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Sunday, January 14, 2018

वर्ष के महाविजेता - 2 : SWARGOSHTHI – 352 : MAHAVIJETA OF THE YEAR - 2




स्वरगोष्ठी – 352 में आज

महाविजेताओं की प्रस्तुतियाँ – 2

संगीत पहेली के महाविजेताओं क्षिति, हरिणा और प्रफुल्ल की प्रस्तुतियों से अभिनन्दन





क्षिति तिवारी
डी.हरिणा माधवी
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का नए वर्ष के दूसरे अंक में कृष्णमोहन मिश्र की ओर से हार्दिक अभिनन्दन है। पिछले अंक में हमने आपसे ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के बीते वर्ष की कुछ विशेष गतिविधियों की चर्चा की थी। साथ ही पहेली के चौथे और पाँचवें महाविजेता डॉ. किरीट छाया और विजया राजकोटिया से आपको परिचित कराया था और उनकी प्रस्तुतियों को भी सुनवाया था। इस अंक में भी हम गत वर्ष की कुछ अन्य गतिविधियों का उल्लेख करने के साथ ही संगीत पहेली के प्रथम, द्वितीय और तृतीय महाविजेताओं की घोषणा करेंगे और उनका सम्मान भी करेंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ के पाठक और श्रोता जानते हैं कि इस स्तम्भ के प्रत्येक अंक में संगीत पहेली के माध्यम से हम हर सप्ताह भारतीय संगीत से जुड़े तीन प्रश्न देकर पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए आपसे कम से कम दो प्रश्नों का उत्तर पूछते हैं। आपके दिये गये सही उत्तरों के प्राप्तांकों की गणना दो स्तरों पर की जाती है। ‘स्वरगोष्ठी’ की दस-दस कड़ियों को पाँच सत्रों (सेगमेंट) में बाँट कर और फिर वर्ष के अन्त में सभी पाँच सत्रों के प्रतिभागियों के प्राप्तांकों की गणना की जाती है। वर्ष 2017 की संगीत पहेली में अनेक प्रतिभागी नियमित रूप से भाग लेते रहे। 349वें अंक की पहेली के परिणाम आने तक शीर्ष के पाँच महाविजेता चुने गए। चौथे और पाँचवें महाविजेता का सम्मान हम पिछले अंक में कर चुके हैं। आज के अंक में हम प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान के महाविजेताओं क्रमशः, क्षिति तिवारी, हरिणा माधवी और प्रफुल्ल पटेल का अभिनन्दन करेंगे और उनकी प्रस्तुतियाँ सुनवाएँगे।



र्ष 2017 की संगीत पहेली में सर्वाधिक 98 अंक अर्जित कर मध्यप्रदेश की क्षिति तिवारी ने प्रथम महाविजेता होने का सम्मान प्राप्त किया है। यह तथ्य भी रेखांकन के योग्य हैं कि सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाली दोनों प्रतिभागी महिलाएँ हैं और संगीत की कलाकार और शिक्षिका भी है। संगीत पहेली में प्रथम महाविजेता होने का सम्मान प्राप्त करने वाली जबलपुर, मध्यप्रदेश की श्रीमती क्षिति तिवारी की संगीत शिक्षा लखनऊ और कानपुर में सम्पन्न हुई। लखनऊ के भातखण्डे संगीत महाविद्यालय से गायन में प्रथमा से लेकर विशारद तक की परीक्षाएँ उत्तीर्ण की। बाद में इस संस्थान को विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त हुआ, जहाँ से उन्होने संगीत निपुण और उसके बाद ठुमरी गायन मे तीन वर्षीय डिप्लोमा भी प्राप्त किया। इसके अलावा कानपुर के वरिष्ठ संगीतज्ञ पण्डित गंगाधर राव तेलंग जी के मार्गदर्शन में खैरागढ़, छत्तीसगढ़ के इन्दिरा संगीत कला विश्वविद्यालय की संगीत स्नातक और स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। क्षिति जी के गुरुओं में डॉ. गंगाधर राव तेलंग के अलावा पण्डित सीताशरण सिंह, पण्डित गणेशप्रसाद मिश्र, डॉ. सुरेन्द्र शंकर अवस्थी, डॉ. विद्याधर व्यास और श्री विनीत पवइया प्रमुख हैं। क्षिति को स्नातक स्तर पर भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से ग्वालियर घराने की गायकी के अध्ययन के लिए छात्रवृत्ति भी मिल चुकी है। कई वर्षों तक लखनऊ के महिला कालेज और जबलपुर के एक दिवयांग बच्चों के विद्यालय मे माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों को संगीत की शिक्षा देने के बाद वर्तमान में जबलपुर के ‘महाराष्ट्र संगीत महाविद्यालय’ में संगीत गायन की शिक्षिका के पद पर कार्यरत हैं। ध्रुपद, खयाल, ठुमरी और भजन गायन के अलावा उन्होने प्रोफेसर कमला श्रीवास्तव से गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत लोक संगीत भी सीखा है, जिसे अब वह अपने विद्यार्थियों को बाँट रही हैं। क्षिति जी कथक नृत्य और नृत्य नाटिकाओं में गायन संगति की विशेषज्ञ हैं। सुप्रसिद्ध नृत्यांगना और भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय की प्रोफेसर कुमकुम धर और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कला संकाय की प्रोफेसर और नृत्यांगना विधि नागर के कई कार्यक्रमों में अपनी इस प्रतिभा का प्रदर्शन कर चुकी हैं। आज के इस विशेष अंक में क्षिति तिवारी राग देश में निबद्ध एक चतुरंग प्रस्तुत कर रही हैं। संगीत के चार विभिन्न अंगों के समावेश से युक्त गीत को चतुरंग कहते हैं। तीनताल में निबद्ध इस चतुरंग के बोल हैं- “डारत मोपे रंग देखो बार बार...”। इस प्रस्तुति में तबले पर सोमनाथ सोनी और हारमोनियम पर अभिषेक पडवार ने संगति की है। लीजिए, अब आप यह चतुरंग सुनिए और प्रथम महाविजेता क्षिति तिवारी का अभिनन्दन कीजिए।

राग देश : चतुरंग : “डारत मोपे रंग देखो बार बार...” : क्षिति तिवारी


‘स्वरगोष्ठी’ की संगीत पहेली 2017 में 96 अंक प्राप्त कर चौथी महाविजेता बनीं हैं, हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी। हम उन्हें सहर्ष सम्मानित करते हैं। “संगीत जीवन का विज्ञान है”, इस सिद्धान्त को केवल मानने वाली ही नहीं बल्कि अपने जीवन में उतार लेने वाली हरिणा जी दो विषयों की शिक्षिका का दायित्व निभा रही हैं। हैदराबाद के श्री साईं स्नातकोत्तर महाविद्यालय में विगत 16 वर्षो से स्नातक और स्नातकोत्तर कक्षाओं को लाइफ साइन्स पढ़ा रही हैं। इसके साथ ही स्थानीय वासवी कालेज ऑफ म्यूजिक ऐंड डांस से भी उनका जुड़ाव है, जहाँ विभिन्न आयुवर्ग के विद्यार्थियों का मार्गदर्शन भी करती हैं। हरिणा जी को प्रारम्भिक संगीत शिक्षा अपनी माँ श्रीमती वाणी दुग्गराजू से मिली। आगे चल कर अमरावती, महाराष्ट्र के महिला महाविद्यालय की संगीत विभागाध्यक्ष श्रीमती कमला भोंडे से विधिवत संगीत सीखना शुरू किया। हरिणा जी के बाल्यावस्था के एक और संगीत गुरु एम.वी. प्रधान भी थे, जो एक कुशल तबला वादक भी थे। इनके अलावा हरिणा जी ने गुरु किरण घाटे और आर. डी. जी. कालेज, अकोला के संगीत विभागाध्यक्ष श्री नाथूलाल जायसवाल से भी संगीत सीखा। हरिणा जी ने मुम्बई के अखिल भारतीय गन्धर्व महाविद्यालय से संगीत अलंकार की उपाधि प्राप्त की है। आज के इस विशेष अंक में हम ‘स्वरगोष्ठी के इस अंक के माध्यम से ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी संचालक और सम्पादक मण्डल के सदस्य, शिक्षिका और विदुषी डी. हरिणा माधवी का महाविजेता के रूप में हार्दिक अभिनन्दन करते हैं और आपको हरिणा जी की आवाज़ में राग पूरिया धनाश्री में एक द्रुत खयाल रचना सुनवाते हैं। इस खयाल रचना को हरिणा जी द्रुत एकताल में निबद्ध कर प्रस्तुत कर रही हैं। रचना के बोल हैं, -“बिन देखे चैन नाहीं...”

राग पूरिया धनाश्री : खयाल : “बिन देखे चैन नाहीं...” : डी. हरिणा माधवी



प्रफुल्ल पटेल
पहेली प्रतियोगिता में 94 अंक प्राप्त कर तीसरे महाविजेता बने हैं, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल। भारतीय शास्त्रीय संगीत में गहरी रुचि रखने वाले प्रफुल्ल पटेल न्यूजर्सी, अमेरिका में रहते हैं। साप्ताहिक स्तम्भ, ‘स्वरगोष्ठी’ को पसन्द करने वाले प्रफुल्ल जी शास्त्रीय संगीत के अलावा भारतीय लोकप्रिय संगीत भी रुचि के साथ सुनते हैं। इस प्रकार के संगीत से उन्हें गहरी रुचि है। परन्तु कहते हैं कि उन्हें पाश्चात्य संगीत ने कभी भी प्रभावित नहीं किया। पेशे से इंजीनियर भारतीय मूल के प्रफुल्ल जी पिछले पचास वर्षों से अमेरिका में रह रहे हैं। प्रफुल्ल जी स्वांतःसुखाय हारमोनियम बजाते हैं और स्वयं गाते भी है, किन्तु बताते हैं कि उनकी गायन और वादन का स्तर ‘स्वरगोष्ठी’ में प्रसारित गायन अथवा वादन जैसा नहीं है। जब हमने उनसे उनका गाया अथवा बजाया अथवा उनकी पसन्द का कोई ऑडियो क्लिप भेजने का अनुरोध किया तो उन्होने किसी एक कलाकार को चुनने में असमंजस के कारण संकोच के साथ टाल दिया। ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली में नियमित रूप से भाग लेने वाले प्रफुल्ल जी के संगीत-ज्ञान का अनुमान इस तथ्य से किया जा सकता है कि संगीत पहेली में 94 अंक अर्जित कर उन्होने वार्षिक महाविजेताओ की सूची तीसरे महाविजेता का सम्मान प्राप्त किया है। ‘स्वरगोष्ठी के आज के इस अंक के माध्यम से ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी संचालक और सम्पादक मण्डल के सदस्य, संगीत-प्रेमी प्रफुल्ल पटेल का महाविजेता के रूप में हार्दिक अभिनन्दन करते हैं और अपनी ओर से उनकी अभिरुचि का ध्यान रखते हुए हारमोनियम वाद्य का एकल वादन प्रस्तुत कर रहे हैं। वादक हैं, मिलिन्द कुलकर्णी। हारमोनियम जैसे संगति वाद्य पर श्री कुलकर्णी राग जनसम्मोहिनी में आलाप, जोड़ और झाला प्रस्तुत कर रहे हैं। आप इस मोहक वादन का रसास्वादन कीजिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। इस अंक से हमारी पहेली प्रतियोगिता पुनः आरम्भ हो रही है। आप सभी इसमें भाग लेना न भूलिए।

राग जनसम्मोहिनी : हारमोनियम पर एकल वादन : मिलिन्द कुलकर्णी




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 352वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा दो प्रश्न का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 360वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के प्रथम सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा भी की जाएगी।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की झलक है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 20 जनवरी, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 354वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 350वीं कड़ी में हमने आपके लिए कोई भी पहेली नहीं दी थी। इस अंक और अगले अंक में पहेली न पूछे जाने के कारण हम पहेली का सही हल और विजेताओं के नाम की घोषणा नहीं कर रहे हैं। 354वें अंक से हम इस अंक की पहेली का हल और विजेताओं के नाम पूर्ववत प्रकाशित करेंगे।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक में भी आपने पहेली के महाविजेताओं के संगीत का रसास्वादन किया। अगले अंक से हम एक नई श्रृंखला शुरू कर रहे हैं। इस नई श्रृंखला का शीर्षक होगा “पाँच स्वर के राग”। इस श्रृंखला और आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिय

Sunday, November 22, 2015

आफताब-ए-मौसिकी फ़ैयाज़ खाँ : SWARGOSHTHI – 245 : USTAD FAIYAZ KHAN



स्वरगोष्ठी – 245 में आज

संगीत के शिखर पर – 6 : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ

संगीत जगत के आकाश पर चमकते सूर्य – उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ




रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी सुरमयी श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की छठीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व का उल्लेख और उनकी कृतियों के कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। आज श्रृंखला की छठीं कड़ी में हम आज ‘आफताब-ए-मौसिकी’ अर्थात संगीत जगत के सूर्य के नाम से विख्यात, आगरा रँगीला घराने के सिरमौर गायक उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के व्यक्तित्व और कृतित्व की संक्षिप्त चर्चा कर रहे हैं। आज हम आपको उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वरों में पहले राग तिलंग में नोम-तोम का आलाप, राग ललित में एक द्रुत खयाल और राग भैरवी का एक दादरा सुनवाएँगे।


भारतीय संगीत के प्रचलित घरानों में जब भी आगरा घराने की चर्चा होगी तत्काल एक नाम जो उभर कर हमारे सामने आता है, वह है- आफताब-ए-मौसिकी उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ का। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हम इन्हीं महान गायक कलासाधक को स्मरण कर रहे हैं। पिछली शताब्दी के पूर्वार्द्ध के जिन संगीतज्ञों की गणना हम शिखर-पुरुष के रूप में करते हैं उस्ताद फ़ैयाज़ खान उन्ही में से एक थे। ध्रुवपद-धमार, खयाल-तराना, ठुमरी-दादरा, सभी शैलियों की गायकी पर उन्हें कुशलता प्राप्त थी। प्रकृति ने उन्हें घन, मन्द्र और गम्भीर कण्ठ का उपहार तो दिया ही था, उनके शहद से मधुर स्वर श्रोताओं पर रस-वर्षा कर देते थे। फ़ैयाज़ खाँ का जन्म ‘आगरा रँगीले घराना’ के नाम से विख्यात ध्रुवपद गायकों के परिवार में हुआ था। दुर्भाग्य से फ़ैयाज़ खाँ के जन्म से लगभग तीन मास पूर्व ही उनके पिता सफदर हुसैन खाँ का इन्तकाल हो गया। जन्म से ही पितृ-विहीन बालक को उनके नाना ग़ुलाम अब्बास खाँ ने अपना दत्तक पुत्र बनाया और पालन-पोषण के साथ-साथ संगीत-शिक्षा की व्यवस्था भी की। यही बालक आगे चल कर आगरा घराने का प्रतिनिधि बना और भारतीय संगीत के अर्श पर आफताब बन कर चमका। फ़ैयाज़ खाँ की विधिवत संगीत शिक्षा उस्ताद ग़ुलाम अब्बास खाँ से आरम्भ हुई, जो फ़ैयाज़ खाँ के गुरु और नाना तो थे ही, गोद लेने के कारण पिता के पद पर भी प्रतिष्ठित हो चुके थे। फ़ैयाज़ खाँ के पिता का घराना ध्रुपदियों का था, अतः ध्रुवपद अंग की गायकी इन्हें संस्कारगत प्राप्त हुई। आगे चल कर फ़ैयाज़ खाँ ध्रुवपद के ‘नोम-तोम’ के आलाप में इतने दक्ष हो गए थे कि संगीत समारोहों में उनके समृद्ध आलाप की फरमाइश हुआ करती थी। आइए आपको भी उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वर में राग ‘तिलंग’ में नोम-तोम का आलाप सुनवाते हैं।


राग तिलंग : नोम-तोम आलाप : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ




फ़ैयाज़ खाँ के नाना का घराना खयाल गायकों का था। नाना ने बचपन से ही कठोर रियाज़ कराया। संगीत के घरानों में संगीत-शिक्षा के लिए एक कठोर व्रत का पालन शिष्य से कराया जाता है, जिसे ‘चिल्ला’ कहा जाता है। इस व्रत के अनुसार शिष्य को निरन्तर बारह वर्षों तक प्रतिदिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक संगीत का अभ्यास करना होता है। प्रशिक्षण की इस अवधि में फ़ैयाज़ खाँ ने स्वर-साधना, ध्रुवपद और होरी गायन का कठिन अभ्यास किया। 25 वर्ष की आयु तक वे लोकप्रिय होने लगे थे। उनकी गायकी पर अपने नाना ग़ुलाम अब्बास खाँ के अतिरिक्त तत्कालीन महान गायक नत्थन खाँ, जयपुर के अब्दुल खाँ और सेनिया घराने के अमीर खाँ का भी प्रभाव था। आइए अब हम आपको उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वरों में राग ललित में द्रुत तीनताल का एक खयाल सुनवाते हैं, जिसके बोल हैं –“तड़पत हूँ जैसे जल बिन मीन...”।


राग ललित : ‘तड़पत हूँ जैसे जल बिन मीन...’ : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ




पिछली शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक के चार दशकों तक उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ देश में आयोजित होने वाले संगीत समारोहों के प्राण हुआ करते थे। संगीत-प्रेमियों को सम्मोहित कर लेने की अद्भुत क्षमता उनकी गायकी में थी। उस दौर में उन्हें जनसामान्य की ओर से ‘महफिल के बादशाह’ के नाम से पुकारा जाता था। 1930 के आसपास उस्ताद ने कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर के निवास स्थान जोरासांकों ठाकुरबाड़ी में आयोजित संगीत समारोह में भाग लिया था। समारोह के दौरान वे रवीन्द्रनाथ ठाकुर से अत्यन्त प्रभावित हुए और उन्हें “हिंदुस्तान का सबसे बड़ा शायर” की उपाधि दे दी। अपने प्रभावशाली संगीत से उन्होने देश के सभी संगीत केन्द्रों में खूब यश अर्जित किया। उनकी ख्याति के कारण बड़ौदा राज-दरबार में संगीतज्ञ के रूप में उनकी नियुक्ति हुई। 1938 में उन्हे मैसूर दरबार से “आफताब-ए-मौसिकी” (संगीत के सूर्य) की उपाधि से नवाजा गया। उस्ताद की गायकी में जवारीदार स्वर, राग दरबारी का गान्धार, राग श्री का ऋषभ और अनूठी लयकारी श्रोताओं को सम्मोहित करती थी। बोलतान में गीत की पंक्तियों का चमत्कारिक प्रदर्शन किया करते थे। वे स्वर, भाषा, अर्थ, भाव, लय सभी का भरपूर आनन्द लेकर गाते थे। ध्रुवपद और खयाल गायकी में दक्ष होने के साथ-साथ ठुमरी-दादरा गायन में भी वे अत्यन्त कुशल थे। फ़ैयाज़ खाँ ने कलकत्ता (अब कोलकाता) में भैया गनपत राव और मौजुद्दीन खाँ से ठुमरी-दादरा सुना था और संगीत की इस विधा से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। ठुमरी के दोनों दिग्गजों से प्रेरणा पाकर फ़ैयाज़ खाँ ने इस विधा में भी दक्षता प्राप्त की। खाँ साहब ठुमरी और दादरा के बीच उर्दू के शे’र जोड़ कर चार चाँद लगा देते थे। इसके साथ ही टप्पे की तानों को भी वे ठुमरी गाते समय जोड़ लिया करते थे। उनके द्वारा गायी गई उपशास्त्रीय रचनाओं में- “ना बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी....”, “पानी भरे री कौन अलबेली...” आदि आज भी संगीत प्रेमियों का बीच अत्यन्त लोकप्रिय है। इस आलेख को विराम देने से पहले आइए आपको सुनवाते हैं, उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वर में राग भैरवी में निबद्ध अत्यन्त लोकप्रिय दादरा। खाँ साहब का निधन 5 नवम्बर, 1950 को हुआ था। इसी माह उनकी पुण्यतिथि भी थी, इस अवसर पर हम उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ को समस्त संगीत-प्रेमियों की ओर से श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हुए आज यहीं विराम लेते हैं।


राग भैरवी दादरा : ना बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...’ : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ





 संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 245वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक तंत्र-वाद्य संगीत रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इस संगीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 250 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) के विजेताओं के साथ ही वार्षिक विजेताओं की घोषणा भी की जाएगी।


1 – वाद्ययंत्र पर कौन सा राग बजाया जा रहा है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – यह किस वाद्ययंत्र की आवाज़ है? वाद्य का नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 28 नवम्बर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 247वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


 पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 243वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुविख्यात वायलिन-वादिका डॉ. एन. राजम् का वायलिन पर बजाया राग जोग का एक अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – जोग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – द्रुत तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य – वायलिन या बेला।

इस बार की पहेली के प्रश्नों का सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


 अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ के आज के अंक में हमने आपसे ध्रुपद, खयाल, ठुमरी, दादरा आदि सभी गान-शैली के शिखर पर प्रतिष्ठित उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के व्यक्तित्व और कृतित्व पर संक्षिप्त चर्चा की है। अगले अंक में एक अन्य विधा के शिखर पर प्रतिष्ठित व्यक्तित्व पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला को हमारे अनेक पाठकों ने पसन्द किया है। हम उन सबके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  





Sunday, February 15, 2015

राग ललित और बसन्त में खयाल : SWARGOSHTHI – 207 : KHAYAL RECITAL


स्वरगोष्ठी – 207 में आज

भारतीय संगीत शैलियों का परिचय : 5 : खयाल

राग ललित और बसन्त में आलाप, विलम्बित और द्रुत खयाल



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ की पाँचवीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पाठकों और श्रोताओं के अनुरोध पर आरम्भ की गई इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की उन परम्परागत शैलियों का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे बीच उपस्थित हैं। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से जो भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धांतों के अनुकूल धारा थी उसे स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। पिछली चार कड़ियों में हमने भारतीय संगीत की सबसे प्राचीन और वर्तमान में उपलब्ध संगीत शैली ‘ध्रुपद’ शैली का सोदाहरण परिचय प्रस्तुत किया था। आज के अंक से हम वर्तमान में सबसे लोकप्रिय ‘खयाल’ शैली का परिचय आरम्भ कर रहे हैं। आज के अंक में पुराने उस्तादों- उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ और उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के स्वरों में विलम्बित और द्रुत खयाल के साथ आलाप का उदाहरण भी हम प्रस्तुत करेंगे। आज प्रस्तुत किये जाने वाले राग हैं, ललित और बसन्त। 



भारतीय संगीत में ध्रुपद शैली के बाद जिस शैली का विकास हुआ उसे हम आज की सबसे लोकप्रिय और प्रचलित शैली ‘खयाल’ के नाम से जानते हैं। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक अनेक कारणों से जनरुचि में पर्याप्त बदलाव आ चुका था। संगीत मन्दिरों से निकल कर राजदरबारों में पहले ही स्थापित हो चुका था। ध्रुपद संगीत से प्रभावित होकर सूफी संगीत भी अस्तित्व में आ चुका था। कई विद्वान मानते हैं कि खयाल शैली पर सूफी संगीत का स्पष्ट प्रभाव पड़ा है। ‘खयाल’ शब्द फारसी भाषा का है, जिसका अर्थ ‘कल्पना’ होता है। मध्यकाल में खयाल नामक एक लोक संगीत की शैली भी प्रचलित थी। सम्भव है इस लोक शैली का प्रभाव भी खयाल शैली पर पड़ा हो। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में जौनपुर के सुल्तान हुसैन शाह शर्क़ी को खयाल शैली का प्रवर्तक माना जाता है। अठारहवीं शताब्दी में मुहम्मद शाह रँगीले के दरबारी संगीतज्ञ नियामत खाँ ‘सदारंग’ ने इस शैली को शास्त्रीय संगीत के रूप में प्रतिष्ठित किया। खयाल शैली की भाषा ध्रुपद की भाँति संस्कृतनिष्ठ न होकर तत्कालीन प्रचालित ब्रज, पंजाबी, राजस्थानी, अवधी और भोजपुरी से प्रभावित हुई। इसके अलावा खयाल शैली में सदारंग ने आलाप के महत्त्व को कम करते हुए राग-विस्तार अथवा स्वर-विस्तार को अधिक महत्त्व दिया। खयाल शैली में आलाप का अंदाज़ खयाल अंगों के अनुरूप होता है। आगरा घराने के गायक ध्रुपद जैसा आलाप करते हैं। आज हम आपको खयाल शैली में ध्रुपद अंग जैसा आलाप और एक द्रुत खयाल उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ की आवाज़ में सुनवाते हैं।

भारतीय संगीत के प्रचलित घरानों में जब भी आगरा घराने की चर्चा होगी तत्काल एक नाम जो हमारे सामने आता है, वह है, आफताब-ए-मौसिकी उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ का। पिछली शताब्दी के पूर्वार्द्ध के जिन संगीतज्ञों की गणना हम शिखर-पुरुष के रूप में कराते हैं, उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ उन्ही में से एक थे। ध्रुपद-धमार, खयाल-तराना, ठुमरी-दादरा आदि सभी शैलियों की गायकी पर उन्हें कुशलता प्राप्त थी। प्रकृति ने उन्हें घन, मन्द्र और गम्भीर कण्ठ का उपहार तो दिया ही था, उनके शहद से मधुर स्वर श्रोताओं पर रस की वर्षा कर देते थे। फ़ैयाज़ खाँ का जन्म ‘आगरा रँगीले घराना’ के नाम से विख्यात ध्रुवपद गायकों के परिवार में हुआ था। दुर्भाग्य से फ़ैयाज़ खाँ के जन्म से लगभग तीन मास पूर्व ही उनके पिता सफदर हुसैन खाँ का इन्तकाल हो गया। जन्म से से ही पितृ-विहीन बालक को उनके नाना गुलाम अब्बास खाँ ने अपना दत्तक पुत्र बना लिया और पालन-पोषण के साथ ही संगीत के शिक्षा की व्यवस्था भी की। यही बालक आगे चल कर आगरा घराने का प्रतिनिधि बना और भारतीय संगीत के अर्श पर आफताब बन कर चमका। फ़ैयाज़ खाँ की विधिवत संगीत शिक्षा उस्ताद ग़ुलाम अब्बास खाँ से आरम्भ हुई, जो फ़ैयाज़ खाँ के गुरु और नाना तो थे ही, गोद लेने के कारण पिता के पद पर भी प्रतिष्ठित हो चुके थे। फ़ैयाज़ खाँ के पिता का घराना ध्रुपदियों का था, अतः ध्रुवपद अंग की गायकी इन्हें संस्कारगत प्राप्त हुई। आगे चल कर फ़ैयाज़ खाँ ध्रुवपद के आलाप में इतने दक्ष हो गए थे कि संगीत समारोहों में उनके समृद्ध आलाप की फरमाइश हुआ करती थी। अब हम उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वरों में राग ललित का आलाप और खयाल अंग की एक बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं।

राग ललित : आलाप और बन्दिश : ‘तड़पत हूँ जैसे जल बिन मीन...’ : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ




खयाल गायकी में स्वर-विस्तार की प्रधानता होने के कारण आलाप सीमित हो जाता है। खयाल के शुरुआती दौर में तानों का प्रयोग नहीं होता था। बाद में जब घरानों का निर्माण हुआ तब गायकी में रंजकता और चमत्कार उत्पन्न करने के लिए तानों का प्रचलन हुआ। खयाल में स्थायी और अन्तरा, दो भाग होते हैं। स्थायी में अपेक्षाकृत शब्द कम होते हैं, जिससे ताल के आवर्तन में बोलतानों के गाने में सुविधा रहे। विलम्बित या बड़ा खयाल प्रायः एकताल, तिलवाड़ा, झूमरा, आड़ा चौताल आदि तालों में और मध्य-द्रुत खयाल या छोटा खयाल तीनताल, एकताल, झपताल, रूपक आदि तालों में निबद्ध होते हैं। पखावज के स्थान पर तबला की संगति की जाती है। अब हम आपके लिए विलम्बित और मध्य-द्रुत खयाल का एक उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। अपने समय के सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के स्वरों मे राग बसन्त में विलम्बित और द्रुत खयाल प्रस्तुत है।

उस्ताद अब्दुल करीम खाँ ऐसे गवैये थे जिन्होने सम्पूर्ण भारतीय संगीत का प्रतिनिधित्व किया। वे उत्तर और दक्षिण भारतीय संगीत के बीच एक सेतु थे। उन्होने दक्षिण के कर्नाटक संगीत के कई रागों को उत्तर भारतीय संगीत में शामिल किया और सरगम के विशिष्ट अन्दाज को उत्तर भारत में प्रचलित किया। उनकी कल्पना विस्तृत और अनूठी थी, जिसके बल पर उन्होने भारतीय संगीत को एक नया आयाम और क्षितिज प्रदान किया। इस महान संगीतज्ञ का जन्म उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुजफ्फरनगर जिले में स्थित कैराना नामक कस्बे में वर्ष 1884 में हुआ था। एक संगीतकार परिवार में जन्में अब्दुल करीम खाँ के पिता का नाम काले खाँ था। खाँ साहब के तीन भाई क्रमशः अब्दुल लतीफ़ खाँ, अब्दुल मजीद खाँ और अब्दुल हक़ खाँ थे। जन्म से ही सुरीले कण्ठ के धनी अब्दुल करीम खाँ की सीखने की रफ्तार इतनी तेज थी कि मात्र छः वर्ष की आयु में ही प्रतिष्ठित संगीत सभाओं में गाने लगे थे। उनकी प्रतिभा इतनी विलक्षण थी कि पन्द्रह वर्ष की आयु में बड़ौदा दरबार में गायक के रूप में नियुक्त हो गए थे। वहाँ वे 1899 से 1902 तक रहे और उसके बाद मिरज चले गए। खाँ साहब के स्वरों में जैसी मधुरता, जैसा विस्तार और जैसी शुद्धता थी वैसी अन्य किसी गायक को नसीब नहीं हुई। वे विलम्बित खयाल में लयकारी और बोलतान की अपेक्षा आलाप पर अधिक ध्यान रखते थे। उनके गायन में वीणा की मींड़, सारंगी के कण और गमक का मधुर स्पर्श होता था। रचना के स्थायी और एक अन्तरे में ही खयाल गायन के सभी गुणो का प्रदर्शन कर देते थे। अपने गायन की प्रस्तुति के समय वे अपने तानपूरे में पंचम के स्थान पर निषाद स्वर में मिला कर गायन करते थे। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। आइए, अब हम उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के स्वरों में राग बसन्त में निबद्ध दो खयाल सुनते हैं। विलम्बित एकताल के खयाल के बोल हैं- ‘अब मैंने देखे...’ तथा द्रुत तीनताल की बन्दिश के बोल हैं- ‘फगुआ ब्रज देखन को चलो री...’।

राग बसन्त : विलम्बित खयाल ‘अब मैंने देखे...’ और द्रुत खयाल ‘फगुआ ब्रज देखन...’ : उस्ताद अब्दुल करीम खाँ





संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 207वें अंक की पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन प्रश्नों में से कोई दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 210 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – भारतीय संगीत की यह कौन सी शैली है? शैली का नाम बताइए।

2 – संगीत के इस अंश में किस राग का आभास हो रहा है? राग का नाम बताइए।

3 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 21 फरवरी, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 209वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 205वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको उस्ताद असद अली खाँ का रुद्रवीणा पर बजाये राग आसावरी का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछे थे। आपको इनमे से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। यह हमारे लिए अत्यन्त सुखद था कि सभी प्रतिभागियों ने तीनों प्रश्नों के सही उत्तर दिये। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य रुद्रवीणा, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग आसावरी और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल चौताल। इस बार की पहेली में पूछे गए प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ जारी है। श्रृंखला के आज के अंक से हमने संगीत के खयाल शैली का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं। इस श्रृंखला में आप भी योगदान कर सकते हैं। भारतीय संगीत की किसी शैली पर अपना परिचयात्मक आलेख अपने नाम और परिचय के साथ हमारे ई-मेल पते पर भेज दें। आप अपनी फरमाइश या अपनी पसन्द का आडियो क्लिप भी हमें भेज सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

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