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Tuesday, May 11, 2010

प्रीतम लाए हैं बदमाश कम्पनी वाली अय्याशी तो शंकर एहसान लॊय के साथ है धन्नो की हाउसफुल महफ़िल

ताज़ा सुर ताल १८/२०१०

सुजॊय - विश्व दीपक जी, साल २०१० के चार महीने बीत चुके हैं, लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि वह एक गीत अभी तक नहीं आ सका है जिसे इस साल का 'सॊंग ऒफ़ दि ईयर' कहा जा सकता हो। मेरे हिसाब से तो इस साल का संगीत कुछ ठंडा ठंडा सा चल रहा है। आपके क्या विचार हैं?

विश्व दीपक - सुजॊय जी, मैं आपकी बात से एक हद तक सहमत हूँ। फिर भी मुझे न जाने क्यों "रावण" के "रांझा-रांझा" से ढेर सारी उम्मीदें हैं। अभी तक जितने भी गाने इस साल आए हैं, यह गाना मुझे सबसे ज्यादा पसंद है। आगे क्या होगा, यह कहा तो नहीं जा सकता, लेकिन बस चार महीने में 'सॊंग ऒफ़ दि ईयर' का निर्णय कर देना तो जल्दीबाजी हीं होगी। इसलिए धैर्य रखिए.... मुझे पूरा विश्वास है कि बाकी के आठ महीनों में कुछ न कुछ कमाल तो ज़रूर हीं होगा, नहीं तो रावण है हीं। खैर ये बताईये कि आज हम किस फिल्म या फिर किन फ़िल्मों के गानों की चर्चा करने जा रहे हैं।

सुजॊय - आज हमने इस स्तंभ के लिए दो ऐसी फ़िल्मों के तीन-तीन गीत चुने हैं जो फ़िल्में हाल ही में प्रदर्शित हो चुकी हैं। ये दो फ़िल्में हैं 'बदमाश कंपनी' और 'हाउसफ़ुल'। हमने जब रावण के संगीत की समीक्षा की थी, तब हीं इन दो फिल्मों का ज़िक्र आया था, लेकिन ’रहमान’ के नाम के कारण रावण को तवज्जो देनी पड़ी। आज दो हफ़्तों के बाद हमें फिर से इन पर नज़र दौराने का मौका मिला है। तो हम इस समीक्षा की शुरूआत 'बदमाश कंपनी' के गीतों से करते हैं। इस फिल्म के रिव्यूज तो कुछ अच्छे नहीं सुनाई दे रहे। कहानी में भी ज़्यादा दम नहीं है, वही चार दोस्तों की शॊर्ट-कट वाले रस्ते में चलकर अमीर बनने की कहानी।

विश्व दीपक - शाहिद कपूर, अनुश्का, वीर दास और मेयांग चैंग इस फ़िल्म के चार मुख्य किरदार हैं। ध्यान देने वाली बात है कि मेयांग चैंग, जो कि पिछले साल 'इंडियन आइडल' के अच्छे गायकों में से एक रहे हैं, इस फ़िल्म में उनकी आवाज़ में कोई भी गीत नहीं है। मुझे यह बात थोड़ी खली ज़रूर। लेकिन क्या कर सकते हैं। निर्णय तो संगीतकार और निर्देशक का हीं होता है। वैसे आपको बता दें कि फ़िल्म में संगीत प्रीतम का है और शाहिद कपूर के साथ उनके गानें ख़ूब कामयाब रहे हैं जैसे कि 'जब वी मेट', 'किस्मत कनेक्शन', 'दिल बोले हड़िप्पा' आदि।

सुजॊय - शाहिद कपूर को अगर इस दौर का जम्पिंग जैक जीतेन्द्र कहा जाए तो गलत न होगा। और प्रीतम के थिरकन भरे गानों को वो अपनी दमदार डान्स से सार्थक बनाते भी हैं। 'बदमाश कंपनी' में भी तेज़ रीदम के कई गीत हैं। जैसे कि पहला गीत जो हम सुनवाने जा रहे हैं "चस्का चस्का लगा है"। सुनते हैं कृष्णा और साथियों की आवाज़ में यह गीत। इस गीत के बारे में यही कह सकते हैं कि विशाल भारद्वाज ने 'कमीने' के "ढैन ट नैन" में जिस तरह के जीवन शैली जीने वाले युवाओं को दर्शाया है, "चस्का" में वही कोशिश सुनाई देती है लेकिन यह गीत ख़ास असर नहीं करती, और एक बहुत ही एवरेज गीत है मेरे ख़याल में।

विश्व दीपक - गीत के अरैंजमेण्ट में ज़्यादा ध्यान दिया गया है और तेज़ रीदम के बीच कृष्णा की आवाज़ बैकग्राउंड में जैसे सुनाई देती है और ड्रम बीट्स ही फ़ोरग्राउंड पर पूरे गीत में छाए हुए हैं। फ़िल्म की गीतकारा अन्विता दत्त गुप्तन ने कोशिश तो अच्छी की है गुलज़ार साहब की तरह वही "ढैन ट नैन" वाला अंदाज़ लाने की, लेकिन वो उसमें कितनी सफल हुईं हैं, यह आप ख़ुद ही गीत को सुन कर निर्णय लीजिए। वैसे अगर आप मुझसे पूछें तो मुझे "ताजी/भाजी करारी है, भून के उतारी है, किस्मत गरमा-गरम" जैसे प्रयोग बेहद पसंद आते हैं। और इस लिहाज से मुझे इस गाने के बोल जबरदस्त तो नहीं कहूँगा लेकिन हाँ अच्छे जरूर लगे। चलिए तो सुनते हैं "चस्का"।

गीत: चस्का चस्का


सुजॊय - जब फ़िल्म की कहानी ही ऐसी है कि चार युवा जो ग़लत राह इख़्तियार कर अमीर बनने की कोशिश में लगे हैं एक आलीशान ज़िंदगी पाने की चाहत में, तो ऐसे में अगर फ़िल्म के किसी गीत का मुखड़ा हो "सर चढ़ी है ये अय्याशी", तो इसमें गीतकार को दोष देना ग़लत होगा। जी हाँ, इस फ़िल्म के एल्बम का पहला गीत ही है "अय्याशी"। के. के और साथियों का गाया हुआ गीत है। के. के ने अपनी रॊक शैली वाले अंदाज़ में इस गीत को बखूबी निभाया है। पहले भी मैंने कहा था, आज दोहरा रहा हूँ कि के.के एक ऐसे गायक हैं जिनकी चर्चा बहुत कम होती है, लेकिन वो अपने हर गीत में अपना १००% देते हैं। आजकल वैसे उनकी आवाज़ में 'काइट्स' का गीत "ज़िंदगी दो पल की" गली गली गूँज रहा है।

विश्व दीपक - जहाँ तक "अय्याशी" का सवाल है, प्रीतम की टेक्नो ईलेक्ट्रॊनिक धुनें गीत के बोलों पर हावी होते सुनाई देती हैं। हिप हॊप और 'डेथ रॊक मेटल' का मिला जुला संगम है इस गीत का संगीत। इस गीत का भाव फ़िल्म के कहानी के साथ जाता है और प्रोमोज़ भी इसी गीत के ज़रिए किया गया है कई दिनों तक। बहुत ज़्यादा इम्प्रेसिव तो नहीं कहेंगे, लेकिन कहानी के हिसाब से ठीक ठाक है।

गीत: अय्याशी


विश्व दीपक - और अब सूफ़ी रंग। आज के दौर का यह चलन बन चुका है कि हर फ़िल्मकार अपनी फ़िल्म में कम से कम एक सूफ़ियाना अंदाज़ का गीत डालने की कोशिश कर रहा है। 'बदमाश कंपनी' में भी प्रीतम ने राहत फ़तेह अली ख़ान से एक ऐसा ही गीत गवाया है, लेकिन पाश्चात्य संगीत के साथ सूफ़ी का ऐसा फ़्युज़न किया है कि गीत कुछ अलग ही शक्ल में सामने आता है। "फ़कीरा" को हम एक 'सूफ़ी-रॊक' गीत कह सकते हैं।

सुजॊय - इससे पहले प्रीतम के संगीत में फ़िल्म 'दे दना दन' में "रिश्ते नाते हंस के तोड़ दूँ" गीत गाया था राहत साहब ने, जिसमें एक सुकून एक मिठास थी। लेकिन इस गीत पर इतना ज़्यादा रॊक का रंग चढ़ा दिया गया है कि गीत की आत्मा कहीं खो सी गई है। यह भी मेरे ख़याल से एक ऐवरेज गीत है और राहत साहब जैसे गायक के होते हुए भी गाना दिल को ज़्यादा छू नहीं पाया। आगे आप सुनिए और बताइए कि आपको इस गीत के बारे में क्या कहना है।

गीत: फ़कीरा


विश्व दीपक - और अब आज की दूसरी फ़िल्म 'हाउसफ़ुल' के तीन गीतों की बारी। अक्षय कुमार, अर्जुन रामपाल, रितेश देशमुख, दीपिका पादुकोन, लारा दत्ता, जिया ख़ान, चंकी पाण्डेय जैसे मल्टी स्टार कास्ट वाली यह हास्य फ़िल्म लोगों को पसंद आ रही है ऐसा सुनने में आया है। फ़िल्म में संगीत शंकर अहसान लॊय का है।

सुजॊय - यह फ़िल्म भले ही अपनी कॊमेडी की वजह से लोगों को आकर्षित कर रही है, लेकिन गीत संगीत में उतना दम नहीं है। यह इसलिए भी हो सकता है क्योंकि इस फिल्म में ऐसे गानों की हीं ज़रूरत है जो लोगों को थिरकाएँ। लोग इन गानों को भविष्य में याद रखते हैं या नहीं, यह एक अलग मुद्दा है। आपको याद होगा कि "हे बेबी" में भी इस तिकड़ी ने ऐसे हीं गाने दिए थे। तो इन गानों में से पहला गीत जो हम सुनने जा रहे हैं वह है "ओ गर्ल, यू आर माइन"। तरुण सागर, अलीसा मेनडॊन्सा और लॊय ने इस गीत को गाया है। गाने का रीदम कैची है, शुरुआती संगीत में जो हारमोनिका सुनाई देता है, वह भी पहली बार सुनने वाले को आकर्षित करता है। आजकल यही गीत हर टीवी चैनल और रेडियो चैनल पर सुनाई दे रहा है। और चलिए यहाँ भी इस गीत को सुना जाए शुरु से लेकर आख़िर तक।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, गाना तो हम सुन हीं लेंगे लेकिन क्या आपने ध्यान दिया कि "तरूण सागर" का नाम बेहद अनजाना तो कुछ-कुछ जाना-पहचाना-सा है। दर-असल तरूण पिछली साल के "सारेगामापा" में एक प्रतिभागी थे, विजयी तो नहीं हुए, लेकिन शंकर महादेवन की नज़रों में आ गए और फिर देखिए किस्मत उन्हें कहाँ से कहाँ ले गई। पहली हीं फिल्म में शंकर के लिए गाना कोई छोटी बात नहीं है। "ओ गर्ल" के बाद हम जो गाना सुनेंगे, उसमें भी एक नई गायिका हैं "रीतु पाठक"। तरूण जहाँ सारेगामापा के प्रतिभागी थे तो रीतु "इंडियन आईडल" की। शंकर-एहसान-लॊय ने इन दोनों गलाकारों को एक बहुत हीं मज़बूत मंच दिया है। मैं तो यही दुआ करता हूँ कि ये दोनों संगीत की दुनिया में बहुत आगे जाएँ और ऐसे हीं एक से बढकर एक गाने गाते रहें। हाँ तो अब सुनते हैं वो गीत:

गीत: ओ गर्ल यू आर माइन


सुजॊय - आजकल फ़िल्मी गीतों में बोलों के लिहाज़ से भी उतने ही प्रयोग हो रहे हैं जितने की संगीत में हो रहे हैं। आज से दस साल पहले तक शायद हीं किसी ने यह सोचा होगा कि "पप्पु काण्ट डान्स साला" जैसे मुखड़े भी कभी आ सकते हैं तो फिर अगर 'हाउसफ़ुल' में गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य लिखते हैं कि "वॊल्युम कम कर पप्पा जग जाएगा" तो इसमें बहुत ज़्यादा हैरान होनेवाली बात नहीं है।

विश्व दीपक - इस गीत को गाया है रीतु पाठक(जिनका ज़िक्र हमने पहले हीं कर दिया है), नीरज श्रीधर और अलीसा मेन्डोन्सा(लॊय की सुपुत्री) ने। पिछले गीत की तरह यह भी एक पेप्पी नंबर है। हल्के फुल्के गीत शैली में ये दोनों गानें ही कैची हैं। 'बदमाश कंपनी' के गानों ने पेप्पी होते हुए भी जो असर नहीं किया था, शायद 'हाउसफ़ुल' के गीत उस मापदंड पर कुछ हद तक खरे उतर जाएँ।

सुजॊय - मुझे भी ऐसा लगा कि ये दोनों गीतों ने अपनी रीदम के बल पे कुछ हद तक आज के युवाओं को वश में किया है। आइए यह गीत भी सुन लेते हैं।

गीत: वॊल्युम कम कर पप्पा जाग जाएगा


विश्व दीपक - ’हाउसफ़ुल' एल्बम का मुख्य आकर्षण है अमिताभ बच्चन की 'लावारिस' फ़िल्म के मशहूर गीत "अपनी तो जैसे तैसे" का रिमिक्स वर्ज़न। गीत का शीर्षक रखा गया है "आपका क्या होगा (धन्नो रिमिक्स)"। लगता है अब यह नया स्टाइल भी चल पड़ेगा कि हर फ़िल्म में किसी पुराने गीत का रिमिक्स डाल दिया जाएगा। आपका क्या ख़याल है सुजॊय?

सुजॊय - हो सकता है। पिछले कुछ समय से रिमिक्स गानें बनाने की होड़ कुछ ख़त्म सी हो गई थी, अब हो सकता है कि इसके बाद फिर से एक बार रिमिक्स बनाने का सिलसिला शुरु हो जाए। इस विवाद पर न जाते हुए आपको यह बता दें कि किशोर दा के इस ऒरिजनल गीत को आवाज़ दी है मिका ने और साथ में हैं सुनिधि चौहान और साजिद ख़ान।

विश्व दीपक - विवाद का आपने ज़िक्र किया तो मैं कम से कम इतना बता दूँ कि विवाद वैसे भी शुरु हो गया है इस गीत को लेकर, ऐसा कहा जा रहा है कि निर्माता ने ऒरिजिनल गीत के कॊपीराइट्स उचित तरीके से हासिल नहीं किए हैं।

सुजॊय - "अपनी तो जैसे तैसे" गीत को लिखा था अंजान साहब ने। और अब इस गीत का रिकिक्स्ड वर्ज़न को लिखा है उन्ही के सुपुत्र गीतकर समीर ने। एक तरह से अपने पिता को श्रद्धांजलि ही हुई उनकी तरफ़ से। आइए सुनते हैं यह गीत और आज के 'ताज़ा सुर ताल' की चर्चा यहीं संपन्न करते हैं।

गीत: आपका क्या होगा (धन्नो)


"बदमाश कंपनी" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***
बदमाश कंपनी से प्रीतम और अन्विता दत्त गुप्तन पहली बार एक साथ आए हैं। प्रीतम के साथ इरशाद कामिल की जो जोड़ी है, वह कमाल करती है और हमें इस फिल्म में उसी जोड़ी की कमी खल गई। वैसे कोई बात नही, अगली फिल्म "राजनीति" में यह जोड़ी वापस आ रही है।

"हाउसफुल" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***१/२
इस फिल्म के हमने तीन हीं गाने चुने हैं लेकिन हम यहाँ पर एक और गाने का ज़िक्र करना चाहेंगे। गाने के बोल हैं "आई डोंट नो व्हाट टू डू".. बोल कुछ अजीब से लगते हैं, लेकिन इस गाने में सुनिधि चौहान और शब्बीर कुमार (हाँ आपने सही सुना, ८० के दशक के सुपरहिट शब्बीर कुमार की आवाज़ है इस गाने में) ने सेन्सुअस और छेड़-छाड़ वाले गानों को एक नया अर्थ दिया है। इस गाने के कारण हीं हम इस एलबम को एक्स्ट्रा आधी रेटिंग दे रहे हैं। हमें खेद है कि हम ये गाना आपको सुनवा नहीं पाए, लेकिन आप इसे किसी भी तरह से सुनिएगा ज़रूर।

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ५२- जिस साल मेयांग चैंग 'ईंडियन आइडल' में भाग लिया था, उस साल इंडियन आइडल का ख़िताब किसने जीता था?

TST ट्रिविया # ५३- गीतकार अंजान ने फ़िल्म 'लावारिस' के लिए लिखा था "अपनी तो जैसे तैसे"। बताइए कि इस फ़िल्म में उनके अलावा और किन गीतकार ने गीत लिखे थे।

TST ट्रिविया # ५४- आज के 'ताज़ा सुर ताल' में में रितेश देशमुख, प्रीतम और मिका का अलग अलग ज़िक्र आया है। क्या आप कोई ऐसा गीत बता सकते हैं जिसमें इन तीनों का योगदान रहा हो?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. 'फ़िल्मफ़ेयर आर.डी. बर्मन अवार्ड' तथा सर्वश्रेष्ठ पार्श्व संगीत (बेस्ट बैकग्राउंड म्युज़िक) - ये दोनों पुरस्कार फ़िल्म 'देव-डी' के लिए।
२. फ़िल्म 'रंग दे बसंती' में "लुका छुपी बहुत हुई सामने आ जाना"।
३. फ़िल्म 'वेक अप सिड' और गायिका कविता सेठ।

सीमा जी, आपके तीनों जवाब सहीं हैं। बधाई स्वीकारें!

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