लिए अगले दस कड़ियों में सुनिए बारिश के नग़में, कभी टिप टिप, कभी रिमझिम, तो कभी टापुर टुपुर के ताल पर सवार हो कर।

इस शृंखला की शुरुआत किसी ऐसे गीत से होनी चाहिए जो हमारे इतिहास से जुड़ा हुआ हो, हमारी प्राचीन संस्कृति से जुड़ी हुई हो। तो फिर ऐसे में कालीदास रचित 'मेघदूत' से बेहतर शुरुआत और क्या हो सकती है भला! 'मेघदूत' कालीदास की सुविख्यात काव्य कृति है। यह एक लिरिकल पोएम है जिसका ना केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्व है, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी बेहद महत्व रखता है। इसमें मानसून का वर्णन मिलता है और मध्य भारत में मानसून के गति पथ और दिशाओं का भी उल्लेख मिलता है जो आज के वैज्ञानिकों के शोध कार्य के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। कालीदास के अन्य महत्वपूर्ण कृतियों में शामिल हैं 'शकुंतला', 'विक्रम-उर्वषी', 'कुमारसंभवा', 'रघुवंशम' आदि। इन सभी पर फ़िल्में बन चुकी हैं। 'मेघदूत' पर सन् १९४५ में देबकी बोस ने इसी शीर्षक से फ़िल्म निर्देशित की जिसका निर्माण कीर्ति पिक्चर्स के बैनर तले हुआ था। ऐतिहासिक व काव्यिक होने की वजह से इस फ़िल्म के संगीतकार के रूप में किसी विशिष्ट संगीतकार को ही चुनना ज़रूरी था। ऐसे में कमल दासगुप्ता को चुना गया जो उन दिनों ग़ैर फ़िल्मी गीतों को मनमोहक धुनों में प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते थे। गायक जगमोहन ने भी इस फ़िल्म के गीतों में महत्वपूर्ण योगदान दिया, ख़ास कर आज का प्रस्तुत गीत "ओ वर्षा के पहले बादल, मेरा संदेसा ले जा वहाँ"। जगमोहन उन गिने चुने कलाकारों में से थे जिन्होने रबीन्द्र संगीत शैली को फ़िल्म संगीत में लाने की कोशिश की। ६ सितंबर १९१८ को जनमे जगन्मय मित्र (जगमोहन) कलकत्ते के एक ज़मीनदार परिवार से तालुख़ रखते थे। उन्होने शास्त्रीय संगीत और सुगम संगीत की तालीम पॊण्डिचेरी के दिलीप कुमार राय से प्राप्त की। मैट्रिक की परीक्षा के बाद वो रेडियो पर गाने लगे। हालाँकि उन्होने हिंदी फ़िल्मों के लिए ज़्यादा नहीं गाए, उनके ग़ैर फ़िल्मी रचनाएँ बहुत लोकप्रिय हुआ करते थे उस ज़माने में। और उनका गाया सब से लोकप्रिय ग़ैर फ़िल्मी गीत है "यह ना बता सकूँगा मैं तुमसे है मुझे प्यार क्यों"। जगमोहन की तरह कमल दासगुप्ता भी हिंदी फ़िल्मों में कम ही नज़र आए। उपलब्ध जानकारी के अनुसार कमल बाबू ने हिंदी की जिन १६ फ़िल्मों में संगीत दिया था उनके नाम हैं - जवाब ('४२), हास्पिटल ('४३), रानी ('४३), मेघदूत ('४५), अरेबियन नाइट्स ('४६), बिंदिया ('४६), कृष्ण लीला ('४६), पहचान ('४६), ज़मीन आसमान ('४६), फ़ैसला ('४७ - अनुपम घटक के साथ), गिरिबाला ('४७), मनमानी ('४७), चन्द्रशेखर ('४८), विजय-यात्रा ('४८), ईरान की एक रात ('४९), फुलवारी ('५१)। और आइए दोस्तों, अब इस साल के मानसून का स्वागत-सत्कार किया जाए 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर जगमोहन के गाए फ़िल्म 'मेघदूत' के इस गाने से। गीत लिखा है फ़ैय्याज़ हाशमी ने। जी हाँ, वोही फ़य्याज़ हशमी जिन्होने कमल दासगुप्ता के लिए तलत महमूद का पहला पहला मशहूर गीत "तस्वीर तेरी दिल मेरा बहला ना सकेगी" लिखा था। इस गीत को हम कभी आपको संभव हुआ तो ज़रूर सुनवाएँगे, फ़िल्हाल सुनते हैं फ़िल्म 'मेघदूत' का गीत, जिसकी अवधि है कुल ६ मिनट और ६ सेकण्ड्स, जो कि उस ज़माने के हिसाब से बहुत ही लम्बा था।



क्या आप जानते हैं...
कि संगीतकार कमल दासगुप्ता धुन बनाते समय हारमोनियम या पियानो के बजाय कलम लेकर बैठते थे। जैसे जैसे उनके दिमाग में सुर आकार लेते थे, वे सीधे उसके नोटेशन्स कापी में लिखते जाते थे।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. कल इस गीतकार की पुण्यतिथि है, नाम बताएं -३ अंक.
२. इस गीतकार संगीतकार जोड़ी ने एक से बढ़कर एक नगमें दिए हैं हमें, संगीतकार बताएं - २ अंक.
३. लता के गाये सावन के इस गीत को हमने किस फिल्म से लिया है - १ अंक.
४. १९६७ में आई थी ये फिल्म, किस राग पर आधारित है ये गीत - ३ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
क्या बात है कोई शरद जी और अवध जी को टक्कर देने मैदान में नहीं उतर रहा, अरे भाई मैदान छोड़ के भागिए मत, चार सवाल हैं...कोशिश कीजिये

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Friday, August 21, 2009

आज जाने की जिद न करो......... महफ़िल-ए-गज़ल में एक बार फिर हाज़िर हैं फ़रीदा खानुम

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #३८

१४अगस्त को गोकुल-अष्टमी और १८ अगस्त को गुलज़ार साहब के जन्मदिवस के कारण आज की महफ़िल-ए-गज़ल पूरे डेढ हफ़्ते बाद संभव हो पाई है। कोई बात नहीं, हमारी इस महफ़िल का उद्देश्य भी तो यही है कि किसी न किसी विध भूले जा रहे संगीत को बढावा मिले। हाँ तो, डेढ हफ़्ते के ब्रेक से पहले हमने दिशा जी की पसंद की दो गज़लें सुनी थीं। आप सबको शायद यह याद हो कि अब तक हमने शरद जी की फ़ेहरिश्त से दो गज़लों का हीं आनंद लिया है। तो आज बारी है शरद जी की पसंद की अंतिम नज़्म की। आज हम जिस फ़नकारा की नज़्म को लेकर हाज़िर हुए हैं, उनकी एक गज़ल हमने पहले भी सुनी हुई है। जनाब "अतर नफ़ीस" की लिखी "वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया" को हमने महफ़िल-ए-गज़ल की २६वीं कड़ी में पेश किया था। उस कड़ी में हमने इन फ़नकारा की आज की नज़्म का भी ज़िक्र किया था और कहा था कि यह उनकी सबसे मक़बूल कलाम है। इन फ़नकारा के बारे में अपने ब्लाग सुख़नसाज़ पर श्री संजय पटेल जी कहते हैं कि ग़ज़ल गायकी की जो जागीरदारी मोहतरमा फ़रीदा ख़ानम को मिली है वह शीरीं भी है और पुरकशिश भी. वे जब गा रही हों तो दिल-दिमाग़ मे एक ऐसी ख़ूशबू तारी हो जाती है कि लगता है इस ग़ज़ल को रिवाइंड कर कर के सुनिये या निकल पड़िये एक ऐसी यायावरी पर जहाँ आपको कोई पहचानता न हो और फ़रीदा आपा की आवाज़ आपको बार बार हाँट करती रहे. तो अब तक आप समझ हीं गए होंगे कि हम मोहतरमा "मुख्तार बेग़म" की छोटी बहन "मल्लिका-ए-गज़ल" फ़रीदा खानुम जी की बात कर रहे हैं। चलिए इनसे थोड़ा और मुखातिब होते हैं।

फ़रीदा खानुम जी को २००५ में जब "हाफ़िज़ अली खां अवार्ड" से नवाज़ा गया था तो उन्होंने हिन्दुस्तान में अपने प्रवास के बारे में कुछ ऐसे विचार व्यक्त किए थे: मुझे अपने संगीत-कैरियर में हिन्दुस्तान आने के न जाने कितने आफ़र और अवसर मिलते रहे हैं, लेकिन हर बार मै बस इसी कारण से इन अवसरों को नकारती रही क्योंकि हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के संबंध अच्छे नहीं थे। चूँकि इन दिनों संबंधों में कुछ सुधार आता दिख रहा है पाकिस्तान सरकार भी इस बार थोड़ी सीरियस है, इसलिए हिन्दुस्तान आने का अंतत: मैने निर्णय कर लिया। पहली मर्तबा पाकिस्तान-हिन्दुस्तान फोरम की बदौलत तो दूसरी मर्तबा एक हिन्दुस्तानी संगठन एस०पी०आई०सी० के कारण मेरा हिन्दुस्तान आना हुआ। और अबकी बार हिन्दुस्तान ने मुझे क्लासिकल और सेमी-क्लासिकल संगीत के सर्वोच्च अवार्ड से सम्मानित किया है। यह सब देखकर मुझे महसूस होता है कि हिन्दुस्तान में मुझे चाहने वाले कम नहीं। सच हीं है, कोई भी फ़नकार नफ़रत नहीं चाहता और किसी भी फ़नकार का फ़न किसी भी सीमा में बँधकर नहीं रहता। तभी तो आज के नफ़रत भरे माहौल में फ़रीदा खानुम चाहकर भी गा नहीं पाती। हाल के दिनों में लिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था: इस माहौल में कौन गाना चाहेगा। मेरा तो दिल ही नहीं करता गाने को, जब दोनों मुल्कों में माहौल सुधरेगा तभी मैं गा सकूंगी। मैने पाकिस्तान में आखि़री बार स्टेज पर दो साल पहले कराची में गाया था और हिन्दुस्तान में करीब एक बरस पहले। पाकिस्तान में कला से जुड़ी सारी गतिविधियां ठप हो गई हैं। नेताओं को फ़न की फिक्र ही कहां है! फ़नकार मौसिक़ी से दूर होते जा रहे हैं। मुझे याद नहीं पड़ता कि पिछले दो साल में एक बार भी मेरा गाने का मन हुआ हो। जब तक मुहब्बत का माहौल नहीं हो तब तक सब कुछ बेमानी है। यदि यही हाल रहा तो पाकिस्तान में न तो फ़न बचेगा और न ही फ़नकार। मुझे हिन्दुस्तान में भी बहुत प्यार और इज्ज़त मिली। आज भी मैं नहीं भूल सकती कि मेरे कार्यक्रमों में किस क़दर भीड़ उमड़ती थी और कैसे लोग घंटों तक सुनते जाते थे। आखिरी बार तो मेरे कार्यक्रम में उस्ताद अमजद अली खान भी मौजूद थे। मेरी तो यही दुआ है कि अल्लाह रहमत करे और जल्दी माहौल ठीक हो। हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के कलाकार मिलकर ही संगीत की साझी विरासत को बचा सकते हैं, नहीं तो सब खत्म हो जाएगा। शायद हीं ऐसा कभी हो, फिर भी हम दुआ तो कर हीं सकते हैं। आमीन!

उस्ताद बड़े गुलाम अली खान और उस्ताद आशिक़ अली खान की शिष्या फ़रीदा खानुम के बाद हम रूख करते हैं आज के शायर की तरफ़। आज के शायर भी बाकी उन शायरों की तरह हैं जिनकी गज़ल या नज़्म हर किसी की जुबान पर है, लेकिन जिनका नाम शायद हीं कोई जानता हो। हिन्दुस्तान में आज की नज़्म को बहुतों ने आशा भोंसले की आवाज़ में सुना है जिसका संगीत खैय्याम साहब ने दिया था और यकीं मानिए हर किसी को यह नज़्म बस इन दोनों के कारण या फिर हमारी आज की फ़नकारा फ़रीदा खानुम के कारण याद है। लेकिन जिस शख्स ने इस नज़्म में अपने दिली जज़्बातों को पिरोया था उसे पूछने वाला कोई नहीं। १९६० की पाकिस्तानी फिल्म "सहेली" का उनका लिखा एक गाना "हम भूल गए हर बात मगर तेरा प्यार नहीं भूले" जिसे संगीत से सजाया था "ए हमीद" ने और आवाज़ दी थी "नसीम बेगम" ने, देखते-देखते हमारी एक फ़िल्म "सौतन की बेटी" में शामिल भी हो गया और स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने अपनी आवाज़ भी दे दी फिर भी हमने यह मालूम करने की कोशिश नहीं की कि यह गाना किसकी लेखनी की उपज है। अगर अभी तक आप उस शायर से अनभिज्ञ हैं तो लीजिए हम हीं बताए देते हैं। उस शायर का नाम है "फ़ैयाज़ हाशमी" जिसने "पैग़ाम", "औलाद", "सहेली", "सवेरा" ,"सवाल" ,"औलाद" और "तौबा" जैसी न जाने कितनी पाकिस्तानी फ़िल्मों में गीत लिखे थे। उनकी लिखी कुछ गज़लें जो उतना नाम न कर सकी, जितने की वो हक़दार थीं: "हमें कोई ग़म नहीं था ग़म-ए-आशिक़ी से पहले", "कम नहीं मेरी ज़िंदगी के लिए" , "ना तुम मेरे, ना दिल मेरा, ना जान-ए-नतावां मेरी", "टकरा हीं गई मेरी नज़र उनकी नज़र से" और "तस्वीर तेरी दिल मेरा बहला नहीं सकती" । इन्हीं गज़लों में कहीं वह शेर भी शामिल है जिसमें उन्होंने दीवानों की हालत का ब्योरा दिया है। आप खुद हीं देखिए:

"फ़ैयाज़" अब आया है जुनूं जोश पे अपना,
हँसता है जमाना, मैं गुजरता हूँ जिधर से।


"आज जाने की जिद न करो"- शायद हीं कोई होगा जिसने इस नज़्म को न सुना हो। और अगर किसी ने न भी सुना हो तो हम किस लिए हैं। लीजिए पेश है वह नज़्म आपकी खिदमत में। मुलाहजा फ़रमाईयेगा:

आज जाने की ज़िद न करो
यूँही पहलू में बैठे रहो
हाय, मर जायेंगे
हम तो लुट जायेंगे
ऐसी बातें किया न करो

तुम ही सोचो ज़रा, क्यों न रोकें तुम्हें?
जान जाती है जब उठ के जाते हो तुम
तुमको अपनी क़सम जान-ए-जाँ
बात इतनी मेरी मान लो
आज जाने की...

वक़्त की क़ैद में ज़िंदगी है मगर
चंद घड़ियाँ यही हैं जो आज़ाद हैं
इनको खोकर कहीं, जान-ए-जाँ
उम्र भर न तरसते रहो
आज जाने की...

कितना मासूम रंगीन है ये समा
हुस्न और इश्क़ की आज में राज है
कल की किसको खबर जान-ए-जाँ
रोक लो आज की रात को
आज जाने की...




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

मुझे पिला रहे थे वो कि खुद ही शम्मा बुझ गयी,
___ गुम, शराब गुम, बड़ी हसीन रात थी....


आपके विकल्प हैं -
a) सुराही, b) पैमाना, c) जाम, d) गिलास

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था "लुत्फ़" और शेर कुछ यूं था -

मुद्दत के बाद उस ने जो की लुत्फ़ की निगाह,
जी खुश तो हो गया मगर आंसू निकल पड़े..

सही जवाब के साथ साथ शरद जी ने जो शेर सुनाया वो भी गजब का था -

अपनी बातों में असर पैदा कर तू समन्दर सा जिगर पैदा कर
जीस्त का लुत्फ़ जो लेना हो ’शरद’,एक बच्चे सी नज़र पैदा कर...

नीलम जी धन्येवाद आपके वापस आने का, आपके शेर कुछ यूं था -

लुत्फ़ कोई भी रहा अब है न जीने में मजा
जाने वाला दे गया जाते हुए ऐसी सजा

क्या नीलम जी, अब लुत्फ़ जैसे शब्द पर भी इतना उदासी भरा शेर :). मंजू जी ने फ़रमाया-

मुद्दतों के बाद मन के आंगन में लुत्फ़ के बादल छाए
संदेश पिया के आने का कजरारे बादल लाए...

अदा जी ने खूब कहा -

लुत्फ़ जो उसके इंतज़ार में है
वो कहाँ मौसम-ए-बहार में है..

कुलदीप जी ये शेर कैफी साहब का है..आपने हमेशा की तरह बहुत शानदार शेर याद दिलाये, खासकर ये -

ज़िन्दगी का लुत्फ़ हो उड़ती रहे हरदम 'रिआज़'
हम हों शीशे की परी हो घर परीखाना रहे

वाह...रचना जी मगर कुछ यूं उदास दिखी -

लुत्फ़ सूरज के निकलने का उठा रहे थे
चाँद को दर्द ढलने का बता रहे थे

चलिए तो आप सब भी जिंदगी के लुत्फ़ यूहीं उठाते रहें इस दुआ के साथ अगली महफिल तक के लिए विदा कहते हैं और आपको छोड़ जाते हैं शमिख फ़राज़ जी के याद दिलाये फैज़ के इस शेर के साथ -

बहुत मिला न मिला ज़िन्दगी से ग़म क्या है
मता-ए-दर्द बहम है तो बेश-ओ-कम क्या है
हम एक उम्र से वाक़िफ़ हैं अब न समझाओ
के लुत्फ़ क्या है मेरे मेहरबाँ सितम क्या है...

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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