Showing posts with label baiju bawara. Show all posts
Showing posts with label baiju bawara. Show all posts

Sunday, January 8, 2012

‘आज गावत मन मेरो....’ : गीत उस्तादों के, चर्चा राग- देसी की

पंडित डी वी पलुस्कर 

हिन्दी फिल्मों का इतिहास १९५३ में प्रदर्शित संगीतमय फिल्म ‘बैजू बावरा’ के उल्लेख के बिना अधूरा ही रहेगा। संगीतकार नौशाद को भारतीय संगीत के रागों के प्रति कितनी श्रद्धा थी, इस फिल्म के गीतों को सुन कर स्पष्ट हो जाता है। अपने समय के जाने-माने संगीतज्ञों को फिल्म संगीत के मंच पर लाने में नौशाद अग्रणी रहे हैं। आज की गोष्ठी में हम फिल्म ‘बैजू बावरा’ के एक गीत के माधम से प्रकृति के रंगों को बिखेरने में सक्षम राग ‘देसी’ अथवा ‘देसी तोड़ी’ पर चर्चा करेंगे।


स्वरगोष्ठी – 51 उस्ताद अमीर खान और डी वी पलुस्कर

ये वर्ष के एक नये अंक और एक नये शीर्षक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र आपकी इस सुरीली गोष्ठी में उपस्थित हूँ। विगत एक वर्ष तक आपका प्रिय स्तम्भ ‘सुर संगम’, अब आपके सुझावों के अनुरूप न केवल नये शीर्षक, बल्कि नये कलेवर के साथ आपके सम्मुख प्रस्तुत है। मित्रों, इस बदले हुए स्वरूप में अब आपकी सहभागिता भी रहेगी। आज की ‘स्वरगोष्ठी’ में हमारी चर्चा के विषय हैं- राग देसी, उस्ताद अमीर खान, पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर (डी.वी. पलुस्कर),संगीतकार नौशाद और फिल्म बैजू बावरा।

मित्रों, १९५३ में एक फिल्म- ‘बैजू बावरा’ प्रदर्शित हुई थी। अपने समय की सफल फिल्मों में यह एक सफलतम फिल्म थी। अकबर के समकालीन कुछ ऐतिहासिक तथ्यों के साथ कुछ दन्तकथाओं के मिश्रण से बुने हुए कथानक पर बनी इस फिल्म को आज भी केवल इसलिए याद किया जाता है कि इसका गीत-संगीत भारतीय संगीत के रागों पर केन्द्रित था। फिल्म के कथानक के अनुसार अकबर के समकालीन सन्त-संगीतज्ञ स्वामी हरिदास के शिष्य तानसेन सर्वश्रेष्ठ थे। श्रेष्ठता के कारण ही तानसेन की गणना अकबर के नवरत्नों में की गई थी। स्वामी हरिदास के ही एक अन्य शिष्य थे- बैजू अथवा बैजनाथ, जिसका संगीत मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण था। फिल्म के कथानक का निष्कर्ष यह था कि संगीत जब राज दरबार की दीवारों से घिर जाता है, तो उसका लक्ष्य अपने स्वामी की प्रशस्ति तक सीमित हो जाता है, जबकि मुक्त प्राकृतिक परिवेश में पनपने वाला संगीत ईश्वरीय शक्ति से परिपूर्ण होता है। राग देसी के स्वरों से पगा जो गीत आज हमारी चर्चा में है, उसका फिल्मांकन बादशाह अकबर के दरबार में किया गया था। तानसेन और बैजू बावरा के बीच एक सांगीतिक प्रतियोगिता बादशाह के सम्मुख, उन्हीं के आदेश से, भरे दरबार में आयोजित की गई और कहने की आवश्यकता नहीं कि इस प्रतियोगिता में तानसेन की तुलना में बैजू बावरा की श्रेष्ठता सिद्ध हुई थी। आज का गीत फिल्म के इसी प्रसंग में प्रस्तुत किया गया था। इस गीत में अपने समय के दो दिग्गज गायक उस्ताद अमीर खाँ और पण्डित डी.वी. पलुस्कर ने स्वर दिया था। आइए पहले इस गीत को सुनते हैं, फिर इस चर्चा को आगे बढ़ाएँगे।

फिल्म – बैजू बावरा : ‘आज गावत मन मेरो झूम के...’: स्वर – उस्ताद अमीर खाँ और पं. डी.वी. पलुस्कर


उस्ताद  अमीर खाँ  
अभी आपने जो युगलबन्दी सुनी, वह तीनताल में निबद्ध है। परदे पर तानसेन के लिए उस्ताद अमीर खाँ ने और बैजू बावरा के लिए पण्डित पलुस्कर ने स्वर दिया था। मित्रों, इन दोनों कलासाधकों का व्यक्तित्व और कृतित्व इतना विशाल है कि ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में मात्र कुछ पंक्तियों में समेटा नहीं जा सकता। भविष्य में इन संगीतज्ञों पर पूरा एक अंक समर्पित करेंगे। फिल्मी परम्पराओं के अनुसार इस गीत के रिकार्ड पर गीतकार, शकील बदायूनी और संगीतकार, नौशाद के नाम अंकित हैं। अपने समय के इन दो दिग्गज संगीतज्ञों की उपस्थिति में क्या नौशाद साहब गीत के एक भी स्वर, लय और ताल में उन्हें निर्देशित कर पाए होंगे? वर्षों पहले एक साक्षात्कार में नौशाद जी ने स्वयं स्वीकार किया था कि ‘मैंने उन्हें फिल्म के सिचुएशन की जानकारी दी और गाने के बोल दिये। उन्होने आपस में सलाह-मशविरा कर राग-ताल तय किये और फिर रिकार्डिंग शुरू...’। आइए, अब हम आपको राग देसी में निबद्ध एक विलम्बित खयाल ‘ए री मोसों करत बतियाँ....’ सुनवाते हैं, जिसके स्वरों में आप उपरोक्त फिल्मी गीत के स्वरों को खोजने का प्रयास करें। ग्वालियर घराने के गवैये उस्ताद उम्मीद अली खाँ (१९१०-१९७९) के स्वरों में राग देसी के इस खिले स्वरूप का अनुभव आप स्वयं करे।

विलम्बित खयाल : राग – देसी : स्वर – उस्ताद उम्मेद अली खाँ


आइए, अब थोड़ी चर्चा राग देसी के बारे में करते है। इस राग को देसी के अलावा देसी तोड़ी अथवा देस तोड़ी भी कहते हैं। यह आसावरी थाट का राग है। इसमे शुद्ध धैवत के स्थान पर कोमल धैवत का प्रयोग किया जाता है। शेष सभी स्वर राग देस के समान होते हैं। फिल्म ‘बैजू बावरा’ में इस राग का संक्षिप्त किन्तु अत्यन्त मुखर प्रयोग किया गया था। आइए, अब हम आपको सारंगी पर राग देसी की एक आकर्षक अवतारणा सुनवाते है। वादक हैं, १८८८ में जन्में, बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक दशकों के जाने-माने सारंगीनवाज़ उस्ताद मसीत खाँ, जिन्होने अपने समय के लगभग सभी दिग्गज गायक कलाकारों के साथ संगति कर यश पाया था।

सारंगी वादन : राग – देसी : वादक – उस्ताद मसीत खाँ


अब हम आज के अंक को यहीं विराम देते हैं और आपको इस सुरीली संगोष्ठी में सादर आमंत्रित करते हैं। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सब के बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। हम आपके सुझाव, समालोचना, प्रतिक्रिया और फरमाइश की प्रतीक्षा करेंगे और उन्हें पूरा सम्मान देंगे। आप इस पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा सीधे admin@radioplaybackindia.com पर अपना सन्देश भेज कर हमारी गोष्ठी में शामिल हो सकते हैं। आज हम आपसे यहीं विदा लेते हैं, अगले अंक में हमारी-आपकी पुनः सांगीतिक बैठक आयोजित होगी।

झरोखा अगले अंक का

आपको स्मरण ही होगा कि ४४वें अंक से हमने लोकगीतों के अन्तर्गत आने वाले संस्कार गीतों की श्रृंखला का शुभारम्भ किया था। इस श्रृंखला की अगली कड़ी में हम यज्ञोपवीत संस्कार के गीत के साथ-साथ विवाह संस्कार के गीतों की भी शुरुआत करेंगे। भविष्य में हम प्रयास करेंगे कि प्रत्येक मास कम से कम एक अंक लोक-संगीत पर अवश्य हो। अगले सप्ताह हम लोक-संगीत की सोंधी महक लिये हुए गीतों के साथ उपस्थित होंगे। हमारी इस सुरीली महफिल में अवश्य पधारिएगा।

Tuesday, October 6, 2009

ओ दुनिया के रखवाले....रफी साहब के गले से निकली ऐसी सदा जिसे खुदा भी अनसुनी न कर पाए

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 224

सुनहरे दौर में बहुत सारी ऐसी फ़िल्में बनी हैं जिनका हर एक गीत कामयाब रहा है। ५० के दशक की ऐसी ही एक फ़िल्म रही है 'बैजु बावरा'। अब तक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में हमने आप को इस फ़िल्म के दो गीत सुनवा चुके हैं, "तू गंगा की मौज" और "मोहे भूल गए साँवरिया"। फ़िल्म के सभी गानें राग प्रधान हैं और नौशाद साहब ने शास्त्रीय संगीत की ऐसी छटा बिखेरी है कि ये गानें आज अमर हो गए हैं। नौशाद साहब की काबिलियत तो है ही, साथ ही यह असर है हमारे शास्त्रीय संगीत का। हमने पहले भी यह कहा है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत में कुछ ऐसी ख़ास बात है कि यह हमारे कानों को ही नहीं बल्कि आत्मा पर भी असर करती है। और शायद यही वजह है कि रागों पर आधारित गानें कालजयी बन जाते हैं। 'बैजु बावरा' के उपर्युक्त गानें क्रम से राग भैरवी और भैरव पर आधारित हैं। इस फ़िल्म के लगभग सभी गीत किसी ना किसी शास्त्रीय राग पर आधारित है। और क्यों ना हो, फ़िल्म की कहानी ही है तानसेन और बैजु बावरा की, जो शास्त्रीय संगीत के दो स्तंभ माने जाते हैं। इसलिए 'दस राग दस रंग' शृंखला में इस फ़िल्म के किसी एक गीत को शामिल करना हमारे लिए अनिवार्य हो जाता है। आज के लिए हम ने इस फ़िल्म के जिस गीत को चुना है वह है रफ़ी साहब का गाया एक भक्ति रचना "ओ दुनिया के रखवाले, सुन दर्द भरे मेरे नाले"। यह गीत आधारित है राग दरबारी कानडा पर, जिसमें नायक ईश्वर का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है और साथ ही उसे कोस भी रहा है। गीतकार शक़ील बदायूनी एक अंतरे में लिखते हैं कि "आग बनी सावन की बरखा फूल बने अंगारे, नागन बन गई रात सुहानी पत्थर बन गए तारे, सब टूट चुके हैं सहारे, जीवन अपना वापस ले ले जीवन देनेवाले, ओ दुनिया के रखवाले"। बाद में 'फूल बने अंगारे' शीर्षक से कम से कम दो फ़िल्में बनी हैं, क्या पता शायद इसी से प्रेरीत हुए हों वे फ़िल्मकार! ख़ैर, 'बैजु बावरा' की तमाम बातें तो आप जान ही गए थे पिछले गीतों में, आइए आज इस राग की बातें करें।

इसमें कोई संदेह नहीं कि दरबारी कानडा एक बहुत ही लोकप्रिय राग रहा है समूचे उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत जगत में। माना जाता है कि संगीत सम्राट तानसेन ने इस राग का आविश्कार किया था, जो शहंशाह अक़बर के शाही दरबार में गायक हुआ करते थे। और इसीलिए इसका नाम पड़ा दरबारी कनाडा। यह रात्री कालीन राग है और इसे विकृत (वक्र) तरीके से गाया जाना चाहिए ताक़ी जौनपुरी, असावरी और अडाणा जैसे समगोष्ठी रागों से भिन्न सुनाई दे। ख़ास कर के अडाणा से इसे अलग रखने के लिए यह ज़रूरी है कि मन्द्र सप्तक और पुर्वांग पर ज़्यादा ज़ोर दिया जाए। इस राग पर अजस्र फ़िल्मी गीत बने हैं जिनकी एक सूची हम यहाँ आप को दे रहे हैं। इन गीतों के मुखड़ों को आप एक के बाद एक गुनगुनाइए ताक़ी इस राग का मूल स्वरूप आप के ज़हन मे आ जाए। ये हैं वो गीत...

१. आपकी नज़रों ने समझा प्यार के क़ाबिल मुझे
२. अगर मुझसे मोहब्बत है मुझे सब अपने ग़म दे दो
३. ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल जहाँ कोई न हो
४. भूल जा, जो चला गया उसे भूल जा
५. चांदी की दीवार न तोड़ी प्यार भरा दिल तोड़ दिया
६. दिल जलता है तो जलने दे
७. हम तुझसे मोहब्बत करके सनम
८. हम तुमसे जुदा होके मर जाएँगे रो रो के
९. झनक झनक तोरी बाजे पायलिया
१०. कितना हसीं है मौसम कितना हसीं सफ़र है
११. कोई मतवाला आया मेरे द्वारे
१२. मैं निगाहें तेरे चेहरे से हटाऊँ कैसे
१३. मेरे महबूब न जा आज की रात न जा
१४. मोहब्बत की झूठी कहानी पे रोए
१५. नैनहीन को राह दिखा प्रभु
१६. रहा गरदिशों में हमदम मेरे इश्क़ का सितारा
१७. सत्यम शिवम सुंदरम
१८. सुहानी चांदनी रातें हमें सोने नहीं देते
१९. तोरा मन दर्पण कहलाए
२०. टूटे हुए ख़्वाबों ने हम को ये सिखाया है

उम्मीद है, इन सब गीतों को गुनगुनाते हुए आप ने राग दरबारी कनाडा से एक रिश्ता बना लिया होगा, और आइए अब सुनते हैं फ़िल्म 'बैजु बावरा' से आज का गीत। बैजु बावरा का ज़िक्र इस शृंखला में आगे भी आएगा, जिसमें हम आपको ऐसी रागों के बारे में बताएँगे जिनका इजाद बैजु बावरा ने किया था। फ़िल्हाल सुनिए आज का गीत।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. इस फिल्म में उस अभिनेत्री ने दोहरी भूमिका निभाई थी जो एक मशहूर गीतकार की जीवन संगिनी भी बनी आगे चलकर
२. नीरज के लिखा ये गीत आधारित है राग पटदीप की.
३. अंतरे में शब्द है -"गंगा".

पिछली पहेली का परिणाम -

पूर्वी जी बहुत बधाई अब आप मंजिल के बेहद करीब हैं, दिशा जी ने बहुत दिनों में दर्शन दिए पर यदि बोल हिंदी में देते तो अधिक बेहतर होता. दिलीप जी अपनी पोस्ट का भी लिंक दे दिया होता....

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, April 23, 2009

तू गंगा की मौज, मैं जमुना का धारा....रफी साहब के श्रेष्ठतम गीतों में से एक

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 60

दोस्तों, जब हमने आपको फ़िल्म बैजु बावरा का गीत "मोहे भूल गए सांवरिया" सुनवाया था तब हमने इस बात का ज़िक्र किया था कि इस फ़िल्म का हर एक गीत 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में शामिल होने की काबिलियत रखता है। इसलिए आज हमने सोचा कि क्यों न इस फ़िल्म का एक और गीत आप तक पहुँचाया जाए! तो लीजिए पेश है बैजु बावरा फ़िल्म का सबसे 'हिट' गीत "तू गंगा की मौज मैं जमुना का धारा"। युं तो इस गीत को मुख्य रूप से रफ़ी साहब ने ही गाया है, लेकिन आख़िर में लताजी और साथियों की भी आवाज़ें मिल जाती हैं। राग भैरवी पर आधारित यह गीत संगीतकार नौशाद और गीतकार शक़ील बदायूनीं की जोड़ी का एक महत्वपूर्ण गीत है। इस गीत के लिए नौशाद साहब को १९५४ में शुरु हुए पहले 'फ़िल्म-फ़ेयर' पुरस्कार के तहत सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का पुरस्कार मिला था। मीना कुमारी को भी सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला था इसी फ़िल्म के लिये। लेकिन फ़िल्म के नायक भारत भूषण को पुरस्कार न मिल सका क्योंकि सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार उस साल ले गये दिलीप कुमार फ़िल्म "दाग़" के लिए। १९५३ में बैजु बावरा बनी थी और उसी साल से अमीन सायानी का मशहूर रेडियो प्रोग्राम गीतमाला शुरु हुआ था और इसी गीत को उस साल के सबसे लोकप्रिय गीत के रूप में इस कार्यक्रम में चुना गया था।

'बैजु बावरा' फ़िल्म के इस गीत के बारे में तो हम बता चुके, आइए अब कुछ बातें इस फ़िल्म के बारे में भी हो जाए! जैसा कि आपको पता होगा फ़िल्मकार भाइयों की जोड़ी विजय भट्ट और शंकर भट्ट प्रकाश पिक्चर्स के बैनर तले फ़िल्में बनाया करते थे। ४० के दशक में एक के बाद एक धार्मिक और पौराणिक फ़िल्में बनाने की वजह से एक समय ऐसा आया कि उनकी आर्थिक अवस्था काफ़ी हद तक ख़राब हो गई। यहाँ तक की प्रकाश पिक्चर्स को बंद करने की नौबत आने ही वाली थी। कोई और उपाय न पा कर दोनो भाई पहुँच गए नौशाद साहब के पास। नौशाद साहब के सम्पर्क में आकर उनके क़िस्मत का सितारा एक बार फिर से चमक उठा 'बैजु बावरा' के रूप में। 'बैजु बावरा' की अपार सफ़लता ने भट्ट भाइयों को डूबने से बचा लिया। दोस्तों, 'बैजु बावरा' से संबंधित कुछ और जानकारियाँ हम सुरक्षित रख रहे हैं किसी और अंक के लिए जब हम आपको इस फ़िल्म का एक और गाना सुनवायेगे। तो लीजिये, आज पेश है "तू गंगा की मौज..."



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. फिल्म के शीर्षक में "बम्बई" शब्द है. देव आनंद मुख्य कलाकार हैं.
२. बर्मन दा के संगीत से सजा एक अमर गीत है ये.
३. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से -"बाबुल".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
भाई कल तो जम कर वोटिंग हुई, दो खेमे बँट गए एक तरफ रहे समीर लाल जी, पी एन साहब और नीलम जी, और दूसरी तरफ हमारे दिग्गज मनु और नीरज. इस बार जीत दिग्गजों की हुई. दरअसल जिस गीत का समीर लाल जी ने जिक्र किया वो भी नौशाद साहब का ही है पर वो लता और रफी का एक युगल गीत है जो दिलीप कुमार और मीना कुमारी पर फिल्माया गया है. जबकि आज का ये गीत मूलतः रफी साहब के स्वर में है, बस यही फर्क है. पर आपका सुझाया गीत भी बेहद प्यारा है और जल्द ही ओल्ड इस गोल्ड पर आएगा. निश्चिंत रहें. संगीता जी और प्रकाश जी का भी महफिल में स्वागत.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Tuesday, March 10, 2009

मोहे भूल गए सांवरिया....

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 19

दोस्तों, जब शास्त्रीय रागों की बात आती है तो फिल्मी गीतों में संगीतकारों ने समय समय पर बहुत से रागों का बहुत ही खूबसूरत इस्तेमाल किया है. लेकिन अगर ज़रा गौर किया जाए तो हम पाते हैं की कुछ राग ऐसे हैं जिनका बहुत ज़्यादा इस्तेमाल होता है. राग भैरवी ऐसा ही एक राग है. संगीतकार जोडी शंकर जयकिशन का यह सबसे पसंदीदा राग रहा है और इस राग पर आधारित उनके बहुत से लोकप्रिय गीत हैं. जहाँ तक राग भैरवी का सवाल है, तो संगीतकार नौशाद भी इसके असर से बच नहीं पाए हैं. उनके कई ऐसे फिल्म हैं जिनमें राग भैरवी पर आधारित गाने हैं. ऐसी ही एक फिल्म है "बैजू बावरा". इस फिल्म में कम से कम दो गीत ऐसे हैं जो इस राग पर आधारित हैं. इनमें से एक गीत तो इस फिल्म का सबसे लोकप्रिय गीत है, जी हाँ, "तू गंगा की मौज मैं जमुना का धारा", और क्या आपको पता है दूसरा गीत कौन सा है? दूसरा गीत है "मोहे भूल गये साँवरिया".

बैजू बावरा फिल्म का हर एक गीत किसी ना किसी शास्त्रीय राग पर आधारित है. नौशाद साहब के बारे में यही कहा जाता है की भारतीय शास्त्रीय संगीत को सरल तरीके से उन्होने आम जनता तक पहुँचाया है, जिसे हर आम आदमी गुनगुना सकता है. बैजू बावरा, नौशाद साहब के संगीत सफ़र का एक महत्वपूर्ण पडाव था. विजय भट्ट और शंकर भट्ट ने प्रकाश पिक्चर्स के 'बॅनर' तले इस फिल्म का निर्माण किया था. इस फिल्म का हर एक गीत 'मास्टरपीस' है, और हर एक गीत इस 'ओल्ड इस गोल्ड' शृंखला में शामिल होने की काबलियत रखता है. तो लीजिए सुनिए लता मंगेशकर की आवाज़, शक़ील बदायूँनी के बोल और नौशाद का दिव्य संगीत फिल्म बैजू बावरा से.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. कल होली है और ये गीत भी होली के रंगों में डूबा हुआ है.
२. ये गीत जिस फिल्म का है उस फिल्म के नाम का एक धारावाहिक आजकल बहुत लोकप्रिय है.
३. आर डी बर्मन और आनंद बक्षी की जोड़ी, शक्ति सामंता का निर्देशन.

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
नीरज जी स्वागत आपका. सही जवाब के साथ एंट्री की है आपने. आचार्य जी आपकी पसंद का गीत भी जल्द ही आएगा. आशा है आपने आज के गीत का भरपूर आनंद लिया होगा. विनय जी और अन्य समस्त श्रोताओं को भो होली की शुभकामनायें. कल हमारा होली विशेषांक सुनना मत भूलियेगा.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ