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Wednesday, January 25, 2012

"ऐ मेरे वतन के लोगों" - इस कालजयी देशभक्ति गीत को न गा पाने का मलाल आशा भोसले को आज भी है


कालजयी देशभक्ति गीत "ऐ मेरे वतन के लोगों" के साथ केवल पंडित नेहरू की यादें ही नहीं जुड़ी हुई हैं, बल्कि इस गीत के बनने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। आज गणतन्त्र दिवस की पूर्वसंध्या पर इसी गीत से जुड़ी कहानियाँ सुजॉय चटर्जी के साथ 'एक गीत सौ कहानियाँ' की चौथी कड़ी में...


एक गीत सौ कहानियाँ # 4

देशभक्ति गीतों की बात चलती है तो कुछ गीत ऐसे हैं जो सबसे पहले याद आ जाते हैं, चाहे वो फ़िल्मी हों या ग़ैर-फ़िल्मी। लता मंगेशकर की आवाज़ में एक ऐसी ही कालजयी रचना है "ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा करो क़ुर्बानी"। कवि प्रदीप के लिखे और सी. रामचन्द्र द्वारा स्वरबद्ध इस गीत को जब भी सुनें, रोंगटे खड़े हुए बिना नहीं रहते, आँखें नम हुए बिना नहीं रहतीं, हमारे वीर शहीदों के आगे नतमस्तक हुए बिना हम नहीं रह पाते। इस गीत को १९६२ के भारत-चीन युद्ध के शहीदों को समर्पित किया गया था। कहते हैं कि रेज़ांग् ला के प्रथम युद्ध में १३ - कुमाऊं रेजिमेण्ट, सी-कंपनी के आख़िरी मोर्चे में परमवीर मेजर शैतान सिंह भाटी के दुस्साहस और बलिदान से प्रभावित होकर कवि प्रदीप नें इस गीत की रचना की थी। २६ जनवरी १९६३ के दिन नई दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित गणतन्त्र दिवस समारोह में गायिका लता मंगेशकर नें इस गीत को पहली बार प्रस्तुत कर मौजूद जनता को मन्त्रमुग्ध कर दिया था। गीत का ऐसा असर हुआ था कि वहाँ पर मौजूद जनता बिल्कुल शान्त, हर एक की आँखें नम, यहाँ तक कि पण्डित नेहरू गीत के समाप्त होने पर मंच में आकर अपनी आँखें पोंछते हुए लता से कहा, "बेटी, तूने मुझे रुला दिया"। उसी समारोह में इस गीत की एक प्रति (साउण्डट्रैक स्पूल) पं नेहरू को भेंट में दी गई थी। प्रसिद्ध फ़िल्म पत्रिका 'स्क्रीन' में प्रकाशित लेख में इस गीत के बारे में लिखा गया था - "The lyrics of the song not only reflected Kavi Pradeep's sentiments but his nationalistic thinking of the country at large. With singer Lata Mangeshkar and composer C Ramchandra, he brought tears to every eye including Nehru's."

सुनने में आता है कि इस गीत से जुड़े हर कलाकार - गायक-वृंद, म्युज़िशियन्स, संगीतकार, रेकॉर्डिंग् स्टुडियो, साउण्ड रेकॉर्डिस्ट - सभी ने इस गीत से मिलने वाली रॉयल्टी का एक-एक अंश 'वार विडोज़ फ़ण्ड' में जमा करवा दी थी। जहाँ इस गीत के लिए गायिका लता मंगेशकर नें अपार शोहरत हासिल की, कवि प्रदीप की तरफ़ लोगों का ध्यान कम ही गया। वैसे कवि प्रदीप को इस गीत के रॉयल्टी संबंधी कई ऑफ़र मिले, पर इस सच्चे देशभक्त नें इस गीत से कभी पैसा कमाना नहीं चाहा। यह तो उनकी एक श्रद्धांजली थी इस देश के वीर सपूतों के नाम, फिर इस गीत के लिए पैसे कैसे ले सकते थे? अत: उन्होंने इस गीत से मिलने वाली पूरी रॉयल्टी 'वार विडोज़ फ़ण्ड' में जमा करने के लिए Saregama HMV को लिखित निर्देश दिया। पर अफ़सोस की बात कि इस कंपनी नें रॉयल्टी की इस राशि को 'वार विडोज़ फ़ण्ड' में कभी जमा नहीं करवाया। बरसों बरस बाद, २५ अगस्त २००५ के दिन, बॉम्बे हाइ कोर्ट नें HMV को सख़्त निर्देश दिया १० लाख रुपये ऐरीयर के रूप में 'वार विडोज़ फ़ण्ड' में जमा करने का। उधर लता मंगेशकर नें आज से कुछ ही वर्ष पहले एक कॉन्सर्ट में सार्वजनिक रूप से कवि प्रदीप का इस गीत के लिए आभार प्रकट किया, और उन्होंने भी यह कबूल किया कि जिस गीत नें उन्हें अपार शोहरत दिलाई, उसके गीतकार को नज़रन्दाज़ कर दिया गया। कवि प्रदीप का सम्मान करते हुए लता जी नें उन्हें १ लाख रुपये की राशी प्रदान की। उस समय के प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपयी नें भी कवि प्रदीप को मुंबई के मलाड में आयोजित एक कार्यक्रम में सम्मानित किया।

अब आते हैं इस गीत के बनने की कहानी पर जो विवादों से घिरी रही। उन दिनों किसी मनमुटाव या व्यक्तिगत कारणों से लता मंगेशकर और सी. रामचन्द्र साथ में काम नहीं कर रहे थे। ऐसे में जब कवि प्रदीप नें "ऐ मेरे वतन..." की रचना की और सी. रामचन्द्र को सुनाया, तो अन्ना नें इस गीत का रिहर्सल आशा भोसले से करवानी शुरु कर दी। प्रदीप को इस बात का पता नहीं था। अब यहाँ से इस कहानी के दो रुख़ सुनने में आते हैं। पहली धारणा यह है कि जब कवि प्रदीप को पता चला कि अन्ना गाने का रिहर्सल आशा से करवा रहे हैं, तब उन्होंने यह साफ़ कह दिया कि वो यह गाना तभी देंगे अगर लता गायेंगी तो (यह बात लता नें साक्षात्कार में भी बताया है)। और दूसरी धारणा यह कहती है कि जब लता को पता चला कि दिल्ली में पंडित नेहरू के सामने गाये जाने वाले गीत को आशा गा रही है, तो सी. रामचन्द्र से अपनी अन-बन को भुला कर प्रदीप के ज़रिये उन्हें ख़बर भिजवाया कि इस गीत को वो गाना चाहती हैं। और क्योंकि प्रदीप भी यही चाहते थे और अन्ना भी मन ही मन लता को ही पसन्द करते थे, इस तरह से लता इस गीत से जुड़ गईं। अब इन दोनों धारणाओं को एक कर दिया जाये तो निश्कर्ष यही निकलता है कि लता के लिए "ऐ मेरे वतन..." का मार्ग खुलने लगा। क्योंकि आशा को इस गीत का ऑफ़र दिया जा चुका था और वो इसका रिहर्सल भी कर रही थीं, प्रदीप और अन्ना नें यह तय किया कि इसे लता और आशा, दोनों की युगल आवाज़ों में प्रस्तुत किया जाए। लेकिन रहस्यमय तरीक़े से आशा का पत्ता साफ़ कर दिया गया और यह गीत लता का एकल गीत बन गया। आशा को दरकिनार करने के पीछे किसका हाथ था, यह जाने बिना यहाँ टिप्पणी करना सही नहीं, पर समझदारों के लिए इसका अनुमान लगाना कोई बड़ी बात नहीं। जो भी हुआ आशा के साथ, अच्छा नहीं हुआ। यह आशा भोसले की महानता ही कहेंगे कि उन्होंने इस गीत को न गा पाने का मलाल अपने दिल में दबाये तो रखा पर कभी किसी के ख़िलाफ़ उंगली भी नहीं उठाई। पारिवारिक कारणों से वो मंगेशकर परिवार से अलग-थलग तो हो ही चुकी थीं, इस घटना के बाद आशा अपनी बड़ी बहन से और भी ज़्यादा दूर चली गईं।

"ऐ मेरे वतन के लोगों" के बनने की कहानी जितनी विवादास्पद रही, आगे चलकर भी विवाद ख़त्म नहीं हुआ। ७० के दशक में बम्बई के ब्रेबोर्ण स्टेडियम में आयोजित एक शो में लता मंगेशकर इस गीत को गाने वाली थीं। उन्हें और इस गीत की भूमिका देने के लिए मंच पर मौजूद थे दिलीप कुमार। अपनी ड्रामाई अंदाज़ में उन्होंणे इस गीत के बारे में बताना शुरु किया। हालाँकि यह गीत किसी तारूफ़ का मोहताज नहीं, फिर भी दिलीप साहब नें इस गीत के बनने की कहानी, कवि प्रदीप के बारे में, पंडित नेहरू के रोने के बारे में बताया जहाँ वो ख़ुद भी मौजूद थे १९६३ के उस जलसे में। उन्होंने इस गीत के बारे में सबकुछ बताया सिवाय इसके संगीतकार सी. रामचन्द्र के बारे में। दिलीप कुमार की परिचित कूटनीति का यह एक उदाहरण था। बैकस्टेज पर जब वो आये तो वहाँ सी. रामचन्द्र खड़े थे और उन्होंने ग़ुस्से से पूछा कि उन्होंने उनका नाम क्यों नहीं लिया? दिलीप कुमार अपनी मासूमियत बरक़रार रखते हुए कहा कि उन्हें यह मालूम ही नहीं था कि अन्ना नें इस गीत की धुन बनाई है। अन्ना नें कहा, "झूठ मत बोलो यूसुफ़! तुम्हे अच्छी तरह पता है कि मैंने इस गीत को कम्पोज़ किया है। तुम्हे ज़रूर उस औरत (लता) नें कहा होगा!" दिलीप कुमार का जवाब था, "कोई भी दिलीप कुमार को टर्म्स डिक्टेट नहीं कर सकता"। अन्ना का तुरन्त जवाब था, "वो दिन गए यूसुफ़। एक समय था जब सी. रामचन्द्र को भी टर्म्स डिक्टेट करने की हिमाकत कोई नहीं कर सकता था। अब दोनों को ही डिक्टेट करते हैं।"

चाहे इस गीत के साथ कितनी भी विवाद, कितने भी मनमुटाव जुड़े रहे हों, सच्चाई यही है कि यह भारत के सर्वश्रेष्ठ १० देशभक्ति गीतों में एक है, और आज भी इसे सुनते हैं तो कलेजा चीर के रख देता है।


"ऐ मेरे वतन के लोगों" गीत को सुनने के लिए नीचे प्लेयर में क्लिक करें...



तो दोस्तों, आज 'एक गीत सौ कहानियाँ' में बस इतना ही, अगले सप्ताह फिर किसी गीत से जुड़ी बातें लेकर मैं फिर उपस्थित हो‍ऊंगा, आपको यह स्तंभ कैसा लग रहा है, ज़रूर बताइएगा टिप्पणी में, और अगर किसी ख़ास गीत की तरफ़ हमारा ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं तो हमें ज़रूर सूचित कीजिएगा। अब अनुमति दीजिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को, फिर मुलाक़ात होगी अगले सप्ताह, नमस्कार!

Saturday, January 22, 2011

ई मेल के बहाने यादों के खजाने (२६)- प्रदीप चटर्जी नाम से कोई गीतकार नहीं -हरमंदिर सिंह 'हमराज़'

नमस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' में एक बार फिर आप सभी का हम स्वागत करते हैं। इस साप्ताहिक स्तंभ में हम साधारणतः 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' पेश किया करते हैं। कई बार यादों के ख़ज़ानें तो नहीं शामिल हो पाते, लेकिन जो भी पेश होता है वो ईमेल के बहाने से ही होता है। हर बार की तरह इस बार भी हम आप सभी से गुज़ारिश करते हैं कि इस शीर्षक को सार्थक करने के लिए आप अपने जीवन से जुड़ी किसी यादगार घटना या संस्मरण हमारे साथ बांटिये जिसे हम इस मंच के माध्यम से पूरी दुनिया के साथ बांट सके। ईमेल भेजने के लिए हमारा आइ.डी है oig@hindyugm.com।

दोस्तों, इसमें कोई शक़ नहीं कि इंटरनेट ने तथ्य तकनीकी और दूरसंचार के क्षेत्र में क्रांति ला दी है, और ऐसी क्रांति आई है, ऐसा बदलाव लाया है कि अब इंटरनेट के बिना सब काम काज जैसे ठप्प सा हो जाता है। लेकिन जिस तरह से हर अच्छे चीज़ के साथ कुछ बुरी चीज़ें भी समा जाती हैं, ऐसा ही कुछ इंटरनेट के साथ भी है। जी नहीं, हम अश्लील वेबसाइटों की बात नहीं कर रहे; हम तो बात कर रहे हैं ग़लत जानकारियों की जो इंटरनेट पर अपलोड होते रहते हैं। दरअसल बात यह है कि इंटरनेट पर हर कोई अपना तथ्य अपलोड कर सकता है, अपने ब्लॊग या वेबसाइट या किसी सोशल नेटवर्किंग् साइट के ज़रिए। ऐसे में किसी भी दी जा रही जानकारी की सत्यता पर प्रश्न-चिन्ह लग जाता है। अब कैसे हर बात पर यकीन करें कि जो बात हम किसी वेबसाइट पर पढ़ रहे हैं, वह सच भी है या नहीं! तभी तो 'रिसर्च-पेपर्स' या डाक्टरेट की थीसिस में इंटरनेट से प्राप्त तथ्यों का रेफ़रेन्स मान्य नहीं होता। हम भी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का आलेख लिखते वक़्त जब इंटरनेट पर शोध करते हैं किसी गीत या फ़िल्म पर, तब हमें भी कुछ गड़बड़ी वाले तथ्य नज़र आ जाते हैं, और ऐसा नहीं है कि हम ख़ुद कभी ग़लतियाँ नहीं करते, हमसे भी कई बार जाने-अंजाने ग़लतियाँ हो जाती हैं, और वही बात हम पर भी लागू हो जाती है।

दोस्तों, पिछले दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर चितलकर रामचन्द्र पर केन्द्रित लघु शृंखला 'कितना हसीं है मौसम' आयोजित की गई थी, जिसमें फ़िल्म 'पैग़ाम' का गीत शामिल हुआ था, जिसके बोल थे "दौलत ने पसीने को आज लात है मारी", जिसके गीतकार का नाम हमने बताया था कवि प्रदीप। अब क्योंकि कुछ वेबसाइटों पर इस फ़िल्म के गीतकार का नाम प्रदीप चटर्जी दिया गया है, तो हमारे कुछ मित्रों ने भी पहेली का जवाब देते वक़्त प्रदीप चटर्जी का नाम लिखा, जिस वजह से काफ़ी संशय पैदा हो गया गीतकार के नाम का। हम भी यकीन के साथ नहीं कर पाये कि क्या कवि प्रदीप और प्रदीप चटर्जी एक ही इंसान हैं या दो अलग। इंटरनेट पर काफ़ी खोजबीन करने के बाद भी जब मेरे हाथ कुछ ठोस ना लगा, तो मैंने सोचा कि क्यों ना उस इंसान से मदद माँगी जाये जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी हिंदी फ़िल्म गीत कोष तैयार करने में लगा दी है! जी हाँ, ठीक समझे आप, मैं हरमंदिर सिंह 'हमराज़' साहब की ही बात कर रहा हूँ। उन्होंने १९३१ से लेकर शायद १९९० तक के सभी फ़िल्मों के सभी गीतों को 'गीत-कोष' के रूप में प्रकाशित किया है और दशकों से 'लिस्नर्स बुलेटिन' नामक पत्रिका भी चला रहे हैं कानपुर से। तो मैंने जब हमराज़ जी को ईमेल भेजकर जानना चाहा कि आख़िर कवि प्रदीप और प्रदीप चटर्जी का क्या माजरा है और 'नास्तिक' और 'पैग़ाम' जैसी फ़िल्मों के गीतकार कौन हैं, तो उन्होंने तुरंत मेरे ईमेल का जवाब देते हुए कुछ ऐसा लिखा ---

"प्रदीप चटर्जी के नाम से कोई गीतकार १९३१ से लेकर अब तक इस फ़िल्म इण्डस्ट्री में नहीं हुए हैं। वो कवि प्रदीप ही थे, दादा साहब फाल्के सम्मानित, जिन्होंने 'नास्तिक' और 'पैग़ाम' में गीत लिखे हैं। यहाँ हर कोई आज़ाद है इंटरनेट पर लोगों को गुमराह करने के लिए। लखनऊ में एक डॊ. डी. सी. अवस्थी रहते हैं जिन्हें कवि प्रदीप पर शोध करने के लिए डाक्टरेट की डिग्री दी गई है।"

तो दोस्तों, आशा है आप सभी का संशय अब दूर हो गया होगा, प्रदीप चटर्जी नामक कोई गीतकार नहीं है, प्रदीप के नाम से जितने भी गीत आते हैं, वो सब कवि प्रदीप के ही लिखे हुए हैं, जिनका जन्म मध्य प्रदेश में हुआ है और जो बंगाली तो बिल्कुल नहीं हैं, इसलिए चटर्जी होने का सवाल ही नहीं। हाँ, आपकी जानकारी के लिए यह बता दूँ कि पंडित प्रदीप चटर्जी एक शास्त्रीय गायक ज़रूर हैं और यूट्युब में आप उनका गायन सुन सकते हैं। ख़ैर, अब आपको एक गीत सुनवाने की बारी है। कवि प्रदीप का लिखा एक ऐसा गीत आज सुनिए जिसे आप ने बहुत दिनों से नहीं सुना होगा, ऐसा हम दावा करते हैं। क्योंकि कवि प्रदीप का उल्लेख सी. रामचन्द्र पर केन्द्रित शृंखला में आयी है, इसलिए आज जिस गीत को हमने चुना है, उसे कवि प्रदीप ने लिखा और सी. रामचन्द्र ने ही स्वरबद्ध किया है। यह साल १९६० की फ़िल्म 'आँचल' का गीत है जिसे आशा भोसले, सुमन कल्याणपुर और सखियों ने गाया है। "नाचे रे राधा", यह एक नृत्य गीत है, बड़ा ही मीठा गाना है, हमें उम्मीद है कि गीत सुनते वक़्त आपके क़दम भी थिरक उठेगे, मचल उठेंगे। गीत की एक और खासियत है कि इसके दो वर्ज़न हैं, दोनों में वही आवाज़ें हैं लेकिन बोल अलग हैं। आइए ये दोनों वर्ज़न सुना जाये एक एक करके। गीत का संगीत संयोजन भी कमाल का है, बेहद सुरीला है। 'आँचल' वसंत जोगलेकर निर्देशित फ़िल्म थी जिसमें मुख्य कलाकार थे अशोक कुमार, नंदा, निरुपा रॊय और ललिता पवार। नंदा को इस फ़िल्म के लिए फ़िल्मफ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री का पुरस्कार मिला था और ललिता पवार भी इसी पुरस्कार के लिए नामांकित हुई थीं।

गीत - नाचे रे राधा -१ (आँचल)


गीत - नाचे रे राधा -२ (आँचल)


तो दोस्तों, ये था इस हफ़्ते का 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने', आपको यह गीत सुनकर कैसा लगा ज़रूर बताइएगा, और हमें ईमेल ज़रुर कीजिएगा अपने सुझावों और अपने जीवन की किसी यादगार घटना के साथ, oig@hindyugm.com के पते पर।

Thursday, January 13, 2011

मैं हूँ एक खलासी, मेरा नाम है भीमपलासी....अन्ना के इस गीत को सुनकर आपके चेहरे पर भी मुस्कान न आये तो कहियेगा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 570/2010/270

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की ५७०-वीं कड़ी के साथ हम हाज़िर हैं और जैसा कि इन दिनों आप सुन और पढ़ रहे हैं कि सी. रामचन्द्र के संगीत और गायकी से सजी लघु शृंखला 'कितना हसीं है मौसम' जारी है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर। आज हम आ गये हैं इस शृंखला के अंजाम पर। आज इसकी अंतिम कड़ी में आपको सुनवा रहे हैं चितलकर और साथियों का गाया एक और मशहूर गीत। सी. रामचन्द्र के संगीत के दो पहलु थे, एक जिसमें वो शास्त्रीय और लोक संगीत पर आधारित गानें बनाते थे, और दूसरी तरफ़ पाश्चात्य संगीत पर उनके बनाये हुए गानें भी गली गली गूंजा करते थे। इस शृंखला में भी हमने कोशिश की है इन दोनों पहलुओं के गानें पेश करें। आज की कड़ी में सुनिए उसी पाश्चात्य अंदाज़ में १९५० की फ़िल्म 'सरगम' से एक हास्य गीत "मैं हूँ एक खलासी, मेरा नाम है भीमपलासी"। एक गज़ब का रॊक-एन-रोल नंबर है जिससे आज ६० साल बाद भी उतनी ही ताज़गी आती है। माना जाता है कि किसी हिंदी फ़िल्म में रॊक-एन-रोल का प्रयोग होने वाला यह पहला गाना था। और वह भी उस समय जब रॊक-एन-रोल विदेश में भी उतना लोकप्रिय नहीं माना जाता था। राज कपूर, रेहाना और अन्य कलाकारों पर फ़िल्माया यह एक नृत्य गीत है। पी. एल. संतोषी ने फ़िल्म के गीत लिखे थे।

'सरगम' फ़िल्म का हर एक गीत अपने आप में एक प्रयोग था। इसी फ़िल्म का लता, चितलकर और साथियों का गाया "मौसमे बहार यार, दिल है गुलज़ार यार" में अरबी शैली को अपनाया गया था। लता, रफ़ी और चितलकर के गाये "सबसे बड़ा रुपैया" में लोक धुनों पर विदेशी रिदम का मिश्रण महसूस किया जा सकता है। इस फ़िल्म में एक और पहला प्रयोग था लता-चितलकर के गाये "मोम्बासा" गीत में, जिसमें सी. रामचन्द्र ने अफ़्रीकन संगीत का इस्तेमाल किया। १९५० में ही एक और फ़िल्म आयी थी 'संगीता', जिसमें भी उन्होंने देशी और विदेशी साज़ों के फ़्युज़न से लता-चितलकर का गाया "गिरगिट की तरह रंग बदलते फ़ैशन वाले बाबू" अपने आप में एक नया प्रयोग था। १९५१ में फ़िल्म 'ख़ज़ाना' में लता, चितलकर और साथियों ने गाया था "बाबड़ी बूबडी बम", जिसमें लैटिन अमेरिकी और कैरिबीयन बीट्स का प्रयोग था। इस तरह से बहुत सारे प्रयोग सी. रामचन्द्र ने किए हैं। ऐसे में उन्हें एक क्रांतिकारी संगीतकार के रूप में सम्मानित करना बहुत ही सटीक रहा। आज सी. रामचन्द्र के गये हुए ३० साल होने हो गये, लेकिन उनके रचे सदाबहार नग़में आज भी उनकी यादों को बिल्कुल ताज़ा रखे हुए है। दोस्तों, हमें उम्मीद है कि सी. रामचन्द्र के स्वरबद्ध और चितलकर के गाये इन गीतों का आपने पिछले दो हफ़्तों से आनंद लिया होगा। यह शृंखला आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा ईमेल के द्वारा। हमारा ईमेल आइडी है oig@hindyugm.com इसी के साथ अब सी. रामचन्द्र को समर्पित इस शृंखला को समाप्त करने की हमें इजाज़त दीजिए, और सुनिए यह मस्ती भरा गीत। 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' के साथ हम फिर हाज़िर होंगे शनिवार की शाम, तब तक के लिए, नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि 'सरगम' के नाम पर सी. रामचन्द्र ने बांद्रा में बनवाए अपने बंगले का नामकरण किया था। वह बंगला तो बिक गया था, लेकिन बाद में पुणे के जिस बंगले में उनका परिवार रहता है, उसका नाम भी 'सरगम' है।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 11/शृंखला 08
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - लता की आवाज़ जैसे जादू है इस गीत में

सवाल १ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - संगीतकार कौन हैं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह..हमारी ये शृंखला बेहद शानदार रहे, अमित जी ने शरद जी का बहुत जम कर मुकाबला किया, मगर उनके ९ अंकों पर शरद जी के १० अंक भारी पड़े, तो इस कारण एक शृंखला और शरद जी के नाम हुई, पर इस शृंखला में हमें दीपा जी, विजय दुआ और हिन्दुस्तानी जी जैसे नए योधा मिले, जो अगर इसी तरह चलते रहे तो आने वाली श्रृंखलाएं जबरदस्त होंगीं ये तय है....वैसे हमारे श्याम कान्त जी अभी तक गायब ही हैं, वैसे हम आपको बताते चलें कि अब तक श्याम जी ४, शरद जी ३ और अमित जी १ शृंखला जीत चुके हैं.....नयी शृंखला के लिए सभी को शुभकामनाएँ...

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, January 12, 2011

ओ दिलवालों दिल का लगाना अच्छा है....शमशाद और अन्ना की जोड़ी को सलाम

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 569/2010/269

सी. रामचन्द्र पर केन्द्रित लघु शृंखला 'कितना हसीं है मौसम' में पिछले कुछ दिनों से हम कुछ ऐसे गीत सुन रहे हैं जिनका संगीत सी. रामचन्द्र ने तैयार किए तो हैं ही, ये गानें उन्हीं की आवाज़ में भी है जिन्हें वो चितलकर के नाम से गाया करते थे। हमने उनके कुछ एकल गीत शामिल किए, और युगल गीतों की बात करें तो लता मंगेशकर और आशा भोसले के साथ उनके गाये हुए गानें बजाये हैं। लता और आशा के बाद अगर किसी गायिका का ज़िक्र चितलकर के साथ आना चाहिए तो वो हैं शम्शाद बेगम। शम्शाद जी ने सी. रामचन्द्र के संगीत में कुल २५ फ़िल्मों में ६२ गीत गाये हैं और उनमें से सब से लोकप्रिय रहा है 'पतंगा' फ़िल्म का "मेरे पिया गये रंगून" और 'शहनाई' फ़िल्म का "आना मेरी जान सण्डे के सण्डे"। ये दोनों ही गीत हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर बजा चुके हैं। शम्शाद और चितलकर की आपस की केमिस्ट्री ग़ज़ब की थी और शम्शाद बेगम ही सी. रामचन्द्र की प्रिय गायिका थीं लता के आने के पहले तक। जिस तरह से आशा के आने के बाद, ओ. पी. नय्यर ने शम्शाद और गीता दत्त को भुला दिया, ठीक वैसे ही लता के आ जाने से दूसरे संगीतकारों ने भी अन्य गायिकाओं से मुंह मोड़ लिया और सी. रामचन्द्र भी उनमें से एक थे। दोस्तों, आइए आज का यह अंक शम्शाद बेगम और चितलकर के नाम करते हैं।

आज के अंक में आपको सुनवाने के लिए लाये हैं फ़िल्म 'पतंगा' से "ओ दिलवालों दिल का लगाना अच्छा है पर कभी कभी"। रोमांटिक कॊमेडी की एक और मिसाल, जिसके लिए सी. रामचन्द्र जाने जाते थे। 'पतंगा' १९४९ की फ़िल्म थी जो एच. एस. रवैल की पहली निर्देशित फ़िल्म थी। वर्मा फ़िल्म्स के बैनर तले निर्मित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे श्याम और निगार सुल्ताना। याकूब और गोप ने इस फ़िल्म में लौरेल और हार्डी का भारतीयकरण किया और लोगों को हँसा हँसा कर लोट पोट कर दिए। फ़िल्म के गानें लिखे राजेन्द्र कुष्ण ने। आइए आज राजु भारतन के उसी किताब से एक अंश यहाँ पेश करें जिसमें उन्होंने सी. रामचन्द्र से शम्शाद बेगम के बारे में पूछा है कि क्यों उन्होंने शम्शाद बेगम को नज़रंदाज़ कर लता से रिश्ता जोड़ लिया। इसका मैं अनुवाद नहीं कर रहा हूँ ताकि आप ऒरिजिनल वार्तालाप का आनंद ले सकें।

“But what made you get so transfixed on Lata?” I asked. “After all, unlike in the case of Shanker- Jaikishan, your career hadn’t begun with Lata. Indeed, Lata had been one of your choral singers, you had attained repeated silver jubilee success, before her advent in your repertoire, with vocals of Amirbai, Zohrabai, Lalita Dewoolkar, Binapani Mukherjee, Geeta Roy, Shamshad Begum, to mention just a few. Shamshad Begum, in fact, was your swinging favorite until Lata happened in your life.”

“And Shamshad told me how exactly Lata happened to you,” I continued. “It came about when Lata had already replaced Shamshad Begum, and all other singers, in your mindset. One day you called Shamshad for recording. She failed to get a phrase absolutely right, whereupon you upbraided her right there in front of the musicians, saying: ‘Can’t you understand once you are taught how?’ Shamshad’s answer to that, she told me, was to snap her songbook shut and leave the studio without a word. ‘At other times,’ she said, ‘there would have been a call from Chitalkar to me, profusely apologizing. But no such call came this time, so I knew it was the end.’ Were you fair to Shamshad Begum?” I asked C Ramchandra.

“I was most unfair to her,” conceded Anna (C. Ramchandra). “In fact, I apologized to her, when the gesture had lost all grace, as she came to my home, forgetting all that had happened, to invite me for the Shamshad Nite years later. I was ill, very ill, running a temperature when Shamshad came. I told her I would make a special effort for her by getting well and not only coming, but coming on the stage to sing with her Meri jaan meri jaan Sunday Ke Sunday. Shamshad, remember, sang that vital, more modern second portion of the Sunday Ke Sunday ‘Shehnai’ duet with me and it was the number with which I grew an overnight sensation as a totally new-style music director in the industry. How ungrateful of me to have eased out Shamshad Begum like that! But there was no help for it, once Lata came into my life, she came into my life.”


तो लीजिए, शम्शाद बेगम और चितलकर की आवाज़ों में सुनिए फ़िल्म 'पतंगा' का यह गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि रंगमंच पर 'भुलाए ना बने' कार्यक्रम में सी. रामचन्द्र काफ़ी अरसे तक अपनी पुरानी फ़िल्मों के गीत स्वयं पेश किया करते थे। मराठी के पुराने कवियों पर आधारित उनका कार्यक्रम 'रसयात्रा' चर्चित रहा था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 10/शृंखला 07
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -एक सुन्दर हास्य गीत है ये ?

सवाल १ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नायक बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी, अमित जी और दीपा जी को बधाई.....रोमेंद्र जी यानी कन्फुशन वैसे के वैसा ही रहा

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, January 11, 2011

दौलत ने पसीने को आज लात मारी है.....बगावती तेवर चितलकर के स्वर और सुरों का

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 568/2010/268

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार! 'कितना हसीं है मौसम', सी. रामचन्द्र को सपर्पित इस लघु शृंखला में आज हम चितलकर और साथियों का गाया एक जोश भरा गीत सुनेंगे। इस गीत के बारे में बताने से पहले आपको याद दिला दें कि कल की कड़ी में हम ज़िक्र कर रहे थे लता मंगेशकर और सी. रामचन्द्र के बीच के अनबन के बारे में। हमने कुछ कही सुनी बातें तो जानी, सी. रामचन्द्र का राजु भारतन को दिए इंटरव्यु के बारे में भी जाना; लेकिन इस चर्चा को तब तक पूरी नहीं मानी जा सकती जब तक हम लता जी से इसके बारे में ना पूछ लें। और हमारे इस काम को अंजाम दिया अमीन सायानी साहब ने जिन्होंने लता जी से इसके बारे में पूछा और लता जी ने विस्तार से बताया। लीजिए पेश है उस इंटरव्यु का वही अंश, यह प्रस्तुत हुआ था 'सरगम के सितारों की महफ़िल' रेडियो प्रोग्राम में।

अमीन सायानी: सी. रामचन्द्र से क्या बात हो गई, कैसे अनबन हो गई, क्यों हो गई, और ना होती तो कितना अच्छा होता?

लता मंगेशकर: (हँसते हुए) नहीं, अगर आप ऐसे सोचें तो मेरा दुश्मन कोई नहीं है, ना ही मैं किसी की दुश्मन हूँ। पर इतने सारे म्युज़िक डिरेक्टर्स के साथ जब हम काम करते हैं, इतने लोग मिलते हैं रोज़, तो कहीं ना कहीं छोटी मोटी बात हो ही जाती है। उनके साथ क्या हुआ था कि एक रेकॊर्डिंस्ट थे जो मेरे पीठ पीछे कुछ बात करते थे, मुझे मालूम हुआ था और वो जिसने मुझे बताया था वो अदमी मुझे बहुत ज़्यादा प्यार करता था, कहता था 'मैं सुन नहीं सकता हूँ लता जी कि वो आपके बारे में बात ऐसी ऐसी करते हैं'। और मेरी रेकॊर्डिंग् थी सी. रामचन्द्र की जो उसी स्टुडिओ में थी। मैंने अन्ना को कहा कि 'अन्ना, मैं इस रेकॊर्डिस्ट के पास रेकॊर्डिंग् नहीं करूँगी, क्योंकि यह मेरे लिए बहुत ख़राब बात करता है, जब मैं गाऊँगी मेरा मन नहीं लगेगा यहाँ और मैं जब गाती हूँ मेरे दिमाग को अच्छा लगना चाहिए, सुकून मिलना चाहिए कि भई जो गाना मैं गा रही हूँ, अच्छा लग रहा है, तभी गाना अच्छा बन सकता है'। उनको पता नहीं क्या हुआ, उन्होंने कहा कि 'लता, तुम अगर नहीं गाओगी तो मैं अपने दोस्त को भी नहीं छोड़ सकता हूँ, मैं तुम्हारी जगह किसी और को लाऊँगा'।

अमीन: अरे!!!

लता: मैंने कहा 'बिल्कुल आप ला सकते हैं, किसी को भी ले आइए'। और मैंने वो काम छोड़ा, पर मेरा उनका झगड़ा ऐसा नहीं हुआ। मैंने वो गाना, मतलब रिहर्सल किया हुआ, मैं छोड़ के चली गई और उन्होंने फिर किसी और से वह गाना लिया, और वह मराठी गाना था, मराठी पिक्चर का था। तो वो गाना होने के बाद, उस समय उनके पास काम भी बहुत कम था, और फिर बाद में मेरी उनकी बात नहीं हुई, मुलाक़ात नहीं हुई, कुछ नहीं। और फिर अगर उनका मेरा इतना झगड़ा होता तो फिर वो फिर मेरे पास दोबारा आए "ऐ मेरे वतन के लोगों" के लिए।

अमीन: हाँ, बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल!

लता: तो झगड़ा तो था ही नहीं। और "ऐ मेरे वतन के लोगों" के लिए वो मेरे घर में आये बुलाने के लिए, वो और प्रदीप जी, दोनों ने आकर कहा कि 'यह गाना तुमको गाना ही पड़ेगा'। मैंने कहा 'मैं गाऊँगी नहीं, मेरी तबीयत ठीक नहीं, मुझे आप यह मत कीजिए, मुझे रिहर्सल करना पड़ेगा, दिल्ली जाना पड़ेगा'। मैंने कहा कि 'दिल्ली जाना भी मुझे इतना पसंद नहीं इस वक़्त'। पर उस गाने के लिए प्रदीप जी ने बहुत ज़ोर लगाया। प्रदीप जी ने कहा कि 'लता, अगर तुम यह गाना नहीं गाओगी तो फिर मैं यह गाना दूँगा ही नहीं'। तो उनका दिल नहीं तोड़ सकी मैं। मैंने कहा 'अच्छी बात है, मैं गाती हूँ', और उनके घर जाकर मैंने रिहर्सल वगेरह किए और मैंने वह गाना गाया।

और इस अमर गीत ने लता जी और चितलकर साहब के बीच के अनबन को मिटाया। चलिए अब वापस आते हैं आज बजने वाले गीत की तरफ़। अभी उपर "ऐ मेरे वतन के लोगों" का ज़िक्र हुआ तो याद आया कि एक फ़िल्म थी 'पैग़ाम' जिसमें भी देशभक्ति और समाजोद्धार के विषयों पर बनें गीत हैं जिन्हें प्रदीप ने लिखे थे और सी. रामचन्द्र ने स्वरबद्ध किए थे। आइए आज इस फ़िल्म से चितलकर और साथियों का गाया एक गीत सुनते हैं, "दौलत ने पसीने को आज लात है मारी, हरगिज़ ना रूकेगी अब हरताल हमारी"। 'पैग़ाम' १९५९ की फ़िल्म थी जिसका एस.एस.वासन ने 'जेमिनि पिक्चर्स' के बैनर तले निर्माण व निर्देशन किया था। दिलीप कुमार, राज कुमार और वैजयंतीमाला अभिनीत इस फ़िल्म के संवाद लिखे थे रामानंद सागर ने, जिसके लिए उन्हें उस साल के फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार से नवाज़ा गया था। आज के प्रस्तुत गीत की बात करें तो मिल मज़दूरों और उनके हरतालों को लेकर इस गीत को बनाया गया है। तो लीजिए प्रस्तुत है फ़िल्म 'पैग़ाम' में चितलकर और साथियों की आवाज़ें।



क्या आप जानते हैं...
कि शुरु शुरु में "ऐ मेरे वतन के लोगों" गीत का रिहर्सल आशा भोसले से करवाया गया था, लेकिन बाद में गीत लता से गवाया गया, इसका आशा भोसले को हमेशा मलाल रहा।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 09/शृंखला 07
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -आसान है न ?

सवाल १ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - फिल्म की नायिका बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह अमित जी आपने शरद जी बहुत बढ़िया टक्कर दी है इस बार...दीपा, प्रदीप दुआ और हिन्दुस्तानी (कृपया अपना सही नाम बताएं) के आने से नए योद्धाओं की जबरदस्त जंग देखने को मिल रही है....जहाँ तक गीतकार का सवाल है, कवि प्रदीप ही परदीप चट्टर्जी के नाम से कहीं कहीं नज़र आये हैं....क्या प्रदीप चट्टर्जी नाम के कोई अन्य गीतकार हैं ? मेरा (सजीव) और सुजॉय का मानना है कि नास्तिक व नया फिल्मों के गीत कवि प्रदीप जी के लिखे हुए है....इस बारे में आप लोग यदि पक्की जानकारी रखते हैं तो हमें बताएं....बहुत से श्रोताओं का मार्गदर्शन होगा

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, January 10, 2011

तुम मेरी जिंदगी में तूफ़ान बन कर आये.....कहीं लता जी का इशारा चितलकर पर तो नहीं था ?

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 567/2010/267

'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आप सभी का एक बार फिर बहुत बहुत स्वागत है। सी. रामचन्द्र के स्वरबद्ध और गाये गीतों की शृंखला 'कितना हसीं है मौसम' इन दिनों आप सुन और पढ़ रहे हैं। कल हमने आपसे वादा किया था कि आज की कड़ी में हम आपको सी. रामचन्द्र और लता मंगेशकर के बीच के अनबन के बारे में बताएँगे। दोस्तों, राजु भारतन लिखित लता जी की जीवनी को पढ़ने पर पता चला कि इस किताब के लिखने के दौरान भारतन साहब सी. रामचन्द्र से मिले थे और सी. रामचन्द्र ने कहा था, "she wanted to marry me, but i was already married.... all i wanted was some fun, but that was not to be.." इसी किताब में "ऐ मेरे वतन के लोगों" के किस्से के बारे में भी लिखा गया है कि शुरु शुरु में यह एक डुएट गीत के रूप में लिखा गया था जिसे लता और आशा, दोनों को मिलकर गाना था। लेकिन जिस दिन मंगेशकर बहनों को दिल्ली जाना था उस फ़ंक्शन के लिए, आशा जी ने सी. रामचन्द्र को फ़ोन कर यह कह दिया कि दीदी अकेली जा रही हैं और वो इससे ज़्यादा और कुछ नहीं कहना चाहतीं। इसी गीत को प्रस्तुत करते हुए दिलीप कुमार ने गायिका और गीतकार के नामों की तो घोषणा कर दी लेकिन संगीतकार का नाम बताना भूल गए। इस बात से सी. रामचन्द्र आगबबूला होकर जब बैकस्टेज पर दिलीप साहब को टोका तो दिलीप साहब ने बस इतना ही कहा कि "अन्ना, मुझे नहीं मालूम था कि आपने इस गीत की धुन बनाई है"। राजु भारतन के किताब के अलावा सी. रामचन्द्र की मराठी में लिखी आत्मकथा 'माझ्या जीवांची सरगम' में उन्होंने बड़ी कुशलता के साथ उस "गायिका" का नाम हटा दिया है लेकिन उस आत्मकथा को पढ़ने वाला हर इंसान समझ सकता है कि इशारा किसकी तरफ़ है। उस आत्मकथा में जिस "सीता" का उन्होंने उल्लेख किया है, वो लता जी के सिवा और कोई नहीं है, यह बात भी हर कोई समझ सकता है। यह तो थी एक तरफ़ की कहानी। उधर लता जी के चाहनेवालों का यह मानना है कि सी. रामचन्द्र ने ही लता को एक बार प्रेम निवेदन किया था जिसे लता ने ठुकरा दिया था। इस अशालीन प्रस्ताव से गुस्से में आकर लता जी ने उनके साथ वही सलूक करना ठीक समझा जो उन्होंने नय्यर साहब और अपनी बहन आशा के साथ किया था। लता जी कभी शादी नहीं करना चाहती थी और ख़ास उस समय तो बिल्कुल नहीं जब उनके कंधों पर उनके पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी थी। दोस्तों, ये सब बातें जो अभी मैंने कहे, वो सब सुनी और पढ़ी हुई बातें हैं। असलियत क्या है यह किसी को भी नहीं मालूम। और हमें भी क्या लेना देना इन महान कलाकारों के व्यक्तिगत जीवन से। हमें तो इसी बात से ख़ुश रहना चाहिए कि क्या क्या नायाब गीत इन दोनों ने हमें दिए हैं।

दोस्तों, आज के अंक के लिए हमने जिस लता-चितलकर डुएट को चुना है, वह है फ़िल्म 'शगुफ़ा' का। १९५३ में एच. एस. रवैल ने दो ऐसी फ़िल्में निर्देशित की जिनमें संगीत सी. रामचन्द्र का था। इनमें से एक थी 'लहरें' जिसमें किशोर कुमार और श्यामा मुख्य कलाकार थे, और दूसरी फ़िल्म थी 'शगुफ़ा'। यह अभिनेता प्रेम नाथ की ही फ़िल्म थी उन्ही के बैनर पी. एन. फ़िल्म्स तले। प्रेम नाथ और बीना रॊय अभिनीत इस फ़िल्म में राजेन्द्र कृष्ण और सी. रामचन्द्र का फिर एक बार साथ हुआ और फिर एक बार जन्म लिए एक से एक सुमधुर गीत। इस फ़िल्म के अधिकतर गीत लता जी के गाये हुए थे जैसे कि "छीन सके तो छीन ले ख़ुशियाँ मेरे नसीब की, लायेगी रंग एक दिन आह किसी ग़रीब की", लोक शैली में रची "छोटा सा देखो मेरा नादान बालमा", हल्के फुल्के अंदाज़ में बना "ये कैसी ख़ुशी है ये कैसा नशा है, मुझे क्या हुआ है", जुदाई के दर्द में डूबी "घिर घिर आयी कारी बदरिया", और मिलन के रंग में रंगी "ये हवा ये समा चांदनी है जवाँ"। गीता दत्त और साथियों नें गाया "मेरी बहकी बहकी चाल" जिसका भी एक अलग ही मज़ा है। गीता दत्त ने सुंदर के साथ मिलकर एक हास्य क़व्वाली "कैसे खेल मोहब्बत में खेलें सितमगर तेरे लिए" ने एक बार फिर राजेन्द्र कृष्ण को हास्य गीतों के बादशाह के रूप में प्रमाणित किया। और इस फ़िल्म का जो ख़ास गीत रहा वह था लता और चितलकर का गाया आज का प्रस्तुत युगल गीत "तुम मेरी ज़िंदगी में तूफ़ान बनके आये"। ऐसा लगता है जैसे इस गीत के बोल भी लता और चितलकर के तरफ़ ही इशारा कर रहे हों। तो लीजिए पेश-ए-ख़िदमत है फ़िल्म 'शगुफ़ा' का यह गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि सी. रामचद्र ने 'Academy of Indian Music' नामक संस्था भी चलाई, जहाँ प्रमिला दातार और कविता कृष्णमूर्ति उनकी शिष्याएँ रहीं।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 08/शृंखला 07
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -चितलकर और साथियों का गाया एक जोश भरा गीत है ये.

सवाल १ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - फिल्म के निर्देशक कौन थे - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
बहुत खुशी हो रही है देखकर कि नए प्रतिभागियों कमान संभाल रखी है....अमित जी दीपा जी और हिन्दुस्तानी जी को बहुत बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, January 9, 2011

कारी कारी कारी अंधियारी सी रात.....सावन की रिमझिम जैसी ठडक है अन्ना के संगीत में भी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 566/2010/266

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक नई सप्ताह के साथ हम हाज़िर हैं दोस्तों। फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के गीतों को सुनने और उनके बारे में जानने का सिलसिला जारी है। इन दिनों हम करीब से जान रहे हैं सी. रामचन्द्र को जिनके स्वरबद्ध और गाये हुए गानें हम शामिल कर रहे हैं उन पर केन्द्रित शृंखला 'कितना हसीं है मौसम' में। दोस्तों, युं तो सी. रामचन्द्र ने ज़्यादातर युगल गानें लता जी के साथ ही गाये थे, लेकिन एक वक़्त ऐसा भी आया कि जब उन दोनों के बीच अनबन हो गई और लता जी ने उनके लिए गाना बंद कर दिया। इसके बारे में विस्तार से हम कल की कड़ी में चर्चा करेंगे, आज बस इतना कहते हैं कि लता का विकल्प आशा बनीं और ५० के दशक के आख़िर के कुछ सालों में अन्नासाहब ने आशा भोसले से कई गीत गवाये। तो आइए आज उन चंद सालों में सी. रामचन्द्र और आशा भोसले के संगम से उत्पन्न गीतों की बात करें। इन फ़िल्मों में जो नाम सब से उपर आता है, वह है १९५८ की फ़िल्म 'नवरंग'। आज इसी फ़िल्म से एक गीत आपको सुनवाने जा रहे हैं। वैसे इस फ़िल्म के दो गीत हम आपको सुनवा चुके हैं - "तू छुपी है कहाँ" (आशा-मन्ना) और "आधा है चन्द्रमा" (आशा-महेन्द्र)। लेकिन आज हम सुनेंगे आशा और चितलकर यानी सी. रामचन्द्र की आवाज़ों में एक बड़ा ही अद्भुत गीत "कारी कारी कारी अंधियारी सी रात"। इस गीत में चितलकर काव्य शैली में बोल गाते हैं, और उसके बाद आशा शास्त्रीय संगीत पर उन्हीं बोलों को गा उठती हैं और एक अलग ही समा सा बंध जाता है। सावन पर बहुत सारे, ढेर सारे फ़िल्मी गीत बनें हैं, लेकिन अगर उत्कृष्ट गीतों को इस लम्बी फ़ेहरिस्त से छाँटा जाये तो इस गीत को निश्चित रूप से उसमें स्थान मिलेगा। इस गीत से सी. रामचन्द्र के ना केवल संगीतकार के रूप में महानता का पता चलता है, बल्कि एक बेहतरीन और प्रतिभाशाली गायक होने का भी आभास दिलाता है। भरत व्यास के काव्यात्मक शब्दों ने गीत की सुंदरता में चार चांद लगा दिया है, और आशा भोसले की आवाज़ तो सोने पे सुहागा का काम करती है। गीत के संगीत संयोजन में अन्य साज़ों के बीच में शहनाई भी सुनाई देती है जिसे रामलाल ने बजाया था। जी हाँ, वही रामलाल जो 'सेहरा' और 'गीत गाया पत्थरों ने' जैसी फ़िल्मों में संगीत दिया था।

हम बात कर रहे थे चितलकर और आशा भोसले के गाये गीतों की। 'नवरंग' के गीतों का लेखक पंकज राग ने अपनी किताब 'धुनों की यात्रा' में जिन शब्दों में वर्णन किया है, वो इस प्रकार है - "नवरंग के लोकप्रिय गीतों में आशा और महेन्द्र का वर्चस्व रहा। पर मालकौंस पर आधारित "आधा है चन्द्रमा" और "तू छुपी है कहाँ" जैसे हिट गीतों हों, अभिनेत्री संध्या की शैली के अनुरूप अनूठे इठलाते अंदाज़ में गाया "आ दिल से दिल मिला ले" या प्रणय को एक पवित्र भाव से प्रस्तुत करता "तुम मेरे मैं तेरी" हों, सौंदर्य का एक कोमल संगीतात्मक वर्णन करता "श्यामल श्यामल वरण" हो, कवि-सम्मेलन की शैली का "कविराजा कविता के मत कान मरोड़ो" या पहाड़ी के सुरों को लेकर बनाये गये होली गीत "जा रे हट नटखट" का आह्लाद हो, लोकप्रियता के बावजूद इन गीतों की शैली सी. रामचन्द्र वाली कम और वी. शांताराम के प्रभाववाली अधिक लगती है।" ठीक ही तो कहा है पंकज जी ने, भले ही ये गानें चले हों, लेकिन इनमें निस्संदेह वो बात नहीं आई जो लता के लिए बनाये उनके गीतों में आते थे। १९५९ की फ़िल्म 'पैगाम' में भी आशा की आवाज़ थी और १९६० में 'आँचल' में आशा-महेन्द्र का गाया "गा रही है ज़िंदगी" और सुमन ने लता की शैली में "सांवरिया रे अपनी मीरा को भूल ना जाना" गाया, लेकिन ये तमाम गानें ज़्यादा चले नहीं। १९६० में ही आशा और चितलकर ने फ़िल्म 'सरहद' में "नाचो घूम घूम घूम के" गाया जो पश्चिमी रिदम पर था। इसी फ़िल्म में आशा और साथियों का गाया "आजा रे लागे न मोरा जिया" में सी. रामचन्द्र का विशिष्ट प्रभाव कम ही नज़र आया। प्रभु दयाल निर्देशित १९६१ की फ़िल्म 'अमर रहे यह प्यार' में आशा की गाई "मेरे अंधेरे घर में चाँद कोई छाया" की सफलता भी सीमित ही रही। १९६१ में ही लता और सी. रामचन्द्र का एक बार फिर साथ हुआ शांताराम की ही फ़िल्म 'स्त्री' में। तो आइए अब आज का गीत सुना जाये। आशा भोसले और चितलकर रामचंद्र की आवाज़ में फ़िल्म 'नवरंग' की यह सुंदर रचना।



क्या आप जानते हैं...
कि सी. रामचन्द्र अपनी धुनों के नोटेशन्स एक पॊकेट डायरी में लिखा करते थे। एक दिन वह डायरी फोकेट्मार हो गई और उन्हें बहुत नुकसान हुआ। इस क़िस्से का ज़िक्र गायिका ललिता देवूलकर से करते वक़्त वो रो पड़े थे।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 07/शृंखला 07
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -इतना सुनने के बाद गीत पहचानना मुश्किल नहीं.

सवाल १ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - आवाज़ पहचाने - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह अमित जी, बहुत बधाई....दीपा जी और हिन्दुस्तानी जी को भी सही जवाब की बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Thursday, January 6, 2011

ऐ आँख अब ना रोना, रोना तो उम्रभर है...कितना दर्दीला है ये युगल गीत लता चितलकर का गाया

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 565/2010/265

सी. रामचन्द्र के स्वरबद्ध किए और उन्हीं के गाये हुए गीतों से सजी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'कितना हसीं है मौसम' की पाँचवीं कड़ी में आप सभी का स्वागत है। दोस्तों, अब तक इस शृंखला में हमने चितलकर की आवाज़ में दो एकल गीत सुनें और बाक़ी के दो गीत उन्होंने लता जी के साथ गाया था। आइए आज एक बार फिर एक मशहूर लता-चितलकर डुएट सुना जाये। यह गीत है १९४९ की फ़िल्म 'सिपहिया' का, जिसके बोल हैं "ऐ आँख अब ना रोना, रोना तो उम्रभर है, पी जाएँ आँसूओं को, बस वो जिगर जिगर है"। गीतकार हैं राम चतुरवेदी। आइए आज अपको एक फ़ेहरिस्त दी जाये लता-चितलकर डुएट्स की।

अलबेला (१९५१) - भोली सूरत दिल के खोटे, महफ़िल में मेरी कौन ये दीवाना आया, मेरे दिल की घड़ी करे टिक टिक टिक, शाम ढले खिड़की तले, शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के।
आज़ाद (१८५४) - कितना हसीं है मौसम।
बारिश (१९५७) - कहते हैं प्यार किस को पंछी, फिर वही चाँद वही हम वही तन्हाई।
भेदी बंगला (१९४९) - आँसू ना बहाना कांटों भरी राह से।
हंगामा (१९५२) - झूम झूम झूम राही प्यार की दुनिया, उल्फ़त की ज़िंदगी के साल हो हज़ार।
झमेला (१९५३) - देखो जी हमारा दिल लेके दग़ा नहीं, सुनोजी सुनो तुम से हुई है मुलाक़ात, बलखाती इठलाती आई है जो।
ख़ज़ाना (१९५१) - बाबडी-बूबडी जल गई दुनिया मिल गये, दो दिलवालों का अफ़साना ऐ चाँद किसी।
नदिया के पार (१९४९) - ओ गोरी ओ छोरी कहाँ चली कहाँ।
नास्तिक (१९५४) - ज़ोर लगाले ज़माने कितना ज़ोर लगाले, झुकती है दुनिया झुकानेवाला चाहिए।
संगीता (१९५०) - गिरगिट की तरह हैं रंग बदलते।
सरगम (१९५०) - बुड्ढ़ा है घोड़ा लाल है लगाम, वो हमसे चुप हैं, मौसम-ए-बहार आये दिल में, मैं हूँ अलादीन मेरे पास चराग़ तीन, मोमबासा रात मिलन की, भैया सब से भला रुपैया।
शगुफ़ा (१९५३) - तुम मेरी ज़िंदगी में तूफ़ान बनके।
शिनशिना की बबला बू (१९५२) - कौन है ऐसा महफ़िल में जो ना तेरा, शिन शिना की बबला बू, ये हँसी बाबा ये ख़ुशी बाबा, ये सिमटी कली कोई ले रस की कली ले।
सिपहिया (१९४९) - ऐ आँख अब ना रोना, लगा है कुछ ऐसा निशाना।
उस्ताद पेड्रो - तेरे दिल पे जादू कर गया।

दोस्तों, इस फ़हरिस्त को पढ़कर आपने ग़ौर किया होगा कि रोमांटिक गीतों के साथ साथ बहुत से गानें हास्य और मस्ती भरे छेड़ छाड़ वाले अंदाज़ के भी हैं और उस ज़माने में सी. रामचन्द्र इस तरह के गीतों के लिए जाने जाते थे। फ़िल्म 'सिपहिया' की बात करें तो मधुबाला और याकूब अभिनीत इस फ़िल्म में लता जी की गाई रचनाओं में शामिल हैं दर्द भरी धुन में कम्पोज़ की हुई "दर्द लगा के ठेस लगा के चले गये" और "आराम के ये साथी क्या-क्या", लेकिन इन गीतों की तज़ें कुछ ख़ास मुकाम हासिल ना कर सकी, पर फ़िल्म का सबसे मशहूर गीत "ऐ आँख अब ना रोना" और गज़ल शैली में गाई हुई "हँसी हँसी न रही और ख़ुशी ख़ुशी ना रही" में सी. रामचन्द्र फिर अपने उसी कामयाबी भरे मधुर अंदाज़ में लौटते हैं। लता, चितलकर के स्वर में "लगा है कुछ ऐसा निशाना" में सी. रामचन्द्र ने दादरा ताल पर कव्वाली के ठेके देकर अभिनव प्रयोग दर्शाया है। तो आइए लता मंगेशकर और चितलकर की इस जोड़ी के नाम आज का यह अंक करें और सुनें यह मीठा दर्द भरा गीत। फिर से वही बात दोहराता हूँ कि न जाने क्यों दर्दीले गीत ज़्यादा मीठे लगते हैं।



क्या आप जानते हैं...
कि 'अनारकली' के संगीत-निर्माण के दौरान सी. रामचन्द्र अपनी फ़िल्म 'झांझर' का भी निर्माण कर रहे थे। 'अनारकली' के निर्माता ने उन पर आरोप लगाया कि 'झांझर' की वजह से सी. रामचन्द्र 'अनारकली' के साथ अन्याय कर रहे हैं। लेकिन जब दोनों फ़िल्में रिलीज़ हुईं, तो 'अनारकली' के गीतों ने इतिहास रचा जबकि 'झांझर' पिट गई।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 06/शृंखला 07
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -इतना सुनने के बाद गीत पहचानना मुश्किल नहीं.

सवाल १ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - इस गीत में शहनाई किस अन्य संगीतकार ने बजायी है - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
एक बार फिर बहुत बढ़िया शरद जी...अमित जी और दीपा जी को भी बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, January 5, 2011

ज़रा ओ जाने वाले.....और जाने वाला कब लौटता है, आवाज़ परिवार याद कर रहा है आज सी रामचंद्र को

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 564/2010/264

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार, और बहुत बहुत स्वागत है इस स्तंभ में। आज है ५ जनवरी, और आज ही के दिन सन् १९८२ में हमसे हमेशा के लिए जुदा हुए थे वो संगीतकार और गायक जिन्हें हम चितलकर रामचन्द्र के नाम से जानते हैं। उन्हीं के स्वरबद्ध और गाये गीतों से सजी लघु शृंखला 'कितना हसीं है मौसम' इन दिनों जारी है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर और आज इस शृंखला की है चौथी कड़ी। दोस्तों, सी. रामचन्द्र का ५ जनवरी १९८२ को बम्बई के 'के. ई. एम. अस्पताल' में निधन हो गया। पिछले कुछ समय से वे अल्सर से पीड़ित थे। २२ दिसम्बर १९८१ को उन्हें जब अस्पताल में भर्ती किया गया था, तभी से उनकी हालत नाज़ुक थी। अपने पीछे वे पत्नी, एक पुत्र तथा एक पुत्री छोड़ गये हैं। दोस्तों, अभी कुछ वर्ष पहले जब मैं पूना में कार्यरत था, तो मैं एक दिन सी. रामचन्द्र जी के बंगले के सामने से गुज़रा था। यकीन मानिए कि जैसे एक रोमांच हो आया था उस मकान को देख कर कि न जाने कौन कौन से गीत सी. रामचन्द्र जी ने कम्पोज़ किए होंगे इस मकान के अंदर। मेरा मन तो हुआ था एक बार अदर जाऊँ और उनके परिवार वालों से मिलूँ, पर उस वक़्त हिम्मत ना जुटा पाया और अब अफ़सोस होता है। ख़ैर, जो भी है, इतना ही शायद बहुत है कि उनके गीत सदा हमारे साथ हैं। आज की कड़ी के लिए हमने जो गीत चुना है, उसे सुन कर आपको अंदाज़ा होगा कि चितलकर किस स्तर के गायक थे। एक शराबी के अंदाज़ में उन्होंने यह गीत गाया था फ़िल्म 'सुबह का तारा' में, जिसके बोल हैं "ज़रा ओ जाने वाले रुख़ से आँचल को हटा देना, तूझे अपनी जवानी की क़सम सूरत दिखा देना"। नूर लखनवी का लिखा यह गीत है और संगीत तो आपको पता ही है, सी. रामचन्द्र का। वैसे इस फ़िल्म का शीर्षक गीत ही सब से लोकप्रिय गीत है इस फ़िल्म का जिसे लता और तलत ने गाया था। आज के प्रस्तुत गीत को ज़्यादा नहीं सुना गया और आज यह एक रेयर जेम बनकर रह गया है जिसमें चितलकर के मस्ती भरी गायकी की झलक मिलती है।

दोस्तों, इस शृंखला की दूसरी कड़ी में हमने सी. रामचन्द्र के शुरुआती करीयर पर एक नज़र डाला था, आइए आज उसी दौर को ज़रा विस्तार से आपको बतायें और यह जानकारी हमें प्राप्त हुई है पंकज राग लिखित किताब 'धुनों की यात्रा' से। "फ़िल्मों का शौक सी. रामचन्द्र को कोल्हापुर खींच ले गया जहाँ ललित पिक्चर्स में पचास रुपय की नौकरी के साथ एक्स्ट्रा के छोटे-मोटे रोल मिले। १९३५ में फ़िल्म 'नागानंद' में नायक का रोल मिला, पर फ़िल्म बुरी तरह पिटी। उसके बाद मिनर्वा मूवीटोन में 'सईद-ए-हवस' और 'आत्म-तरंग' जैसी फ़िल्मों में छोटे-मोटे रोल मिले। फिर अचानक बर्खास्तगी का नोटिस मिला। सी. रामचन्द्र नोटिस पाकर चुप रहनेवालों में से नहीं थे। वे मिनर्वा के मालिक सोहराब मोदी के पास पहुँच गये और सोहराब मोदी को बताकर कि उन्हें हारमोनियम बजाना आता है, मिनर्वा के संगीत-विभाग में नौकरी की गुज़ारिश की। मोदी मान गये और बुंदू ख़ान के साथ हारमोनियम वादक के रूप में उन्हें लगा दिया। पर यह काम सिर्फ़ काग़ज़ी रहा। फिर हबीब ख़ाँ ने उन्हें अपना सहायक बनाया। बाद में मीर साहब के भी सहायक रहे और हूगन से पश्चिमी संगीत के कुछ सिद्धांत भी सीखे जो बाद में सी. रामचन्द्र को अपनी अलग शैली विकसीत करने में बड़े सहयक रहे। मिनर्वा में रहते रहते सी. रामचन्द्र ने 'मीठा ज़हर', 'जेलर', और 'पुकार' फ़िल्मों में वादक के रूप में काम किया। 'पुकार' में उन्होंने शीला की गाई रचना "तुम बिन मोरी कौन खबर ले" की धुन भी स्वयं बनाई थी और 'लाल हवेली' में पहली और आख़िरी बार नूरजहाँ से अपनी धुन पर "आओ मेरे प्यारे सांवरिया" गवाया था। इसी वक़्त भगवान के निर्देशन में 'बहादुर किसान' बन रही थी। संगीतकार थे मीर साहब, और उनके सहायक के रूप में सी. रामचन्द्र भी भगवान के सम्पर्क में आये। यह सम्पर्क दोस्ती में बदल गई और आगे चलकर तो यह दोस्ती इतनी प्रगाढ़ हुई कि भगवान ने अपने संगीतकार के लिए सी. रामचन्द्र को छोड़कर वर्षों तक इधर उधर नहीं देखा।" तो दोस्तों, आज बस इतना ही, लीजिए आज का गीत सुनिए। आज सी. रामचन्द्र जी की पुण्यतिथि पर हम उन्हें अपनी श्रद्धांजली अर्पित करते हैं। ५ जनवरी १९८२ को ७२ वर्ष की आयु में भले ही उनके साँस की डोर टूट गयी हों, पर संगीत के साथ उनका जो डोर था वह आज भी बरक़रार है और हमेशा रहेगा।



क्या आप जानते हैं...
कि १९४९ से लेकर १९७१ के दरमीयाँ सी. रामचन्द्र ने १२० से अधिक फ़िल्मों में संगीत दिए।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 05/शृंखला 07
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -१९४९ में आई थी ये फिल्म.

सवाल १ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - सह गायिका कौन है इस गीत में चितलकर की - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह शरद जी मान गए आपको. दीपा जी स्वागत है, श्याम जी आप कहाँ है ?

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, January 4, 2011

कितना हसीं है मौसम, कितना हसीं सफर है....जब चितलकर की आवाज़ को सुनकर तलत साहब का भ्रम हुआ शैलेन्द्र को

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 563/2010/263

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार। आज ४ जनवरी है, यानी कि संगीतकार राहुल देव बर्मन की पुण्यतिथि। 'आवाज़' परिवार की तरफ़ से हम पंचम को दे रहे हैं श्रद्धांजली। आपको याद होगा पिछले साल इस समय हमने पंचम के गीतों से सजी लघु शृंखला 'दस रंग पंचम के' प्रस्तुत किया था। और इस साल हम याद कर रहे हैं सी. रामचन्द्र को जिनकी कल, यानी ५ जनवरी को पुण्यतिथि है। 'कितना हसीं है मौसम' - सी. रामचन्द्र के गाये और स्वरबद्ध किए गीतों के इस लघु शृंखला की आज तीसरी कड़ी है। शुरुआती दिनों में सी. रामचन्द्र ने कई फ़िल्मों में संगीत दिया जिनमें से कुछ के नाम हैं 'सगाई', 'नमूना', 'उस्ताद पेड्रो', 'हंगामा', 'शगुफ़ा', '२६ जनवरी' वगेरह। पर जिन दो फ़िल्मों के संगीत से वे कामयाबी के शिखर पर पहुँचे, वो दो फ़िल्में थीं 'शहनाई' और 'अलबेला'। जैसा कि कल हमने आपको बताया था कि 'अलबेला' के गीतों ने उस फ़िल्म को चार चांद लगाये। सारे गानें हिट हुए और गली गली गूंजे। सिनेमाघरों में लोग खड़े होकर इन गीतों के साथ झूमने की भी बात मानी जाती है। सी. रामचन्द्र ने अपने संगीत में नये नये प्रयोग किए हैं। गुजराती गरबा को हिंदी फ़िल्म संगीत में पहली बार वही लेकर आये थे, फ़िल्म थी 'नास्तिक' और गीत था "कान्हा बजाये बांसुरी"। फ़िल्म 'शहनाई' में "आना मेरी जान मेरी जान सण्डे के सण्डे" में गोवन संगीत का प्रभाव था, तो 'यासमीन' के "बेचैन नज़र बेताब जिगर" में अरबियन संगीत की मिठास और मैण्डोलिन यंत्र का दिलकश इस्तमाल किया। दोस्तों, आपको याद होगा "सण्डे के सण्डे" हमने ५९-वीं कड़ी मे सुनवाया था। उसके बाद सी. रामचन्द्र के सुमधुर संगीत से सजी एक और फ़िल्म आयी थी 'आज़ाद'। साल था १९५५। आज ५० बरसों के बाद भी इसके गीतों में वही ताज़गी है, वही कशिश बरकरार है। इस फ़िल्म का भी एक गीत "अपलम चपलम" हमने ३९३-वीं कड़ी में सुनवाया है। लेकिन आज इस फ़िल्म से लता और चितलकर का गाया एक और मशहूर गीत हम सुनने जा रहे हैं।

फ़िल्म 'आज़ाद' सी. रामचन्द्र को कैसे मिली, इसके पीछे एक मज़ेदार क़िस्सा है। प्रोड्युसर एस. एम. एस. नायडू ने पहले संगीतकार नौशाद को इस फ़िल्म के संगीत का उत्तरदायित्व देना चाहा, पर उन्होंने नौशाद साहब के सामने शर्त रख दी कि एक महीने के अंदर सभी ९ गीत उन्हें तैयार चाहिए। नौशाद को यह शर्त मंज़ूर नहीं हुई। तब नायडू साहब ने कई और संगीतकारों से सम्पर्क किया, नय्यर साहब से भी मिले, पर कोई भी तैयार नही हुआ। आख़िरकार चुनौति स्वीकारी सी. रामचन्द्र ने। सच में उन्होंने एक महीने के अंदर सारे गानें रेकॊर्ड कर लिए और सभी गीत एक से बढ़कर एक साबित हुए। यही नहीं, फ़िल्म 'आज़ाद' में सी. रामचन्द्र ने लता मंगेशकर के साथ एक युगल गीत भी गाया और यही गीत है आज के इस अंक की शान। "कितना हसीं है मौसम, कितना हसीं सफ़र है, साथी है ख़ूबसूरत, यह मौसम को भी ख़बर है"। अब दोस्तो, इस गीत से जुड़ा भी एक क़िस्सा है। हुआ युं कि उस समय दिलीप कुमार के ज़्यादातर गानें तलत महमूद साहब गाया करते थे, और उन्हीं की गायकी और स्टाइल को ध्यान में रखकर सी. रामचन्द्र ने यह गीत बनाया था। पर सम्भवत: 'डेट प्रॊबलेम' की वजह से तलत साहब रेकॊर्डिंग् तक नहीं पहुँच सके। और क्योंकि गीत जल्द से जल्द रेकॊर्ड होना था, सी. रामचन्द्र ने यह निर्णय लिया कि उस गीत को वे ख़ुद ही गायेंगे। उन्होंने अपनी आवाज़ को युं तलत साहब की शैली मे ढालकर इस गीत को गाया कि आज भी कभी कभी यह शक़ सा होता है कि कहीं इस गीत को तलत साहब ने तो नहीं गाया था। इस गीत के गीतकार शैलेन्द्र ने जब इस गीत की रेकॊर्डिंग् सुनी तो उन्होंने सी. रामचन्द्र से सामने १०० रुपय की शर्त रख दी कि यह आवाज़ तलत महमूद की ही है। पर जब बाद में दूसरे लोगों से उन्हें यह पता चला कि असल मे यह आवाज़ सी. रामचन्द्र की है, तो वे शर्त हार गये। तो लीजिए आज इस गीत का आनंद उठाइए, वैसे इन दिनों मौसम वाक़ई हसीं हो रखा है, मीठी मीठी सर्दियों का आप सभी आनंद ले रहे होंगे, ऐसी हम उम्मीद रखते हैं.



क्या आप जानते हैं...
कि हिंदी में सी. रामचंद्र के संगीत से सजी अंतिम फ़िल्म थी 'तूफ़ानी टक्कर' (१९७८)

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 04/शृंखला 07
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - चितलकर ने इसे एक शराबी के अंदाज़ में गाया था.

सवाल १ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - गीत के मुखड़े में नायिका को गीतकार किस बात की कसम दे रहा है - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
एकदम सही जवाब है शरद जी....अरे इंदु जी आप कैसे मैदान छोड़ गए, देखिये सब कह रहे हैं कि सवाल आसान थे. बहरहाल अमित जी और अवध जी सही जवाब लेकर आये. भारतीय नागरिक जी धन्येवाद. रोमेंद्र जी कैसे हैं आप

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, January 3, 2011

दाने दाने पे लिखा है खाने वाले का नाम...क्या खूब प्रयोग किया राजेन्द्र कृष्ण साहब ने इस मुहावरे का गीत में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 562/2010/262

'कितना हसीं है मौसम' - चितलकर रामचन्द्र के स्वरबद्ध और गाये गीतों की इस लघु शृंखला की दूसरी कड़ी में आप सभी का स्वागत है। सी. रामचन्द्र का जन्म महाराष्ट्र के अहमदनगर के पुणेताम्बे में १२ जून १९१५ को हुआ था। उनके पिता रेल्वे में सहायक स्टेशन मास्टर की नौकरी किया करते थे। अपने बेटे की संगीत के प्रति लगाव और रुझान को देख कर उन्हें नागपुर के एक संगीत विद्यालय में भर्ती करवा दिया। फिर उन्होंने पुणे में विनायकबुआ पटवर्धन से गंधर्व महाविद्यालय म्युज़िक स्कूल में संगीत की शिक्षा प्राप्त की। उन दिनों मूक फ़िल्मों का दौड़ था, वे कोल्हापुर आ गये और कई फ़िल्मों में अभिनय किया। पर उनकी क़िस्मत में तो लिखा था संगीतकार बनकर चमकना। कोल्हापुर से बम्बई में आने के बाद सी. रामचन्द्र सोहराब मोदी की मशहूर मिनर्वा मूवीटोन में शामिल हो गए जहाँ पर उन्हें उस दौर के नामचीन संगीतकारों, जैसे कि हबीब ख़ान, हूगन और मीरसाहब के सहायक बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। हूगन से उन्होंने पाश्चात्य संगीत सीखा जो बाद में उनके संगीत में नज़र आने लगा, और शायद उनका यही वेस्टर्ण स्टाइल उन्हें क्रांतिकारी संगीतकार होने का गौरव दिलाया। सी. रामचन्द्र इस नाम से स्थापित होने से पहले तीन और नामों से संगीत दिए। श्यामू के नाम से 'ये है इण्डिया दुनिया' में, राम चितलकर के नाम से 'सुखी जीवन', 'बदला', 'मिस्टर झटपट', 'बहादुर' और 'दोस्ती' में, तथा अन्नासाहब के नाम से 'बहादुर प्रताप', 'मतवाले' और 'मददगार' में। संगीतकार के रूप में उन्हें पहली फ़िल्म मिली थी तमिल फ़िल्म 'जयक्कोडी' और 'वनमोहिनी'। अनिल बिस्वास, बसंत प्रकाश, धनीराम, वसंत देसाई और ओ. पी. नय्यर जैसे संगीतकारों के साथ उन्होंने काम किया और संगीत सृजन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

सी. रामचन्द्र के संगीत से सजी पहली हिंदी फ़िल्म थी 'सुखी जीवन'। सचिन देव बर्मन, ओ. पी. नय्यर और दूसरे कई संगीतकारों ही की तरह उनकी शुरुआत भी सुखद नही रही। लोगों के दिलों में जगह बनाने के लिए उन्हें भी कड़ी मेहनत और जद्दोजहद करनी पड़ी। लेकिन एक बार कामयाबी की राह पर चल निकले तो फिर कभी पीछे मुड़कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी। वो कहते हैं न कि दाने दाने पे लिखा है खाने वाले का नाम। तो जो शोहरत, जो बुलंदी, चितलकर साहब के नसीब में लिखी थी, वो उन्हें मिली, और आज उनका नाम फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के अग्रणी संगीतकारों में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। दोस्तों, आज हमने जिस गीत को चुना है, उसके बोल अभी अभी हम बता चुके हैं। जी हाँ, "दाने दाने पे लिखा है खाने वाले का नाम, लेने वाले करोड़ देने वाला एक राम"। यह गीत १८५७ की फ़िल्म 'बारिश' का है जिसे चितलकर ने अपनी एकल आवाज़ में गाया है। बोल सुन कर ऐसा लगता है जैसे कोई भक्तिमूलक रचना है, लेकिन सुनने पर पता चलता है कि पाश्चात्य ऒर्केस्ट्रेशन पर आधारित है यह गीत, लेकिन गीत में जो दर्शन छुपा हुआ है, उससे मुंह मोड़ा नहीं जा सकता। राजेन्द्र कृष्ण साहब के लिखे इस गीत में वो कहते हैं कि "कभी गरमी की मौज कभी बारिश का रंग, ऐसे चक्कर को देख सारी दुनिया है दंग, चांद सूरज ज़मीन सारे उसके ग़ुलाम, लेने वाले करोड़ देने वाला एक राम"। भाव बस यही है कि सब कुछ उस एक आद्यशक्ति, उस एक सुप्रीम पावर द्वारा संचालित है, यह पूरी दुनिया, यह अंतरिक्ष, सब कुछ उस एक शक्ति का ग़ुलाम है। आइए इस गीत को सुनें, हमें यकीन है कि आपने बहुत दिनों से इस गीत को नहीं सुना होगा।



क्या आप जानते हैं...
कि सी. रामचन्द्र ने हिंदी के अलावा ७ मराठी, ३ तेलुगु, ६ तमिल और कई भोजपुरी फ़िल्मों का भी संगीत तैयार किया।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 03/शृंखला 07
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.

सवाल १ - फिल्म के नायक बताएं - १ अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - इस गीत में अन्ना जिस गायक की आवाज़ इस्तेमाल करना चाह रहे थे खुद उसी गायक की शैली में उन्होंने इस गीत को गाया है, कौन थे वो गायक जो इस गीत को नहीं गा पाए- २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अरे अरे, लगता है कि आप लोग गलत गीत पर दाव खेल बैठे. शुरूआती धुन को सुनकर थोडा सा भरम होता है, पर हमने मुहावरे का भी हिंट दिया था, खैर अवध जी सही निकले, शरद जी और प्रतिभा जी बिना अंकों के ही संतुष्ट होना पड़ेगा. श्याम जी और अमित जी कहाँ गायब हैं ?

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, January 2, 2011

शाम ढले, खिडकी तले तुम सीटी बजाना छोड़ दो....हिंदी फिल्म संगीत जगत के एक क्रान्तिकारी संगीतकार को समर्पित एक नयी शृंखला

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 561/2010/261

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और आप सभी को एक बार फिर से नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ! साल २०११ आपके जीवन में अपार सफलता, यश, सुख और शांति लेकर आये, यही हमारी ईश्वर से कामना है। और एक कामना यह भी है कि हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के माध्यम से फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के अनमोल मोतियों को इसी तरह आप सब की ख़िदमत में पेश करते रहें। तो आइए नये साल में नये जोश के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के कारवाँ को आगे बढ़ाया जाये। दोस्तों, फ़िल्म संगीत के इतिहास में कुछ संगीतकार ऐसे हुए हैं जिनके संगीत ने उस समय की प्रचलित धारा को मोड़ कर रख दिया था, यानी दूसरे शब्दों में जिन्होंने फ़िल्म संगीत में क्रांति ला दी थी। जिन पाँच संगीतकारों को क्रांतिकारी संगीतकारों के रूप में चिन्हित किया गया है, उनके नाम हैं मास्टर ग़ुलाम हैदर, सी. रामचन्द्र, ओ. पी. नय्यर, राहुल देव बर्मन और ए. आर. रहमान। इनमें से एक क्रांतिकारी संगीतकार को समर्पित है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की आज से शुरु होने वाली लघु शृंखला। ये वो संगीतकार हैं, जो फ़िल्म जगत में आये तो थे नायक बनने, कुछ फ़िल्मों में अभिनय भी किया, पर उनकी क़िस्मत में लिखा था संगीतकार बनना, सो बन गये एक क्रांतिकारी संगीतकार। इसके साथ साथ उन्होंने अपनी गायकी के जलवे भी दिखाये समय समय पर। जी हाँ, जिस फ़नकार पर केन्द्रित है यह लघु शृंखला, उन्हें हम संगीतकार के रूप में सी. रामचन्द्र के नाम से और गायक के रूप में चितलकर के नाम से जानते हैं। प्रस्तुत है अन्ना साहब, अर्थात् चितलकर नरहर रामचन्द्र, यानी सी. रामचन्द्र के स्वरबद्ध किए और गाये गीतों से सजी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई लघु शृंखला 'कितना हसीं है मौसम'। इस शृंखला में हम ना केवल उनके गाये व संगीतबद्ध किए गीत सुनवाएँगे, बल्कि उनके जीवन और करीयर से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं से भी आपका परिचय करवाएँगे।

आइए इस शृंखला की पहली कड़ी में हम आपको सुनवाते हैं फ़िल्म 'अलबेला' से चितलकर और लता मंगेशकर की युगल आवाज़ों में "शाम ढले खिड़की तले तुम सीटी बजाना छोड़ दो"। 'अलबेला' १९५१ की फ़िल्म थी और यह साल सी. रामचन्द्र के करीयर का एक महत्वपूर्ण साल साबित हुआ था। १९४२ में सी. रामचन्द्र ने हिंदी फ़िल्मों में बतौर संगीतकार पदार्पण किया था मास्टर भगवान की फ़िल्म 'सुखी जीवन' में। और इसके करीब १० साल बाद १९५१ में भगवान दादा की ही फ़िल्म 'अलबेला' में संगीत देकर सफलता के नये झंडे गाढ़े। मास्टर भगवान शकल सूरत से बहुत ही साधारण थे जहाँ तक फ़िल्म में नायक बनने की बात थी। लेकिन उन्होंने इतिहास कायम किया ना केवल इस फ़िल्म को प्रोड्युस व डिरेक्ट कर के, बल्कि फ़िल्म में गीता बाली के विपरीत नायक बन कर उन्होंने सब को चौंका दिया। इसमें कोई शक़ नहीं कि इस फ़िल्म की सफलता का एक मुख्य कारण इसका संगीत रहा। गीतकार राजेन्द्र कृष्ण और संगीतकार सी. रामचन्द्र ने सर्वसाधारण के नब्ज़ को सटीक पकड़ा और हल्के फुल्के बोलों से तथा पाश्चात्य व शास्त्रीय संगीत के मिश्रण से लोकप्रिय गीत संगीत की रचना की। ये गानें थोड़े से पारम्परिक भी थे, थोड़े आधुनिक भी, थोड़े शास्त्रीयता लिये हुए भी और थोड़े पाश्चात्य भी। फ़िल्म का हर गीत हिट हुआ और ऐसा सुना गया कि जब यह फ़िल्म थिएटर में चलती थी तो जब जब कोई गाना शुरु होता, लोग खड़े हो जाते और डान्स करने लग पड़ते। अन्य गीतों के अलावा लता और चितलकर की आवाज़ों में इस फ़िल्म में कुछ युगल गीत थे जैसे कि "शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के", "भोली सूरत दिल के खोटे", "मेरे दिल की घड़ी करे टिक टिक टिक" तथा राग पहाड़ी पर आधारित आज का प्रस्तुत गीत "शाम ढले खिड़की तले"। रोमांटिक कॊमेडी पर आधारित यह गीत ५० वर्ष बाद आज भी हमें गुदगुदा जाता है और यकायक हमारे होठों पर मुस्कान खिल उठता है। तो आइए आप भी मुस्कुराइए और सुनिए 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर साल २०११ का पहला गोल्डन गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि १९ नवंबर १९४२ को सी. रामचन्द्र ने अपनी मकान-मालकिन की बेटी रतन ठाकुर से प्रेम-विवाह कर लिया था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 02/शृंखला 07
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - खुद अन्ना ने गाया है इस गीत को.

सवाल १ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम क्या है - १ अंक
सवाल ३ - गाने के शुरूआती बोल किस मुहावरे पर हैं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी को २ अंक और श्याम जी को १ अंक की बधाई. इंदु जी जरा ध्यान से खेलिए

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Thursday, November 25, 2010

आधा है चंद्रमा रात आधी.....पर हम वी शांताराम जैसे हिंदी फिल्म के लौह स्तंभ पर अपनी बात आधी नहीं छोडेंगें

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 535/2010/235

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार! 'हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ' - इस लघु शृंखला के पहले खण्ड के अंतिम चरण मे आज हम पहुँच चुके हैं। इस खण्ड में हम बात कर रहे हैं फ़िल्मकार वी. शांताराम की। उनकी फ़िल्मी यात्रा में हम पहुँच चुके थे १९५७ की फ़िल्म 'दो आँखें बारह हाथ' तक। आज बातें उनकी एक और संगीत व नृत्य प्रधान फ़िल्म 'नवरंग' की, जो आई थी ५० के दशक के आख़िर में, साल था १९५९। इससे पहले की हम इस फ़िल्म की विस्तृत चर्चा करें, आइए आपको बता दें कि ६०, ७० और ८० के दशकों में शांताराम जी ने किन किन फ़िल्मों का निर्देशन किया था। १९६१ में फिर एक बार शास्त्रीय संगीत पर आधारित म्युज़िकल फ़िल्म आई 'स्त्री'। 'नवरंग' और 'स्त्री', इन दोनों फ़िल्मों में वसत देसाई का नहीं, बल्कि सी. रामचन्द्र का संगीत था। १९६३ में वादक व संगीत सहायक रामलाल को उन्होंने स्वतंत्र संगीतकार के रूप में संगीत देने का मौका दिया फ़िल्म 'सेहरा' में। इस फ़िल्म के गानें भी ख़ूब चले। १९६४ की में वी. शांताराम ने अपनी सुपुत्री राजश्री शांताराम को बतौर नायिका लॉन्च किया फ़िल्म 'गीत गाया पत्थरों ने' में। जीतेन्द्र की भी यह पहली फ़िल्म थी और इस फ़िल्म के संगीत ने भी ख़ूब नाम कमाया। संगीतकार एक बार फिर रामलाल। १९६६ में 'लड़की सह्याद्री की' और १९६७ में 'बूंद जो बन गए मोती' इस दशक की दो और उल्लेखनीय फ़िल्में थीं। इन दो फ़िल्मों के संगीतकार थे क्रम से वसंत देसाई और सतीश भाटिया। मुकेश की आवाज़ में "ये कौन चित्रकार है" गीत प्रकृति की सुषमा का वर्णन करने वाले गीतों में सर्वोपरी लगता है। ऐसे में १९७१ में 'जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली', १९७२ में 'पिंजरा', १९७५ में 'चंदनाची चोली अंग अंग जली', और १९७७ में 'चानी' नाम की कमचर्चित फ़िल्में आईं जो व्यावसायिक दृष्टि से असफल रही। बहुत कम लोगों ने सुना होगा, पर फ़िल्म 'चानी' में लता का गाया 'मैं तो जाऊँगी जाऊँगी जाऊँगी उस पार" गीत में कुछ और ही बात है। इस गीत को हम खोज पाए तो आपको ज़रूर सुनवाएँगे कभी। १९८६ में शांताराम ने 'फ़ायर' नामक फ़िल्म का निर्देशन किया था जो उनकी फ़िल्मी सफ़र की अंतिम फ़िल्म थी। एक अभिनेता, निर्माता और निर्देशक होने के अलावा वी. शांताराम फ़िल्म सोसायटी' के अध्यक्ष भी रहे ७० के दशक के आख़िर के सालों में। १९८६ में सिनेमा में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए शांताराम जी को दादा साहब फालके पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। ३० अक्तुबर १९९० को वी. शांताराम का बम्बई में निधन हो गया।

दोस्तों, वी. शांताराम के फ़िल्म के जिस गीत से उन पर केन्द्रित इस शृंखला को हम समाप्त कर रहे हैं, वह है फ़िल्म नवरंग का कालजयी युगल गीत "आधा है चन्द्रमा रात आधी, रह ना जाए तेरी मेरी बात अधी, मुलाक़ात आधी"। 'झनक झनक पायल बाजे' की अपार सफलता के बाद सन् १९५९ में शांताराम जी ने कुछ इसी तरह की एक और नृत्य और संगीत-प्रधान फ़िल्म बनाने की सोची और इस तरह से 'नवरंग' की कल्पना की गई। अभिनेत्री के रूप में संध्या को ही फ़िल्म में बरकरार रखा गया, लेकिन नायक के रूप में आ गये महिपाल। संगीत पक्ष के लिए वसंत देसाई की जगह पर आ गई अन्ना साहब यानी कि सी. रामचन्द्र। भरत व्यास ने फ़िल्म के सभी गीत लिखे। आशा भोसले और महेन्द्र कपूर के गाये इस गीत के साथ महेन्द्र कपूर का एक दिलचस्प वक्या जुड़ा हुआ है, जिसे महेन्द्र कपूर ने विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में कहे थे। उनके अनुसार इस गीत के निर्माण के दौरान उनका करीयर दाव पर लग गया था। हुआ युं था कि यह गीत किसी रिकॉर्डिंग स्टुडिओ में नहीं बल्कि 'राजकमल कलामंदिर' में रेकॊर्ड किया जा रहा था, जो एक फ़िल्म स्टुडिओ था। एक तरफ़ वो इस बात से नर्वस थे कि पहली बार अशा भोसले के साथ गा रहे हैं, और दूसरी तरफ़ देखा कि रेकॊर्डिस्ट मंगेश देसाई और दूसरे नकनीकी सहायक एक एक कर के कन्ट्रोल रूम से बाहर निकल के आ रहे हैं और उनकी तरफ़ अजीब निगाहों से देख रहे हैं। सी. रामच्न्द्र मंगेश से पूछते हैं कि 'काय बख्तोस तू?' (तुम क्या देख रहे हो?)। मंगेश देसाई कहते हैं कि रेकॊर्डिंग् कैन्सल करनी पड़ेगी क्योंकि महेन्द्र कपूर की आवाज़ स्थिर नहीं है, और वो नर्वस हैं। तब अन्ना ने कहा कि ये तो फ़र्स्ट क्लास गा रहा है, तुम अपना वायरिंग् चेक करो। और तभी इस बात पर से पर्दा उठा कि महेन्द्र कपूर के माइक्रोफ़ोन का प्लग ढीला हो गया था, जिस वजह से ये कंपन आ रहा था। महेन्द्र कपूर यह मानते हैं कि अगर उस प्लग के ढीले होने की बात पता ना चलती तो शायद उसी दिन उनका करीयर ख़त्म हो जाता। तो दोस्तों, आइए अब इस गीत को सुनते हैं, और इसी के साथ समाप्त करते हैं 'हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ' शृंखला का पहला खण्ड जो समर्पित था महान फ़िल्मकार वी. शांताराम को। अगले हफ़्ते इस शृंखला के दूसरे खण्ड में हम एक और महान फ़िल्मकार के फ़िल्मी सफ़र के साथ हाज़िर होंगे, तब तक के लिए अनुमति दीजिए, शनिवार को 'ईमेल के बहाने, यादों के ख़ज़ाने' में पधारना ना भूलिएगा, नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि बतौर लेखक वी. शांताराम को उनकी तीन फ़िल्मों के साथ जोड़ा जा सकता है - 'अमृत मंथन' (संवाद), 'नवरंग' (स्क्रीनप्ले), 'सेहरा' (स्क्रीनप्ले)

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ६ /शृंखला ०४
गीत का प्रील्यूड सुनिए -


अतिरिक्त सूत्र - नौशाद साहब हैं संगीतकार

सवाल १ - किस निर्देशक की चर्चा में होगा ये गीत - २ अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - गायिका बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
श्याम कान्त जी एक बार फिर सही निकले. रोमेंद्र समय पर पहुंचे कल तो अमित भाई का भी जवाब उनके लिए एक अंक का बोनस दे गया. शरद जी आज देखते हैं...:)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, November 2, 2010

झुकती है दुनिया झुकाने वाला चाहिए....मगर लता जी से भी तो चूक हो गयी यहाँ

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 518/2010/218

'गीत गड़बड़ी वाले' - 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस अनोखी शृंखला की आठवीं कड़ी में आप सभी का एक बार फिर स्वागत है। जैसा कि कल हमने आपको बताया था, आज भी हम एक ऐसा गीत सुनेंगे जिसमें गायक ने उर्दू उच्चारण में गड़बड़ी की है। कल आशा जी की बारी थी, आज कठघड़े में हैं उनकी बड़ी बहन लता जी। एक फ़िल्म आयी थी साल १९५१ में - 'सगाई'। इसमें एक बड़ा ही चंचल गीत था "झुकती है दुनिया झुकाने वाला चाहिए"। उस ज़माने में सी. रामचन्द्र के इस अंदाज़ के गानें ख़ूब चले थे। हास्य रस पर आधारित इस गीत को गाया था लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी, चितलकर और साथियों ने। गीत के एक अंतरे की पंक्तियाँ हैं "श्रीमती हो या बेगम, एक जान और सौ सौ ग़म, औरत को कमज़ोर ना समझो मर्दों से किस बात पे कम"। इस पंक्ति में लता जी ने "बेगम" शब्द में "ग" को उर्दू गाफ की जगह ग़ैन का उपयोग कर "बेगम" को "बेग़म" गाया है। कुछ इसी तरह की ग़लती लता जी ने बरसों बरस बाद १९९५ की सुपर डुपर हिट फ़िल्म 'दिल तो पागल है' के एक गीत में भी किया है। लेकिन उसमें उन्होंने "ख़" को "ख" गाया है। "चाँद ने कुछ कहा, रात ने कुछ सुना, तू भी सुन बेख़बर प्यार कर"।

'सगाई' वर्मा फ़िल्म्स की प्रस्तुति थी जिसे निर्देशित किया था एच. एस. रवैल ने। प्रेम नाथ, रेहाना, याकूब, गोप, विजयलक्ष्मी अभिनीत इस फ़िल्म के गानें लिखे थे राजेन्द्र कृष्ण ने। आज के प्रस्तुत गीत के अलावा इस फ़िल्म में एक और हास्य गीत था लता जी की एकल आवाज़ में, जिसके बोल थे "डैडी जी मेरी मम्मी को सताना नहीं अच्छा"। इसके अलावा लता और तलत के गाये "मोहब्बत में ऐसे ज़माने भी आए, कभी रो दिए हम कभी मुस्कुराये" के क्या कहने! और लता की गाई "दिल की कहानी कहना तो चाहे हाये री क़िस्मत कह ना सके" भी ख़ूब मशहूर हुई थी उस ज़माने में। इसी साल लता - सी. रामचन्द्र - राजेन्द्र कृष्ण की टीम ने फ़िल्म 'ख़ज़ाना' में एक गाना दिया था, "ऐ चाँद प्यार मेरा मुझसे कह रहा है, युं बेवफ़ा ना होना दुनिया तो बेवफ़ा है", जो लेखन, संगीत और गायकी के लिहाज़ से बेहद उत्कृष्ट गीत है, लेकिन अफ़सोस कि आज ऐसे गीतों को भुला दिया जा चुका है। 'सगाई' में रफ़ी, चितलकर और शम्शाद बेगम का गाया हुआ भी एक दुर्लभ गीत है "एक दिन लाहौर की ठंडी सड़क... तबीयत साफ़ हो गई साफ़", यह गीत भी निस्संदेह हास्य व्यंग का गीत है। तो आइए इसी हास्य व्यंग के मूड को बरकरार रखते हुए सुनते हैं लता-रफ़ी-चितलकर की त्रिवेणी संगम से उत्पन्न फ़िल्म 'सगाई' का यह समूह गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि सी. रामचन्द्र को १९३९ की तमिल फ़िल्म 'जयकोडी' में संगीत देने का मौका मिला था। पर फ़िल्म की नायिका से वो इश्क़ कर बैठे। और क्योंकि फ़िल्म के निर्माता भी उसी नायिका पर आशिक़ थे, इसलिए बात बिगड़ गई और सी. रामचन्द्र के हाथ से फ़िल्म निकल गई।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०९ /शृंखला ०२
बहुत आसान है इस प्रिल्यूड को सुनिए -


अतिरिक्त सूत्र - इस युगल गीत में पुरुष आवाज़ है किशोर दा की.

सवाल १ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - संगीतकार बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी आपने पूरे प्रश्न का जवाब सही नहीं दिया, इसलिए हमें अंक शरद जी को देने पड़ेंगें. प्रतिभा जी और किशोर जी अरसे बाद लौटे कल, स्वागत और मनु जी ने आकर तो नुक्ते पर पूरी नुक्ताचीनी ही कर दी. अवध जी सुनना पड़ेगा फिर आपके वाला गीत भी

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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