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Saturday, January 28, 2017

चित्रकथा - 4: आशा के बाद ओ. पी. नय्यर की पार्श्वगायिकाएँ


अंक - 4

आशा के बाद ओ. पी. नय्यर की पार्श्वगायिकाएँ


हम कैसे बतायें तक़दीर ने हमको ऐसा मारा..



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं है। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। हमारी दिलचस्पी का आलम ऐसा है कि हम केवल फ़िल्में देख कर या गाने सुनने तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखते, बल्कि फ़िल्म संबंधित हर तरह की जानकारियाँ बटोरने का प्रयत्न करते रहते हैं। इसी दिशा में आपके हमसफ़र बन कर हम आते हैं हर शनिवार ’चित्रकथा’ लेकर। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ के तीसरे अंक में आपका हार्दिक स्वागत है।  

ओ. पी. नय्यर एक ऐसे संगीतकार थे जो शुरु से लेकर अन्त तक अपने उसूलों पर चले, और किसी के भी लिए उन्होंने अपना सर नीचे नहीं झुकाया, फिर चाहे उनकी हाथ से फ़िल्म चली जाए या गायक-गायिकाएँ मुंह मोड़ ले। करीयर के शुरुआती दिनों में ही एक ग़लतफ़हमी की वजह से लता मंगेशकर के साथ जो अन-बन हुई थी, उसके चलते नय्यर साहब ने कभी लता जी के साथ सुलह नहीं किया। और अपने करीयर के अन्तिम चरण में अपनी चहेती गायिका आशा भोसले से भी उन्होंने सारे संबंध तोड़ दिए। आइए आज हम नज़र डाले उन पार्श्वगायिकाओं पर जिनकी आवाज़ का ओ. पी. नय्यर ने अपने गीतों में इस्तमाल किया आशा भोसले से संबंध समाप्त होने के बाद।



संगीतकार ओ. पी. नय्यर की शख़्सियत के बारे में हम सभी जानते हैं। जब दूसरे सभी संगीतकार लता
मंगेशकर से अपने गीत गवाने के लिए व्याकुल थे, तब उन्होंने यह ऐलान कर दिया कि वो लता से कभी नहीं गवाएँगे। राजकुमारी, शम्शाद बेगम और गीता दत्त से अपनी शुरुआती फ़िल्मों के गीत गवाने के बाद नय्यर साहब को मिली आशा भोसले। आशा जी और नय्यर साहब की जोड़ी कमाल की जोड़ी बनी। एक से एक सुपर-डुपर हिट गीत बनते चले गए। लेकिन यह जोड़ी भी टिक नहीं सकी। 70 के दशक के आते आते संगीतकारों की नई पीढ़ी ने फ़िल्म-संगीत जगत में तहल्का मचाना शुरु कर दिया था। कल्याणजी-आनन्दजी, लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल और राहुल देव बर्मन सर्वोच्च शिखर पर पहुँच चुके थे। ऐसे में शंकर जयकिशन, ओ. पी. नय्यर, रवि, चित्रगुप्त आदि संगीतकारों का करीअर ढलान पर आ गया। उधर ओ. पी. नय्यर और आशा भोसले के बीच भी अन-बन शुरु हुई। और कहा जाता है कि जब एक दिन नय्यर साहब ने आशा जी की बेटी वर्षा पर हाथ उठाने की हिमाकत की, उस दिन आशा ने ओ. पी. नय्यर के साथ किसी भी तरह के संबंध में पूर्ण-विराम लगा दिया। उन दिनों ’प्राण जाए पर वचन ना जाए’ फ़िल्म रिलीज़ होने ही वाली थी और इसका "चैन से हमको कभी आपने जीने ना दिया" गीत बेहद लोकप्रिय होने लगा था। ऐसे में आशा जी ने निर्माता-निर्देशक से कह कर इस गीत को फ़िल्म से हटवा दिया। और जब इसी फ़िल्म के लिए नय्यर साहब को इस वर्ष का फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कार मिला, तब घर लौटते वक़्त गाड़ी का शीशा उतार कर यह पुरस्कार उन्होंने बाहर फेंक दिया। नय्यर और आशा का रिश्ता हमेशा-हमेशा के लिए ख़त्म हो गया।

इस घटना के समय नय्यर और आशा एक और फ़िल्म में साथ में काम कर रहे थे। फ़िल्म थी ’टैक्सी
Krishna Kalle
ड्राइवर’। 1973 में प्रदर्शित इस फ़िल्म में तब तक आशा भोसले की आवाज़ में कई गीत रेकॉर्ड हो चुके थे, बस एक गीत रेकॉर्ड होना बाक़ी था। आशा जी से संबंध समाप्त होने के बाद यह आख़िरी गीत नय्यर साहब ने कृष्णा कल्ले से गवाने का निर्णय लिया। गीत के बोल थे "प्यार करते हो यार, करके डरते हो यार"। गीत क्लब-कैबरे जौनर का गीत है। यूं तो कृष्णा कल्ले ने इस गीत को बहुत अच्छा गाया है, पर आशा-नय्यर का वह जादू नहीं चल पाया। कुछ-कुछ इसी तरह के भाव पर आधारित आशा-नय्यर का एक मास्टरपीस गीत रहा है फ़िल्म ’मेरे सनम’ का "ये है रेशमी ज़ुल्फ़ों का अन्धेरा ना घबराइए"। वह असर नय्यर साहब ’टैक्सी ड्राइवर’ के इस गीत में पैदा नहीं कर सके। गायिका कृष्णा कल्ले ने 60 और 70 के दशकों में बहुत से फ़िल्मी गीत गाए, पर उनमें से अधिकतर कम बजट की फ़िल्मों के गीत होने की वजह से ज़्यादा चल नहीं पाए। रफ़ी साहब के साथ उनका गाया 1967 की फ़िल्म ’राज़’ का गीत "सोचता हूँ के तुम्हें मैंने कहीं देखा है" काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। मराठी और कन्नड़ फ़िल्मों में भी उन्होंने कई गीत गाए हैं।


’टैक्सी ड्राइवर’ के बाद ओ. पी. नय्यर के संगीत से सजी अगली फ़िल्म आई ’ख़ून का बदला ख़ून’। 1978
Vani Jayram
की इस फ़िल्म में नय्यर साहब ने एक नहीं बल्कि तीन-तीन गायिकाओं को मौक़ा दिया अपने गीतों को गाने का। ये थीं वाणी जयराम, उत्तरा केलकर और पुष्पा पगधरे। वाणी जयराम का करीअर हिन्दी फ़िल्मों में 1971 में शुरु हुआ जब वसन्त देसाई के संगीत में फ़िल्म ’गुड्डी’ में दो गीत गा कर वो रातों रात मशहूर हो गईं। फिर नौशाद साहब ने उन्हें अपनी 1972 की फ़िल्म ’पाक़ीज़ा’ में "मोरा साजन" और 1977 की फ़िल्म ’आइना’ में आशा भोसले के साथ एक युगल गीत में गवाया। और 1978 में ओ. पी. नय्यर ने उन्हें ’ख़ून का बदला ख़ून’ की मुख्य गायिका के रूप में प्रस्तुत किया और उनसे एक या दो नहीं बल्कि फ़िल्म के सभी आठ गीत गवाए। रफ़ी साहब के साथ गाया "एजी होगा क्या आगे जनाब देखना, अभी तो सवाल है जवाब देखना" क़व्वाली शैली का गीत है जिसमें नय्यर साहब का हस्ताक्षर ऑरकेस्ट्रेशन इन्टरल्युड में साफ़ सुनाई देता है, पर गीत को 70 के दशक के स्टाइल में ढालने की कोशिश की गई है। वाणी जयराम के गाए चार और गीत हैं इस फ़िल्म में; "बड़ा दुख द‍इबे पवन पुरवैया" और "प्यार भरा कजरा अखियों में डालके" मुजरा शैली के गीत हैं। "तुमको दीवाना मेरी जान बनाने के लिए, एक बस एक मोहब्बत की नज़र काफ़ी है" एक क्लब नंबर है। "ज़ुल्फ़ लहराई तो सावन का महीना आ गया" में नय्यर साहब की वही 60 के दशक के गीतों की छाया नज़र आई, पर कुल मिला कर इस फ़िल्म में वाणी जयराम की आवाज़ वह कमाल नहीं दिखा सकी जो ’गुड्डी’ में दिखाई थी। गीतों में वह दम नहीं था कि उस दौर के सुपरहिट फ़िल्मों के सुपरहिट गीतों से टक्कर ले पाते।


’ख़ून का बदला ख़ून’ में वाणी जयराम के साथ दो और गायिकाओं की आवाज़ें भी गूंजी। इनमें से एक थीं
Uttara Kelkar
उत्तरा केलकर। इन्होंने हिन्दी फ़िल्मों में बहुत ज़्यादा तो नहीं गाईं, पर मराठी संगीत जगत में इनका नाम हुआ। कहना आवश्यक है कि हिन्दी फ़िल्म जगत में उत्तरा केलकर को पहला अवसर ओ. पी. नय्यर ने ही दिया था ’ख़ून का बदला ख़ून’ में। इस फ़िल्म के तीन गीतों में इनकी आवाज़ सुनाई दी - "घर अपना बंगाल और बम्बई...", "हम यतीमों के जैसा भी संसार..." और "प्यार भरा कजरा अखियों में..."। लेकिन ये तीनों गीत उनकी एकल आवाज़ में नहीं थे, बल्कि वाणी जयराम इनमें मुख्य गायिका थीं, और साथ में थीं पुष्पा पगधरे। इन गीतों ने उत्तरा केलकर को कोई प्रसिद्धी तो नहीं दिलाई, पर हिन्दी फ़िल्म जगत में उनका खाता खुल गया। उन्हें हिन्दी में दूसरा मौका मिला सात साल बाद, 1985 की फ़िल्म ’टारज़न’ में जिसमें बप्पी लाहिड़ी ने उनसे गवाए "मेरे पास आओगे" और "तमाशा बनके आए हैं" जैसे हिट गीत। 1987 में ’डान्स डान्स’ का "आ गया आ गया हलवा आ गया" गीत भी सुपरहिट रहा। ’माँ कसम’, ’अधिकार’, ’सूर्या’, ’पुलिस और मुजरिम’, और ’इनसानियत के देवता’ जैसी फ़िल्मों में उनके गाए गीत नाकामयाब रहे। ओ. पी. नय्यर ने भी फिर कभी उत्तरा केलकर से अपने गीत नहीं गवाए।


वाणी जयराम और उत्तरा केलकर के अलावा ’ख़ून का बदला ख़ून’ में नय्यर साहब ने पुष्पा पगधरे को
Pushpa Pagdhare
भी गाने का मौक़ा दिया था। "घर अपना बंगाल और बम्बई" और "प्यार भरा कजरा अखियों में डाल के" में इन्होंने अपनी आवाज़ मिलाई थी। वैसे यह पुष्पा पगधरे की पहली फ़िल्म नहीं थी। इससे एक साल पहले 1977 में संगीतकार एस. एन. त्रिपाठी ने धार्मिक फ़िल्म ’जय गणेश’ में इन्हें गाने का अवसर दिया था। आशा भोसले, मन्ना डे और महेन्द्र कपूर जैसे सीनियर गायकों के साथ इनकी भी आवाज़ इस ऐल्बम में सुनाई दी थी। 1978 में ही एक और फ़िल्म में पुष्पा की आवाज़ सुनाई दी, यह फ़िल्म थी ’चोर का भाई चोर’। डी. एस. रेउबेन के संगीत में इस फ़िल्म के गाने नहीं चले। इस तीनों फ़िल्मों के पिट जाने की वजह से पुष्पा पगधरे की आवाज़ लोगों तक नहीं पहुँच सकी और पुष्पा गुमनामी में ही रह गईं। ओ. पी. नय्यर ने एक बार फिर उन्हें मौका दिया अपनी अगली ही फ़िल्म ’बिन माँ के बच्चे’ में जो प्रदर्शित हुई थी 1979 में। इस फ़िल्म के कुल छह गीतों में तीन रफ़ी साहब के एकल, दो पुष्पा पगधरे के एकल और एक रफ़ी-पुष्पा डुएट थे। रफ़ी साहब के साथ गाया गीत एक होली गीत था जिसके बोल थे "होली आई रे आई रे होली आई रे, दिल झूम रहे मस्ती में लिए लाखों रंग बहार के"। बदलते दौर में भी अपनी शैली को बरकरार रखने की कोशिश में नाकाम रहे नय्यर साहब और यह होली गीत कोई कमाल नहीं दिखा सकी। पुष्पा पगधरे की एकल गीतों में पहला गीत था "अपनी भी एक दिन ऐसी मोटर कार होगी" और दूसरा गीत था "जो रात को जल्दी सोये और सुबह को जल्दी जागे"। इन गीतों में नय्यर साहब का स्टाइल बरकरार था और एस. एच. बिहारी के लिखे सुन्दर बोलों के होने के बावजूद ये गाने नहीं चले। एक तो दौर बदल चुका था, 80 के दशक में 60 के दशक का स्टाइल भला कैसे हिट होता! और शायद आशा भोसले की आवाज़ होती तो बात कुछ और होती, क्या पता! 1986 की फ़िल्म ’अंकुष’ में "इतनी शक्ति हमें देना दाता" गा कर पुष्पा पगधरे को पहली बार हिन्दी फ़िल्म जगत में ख्याति हासिल हुई। इस फ़िल्म के संगीतकार थे कुलदीप सिंह। ओ. पी. नय्यर ने अपने जीवन की अन्तिम फ़िल्म, 1995 की ’मुक़द्दर की बात’ में एक बार फिर से पुष्पा पगधरे को गवाया था।


1979 में ओ. पी. नय्यर के संगीत निर्देशन में एक और फ़िल्म आई ’हीरा मोती’। इस फ़िल्म में भी रफ़ी
Dilraj Kaur
साहब पुरुष गायक थे, साथ में मन्ना डे भी। पर गायिका के रूप में इस बार उन्होंने चुना दिलराज कौर की आवाज़। शत्रुघन सिन्हा और रीना रॉय पर फ़िल्माया रफ़ी-दिलराज डुएट "होंठ हैं तेरे दो लाल हीरे" पंजाबी शैली का नृत्य गीत है जिसमें दिलराज कौर आशा भोसले के अंदाज़ में गाने की कोशिश करती हैं और कुछ हद तक सफल भी हुई हैं। फ़िल्म अगर चलती तो शायद यह गीत भी चल पड़ता, पर अफ़सोस की बात कि फ़िल्म के ना चलने से इस गीत पर किसी का ध्यान नहीं गया। इस फ़िल्म में एक ख़ूबसूरत क़व्वाली भी थी रफ़ी साहब, मन्ना दा और दिलराज कौर की आवाज़ों में - "ज़िन्दगी लेकर हथेली पर दीवाने आ गए, तीर खाने के लिए बन कर निशाने आ गए"। इस गीत में भी दिलराज कौर का वही आशा वाली अंदाज़ साफ़ महसूस की जा सकती है। शत्रुघन सिन्हा, डैनी और बिन्दू पर फ़िल्माई हुई यह क़व्वाली उस ज़माने में काफ़ी हिट हुई थी। इस फ़िल्म में दिलराज कौर की आवाज़ में तीन एकल गीत भी थे। "तुम ख़ुद को देखते हो सदा अपनी नज़र से" सुन कर नय्यर साहब के कितने ही पुराने गीत याद आ जाते हैं। इस गीत की धुन से मिलती जुलती धुनों का उन्होंने कई बार अपने गीतों में प्रयोग किया है। "यही वह जगह है" गीत से भी इस गीत की ख़ास समानता है। "सौ साल जियो तुम जान मेरी तुम्हें मेरी उमरिया लग जाए" एक हल्का फुल्का जनमदिन गीत है जिसमें हिट होने के सभी गुण थे, बस बदक़िस्मती यही थी कि फ़िल्म पिट गई। अन्तिम गीत "मैं तुझको मौत दे दूँ या आज़ाद कर दूँ, तुझे नई ज़िन्दगी दे दूँ या बरबाद कर दूँ" भी एक सुन्दर रचना है जिसमें मध्य एशियाई संगीत की छाया मिलती है, और गीत के बोलों में ’मेरा गाँव मेरा देश’ के प्रसिद्ध गीत "मार दिया जाए के छोड़ दिया जाए" से समानता मिलती है।


इन चन्द फ़िल्मों में संगीत देने के बाद ओ. पी. नय्यर को यह बात समझ आ गई कि लता मंगेशकर या
S Janaki
आशा भोसले को लिए बग़ैर उन्हें किसी बड़ी फ़िल्म में संगीत देने का अवसर मिलना असंभव है। लता के साथ काम करने का सवाल ही नहीं था और आशा से वो किनारा कर चुके थे, अत: इस इंडस्ट्री से संयास लेना ही उन्होंने उचित समझा। नय्यर साहब अपने मर्ज़ी के मालिक थे, वो किसी के शर्तों पर काम नहीं करते थे, अपने उसूलों के लिए वो अपने परिवार से भी अलग हो गए। 80 के दशक के अन्त तक उन्हें आर्थिक परेशानियों ने भी घेर लिया और ना चाहते हुए भी उन्हें एक बार फिर से इस फ़िल्म जगत में क़दम रखना पड़ा। साल था 1992 और फ़िल्म थी ’मंगनी’। बी. आर. इशारा निर्देशित यह फ़िल्म एक कम बजट की फ़िल्म थी। पार्श्वगायिका के रूप में लिया गया दक्षिण की मशहूर गायिका एस. जानकी को, गायक बने एस. पी. बालसुब्रह्मण्यम। और गीतकार थे क़मर जलालाबादी जिनके साथ नय्यर साहब ने पुराने ज़माने में बहुत काम किया है। लेकिन बात बन नहीं पायी। एस. जानकी की गाई "मैं तो मर के भी तेरी रहूंगी" एक बेहद कर्णप्रिय रचना है जिसे नय्यर साहब ने शास्त्रीय संगीत पर आधारित किया है। एस. जानकी की आवाज़ और अन्दाज़ में आशा जी की झलक मिलती है। इस गीत के इन्टरल्युड में भी उन्होंने कुछ ऐसी आलाप ली हैं जो बिल्कुल आशा-नय्यर के गीतों की याद दिला जाती हैं। नय्यर साहब ने एक साक्षात्कार में यह कहा है कि अगर एस. जानकी विदेश में जाकर नहीं बस जातीं तो उनसे बेहतर गाने वाली पूरे हिन्दुस्तान में नहीं थीं। उन्होंने यहाँ तक कहा कि अगर वो मुंबई में गातीं तो वो शीर्ष की गायिका होतीं। इस फ़िल्म का एक अन्य गीत है "हम कैसे बतायें तक़दीर ने हमको ऐसा मारा" जो नय्यर साहब के जाने-पहचाने तालों पर आधारित है। नय्यर साहब के गीतों की ख़ासियत यह है कि हर गीत में वो अपना हस्ताक्षर छोड़ जाते थे और यह गीत भी एक ऐसा ही गीत है जिसे सुन कर कोई भी बता सकता है कि यह नय्यर साहब का कम्पोज़िशन है।


1992 में ही ओ. पी. नय्यर के संगीत से सजी एक और फ़िल्म आई जिसके गीतों ने ख़ूब लोकप्रियता
Kavita
हासिल की। यह फ़िल्म थी ’निश्चय’। भप्पी सोनी निर्मित इस फ़िल्म में सलमान ख़ान और करिश्मा कपूर के होने की वजह से फ़िल्म लोगों तक पहुँची, और ओ. पी. नय्यर ने भी यह सिद्ध किया कि 90 के दशक में भी उनके संगीत का जादू बरक़रार है। इस फ़िल्म में सलमान की आवाज़ बने अमित कुमार और करिश्मा की आवाज़ बनी कविता कृष्णमूर्ती। इस फ़िल्म में कविता की एकल आवाज़ में "छुट्टी कर दी मेरी" के अलावा अमित-कविता के चार युगल गीत थे - "किसी हसीन यार की तलाश है", "सुन मेरे सजना सुन रे", "नई सुराही ताज़ा पानी पी ले तू जानी" और "देखो देखो तुम हो गया मैं गुम"। ये सभी के सभी गीत बेहद कामयाब रहे और ऐसा लगा जैसे फ़िल्म-संगीत का सुनहरा दौर वापस आ गया है। जब यही बात किसी ने एक साक्षात्कार में नय्यर से कही तो ’निश्चय’ के गीतों की लोकप्रियता से साफ़ इनकार करते हुए नय्यर साहब ने कहा,
"देखिए, इन दो पिक्चरों ने यह बता दिया कि नय्यर साहब, आप जो बनाते हो वो आज चलेगा नहीं, और जो आज बन रहा है वो मैं बना नहीं सकता। तो ग्रेस किस चीज़ में है? विस्डम ऐण्ड ग्रेस? कि आप विथड्रॉ कर लीजिए! बहुत कैसेट बिका था, बहुत बहुत बिका म्युज़िक, पिक्चर रिलीज़ होते ही दोनों ठप्प। तो म्युज़िक भी गया साथ में, पिक्चरों का जनाज़ा निकला और म्युज़िक का भी। उस वक़्त मुझे पैसों की सख़्त ज़रूरत थी, तो मुझे वो तस्वीरें लेनी पड़ी। बेगर्स कान्ट बी चूज़र्स; ज़रूरतमन्द आदमी तो यह नहीं देखेगा कि सब्जेक्ट क्या क्या है, जब ज़रूरतमन्द नहीं था, तब भी नहीं पूछता था मैं कि सबजेक्ट क्या है, कहानी क्या है, कुछ नहीं। मेरा एक ही सब्जेक्ट और एक ही कहानी थी कि रुपया कितना है!"



Ranjana Joglekar
’निश्चय’ के बाद 1994 में एक और फ़िल्म आई ’ज़िद’ जिसमें नय्यर साहब का संगीत एक बार फिर हिट हुआ, पर फ़िल्म के बुरी तरह पिट जाने से फ़िल्म के साथ-साथ फ़िल्म के गीतों का भी जनाज़ा निकल गया। इस फ़िल्म में नय्यर साहब ने कविता कृष्णमूर्ति के अलावा दो और गायिकायों से गीत गवाए। ये गायिकाएँ थीं रंजना जोगलेकर और माधुरी जोगलेकर। मोहम्मद अज़ीज़ और रंजना जोगलेकर की युगल आवाज़ों में "तुझे प्यार कर लूँ यह जी चाहता है" को बेहद सुन्दर तरीके से स्वरबद्ध किया है जिसमें तबले का आकर्षक प्रयोग किया गया है। कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़ में "कोरी गगरिया मीठा पानी" में कोई नई या ख़ास बात नहीं लगी। उपर से हाल ही में फ़िल्म ’निश्चय’ में "नई सुराही ताज़ा पानी" लोग सुन चुके थे। कविता, रंजना और माधुरी जोगलेकर, इन तीनों ने एक साथ आवाज़ें मिलाई "ख़ून-ए-जिगर से हो लिख देंगे हम तो पहला पहला
Madhuri Joglekar
सलाम सँवरिया के नाम"। इस गीत में तीनों गायिकाएँ पूरा गीत साथ में गाती हैं, इसलिए तीनों आवाज़ों का कॉनट्रस्ट बाहर नहीं आया। अगर तीनों गायिकाएँ बारी-बारी गातीं तो शायद कुछ और बात बनती। कुल मिला कर ’ज़िद’ के गाने सुन्दर और कर्णप्रिय होने के बावजूद फ़िल्म के ना चलने से इनकी तरफ़ लोगों ने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। 
और 1995 में ओ. पी. नय्यर के संगीत में ढल कर अन्तिम फ़िल्म लौन्च हुई ’मुक़द्दर की बात’ पर यह फ़िल्म प्रदर्शित नहीं हो सकी। इस फ़िल्म के गाने महेन्द्र कपूर और पुष्पा पगधरे ने गाए। "सोने में सुगन्ध मिलाई गई, तब तेरी काया बनाई गई" एक बेहद सुन्दर युगल गीत है, जो बोल, संगीत और गायन की दृष्टि से उत्तर रचना है। एक और युगल गीत है "क्या यह मुमकिन है हम दोनों मिला करें हर बार, बार बार दुनिया में किसी को कब मिलता है प्यार"। इन गीतों को सुन कर यह बात मन में उठती है कि क्या नय्यर साहब ने ही महेन्द्र कपूर को सबसे ज़्यादा अच्छे गाने दिए हैं! इसी फ़िल्म की एक अन्य सुन्दर रचना है "कैसे ये तारों भरी रात खिली सजना" जो पुष्पा पगधरे की एकल आवाज़ में शास्त्रीय राग में ढल कर बेहद सुन्दर बन पड़ी है। पुष्पा जी की आवाज़ में एक और एकल गीत है "पिया तेरा प्यार मैं तो माँग में सजाऊंगी, जग सारा देखेगा मैं तेरी बन जाऊँगी" जिसमें पंजाबी रंग है और साथ ही इन्टरल्युड में सितार पर शास्त्रीय रंग भी है।

ओ. पी. नय्यर 81 वर्ष की आयु में 28 जनवरी 2007 को इस फ़ानी दुनिया से चले गए। अपने उसूलों के पक्के नय्यर साहब ने कभी अपना सर नहीं झुकाया, फिर चाहे उनके गीत लता और आशा न गाए, उन्होंने कभी किसी के साथ कोई समझौता नहीं किया या किसी के दबाव में नहीं आए। आशा भोसले से अलग होने के बाद उनके गाने कृष्णा कल्ले, वाणी जयराम, पुष्पा पगधरे, उत्तरा केलकर, दिलराज कौर, एस. जानकी, कविता कृष्णामूर्ति, रंजना जोगलेकर और माधुरी जोगलेकर जैसी गायिकाओं ने गाए। गाने सभी उत्कृष्ट बने लेकिन फ़िल्मों के ना चलने से ये गाने भी ठंडे बस्ते में चले गए। 

आपकी बात

’चित्रकथा’ के पिछले अंक में गणतन्त्र दिवस विशेषांक में महेन्द्र कपूर के गाए देशभक्ति फ़िल्मी गीतों पर लेख आप सब ने पसन्द किया, हमें बहुत प्रसन्नता हुई। आँकड़ों के अनुसार इस लेख को करीब 162 पाठकों ने पढ़ा है। ’चित्रकथा’ के पिछले तीन अंकों का अब तक का मिला-जुला रीडरशिप है 580, आप सभी के इस स्नेह और सहयोगिता के लिए हम आपके अत्यन्त आभारी हैं और आशा करते हैं कि भविष्य में यूं ही आप अपना साथ बनाए रखेंगे।

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!


शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, February 2, 2014

बसन्त ऋतु की दस्तक और वाणी वन्दना

  
स्वरगोष्ठी – 153 में आज

पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में ऋतुराज बसन्त का अभिनन्दन 

‘फगवा ब्रज देखन को चलो री...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-रसिकों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों आज संगीत-प्रेमियों की इस गोष्ठी में चर्चा के लिए दो उल्लेखनीय अवसर हैं। आज से ठीक दो दिन बाद अर्थात 4 फरवरी को बसन्त पंचमी का पर्व है। यह दिन कला, साहित्य और ज्ञान की देवी माँ सरस्वती की आराधना का दिन है। इसी दिन प्रकृति में ऋतुराज बसन्त अपने आगमन की दस्तक देते हैं। इस ऋतु में मुख्य रूप से राग बसन्त का गायन-वादन अनूठा परिवेश रचता है। आज के अंक में हम आपके लिए राग बसन्त की एक बन्दिश- ‘फगवा ब्रज देखन को चलो री...’ लेकर उपस्थित हुए हैं। यह रचना आज इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि इसे पण्डित भीमसेन जोशी ने अपना स्वर दिया है। यह तथ्य भी रेखांकन योग्य है कि 4 फरवरी को इस महान संगीतज्ञ की 93वीं जयन्ती भी है। चूँकि इस दिन बसन्त पंचमी का पर्व भी है, अतः आज हम आपको वर्ष 1977 की फिल्म ‘आलाप’ से लता मंगेशकर, येशुदास, दिलराज कौर और मधुरानी का गाया और राग भैरवी में निबद्ध सरस्वती वन्दना भी प्रस्तुत करेंगे। 
 



भारतीय संगीत की मूल अवधारणा भक्ति-रस है। इसके साथ ही इस संगीत में समय और ऋतुओं के अनुकूल रागों का भी विशेष महत्त्व होता है। विभिन्न रागों के परम्परागत गायन और वादन में समय और मौसम का सिद्धान्त आज वैज्ञानिक कसौटी पर खरा उतरता है। बसन्त पंचमी के अवसर पर ऋतुराज बसन्त अपने आगमन की आहट देते हैं। इस ऋतु में मुख्य रूप से राग बसन्त का गायन-वादन हमें प्रकृति के निकट ले जाता है। हमारे परम्परागत भारतीय संगीत में ऋतु प्रधान रागों का समृद्ध भण्डार है। छः ऋतुओं बसन्त और पावस ऋतु मानव जीवन को सर्वाधिक प्रभावित करते हैं। आज के अंक से हम बसन्त ऋतु के राग बसन्त की चर्चा कर रहे हैं। इस मनभावन ऋतु में कुछ विशेष रागों के गायन-वादन की परम्परा है, जिनमें सर्वप्रमुख राग बसन्त है।

यह भी एक सुखद संयोग ही है कि भारतीय संगीत के विश्वविख्यात कलासाधक और सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान ‘भारतरत्न’ से अलंकृत पण्डित भीमसेन जोशी का जन्म भी बसन्त ऋतु में 4 फरवरी, 1922 को हुआ था। दो दिन बाद उनका 93वाँ जन्मदिवस है। सात दशक तक भारतीय संगीताकाश पर छाए रहने वाले पण्डित भीमसेन जोशी का भारतीय संगीत की विविध विधाओं- ध्रुवपद, खयाल, तराना, ठुमरी, भजन, अभंग आदि सभी पर समान अधिकार था। उनकी खरज भरी आवाज़ का श्रोताओं पर जादुई असर होता था। बन्दिश को वे जिस माधुर्य के साथ बढ़त देते थे, उसे केवल अनुभव ही किया जा सकता है। तानें तो उनके कण्ठ में दासी बन कर विचरती थी। संगीत-जगत के सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित होने के बावजूद स्वयं अपने बारे में बातचीत करने के मामले में वे संकोची रहे। आइए भारत के इस अनमोल रत्न की जयन्ती के अवसर पर उन्हीं के गाये राग बसन्त की एक रचना के माध्यम से उनका स्मरण करते हैं, साथ ही ऋतुराज बसन्त का अभिनन्दन भी। लीजिए, आप भी सुनिए- पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में राग बसन्त की तीनताल में निबद्ध यह मनोहारी प्रस्तुति। तबला पर पण्डित नाना मुले और हारमोनियम पर पुरुषोत्तम वलवालकर ने संगति की है।


राग बसन्त : ‘फगवा ब्रज देखन को चलो री...’ : स्वर – पण्डित भीमसेन जोशी




आइए, अब थोड़ी चर्चा राग बसन्त के बारे में कर ली जाए। राग बसन्त ऋतु प्रधान राग है। बसन्त ऋतु में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। अन्य अवसरों पर इस राग को रात्रि के तीसरे प्रहर में गाने-बजाने की परम्परा है। पूर्वी थाट के अन्तर्गत आने वाले इस राग की जाति औडव-सम्पूर्ण होती है, आरोह में पाँच स्वर और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह के स्वर हैं- स ग म॑ ध (कोमल) नि सं, तथा अवरोह के स्वर हैं- सं नि ध प म॑ ग रे स । इस राग में ललित अंग से दोनों मध्यम का प्रयोग होता है। आरोह में ऋषभ और पंचम स्वर वर्जित है। राग बसन्त का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। कभी-कभी संवादी स्वर के रूप में मध्यम का प्रयोग भी होता है। यह एक प्राचीन राग है। ‘रागमाला’ में इसे हिंडोल का पुत्र कहा गया है।

आज का यह अंक हम बसन्त पंचमी पर्व को दृष्टिगत करते हुए प्रस्तुत कर रहे हैं, अतः अब हम आपको राग भैरवी में निबद्ध एक सरस्वती वन्दना सुनवा रहे हैं। वर्ष 1977 में एक फिल्म ‘आलाप’ प्रदर्शित हुई थी। फिल्म के संगीत निर्देशक जयदेव ने राग आधारित कई गीतों का समावेश इस फिल्म में किया था। फिल्म का कथानक संगीत-शिक्षा और साधना पर ही केन्द्रित था। संगीतकार जयदेव ने एक प्राचीन सरस्वती वन्दना- ‘माता सरस्वती शारदा...’ को भी फिल्म में शामिल किया। राग भैरवी में निबद्ध यह वन्दना इसलिए भी रेखांकन योग्य है कि यह युगप्रवर्तक संगीतज्ञ, और भारतीय संगीत के उद्धारक पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर द्वारा स्वरबद्ध परम्परागत सरस्वती वन्दना है, जिसे फिल्म में यथावत रखा गया था। पलुस्कर जी का जन्म 1872 में हुआ था। उन्होने भक्तिगीतों के माध्यम भारतीय संगीत को समाज में प्रतिष्ठित किया था। आइए, सुनते हैं, राग भैरवी, तीनताल में निबद्ध यह वन्दना गीत। इस गीत को लता मंगेशकर, येशुदास, दिलराज कौर और मधुरानी ने स्वर दिया है। आप यह वन्दना गीत सुनिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भैरवी : ‘माता सरस्वती शारदा...’ : फिल्म आलाप : लता मंगेशकर, येशुदास, दिलराज कौर और मधुरानी





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ की 153वीं संगीत पहेली में हम आपको एक पुराने ग्रामोफोन रेकार्ड से वायलिन वादन का एक अंश प्रस्तुत कर रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 160वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – संगीत के इस अंश को सुन कर राग पहचानिए और हमें राग का नाम लिख भेजिए।

2 – किस ताल में यह रचना निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 155वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 151वीं संगीत पहेली में हमने आपको गायन और सितार-वादन की जुगलबन्दी रचना का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग खमाज और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- भजन- ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए...’। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी, चंडीगढ़ से हरकीरत सिंह और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। लखनऊ के चन्द्रकान्त दीक्षित ने केवल दूसरे प्रश्न का ही उत्तर दिया है और वह सही है, अतः उन्हें एक अंक मिलेगा। श्री दीक्षित ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘सिने-पहेली’ के नियमित प्रतिभागी हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली में पहली बार भाग लेने पर हम उनका हार्दिक अभिनन्दन करते हैं। पाँचो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


   
मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज का हमारा यह अंक बसन्त पंचमी पर्व के प्रति समर्पित था। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। आप हमें एक नई श्रृंखला के विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र


Sunday, August 18, 2013

भैरवी के कोमल स्वरों से आराधना

  
स्वरगोष्ठी – 133 में आज

रागों में भक्तिरस – 1

'भवानी दयानी महावाक्वानी सुर नर मुनि जन मानी...'


भारतीय संगीत की परम्परा के सूत्र वेदों से जुड़े हैं। इस संगीत का उद्गम यज्ञादि के समय गेय मंत्रों के रूप में हुआ। आरम्भ से ही आध्यात्म और धर्म से जुड़े होने के कारण हजारों वर्षों तक भारतीय संगीत का स्वरूप भक्तिरस प्रधान रहा। मध्यकाल तक संगीत का विकास मन्दिरों में ही हुआ था, परिणामस्वरूप हमारे परम्परागत संगीत में भक्तिरस की आज भी प्रधानता है। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से हम एक नई श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं, जिसका शीर्षक है- ‘रागों में भक्तिरस’। इस श्रृंखला की प्रथम कड़ी में, मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस नई श्रृंखला में हम आपको विभिन्न रागों में निबद्ध भक्ति संगीत की कुछ उत्कृष्ट रचनाओं का रसास्वादन कराएँगे। साथ ही उन्हीं रागों पर आधारित फिल्मी गीतों को भी हमने श्रृंखला की विभिन्न कड़ियों में सम्मिलित किया है। आज श्रृंखला की पहली कड़ी में हमने आपके लिए राग भैरवी चुना है। इस राग में पहले हम आपको 1977 में प्रदर्शित फिल्म ‘आलाप’ में शामिल, राग भैरवी पर आधारित एक प्रार्थना गीत सुनवाएँगे। इसके साथ ही सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी परवीन सुलताना के स्वरों में देवी-स्तुति से युक्त एक मनमोहक सादरा भी प्रस्तुत करेंगे। 


ज भारतीय उपमहाद्वीप में संगीत की जितनी भी शैलियाँ प्रचलित हैं, इनका क्रमिक विकास प्राचीन वैदिक संगीत से ही हुआ है। जब हम भारतीय संगीत की परम्परा को सामवेद से जोड़ते हैं तब यह प्रश्न उपस्थित होता है कि क्या वैदिकयुग से पहले संगीत नहीं था? वैदिककालीन सभ्यता अपने उच्च शिखर पर थी। परन्तु संगीत की उपस्थिति तो उससे भी पहले थी। जब मानव को भावाभिव्यक्ति की आवश्यकता प्रतीत हुई, तभी उसे ध्वनियों का सहारा लेना पड़ा और तभी शब्दों व संगीत का जन्म हुआ। यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि मानव ने प्रकृति से प्रेरणा पाकर ही संगीत को जन्म दिया। नदियों की कल-कल ध्वनि, पक्षियों के कलरव, सागर की तरंगों और वायु के शीतल झोकों से उपजने वाला नाद हमारे संगीत का आधार बना। मानव ने अपनी प्रसन्नता, आशाएँ, अपेक्षाएँ, इच्छाएँ आदि भावों को व्यक्त करने के लिए ऊँची-नीची ध्वनियों का प्रयोग किया जो कालान्तर में संगीत बना। आगे चल कर यह संगीत सर्वाधिक उन्नत, आर्य संस्कृति का प्रमुख अंग बन गया। चूँकि भारतीय संगीत की परम्परा वैदिककालीन सभ्यता से जुड़ी है, इसीलिए संगीत की विविध शैलियों में आध्यात्म, धर्म और भक्ति के तत्त्व आज भी प्रमुख रूप से उपस्थित हैं। विषय के अनुसार भक्ति संगीत का कई प्रकार से वर्गीकरण किया जा सकता है। भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में वन्दना या प्रार्थना गीतों का सर्वाधिक प्रयोग हुआ है। इस श्रृंखला की आरम्भिक कुछ कड़ियों में हम भक्ति संगीत के इसी स्वरूप पर चर्चा करेंगे।

भारतीय संगीत के कई राग हैं, जिनमें भक्तिरस खूब मुखर हो जाता है। प्रातःकाल गाये-बजाए जाने वाले राग, विशेषतः राग भैरवी, भक्तिरस की अभिव्यक्ति के लिए आदर्श होते हैं। आज के अंक में हम आपके लिए राग भैरवी में निबद्ध भक्तिरस से अभिसिंचित दो रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे। वर्ष 1977 में फिल्म ‘आलाप’ प्रदर्शित हुई थी। फिल्म के संगीत निर्देशक जयदेव ने राग आधारित कई गीतों का समावेश फिल्म में किया था। फिल्म का कथानक संगीत-शिक्षा और साधना पर ही केन्द्रित था। संगीतकार जयदेव ने एक प्राचीन सरस्वती वन्दना- ‘माता सरस्वती शारदा...’ को भी फिल्म में शामिल किया। राग भैरवी में निबद्ध यह वन्दना इसलिए भी रेखांकन योग्य है कि यह युगप्रवर्तक संगीतज्ञ पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर द्वारा स्वरबद्ध परम्परागत सरस्वती वन्दना है, जिसे फिल्म में यथावत रखा गया था। प्रसंगवश यह भी उल्लेखनीय है कि भारतीय संगीत के इस उद्धारक की आज 140वीं जयन्ती है। पलुस्कर जी का जन्म आज के ही दिन वर्ष 1872 में हुआ था। फिल्म ‘आलाप’ में जयदेव ने इस सरस्वती वन्दना को यथावत सम्मिलित किया। आइए, सुनते हैं, राग भैरवी में निबद्ध यह वन्दना गीत। इस गीत को लता मंगेशकर, येशुदास, दिलराज कौर और मधुरानी ने स्वर दिया है।


राग भैरवी : ‘माता सरस्वती शारदा...’ : फिल्म आलाप : तीनताल 


राग भैरवी भक्तिरस की अभिव्यक्ति के लिए एक आदर्श राग है। ‘भारतीय संगीत के विविध रागों का मानव जीवन पर प्रभाव’ विषय पर अध्ययन और शोध कर रहे लखनऊ के जाने-माने मयूर वीणा और इसराज वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र से जब मैंने इस विषय पर चर्चा की तो उन्होने स्पष्ट बताया कि भारतीय रागदारी संगीत से राग भैरवी को अलग करने की कल्पना ही नहीं की जा सकती। यदि ऐसा किया गया तो मानव जाति प्रातःकालीन ऊर्जा की प्राप्ति से वंचित हो जाएगा। राग भैरवी मानसिक शान्ति प्रदान करता है। इसकी अनुपस्थिति से मनुष्य डिप्रेशन, उलझन, तनाव जैसी असामान्य मनःस्थितियों का शिकार हो सकता है। प्रातःकाल सूर्योदय का परिवेश परम शान्ति का सूचक होता है। ऐसी स्थिति में भैरवी के कोमल स्वर- ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद, मस्तिष्क की संवेदना तंत्र को सहज ढंग से ग्राह्य होते है। कोमल स्वर मस्तिष्क में सकारात्मक हारमोन रसों का स्राव करते हैं। इससे मानव मानसिक और शारीरिक विसंगतियों से मुक्त रहता है।

भैरवी के कोमल स्वर मन को शान्ति प्रदान करता है, वहीं भक्तिरस का संचार करने में भी सहायक होता है। अब हम आपको राग भैरवी में निबद्ध एक बेहद लोकप्रिय सादरा सुनवाते हैं। इस रचना के माध्यम से देवी-स्तुति की गई है। इसे अनेक वरिष्ठ कलासाधक अपने-अपने स्वरों से सुसज्जित कर चुके हैं, परन्तु सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी परवीन सुलताना ने अपने पुकारयुक्त स्वरों में जिस प्रकार इसे प्रस्तुत किया है, उससे यह भक्तिरस की अभिव्यक्ति का श्रेष्ठ उदाहरण हो जाता है। यह रचना झपताल में निबद्ध है।


राग भैरवी : ‘भवानी दयानी महा वाक्वानी सुर नर मुनि जन मानी...’ : बेगम परवीन सुलताना : झपताल





आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की 133वीं संगीत पहेली में हम आपको एक द्रुत खयाल का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 140वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – खयाल के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह रचना किस राग में निबद्ध है?

2 – यह खयाल किस ताल में प्रस्तुत किया गया है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 135वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 131वीं संगीत पहेली में हमने आपको एक कजरी गीत का अन्तरा सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- स्थायी की पंक्ति- ‘बरसन लागी बदरिया रूम झूम के...’ और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- स्वर- विदुषी गिरिजा देवी। दोनों प्रश्नो के उत्तर हमारे नियमित प्रतिभागी जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द और जबलपुर की क्षिति तिवारी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से आरम्भ हुई लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ के अन्तर्गत हमने आज की कड़ी में आपको राग भैरवी की दो रचनाओं का रसास्वादन कराया। अगले अंक में हम आपके लिए एक और भक्तिरस प्रधान राग चुनेंगे और उसमें निबद्ध रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के भक्तिरस प्रधान रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र


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