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Wednesday, March 30, 2011

साहिब मेरा एक है.. अपने गुरू, अपने साई, अपने साहिब को याद कर रही है कबीर, आबिदा परवीन और गुलज़ार की तिकड़ी

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #११२

शे इकहरे ही अच्छे होते हैं। सब कहते हैं दोहरे नशे अच्छे नहीं। एक नशे पर दूसरा नशा न चढाओ, पर क्या है कि एक कबीर उस पर आबिदा परवीन। सुर सरूर हो जाते हैं और सरूर देह की मिट्टी पार करके रूह मे समा जाता है।

सोइ मेरा एक तो, और न दूजा कोये ।
जो साहिब दूजा कहे, दूजा कुल का होये ॥


कबीर तो दो कहने पे नाराज़ हो गये, वो दूजा कुल का होये !

गुलज़ार साहब के लिए यह नशा दोहरा होगा, लेकिन हम जानते हैं कि यह नशा उससे भी बढकर है, यह तिहरा से किसी भी मायने में कम नहीं। आबिदा कबीर को गा रही हैं तो उनकी आवाज़ के सहारे कबीर की जीती-जागती मूरत हमारे सामने उभर आती है, इस कमाल के लिए आबिदा की जितनी तारीफ़ की जाए कम है। लेकिन आबिदा गाना शुरू करें उससे पहले सबा के झोंके की तरह गुलज़ार की महकती आवाज़ माहौल को ताज़ातरीन कर जाती है, इधर-उधर की सारी बातें फौरन हीं उड़न-छू हो जाती है और सुनने वाला कान को आले से उतारकर दिल के कागज़ पर पिन कर लेता है और सुनता रहता है दिल से.. फिर किसे खबर कि वह कहाँ है, फिर किसे परवाह कि जग कहाँ है! ऐसा नशा है इस तिकड़ी में कि रूह पूरी की पूरी डूब जाए, मदमाती रहे और जिस्म जम जाए वहीं का वहीं!!

कबीरा खड़ा बजार में, सब की चाहे खैर।
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।।


कबीर... कबीर ऐसा नाम है, जिसे सुनते हीं दिल सूफ़ियाना हो जाता है। जैसे सूफ़ियों के हर कलाम में उस ऊपर वाले का ज़िक्र होता है, उसी तरह कबीर अपने गुरू, अपने साईं, अपने साहिब का ज़िक्र किसी न किसी बहाने अपने दोहों में ले हीं आते हैं। गुरू के प्रति कबीर का यह प्रेम अनुपम है। कबीर अपने गुरू की बहुत कदर करते थे। एक शिष्य के लिए गुरू का क्या महत्व होता है, यह बताने के लिए कबीर ने इतना तक कह दिया कि:

कबीरा ते नर अन्ध हैं, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ॥


गुरू का माहात्म्य जानना हो तो कोई कबीर से पूछे:

सब धरती कागद करूं, लेखन सब बनराय ।
सात समुंद्र कि मस करूं, गुरु गुन लिखा न जाय ॥


कबीर का अपने गुरू के प्रति प्रेम और लगाव का बखान आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपनी पुस्तक "हिन्दी साहित्य का इतिहास" में कुछ यूँ किया है:

कहते हैं, काशी में स्वामी रामानंद का एक भक्त ब्राह्मण था, जिसकी किसी विधवा कन्या को स्वामी जी ने पुत्रवती होने का आशीर्वाद भूल से दे दिया। फल यह हुआ कि उसे एक बालक उत्पना हुआ जिसे वह लहरतारा के ताल के पास फेंक आयी। अली या नीरू नाम का जुलाहा उस बालक को अपने घर उठा लाया और पालने लगा। यही बालक आगे चलकर कबीरदास हुआ। कबीर का जन्मकाल जेठ सुदी पूर्णिमा, सोमवार विक्रम संवत १४५६ माना जाता है। कहते हैं कि आरंभ से हीं कबीर में हिंदू भाव से भक्ति करने की प्रवृत्ति लक्षित होती थी जिसे उसे पालने वाल माता-पिता न दबा सके। वे "राम-राम" जपा करते थे और कभी-कभी माथे पर तिलक भी लगा लेते थे। इससे सिद्ध होता है कि उस समय स्वामी रामानंद का प्रभाव खूब बढ रहा था। अत: कबीर पर भी भक्ति का यह संस्कार बाल्यावस्था से ही यदि पड़ने लगा हो तो कोई आश्चर्य नहीं।

रामानंद जी के माहात्म्य को सुनकर कबीर के हृदय में शिष्य होने की लालसा जगी होगी। ऐसा प्रसिद्ध है कि एक दिन वे एक पहर रात रहते हुए उप्त (पंचगंगा) घाट की सीढियों पर जा पड़े जहाँ से रामानंद जी स्नान करने के लिए उतरा करते थे। स्नान को जाते समय अंधेरे में रामानंद जी का पैर कबीर के ऊपर पड़ गया। रामानंद जी बोल उठे, ’राम-राम कह’। कबीर ने इसी को गुरूमंत्र मान लिया और वे अपने को गुरू रामानंद जी का शिष्य कहने लगे।

आरंभ से हीं कबीर हिंदू भाव की उपासना की ओर आकर्षित हो रहे थे। अत: उन दिनों जब कि रामानंद जी की बड़ी धूम थी, अवश्य वे उनके सत्संग में भी सम्मिलित होते रहे होंगे। रामानुज की शिष्य परंपरा में होते हुए भी रामानंद जी भक्ति का एक अलग उदार मार्ग निकाल रहे थे जिसमे जाति-पाँति का भेद और खानपान का आचार दूर कर दिया गया था। अत: इसमें कोई संदेह नहीं कि कबीर को ’राम-राम’ नाम रामानंद जी से हीं प्राप्त हुआ। पर आगे चलकर कबीर के ’राम’ रामानंद के ’राम’ से भिन्न हो गए। अत: कबीर को वैष्णव संप्रदाय के अंतर्गत नहीं ले सकते। कबीर ने दूर-दूर तक देशाटन किया, हठयोगियों तथा सूफ़ी मुसलमान फकीरों का भी सत्संग किया। अत: उनकी प्रवृत्ति निर्गुण उपासना की ओर दृढ हुई। फल यह हुआ कि कबीर के राम धनुर्धर साकार राम नहीं रह गये, वे ब्रह्म के पर्याय हुए -

दशरथ सुत तिहुँ लोक बखाना।
राम नाम का मरम है आना॥


सारांश यह है कि जो ब्रह्म हिंदुओं की विचारपद्धति में ज्ञान मार्ग का एक निरूपण था उसी को कबीर ने सूफ़ियों के ढर्रे पर उपासना का हीं विषय नहीं, प्रेम का भी विषय बनाया और उसकी प्राप्ति के लिए हठयोगियों की साधना का समर्थन किया। इस प्रकार उन्होंने भारतीय ब्रह्मवाद के साथ सूफ़ियों के भावात्मक रहस्यवाद, हठयोगियों के साधनात्मत रहस्यवाद और वैष्णवों के अहिंसावाद तथा प्रपत्तिवाद का मेल करके अपना पंथ खड़ा किया। उनकी बानी में ये सब अवयव लक्षित होते हैं।

गुरू गोविंद दोऊ खड़े काकै लागूं पाय,
बलिहारी गुरू आपने गोविंद दियो बताय।


गुरू को गोविंद के आगे खड़े करने वाले संत कबीर ने गुरू के बारे में और क्या-क्या कहा है, यह जानने के लिए चलिए आबिदा परवीन की मनमोहक आवाज़ की ओर रूख करते हैं। और हाँ, आईये हम भी साथ-साथ गुनगुनाएँ "साहिब मेरा एक है"..:

साहिब मेरा एक है, दूजा कहा न जाय ।
दूजा साहिब जो कहूं, साहिब खडा रसाय ॥

माली आवत देख के, कलियां करें पुकार ।
फूल फूल चुन लिये, काल हमारी बार ॥

____ गयी चिन्ता मिटी, मनवा बेपरवाह ।
जिनको कछु न चहिये, वो ही शाहनशाह ॥

एक प्रीत सूं जो मिले, ताको मिलिये धाय ।
अन्तर राखे जो मिले, तासे मिले बलाय ॥

सब धरती कागद करूं, लेखन सब बनराय ।
सात समुंद्र कि मस करूं, गुरु गुन लिखा न जाय ॥

अब गुरु दिल मे देखया, गावण को कछु नाहि ।
कबीरा जब हम गांवते, तब जाना गुरु नाहि ॥

मैं लागा उस एक से, एक भया सब माहि ।
सब मेरा मैं सबन का, तेहां दूसरा नाहि ॥

जा मरने से जग डरे, मेरे मन आनन्द ।
तब मरहू कब पाहूं, पूरण परमानन्द ॥

सब बन तो चन्दन नहीं, सूर्य है का दल(?) नाहि ।
सब समुंद्र मोती नहीं, यूं सौ भूं जग माहि ॥

जब हम जग में पग धरयो, सब हसें हम रोये ।
कबीरा अब ऐसी कर चलो, पाछे हंसीं न होये ॥

अवगुण किये तो बहु किये, करत न मानी हार ।
भांवें बन्दा बख्शे, भांवें गर्दन मार ॥

साधु भूखा भाव का, धन का भूखा नाहि ।
धन का भूखा जो फिरे, सो तो साधू नाहि ॥

कबीरा ते नर अन्ध हैं, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ॥

करता था तो क्यों रहा, अब काहे पछताय ।
बोवे पेड बबूल का, आम कहां से खाय ॥

साहिब सूं सब होत है, बन्दे ते कछु नाहि ।
राइ से परबत करे, परबत राइ मांहि ॥

ज्यूं तिल मांही तेल है, ज्यूं चकमक में आग ।
तेरा सांई तुझमें बसे, जाग सके तो जाग ॥




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो दोहे हमने पेश किए हैं, उसके एक दोहे की एक पंक्ति में कोई एक शब्द गायब है। आपको उन दोहों को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "पिया" और मिसरे कुछ यूँ थे-

सती बिचारी सत किया, काँटों सेज बिछाय ।
ले सूती पिया आपना, चहुं दिस अगन लगाय ॥

इस शब्द पर ये सारे शेर/रूबाईयाँ/नज़्म महफ़िल में कहे गए:

पिया रे, पिया रे , पिया रे, पिया रे,
तेरे बिन लागे नहीँ मोरा जिया रे ।

मंजु जी, आपने शब्द पहचानने में गलती कर दी, इसलिए हम आपके शेर (दोहे) को यहाँ पेश नहीं कर सकते। अगली बार से ध्यान दीजिएगा।

पिछली महफ़िल की शुरूआत सजीव जी की प्रेरणादायक टिप्पणी से हुई। बंधुवर धन्यवाद आपका! आपके बाद महफ़िल को रंगीन करने आए शरद जी। शरद जी ने न सिर्फ़ सही शब्द की पहचान की बल्कि उस पर एक शेर भी कहा। यह क्या, आपसे हमें स्वरचित शेर की उम्मीद रहती है, आपने तो नुसरत साहब के एक गाने की दो पंक्तियों से हीं काम चला लिया। आगे से ऐसा नहीं चलेगा। समझे ना? :) आपने एक गलती की तरफ़ हमारा ध्यान दिलाया, इसके लिए आपका तह-ए-दिल से आभार। हमने आज की महफ़िल में उस गलती को ठीक कर लिया है। अवध जी, शायद "दोहावली" हीं कहा जाना चाहिए। मैं और भी एक-दो जगह से पता करता हूँ, उसके बाद आगे से इसी शब्द का प्रयोग करूँगा। बहुत-बहुत धन्यवाद। मंजु जी, हाँ पिछली बार मैंने "अहसास" पर सारे शेर जमा तो कर दिये थे, लेकिन जल्दीबाजी में "आँगन" को हटाना भूल गया। दर-असल "आँगन" पिछली से पिछली महफ़िल का गुमशुदा शब्द था। आपको यकीन दिलाता हूँ कि आगे से ऐसा नहीं होगा। कुलदीप जी, महफ़िल को और महफ़िल में पेश की गई रचना को पसंद करने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया। बस लगे हाथों आप "पिया" पर कोई शेर भी कह देते तो खुशी चौगुनी हो जाती। खैर, इस बार से कोशिश कीजिएगा।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, June 16, 2010

दिल मगर कम किसी से मिलता है... बड़े हीं पेंचो-खम हैं इश्क़ की राहो में, यही बता रहे हैं जिगर आबिदा

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #८८

"को"कोई अच्छा इनसान ही अच्छा शायर हो सकता है।" ’जिगर’ मुरादाबादी का यह कथन किसी दूसरे शायर पर लागू हो या न हो, स्वयं उन पर बिलकुल ठीक बैठता है। यों ऊपरी नज़र डालने पर इस कथन में मतभेद की गुंजाइश कम ही नज़र आती है लेकिन इसको क्या किया जाए कि स्वयं ‘जिगर’ के बारे में कुछ समालोचकों का मत यह है कि जब वह अच्छे इनसान नहीं थे, तब बहुत अच्छे शायर थे।

’जिगर’ के बारे में खुद कुछ कहूँ (इंसान खुद कुछ कहने की हालत में तभी आता है, जब उसने उस शख्सियत पर गहरा शोध कर लिया हो और मैं यह मानता हूँ कि मैने जिगर साहब की बस कुछ गज़लें पढी हैं, उनपर आधारित अली सरदार ज़ाफ़री का "कहकशां" देखा है और उनके बारे में कुछ बड़े लेखकों के आलेख पढे हैं.... इससे ज्यादा कुछ नहीं किया...... इसलिए मुझे नहीं लगता कि मैं इस काबिल हूँ कि अपनी लेखनी से दो शब्द या दो बोल निकाल सकूँ) इससे बेहतर मैंने यही समझा कि हर बार की तरह "प्रकाश पंडित" जी की पुस्तक का सहारा लिया जाए। तो अभी ऊपर मैंने ’जिगर’ की जो हल्की-सी झांकी दिखाई, वो "प्रकाश पंडित" जी की मेहरबानी से हीं संभव हो पाई थी। मेरे हिसाब से जिगर उन शायरों में आते हैं, जिन्हें अपनी हैसियत का एक शतांश भी न मिला। इनका लिखा यह शेर

ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना तो समझ लीजे,
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है।


अभी भी ग़ालिब के नाम से पढा और सराहा जाता है (जी हाँ ,हमने भी यह गलती की थी..... "कमीने" फिल्म के "फ़टाक" गाने पर चर्चा के दौरान हमने यही कहा था कि गुलज़ार की यह पंक्ति "ये इश्क़ नहीं आसाँ..अजी एड्स का खतरा है" ग़ालिब के शेर से प्रेरित है)। भला कितनों को यह मालूम है कि "चोरी-चोरी चुपके-चुपके" फिल्म के शीर्षक गीत की शुरूआती पंक्तियाँ सीधे-सीधे इस शेर से उठाई हुई हैं:

रग-रग में इस तरह वो समा कर चले गये
जैसे मुझ ही को मुझसे चुराकर चले गये


भले हीं हमें "जिगर" की जानकारी न हो, लेकिन इनके शेर हर तबके के लोगों की जुबान पर चढे हुए हैं। है कोई ऐसा जो यह दावा करे कि कभी न कभी, कही न कहीं उसने इस शेर को सुना या फिर कहा नहीं है:

हमको मिटा सके, यह ज़माने में दम नहीं,
हमसे ज़माना ख़ुद है, ज़माने से हम नहीं।


फिल्मों के नाम तक इनके शेरों ने मुहैया कराए हैं। इस शेर को पढकर खुद अंदाजा लगाईये कि हम किस फिल्म की बात कर रहे हैं:

फूल खिले हैं गुलशन गुलशन
लेकिन अपना अपना दामन


'जिगर’ ने भले हीं हिन्दी फिल्मों में न लिखा हो, लेकिन उन्होंने हिन्दी फिल्मों को वह हीरा दिया, जिसे संगीत-जगत कभी भी भूल नहीं सकता। "मजरूह सुल्तानपुरी" की मानें तो "जिगर" ने हीं उन्हें फिल्मों के लिए लिखने की सलाह दी थी। दर-असल जिगर मजरूह के गुरू थे।

जिगर को याद करते हुए उर्दू के जानेमाने शायर निदा फ़ाज़ली कहते हैं:

जिगर अपने युग में सबसे ज़्यादा मशहूर और लोकप्रिय रहे हैं। वह जिस मुशायरे में शरीक होते, उनके सामने किसी और का चिराग नहीं जलता, वह भारत, और पाकिस्तान दोनों जगह पूजे जाते थे। लेकिन इस शोहरत ने न उनके तौर तरीके बदले न उनके ख़ानदानी मूल्यों में कोई परिवर्तन किया। पाकिस्तान ने उन्हें दौलत की बड़ी-बड़ी लालचें देकर हिंदुस्तान छोड़ने को कहा, लेकिन उन्होंने शाह अब्दुलग़नी (जिनके वह मुरीद थे) और असग़र के मज़ारों के देश को त्यागने से इनकार कर दिया।

जिगर की शायरी की दुनिया, और इसके ज़मीन-आसमान उनके अपने थे। इसमें न गालिब की दार्शनिक सूझबूझ हैं, न नजीर जैसा इन्सानी फैलाव है। लेकिन इसके बावजूद वह ग़ज़ल की तारीख में अपने अंदाजेबयान की नग़मगी और हुस्नोइश्क़ के सांस्कृतिक रिश्ते की वजह से हमेशा याद किये जाते रहेंगे। वह दाग़ की तरह बाज़ारे हुस्न के सैलानी होते हुए भी, रिश्तों की बाजारियत से कोसों दूर हैं। उन्होंने अपनी विरासती तहजीब से ग़ज़ल के बाज़ारी किरदारों में सामाजिकता का जादू जगाया है। वस्लों-फ़िराक़ के परंपरागत बयानों को अपने अनुभवों की रोशनी से सजाया है। उनके अनुभवों ने शब्दों को लयात्मक बनाया है।

जिगर ऐसे थे, जिगर वैसे थे, जिगर ने ये लिखा, जिगर ने वो लिखा... ये सब बातें तो होती रहेंगी, लेकिन जो इंसान यह कह गया

क्या हुस्न ने समझा है क्या इश्क ने जाना है,
हम ख़ाकनशीनों की ठोकर में ज़माना है।


वह असल में था कौन.. उसकी निजी ज़िंदगी क्या थी... आईये अब हम यह भी जान लेते हैं (साभार: प्रकाश पंडित):

अली सिकन्दर ‘जिगर’ मुरादाबादी १८९० ई. में मौलवी अली ‘नज़र’ के यहां, जो स्वयं एक अच्छे शायर और ख़्वाजा वज़ीर देहलवी के शिष्य थे, पैदा हुए। एक पूर्वज मौलवी ‘समीअ़’ दिल्ली के निवासी और बादशाह शाहजहान के उस्ताद थे। लेकिन शाही प्रकोप के कारण दिल्ली छोड़कर मुरादाबाद में जा बसे थे। यों ‘जिगर’ को शायरी उत्तराधिकार के रूप में मिली। तेरह-चौदह वर्ष की आयु में ही उन्होंने शे’र कहने शुरू कर दिए। शुरू-शुरू में अपने पिता से संशोधन लेते उसके बाद उस्ताद ‘दाग़’ देहलवी को अपनी ग़ज़लें दिखाईं और ‘दाग’ के बाद मुंशी अमीर-उल्ला ‘तसलीम’ और ‘रसा’ रामपुरी को ग़ज़लें दिखाते रहे। शायरी में सूफ़ियाना रंग ‘असग़र’ गौंडवी की संगत का फल था। शिक्षा बहुत साधारण। अंग्रेज़ी बस नाम-मात्र जानते थे। आजीविका जुटाने के लिए कभी स्टेशन-स्टेशन चश्मे भी बेचा करते थे। और शक्ल-सूरत के लिहाज़ से तो अच्छे-खासे बदसूरत व्यक्ति गिने जाते थे। लेकिन ये सब ख़ामियां अच्छे शे’र कहने की क्षमता तले दब कर रह गई थीं।

‘जिगर’ साहब की शादी उर्दू के प्रसिद्ध कवि स्वर्गीय ‘असग़र’ गौंडवी की छोटी साली से हुई थी लेकिन ‘जिगर’ साहब की शराबनोशी ने बना घर बिगाड़ दिया और ‘असग़र’ साहब ने ‘जिगर’ साहब से तलाक़ दिलाकर उनकी पत्नी को अपनी पत्नी बना लिया। ‘असग़र’ साहब के देहांत पर ‘जिगर’ साहब ने फिर उसी महिला से दोबारा शादी कर ली और कुछ मित्रों का कहना है कि उनकी इस पत्नी ने ही उनकी शराब की लत छुड़ावाई। यह उनके अच्छे आदमी बनने की धुन थी , पत्नी का जोर था या फिर न जाने क्या था कि एक दिन उन्होंने हमेशा के लिए शराब से तौबा कर ली और फिर मरते दम तक शराब को हाथ नहीं लगाया। शराब से तौबा के बाद वह बेतहाशा सिगरेट पीने लगे, लेकिन कुछ समय के बाद उन्होंने सिगरेट भी छोड़ दी।

‘जिगर’ साहब बड़े हंसमुख और विशाल हृदय के व्यक्ति थे। धर्म पर उनका गहरा विश्वास था लेकिन धर्मनिष्ठा ने उनमें उद्दंडता और घमंड नहीं, विनय और नम्रता उत्पन्न की। वह हर उस सिद्धांत का सम्मान करने को तैयार रहते थे जिसमें सच्चाई और शुद्धता हो। यही कारण है कि साहित्य के प्रगतिशील आन्दोलन का भरसक विरोध करने पर भी उन्होंने ‘मजाज़’, ‘जज़्बी’, मसऊद अख़्तर ‘जमाल’, मजरूह सुलतानपुरी इत्यादि बहुत से प्रगतिशील शायरों को प्रोत्साहन दिया और ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के निमंत्रण पर अपनी जेब से किराया ख़र्च करके वह उनके सम्मेलनों में योग देते रहे। (यों ‘जिगर’ साहब किसी मुशायरे में आने के लिए हज़ार-बारह सौ रुपये से कम मुआवज़ा नहीं लेते थे।)

‘जिगर’ साहब का पहला दीवान (कविता-संग्रह) ‘दाग़े-जिगर’ १९२१ ई. में प्रकाशित हुआ था। उसके बाद १९२३ ई. में ‘शोला-ए-तूर’ के नाम से एक संकलन मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ से छपा। एक नया कविता-संग्रह ‘आतिशे-गुल’ के नाम से सन् १९५८ में प्रकाशित हुआ था। इस पुस्तक को साहित्य अकादमी ने उर्दू भाषा की सन् १९५९ की सर्वश्रेष्ठ कृति मानकर उस पर पाँच हज़ार रुपये का पुस्कार देकर ‘जिगर’ साहब को सम्मानित किया। ९ सितम्बर, १९६० को उर्दू ग़ज़ल के इस शती के बादशाह ‘जिगर’ का गोंडा में स्वर्गवास हो गया।

बातों-बातों में हम गज़ल सुनवाना तो भूल हीं गए। अरे-अरे उदास मत होईये... ऐसा कैसे हो सकता है कि महफ़िल सजे और कोई गज़ल साज़ पर चढे हीं नहीं। आज की गज़ल वैसे भी कुछ खास है... क्योंकि "जिगर" की इस गज़ल को अपनी आवाज़ से मुकम्मल किया है अनोखी अदाओं की धनी बेगम आबिदा परवीन ने। हमने यह गज़ल उनकी एलबम "खज़ाना" से ली है। तो लीजिए.. लुत्फ़ उठाईये आज की पेशकश का:

आदमी आदमी से मिलता है
दिल मगर कम किसी से मिलता है

भूल जाता हूँ मैं ____ उस के
वो कुछ इस सादगी से मिलता है

आज क्या बात है के फूलों का
रंग तेरी हँसी से मिलता है

रूह को भी मज़ा मोहब्बत का
दिल की हमसायगी से मिलता है

मिल के भी जो कभी नहीं मिलता
टूट कर दिल उसी से मिलता है

कार-ओ-बार-ए-जहाँ सँवरते हैं
होश जब बेख़ुदी से मिलता है




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "सियाह" और शेर कुछ यूँ था-

कहें न तुमसे तो फ़िर और किससे जाके कहें
सियाह ज़ुल्फ़ के सायों बड़ी उदास है रात

पिछली महफ़िल की शोभा बनीं सीमा जी। आपके अलावा महफ़िल में नीरज जी (नीरज रोहिल्ला), शन्नो जी, मंजु जी, सुमित जी, नीलम जी, अवनींद्र जी और शरद जी भी शामिल हुए। माहौल बड़ा हीं खुशगवार था। शन्नो जी, अवनींद्र जी और नीलम जी की शरारतें जोरों पर थीं। नीलम जी जहाँ शेर को बकरी करार देने पर (जो कि हमने कतई नहीं किया था, हमने तो बस गलती बताई थी ताकि अगली बार उनमें सुधार हो सके :) ) थोड़ी नाराज़ दिखीं तो वहीं शन्नो जी डूबते माहौल को उबारने में लगी थीं। अवनींद्र जी गज़ल के रंग से सराबोर नज़र आए, वहीं शरद जी बड़े दिनों बाद महफ़िल में शेर पढते दिखे। नीरज जी का बहुत दिनों बाद (या शायद पहली बार) महफ़िल में आना हुआ, हम उनका स्वागत करते हैं। महफ़िल में सभी मित्रों (रसिकों) ने सियाह शब्द पर कई सारे शेर पढे (कुछ अपने तो कुछ जानेमाने शायरों के... हम दोनों को बराबर का दर्जा देते हैं) ..

जिसे नसीब हो रोज़-ए-सियाह मेरा सा
वो शख़्स दिन न कहे रात को तो क्यों कर हो ( ग़ालिब )

फ़र्द-ए-अमल सियाह किये जा रहा हूँ मैं
रहमत को बेपनाह किये जा रहा हूँ मैं (जिगर मुरादाबादी )

स्याह को सफ़ेद और सफ़ेद को स्याह करते हैं
यहाँ दिन को रात कहने से लोग नहीं डरते हैं (शन्नो जी)

जलने वालों के दिल जल के सियाह हुए
जलाने वाले जलाकर अपनी राह हुए (शन्नो जी) बढिया है!

सियाह रातों में मिलन की ऋतु आई ,
हर दिशा में फूलों ने भी खुशबु है लुटाई . (मंजु जी)

स्याह अँधेरे दिल में थे
और बेवफा महफ़िल में थे (नीलम जी ) वाह-वाह! इशारा किधर है? :)

ये चाँद भी स्याह हो जाये
सारे तारे भी तबाह हो जायें
तेरे होठों पे ठहरी ख़ामोशी
गर खुले तो शराब हो जाये (अवनींद्र जी)

ग़र रात है सियाह तो उसकी है ये फ़ितरत
पर दिन का उजाला भी अंधेरा तेरे बगैर। (शरद जी) क्या बात है!!

मैने चाँद और सितारो की तमन्ना की थी,
मुझको रातो की सियाही के सिवा कछ ना मिला

हमने इस बार से अपनी टिप्पणियों का तरीका बदल दिया है। हमें लगता है कि सारे रसिकों, सारे पाठकों से एक साथ की गई बात ज्यादा असरकारी होती है। आप क्या कहते है? अपने विचारों से हमें अवगत जरूर कराईयेगा।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, June 23, 2009

वाह-वाह रम्ज़ सजन दी होर..... महफ़िल-ए-अथाह और "बाबा बुल्ले शाह"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #२३

क शख्स जिसे उसकी लीक से हटकर धारणाओं और भावनाओं के कारण गैर-इस्लामिक करार दिया गया और जिसे कज़ा के बाद भी अपने समुदाय का कब्रिस्तान नसीब न हुआ,क्योंकि आसपास के मुल्लाओं को उसकी बातों में "काफ़िर" होने की बू आती थी, नियति का यह खेल देखिए कि आज उसे पूरी दुनिया में इबादत के शिखर पर स्थान दिया जाता है और उसके दर्शन और लेखन की तुलना "रूमि" और "शम्स-ए-तबरिज़" से की जाती है। जन्म से मुसलमान होने के बावजूद उसकी प्रसिद्धि सारे धर्मों में एक-सी है, दरवेश और बुद्धिजीवी उसे "दोनों दुनिया का शेख","खुदा का बंदा" कहकर संबोधित करते हैं और न सिर्फ़ पंजाब बल्कि पूरे मुल्क या कहिए पूरी दुनिया में "पराभौतिक/रहस्यवादी" कविता का जानकार उससे अच्छा नहीं मिलता। उसे "सूफी-साहित्य का शिखर-पुरूष" कहने वाले भी कम नहीं है। "क़सुर" में उसके कब्र के पास की ज़मीन आज भी इंसानियत का दम भरती है और आज भी उस जगह पर बड़े-छोटे का भेदभाव नहीं होता, वहाँ जो भी जाता है कुछ न कुछ हासिल करके हीं आता है। उसका जन्म कब हुआ, इसकी सही जानकारी किसी को नहीं है, लेकिन ज्यादातर विद्वानों का यह मत है कि उसने १६८० से १७५८ तक इस दुनिया को अपने होने का अनुभव दिया था। जन्म से छ: महीने तक की अवधि उसने "बहावलपुर" के "उच" नामक जगह पर बिताई,जोकि अब पाकिस्तान में है और उसके बाद उसका परिवार "मलकवल" चला गया। पिता "शाह मोहम्मद दरवेश" गाँव की हीं मस्जिद में "ज़ाहिद" थे और "शिक्षक" भी। "मलकवल" में कुछ दिन बिताने के बाद उसे अपने परिवार के साथ "पंडोके" जाना पड़ा, जोकि "क़सुर" से ५० मील दक्षिण-पूर्व की ओर था । वैसे कुछ लोगों का यह भी मानना है कि उसका जन्म "पंडोके" में हीं हुआ था। हज़ार लोग,हज़ार बातें,इसलिए पक्के से यह कहा नहीं जा सकता कि सच्चाई किस में है, वैसे सच्चाई जो भी है,यह तो तय है कि "काफ़ी/कफ़ी"(पंजाबी साहित्य का एक रूप) का जानकार उस-सा दूसरा कोई न हुआ।

"अब्दुल्लाह शाह" या फिर "मीर बुल्ले शाह क़ादिरी शतरी" के पिता अरबी, फ़ारसी और "पाक़ क़ुरान" के बहुत बड़े जानकार थे। उनका आध्यात्म की तरफ़ भी गहरा झुकाव था,इसी झुकाव और नेकदिली के कारण लोगों ने उन्हें दरवेश की उपाधि से नवाज़ा था। कहा जाता है कि पूरे परिवार में "बुल्ले शाह" की बहन उन्हें सबसे ज्यादा चाहती थी और उसने "बुल्ले शाह" की तरह हीं ता-ज़िंदगी शादी नहीं की। "पंडोके भटियाँ" में अब भी उनका (बुल्ले शाह के पिता का) मकबरा है, जहाँ हर साल "उर्स"(एक तरह का मेला) आयोजित किया जाता है और बड़े हीं जोश-औ-जुनूँ के साथ "बुल्ले शाह" के कफ़िये गाए जाते हैं। इस तरह एक हीं साथ पिता-पुत्र दोनों को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है। यह तो हुई बुल्ले शाह और उनके पिता की बात, लेकिन अगर हम इनकी पीढी में पीछे की ओर जाए तो यह पता चलता है कि "शाह मोहम्मद दरवेश" और "बुल्ले शाह" के होने से लगभग ३०० साल पहले इन्हीं के वंश के "सैयद जलालुद्दीन बुखारी" "सुरख-बुखारा" से "मुल्तान" आए थे। "मुल्तान" अब पाकिस्तान में है और "सुरख-बुखारा" "उजबेकिस्तान" में। यह भी कहा जाता है कि "हज़रत मोहम्मद" इन्हीं के पूर्वज थे। इस तरह एक तरफ़ "बुल्ले शाह" "सैय्यद" वंश के होने के कारण "हज़रत मोहम्मद" से जुड़े थे तो दूसरी तरफ़ "सूफ़ी विचारो" के कारण ये न सिर्फ़ खुदा को मानते थे, बल्कि हर ज़र्रे में "खुदा" के अंश की भी मंजूरी देते थे। वैसे भी "सूफ़ियों" के अनुसार "निर्वाण" पाने की चार शर्ते हैं:

१) शरियत: इस्लाम में कहे मुताबिक एक अनुशासित ज़िंदगी जीना
२) तरिक़त: मुर्शिद या गुरू की आज्ञा का पालन करना
३) हक़ीक़त: उस खुदा के नूर से दो-चार होना
४) मार्फ़त: सच से सामना होने के बाद उसी एक सच्चाई(उस एक खुदा) में खुद को डुबो देना

"बुल्ले शाह" ने अपनी ज़िंदगी का एक बहुमूल्य समय "मुर्शिद" यानी कि "गुरू" की खोज में बीता दिया। और अंत में जिस गुरू की शरण ली, वह न तो ओहदे में उनके स्तर का था और न हीं भेष-भूषा में किसी गुरू की तरह जान पड़ता था। यूँ तो "मिस्टिसिज़्म"(पराभौतिकवाद/रहस्यवाद) पर उस इंसान ने फ़ारसी में कई सारी किताबें लिखी थीं,जिनमें "दस्तूर-उल-अमल","इस्लाह-उल-अमल","लताइफ़-इ-ग़ैब्या", "इशरतुल तालिबिन" प्रमुख हैं, लेकिन पेशे से वह इंसान एक "माली" था और इसी कारण "बुल्ले शाह" के कई सारे शुभचिंतकों ने उनसे अपनी यह राय ज़ाहिर की थी कि "आप पैगम्बर मोहम्मद के वंशज हैं और आप कई सारी तिलिस्मी शक्तियों के मालिक हैं,फिर क्या यह आपको शोभा देता है कि आप एक नीच जाति के माली के शागिर्द बन जाएँ। क्या यह शर्मनाक नहीं है?" इतना सब कुछ होने के बावजूद "बुल्ले शाह" को अपने मुर्शिद "इनायत शाह क़ादरी" के प्रति बहुत हीं ज्यादा निष्ठा थी। उनका अपने गुरू के प्रति प्रेम के कई सारे किस्से मशहूर हैं। "प्रोफ़ेसर पुर्ण सिंह" एक ऐसी हीं घटना का हवाला देते हुए लिखते हैं: "एक बार बुल्ले शाह ने एक लड़की को अपने पति का इंतज़ार करते हुए देखा और पाया कि उसी इंतज़ार में वह सज-सँवर रही है,बालों में गाँठ और जुड़ा बाँध रही है। न जाने बुल्ले शाह को क्या सूझा और उन्होंने भी अपने गुरू से मिलने जाने से पहले एक लड़की की तरह का भेष बना लिया,बालों में उसी तरह के गांठ बाँध लिए और चल पड़े गुरू रहमत से मिलने। " तो इस तरह की थी बुल्ले शाह की भक्ति और जिसकी अपने गुरू के लिए इतनी भक्ति हो ,उसके दिल में खुदा के लिए कैसा अनुराग होगा, यह अनकहे हीं स्पष्ट है। "बुल्ले शाह" को लोग प्यार से "बाबा बुल्ले शाह" भी कहते हैं। "बाबा" के समकालीन कई सारे जानेमाने सूफ़ी और उर्दू कवि थे, जिनमें "वारिश शाह"(हीर-रांझा के रचयिता), सचल सरमस्त(वास्तविक नाम- अब्दुल वहद) और "मीर तकी मीर" के नाम सबसे ऊपर आते हैं। वैसे तो "बाबा" का लिखा सबकुछ संभाले जाने और गुनने योग्य है, लेकिन एक कलाम जो खासा प्रसिद्ध हुआ और जिसने हर किसी को अपने दिल में झांकने को मजबूर कर दिया,वो कुछ यूँ है:

बुल्ला कि जाणां मैं कौन?

न मैं अरबी न लाहौरी, न मैं हिंदी शहर नगौरी
न हिंदू न तुर्क पिशौरी, न मैं रहंदा विच नदौन।

इस कलाम को "रब्बी शेरगिल" ने एक अलग हीं चेहरा दे दिया है। वैसे आज हम इसकी बात नहीं कर रहे। आज हम "बेगम" आबिदा परवीन की आवाज़ में लयबद्ध "बाबा बुल्ले शाह" एलबम से "वाह-वाह रम्ज़ सजन दी होर" लेकर आप सबके सामने हाज़िर हुए हैं। अब चूँकि रचना "पंजाबी" भाषा में है,इसलिए मुझे इसका अर्थ नहीं मालूम। मैं आप सबसे यह दरख्वास्त करूँगा कि जितना हो सके,उतना हीं "तर्ज़ुमा" हमारे लिए कर दें। तो लीजिए कलाम पेश है:

वाह-वाह रम्ज़ सजन दी होर!

कोठे चढकर देवान होका
इश्क़ विहाजो कोई ना लोकां
इस सा मूल ना खाना धोखा
जंगल बस्ती मिले ना ठौर।

दे दीदार होया जद राही
अच्नाचेत प्यी गल विच फ़ाही
अनहदी कीति बेपरवाही
मैनु मिल्या ठग लाहौर।

आशिक़ फिरदे छुप-छुपाते
जैसे मूरत साडा मदमाते
दामे ज़ुल्फ़ दे अंदर फ़ाते
ओथे चल्ले वश ना जोर।

बुल्या शाह नु कोई ना देखे
जो देखे सो किसे ना लेखे
उस दा रंग ना रूप ना रेखे
ओही होवे होके चोर।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

वो फिराक हो या विसाल हो, तेरी याद महकेगी एक दिन,
वो गुलाब बनके खिलेगा क्या, जो ___ बनके जला न हो...

आपके विकल्प हैं -
a) चिराग, b) मशाल, c) आफ़ताब, d) माहताब

इरशाद ....

पिछली महफ़िल के साथी-
पिछली महफिल का सही शब्द था -"आवारा" और सही शेर कुछ यूँ था -

एक हमें आवारा कहना कोई बड़ा इल्जाम नहीं,
दुनिया वाले दिलवालों को और बहुत कुछ कहते हैं...

स्वप्न मंजूषा जी बधाई सही जवाब के लिए, आपने जो शेर फ़रमाया वो कुछ ऐसा था -

वो जो अभी इस राह गुजर से चाक गिरेबाँ गुजरा है,
उसी आवारा दीवाने को "जालिब जालिब" कहते हैं...

नीलम जी ने अर्ज किया -

आवारा हूँ गलियों में, मैं और मेरी तन्हाई,
जाये तो कहाँ जाएँ, हर मोड़ पर रुसवाई ...

रचना जी बहुत दिनों बाद लौटी इस शेर के साथ -

आवारा सा फिरता है वो
इश्क की धुन में रहता है वो...

इश्क की इस धुन में जीने का मज़ा ही कुछ और है....सभी रसिक श्रोताओं को बधाई.

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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