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Tuesday, December 9, 2008

लक्ष्मीकांत प्यारेलाल से लक्ष्मी प्यारे..और आज के एल पी तक...एक सुनहरा अध्याय


३७ लंबे वर्षों तक श्रोताओं को दीवाना बनाकर रखने वाले इस संगीत जोड़ी को अचानक ही हाशिये पर कर दिया गया. आखिर ऐसा क्यों हुआ. ५०० से भी अधिक फिल्में, अनगिनत सुपरहिट गीत, पर फ़िर भी संगीत कंपनियों ने और मिडिया ने उन्हें नई पीढी के सामने उस रूप में नही रखा जिस रूप में कुछ अन्य संगीतकारों को रखा गया. गायक महेंद्र कपूर ने एक बार इस मुद्दे पर अपनी राय कुछ यूँ रखी थी- "उनका संगीत पूरी तरह से भारतीय था, जहाँ लाइव वाद्यों का भरपूर प्रयोग होता था. चूँकि उनके अधिकतर गीत मेलोडी प्रधान हैं उनका रीमिक्स किया जाना बेहद मुश्किल है और संगीत कंपनियाँ अपने फायदे के लिए केवल उन्हीं को "मार्केट" करती हैं जिनके गीतों में ये "खूबी" होती है." ये बात काफ़ी हद तक सही प्रतीत होती है. पर अगर हम बात करें हिट्स की तो किसी भी सच्चे हिन्दी फ़िल्म संगीत के प्रेमी को जो थोड़ा बहुत भी बीते सालों पर अपनी नज़र डालने की जेहमत करें वो बेझिझक एल पी के बारे में यह कह सकेगा - "बॉस" कौन था मालूम है जी...

चलिए इस बात को कुछ तथ्यों के आधार पर परखें -

हिन्दी फिल्मों कि स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर ने एल पी के संगीत निर्देशन में सबसे अधिक (करीब ७००) गीत गाये. कुछ ऐसा था ये गठबंधन कि जैसे एल पी जानते हो कि क्या जचेगा लता जी की आवाज़ में और लता दी भी समझती हों कि क्या है एल पी के किसी ख़ास गीत के गहरे छुपे भाव. तभी तो इस टीम ने सालों साल एक से बढ़कर एक गीत दिए, वो भी विविधता से भरे हुए, बानगी देखिये "अखियों को रहने दे" (बॉबी), "एक प्यार का नग्मा है" (शोर), "जाने क्यों लोग.."(महबूब की मेहंदी), "चलो सजना" (मेरे हमदम मेरे दोस्त), गुडिया (दोस्ती)....ये सूची बहुत बहुत लम्बी है. बहरहाल तर्क ये है कि लता दी की आवाज़ का हर रंग हर रूप देखा दुनिया ने, एल पी के निर्देशन में.

गायक/गायिका की मार्केट पोजीशन से अलग हट कर वो ये देखते थे कि उनके गीतों पर किसकी आवाज़ जचेगी. रफी साहब एक "सूखे" दौर से गुजर रहे थे जब एल पी ने उन्हें "अमर अकबर अन्थोनी" का सुपर हिट गीत "परदा है परदा" दिया. इसी फ़िल्म में उन्होंने हिन्दी फिल्मों के चार सबसे बड़े गायकों को एक साथ गवाया. "हम को तुमसे..." गीत में लता के साथ स्वर मिलाया रफी साहब, किशोर दा और मुकेश के स्वरों ने. मुकेश साहब भी अपने कैरियर के मुश्किल दौर से गुजर रहे थे जब एल पी ने उनसे "मिलन" के गीत गवाए, जिसके लिए उन्हें फ़िल्म के निर्माता -निर्देशक को बहुत समझाना-मनाना भी पड़ा था.

फ़िल्म फेयर पुरस्कारों की बात करें तो एल पी ने ये सम्मान ७ बार जीता. जिसमें ४ बार लगातार (१९७७ से १९८० तक) इस सम्मान के विजेता होने का रिकॉर्ड भी है. बहुत सी "बी" ग्रेड और गैर सितारों से सजी फिल्मों को भी उन्होंने अपने संगीत के दम पर उंचाईयां दी. यहाँ तक कि इंडस्ट्री के दो बड़े गायकों (मोहम्मद रफी और किशोर कुमार) पर बिना निर्भर रहे भी उन्होंने "रोटी कपड़ा और मकान","बॉबी", "एक दूजे के लिए", "हीरो", "उत्सव", और "सुर संगम" जैसी फिल्मों में ढेरों हिट गीत दिए. पर बड़े गायकों में भी उन्होंने एक सामंजस्य बनाये रखा गीतों की संख्या के मामले में रफी साहब ने लगभग ३७० गीत गाये तो किशोर दा ने करीब ३९९ गीतों को आवाज़ दी उनके संगीत निर्देशन में. आशा जी ने २५० गीत गाये तो मुकेश ने ८० गीतों में योगदान दिया. हेमंत कुमार, मन्ना डे, तलत महमूद, महेंद्र कपूर से लेकर सुरेश वाडकर, मनहर उधास, पंकज उधास, सुदेश भोंसले, सोनू निगम, कुमार सानू, कविता कृष्णमूर्ति, अलका याग्निक, साधना सरगम, अनुराधा पौडवाल, सुखविंदर, अलीशा, उदित नारायण, रूप कुमार राठोड.... कौन सा ऐसा गायक है जिसे उन्होंने मौका नही दिया और जिसने उनके संगीत निर्देशन में गाकर ख़ुद को खुशकिस्मत न महसूस किया हो.

एल पी की कमियाबी का सबसे बड़ा राज़ था, उत्कृष्ट आपसी समन्वय, काम का उचित बंटवारा, एक दूसरे के काम में दखल न देने की आदत, सरल और गुनगुनाने लायक धुन, अकॉस्टिक वाद्यों का अधिक इस्तेमाल, इलेक्ट्रॉनिक वाद्यों का भी सही मात्र में उपयोग, और इन सब से बढ़कर दोनों की भारतीय और पाश्चात्य संगीत की और वाद्यों की विशाल और विस्तृत जानकारी. लक्ष्मीकांत प्यारेलाल से लक्ष्मी प्यारे और लक्ष्मी प्यारे से एल पी, संगीत का एक विशाल अध्याय है ये सफर जिसकी शुरूआती कहानी भी कम दिलचस्प नही है, जिसका जिक्र हम करेंगें कल साथ ही आपको मिलवायेंगें प्यारेलाल जी से,फिलहाल सुनते हैं एल पी के कुछ और यादगार नग्में.





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