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Sunday, November 1, 2015

जगजीत सिंह और राग : SWARGOSHTHI – 242 : JAGJEET SINGH AND RAGAS


स्वरगोष्ठी – 242 में आज

संगीत के शिखर पर – 3 : जगजीत सिंह के गजल, गीत और भजन

जगजीत सिंह के बेमिसाल मगर कमचर्चित राग प्रयोग की एक झलक




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी सुरीली श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का एक बार पुनः स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनकी प्रस्तुतियों की चर्चा करेंगे। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व का उल्लेख और उनकी कृतियों के उदाहरण प्रस्तुत करेंगे। आज श्रृंखला की दूसरी कड़ी में हमारा विषय है, गजल गायकी और इस विधा में अत्यन्त लोकप्रिय रहे गायक जगजीत सिंह और उनकी गजल, गीत और भजन की राग आधारित प्रस्तुतियाँ। आज के अंक में हम जगजीत सिंह द्वारा प्रस्तुत राग दरबारी कान्हड़ा में निबद्ध एक द्रुत रचना, राग भैरवी में ठुमरियाँ और राग दरबारी कान्हड़ा के स्वरों में एक कीर्तन सुनवाएँगे।



गजीत सिंह का जन्म 8 फरवरी,1941 को राजस्थान के गंगानगर में हुआ था। पिता सरदार अमर सिंह धमानी सरकारी कर्मचारी थे। जगजीत सिंह का परिवार मूलतः पंजाब के रोपड़ ज़िले के दल्ला गाँव का रहने वाला है। उनकी प्रारम्म्भिक शिक्षा गंगानगर के खालसा स्कूल में हुई और बाद में माध्यमिक शिक्षा के लिए जालन्धर आ गए। डी.ए.वी. कॉलेज से स्नातक की शिक्षा पूर्ण की और इसके बाद कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की। जगजीत सिंह को बचपन मे अपने पिता से संगीत विरासत में मिला था। गंगानगर मे ही पण्डित छगनलाल शर्मा से दो साल तक शास्त्रीय संगीत सीखा। बाद में सेनिया घराने के उस्ताद जमाल खाँ से ख्याल, ठुमरी और ध्रुवपद की बारीकियाँ सीखीं। आगे चल कर उन्होने ग़ज़ल गायकी के क्षेत्र में कुछ नये प्रयोग कर संगीत की इसी विधा में आशातीत सफलता प्राप्त की, परन्तु जब भी उन्हें अवसर मिला, अपनी शास्त्रीय संगीत शिक्षा को अनेक संगीत सभाओं में प्रकट किया। जगजीत सिंह द्वारा प्रस्तुत किये गए अधिकतर ग़ज़लों, गीतों और भजनों में रागों का स्पर्श स्पष्ट परिलक्षित होता है। राग दरबारी और भैरवी उनके प्रिय राग थे। आइए, आपको सुनवाते हैं, जगजीत सिंह के स्वर में राग दरबारी, द्रुत एकताल में निबद्ध एक खयाल रचना।


राग दरबारी : “नज़रें करम फरमाओ...” : जगजीत सिंह




जगजीत सिंह 1955 में मुम्बई आ गए। यहाँ से उनके संघर्ष का दौर आरम्भ हुआ। मुम्बई में रहते हुए विज्ञापनों के लिए जिंगल्स गाकर, वैवाहिक समारोह अथवा अन्य मांगलिक अवसरों पर गीत-ग़ज़लें गाकर अपना गुजर करते रहे। उन दिनों देश के स्वतंत्र होने के बावजूद ग़ज़ल गायकी के क्षेत्र में दरबारी परम्परा कायम थी। संगीत की यह विधा रईसों, जमींदारों और अरबी-फारसी से युक्त क्लिष्ट उर्दू के बुद्धिजीवियों के बीच ही प्रचलित थी। जगजीत सिंह ने ग़ज़ल को इस दरबारी परम्परा से निकाल कर जनसामान्य के बीच लोकप्रिय करने का प्रयत्न किया। उस दौर में ग़ज़ल गायकी के क्षेत्र में नूरजहाँ, मलिका पुखराज, बेग़म अख्तर, तलत महमूद और मेंहदी हसन जैसे दिग्गजॉ के प्रयत्नों से ग़ज़ल, अरबी और फारसी के दायरे से निकल कर उर्दू के साथ नये अंदाज़ में सामने आने को बेताब थी। ऐसे में जगजीत सिंह, अपनी रेशमी आवाज़, रागदारी संगीत का प्रारम्भिक प्रशिक्षण तथा संगति वाद्यों में क्रान्तिकारी बदलाव कर इस अभियान के अगुआ बन गए। अब आपको सुनवाने के लिए हमने चुना है, जगजीत सिंह की आवाज़ में दो ठुमरी रचनाएँ। एक मंच प्रदर्शन के दौरान उन्होने पहले भैरवी के स्वरों में थोड़ा आलाप किया, फिर बिना ताल के नवाब वाजिद आली शाह की रचना- ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए...’ और फिर तीनताल में निबद्ध पारम्परिक ठुमरी भैरवी- ‘बाजूबन्द खुल-खुल जाए...’ प्रस्तुत किया है। अन्त में उन्होने तीनताल में निबद्ध तराना का एक अंश भी प्रस्तुत किया है। आइए सुनते हैं, जगजीत सिंह की विलक्षण प्रतिभा का एक उदाहरण।


राग भैरवी : ठुमरी और तराना : जगजीत सिंह




पुत्र विवेक और पत्नी चित्रा सिंह के साथ
जगजीत सिंह ने ग़ज़लों को जब सरल और सहज अंदाज़ में गाना आरम्भ किया तो जनसामान्य की अभिरुचि ग़ज़लों की ओर बढ़ी। उन्होने हुस्न और इश्क़ से युक्त पारम्परिक ग़ज़लों के अलावा साधारण शब्दों में ढली आम आदमी की ज़िंदगी को भी अपने सुरों से सजाया। जैसे- ‘अब मैं राशन की दुकानों पर नज़र आता हूँ..’, ‘मैं रोया परदेश में...’, ‘ये दौलत भी ले लो...’, ‘माँ सुनाओ मुझे वो कहानी...’ जैसी रचनाओं में आम आदमी को अपने जीवन का यथार्थ नज़र आया। प्राचीन ग़ज़ल गायन शैली में केवल सारंगी और तबले की संगति का चलन था, किन्तु जगजीत सिंह ने सारंगी का स्थान पर वायलिन और सन्तूर को अपनाया। उन्होने संगति वाद्यों में गिटार को भी जोड़ा। ग़ज़ल को जनरुचि का हिस्सा बनाने के बाद 1981 में उन्होने फिल्म ‘प्रेमगीत’ से अपने फिल्मी गायन का सफर शुरू किया। इस फिल्म का गीत- ‘होठों से छू लो तुम मेरा गीत अमर कर दो...’ वास्तव में एक अमर गीत सिद्ध हुआ। 1990 में एक सड़क दुर्घटना में जगजीत सिंह के इकलौते पुत्र विवेक का निधन हो गया। इस रिक्तता की पूर्ति के लिए उन्होने अपनी संगीत-साधना को ही माध्यम बनाया और आध्यात्मिकता की ओर मुड़ गए। इस दौर में उन्होने अनेक भक्त कवियों के पदों सहित गुरुवाणी को अपनी वाणी दी। अब हम आपको जगजीत सिंह के स्वर में एक भक्तिगीत सुनवा रहे हैं। यह भक्तिगीत कीर्तन शैली में प्रस्तुत किया गया है। इस प्रस्तुति में भी आपको राग दरबारी कान्हड़ा की झलक मिलेगी। आप जगजीत सिंह की आवाज़ में यह भक्तिगीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग दरबारी : भजन - “जय राधा माधव जय कुंजबिहारी...” : जगजीत सिंह




 संगीत पहेली 



‘स्वरगोष्ठी’ के 242वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको भारतीय संगीत के एक सम्मानित गायक की आवाज़ में प्रस्तुत कण्ठ-संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 250वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग में निबद्ध है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गायक की आवाज़ को पहचान रहे हैं? यदि हाँ, तो हमें उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 7 नवम्बर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 244वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


 पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 240 की संगीत पहेली में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायिका बेगम अख्तर की आवाज़ में प्रस्तुत ठुमरी का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न के उत्तर में हमे दो उत्तर, 'खमाज' और 'तिलंग', प्राप्त हुए हैं। ठुमरी का जो अंश सुनवाया गया था, उसमें दोनों रागों का भ्रम हो रहा है। दरअसल दोनों राग खमाज थाट के हैं, दोनों रागों में दोनों निषाद का प्रयोग होता है और दोनों रागों का वादी और संवादी स्वर क्रमशः गान्धार और निषाद होता है। हमने दोनों उत्तरों को सही माना है। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग खमाज, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल कहरवा की लग्गी और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायिका बेगम अख्तर

सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं- वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर से क्षिति तिवारी। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। अगले अंक में हम चौथी श्रृंखला के विजेताओं के नामों की घोषणा भी करेंगे।


 अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ का यह तीसरा अंक था। अगले अंक में हम भारतीय संगीत की किसी अन्य विधा के किसी शिखर व्यक्तित्व के कृतित्व पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


 प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 





Sunday, March 2, 2014

राग काफी में खयाल, तराना और भजन


स्वरगोष्ठी – 157 में आज

फाल्गुनी परिवेश में राग काफी के विविध रंग


‘कान्ह कुँवर के कर-पल्लव पर मानो गोवर्धन नृत्य करे...’





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, पिछली कड़ी से हमने फाल्गुनी परिवेश के सर्वप्रिय राग काफी पर चर्चा आरम्भ की है। फाल्गुन मास में शीत ऋतु का क्रमशः अवसान और ग्रीष्म ऋतु की आहट होने लगती है। यह परिवेश उल्लास और श्रृंगार भाव से परिपूर्ण होता है। प्रकृति में भी परिवर्तन परिलक्षित होने लगता है। रस-रंग से परिपूर्ण फाल्गुनी परिवेश का एक प्रमुख राग काफी होता है। स्वरों के माध्यम से फाल्गुनी परिवेश, विशेष रूप से श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए राग काफी सबसे उपयुक्त राग है। पिछले अंक में हमने इस राग में ठुमरी और टप्पा प्रस्तुत किया था। आज के अंक में हम राग काफी में खयाल, तराना और भजन प्रस्तुत करेंगे, जिसे क्रमशः विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे, पण्डित कुमार गन्धर्व और पण्डित जसराज की आवाज़ में प्रस्तुत किया गया है। 
 


पिछले अंक में हमने राग काफी के स्वरूप पर चर्चा करते हुए निवेदन किया था कि राग काफी, इसी नाम से पहचाने जाने वाले काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात इस राग के आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा रे (कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म (कोमल) रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी स्वर कोमल गान्धार और संवादी स्वर कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिय राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी में धमार गायकी से लेकर खयाल, तराना, ठुमरी, दादरा, टप्पा और भजन आदि रचनाएँ आकर्षक लगती हैं। चंचल प्रकृति के इस राग में निबद्ध रचनाओं के माध्यम से उल्लास और उमंग का भाव सहज ही सृजित किया जा सकता है। ठुमरियों में प्रायः मिश्र काफी का रूप मिलता है। रस और भाव में विविधता के लिए राग काफी के स्वर-संगतियों में प्रयोग की अपार सम्भावनाएँ हैं। राग का ऐसा ही एक रूप आज के इस अंक में हम प्रस्तुत कर रहे हैं। राग के इस रूप को काफी कान्हड़ा के नाम से पहचाना जाता है। राग काफी कान्हड़ा में आरोह के स्वर काफी के अनुसार प्रयोग होते है, जबकि अवरोह के स्वर कान्हड़ा अंग में प्रयोग किए जाते हैं। राग काफी की प्रवृत्ति चंचल होती है और कान्हड़ा की प्रवृत्ति गम्भीर होती है। राग काफी कान्हड़ा में परस्पर विरोधी भाव उत्पन्न करने का प्रयास होता है। अब हम आपको राग काफी कान्हड़ा में आपको द्रुत खयाल की एक मोहक रचना का रसास्वादन कराते हैं। इसे प्रस्तुत कर रही है, सुप्रसिद्ध गायिका डॉ. अश्विनी भिड़े देशपाण्डे।

डॉ. अश्विनी भिड़े जयपुर अतरौली खयाल गायकी परम्परा की एक सर्वप्रिय गायिका हैं। मुख्यतः खयाल गायिका के रूप में विख्यात अश्विनी जी ठुमरी, दादरा, भजन और अभंग गायन में भी समान रूप से दक्ष हैं। उनकी प्रारम्भिक संगीत शिक्षा गन्धर्व महाविद्यालय से और पारम्परिक संगीत की शिक्षा पण्डित नारायण राव दातार से पलुस्कर परम्परा में हुई। बाद में उन्हें अपनी माँ श्रीमती माणिक भिड़े और गुरु पण्डित रत्नाकर पै से जयपुर अतरौली परम्परा में मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ। अश्विनी जी ने भारतीय संगीत के व्यावहारिक पक्ष के साथ-साथ सैद्धान्तिक पक्ष को भी आत्मसात किया है। एक कुशल गायिका होने के साथ ही उन्होने ‘रागरचनांजलि’ नामक पुस्तक की रचना भी की है। इस पुस्तक के पहले भाग का प्रकाशन वर्ष 2004 में और दूसरे भाग का प्रकाशन वर्ष 2010 में किया गया। वर्तमान में अश्विनी जी संगीत के मंचों पर जितनी लोकप्रिय हैं उतनी ही निष्ठा से नई पीढ़ी को पारम्परिक संगीत की दीक्षा भी दे रही हैं। आज की कड़ी में हम उनकी आवाज़ में राग काफी कान्हड़ा का एक द्रुत खयाल प्रस्तुत कर रहे हैं। यह तीनताल की मोहक रचना है।


राग काफी कान्हड़ा : ‘कान्ह कुँवर के कर-पल्लव पर मानो गोवर्धन नृत्य करे...’ : विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे



लोक, फिल्म और सुगम संगीत की रचनाओं में शब्दों का महत्त्व अधिक होता है, किन्तु जैसे-जैसे हम शास्त्रीयता की ओर बढ़ते है शब्दों की अपेक्षा स्वरों का महत्त्व बढ़ता जाता है। हमारे संगीत की एक विधा है, तराना, जिसमें शब्दों की अपेक्षा स्वर बेहद महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। गायन की सभी विधाओं में तराना एक ऐसी विधा है जिसमें स्पष्ट सार्थक शब्द नहीं होते। इसलिए रागानुकूल परिवेश रचने में स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। अब हम आपको राग काफी का एक तराना सुनवा रहे है, जिसे भारतीय संगीत जगत के शीर्षस्थ साधक पण्डित कुमार गन्धर्व ने स्वर दिया है। कुमार गन्धर्व भारतीय संगीत की एक नई प्रवृत्ति और नई प्रक्रिया के पहले कलासाधक थे। घरानों की पारम्परिक गायकी की अनेक शताब्दी पुरानी जो प्रथा थी उसमें संगीत तो जीवित रहता था, किन्तु संगीतकार के व्यक्तित्व और प्रतिभा का विसर्जन हो जाता था। कुमार गन्धर्व ने पारम्परिक संगीत के कठोर अनुशासन के अन्तर्गत ही कलासाधक की सम्भावना को स्थापित किया। 8 अप्रैल, 1924 को बेलगाम, कर्नाटक के पास सुलेभवी नामक स्थान में एक संगीत-प्रेमी परिवार में एक बालक का जन्म हुआ था, जिसका माता-पिता का रखा नाम तो था शिवपुत्र सिद्धरामय्या कोमकलीमठ, किन्तु आगे चल कर संगीत-जगत ने उसे कुमार गन्धर्व के नाम से पहचाना। कुमार गन्धर्व ने जब संगीत-जगत में पदार्पण किया, उन दिनों भारतीय संगीत दरबारी जड़ता से प्रभावित था। कुमार गन्धर्व, पूर्णनिष्ठा और स्वर-संवेदना से एकाकी ही संघर्षरत हुए। उन्होने अपनी एक निजी गायन-शैली विकसित की, जो हमें भक्ति-पदों के आत्म-विस्मरणकारी गायकी का स्मरण कराती थी। वे मात्र एक साधक ही नहीं अन्वेषक भी थे। उनकी अन्वेषण-प्रतिभा ही उन्हें भारतीय संगीत का कबीर बनाती है। उनका संगीत इसलिए भी रेखांकित किया जाएगा कि वह लोकोन्मुख रहा है। कुमार गन्धर्व ने अपने समय में गायकी की बँधी-बँधाई लीक से अलग हट कर अपनी एक भिन्न शैली का विकास किया। 1947 से 1952 तक वे फेफड़े के रोग से ग्रसित हो गए। चिकित्सकों ने घोषित कर दिया की स्वस्थ हो जाने पर भी वे गायन नहीं कर सकेंगे, किन्तु अपनी साधना और दृढ़ इच्छा-शक्ति के बल पर संगीत-जगत को चमत्कृत करते हुए संगीत-मंचों पर पुनर्प्रतिष्ठित हुए। अपनी अस्वस्थता के दौरान कुमार गन्धर्व, मालवा अंचल के ग्राम्य-गीतों का संकलन और प्राचीन भक्त-कवियों की विस्मृत हो रही रचनाओं को पुनर्जीवन देने में संलग्न रहे। आदिनाथ, सूर, मीरा, कबीर आदि कवियों की रचनाओं को उन्होने जन-जन का गीत बनाया। वे परम्परा और प्रयोग, दोनों के तनाव के बीच अपने संगीत का सृजन करते रहे। आज के अंक में हम आपको इस महान संगीतज्ञ के स्वरों में राग काफी का तराना प्रस्तुत कर रहे हैं। आप यह तराना सुनिए और राग काफी की प्रत्यक्ष रसानुभूति कीजिए।


राग काफी : तीनताल में निबद्ध तराना : पण्डित कुमार गन्धर्व




खयाल और तराना के बाद अब हम आपको राग काफी में एक भजन सुनवाते है। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं, सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित जसराज, जिनका जन्म 28 जनवरी 1930 को एक ऐसे परिवार में हुआ जिसे 4 पीढ़ियों तक भारतीय शास्त्रीय संगीत को एक से बढ़कर एक शिल्पी देने का गौरव प्राप्त है। उनके पिताजी पण्डित मोतीराम जी स्वयं मेवाती घराने के एक विशिष्ट संगीतज्ञ थे। पण्डित जसराज को संगीत के संस्कार अपने परिवार से मिले। जब वे मात्र 3 वर्ष के थे, प्रकृति ने उनके सर से पिता का साया छीन लिया। उनके बाद परिवार के भरण-पोषण का दायित्व जसराज जी के अग्रज, संगीत महामहोपाध्याय पण्डित मणिराम जी पर आगया। इन्हीं की छत्र-छाया में जसराज जी की संगीत शिक्षा आगे बढ़ी। मणिराम जी अपने साथ बालक जसराज को तबला वादक के रूप में ले जाया करते थे। परन्तु उस समय सारंगी वादकों की तरह तबला वादकों को भी हेय दृष्टि से देखा जाता था। संगति कलाकारों के साथ इस प्रकार के निम्न बर्ताव से अप्रसन्न होकर जसराज ने तबला त्याग दिया और प्रण लिया कि जब तक वे शास्त्रीय गायन में दक्ष नहीं हो जाते, वे अपने बाल नहीं कटवाएँगे। इसके पश्चात् उन्होंने मेवाती घराने के दिग्गज महाराणा जयवन्त सिंह वाघेला से तथा आगरा के स्वामी वल्लभदास जी से संगीत को आत्मसात किया। पण्डित जसराज के आवाज़ का फैलाव साढ़े तीन सप्तकों तक है। उनके गायन में पाया जाने वाला शुद्ध उच्चारण और स्पष्टता मेवाती घराने की खयाल शैली की विशिष्टता को झलकाता है। उन्होंने बाबा श्याम मनोहर गोस्वामी महाराज के मार्गदर्शन में हवेली संगीत विधा पर व्यापक अनुसन्धान कर अनेक नवीन बन्दिशों की रचना भी की है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनका सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान है। उनके द्वारा अवधारित एक अद्वितीय एवं अनोखी जुगलबन्दी, जो 'मूर्छना' की प्राचीन पद्यति पर आधारित है। इसमें एक महिला और एक पुरुष गायक अपने-अपने सुर में भिन्न रागों को एक साथ गाते हैं। पण्डित जसराज के सम्मान में इस जुगलबन्दी का नाम 'जसरंगी' रखा गया है। आज के अंक में हम पण्डित जसराज के द्वारा राग काफी के स्वरों में पिरोया एक भजन प्रस्तुत कर रहे हैं। इसे हमने उनके अल्बम ‘बिहरत रंग लाल गिरधारी’ से लिया है। आप भक्तिरस अभिसिंचित इस भजन का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग काफी : भजन : ‘कहा करूँ वैकुण्ठ ही जाए...’ : पण्डित जसराज




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ की 157वीं संगीत पहेली में हम आपको कण्ठ संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 160वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर राग पहचानिए और हमें राग का नाम लिख भेजिए।

2 – रचना के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम लिख भेजिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 159वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 155वीं संगीत पहेली में हमने आपको तंत्रवाद्य पर ठुमरी वादन का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मिश्र काफी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गिटार। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी, चंडीगढ़ से हरकीरत सिंह और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज का हमारा यह अंक फाल्गुनी रस और रंग से अभिसिंचित राग काफी के खयाल, तराना और भजन में किये गए प्रयोग पर केन्द्रित था। यह सिलसिला आगामी अंक में भी जारी रहेगा। इस अंक में पण्डित जसराज का परिचय 'भारत ज्ञानकोश' से साभार उद्धरित किया है। श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। आप हमें एक नई श्रृंखला के विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Saturday, October 1, 2011

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 61- पद्मश्री गायिका जुथिका रॉय और "बापू"

जब गायिका जुथिका रॉय मिलीं राष्ट्रपिता बापू से

नमस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' में आप सभी का मैं, आपका दोस्त सुजॉय चटर्जी, स्वागत करता हूँ। कल २ अक्टूबर, यानि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयन्ती है। इस अवसर पर आज के इस प्रस्तुति में हम एक गायिका की ज़ुबानी आप तक पहुँचाने जा रहे हैं जिसमें वो बताएंगी बापू से हुई उनकी मुलाक़ात के बारे में। दोस्तों, ५० के दशक में फ़िल्म-संगीत के क्षेत्र में लता मंगेशकर जो मुकाम रखती थीं, ग़ैर-फ़िल्मी भजनों में वह मुकाम उस समय गायिका जुथिका रॉय का था। उनकी आवाज़ आज कहीं सुनाई नहीं देती, पर उस समय उनकी मधुर आवाज़ में एक से एक लाजवाब भजन आए थे जिनके सिर्फ़ आम जनता ही नहीं बल्कि बड़े से बड़े राजनेता जैसे महात्मा गांधी, पण्डित नेहरू, सरोजिनी नायडू आदि भी शैदाई थे। जुथिका जी की आवाज़ किसी ज़माने में घर घर में गूंजती थी। भजन संसार और सुगम संगीत के ख़ज़ाने को समृद्ध करने में जुथिका जी का अमूल्य योगदान है। सन्‍ २००९ में पद्मश्री सम्मानित जुथिका रॉय तशरीफ़ लाई थीं विविध भारती के स्टुडियो में और उनके साथ साथ विविध भारती के समस्त श्रोतागण गुज़रे थे बीते युग की स्मृतियों के गलियारों से। उसी साक्षात्कार में जुथिका जी नें बताया था कि किस तरह से उनकी राष्ट्रपिता बापू से मुलाक़ात हुई थी। आइए बापू को स्मरण करते हुए साक्षात्कार के उसी अंश को आज यहाँ पढ़ते हैं।

जुथिका रॉय - "एक दफ़े हैदराबाद में मेरी सरोजिनी नायडू के साथ मुलाक़ात हुई। वो आई थीं मेरा गाना सुनने के लिए, मुझे देखने के लिए। और उनको मैं कभी यह नहीं सोचा कि वो मेरे पास आएंगी, हमारे पास आकर बोलीं कि 'दीदी, आप ने महात्मा गांधी को देखा?' मैंने कहा कि नहीं, अभी तक हमारा यह सौभाग्य नहीं हुआ, हम तो बस पेपर में पढ़ते हैं कि वो क्या क्या काम करते हैं हमारे देश के लिए। बोलीं, 'आप जानती हैं आपका गाना कितना पसन्द करते हैं?' मैंने बोला कि नहीं, मुझे मालूम नहीं है, मुझे कैसे मालूम पड़ेगा? बोलीं कि 'उनको आपका गाना बहुत पसन्द है, हर रोज़ वो आपके रेकॉर्ड्स बजाते हैं, और जब प्रार्थना में बैठते हैं तो पहले मीराबाई का यह भजन बजाते हैं, फिर प्रार्थना शुरु करते हैं। तो मेरी एक बहुत इच्छा है कि आप महात्मा जी के साथ ज़रूर दर्शन करना, वो गाना सुनना चाहें तो एकदम सामने से उनको गाना सुनाना, यह मैं आपको बोल रही हूँ।'

मैंने यह खबर तो उनसे सुना, मैं पहले तो नहीं जानती थी, लेकिन मैं बहुत कोशिश करने लगी कि बापू के साथ मुलाकात करूँ, उनके दर्शन करूँ, उनको प्रणाम करूँ, लेकिन वह समय बहुत खराब समय था, स्वाधीनता के लिए बहुत काम थे, इधर उधर घूमते थे, और हमारे कलकत्ते में भी दंगे लग गए, सब जलने लगा चारों तरफ़। उस वक्त १९४६ में दंगे शुरु हो गए। हमने सुना कि बापू कलकता में आए हैं, और बेलेघाटा में, बहुत दूर है हमारे घर से, तो वहाँ पे ३ दिन ठहरेंगे, लेकिन बहुत बिज़ी हैं, किसी के साथ मुलाकात नहीं कर सकते। मैंने, माताजी और पिताजी ने सोचा कि जैसे भी हो हमें उनका दर्शन करना ही पड़ेगा। और उनके सामने नहीं जा सकेंगे, उनको गाना नहीं सुना सकेंगे, उसमें कोई बात नहीं है, लेकिन दूर से उनके हम दर्शन करेंगे सामने से। और एक साथ हम लोग सब भाई बहन, माताजी, पिताजी, काका, बहुत बड़ा एक ग्रूप बनाके, हम लोगों ने देखा कि जैसे वो मॉरनिंग्‍ वाक करते थे, तो हम रस्ते के उपर उनको प्रणाम करेंगे। ऐसे सब बातचीत करके हम निकले। वहाँ पहुंचे तो देखा कि जहाँ पर बापू रहते हैं वह बहुत बड़ा मकान है, उसके सामने एक बहुत बडआ गेट है और गेट के सामने ताला लगा हुआ है। वहाँ एक दरवान बैठा था तो हमने पूछा कि 'क्या हुआ, ताला क्यों लगा है, बापू मॉरनिंग् वाक में गए क्या?' तो बोला कि 'नहीं, उनका मॉरनिंग् वाक हो गया, अभी आराम कर रहे हैं, इसलिए ताला लगा हुआ है'। हमको बहुत बुरा लगा कि टाइम तो निकल गया।

मेरे काकाजी ने गेट-कीपर को कहा कि 'देखो, हम लोग बहुत दूर से आ रहे हैं, गेट को खोल दो, हम थोड़ा हॉल में बैठेंगे'। बोला, 'नहीं नहीं, मुझे हुकुम नहीं है, आप तो नहीं जा सकते, आप इधर ही खड़े रहना'। बहुत कड़ी धूप थी उधर, हम सब धूप में खड़े थे, हमारे पीछे-पीछे और भी बहुत से लोग आ गए। हम सब साथ में खड़े रहे। अचानक ऐसा हुआ कि वह शरत काल था, इसमें ऐसा होता है कि अभी कड़ी धूप है और अभी अचानक बरसात हो जाती है। तो एकदम से काले बादल आके बरसात शुरु हो गई, और हम भीगने लगे। हमारे काकाजी को तो बहुत गुस्सा आ गया। मुझे बहुत प्यार करते हैं, 'रेणु भीग रही है', उन्होंने एकदम से दरवान को जाकर कहा कि 'देखो, बापू को जाकर कहो कि जुथिका रॉय आई है उनके दर्शन के लिए, अन्दर जाओ और उनको यह बता दो'। दरवान तो चला गया, बाद में क्या देखते हैं कि अन्दर से मानव गांधी और दूसरे सब वोलन्टियर्स आ रहे हैं निकल के। छाता लेकर सब दौड़-दौड़ के आ रहे हैं। हम अन्दर गए, हॉल में सब बैठे। टावल लेकर आए क्योंकि हम सब भीग गए थे। थोड़ी देर बाद आभा गांधी, आभा गांधी बंगाली थे, कानू गांधी के साथ उन्होंने शादी की थी, वो आश्रम में रहती थीं। तो आभा आकर मुझको बोली कि 'दीदी, आप और माताजी अन्दर आइए, बापू जी आपको बुलाए हैं, और किसी को नहीं'। बापूजी एक दफ़े उठ कर हॉल में एक चक्कर देके, सबको दर्शन देके अन्दर चले गए और हमको और माताजी को अन्दर ले गए।

बापूजी एक छोटे से आसन पर बैठे हैं, कुछ नहीं पहनते थे एक छोटी धोती के अलावा। और आँखों में बहुत मोटे काँच का चश्मा है। उसमें से उसी तरह हमको देखने लगे और हँसने लगे। आभा जी ने कहा कि 'आज बापू जी का मौन व्रत है और वो आज नहीं बोलेंगे'। तो भी ठीक है, सामने तो आ गए बापू जी के, यही क्या कम थी हमारे लिए! बापू जी को हमने प्रणाम किया, उन्होंने दोनों हाथ मेरे सर पे रख कर बहुत आशीर्वाद दिया। फिर वो लिखने लगे, लिख लिख कर वो आभा को देते थे और वो पढ़ कर हमको बताती थीं। उन्होंने लिखा कि 'हम तो अभी बहुत बिज़ी हैं, हमारे पास तो टाइम नहीं है, हमें टाइम से सब काम करना पड़ता है, हम अभी दूसरे कमरे में जाकर थोड़ा काम करेंगे, आप यहीं से खाली गले से भजन गाइए'। मैं तो चौंक गई, पेटी-वेटी कुछ नहीं लायी, हम तो खाली दर्शन के लिए आ गए थे। तो एक के बाद एक उनके जो फ़ेवरीट भजन थे, वो उन्होंने बोल दिया था, मैं गाती चली गई, जैसे "मैं तो राम नाम की चूड़ियाँ पहनूँ", "घुंघट के पट खोल रे तुझे पिया मिलेंगे", "मैं वारी जाऊँ राम" आदि।

तो उस दिन वहाँ पर आधे घण्टे तक मैं गाई एक एक करके। उसके बाद बापू जी फिर हमारे कमरे में आ गए, फिर गाना बन्द करके उनको प्रणाम किया, तो फिर से हमारे सर पे हाथ रख के बहुत आशीर्वाद दिया, और फिर आभा को लिख कर बताया कि 'आज मेरा मैदान में अनुष्ठान है'। कलकत्ते का मैदान कितना बड़ा है आपको शायद मालूम होगा। तो वो बोले कि 'आज मेरा मैदान में अनुष्ठान है, शान्तिवाणी जो हम प्रचार करेंगे, उधर सब लोग आएंगे, उधर जुथिका भी हमारे साथ जाएंगी। जुथिका गाएगी भजन और मैं शान्तिवाणी दूंगा, और राम धुन होगा और यह होगा, वह होगा'। मेरा जीवन धन्य हो गया। बस वही एक बार १९४६ में वो मुझे मिले, फिर कभी नहीं मिले। उस वक्त मैं यही कुछ २५-२६ वर्ष की थी।"

तो दोस्तों, कैसा लगा जुथिका जी का यह संस्मरण? इन यादों को दोहराते हुए जुथिका जी की आँखों में चमक आ गई थी उस साक्षात्कार के दौरान, ऐसा साक्षात्कार लेने वाले कमल शर्मा नें बताया था कुछ इन शब्दों में - "सत्य के उस पुजारी से, शान्ति के उस दूत से जो आपकी भेंट हुई थी, उसकी चमक मैं आज भी आपके चेहरे पर ताज़ा देखता हूँ। आप बता रही हैं और वैसी ही पुलक, बच्चों जैसी वैसी ही ख़ुशी आपके चेहरे पर नज़र आ रही है, ऐसा लग रहा है कि आप को वह स्पर्श महसूस हो रहा है ताज़ा"।

तो आइए दोस्तों, अब जुथिका रॉय की आवाज़ में सुनें एक भजन जिसे उन्होंने बापू को भी सुनाया था उस मुलाकात में।

भजन: घूंघट के पट खोल रे तोहे पिया मिलेंगे (जुथिका रॉय, ग़ैर-फ़िल्मी)


तो ये था आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष'। इस प्रस्तुति के बारे में अपने प्रतिक्रिया आप टिप्पणी में ज़रूर लिखिएगा। जुथिका रॉय को ढेरों शुभकामनाएँ देते हुए और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए आज आपसे अनुमति लेते हैं, कल फिर मुलाकात होगी, नमस्कार!

Monday, October 20, 2008

आस्था और विश्वास के ३०० वर्ष (विश्व भर के सिख समुदायों को आवाज़ की शुभकामनायें)

लगभग ३०० वर्ष पहले, एक अकेला इंसान बुराई और अत्याचार के ख़िलाफ़ खड़ा हुआ. उसने बहुत से नुकसान उठाये और कष्ट सहे. उनके माता-पिता का कत्ल कर दिया गया. चार बच्चों को मौत के घाट उतार दिया गया. दो मासूमों को तो दीवारों में चुनवा दिया गया जिनकी उम्र मात्र ९ और ७ वर्ष थी. जब दुश्मनों ने उन्हें चारों तरफ़ से घेर लिया तो भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी, वह परमेश्वर की तरफ़ मुड़ा ख़ुद को सबल करने के लिए. ये कविता उसी शख्स की है.

पटना,बिहार में जन्मे श्री गुरु गोविन्द सिंह (दिसम्बर २२,१६६६ - ७ अक्टूबर १७०८) जी सिखों के दसवें गुरु थे जिनके बाद ग्यारहवें और अन्तिम गुरु के रूप में गुरु ग्रन्थ साहिब की स्थापना हुई थी. ये पवित्र ग्रन्थ वास्तव में सिख विश्वास का आधार है. सभी दसों गुरुवों के जीवन काल को समेटे १४३० पृष्ठों के इस महाग्रंथ के संकलन का काम सबसे पहले पांचवें गुरु अर्जुन देव जी ने शुरू किया था. गुरमुखी या संत भाषा में लिखे इस आदि ग्रन्थ के ३०० वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य विश्व भर में बसे सभी सिख मित्रों और उनके परिवारों को आवाज़ परिवार बधाइयाँ संप्रेषित कर रहा है, श्री गुरु गोविन्द सिंह जी के लिखे इस प्रार्थना के साथ, जिसका संगीत तैयार किया है UK में बसे श्री राजेंदर सिंह जी ने. साथ में अमृत संधू जी का आभार जिन्होंने इसे यू ट्यूब पर उपलब्ध करवाया -



Wednesday, September 3, 2008

गाइए गणपति जगवंदन- पारूल की पेशकश

सुनिए सिद्धि विनायक गणपति बप्पा की वंदना



आज गणेश चतुर्थी है, पूरे देश में इस त्योहार की धूम है। कोई नये कपड़े खरीद रहा होगा तो कोई अपने परिजनों के लिए नये-नये उपहार। हलवाई की दुकान पर भीड़ होगी तो गणेश के मंदिर में हुजूम। आवाज़ के मंच पर तो कुछ संगीतमयी होना चाहिए। इसीलिए हम लेकर आये हैं एक संगीतबद्ध भजन जिसे पेश कर रही हैं बोकारो से पारूल। यह भजन पारूल द्वारा तानपुरा (तानपूरा) पर संगीतबद्ध है।

सुनिए और खो जाइए भक्ति-संगीत में।





हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार बुद्धि के देवता श्री गणपति का जन्मोत्सव हम सब भाद्रपद की शुक्ल चतुर्थी को आनन्द व उल्लास के साथ विभिन्न तरीकों से मनाते हैं। अलग-अलग प्रांतों में इस पावन पर्व की महिमा विविध रंगों में दिखायी पड़ती है। भारत में गणेशोत्सव की धूम सबसे अधिक माहारा्ष्ट्र प्रान्त में गूँजती है। यहाँ गणपति बप्पा की मूर्ति की स्थापना से प्रारम्भ होकर दस दिनों तक यह त्यौहार जन-जन को भक्ति रस में सरोबार करने के बाद, अनंत चतुर्दशी को मूर्ति विसर्जन के साथ संपन्न होता है।

गणेश चतुर्थी की हमारे स्वतंत्रता संग्राम में अहम् भूमिका रही है. यह त्यौहार सन १८९३ से पहले घर की चारदीवारियों में मनाया जाता था. इसे जन-जन में लोकप्रिय करने का श्रेय श्री बाल गंगाधर तिलक को जाता है. श्री तिलक स्वतंत्रता संग्राम में सामाजिक एकता के महत्व को समझते थे। उन्होंने समझ लिया था की अंग्रेजों की "बाँटो और राज करो" की नीति को तोड़े बगैर स्वतंत्रता नहीं पायी जा सकती. समाज विभिन्न वर्गों में बँटा था और अंग्रेज इस बँटवारे को हवा दे रहे थे. श्री तिलक ने गणेश चतुर्थी के अवसर पर गणेश की प्रतिमा सार्वजनिक स्थलों पर स्थापित करवाई और इस बात पर जोर दिया की समाज के विभिन्न तबके के लोग आये और पूजा में सम्मिलित हों. दस दिनों तक संगीत सभाओं आदि का आयोजन किया जाने लगा जिसमें समाज के विभिन्न वर्गों के लोग भाग लेते थे. दसवें दिन सम्मिलित रूप से प्रतिमा विसर्जित करने के पीछे तिलक की भावना सामाजिक भेदभाव को दूर करना था. एकबार जब सामजिक एकता दृढ़ हुई तो तिलक ने स्वराज आन्दोलन का सूत्रपात किया.

गणेश चतुर्थी के माध्यम से तिलक ने एक ऐसे विशाल मंच को तैयार किया जहाँ से कालांतर में गाँधी ने स्वतंत्रता संग्राम की बिगुल फूंकी.

प्रस्तुति- पारूल


#pics of Ganapati Bappa Morya

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