Showing posts with label devotional songs. Show all posts
Showing posts with label devotional songs. Show all posts

Sunday, January 26, 2014

गणतन्त्र दिवस पर विशेष : महात्मा गाँधी का प्रिय भजन



  
स्वरगोष्ठी – 152 में आज

रागों में भक्तिरस – 20

एक भजन जिसे राष्ट्रव्यापी सम्मान मिला 
  
‘वैष्णवजन तो तेने कहिए...’





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल की ओर से सभी पाठकों-श्रोताओं को आज गणतन्त्र दिवस पर हार्दिक बधाई। आज के इस पावन राष्ट्रीय पर्व पर हम अपने साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर प्रस्तुत कर रहे हैं, एक विशेष अंक। आपको स्मरण ही होगा कि ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ जारी है। आज इस श्रृंखला की समापन कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-रसिकों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला के अन्तर्गत हमने भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और कुछ प्रमुख भक्त कवियों की रचनाएँ प्रस्तुत की है। इसके साथ ही उस भक्ति रचना के फिल्म में किये गए प्रयोग भी आपको सुनवाए। श्रृंखला की पिछली 19 कड़ियों में हमने हिन्दी के अलावा मराठी, कन्नड, गुजराती, राजस्थानी, ब्रज, अवधी आदि भाषा-बोलियों में रचे गए भक्तिगीतों का रसास्वादन कराने का प्रयास किया। आज श्रृंखला की समापन कड़ी में राष्ट्रीय पर्व के अवसर पर हम आपसे एक ऐसे भजन पर चर्चा करेंगे, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक लोकप्रियता प्राप्त है। पन्द्रहवीं शताब्दी के भक्तकवि नरसी मेहता का पद- ‘वैष्णवजन तो तेने कहिए...’ महात्मा गाँधी की प्रार्थना सभाओं में गाये जाने के कारण राष्ट्रीय स्तर का गीत बन चुका है। आज हम आपको यह भजन संगीत के वरिष्ठ कलासाधकों, उस्ताद राशिद खाँ, उस्ताद शाहिद परवेज़ और विदुषी एम.एस. शुभलक्ष्मी सहित चौथे दशक की फिल्मों की सुप्रसिद्ध गायिका अमीरबाई कर्नाटकी के  स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। 
 


गुजराती साहित्य के सन्तकवि नरसी मेहता का जन्म गुजरात के जूनागढ़ अंचल में 1414 ई. में हुआ था। उनके कृतित्व की गुणबत्ता से प्रभावित होकर भारतीय साहित्य के इतिहासकारों ने ‘नरसी-मीरा’ के नाम से एक स्वतंत्र काव्यकाल का निर्धारण किया है। पदप्रणेता के रूप में गुजराती साहित्य में नरसी मेहता का लगभग वही स्थान है जो हिन्दी में महाकवि सूरदास का है। उनके माता-पिता का बचपन में ही देहान्त हो गया था। बाल्यकाल से ही साधु-सन्तों की मण्डलियों के साथ भ्रमण करते रहे। यहाँ तक कि एक बार द्वारका जाकर रासलीला के दर्शन भी किए। इस सत्संग का उनके जीवन पर ऐसा गहरा प्रभाव पड़ा कि वे गृहस्थ होते हुए भी हर समय कृष्णभक्ति में तल्लीन रहते थे। नरसी मेहता तत्कालीन समाज में व्याप्त आडम्बर और रूढ़ियों के विरुद्ध संघर्षरत थे। उनके लिए सब बराबर थे। वे छुआ-छूत नहीं मानते थे और हर मानव को बराबर समझते थे। उन्होने हरिजनों की बस्ती में जाकर उनके साथ कीर्तन भी किया करते थे। इससे क्रुद्ध होकर बिरादरी ने उनका बहिष्कार तक कर दिया, पर वे अपने मत से डिगे नहीं। एक जनश्रुति के अनुसार हरिजनों के साथ उनके सम्पर्क की बात सुनकर जब जूनागढ़ के राजा ने उनकी परीक्षा लेनी चाही तो कीर्तन में लीन नरसी मेहता के गले में अन्तरिक्ष से फूलों की माला पड़ गई थी। जिस नागर समाज ने उन्हें बहिष्कृत किया था अन्त में उसी समाज ने उन्हें अपना रत्न माना और आज भी गुजरात में ही नहीं सम्पूर्ण देश में उनकी मान्यता है। भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से अभिसिंचित उनकी कृतियों का एक समृद्ध भण्डार है। उनकी कुछ चर्चित कृतियाँ हैं- सुदामा चरित्र, गोविन्द गमन, दानलीला, चातुरियो, राससहस्त्रपदी, श्रृंगारमाला आदि। अनेक पदों में उन्होने मानव-धर्म की व्याख्या की है। गाँधी जी के प्रिय भजन ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए...’ में भी भक्त नरसी ने सच्चे मानव-धर्म को ही परिभाषित किया है। भजन का मूल पाठ इस प्रकार है-

वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीड परायी जाणे रे। 

पर दुःखे उपकार करे तो ये मन अभिमान न आणे रे।

सकळ लोकमाँ सहुने वन्दे, निन्दा न करे केनी रे। 

वाच काछ मन निश्चळ राखे, धन धन जननी तेनी रे। 

समदृष्टि ने तृष्णा त्यागी, परस्त्री जेने मात रे। 

 जिह्वा थकी असत्य न बोले, परधन नव झाले हाथ रे।

मोह माया व्यापे नहि जेने, दृढ़ वैराग्य जेना मनमाँ रे। 

रामनाम शुं ताळी रे लागी, सकळ तीरथ तेना तनमाँ रे। 

वणलोभी ने कपटरहित छे, काम क्रोध निवार्या रे। 

भणे नरसैयॊ तेनुं दरसन करतां, कुळ एकोतेर तार्या रे॥

‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में आप इस भजन को जुगलबन्दी के रूप में सुनेगे। रामपुर सहसवान गायकी में सिद्ध उस्ताद राशिद खाँ और सितार के इटावा बाज के संवाहक उस्ताद शाहिद परवेज़ की अनूठी जुगलबन्दी में नरसी का यह भजन प्रस्तुत है। इन दोनों कलासाधकों ने भजन के भाव पक्ष को राग खमाज के स्वरों में भलीभाँति सम्प्रेषित किया है। राग खमाज की चर्चा हम इस जुगलबन्दी के बाद करेंगे।



गायन और सितार वादन जुगलबन्दी : ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए...’ : उस्ताद राशिद खाँ और उस्ताद शाहिद परवेज़





महात्मा गाँधी के सर्वप्रिय भजनों में सम्मिलित नरसी मेहता के इस भजन को प्रस्तुत करने के लिए राग खमाज के स्वर सम्भवतः सबसे उपयुक्त है। अधिकतर गायक-वादक कलासाधकों ने भजन ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए...’ को खमाज या मिश्र खमाज में ही प्रस्तुत किया है। पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे द्वारा प्रवर्तित दस थाट के सिद्धान्त का खमाज भी एक थाट है। राग खमाज इसी थाट का आश्रय राग माना जाता है। इसके आरोह में ऋषभ स्वर वर्जित होता है। अवरोह में सभी सात स्वरों का प्रयोग होता है। अर्थात इसकी जाति षाड़व-सम्पूर्ण है। इसके आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। शेष स्वर शुद्ध होते हैं। इस राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद माना जाता है। रात्रि का दूसरा प्रहर इस राग के गायन-वादन के लिए उपयुक्त होता है। राग खमाज श्रृंगार और भक्ति भाव की अभिव्यक्ति के लिए उपयुक्त होता है। इसीलिए अधिकतर ठुमरी गायन में इसी राग का प्रयोग किया जाता है।

अब हम आपको नरसी मेहता का यह भजन विदुषी एम.एस. शुभलक्ष्मी के स्वरों में सुनवाते है। संगीत की दक्षिण और उत्तर भारतीय, दोनों संगीत पद्यतियों में दक्ष, विश्वविख्यात गायिका एम.एस. शुभलक्ष्मी ने अनेक भक्त कवियों की रचनाओं को अपना स्वर देकर अविस्मरणीय कर दिया है। भारत की लगभग सभी भाषाओं में गाने वाली एम.एस. शुभलक्ष्मी को 1988 में भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘भारतरत्न’ से अलंकृत किया गया था। आइए इन्हीं महान गायिका से सुनते हैं, नरसी मेहता का यह पद।



नरसी भजन : ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए...’ : विदुषी एम.एस. शुभलक्ष्मी





गुजराती के भक्तकवि नरसी मेहता के व्यक्तित्व और कृतित्व पर 1940 में फिल्म ‘नरसी भगत’ का निर्माण हुआ था। उस समय के चर्चित गायक-अभिनेता विष्णुपन्त पगनीस ने इस फिल्म में भक्त नरसी की भूमिका की थी। फिल्म में अभिनेत्री दुर्गा खोटे और अमीरबाई कर्नाटकी ने भी गायन-अभिनय किया था। फिल्म के गीतो को शंकरराव व्यास ने संगीतबद्ध किया था। फिल्म में यह भजन विष्णुपन्त पगनीस और अमीरबाई कर्नाटकी ने अलग-अलग गाया था। इस भजन को गाकर अमीरबाई कर्नाटकी को अपार लोकप्रियता मिली थी। फिल्म में गाये अमीरबाई के इस भजन को सुन कर महात्मा गाँधी ने गायिका की प्रशंसा की थी। अब आप यह भजन गायिका अमीरबाई कर्नाटकी के स्वर में सुनिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 





नरसी भजन : ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए...’ : अमीरबाई कर्नाटकी : फिल्म नरसी भगत





   
आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 152वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक महान गायक की आवाज़ में भक्ति रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 160वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – आलाप के इस अंश को सुन कर गायक को पहचानिए और हमे उनका नाम लिख भेजिए।

2 – इस आलाप में आपको किस राग का संकेत प्राप्त हो रहा है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 154वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

   
पिछली पहेली और श्रृंखला के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 150वीं कड़ी में हमने आपको गोस्वामी तुलसीदास के एक पद के गायन का अंश प्रस्तुत कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- गायक दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- दादरा ताल। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी और चण्डीगढ़ से हरकीरत सिंह ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

150वें अंक की पहेली के साथ ही हमारी यह श्रृंखला भी पूरी हुई। इस श्रृंखला में सर्वाधिक 18 अंक लेकर जबलपुर की क्षिति तिवारी ने प्रथम स्थान, 12-12 अंक अर्जित कर हमारे दो प्रतियोगियों, जौनपुर (उत्तर प्रदेश) के डॉ. पी.के. त्रिपाठी और चंडीगढ़ के हरकीरत सिंह ने दूसरा स्थान तथा 5 अंक प्राप्त कर हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने तीसरा स्थान प्राप्त किया है। सभी विजेताओं को हार्दिक बधाई।

   
अपनी बात


   
मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ के अन्तर्गत आज के अंक के साथ ही हमारी यह लघु श्रृंखला भी पूर्ण हुई। हम शीघ्र ही एक नई श्रृंखला के साथ उपस्थित होंगे। इस बीच हम अपने पाठकों/श्रोताओं के अनुरोध पर कुछ अंक जारी रखेंगे। अगले अंक में हम अवसर विशेष को ध्यान में तैयार किया गया अंक प्रस्तुत करने जा रहे हैं। अगले अंक के साथ रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, January 19, 2014

पण्डित पलुस्कर और तुलसी के राम

  
स्वरगोष्ठी – 151 में आज

रागों में भक्तिरस – 19

राम की बाललीला के चितेरे तुलसीदास को पलुस्कर जी ने गाया 

‘ठुमक चलत रामचन्द्र बाजत पैजनिया...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की उन्नीसवीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-रसिकों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और कुछ प्रमुख भक्त कवियों की रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस भक्ति रचना के फिल्म में किये गए प्रयोग भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की पिछली कड़ी में हमने आपको सोलहवीं शताब्दी के कृष्णभक्त कवि सूरदास के एक लोकप्रिय पद- ‘मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो...’ पर सांगीतिक चर्चा की थी। यह पद कृष्ण की माखन चोरी लीला का वात्सल्य भाव से अभिसिंचित है। इसी क्रम में आज की कड़ी में हम राम की बाललीला का आनन्द लेंगे। गोस्वामी तुलसीदास अपने राम को ठुमक कर चलते हुए और पैजनी की मधुर ध्वनि बिखेरते हुए देखते हैं। तुलसीदास के इस पद को भारतीय संगीत के अनेकानेक शीर्षस्थ कलासाधकों स्वर दिया है। परन्तु ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हम आपको यह पद पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर, भजन गायक पुरुषोत्तमदास जलोटा और लता मंगेशकर की आवाज़ों में प्रस्तुत कर रहे हैं। 

 



सोलहवीं शताब्दी के भक्त कवियों में गोस्वामी तुलसीदास शीर्ष स्थान पर विराजमान हैं। आधुनिक काल में सूरदास और तुलसीदास का मूल्यांकन सूर्य और चन्द्र की उपमा से किया जाता है। तुलसीदास की जन्मतिथि और उनके जन्मस्थान के बारे में कई मत हैं। परन्तु एक प्रचलित धारणा के अनुसार उनका जन्म संवत 1554 को वर्तमान उत्तर प्रदेश के बाँदा जनपद के राजापुर नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम आत्माराम दुबे तथा माता का नाम हुलसी था। इनके गुरु बाबा नरहरिदास (नृसिंहदास) थे, जिन्होंने इन्हें दीक्षा दी। इनका अधिकाँश जीवन चित्रकूट, काशी और अयोध्या में बीता। संवत 1631 में अपने अयोध्या प्रवास के दौरान तुलसीदास ने रामचरितमानस का सृजन आरम्भ किया। अभी अरण्य काण्ड की रचना भी न हो पाई थी कि वैष्णवों से विवाद होने के कारण अयोध्या छोड़ कर काशी जाकर निवास करना पड़ा। तुलसीदास श्रीसम्प्रदाय के आचार्य रामानन्द की शिष्य परम्परा में थे। उन्होंने सामाजिक स्थितियों को देखते हुए लोकभाषा में 'रामचरितमानस' की रचना की। उनके साहित्य में वर्णाश्रमधर्म, अवतारवाद, साकार उपासना, सगुणवाद, गो-ब्राह्मण रक्षा, देवादि विविध योनियों का यथोचित सम्मान एवं प्राचीन संस्कृति और वेदमार्ग का मण्डन और साथ ही उस समय के धार्मिक अत्याचारों और सामाजिक दोषों की एवं पन्थवाद की आलोचना भी की है। गोस्वामीजी पन्थ व सम्प्रदाय चलाने के विरोधी थे। उन्होंने भ्रातृप्रेम, स्वराज्य के सिद्धान्त, रामराज्य का आदर्श, अत्याचारों से बचने और शत्रु पर विजयी होने का निदान भी प्रस्तुत किया है। तत्कालीन परिवेश की समस्त शंकाओं का रामचरितमानस में उत्तर है। अकेले इस ग्रन्थ को लेकर यदि गोस्वामी तुलसीदास चाहते तो अपना अत्यन्त विशाल और शक्तिशाली सम्प्रदाय चला सकते थे। परन्तु उन्होने ऐसा नहीं किया। यह एक सौभाग्य की बात है कि आज यही एक ग्रन्थ है, जो साम्प्रदायिकता की सीमाओं को लाँघ कर सारे देश में व्यापक और सभी मत-मतान्तरों को पूर्णतया मान्य है। सबको एक सूत्र में बाँधने का जो कार्य शंकराचार्य ने किया था वही अपने युग में तुलसीदास की प्रवृत्ति साम्प्रदायिक न थी। उनके ग्रन्थों में अद्वैत और विशिष्टाद्वैत का सुन्दर समन्वय उपस्थित है। इसी प्रकार वैष्णव, शैव, शाक्त आदि साम्प्रदायिक भावनाओं और पूजापद्धतियों का समन्वय भी उनकी रचनाओं में पाया जाता है। वे आदर्श समुच्चयवादी सन्त कवि थे। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हम आपको गोस्वामी तुलसीदास का एक पद, जो उनके आराध्य श्रीराम की बाललीला पर केन्द्रित है, सुनवाएँगे। यह पद इस प्रकार है-

ठुमक चलत रामचन्द्र बाजत पैंजनियाँ।

किलकि किलकि उठत धाय, गिरत भूमि लटपटाय,

धाय मातु गोद लेत दशरथ की रानियाँ।

अंचल रज अंग झारि, विविध भाँति सो दुलारि,

तन मन धन वारि वारि कहत मृदु बचनियाँ।

विद्रुम से अरुण अधर, बोलत मुख मधुर मधुर,

सुभग नासिका में चारु, लटकत लटकनियाँ।

तुलसीदास अति आनन्द, देख कर मुखारविन्द,

रघुवर छबि के समान रघुवर छबि बनियाँ।

ठुमक चलत रामचन्द्र, बाजत पैंजनियाँ।

आइए, सबसे पहले गोस्वामी तुलसीदास का यह पद सुप्रसिद्ध गायक पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर जी (डी.वी. पलुस्कर) के स्वरों में सुनते हैं। इस पद के भाव, गायक पलुस्कर जी और प्रस्तुति में मौजूद राग पीलू की चर्चा हम यह पद सुनने के बाद करेंगे।



तुलसी भजन : ‘ठुमक चलत रामचन्द्र बाजत पैंजनियाँ...’ : पण्डित डी.वी. पलुस्कर





तुलसीदास के मानस में श्रीराम मर्यादापुरुषोत्तम के रूप में विराजमान थे। इसीलिए सूरदास के कृष्ण की भाँति श्रृंगार और चंचल भावों को उन्होने विस्तार नहीं दिया है। रामचरितमानस में भी श्रीराम की बाललीलाओं के प्रसंग संक्षिप्त ही हैं। रामचरितमानस के दोहा संख्या 190 में रामजन्म का प्रसंग है। इसके उपरान्त दोहा संख्या 191 के बाद अत्यन्त प्रचलित छन्द- ‘भए प्रगट कृपाला...’ में माता कौशल्या ‘कीजै शिशुलीला...’ का अनुरोध करतीं हैं। यहाँ से लेकर दोहा संख्या 203 तक गोस्वामी जी ने राम सहित चारो भाइयों के विभिन्न संस्कारों का उल्लेख किया है। बाल सुलभ क्रीडा का जितना मोहक चित्रण तुलसीदास ने इस पद में किया है, वैसा अन्यत्र नहीं मिलता।

इस पद का पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर ने भावपूर्ण गायन प्रस्तुत कर अपने पिता पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर की संगीत परम्परा को आगे बढ़ाया है। पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने भक्त कवियों की कृतियों को सरल रागों में बाँध कर समाज में शास्त्रीय संगीत को ग्राह्य और सर्वसुलभ बनाया था। तुलसीदास का यह पद पलुस्कर जी ने चंचल, श्रृंगार और नटखट भाव की सृष्टि करने वाले राग पीलू के स्वरों में प्रस्तुत किया था। इस पद के लिए यह धुन इतनी लोकप्रिय हुई कि परवर्ती प्रायः सभी गायकों ने इसी धुन का अनुसरण किया। राग पीलू काफी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। यह ठुमरी अंग का संकीर्ण राग है। रग भैरवी की तरह रसानुभूति के लिए और रचना के भाव को सम्प्रेषित करने के लिए सभी 12 स्वरों का प्रयोग भी किया जा सकता है। इस राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। गोस्वामी तुलसीदास का यही पद अब हम आपको दो प्रमुख कलासाधकों से सुनवाते हैं। पहले प्रस्तुत है, चर्चित भजन गायक पुरुषोत्तमदास जलोटा की आवाज़ में। पुरुषोत्तमदास जी आज के लोकप्रिय भजन गायक अनूप जलोटा के पिता हैं। यह भजन उन्होने कीर्तन शैली में राग मिश्र पीलू के स्वर के साथ गाया है। इसके बाद आप स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर की आवाज़ में यही भजन सुनेंगे। इनकी गायकी में अधिकतर पलुस्कर जी के स्वर-समूह को स्वीकार किया गया है। आप तुलसीदास के इस पद के रस-भाव की अनुभूति कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।



तुलसी भजन : ‘ठुमक चलत रामचन्द्र बाजत पैंजनियाँ...’ : पुरुषोत्तमदास जलोटा

 




तुलसी भजन : ‘ठुमक चलत रामचन्द्र बाजत पैंजनियाँ...’ : लता मंगेशकर






आजकी पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ की 151वीं संगीत पहेली में हम आपको गायन और सितार वादन की जुगलबन्दी के अन्तर्गत एक बेहद लोकप्रिय भजन का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 160वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि इस रचना में किस राग की झलक है?

2 – यह किस जनप्रिय भजन की धुन है? भजन की केवल आरम्भिक पंक्ति लिख भेजिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 153वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 149वीं संगीत पहेली में हमने आपको सूरदास के एक पद का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग काफी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- एम.एस. शुभलक्ष्मी। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी, चंडीगढ़ से हरकीरत सिंह और बड़ोदरा, गुजरात से हमारे एक नए प्रतिभागी गोविन्द नामदेव ने दिया है। हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी का एक ही उत्तर सही है। पाँचो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।



अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ हमने 20 कड़ियों में प्रस्तुत करने का लक्ष्य निर्धारित किया था। यह इस श्रृंखला की उन्नीसवीं कड़ी थी। आज की कड़ी में हमने आपसे गोस्वामी तुलसीदास के वात्सल्य भाव से परिपूर्ण एक पद का रसास्वादन कराया। अगले अंक में आप एक और भक्तकवि की एक भक्ति-रचना का रसास्वादन करेंगे जिसके माध्यम से अनेक शीर्षस्थ कलासाधकों ने रागों का आधार लेकर भक्तिरस को सम्प्रेषित किया है। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के भक्तिरस प्रधान रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। आप हमें एक नई श्रृंखला के विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, January 12, 2014

पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के दिव्य स्वर में सूरदास का वात्सल्य भाव

 
स्वरगोष्ठी – 150 में आज


रागों में भक्तिरस – 18

कृष्ण की लौकिक बाललीला का अलौकिक चित्रण

‘मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो...’



रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की अठारहवीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-रसिकों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और कुछ प्रमुख भक्तिरस कवियों की रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस भक्ति रचना के फिल्म में किये गए प्रयोग भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की पिछली दो कड़ियों में हमने आपसे पन्द्रहवीं शताब्दी के सन्त कवि कबीर के व्यक्तित्व और उनके एक पद- ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ पर चर्चा की थी। आज के अंक में हम सोलहवीं शताब्दी के कृष्णभक्त कवि सूरदास के एक लोकप्रिय पद- ‘मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो...’ पर सांगीतिक चर्चा करेंगे। सूरदास के इस पद को भारतीय संगीत के अनेकानेक शीर्षस्थ कलासाधकों स्वर दिया है, परन्तु ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के इस अंक में हम आपको यह पद संगीत मार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर, दक्षिण और उत्तर भारतीय संगीत पद्यति में समान रूप से लोकप्रिय गायिका विदुषी एम.एस. शुभलक्ष्मी तथा हिन्दी फिल्मों के पहले सुपर स्टार कुन्दनलाल सहगल की आवाज़ों में प्रस्तुत कर रहे हैं।  


पने शैशवकाल से ही हिन्दी साहित्य और संगीत परस्पर पूरक रहे हैं। नाथ पन्थ के कवियों से लेकर जयदेव और विद्यापति के भक्ति-साहित्य राग-रागिनियों से अभिसिंचित हैं। सोलहवीं शताब्दी के कृष्ण-भक्त कवि सूरदास का तो पूरा साहित्य ही संगीत पक्ष पर अवलम्बित है। सूर-साहित्य के अध्येताओं के लिए यह निश्चय कर पाना कठिन हो जाता है कि उनका साहित्यकार पक्ष अधिक प्रबल है कि संगीतज्ञ का। साहित्य और संगीत, दोनों ही रस और भाव की सृष्टि करने समर्थ है। ‘सूरसागर’ में भावों की जैसी विविधता दिखलाई देती है, वह अन्य किसी कवि की रचनाओं में दुर्लभ ही है। किस राग अथवा स्वर समूह से किस रस की सृष्टि की जा सकती है, यह सूरदास को ज्ञात था। कृष्ण की बाललीला हो या गोपियों का विरह प्रसंग, सूरदास ने भाव के अनुकूल ही रागों का चयन किया है। प्रत्येक राग किसी न किसी रस विशेष की अभिव्यक्ति करता है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद के पहले दशक में रेडियो से प्रसारित एक साक्षात्कार में कविवर सुमित्रानन्दन पन्त के यह पूछने पर कि “विशेष रस के लिए विशेष राग होते हैं, क्या यह सत्य है?” संगीत मार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर का उत्तर था- “यह नितान्त सत्य है। प्रत्येक राग विशेष रस के लिए होता है। हमें यह तथ्य प्रकृति से ही प्राप्त है। उच्चारण भेद से, आवाज़ के लगाव से, उसकी फ्रिक्वेन्सी के भिन्न-भिन्न रेशों के द्वारा भिन्न-भिन्न परिणाम आ सकते हैं”

सबसे पहले सूरदास का लोकप्रिय पद ‘मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो...’ आप संगीत मार्तण्ड, अर्थात भारतीय संगीत जगत के सूर्य पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर से ही सुनेगे। 24 जून, 1897 को तत्कालीन बड़ौदा राज्य के जहाज नामक गाँव में एक ऐसे महापुरुष का जन्म हुआ था जिसने आगे चल कर भारतीय संगीत जगत को ऐसी गरिमा प्रदान की, जिससे सारा विश्व चकित रह गया। ओंकारनाथ का बचपन अभावों में बीता। यहाँ तक कि किशोरावस्था में ओंकारनाथ जी को अपने पिता और परिवार के सदस्यों के भरण-पोषण के लिए एक मिल में नौकरी करनी पड़ी। ओंकारनाथ की आयु जब 14 वर्ष की थी तभी उनके पिता का देहान्त हो गया। उनके जीवन में एक दिलचस्प मोड़ तब आया, जब भड़ौच के एक संगीत-प्रेमी सेठ ने किशोर ओंकारनाथ की प्रतिभा को पहचाना और उनके बड़े भाई को बुला कर संगीत-शिक्षा के लिए बम्बई के विष्णु दिगम्बर संगीत महाविद्यालय भेजने को कहा। पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर के मार्गदर्शन में उनकी संगीत-शिक्षा आरम्भ हुई। विष्णु दिगम्बर संगीत महाविद्यालय, बम्बई (अब मुम्बई) में प्रवेश लेने के बाद ओंकारनाथ जी ने वहाँ के पाँच वर्ष के पाठ्यक्रम को तीन वर्ष में ही पूरा कर लिया और इसके बाद गुरु जी के चरणों में बैठ कर गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत संगीत की गहन शिक्षा प्राप्त की। 20 वर्ष की आयु में ही वे इतने पारंगत हो गए कि उन्हें लाहौर के गन्धर्व संगीत विद्यालय का प्रधानाचार्य नियुक्त कर दिया गया। 1934 में उन्होने मुम्बई में ‘संगीत निकेतन’ की स्थापना की। 1940 में महामना मदनमोहन मालवीय उन्हें काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संगीत संकाय के प्रमुख के रूप में बुलाना चाहते थे किन्तु अर्थाभाव के कारण न बुला सके। बाद में विश्वविद्यालय के एक दीक्षान्त समारोह में शामिल होने जब आए तो उन्हें वहाँ का वातावरण इतना अच्छा लगा कि वे काशी में ही बस गए। 1950 में उन्होने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के गन्धर्व महाविद्यालय के प्रधानाचार्य का पद-भार ग्रहण किया और 1957 में सेवानिवृत्त होने तक वहीं रहे। पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर का जितना प्रभावशाली व्यक्तित्व था उतना ही असरदार उनका संगीत भी था। उनके संगीत में ऐसा जादू था कि आम से लेकर खास व्यक्ति भी सम्मोहित हुए बिना नहीं रह सकता। जब वे सूरदास का पद- ‘मैं नहीं माखन खायो, मैया मोरी...’ गाते थे तो वात्सल्य भाव की सार्थक अनुभूति से पूरे श्रोता समुदाय की आँखेँ नम हो जाती थीं। इस पद में राग तिलक कामोद की प्रधानता है, परन्तु साहित्य के सभी रसों से साक्षात्कार कराने के लिए पण्डित जी ने कुछ अन्य रागों के स्वर भी इस्तेमाल किये हैं। इस रिकार्डिंग में पण्डित जी के साथ अन्य स्वर, जो आप सुनेगे, वह पण्डित बलवन्तराव भट्ट, पण्डित कनक राय त्रिवेदी और पण्डित प्रदीप दीक्षित ‘नेहरंग’ के हैं। लीजिए आप भी सुनिए, पण्डित जी के स्वर में, सूरदास का यह पद।


सूरदास पद : ‘मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो...’ : पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर




सूरदास के साहित्य की भावभूमि का आधार वात्सल्य और श्रृंगार वर्णन है। वात्सल्य रस भी अन्य रसों की भाँति संगीत के मुख्य चार रसों- श्रृंगार, करुण, वीर और शान्त में ही समाहित हो जाता है। सूरदास के इस पद में अन्य सभी नौ रसों की उपस्थिति तो है, किन्तु वात्सल्य रस सभी रसों पर प्रभावी है। सूरदास का यही पद अब आप विश्वविख्यात संगीत विदुषी एम.एस. शुभलक्ष्मी के स्वरों में सुनेगे। उत्तर और दक्षिण भारत के संगीत प्रेमियों के बीच समान रूप से लोकप्रिय शुभलक्ष्मी जी ने सूरदास के इस पद के लिए राग काफी का चयन किया है। राग काफी भक्ति, श्रृंगार और चंचलता का भाव सृजित करता है। यह काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा रे (कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म (कोमल) रे सा, स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी स्वर कोमल गान्धार और संवादी स्वर कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिया राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी, ध्रुवपद और खयाल की अपेक्षा उपशास्त्रीय संगीत में अधिक प्रयोग किया जाता है। ठुमरियों में प्रायः दोनों गान्धार और दोनों धैवत का प्रयोग भी मिलता है। टप्पा गायन में शुद्ध गान्धार और शुद्ध निषाद का प्रयोग वक्र गति से किया जाता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है। अब आप विदुषी एम.एस. शुभलक्ष्मी के स्वरों में सूरदास का यही पद सुनिए। एच.एम.वी. द्वारा जारी इस रिकार्ड में सहयोगी स्वर राधा विश्वनाथन् का है।


सूरदास पद : ‘मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो...’ : विदुषी एम.एस. शुभलक्ष्मी




1942 में सूरदास के व्यक्तित्व पर एक फिल्म बनी थी- ‘भक्त सूरदास’, जिसमें अन्य पदों के साथ ‘मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो...’ भी शामिल था। इस फिल्म के संगीतकार ज्ञानदत्त और गायक कुन्दनलाल सहगल थे। चौथे दशक के उत्तरार्द्ध से पाँचवें दशक के पूर्वार्द्ध में अत्यन्त सक्रिय रहे संगीतकार ज्ञानदत्त आज जनमानस से विस्मृत हो चुके हैं। रणजीत मूवीटोन की 1937 में बनी फिल्म ‘तूफानी टोली’ से अपनी संगीतकार की पारी आरम्भ करने वाले ज्ञानदत्त रणजीत स्टुडियो के अनुबन्धित संगीत निर्देशक थे। वर्ष 1940 तक उन्होने रणजीत की लगभग 20 फिल्मों में संगीत दिया था। अपनी पहली फिल्म ‘तूफानी टोली’ में ज्ञानदत्त ने अभिनेत्री निम्मी की माँ और अपने समय की मशहूर तवायफ वहीदन बाई से उनका पहला फिल्मी गीत- ‘क्यों नैनन में नीर बहाए...’ गवाया था। बाद में महिला गायिकाओं में वहीदन बाई, ज्ञानदत्त की प्रमुख गायिका बन गईं। इसके साथ ही अपनी पहली फिल्म में उन्होने पुरुष गायक के रूप में कान्तिलाल को अवसर दिया था। आगे चल कर ज्ञानदत्त की आरम्भिक फिल्मों में कान्तिलाल प्रमुख पुरुष गायक बने। महिला गायिकाओं में वहीदन बाई के अलावा कल्याणी, इन्दुबाला, इला देवी, राजकुमारी, खुर्शीद और सितारा आदि ने भी उनके गीतों को स्वर दिया।

पाँचवें दशक के आरम्भ में ज्ञानदत्त ने रणजीत के अलावा अन्य फिल्म निर्माण संस्थाओं की कई उल्लेखनीय फिल्मों में भी संगीत निर्देशन किया था। वे मूलतः प्रेम और श्रृंगार के संगीतकार थे और उन्होने उस समय के इस प्रकार के गीतों की प्रचलित परिपाटी से हट कर अपने गीतों में सुगम और कर्णप्रियता के तत्व डालने की कोशिश की थी। उन्होने पाँचवें दशक की अपनी फिल्मों में धुन की भावप्रवणता पर अधिक ध्यान दिया। इस दौर की उनकी सबसे उल्लेखनीय फिल्म थी, 1942 में प्रदर्शित, ‘भक्त सूरदास’। इस फिल्म में कुन्दनलाल सहगल के गाये कई गीतों ने अपने समय में धूम मचा दी थी। फिल्म ‘भक्त सूरदास’ में सूरदास के कुछ लोकप्रिय पदों को शामिल किया गया था। ‘निस दिन बरसत नैन हमारे...’, ‘मैं नहीं माखन खायो...’ और ‘मधुकर श्याम हमारे चोर...’ जैसे प्रचलित पदों को कुन्दनलाल सहगल ने अपना भावपूर्ण स्वर दिया था। सहगल के स्वरों में ‘मैं नहीं माखन खायो...’ का गायन शान्तरस के साथ वात्सल्य भाव की सृष्टि करता है। अब आप फिल्म ‘भक्त सूरदास’ का यह गीत सुनिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


सूरदास पद : ‘मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो...’ : फिल्म भक्त सूरदास : कुन्दनलाल सहगल





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 150वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक महान गायक की आवाज़ में भक्ति रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यह पाँचवें सेगमेंट की अन्तिम पहेली है। इस अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – इस भक्ति रचना के अंश को सुन कर गायक को पहचानिए और हमे उनका नाम लिख भेजिए।

2 – इस रचना की प्रस्तुति में किस ताल का प्रयोग हुआ है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 152वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 148वीं कड़ी में हमने आपको भक्तकवि कबीर के एक पद का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- गायक पण्डित कुमार गन्धर्व और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- चौदह मात्रा का चाँचर ताल। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हमारी एक नई प्रतिभागी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी और चण्डीगढ़ से हरकीरत सिंह ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ के अन्तर्गत आज के अंक में हमने कृष्ण की बाललीला पर केन्द्रित भक्तकवि सूरदास के एक पद पर चर्चा की। इस अंक में कविवर सुमित्रानन्दन पन्त और पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर की बातचीत का प्रसंग सुश्री डेजी वालिया की पुस्तक ‘सूर काव्य में संगीत लालित्य’ से तथा संगीतकार ज्ञानदत्त का परिचय पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ से साभार उद्धरित किया है। अगले अंक में एक और भक्त कवि के व्यक्तित्व और कृतित्व पर हम आपसे चर्चा करेंगे। अगले अंक में इस लघु श्रृंखला की उन्नीसवीं कड़ी के साथ रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, January 5, 2014

कुमार गन्धर्व, जसराज और मन्ना डे ने भी कबीर को गाया

  
स्वरगोष्ठी – 149 में आज

रागों में भक्तिरस – 17

‘दास कबीर जतन से ओढ़ी ज्यों की त्यों धर दीन्ही चदरिया...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की सत्रहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-रसिकों का नये वर्ष की पहली कड़ी में हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और कुछ प्रमुख भक्तिरस कवियों की रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस भक्ति रचना के फिल्म में किये गए प्रयोग भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की पिछली कड़ी में हमने पन्द्रहवीं शताब्दी के सन्त कवि कबीर के व्यक्तित्व और उनके एक पद- ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ पर चर्चा की थी। पिछले अंक में हमने यह पद ध्रुवपद, भजन और मालवा की लोक संगीत शैली में प्रस्तुत किया था। कबीर का यही पद आज हम सुविख्यात गायक पण्डित कुमार गन्धर्व, पण्डित जसराज और पार्श्वगायक मन्ना डे की आवाज़ में प्रस्तुत करेंगे। 
  


बीर एक सन्त कवि ही नहीं समाज सुधारक भी थे। उन्होने हिन्दू और मुस्लिम, दोनों धर्मों में व्याप्त रूढ़ियों के विरुद्ध अभियान चलाया था। अन्धविश्वासों पर कुठाराघात करते हुए कबीर ने निर्गुण ब्रह्म की उपासना पर बल दिया। उन्होने अपने काव्य में बोलचाल की भाषा का ही प्रयोग किया है। उनके काव्य में भरपूर व्यंग्य मौजूद है, जो अन्धविश्वास पर जोरदार प्रहार करते हैं। भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था। कबीर की रचनाओं में अनेक भाषाओं के शब्द मिलते हैं। खड़ीबोली, ब्रज, भोजपुरी और पंजाबी के शब्द तो प्रचुर मात्रा में हैं। इसके अलावा तत्कालीन शासकों की अरबी और फारसी के शब्दों का भी उन्होने प्रयोग किया है। इसीलिए उनकी भाषा को ‘सधुक्कड़ी’ या ‘पंचमेल खिचड़ी’ कहा जाता है। पिछले अंक में हमने कबीर के पद- ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ पर चर्चा की थी। आज हम उस चर्चा को आगे बढ़ाते हुए यही पद पहले पण्डित कुमार गन्धर्व के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं। रागदारी संगीत में घरानों के घेरे को तोड़ कर अपनी एक अलग शैली का सूत्रपात करने वाले कुमार गन्धर्व मालवा के सबसे दिव्य सांस्कृतिक विभूति हैं। कुमार गन्धर्व एकमात्र ऐसे संगीतज्ञ हुए हैं जिन्होंने मालवा क्षेत्र की बोली मालवी और उसके लोकगीतों को रागों से सुसज्जित कर बन्दिशों का स्वरूप दिया। कबीर की रचनाओं पर उनका शोध भारतीय संगीत के भण्डार को समृद्ध करता है। स्वरों के माध्यम से मानो उन्होने कबीर के रहस्यवाद को पर्त-दर-पर्त खोल कर रख दिया हो। लोक संगीत को रागदारी संगीत के समकक्ष ले जाने वाले कुमार जी ने कबीर को जैसा गाया वैसा कोई नहीं गा सकेगा। आज के अंक में प्रस्तुत कबीर के पद- ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ को कुमार जी ने राग जोगिया के स्वरों में बाँधा है। राग जोगिया भक्तिरस में छिपे वैराग्य भाव को अभिव्यक्त करने में पूर्ण समर्थ है। प्रथम प्रहर अर्थात सूर्योदय के समय गाया-बजाया जाने वाला यह राग भैरव थाट के अन्तर्गत माना जाता है। कर्नाटक संगीत पद्यति का राग सावेरी, इस राग के समतुल्य होता है। राग जोगिया के आरोह में गान्धार और निषाद स्वर वर्जित होता है। आरोह में ऋषभ और धैवत कोमल और मध्यम स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है। अवरोह के दो रूप प्रचलित है। अवरोह के पहले रूप में गान्धार और निषाद स्पष्ट होता है। यह रूप कर्नाटक पद्यति के राग सावेरी के निकट होता है। दूसरे रूप में कोमल गान्धार स्वर केवल अवरोह में प्रयोग होता है, वह भी मात्र कण रूप में। यह रूप राग गुणकली के निकट हो जाता है। अवरोह में सात स्वर का प्रयोग होता है। इस प्रकार यह राग औड़व-सम्पूर्ण जाति का है। राग जोगिया में शुद्ध मध्यम स्वर पर न्यास अर्थात ठहराव दिया जाता है, जबकि राग भैरव में ऐसा नहीं होता। इसी प्रकार राग जोगिया में कोमल ऋषभ और कोमल धैवत स्वरों का आन्दोलन नहीं होता, जबकि राग भैरव में ऐसा होता है। इस राग का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर मध्यम होता है। आइए, अब आप पण्डित कुमार गन्धर्व से कबीर का पद- ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ सुनिए, जिसे उन्होने राग जोगिया और चाँचर ताल में प्रस्तुत किया है।


कबीर पद : ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ : पण्डित कुमार गन्धर्व : राग - जोगिया : चाँचर ताल



कबीर के इस पद को अनेक श्रेष्ठ गायकों ने स्वर दिया है। इन्हीं में विश्वविख्यात कलासाधक हैं, पण्डित जसराज। कबीर के इस भक्तिपद का पण्डित जसराज के स्वरों से जो योग हुआ है, उसमें आध्यात्म पक्ष खूब मुखरित हुआ है। पण्डित जसराज की आवाज़ का फैलाव साढ़े तीन सप्तकों तक है। उनके गायन में पाया जाने वाला शुद्ध उच्चारण और स्पष्टता मेवाती घराने की गायन शैली की विशिष्टता को झलकाता है। उन्होंने बाबा श्याममनोहर गोस्वामी महाराज के सान्निध्य में 'हवेली संगीत' पर व्यापक अनुसन्धान कर कई नवीन बन्दिशों की रचना भी की है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनका सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान है उनके द्वारा प्रवर्तित एक अद्वितीय एवं अनोखी जुगलबन्दी, जो प्राचीन शास्त्रोक्त मूर्छना पद्यति को पुनर्जीवित करता है। इसमें एक महिला और एक पुरुष गायक अपने-अपने सुर में दो भिन्न रागों को एक साथ गाते हैं। जसराज जी के सम्मान में इस जुगलबन्दी का नाम 'जसरंगी' रखा गया है। भक्तिरस तो इनकी हर रचना में परिलक्षित होता ही है। पण्डित जी ने कबीर के इस पद को राग अहीर भैरव के स्वरों का आवरण प्रदान किया है। अहीर भैरव एक प्राचीन राग है, जिसमें अप्रचलित और लुप्तप्राय राग अभीरी या अहीरी और भैरव का मेल है। स्वरों के माध्यम से भक्तिरस को उकेरने में सक्षम इस राग में कोमल ऋषभ और कोमल निषाद स्वरों का प्रयोग किया जाता है। शेष सभी शुद्ध स्वर होते हैं। राग अहीर भैरव के आरोह और अवरोह में सभी सात स्वरों का प्रयोग किया जाता है, अर्थात यह सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग है। यह राग भैरव थाट के अन्तर्गत माना जाता है। दक्षिण भारतीय कर्नाटक पद्यति का राग चक्रवाक, इस राग के समतुल्य है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। उत्तरांग प्रधान इस राग का गायन-वादन दिन के प्रथम प्रहर में अत्यन्त सुखदायी होता है। कबीर का पद- ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ अब आप पण्डित जसराज से राग अहीर भैरव के स्वरों में सुनिए।


कबीर पद : ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ : पण्डित जसराज: राग – अहीर भैरव





इसी क्रम में आज हम आपको मानव जीवन की उपमा एक चादर से करते कबीर के इस पद का एक फिल्मी संस्करण भी सुनवाते हैं। 1954 में कबीर के जीवन पर एक फिल्म ‘महात्मा कबीर’ बनी थी, जिसके संगीतकार अनिल विश्वास थे। इस फिल्म के संगीत के विषय में फिल्म संगीत के इतिहासकार पंकज राग अपनी पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ में लिखते हैं- “1953 में मन्ना डे से फिल्म ‘हमदर्द’ के शास्त्रीय संगीत आधारित कंपोज़ीशन गवाने के बाद अनिल विश्वास ने ‘महात्मा कबीर’ में पुनः मन्ना डे के स्वर में ‘झीनी झीनी रे बीनी चदरिया...’, ‘घूँघट का पट खोल रे...’, ‘मनुआ तेरा दिन दिन बीता जाए...’ और ‘सतगुरु मोरा रंगरेज...’ जैसी रचनाएँ निर्गुण भक्ति की एक बेहद प्रभावशाली संगीत धारा का सृजन करती हैं। फिल्म संगीत में कबीर के दोहों और भजनों का इतना सुन्दर उदाहरण फिर नहीं मिलता।” दरअसल अनिल विश्वास ने इस पद को कीर्तन शैली में संगीतबद्ध किया है और मन्ना डे ने शब्दों को पूरी भावाभिव्यक्ति से गाया है। आप कबीर के इस पद का यह फिल्मी रूप भी सुनिए और मुझे आज के इस अंक को विराम देने की अनुमति दीजिए। परन्तु पहेली में भाग लेना न भूलिए। 


कबीर पद : ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ : गायक - मन्ना डे : संगीत – अनिल विश्वास : फिल्म – महात्मा कबीर



  
आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ की 149वीं संगीत पहेली में हम आपको एक बेहद लोकप्रिय भजन का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 150वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला तथा वर्ष का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि इस रचना में किस राग की झलक है?

2 – यह किस गायिका की आवाज़ है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 151वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

  
पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 147वीं संगीत पहेली में हमने आपको भजन गायक अनूप जलोटा की आवाज़ में कबीर के पद का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग देश और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल कहरवा। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी और चंडीगढ़ से हरकीरत सिंह ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


  
झरोखा अगले अंक का


मित्रों, नये वर्ष में भी ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी है, लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’, जिसके अन्तर्गत हमने आज की कड़ी में आपसे एक बार फिर निर्गुण ब्रह्म के उपासक सन्त कबीर के ही पद का रसास्वादन कराया। अगले अंक में आप एक और भक्तकवि सूरदास की एक भक्ति-रचना का रसास्वादन करेंगे जिसके माध्यम से अनेक शीर्षस्थ कलासाधकों ने अलग-अलग रागों का आधार लेकर भक्तिरस को सम्प्रेषित किया है। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के भक्तिरस प्रधान रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। आप हमें एक नई श्रृंखला के विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

Sunday, December 29, 2013

कुछ दिग्गज स्वर-शिल्पी, जिन्होने कबीर को गाया

  
स्वरगोष्ठी – 148 में आज

रागों में भक्तिरस – 16

‘चदरिया झीनी रे बीनी...’


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की सोलहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-रसिकों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और कुछ प्रमुख भक्तिरस कवियों की रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस भक्ति रचना के फिल्म में किये गए प्रयोग भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की पिछली दो कड़ियों में हमने सोलहवीं शताब्दी की भक्त कवयित्री मीरा के दो पदों पर आपके साथ चर्चा की थी। आज की कड़ी में हम पन्द्रहवीं शताब्दी के सन्त कवि कबीर के व्यक्तित्व और उनके एक पद- ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ पर चर्चा करेंगे। कबीर के इस पद को भारतीय संगीत की हर शैली में गाया गया है। आज के अंक में पहले हम आपको यह पद राग चारुकेशी में निबद्ध, ध्रुवपद गायक गुण्डेचा बन्धुओं के स्वरों में सुनवाएँगे। इसके बाद यही पद सुविख्यात भजन गायक अनूप जलोटा राग देश में और अन्त में लोक संगीत के जाने-माने गायक प्रह्लाद सिंह टिपणिया प्रस्तुत करेंगे। आप भी नादब्रह्म के माध्यम से निर्गुणब्रह्म की उपासना के साक्षी बनें। 


न्द्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी के जिन भक्त कवियों ने भारतीय जनमानस को सर्वाधिक प्रभावित किया उनमें कबीर अग्रगण्य हैं। उनके जन्म और जन्मतिथि के विषय में विद्वानों के कई मत हैं। एक मान्यता के अनुसार कबीर का जन्म 1398 ई. की ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को काशी (अब वाराणसी) के लहरतारा नामक स्थान पर हुआ था। जुलाहा परिवार में उनका पालन-पोषण हुआ। आगे चलकर वे सन्त रामानन्द के शिष्य बने और अलख जगाने लगे। कबीर विविध क्षेत्रों की मिली-जुली सधुक्कड़ी भाषा में किसी भी सम्प्रदाय और रूढ़ियों की परवाह किये बिना खरी बात कहते थे। कबीर ने हिन्दू और मुस्लिम, दोनों धर्मावलम्बियों के समाज में व्याप्त रूढ़िवाद तथा कट्टरवाद का मुखर विरोध किया। कबीर की वाणी, उनके मुखर उपदेश, उनकी साखी, रमैनी, बीजक, बावन-अक्षरी, उलटबासी आदि रूप में उपलब्ध हैं। गुरुग्रन्थ साहब में उनके 200 पद और 250 साखियाँ संकलित हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में चर्चा के लिए हमने कबीर का ही एक पद चुना है। यह कबीर के अत्यन्त लोकप्रिय पदों में से एक है। पहले आप इस पद की पंक्तियों पर दृष्टिपात कीजिए।

झीनी झीनी बीनी चदरिया।

काहे कै ताना काहे कै भरनी,

कौन तार से बीनी चदरिया।

ईडा पिङ्गला ताना भरनी,

सुखमन तार से बीनी चदरिया।

आठ कँवल दल चरखा डोलै,

पाँच तत्त्व गुन तीनी चदरिया।

वाको सियत मास दस लागे,

ठोंक ठोंक कै बीनी चदरिया।

सो चादर सुर नर मुनि ओढी,

ओढि कै मैली कीनी चदरिया।

दास कबीर जतन से ओढी,

ज्यों कीं त्यों धर दीनी चदरिया॥

इस पद में कबीर ने मानव के शरीर धारण करने, जीवन को संस्कारित करने और शरीर की सार्थकता से सम्बन्धित गूढ तत्त्वों को एक चादर के प्रतीक रूप में समझाने का प्रयास किया है। कबीर के शब्दों को भारतीय संगीत की प्रायः सभी शैलियों में स्वर मिला है। शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम, लोक और फिल्म संगीत के साथ-साथ सूफी संगीत और कव्वाली में भी कबीर गाये जाते है। आज के अंक में इस पद के गायन के तीन उदाहरण हम प्रस्तुत करेंगे। सबसे पहले यह पद ध्रुवपद अंग में सुनिए, जिसे सुप्रसिद्ध ध्रुवपद गायक गुण्डेचा बन्धुओं ने प्रस्तुत किया है। भारतीय संगीत की प्राचीन और शास्त्र-सम्मत शैली है- ध्रुवपद। इस शैली की गायकी में एक युगल गायक हैं- गुण्डेचा बन्धु (रमाकान्त और उमाकान्त गुण्डेचा), जिन्हें देश-विदेश में ध्रुवपद गायकी में भरपूर यश प्राप्त हुआ है। इनकी संगीत-शिक्षा उस्ताद जिया फरीदउद्दीन डागर और विख्यात रुद्रवीणा वादक उस्ताद जिया मोहिउद्दीन डागर द्वारा हुई है। ध्रुवपद के ‘डागुरवाणी’ गायन में दीक्षित इन कलासाधकों ने कबीर का यह पद राग चारुकेशी के स्वरों में प्रस्तुत किया है। राग चारुकेशी के परिचय से पहले गुण्डेचा बन्धुओं से सुनिए कबीर का पद- ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया...’। मोहक पखावज वादन अखिलेश गुण्डेचा ने की है।


कबीर पद : ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया...’ : राग चारुकेशी : पं. रमाकान्त और उमाकान्त गुण्डेचा



कबीर का यह पद आप राग चारुकेशी के स्वरों में सुन रहे थे। यह राग मूलतः कर्नाटक संगीत पद्यति का है, जिसे उत्तर भारतीय संगीत पद्यति में भी मान्यता प्राप्त है। सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह-अवरोह में धैवत और निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते है। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। यह राग पूर्वांग में बिलावल और उत्तरांग में भैरवी का आभास कराता है। चारुकेशी के शुद्ध ऋषभ के स्थान पर यदि कोमल ऋषभ का प्रयोग किया जाए तो राग बसन्त मुखारी का और यदि कोमल निषाद के स्थान पर शुद्ध निषाद का प्रयोग किया जाए तो यह राग नट भैरव की अनुभूति कराता है। इस राग का गायन-वादन दिन के दूसरे प्रहर में अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है।

कबीर का यही पद अब हम चर्चित भजन गायक अनूप जलोटा के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं। अनूप जलोटा के पिता पुरुषोत्तमदास जलोटा स्वयं एक लोकप्रिय भजन गायक हैं। इनका परिवार पंजाब से लखनऊ आया था। परन्तु अनूप जलोटा का जन्म 29 जुलाई 1953 को नैनीताल में हुआ था। भजन गायन उन्हें अपने माता-पिता से विरासत में मिला, जिसे उन्होने लखनऊ के भातखण्डे संगीत महाविद्यालय (अब विश्वविद्यालय) में सँवारा। बचपन से ही क्रिकेट और टेबिल टेनिस खेल के शौकीन अनूप जलोटा सूर, कबीर, तुलसी, मीरा आदि भक्त कवियों-कवयित्रियों के पदों को रागों का स्पर्श देकर देश-विदेश के श्रोताओं के बीच लोकप्रिय हुए। आज हमारी चर्चा में कबीर का जो पद है, उसे अनूप जलोटा ने राग देश का स्पर्श दिया है। राग देश की रचना खमाज थाट के अन्तर्गत मानी गई है। इसमे कोमल और शुद्ध दोनों निषाद का प्रयोग होता है। आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। आरोह में गान्धार स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं। इस प्रकार यह औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। इस राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। इसके गायन-वादन का उपयुक्त समय रात्रि का दूसरा प्रहर है। अब सुनिए, राग देश के स्वरों का सहारा लेकर, अनूप जलोटा की आवाज़ में कबीर का यही पद।


कबीर पद : ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया...’ : राग देश : भजन गायक अनूप जलोटा



कबीर का यह पद संगीत की विविध शैलियों में अनेक शीर्षस्थ कलासाधकों ने गाया है। ध्रुवपद और भजन गायकी में यह पद सुनवाने का बाद अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, यही पद मालवा की लोक संगीत शैली में। इसे मालवा अंचल की लोक संगीत शैली में प्रस्तुत कर रहे है, पद्मश्री सम्मान से विभूषित प्रह्लाद सिंह टिपणिया 7 सितम्बर, 1954 को उज्जैन (मध्यप्रदेश) के तरना कस्बे में जन्में श्री टिपणिया पेशे से शिक्षक हैं और मालवा के लोक संगीत में उनकी गहरी अभिरुचि थी। पारम्परिक लोक कलाकारों के बीच रह कर उन्होने इस अनूठी शैली का गहन अध्ययन किया और कबीर को ही गाने लगे। इस प्रकार की गायकी में स्वर और लय को साधने का प्रमुख वाद्य तम्बूरा होता है, जिसमें पाँच तार होते हैं। इसके अलावा करताल, ढोलक और मँजीरा भी सहायक वाद्य होते हैं। देश में आयोजित होने वाले प्रमुख संगीत समारोहों के सहभागी श्री टिपणिया अमेरिका और ब्रिटेन में भी कबीर को प्रस्तुत कर चुके हैं। कबीर के पद ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया...’ का मालवा की लोक संगीत शैली में गायन प्रस्तुत कर रहे हैं, प्रह्लाद सिंह टिपणिया और उनके साथी। आप कबीर के इस पद की रसानुभूति कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


कबीर पद : ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया...’ : लोक संगीत : प्रह्लाद सिंह टिपणिया और साथी




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 148वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक विख्यात गायक की आवाज़ में कबीर की भक्ति रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यह पाँचवाँ और इस वर्ष का अन्तिम सेगमेंट है। 150वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – इस भक्ति रचना के अंश को सुन कर गायक को पहचानिए और हमे उनका नाम लिख भेजिए।

2 – इस रचना की प्रस्तुति में जिस ताल का प्रयोग हुआ है उसके मात्राओं की संख्या बताइए।

आप अपने उत्तर केवल radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 150वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 146वीं कड़ी में हमने आपको भक्त कवयित्री मीरा के एक पद का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका वाणी जयराम। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी और चंडीगढ़ से हरकीरत सिंह ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का


   
मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ के अन्तर्गत आज के अंक में हमने आपको सन्त कबीर के एक पद का गायन ध्रुवपद शैली, भजन शैली और लोक संगीत शैली में प्रस्तुत किया। अगले अंक में इसी पद का गायन कुछ और शैलियों और कलासाधकों के स्वरों में हम प्रस्तुत करेंगे। अगले अंक में इस लघु श्रृंखला की सत्रहवीं कड़ी के साथ रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों की प्रतीक्षा करेंगे।



प्रस्तुति :कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, December 22, 2013

मीरा का एक और पद : विविध धुनों में


स्वरगोष्ठी – 147 में आज


रागों में भक्तिरस – 15


‘श्याम मने चाकर राखो जी...’


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की पन्द्रहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीतानुरागियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस भक्ति रचना के फिल्म में किये गए प्रयोग भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की पिछली कड़ी में हमने सोलहवीं शताब्दी की भक्त कवयित्री के एक पद- ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोय...’ पर आपके साथ चर्चा की थी। आज की कड़ी में हम मीराबाई के साहित्य और संगीत पर चर्चा जारी रखते हुए एक और बेहद चर्चित पद- ‘श्याम मने चाकर राखो जी...’ सुनवाएँगे। इस भजन को विख्यात गायिका एम.एस. शुभलक्ष्मी, वाणी जयराम, लता मंगेशकर और चौथे दशक की एक विस्मृत गायिका सती देवी ने गाया है। इन चारो गायिकाओं ने मीरा का एक ही पद अलग-अलग धुनों में गाया है। आप इस भक्तिगीत के चारो संस्करण सुनिए और स्वरों के परिवर्तन से गीत के भाव में होने वाले आंशिक बदलाव का प्रत्यक्ष अनुभव कीजिए। 


तिहासकारों के अनुसार भक्त कवयित्री मीराबाई का जन्म विक्रमी संवत 1561 अर्थात 1504 ई. के श्रावण मास की प्रतिपदा तिथि को हुआ था। अजमेर के लेखक श्री ओमप्रकाश ने अपनी पुस्तक ‘मेरे तो गिरधर गोपाल’ की भूमिका में मीरा की भक्ति रचनाओं का विवेचन करते हुए लिखा है- “सर्वथा प्रतिकूल परिस्थितियों में मुगल आक्रमणकारियों से भयाक्रान्त समाज को मीरा ने भक्ति का सम्बल दिया। पूरे भारतवर्ष के कोने-कोने में भक्ति आन्दोलन चल रहे थे। मीरा ने भी उसी संस्कृति के भक्ति-प्रवाह को परिपुष्ट किया। ‘नारी भोग्या नहीं, माँ है’ की जीवन-दृष्टि देकर नारी को नव प्रतिष्ठा दी। समाज की सुव्यवस्था हेतु कुरीतियों का उन्मूलन कर, चिर विद्रोहिणी की भूमिका निभाते हुए समाज-सुधार का कर्तव्य निभाया।”

आज के अंक में हमने मीरा का वह पद चुना है जिसमें वह अपने आराध्य श्रीकृष्ण से आग्रह कर रही हैं कि ‘हे श्याम मुझे अपना चाकर बना लो’। सबसे पहले आप यह भक्तिगीत सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी एम.एस. शुभलक्ष्मी के स्वरों में सुनेगे। मीरा के व्यक्तित्व, कृतित्व और जीवन दर्शन पर 1947 में चन्द्रप्रभा मूवीटोन द्वारा निर्मित फिल्म ‘मीरा’ के गीतों में उन्होने स्वयं अपना स्वर दिया था। यह फिल्म पहले तमिल में और फिर हिन्दी में भी बनी थी। विदुषी एम.एस. शुभलक्ष्मी ने इस फिल्म में न केवल गीत गाये, बल्कि मीरा की भूमिका में अभिनय भी किया था। फिल्म के संगीत निर्देशक एस.वी. वेंकटरमन, जी. रामनाथन् और नरेश भट्टाचार्य थे। फिल्म में मीरा का यह पद एक अप्रचलित राग बिहारी के स्वरों में निबद्ध है। मीरा-भजन के इस संस्करण के बाद आप इसका दूसरा संस्करण भी सुनेगे। भजन- ‘मने चाकर राखो जी...’ का यह संस्करण चौथे दशक में सक्रिय किन्तु वर्तमान में विस्मृत गायिका सती देवी ने गाया है। गायिका सती देवी चर्चित पार्श्वगायक किशोर कुमार की पहली पत्नी रूमा गुहा ठाकुरता (गांगुली) की माँ थीं। चौथे और पाँचवें दशक में गाये गए इस मीरा-भजन के इन दोनों संस्करणों का आप रसास्वादन कीजिए।


मीरा भजन : ‘श्याम मने चाकर राखो जी...’ : एम.एस. शुभलक्ष्मी : फिल्म मीरा (1947)




मीरा भजन : ‘श्याम मने चाकर राखो जी...’ : सती देवी : गैर फिल्मी भजन



भक्त कवयित्री मीरा के पद ‘श्याम मने चाकर राखो जी...’ पर हमारी यह चर्चा जारी है। मीरा के जीवन दर्शन पर एक और फिल्म ‘मीरा’ 1979 में गीतकार गुलजार के निर्देशन में बनी थी। इस फिल्म में भी मीरा के अन्य पदों के साथ-साथ ‘श्याम मने चाकर राखो जी...’ भी शामिल था, जिसे वाणी जयराम ने अपना स्वर दिया था। फिल्म के संगीत निर्देशक विश्वविख्यात संगीतज्ञ पण्डित रविशंकर थे। उन्होने इस भजन को राग भैरवी के स्वर दिये। ‘स्वरगोष्ठी’ के पिछले कई अंकों में हम राग भैरवी की चर्चा करते रहे हैं। राग भैरवी के आरोह स्वर हैं, सा, रे॒ (कोमल), ग॒ (कोमल), म, प, ध॒ (कोमल), नि॒ (कोमल), सां तथा अवरोह के स्वर, सां, नि॒ (कोमल), ध॒ (कोमल), प, म ग (कोमल), रे॒ (कोमल), सा होते हैं। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। यूँ तो इसके गायन-वादन का समय प्रातःकाल, सन्धिप्रकाश बेला में है, किन्तु आम तौर पर राग ‘भैरवी’ का गायन-वादन किसी संगीत-सभा अथवा समारोह के अन्त में किये जाने की परम्परा बन गई है। राग ‘भैरवी’ को ‘सदा सुहागिन राग’ भी कहा जाता है। मीरा का यह पद पहले आप राग भैरवी के स्वरो में सुनेगे और फिर उसके बाद यही पद राग बागेश्री के स्वरो पर आधारित प्रस्तुत करेंगे। यह संस्करण हमने 1956 में प्रदर्शित फिल्म ‘तूफान और दीया’ से लिया है। भजन के स्थायी की पंक्ति में श्याम के स्थान पर गिरधारी शब्द का प्रयोग हुआ है। इसके संगीत निर्देशक बसन्त देसाई थे और इस भजन को लता मंगेशकर ने स्वर दिया था। गीत में राग बागेश्री की स्पष्ट झलक मिलती है। बेहद लोकप्रिय राग है, बागेश्री। कुछ लोग इसे बागेश्वरी नाम से भी सम्बोधित करते हैं, किन्तु वरिष्ठ गायिका विदुषी गंगूबाई हंगल के अनुसार इस राग का सही नाम बागेश्री ही होना चाहिए। काफी थाट के अन्तर्गत माना जाने वाला यह राग कर्नाटक संगीत के नटकुरंजी राग से काफी मिलता-जुलता है। राग बागेश्री में पंचम स्वर का अल्पत्व प्रयोग होता है। षाड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में ऋषभ वर्जित होता है। कुछ विद्वान आरोह में पंचम का प्रयोग न करके औड़व-सम्पूर्ण रूप में इस राग को गाते-बजाते हैं। इसमें गान्धार और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किये जाते हैं। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। यह राधा का सर्वप्रिय राग माना जाता है। आप मीरा के पद- ‘श्याम माने चाकर राखो जी...’ को पहले राग भैरवी और फिर राग बागेश्री के स्वरों में सुनिए और मुझे श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भैरवी : ‘श्याम माने चाकर राखो जी...’ : वाणी जयराम : फिल्म मीरा (1979)




राग बागेश्री : ‘श्याम माने चाकर राखो जी...’ : लता मंगेशकर : फिल्म तूफान और दीया




आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की 147वीं संगीत पहेली में हम आपको एक बेहद लोकप्रिय भजन का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 150वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि इस रचना में किस राग की झलक है?

2 – इस रचना में किस ताल का प्रयोग किया गया है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 149वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 145वीं संगीत पहेली में हमने आपको पण्डित रविशंकर द्वारा स्वरबद्ध और वाणी जयराम की आवाज़ में प्रस्तुत मीरा के एक भजन का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग तोड़ी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- सात मात्रा का रूपक ताल। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर एकमात्र प्रतिभागी जबलपुर की क्षिति तिवारी ने दिया है। क्षिति जी को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी है, लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’, जिसके अन्तर्गत हमने आज की कड़ी में आपसे एक बार फिर भक्त कवयित्री मीरा के एक और पद पर चर्चा की। अगले अंक में आप एक और भक्तकवि महात्मा कबीर की एक भक्ति-रचना का रसास्वादन करेंगे जिसे अनेक शीर्षस्थ कलासाधकों ने अलग-अलग रागों का आधार लेकर भक्तिरस को सम्प्रेषित किया है। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के भक्तिरस प्रधान रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ