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Saturday, June 11, 2016

’बेबी डॉल’ की गायिका कनिका कपूर के संघर्ष की मार्मिक दास्तान


तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 13
 
कनिका कपूर 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी'। इसी शीर्षक के अन्तर्गत इस नई श्रृंखला में हम ज़िक्र करेंगे उन फ़नकारों का जिन्होंने ज़िन्दगी के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए जीवन में सफलता प्राप्त किये हैं, और हर किसी के लिए मिसाल बन गए हैं। आज का यह अंक केन्द्रित है इस ज़माने की जानी-मानी गायिका कनिका कपूर पर।


"बेबी डॉल मैं सोने दी" गाने वाली गायिका कनिका कपूर की रातों रात कामयाबी को देख कर आप यह ना समझ बैठें कि उन्हें इस मुक़ाम तक पहुँचने के लिए किसी भी तरह का संघर्ष नहीं करना पड़ा। आज कनिका कपूर की कहानी ख़ुद उन्हीं की ज़ुबानी।

"मेरा जन्म लखनऊ के एक खाते-पीते अच्छे खत्री परिवार में हुआ। छह साल की उम्र से शास्त्रीय संगीत सीखती हुई बड़ी हुई हूँ। 11 साल की उम्र में मैं आकाशवाणी पर शुद्ध शास्त्रीय संगीत गाया करती थी। 12 साल की उम्र में मैं भजन-सम्राट अनूप जलोटा जी के साथ शोज़ करने लगी। वो मेरे पिता के दोस्त हैं और मेरे लिए पिता समान हैं। लखनऊ के हमारे घर के गराज को मैंने अपने स्टुडिओ में तब्दिल कर दिया था जहाँ मैं गाती और रेकॉर्ड करती थी। 17 साल की उम्र में मैं मुंबई गई संगीतकार ललित सेन के साथ एक ऐल्बम करने और अपने आप को एक गायिका के रूप में स्थापित करने। मैंने संगीत में स्नातकोत्तर (Masters) किया है, जिस वजह से मैं शास्त्रीय संगीत सिखा-पढ़ा सकती हूँ। शादी करने का कोई विचार उस समय मेरे मन में नहीं था। पर मुझे राज नाम के एक पंजाबी युवक से प्यार हो गया और हमने शादी कर ली। मेरी माँ उस शादी से ख़ुश थी सिर्फ़ इसलिए नहीं कि राज पढ़ा-लिखा और अमीर परिवार से था, बल्कि इसलिए भी कि मेरा अब मुंबई फ़िल्म जगत से नाता टूट जाएगा। इस तरह से मैं एक गृहणी बन गई, राज से शादी कर लंदन जा कर बस गई। मात्र 18 साल की उम्र में मैं पापड-अचार डालने वाली बहू बन गई, फिर एक एक कर तीन बच्चों की माँ भी बनी। संगीत जैसे कहीं पीछे छूट गया। पर मैं अपने परिवार और घर-संसार को लेकर बहुत ख़ुश थी। राज ने मुझे दुनिया भर की सैर कराई।

पर होनी को कुछ और ही मंज़ूर था। राज मुझे धोखा देने लगा। एक अन्य शादीशुदा लड़की से उसका संबंध हुआ। हम दोनों में मनमुटाव और झगड़े शुरू हो गए। मुझे मेरा घर संसार उजड़ता हुआ साफ़ दिखाई दे रहा था। हमारी शादी की दसवीं सालगिरह पर मैंने उससे एक उपहार माँगा। मैंने कहा कि मुझे कोई ज़ेवर-गहने नहीं चाहिए, मुझे अपनी आवाज़ में एक ऐल्बम रेकॉर्ड करवाना है, यह मेरा एक सपना है। वो मान गया और हमने एक प्रोड्युसर की तलाश करनी शुरू कर दी। हमारी मुलाक़ात हुई बलजीत सिंह पदम उर्फ़ Dr. Zeus से जो 5000 पाउण्ड प्रति गीत के दर से आठ गीतों का ऐल्बम बनाने के लिए मान गया। राज ने उसे पैसा दे दिया और मैं बिर्मिंघम में हफ़्ते में एक दिन गाना रेकॉर्ड करने के उद्येश्य से जाने लगी। एक साल बीत गया पर अब तक कोई भी गाना वो लोग नहीं बना सके। इधर मेरा वैवाहिक जीवन बद से बदतर होता चला गया। दो तीन महीने मैं स्टुडिओ भी नहीं गई। फिर एक दिन मेरे एक दोस्त ने मेरा परिचय "जुगनी" नामक गीत से करवाया जो पाक़िस्तानी गायक आरिफ़ लोहर का गाया हुआ गाना था। हमने Dr. Zeus के ज़रिए इस गीत का एक सस्ता रीमिक्स बना कर इन्टरनेट पर फ़्री डाउनलोड के लिए डाल दिया। यह जनवरी 2012 की बात थी। विडिओ बेहद सफल रहा और इसे तीस लाख हिट्स मिले। जुलाई 2012 को मैं और राज अलग हो गए, और अक्टुबर में मुझे ’ब्रिटिश एशिअन अवार्ड’ मिला "जुगनी" के लिए। 

जैसे ही Dr. Zeus को पता चला कि मेरा पति अब मेरे साथ नहीं है, उसने हमारे पूरे 40,000 पाउण्ड (जो हमने उसे दिए थे ऐल्बम बनाने के लिए) खा गया और दोष डाल दिया अपने मैनेजर विवेक नायर पर कि वो पैसे लेकर भाग गया है। ऐल्बम का सपना सपना ही बन कर रह गया। इधर समाज में लोग मेरे बारे में गंदी-गंदी बातें करने लगे। मैं अपनी नज़रों में ही जैसे गिर चुकी थी और आत्महत्या का ख़याल आने लगा था। आस पड़ोस से लोगों ने मेरे बारे में अफ़वाहें उड़ानी शुरू कर दी कि मैंने अपने पति को छोड़ कर किसी और के साथ संबंध बना लिया, मैं वेश्या बन गई हूँ, वगेरह वगेरह। ये सब झूठ था। लोगों ने मेरे साथ बात करना बन्द कर दिया और मुझे सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा। इन सब हालातों ने मुझे आज एक मज़बूती प्रदान की है, इसमें कोई शक़ नहीं। ये सब कुछ होने के बाद 2013 के शुरु में मुझे मनमीत (मीत ब्रदर्स अनजान), जो मेरा राखी भाई है और जिसे मैं लखनऊ के छुटपन से जानती हूँ, का फ़ोन आया कि एकता कपूर ने मेरी आवाज़ "जुगनी" में सुनी है, उन्हें पसन्द आया है, और वो मुझे "बेबी डॉल" के एक ट्रायल के लिए मिलना चाहती हैं। और फ़ाइनली इस "बेबी डॉल" को गाकर मुझे मिला फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड। वही औरतें जो मुझे कॉल-गर्ल बुलाती थी पीछे से, अब मेरे साथ सेल्फ़ी खींचवा कर फ़ेसबूक में पोस्ट करती हैं। अब मैं ख़ुश हूँ, मेरी माँ मेरे साथ अब लंदन में रहती हैं, और हम दोनों मिल कर मेरे तीन बच्चों की परवरिश कर रहे हैं।" 


आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य लिखिए। हमारा यह स्तम्भ प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार को प्रकाशित होता है। यदि आपके पास भी इस प्रकार की किसी घटना की जानकारी हो तो हमें पर अपने पूरे परिचय के साथ cine.paheli@yahoo.com मेल कर दें। हम उसे आपके नाम के साथ प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे। आप अपने सुझाव भी ऊपर दिये गए ई-मेल पर भेज सकते हैं। आज बस इतना ही। अगले शनिवार को फिर आपसे भेंट होगी। तब तक के लिए नमस्कार। 

खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  



Sunday, December 29, 2013

कुछ दिग्गज स्वर-शिल्पी, जिन्होने कबीर को गाया

  
स्वरगोष्ठी – 148 में आज

रागों में भक्तिरस – 16

‘चदरिया झीनी रे बीनी...’


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की सोलहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-रसिकों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और कुछ प्रमुख भक्तिरस कवियों की रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस भक्ति रचना के फिल्म में किये गए प्रयोग भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की पिछली दो कड़ियों में हमने सोलहवीं शताब्दी की भक्त कवयित्री मीरा के दो पदों पर आपके साथ चर्चा की थी। आज की कड़ी में हम पन्द्रहवीं शताब्दी के सन्त कवि कबीर के व्यक्तित्व और उनके एक पद- ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ पर चर्चा करेंगे। कबीर के इस पद को भारतीय संगीत की हर शैली में गाया गया है। आज के अंक में पहले हम आपको यह पद राग चारुकेशी में निबद्ध, ध्रुवपद गायक गुण्डेचा बन्धुओं के स्वरों में सुनवाएँगे। इसके बाद यही पद सुविख्यात भजन गायक अनूप जलोटा राग देश में और अन्त में लोक संगीत के जाने-माने गायक प्रह्लाद सिंह टिपणिया प्रस्तुत करेंगे। आप भी नादब्रह्म के माध्यम से निर्गुणब्रह्म की उपासना के साक्षी बनें। 


न्द्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी के जिन भक्त कवियों ने भारतीय जनमानस को सर्वाधिक प्रभावित किया उनमें कबीर अग्रगण्य हैं। उनके जन्म और जन्मतिथि के विषय में विद्वानों के कई मत हैं। एक मान्यता के अनुसार कबीर का जन्म 1398 ई. की ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को काशी (अब वाराणसी) के लहरतारा नामक स्थान पर हुआ था। जुलाहा परिवार में उनका पालन-पोषण हुआ। आगे चलकर वे सन्त रामानन्द के शिष्य बने और अलख जगाने लगे। कबीर विविध क्षेत्रों की मिली-जुली सधुक्कड़ी भाषा में किसी भी सम्प्रदाय और रूढ़ियों की परवाह किये बिना खरी बात कहते थे। कबीर ने हिन्दू और मुस्लिम, दोनों धर्मावलम्बियों के समाज में व्याप्त रूढ़िवाद तथा कट्टरवाद का मुखर विरोध किया। कबीर की वाणी, उनके मुखर उपदेश, उनकी साखी, रमैनी, बीजक, बावन-अक्षरी, उलटबासी आदि रूप में उपलब्ध हैं। गुरुग्रन्थ साहब में उनके 200 पद और 250 साखियाँ संकलित हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में चर्चा के लिए हमने कबीर का ही एक पद चुना है। यह कबीर के अत्यन्त लोकप्रिय पदों में से एक है। पहले आप इस पद की पंक्तियों पर दृष्टिपात कीजिए।

झीनी झीनी बीनी चदरिया।

काहे कै ताना काहे कै भरनी,

कौन तार से बीनी चदरिया।

ईडा पिङ्गला ताना भरनी,

सुखमन तार से बीनी चदरिया।

आठ कँवल दल चरखा डोलै,

पाँच तत्त्व गुन तीनी चदरिया।

वाको सियत मास दस लागे,

ठोंक ठोंक कै बीनी चदरिया।

सो चादर सुर नर मुनि ओढी,

ओढि कै मैली कीनी चदरिया।

दास कबीर जतन से ओढी,

ज्यों कीं त्यों धर दीनी चदरिया॥

इस पद में कबीर ने मानव के शरीर धारण करने, जीवन को संस्कारित करने और शरीर की सार्थकता से सम्बन्धित गूढ तत्त्वों को एक चादर के प्रतीक रूप में समझाने का प्रयास किया है। कबीर के शब्दों को भारतीय संगीत की प्रायः सभी शैलियों में स्वर मिला है। शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम, लोक और फिल्म संगीत के साथ-साथ सूफी संगीत और कव्वाली में भी कबीर गाये जाते है। आज के अंक में इस पद के गायन के तीन उदाहरण हम प्रस्तुत करेंगे। सबसे पहले यह पद ध्रुवपद अंग में सुनिए, जिसे सुप्रसिद्ध ध्रुवपद गायक गुण्डेचा बन्धुओं ने प्रस्तुत किया है। भारतीय संगीत की प्राचीन और शास्त्र-सम्मत शैली है- ध्रुवपद। इस शैली की गायकी में एक युगल गायक हैं- गुण्डेचा बन्धु (रमाकान्त और उमाकान्त गुण्डेचा), जिन्हें देश-विदेश में ध्रुवपद गायकी में भरपूर यश प्राप्त हुआ है। इनकी संगीत-शिक्षा उस्ताद जिया फरीदउद्दीन डागर और विख्यात रुद्रवीणा वादक उस्ताद जिया मोहिउद्दीन डागर द्वारा हुई है। ध्रुवपद के ‘डागुरवाणी’ गायन में दीक्षित इन कलासाधकों ने कबीर का यह पद राग चारुकेशी के स्वरों में प्रस्तुत किया है। राग चारुकेशी के परिचय से पहले गुण्डेचा बन्धुओं से सुनिए कबीर का पद- ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया...’। मोहक पखावज वादन अखिलेश गुण्डेचा ने की है।


कबीर पद : ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया...’ : राग चारुकेशी : पं. रमाकान्त और उमाकान्त गुण्डेचा



कबीर का यह पद आप राग चारुकेशी के स्वरों में सुन रहे थे। यह राग मूलतः कर्नाटक संगीत पद्यति का है, जिसे उत्तर भारतीय संगीत पद्यति में भी मान्यता प्राप्त है। सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह-अवरोह में धैवत और निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते है। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। यह राग पूर्वांग में बिलावल और उत्तरांग में भैरवी का आभास कराता है। चारुकेशी के शुद्ध ऋषभ के स्थान पर यदि कोमल ऋषभ का प्रयोग किया जाए तो राग बसन्त मुखारी का और यदि कोमल निषाद के स्थान पर शुद्ध निषाद का प्रयोग किया जाए तो यह राग नट भैरव की अनुभूति कराता है। इस राग का गायन-वादन दिन के दूसरे प्रहर में अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है।

कबीर का यही पद अब हम चर्चित भजन गायक अनूप जलोटा के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं। अनूप जलोटा के पिता पुरुषोत्तमदास जलोटा स्वयं एक लोकप्रिय भजन गायक हैं। इनका परिवार पंजाब से लखनऊ आया था। परन्तु अनूप जलोटा का जन्म 29 जुलाई 1953 को नैनीताल में हुआ था। भजन गायन उन्हें अपने माता-पिता से विरासत में मिला, जिसे उन्होने लखनऊ के भातखण्डे संगीत महाविद्यालय (अब विश्वविद्यालय) में सँवारा। बचपन से ही क्रिकेट और टेबिल टेनिस खेल के शौकीन अनूप जलोटा सूर, कबीर, तुलसी, मीरा आदि भक्त कवियों-कवयित्रियों के पदों को रागों का स्पर्श देकर देश-विदेश के श्रोताओं के बीच लोकप्रिय हुए। आज हमारी चर्चा में कबीर का जो पद है, उसे अनूप जलोटा ने राग देश का स्पर्श दिया है। राग देश की रचना खमाज थाट के अन्तर्गत मानी गई है। इसमे कोमल और शुद्ध दोनों निषाद का प्रयोग होता है। आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। आरोह में गान्धार स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं। इस प्रकार यह औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। इस राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। इसके गायन-वादन का उपयुक्त समय रात्रि का दूसरा प्रहर है। अब सुनिए, राग देश के स्वरों का सहारा लेकर, अनूप जलोटा की आवाज़ में कबीर का यही पद।


कबीर पद : ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया...’ : राग देश : भजन गायक अनूप जलोटा



कबीर का यह पद संगीत की विविध शैलियों में अनेक शीर्षस्थ कलासाधकों ने गाया है। ध्रुवपद और भजन गायकी में यह पद सुनवाने का बाद अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, यही पद मालवा की लोक संगीत शैली में। इसे मालवा अंचल की लोक संगीत शैली में प्रस्तुत कर रहे है, पद्मश्री सम्मान से विभूषित प्रह्लाद सिंह टिपणिया 7 सितम्बर, 1954 को उज्जैन (मध्यप्रदेश) के तरना कस्बे में जन्में श्री टिपणिया पेशे से शिक्षक हैं और मालवा के लोक संगीत में उनकी गहरी अभिरुचि थी। पारम्परिक लोक कलाकारों के बीच रह कर उन्होने इस अनूठी शैली का गहन अध्ययन किया और कबीर को ही गाने लगे। इस प्रकार की गायकी में स्वर और लय को साधने का प्रमुख वाद्य तम्बूरा होता है, जिसमें पाँच तार होते हैं। इसके अलावा करताल, ढोलक और मँजीरा भी सहायक वाद्य होते हैं। देश में आयोजित होने वाले प्रमुख संगीत समारोहों के सहभागी श्री टिपणिया अमेरिका और ब्रिटेन में भी कबीर को प्रस्तुत कर चुके हैं। कबीर के पद ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया...’ का मालवा की लोक संगीत शैली में गायन प्रस्तुत कर रहे हैं, प्रह्लाद सिंह टिपणिया और उनके साथी। आप कबीर के इस पद की रसानुभूति कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


कबीर पद : ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया...’ : लोक संगीत : प्रह्लाद सिंह टिपणिया और साथी




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 148वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक विख्यात गायक की आवाज़ में कबीर की भक्ति रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यह पाँचवाँ और इस वर्ष का अन्तिम सेगमेंट है। 150वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – इस भक्ति रचना के अंश को सुन कर गायक को पहचानिए और हमे उनका नाम लिख भेजिए।

2 – इस रचना की प्रस्तुति में जिस ताल का प्रयोग हुआ है उसके मात्राओं की संख्या बताइए।

आप अपने उत्तर केवल radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 150वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 146वीं कड़ी में हमने आपको भक्त कवयित्री मीरा के एक पद का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका वाणी जयराम। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी और चंडीगढ़ से हरकीरत सिंह ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का


   
मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ के अन्तर्गत आज के अंक में हमने आपको सन्त कबीर के एक पद का गायन ध्रुवपद शैली, भजन शैली और लोक संगीत शैली में प्रस्तुत किया। अगले अंक में इसी पद का गायन कुछ और शैलियों और कलासाधकों के स्वरों में हम प्रस्तुत करेंगे। अगले अंक में इस लघु श्रृंखला की सत्रहवीं कड़ी के साथ रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों की प्रतीक्षा करेंगे।



प्रस्तुति :कृष्णमोहन मिश्र 

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