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Friday, February 6, 2009

इस मोड़ से जाते हैं, कुछ सुस्त कदम रस्ते,: पंचम दा पर विशेष

हिन्दी फ़िल्म संगीत के इतिहास में अगर किसी संगीत निर्देशक को सबसे ज्यादा प्यार मिला, तो वह निस्संदेह आर डी वर्मन,या पंचम दा हैं |सचिन देव वर्मन जैसे बड़े और महान निर्देशक के पुत्र होने के बावजूद पंचम दा ने अपनी अलग और अमिट पहचान बनाई |कहते हैं न,पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं,जब इनका जन्म हुआ था,तब अभिनेता स्व अशोक कुमार ने देखा कि नवजात आर डी बार बार पाँचवा स्वर "पा" दुहरा रहे हैं,तभी उन्होने इनका नाम रख दिया "पंचम "|आज भी वे बहुत सारे लोगों के लिये सिर्फ़ पंचम दा हैं| सिर्फ़ नौ बरस की उम्र में उन्होंने अपना पहला गीत "ऐ मेरी टोपी पलट के" बना लिया था,जिसे उनके पिता ने "फ़ंटूश" मे लिया भी था| काफ़ी कम उम्र में पंचम दा ने "सर जो तेरा चकराये …" की धुन तैयार कर ली जिसे गुरुदत्त की फ़िल्म "प्यासा" मे लिया गया | आगे जाकर जब आर डी संगीत बनाने लगे,तो उनकी शैली अपने पिता से काफ़ी अलग थी, और इस बात को लेकर दोनों का नजरिया अलग था । आर डी हिन्दुस्तानी के साथ पाश्चात्य संगीत का भी मिश्रण करते थे,जो सचिन देव वर्मन साहब को रास नहीं आता था, इस बात पर एक बार मशहूर गीतकार मजरुह सुल्तानपुरी साहब ने इन्हें समझाया तो पंचम बोले : "देखिये अंकल,बाबा बहुत बड़े म्यूजिक डायरेक्टर हैं,उनसे मैने बहुत कुछ सीखा है और सीखूँगा,लेकिन मैं उनकी राह पर नहीं चलूँगा । मैं अपना रास्ता कुछ अलग निकालूंगा ।" और पंचम दा ने अपनी बात सच साबित कर दिखाई ।

सुनिए उनके शुरूआती दौर की फ़िल्म "भूत बंगला" के ये मस्ती भरा गीत -


संगीत में किसी की सफ़लता का एक पैमाना यह भी होता है कि आप अपने समकालीन कलाकारों से कितनी इज्जत पाते हैं और आपका काम कितना लोकप्रिय होता है । लेकिन आर डी वर्मन की बात करें तो उनके लिये तात्कालिक सफ़लता से ज्यादा यह बात मायने रखती थी कि आपके गाने कितने दिनों तक याद किये जायेंगें,शायद यही कारण भी है कि उनके गाने आज भी हमारे काफ़ीं करीब हैं । मिसाल के तौर पर फ़िल्म परिचय से 'बीती ना बिताई रैना' ,या फ़िर आँधी फ़िल्म मे 'इस मोड़ से जाते हैं,कुछ सुस्त कदम रस्ते' जैसे गीत आज भी काफ़ी पसंद किये जाते हैं और पंचम दा की श्रेष्ठता के परिचायक हैं ।

एक ऐसा ही राग आधारित गीत है फ़िल्म किनारा का "मीठे बोल बोले...", सुनिए -


विशेषज्ञों के अनुसार,आर डी अपने समकालीन निर्देशकों से सालों आगे थे और संगीत की उनकी समझ अन्य की तुलना में कहीं बेहतर थी । वे भारतीय तथा पाश्चात्य संगीत के मिश्रित प्रयोग से संगीत में जादू भर देते । संगीत फ़िल्म की सिचुएशन मे सही हो इसके लिये वह काफ़ी मेहनत करते थे, और कई बार तो धुन बनाते समय फ़िल्म के हीरो का चेहरा दिमाग में रखते थे ताकि धुन बिलकुल सही बैठे । संगीत कभी भी गायक की आवाज पर भारी नहीं पड़ना चाहिये, ऐसा पंचम दा का मानना था, और शायद इसी कारण उनके गाने जादू भरे होते थे, क्योंकि उनमें बेहतरीन सगीत और गीत के साथ सादगी भी होती थी । भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ पाश्चात्य संगीत का मिश्रण कब और कैसे करना है, यह पंचम दा को खूब आता था ; फ़िल्म अमर प्रेम के गाने 'कुछ तो लोग कहेंगें' को ही ले लें जिसमें राग खमाज और राग कलावती के साथ पाश्चात्य संगीत का अद्भुत मिश्रण है । यही नहीं, इनकी रचनात्मकता सिर्फ़ गाने बनाने तक सीमित नहीं थी । नई तकनीकि का इस्तेमाल, रेकार्डिग, बिना तबले के गाने की रेकार्डिग, और विशेष प्रभाव के लिये नये वाद्यों का ईजाद आर डी की विविधता के परिचायक हैं । यहां तक कि सुपरहिट गीत 'चुरा लिया है तुमने जो दिल को' में ग्लास पर चम्मच टकराने की आवाज का इस्तेमाल भी पचम दा ने किया था ।

"चुरा लिया है..." आशा की जादूभरी आवाज़ में -


कई सफ़ल नामों,मसलन गुलजार,आशा भोंसले,किशोर कुमार आदि के सफ़र में पंचम दा की अहम भूमिका रही है । गुलजार साहब,जो कि पंचम दा के बहुत करीब के लोगों में से एक थे,पंचम दा के बारे में कहते हैं "संगीत के तो सिर्फ़ सात ही सुर हैं,पर पंचम की शख्सियत में बेपनाह सुर थे"। आशा जी की आवाज को जिस तरह आर डी वर्मन साहब ने इस्तेमाल किया,वैसा शायद किसी ने नही (ओ पी नैयर अपवाद हैं) किया । इस महान शख्सियत के कुछ पहलुओं को आज हमने छुआ,अगली बार और कई बातों के साथ मिलेंगें आज बस इतना ही । चलते चलते आपको वह गीत सुनवाते हैं जिसने लता जी और भूपेन्द्र जी दोनों को श्रेष्ठ गायक का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार दिलाया ।

"बीते न बितायी रैना..." फ़िल्म परिचय से -


प्रस्तुति - आलोक शंकर


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