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Saturday, September 24, 2016

"मन क्यों बहका री बहका आधी रात को…”, क्यों प्यारेलाल इस गीत के लिए वनराज भाटिया का शुक्रिया अदा करते हैं?



एक गीत सौ कहानियाँ - 93

'मन क्यों बहका री बहका आधी रात को...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 93-वीं कड़ी में आज जानिए 1984 की फ़िल्म ’उत्सव’ के मशहूर गीत "मन क्यों बहका री बहका आधी रात को..." के बारे में जिसे लता मंगेशकर और आशा भोसले ने गाया था। बोल वसन्त देव के और संगीत लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल का। 

ता मंगेशकर और आशा भोसले के गाए युगल गीतों को सुनने का एक अलग ही आनन्द है। फ़िल्म-संगीत के आकाश में ये दोनों बहने सूरज और चाँद की तरह चमकते रहे हैं। और जब जब इन दोनों ने साथ में कोई गीत गाया, गीत को एक अलग ही पहचान मिली। उपलब्ध जानकारी के अनुसार ऐसे कुल 84 गीत हैं जिनमें लता जी और आशा जी, दोनों की आवाज़ें शामिल हैं। इनमें से कुछ गीतों में अन्य गायक कलाकार भी शामिल हैं। अगर लता-आशा डुएट्स की बात करें तो यह संख्या 62 के करीब है। पहली बार इन बहनों को 1949 की फ़िल्म ’बाज़ार’ में साथ में गवाया था संगीतकार श्यामसुन्दर ने, जिसमें राजकुमारी की आवाज़ भी शामिल थी, गीत के बोल थे “ज़रा सुन लो हम अपना...”। इसी साल मोहम्मद रफ़ी और सतीश बत्रा के साथ इन्हें संगीतकार विनोद ने गवाया ’एक थी लड़की’ में, जिसके बोल थे “हम चले दूर...”। लता-आशा का पहला युगल गीत वर्ष 1951 में रेकॉर्ड हुआ फ़िल्म ’दामन’ के लिए। के. दत्ता के संगीत में यह गीत था “ये रुकी रुकी हवायें...”। फिर इसके बाद तो इन बहनों को कई संगीतकारों ने गवाये जैसे कि रोशन, शंकर जयकिशन, हेमन्त कुमार, सी. रामचन्द्र, नौशाद, मदन मोहन, वसन्त देसाई, एस. एन. त्रिपाठी, सचिन देव बर्मन, आदि नारायण राव, रवि, दत्ताराम, चित्रगुप्त, कल्याणजी-आनन्दजी, लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल, राहुल देव बर्मन, ख़य्याम, राम लक्ष्मण और दिलीप सेन – समीर सेन। छोटे भाई हृदयनाथ मंगेशकर ने बड़ी बहनों और आशा जी के पुत्र हेमन्त भोसले ने भी अपनी माँ और मासी को एक साथ माइक के सामने ला खड़ा किया था। लता जी और आशा जी ने आख़िरी बार 1997 की फ़िल्म ’लवकुश’ में साथ में गाया था राम लक्ष्मण के संगीत में। वैसे वर्ष 2000 में जगजीत सिंह के ऐल्बम में “कहीं कहीं से हर चेहरा...” गीत साथ में गाया था। इस गीत में जगजीत सिंह की आवाज़ भी शामिल थी।

80 के दशक में जिस लता-आशा डुएट ने सर्वाधिक धूम मचाई, वह था फ़िल्म ’उत्सव’ का “मन क्यों बहका री बहका आधी रात को...”। विविध भारती के ’उजाले उनकी यादों के’ कार्यक्रम में प्यारेलाल जी ने इस गीत का उल्लेख करते हुए कहा था, “देखिए सबसे मज़े की बात क्या थी इसमें कि एक तो वह गाना जो लिखा गया, वह बहुत ही अच्छा, वसन्त देव जी। उसके बाद जब उसके धुन बनी, सबसे जो मैंने उसमें एन्जॉय किया वह लता जी और आशा जी। मेरे ख़याल से उसके बाद उन्होंने साथ में गाया है कि नहीं, मुझे मालूम नहीं, लेकिन जो दोनो गा रही थीं, उसका हम आनन्द ले रहे थे; एक ज़रा बोले ऐसे, फिर दूसरी बोलती थीं, इतना ख़ूबसूरत लगा और मतलब, मैं तो बोलूंगा कि नेक टू नेक बिल्कुल, जैसे लता जी ने गाया, वैसा ही आशा जी ने गाया है। इस पूरे पिक्चर के अन्दर बड़ी मेहनत की हमने, क्योंकि क्या है कि गिरिश कारनाड जी बहुत ही सेन्सिबल टाइप के आदमी हैं, हर एक चीज़ प्री-प्लान्ड, बल्कि लास्ट क्लाइमैक्स के पहले दो तीन रील तो गाने ही गाने हैं, दो रील में ख़ाली गाने हैं, गाने चल ही रहे थे और बहुत मेहनत किया हम लोगों ने। और मुझे सबसे ख़ुशी क्या हुई जो मैं आपको बोलना चाहूंगा, कि शशि कपूर जी की पिक्चर, हमेशा श्याम बेनेगल या वो करते थे, और गिरिश कारनाड, जो भी करते थे, हमेशा म्युज़िक होता था वनराज भाटिया का। तो मुझे सबसे बड़ी ख़ुशी तब हुई कि एक दिन मुझे फ़ोन किया वनराज जी ने, बोले, I am very very impressed and very glad and both of you have done a great job। मुझे लगा कि आज भी अच्छे लोग हैं दुनिया में, नहीं तो होता है कि हमारी पिक्चर छीन गई, यह बड़प्पन है उन लोगों का, जो अच्छे लोग होते हैं, तो I am real thankful to Mr Vanraj Bhatia।" 

इस गीत की रेकॉर्डिंग् से जुड़ा एक और क़िस्सा प्यारेलाल जी ने एक अन्य साक्षात्कार में बताया था। जैसा कि सभी जानते हैं कि लता जी और आशा जी में हेल्दी प्रोफ़ेशनल राइवलरी हमेशा ही रही है, इस वजह से जब भी कभी एक साथ डुएट गाने की बारी आती तो दोनों अपने अपने तरीके से एक दूसरे से बेहतर प्रदर्शन करने की कोशिशें करते। इस गीत में भी यही हुआ। रिहर्सल होकर गीत रेकॉर्डिंग् तक जा पहुँचा। लता जी और आशा जी आमने-सामने शीशे के केबिनों में गा रही थीं। जैसा कि इस गीत का स्वरूप है कि हर पंक्ति का पहला भाग लता जी गाती हैं, और दूसरा भाग आशा जी, तो एक तरह से लता जी सुर को लेती हैं और आशा जी सुर को छोड़ती हैं। तो गीत के एक जगह पर रिहर्सल के दौरान दोनों बहनों ने जिस तरह से गाया था, असली रेकॉर्डिंग् के समय आशा जी ने एक अलग ही मुड़की ले ली। लता जी ने जैसे ही यह महसूस किया, तो वो आशा की तरफ़ देखीं और मुस्कुरायीं और सहमती से सर हिलाया। आपस में प्रतिस्पर्धा होते हुए भी दोनों एक दूसरे की अच्छी बातों को सराहने में पीछे नहीं रहती थीं। 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Sunday, March 6, 2016

राग भटियार : SWARGOSHTHI – 260 : RAG BHATIYAR



स्वरगोष्ठी – 260 में आज

दोनों मध्यम स्वर वाले राग – 8 : राग भटियार

पण्डित रविशंकर और पण्डित राजन मिश्र का भटियार





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला – ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ की आठवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों की चर्चा कर रहे हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। संगीत के सात स्वरों में ‘मध्यम’ एक महत्त्वपूर्ण स्वर होता है। हमारे संगीत में मध्यम स्वर के दो रूप प्रयोग किये जाते हैं। स्वर का पहला रूप शुद्ध मध्यम कहलाता है। 22 श्रुतियों में दसवाँ श्रुति स्थान शुद्ध मध्यम का होता है। मध्यम का दूसरा रूप तीव्र या विकृत मध्यम कहलाता है, जिसका स्थान बारहवीं श्रुति पर होता है। शास्त्रकारों ने रागों के समय-निर्धारण के लिए कुछ सिद्धान्त निश्चित किये हैं। इन्हीं में से एक सिद्धान्त है, “अध्वदर्शक स्वर”। इस सिद्धान्त के अनुसार राग का मध्यम स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाता है। अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार राग में यदि तीव्र मध्यम स्वर की उपस्थिति हो तो वह राग दिन और रात्रि के पूर्वार्द्ध में गाया-बजाया जाएगा। अर्थात, तीव्र मध्यम स्वर वाले राग 12 बजे दिन से रात्रि 12 बजे के बीच ही गाये-बजाए जा सकते हैं। इसी प्रकार राग में यदि शुद्ध मध्यम स्वर हो तो वह राग रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच का अर्थात उत्तरार्द्ध का राग माना गया। कुछ राग ऐसे भी हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वर प्रयोग होते हैं। इस श्रृंखला में हम ऐसे ही रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आठवीं कड़ी में आज हम राग भटियार के स्वरूप की चर्चा करेंगे। साथ ही सबसे पहले हम आपको विश्वविख्यात संगीतज्ञ पण्डित रविशंकर के सितार पर राग भटियार के स्वर गूँजेंगे। इसके साथ ही लक्ष्मीकान्त – प्यारेलाल का संगीतबद्ध किया फिल्म ‘सुर संगम’ का इसी राग पर आधारित गीत पण्डित राजन मिश्र और एस. जानकी से सुनेगे।



आरोही नी अल्प ले, मध्यम दोऊ सम्हार,
रे कोमल, संवाद म स, क़हत राग भटियार।

पं. रविशंकर
अर्थात इस राग में कोमल ऋषभ और दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। आरोह में निषाद स्वर का अल्प प्रयोग किया जाता है। यह मारवा थाट का सम्पूर्ण जाति का राग है। अधिकतर विद्वान इस राग को बिलावल थाट के अन्तर्गत मानते हैं। बिलावल थाट का राग मानने का कारण है कि इस राग में शुद्ध मध्यम स्वर प्रधान होता है, जबकि राग मारवा में शुद्ध मध्यम का प्रयोग होता ही नहीं। स्वरूप की दृष्टि से भी यह मारवा के निकट भी नहीं है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। यह रात्रि के अन्तिम प्रहर विशेष रूप से प्रातःकालीन सन्धिप्रकाश काल में गाया-बजाया जाने वाला राग है। प्रातःकालीन सन्धिप्रकाश रागों में कोमल ऋषभ और शुद्ध गान्धार के साथ-साथ शुद्ध मध्यम स्वर का प्रयोग भी किया जाता है। तीव्र मध्यम स्वर का भी प्रयोग होता है, किन्तु अल्प। अवरोह के स्वर वक्रगति से लिये जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि यह पाँचवीं शताब्दी के राजा भर्तृहरि की राग रचना है। उत्तरांग प्रधान यह राग भंखार के काफी निकट होता है। राग भंखार में पंचम स्वर पर ठहराव दिया जाता है, जबकि राग भटियार में शुद्ध मध्यम पर। राग भटियार वक्र जाति का राग है। इसमें षडज स्वर से सीधे धैवत पर जाते हैं, जो अत्यन्त मनोहारी होता है। यह राग गम्भीर, दार्शनिक भाव और जीवन के उल्लास की अभिव्यक्ति देने में पूर्ण समर्थ है। राग भटियार का एक शास्त्रोक्त और प्रयोगधर्मी स्वरूप का अनुभव कराने के लिए अब हम आपको विश्वविख्यात संगीतज्ञ पण्डित रविशंकर से सितार पर दो रचनाएँ सुनवा रहे हैं। पहली रचना मध्यलय तीनताल में और दूसरी द्रुत एकताल में निबद्ध है। तबला संगति पण्डित कुमार बोस ने की है।


राग भटियार : सितार पर मध्यलय तीनताल और द्रुत एकताल की दो रचनाएँ : पण्डित रविशंकर 




लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल
आठवें दशक से ही फिल्म संगीत की प्रवृत्तियों में काफी बदलाव आ चुका था। नौवें दशक के फिल्म संगीत में रागदारी संगीत का समावेश एक उल्लेखनीय घटना मानी जाने लगी थी। ऐसे ही माहौल में 1985 में ‘सुर संगम’ और ‘उत्सव’, दो फिल्में बनीं जिसके संगीत में रागों का सहारा लिया गया था। यह भी उल्लेखनीय है कि इन दोनों फिल्मों के संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल थे। फिल्मों में लम्बे समय तक लोकप्रिय संगीत देने के लिए लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल का योगदान सराहनीय रहा है। 1963 में फिल्म ‘पारसमणि’ से फिल्म संगीतकार के रूप में पदार्पण करने वाली इस संगीतकार जोड़ी ने शुरुआती दौर की निम्नस्तरीय स्टंट फिल्मों में भी राग आधारित धुनें बना कर अपनी पैठ बनाई थी। उस दौर में उनकी फिल्में भले ही न चली हो, किन्तु उसका संगीत खूब लोकप्रिय हुआ। इसके बाद उनकी फिल्मों में लोक संगीत और लोकप्रिय सुगम संगीत के साथ-साथ राग आधारित धुनों का भी सहारा लिया गया था। 1985 में प्रदर्शित फिल्म ‘सुर संगम’ में उन्होने तत्कालीन प्रचलित फिल्म संगीत की प्रवृत्तियों के विपरीत संगीत दिया था। इस फिल्म के प्रायः सभी गीत विभिन्न रागों का आधार लिये हुए थे। यही नहीं फिल्म में मुख्य चरित्र के लिए उन्होने किसी फिल्मी पार्श्वगायक को नहीं बल्कि सुप्रसिद्ध शास्त्रीय युगल गायक पण्डित राजन और साजन मिश्र बन्धुओं में से एक राजन मिश्र का सहयोग लिया। फिल्म ‘सुर संगम’ में राग आधारित संगीत देना एक अनिवार्यता थी। दरअसल यह फिल्म दक्षिण भारतीय फिल्म ‘शंकराभरणम्’ का हिन्दी रूपान्तरण थी। फिल्म में मुख्य चरित्र संगीतज्ञ पण्डित शिवशंकर शास्त्री थे, जो संगीत की शुचिता और मर्यादा के प्रबल पक्षधर थे। अपने इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए शास्त्री जी मानव-मानव में कोई भेद नहीं मानते थे। ऐसे विषय के लिए राग आधारित संगीत की आवश्यकता थी। फिल्म में राग मालकौंस पर आधारित गीत- ‘आए सुर के पंछी आए...’, राग भूपाली और देशकार पर आधारित गीत- ‘जाऊँ तोरे चरणकमल पर वारी...’, राग भैरवी के सुरों में- ‘धन्यभाग सेवा का अवसर पाया...’ जैसे आकर्षक गीत पण्डित राजन मिश्र की आवाज़ में थे। परन्तु इस फिल्म का जो गीत लेकर आज हम उपस्थित हुए हैं, वह राग भटियार के सुरों में पिरोया गीत- ‘आयो प्रभात सब मिल गाओ...’ है। इस गीत में पण्डित राजन मिश्र के साथ दक्षिण भारत की सुप्रसिद्ध गायिका एस. जानकी के स्वर भी शामिल हैं। गीतकार बसन्त देव का लिखा यह गीत संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने सितारखानी ताल में निबद्ध किया है। आप इस अनूठे फिल्मी गीत में राग का अनुभव कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति प्रदान कीजिए।


राग भटियार : ‘आयो प्रभात सब मिल गाओ...’ : पण्डित राजन मिश्र और एस. जानकी





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 260वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको राग पर आधारित एक और फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत के गायक और गायिका के नाम हमे बता सकते हैं?

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 12 मार्च, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 262वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 258 की संगीत पहेली में हमने आपको 1966 में प्रदर्शित फिल्म ‘मेरा साया’ से राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – नन्द, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायिका – लता मंगेशकर

इस बार की पहेली में कुल छः प्रतिभागियों ने सही उत्तर दिया है। नागपुर, महाराष्ट्र से पुष्पा राठी ने ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली में पहली बार भाग लिया है। संगीत-प्रेमियों के इस परिवार में पुष्पा जी को शामिल करते हुए हम उनका हार्दिक स्वागत करते हैं। हमारे अन्य नियमित विजेता प्रतिभागी हैं- चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। सभी छः प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आप हमारी श्रृंखला ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ का रसास्वादन कर रहे हैं। श्रृंखला के आठवें अंक में हमने आपसे राग भटियार पर चर्चा की। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। ‘स्वरगोष्ठी’ पर आप भी अपने सुझाव और फरमाइश हमें शीघ्र भेज सकते है। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




Sunday, December 21, 2014

‘आयो प्रभात सब मिल गाओ...’ : SWARGOSHTHI – 199 : RAG BHATIYAR


स्वरगोष्ठी – 199 में आज

शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत – 8 : राग भटियार


पण्डित राजन मिश्र ने एस. जानकी के साथ भटियार के स्वरों में गाया- 'आयो प्रभात सब मिल गाओ...'



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी लघु श्रृंखला, ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत’। अब हम इस लघु श्रृंखला के समापन की ओर बढ़ रहे हैं। इस श्रृंखला में अभी तक आपने 1943 से 1960 के बीच में बनी कुछ फिल्मों के ऐसे गीत सुने जो रागों पर आधारित थे और इन्हें किसी फिल्मी पार्श्वगायक या गायिका ने नहीं बल्कि समर्थ शास्त्रीय गायक या गायिका ने गाया था। छठे दशक के बाद अब हम आपको सीधे नौवें दशक में ले चलते है। इस दशक में भी फिल्मी गीतों में रागदारी संगीत का हल्का-फुल्का प्रयास किया गया था। ऐसा ही एक प्रयास संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने 1985 की फिल्म ‘सुर संगम’ में किया था। इस फिल्म के मुख्य चरित्र के लिए उन्होने सुविख्यात गायक पण्डित राजन मिश्र (युगल गायक पण्डित राजन और साजन मिश्र में से एक) से पार्श्वगायन कराया था। आज के अंक में हम आपको इसी फिल्म से पण्डित राजन मिश्र की आवाज़ में राग भटियार के स्वरों में पिरोया एक गीत सुनवा रहे हैं। राग भटियार का एक अलग प्रयोगधर्मी स्वरूप का अनुभव करने के लिए सुप्रसिद्ध गायक पण्डित कुमार गन्धर्व के स्वरों में इस राग की एक आकर्षक रचना भी हम सुनेंगे। 


पण्डित राजन मिश्र
ठवें दशक से ही फिल्म संगीत की प्रवृत्तियों में काफी बदलाव आ चुका था। नौवें दशक के फिल्म संगीत में रागदारी संगीत का समावेश एक उल्लेखनीय घटना मानी जाएगी। ऐसे ही माहौल में 1985 में ‘सुर संगम’ और ‘उत्सव’, दो फिल्में बनीं जिसके संगीत में रागों का सहारा लिया गया था। यह भी उल्लेखनीय है कि इन दोनों फिल्मों के संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल थे। फिल्मों में लम्बे समय तक लोकप्रिय संगीत देने के लिए लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल का योगदान सराहनीय रहा है। 1963 में फिल्म ‘पारसमणि’ से फिल्म संगीतकार के रूप में पदार्पण करने वाली इस संगीतकार जोड़ी ने शुरुआती दौर की निम्नस्तरीय स्टंट फिल्मों में भी राग आधारित धुनें बना कर अपनी पैठ बनाई थी। उस दौर में उनकी फिल्में भले ही न चली हो, किन्तु उसका संगीत खूब लोकप्रिय हुआ। उनकी फिल्मों में लोक संगीत और लोकप्रिय सुगम संगीत के साथ-साथ राग आधारित धुनों का भी सहारा लिया गया था। 1985 में प्रदर्शित फिल्म ‘सुर संगम’ में उन्होने तत्कालीन प्रचलित फिल्म संगीत की प्रवृत्तियों के विपरीत संगीत दिया था। इस फिल्म के प्रायः सभी गीत विभिन्न रागों का आधार लिये हुए थे। यही नहीं फिल्म में मुख्य चरित्र के लिए उन्होने किसी फिल्मी पार्श्वगायक को नहीं बल्कि सुप्रसिद्ध शास्त्रीय युगल गायक पण्डित राजन और साजन मिश्र बन्धुओं में से एक राजन मिश्र का सहयोग लिया।

विदुषी एस. जानकी 
फिल्म ‘सुर संगम’ में राग आधारित संगीत देना एक अनिवार्यता थी। दरअसल यह फिल्म दक्षिण भारतीय फिल्म ‘शंकराभरणम्’ का हिन्दी रूपान्तरण थी। फिल्म में मुख्य चरित्र संगीतज्ञ पण्डित शिवशंकर शास्त्री थे, जो संगीत की शुचिता और मर्यादा के प्रबल पक्षधर थे। अपने इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए शास्त्री जी मानव-मानव में कोई भेद नहीं मानता थे। ऐसे विषय के लिए राग आधारित संगीत की आवश्यकता थी। फिल्म में राग मालकौंस पर आधारित गीत- ‘आए सुर के पंछी आए...’, राग भूपाली और देशकार पर आधारित गीत- ‘जाऊँ तोरे चरणकमल पर वारी...’, राग भैरवी के सुरों में- ‘धन्यभाग सेवा का अवसर पाया...’ जैसे आकर्षक गीत पण्डित राजन मिश्र की आवाज़ में थे। परन्तु इस फिल्म का जो गीत लेकर आज हम उपस्थित हुए हैं, वह राग भटियार के सुरों में पिरोया गीत- ‘आयो प्रभात सब मिल गाओ...’ है। इस गीत में पण्डित राजन मिश्र के साथ दक्षिण भारत की सुप्रसिद्ध गायिका एस. जानकी के स्वर भी शामिल हैं। गीतकार बसन्त देव का लिखा यह गीत संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने सितारखानी ताल में निबद्ध किया है। इस गीत के अन्य पक्ष पर चर्चा जारी रहेगी, आइए पहले यह गीत सुनते हैं।


राग भटियार : ‘आयो प्रभात सब मिल गाओ...’ : पण्डित राजन मिश्र  और एस. जानकी : फिल्म - सुर संगम : संगीत - लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल : गीत - बसन्त देव



आरोही नी अल्प ले, मध्यम दोऊ सम्हार,
रे कोमल, संवाद म स, क़हत राग भटियार।

अर्थात, इस राग में कोमल ऋषभ और दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। आरोह में निषाद स्वर का अल्प प्रयोग किया जाता है। यह मारवा थाट का सम्पूर्ण जाति का राग है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। यह रात्रि के अन्तिम प्रहर विशेष रूप से सन्धिप्रकाश काल में गाया-बजाया जाने वाला राग है। अवरोह के स्वर वक्रगति से लिये जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि यह पाँचवीं शताब्दी के राजा भर्तृहरि की राग रचना है। उत्तरांग प्रधान यह राग भंखार के काफी निकट होता है। राग भंखार में पंचम स्वर प ठहराव दिया जाता है, जबकि राग भटियार में शुद्ध मध्यम पर। यह राग गम्भीर, दार्शनिक भाव और जीवन के उल्लास की अभिव्यक्ति देने में पूर्ण समर्थ है। फिल्म ‘सुर संगम’ का यह गीत इन्हीं भावों की अभिव्यक्ति करता है। राग भटियार का एक शास्त्रोक्त और प्रयोगधर्मी स्वरूप का अनुभव कराने के लिए अब हम आपको पण्डित कुमार गन्धर्व की आवाज़ में इसी राग में एक खयाल रचना भी सुनवाएँगे।

पण्डित कुमार गन्धर्व 
पण्डित कुमार गन्धर्व भारतीय संगीत की एक नई प्रवृत्ति और नई प्रक्रिया के पहले कलासाधक थे। घरानों की पारम्परिक गायकी की अनेक शताब्दी पुरानी जो प्रथा थी उसमें संगीत तो जीवित रहता था, किन्तु संगीतकार के व्यक्तित्व और प्रतिभा का विसर्जन हो जाता था। कुमार गन्धर्व ने पारम्परिक संगीत के कठोर अनुशासन के अन्तर्गत ही कलासाधक की सम्भावना को स्थापित किया। 8 अप्रैल 1924 को बेलगाम, कर्नाटक के पास सुलेभवी नामक स्थान में एक संगीत प्रेमी परिवार में उनका जन्म हुआ था। माता-पिता ने नाम तो रखा था शिवपुत्र सिद्धरामय्या कोमकलीमठ, किन्तु आगे चल कर संगीत जगत में उन्हें कुमार गन्धर्व के नाम से प्रसिद्धि मिली। जिन दिनों कुमार गन्धर्व ने संगीत जगत में पदार्पण किया, उन दिनों भारतीय संगीत दरबारी जड़ता से प्रभावित था। कुमार गन्धर्व, पूर्णनिष्ठा और स्वर संवेदना के साथ एकाकी ही सक्रिय हुए। उन्होने अपनी एक निजी गायन शैली विकसित की जो हमें भक्तिपदों के आत्मविस्मरणकारी गायकी का स्मरण कराती है। वे मात्र एक साधक ही नहीं अन्वेषक भी थे। उनकी अन्वेषण प्रतिभा ही उन्हें भारतीय संगीत का कबीर बनाती है। उनका संगीत इसलिए भी रेखांकित किया जाएगा कि वह लोकोन्मुख रहा है। आइए, अब हम आपको पण्डित कुमार गन्धर्व के स्वर में राग भटियार, तीनताल में निबद्ध एक खयाल सुनवाते हैं। आप इस कृति का रसास्वादन कीजिए और इसी के साथ आज के इस अंक से विराम लेने की हमें अनुमति दीजिए।


राग भटियार : ‘दिन गए बीत दुःख के...’ : पण्डित कुमार गन्धर्व : तीनताल





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 199वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। फिल्म के इस गीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं।वर्ष 2014 की 200वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर बताइए कि आपको इसमें किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – यह रचना किस गायिका की आवाज़ में है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 27 दिसम्बर, 2014 को मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 201वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 197वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1960 में प्रदर्शित बाँग्ला फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ के एक राग आधारित गीत अथवा खयाल का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग बागेश्री और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल मध्य लय तीनताल। इस बार की पहेली में पूछे गए दोनों प्रश्नो के सही उत्तर पूर्व की भाँति जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हम भारतीय शास्त्रीय संगीत के विद्वानों द्वारा फिल्मों के लिए गाये गए गीतों पर चर्चा कर रहे हैं। अब हम इस लघु श्रृंखला के समापन की ओर बढ़ रहे हैं। वर्ष 2015 से ‘स्वरगोष्ठी’ की श्रृंखलाओं के बारे में हमे अनेक पाठकों और श्रोताओ के बहुमूल्य सुझाव प्राप्त हो रहे हैं। इन सभी सुझाव पर विचार-विमर्श कर हम नये वर्ष से अपनी प्रस्तुतियों में आवश्यक संशोधन करने जा रहे हैं। यदि आपने अभी तक अपने सुझाव और फरमाइश नहीं भेजी हैं तो आविलम्ब हमें भेज दें। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

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