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Friday, October 2, 2009

अल्लाह भी है मल्लाह भी....लता के स्वरों में समायी है सारी खुदाई ..साथ में सलाम है अनिल बिश्वास दा को भी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 220

ता मंगेशकर के गाए कुछ बेहद पुराने, भूले बिसरे, और दुर्लभ नग़मों को सुनते हुए आज हम आ पहुँचे हैं इस ख़ास शृंखला 'मेरी आवाज़ ही पहचान है' की अंतिम कड़ी में। पिछले नौ दिनों आप ने नौ अलग अलग संगीतकारों की धुनों पर लता जी की सुरीली आवाज़ सुनी, आज जिस संगीतकार की रचना हम पेश करने जा रहे हैं वो एक ऐसे संगीतकार हैं जिन्हे फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के संगीतकारों का भीष्म पितामह कहा जाता है। आप हैं अनिल बिस्वास (विश्वास)। एक बार जब उन्हे किसी ने फ़िल्मी संगीतकारों का भीष्म पितामह कह कर संबोधित किया तो उन्होने उसे सुधारते हुए कहा था कि 'R.C. Boral is the father of film music directors, I am only the uncle'| यह सच ज़रूर है कि न्यु थियटर्स के आर. सी. बोराल, तिमिर बरन, पंकज मल्लिक, के. सी. डे जैसे संगीतकारों ने फ़िल्मों में सुगम संगीत की नींव रखी, लेकिन जब सुनहरे युग की बात चलती है तो उसमें अनिल बिस्वास का ही नाम सब से पहले ज़हन में आता है। ख़ैर, इस पर हम फिर कभी बहस करेंगे, आज ज़िक्र लता जी और अनिल दा का। अनिल दा उन संगीतकारों में से हैं जिन्होने लता जी से उनके शुरुआती दिनों में कई गीत गवाए थे। इससे पहले कि हम आज के गीत का ज़िक्र छेड़ें, प्रस्तुत है अनिल बिस्वास के उद्‍गार लता जी के बारे में और उन बीते हुए सुनहरे दिनों के बारे में। यह अमीन सायानी के एक इंटरव्यू का एक अंश है दोस्तों, जिसे बरसों पहले रिकार्ड किया गया था - "किसी से मैने पूछा था 'देखो मैं सुनता हूँ टीवी पर, बहुत ख़ूबसूरत आवाज़ें आ रहीं हैं आजकल, दो तीन आवाज़ें मुझे बहुत पसंद आई, लेकिन क्या वजह है कि लोगों को चान्स नहीं देते हो?' तो उस साहब ने कहा कि 'समय किसके पास है साहब? वो तो लता दीदी आती हैं और रिहर्सल विहर्सल कुछ नहीं करती हैं और गाना वहीं सुन लेती हैं और रिकार्ड हो जाता है, सब कुछ ठीक हो जाता है'। तो रिहर्सल लेने के लिए इन लोगों के पास समय नहीं है। और हमारे साथ तो ऐसी बात हुई कि लता दीदी ने ही, उनके पास भी समय हुआ करता था रिहर्सल देने के लिए और एक गाना शायद आपको याद होगा, जो चार ख़याल मैने पेश किए थे फ़िल्म 'हमदर्द' में, "ऋतू आए ऋतू जाए", १५ दिन बैठके लता दी और मन्ना दादा, १५ दिन बैठके उसका प्रैक्टिस किया था।"

आज जिस गीत के ज़रिए हम लता जी और अनिल दा के सुरीले संगम को याद करने जा रहे हैं वह गीत है १९५४ की फ़िल्म 'मान' का। अजीत, चित्रा, जागिरदार और कमलेश कुमारी अभिनीत यह फ़िल्म कामयाब नहीं रही और इसके गीतों को भी लोगों ने समय के साथ साथ भुला दिए। इस फ़िल्म में लता जी का गाया एक बहुत ही सुंदर भक्ति रचना है "अल्लाह भी है मल्लाह भी है, कश्ती है कि डूबी जाती है", जिसे गीतकार कैफ़ भोपाली ने लिखा था। कैफ़ भोपाली का नाम याद आते ही याद आते हैं फ़िल्म 'पाक़ीज़ा' के दो गीत "तीर-ए-नज़र देखेंगे" और "चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो"। कैफ़ साहब बहुत ज़्यादा गीत फ़िल्मों में नहीं लिखे, लेकिन जितने भी लिखे उनमें अपने स्तर को कभी गिरने नहीं दिया। 'दाएरा', 'डाकू', 'शंकर हुसैन', 'मान' और 'पाक़ीज़ा' जैसी फ़िल्मों में उन्होने गीत लिखे हैं। फ़िल्म 'मान' के प्रस्तुत गीत में अल्लाह और मल्लाह का बहुत ही सुंदर इस्तेमाल करते हुए कैफ़ साहब नायिका की ज़ुबाँ से ये कहने की कोशिश कर रहे हैं कि लाख कोशिशें करने के बावजूद (जिस तरह मल्लाह अपनी नाव को डूबने से बचाने का हर संभव प्रयास करता है) और लाख ईश्वर पर भरोसा होने के बावजूद भी दिल की नैय्या डूबती जा रही है। "इक शमा घिरी है आंधी में, बुझती भी नहीं जलती भी नहीं, शमशीर-ए-मोहब्बत क्या कहिए, रुकती भी नहीं चलती भी नहीं, मजबूर मोहब्बत रह रह कर हर साँस ठोकर खाती है"। तो दोस्तों, यह गीत सुनिए और इसी के साथ लता जी पर केन्द्रित इस विशेष शृंखला 'मेरी आवाज़ ही पहचान है' का यहीं पर समापन होता है, हालाँकि लता जी के गाए सदाबहार गीत 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर युंही जारी रहेंगे, लेकिन उनके गाए भूले बिसरे १० गीतों की यह माला आज यहाँ पूरी हो रही है। और इस गीतमाला को रचने में नागपुर निवासी अजय देशपाण्डे जी का बहुत ही सराहनीय योगदान रहा, जिन्होने लता जी के गाए इन १० गीतों को चुनकर हमें भेजा। उनके सहयोग के बिना इन गीतों को आप तक पहुँचाना हमारे लिए संभव नहीं होता। तो एक बार फिर से अजय जी को धन्यवाद देते हुए आज के लिए हम विदा लेते हैं, फिर मिलेंगे अगर ख़ुदा लाया तो!



अल्लाह भी है मल्लाह भी है
अल्लाह भी है मल्लाह भी है
कश्ती है कि डूबी जाती है
अल्लाह भी है मल्लाह भी है

हम डूब तो जाएंगे लेकिन
दोनों ही पे तोहमत आती है
अल्लाह भी है मल्लाह भी है

इक शमा घिरी है आंधी में
बुझती भी नही जलती भी नही
शमशीर -ए -मोहब्बत क्या कहिये
रुकती भी नही चलती भी नही
मजबूर मोहब्बत रह रह कर
हर सांस ठोकर खाती है
अल्लाह भी है मल्लाह भी है

एक ख्वाब नज़र सा आया था
कुछ देख लिया कुछ टूट गया
एक तीर जिगर पर खाया था
कुछ डूब गया कुछ टूट गया
कुछ डूब गया कुछ टूट गया
क्या मौत की आमद आमद है
क्या मौत की आमद आमद है
क्यूँ नींद सी आयी जाती है
अल्लाह भी है मल्लाह भी है

और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. इस महागायक ने जीता है इस वर्ष का दादा साहब फाल्के सम्मान जिसकी आवाज़ में है कल का गीत.
२. दस राग पर आधारित दस शानदार गीत होंगें अगले १० एपिसोड्स में, कल का राग है -अहिरभैरव.
३. एक अंतरे की अंतिम पंक्ति में शब्द है -"उमर".

पिछली पहेली का परिणाम -

पूर्वी जी ४० अंकों तक पहुँचने की जबरदस्त बधाई, बस अब आप १० अंक पीछे हैं, लता वाली सीरीस और बोनस अंकों का सही फायदा आपने ही उठाया.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, April 5, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (1)

सुनिए १९४९ में आयी फिल्म "बाज़ार" से लता के कुछ दुर्लभ गीत

रविवार की अलसाई सुबह का आनंद और बढ़ जाता है जब सुबह सुबह की कॉफी के साथ कुछ ऐसे दुर्लभ गीत सुनने को मिल जाएँ जिसे कहीं गाहे बगाहे सुना तो था, पर फिर कभी सुनने का मौका नहीं मिला -

एक पुराना मौसम लौटा , यादों की पुरवाई भी,
ऐसा तो कम ही होता है, वो भी हो तन्हाई भी...

चलिए आपका परिचय कराएँ आवाज़ के एक संगीत प्रेमी से. अजय देशपांडे जी नागपुर महाराष्ट्र में रहते हैं, आवाज़ के नियमित श्रोता हैं और जबरदस्त संगीत प्रेमी हैं. लता मंगेशकर इनकी सबसे प्रिय गायिका है, और रोशन साहब को ये संगीतकारों में अव्व्वल मानते हैं. मानें या न मानें इनके पास १९३५ से लेकर १९६० तक के लगभग ८००० गीतों का संकलन उपलब्ध है, जाहिर है इनमें से अधिकतर लता जी के गाये हुए हैं. आवाज़ के श्रोताओं के साथ आज वो बंटाना चाहते हैं १९४९ में आई फिल्म "बाज़ार" से लता और रफी के गाये कुछ बेहद मधुर गीत. फिल्म "बाज़ार" में संगीत था श्याम सुंदर का, दरअसल १९४९ का वर्ष श्याम सुंदर के लिए सर्वश्रेष्ठ रहा, "बाज़ार" के आलावा "लाहौर" में भी उनका संगीत बेहद लोकप्रिय हुआ. हालाँकि उनके काम को तो १९४५ में आई फिल्म "गाँव की गोरी" के बाद से ही सराहना मिलनी शुरू हो चुकी थी पर "बाज़ार" में आया लता की आवाज़ में गीत "साजन की गलियां छोड़ चले..." शायद उनके कैरियर का सर्वोत्तम गीत था. लता के भी अगर सर्वश्रेष्ठ गीतों की बात की जाए तो इस गाने का जिक्र अवश्य किया जायेगा. श्याम सुंदर ने इसके बाद "कमल के फूल", "काले बादल", "ढोलक" और १९५३ में आई "अलिफ़ लैला" में भी एक से एक हिट गीत दिए. उनके संगीत पर किसी परंपरा या जमाने का असर नहीं था. उनकी शैली पूर्णतया मौलिक थी, और धुनों में जो मिठास थी वो अदभुत ही थी.

"बाज़ार" के इन दुर्लभ गीतों को सुनने से पहले ज़रा उन गीतों की फेहरिस्त देखिये जो श्याम सुंदर के मधुर संगीत से रोशन हुई - "ज़रा सुन लो...", "शहीदों तुमको मेरा सलाम... "(बाज़ार), "बैठी हूँ तेरी याद में...", "किस तरह भूलेगा दिल..."(गाँव की गोरी), "बहारें फिर भी आयेंगीं..", "युहीं रोता हुआ दिल...", "टूटे हुए अरमानों की..."(लाहौर), "खामोश क्यों हो तारों..."(अलिफ़ लैला), "चोरी चोरी आग सी दिल में..."(ढोलक). दोस्तों ऐसे गीत आजकल कहीं सुनने को नहीं मिल पाते. पर आवाज़ की अब ये कोशिश रहेगी कि इन दुर्लभ मोतियों को आप तक निरंतर पहुंचाए. इस कार्य में हमें आपका भी सहयोग चाहिए. आप भी अपने संकलन से कुछ दुर्लभ गीत हमें भेजें और अन्य श्रोताओं के साथ बांटे.

अब सुनिए फिल्म "बाज़ार" से ये दुर्लभ गीत -

साजन की गलियां छोड़ चले...


ऐ मोहब्बत उनसे...


बसा लो अपनी निगाहों में...


ऐ दिल उनको याद न करना...


यदि कोई गीत, खास कर लता जी का गाया (1940-1960)आप सुनना चाहते हैं तो हमें लिखे हम आपका सन्देश अजय जी तक अवश्य पहुंचाएंगे.



"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.


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