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Thursday, April 26, 2018

चित्रकथा - 65: भीमसेन को श्रद्धांजलि - 40 वर्ष बाद भी प्रासंगिक है फ़िल्म ’घरौंदा’

अंक - 6५

फ़िल्मकार भीमसेन को श्रद्धांजलि

40 वर्ष बाद भी प्रासंगिक है फ़िल्म ’घरौंदा’ 






17 अप्रैल 2018 को जानेमाने फ़िल्मकार भीमसेन का 81 वर्ष की आयु में निधन हो गया। भारत में ऐनिमेशन के भीष्म-पितामह का दर्जा रखने वाले भीमसेन 70 के दशक में समानान्तर सिनेमा का आंदोलन छेड़ने वाले फ़िल्मकारों में भी एक सम्माननीय नाम हैं। मुल्तान (वर्तमान पाकिस्तान में) में वर्ष 1936 में जन्में भीमसेन खुराना देश विभाजन के बाद लखनऊ स्थानान्तरित हो गए थे। कलाकारों के परिवार से ताल्लुख़ रखने की वजह से संगीत और कला उन्हें विरासत में ही मिली। ललित कला और शास्त्रीय संगीत की शिक्षा प्राप्त करने की वजह से जीवन भर वो एक अच्छी जगह पर बने रहे। 1961 में भीमसेन ने बम्बई का रुख़ किया और Films Division में बैकग्राउंड पेन्टर की नौकरी कर ली। वहीं पर उन्होंने ऐनिमेशन कला की बारीकियाँ सीख ली। 1971 में भीमसेन स्वतंत्र रूप से फ़िल्म-निर्माण के कार्य में उतरे और अपनी पहली ऐनिमेटेड लघु फ़िल्म ’The Climb' बनाई जिसके लिए उन्हें Chicago Film Festival में "Silver Hugo award" से सम्मानित किया गया। इस फ़िल्म की कामयाबी से प्रेरित होकर उन्होंने ’Climb Films' के नाम से अपनी बैनर बनाई और फिर पीछे मुड़ कर कभी नहीं देखा। 1974 की उनकी ’एक अनेक एकता’ ऐनिमेशन फ़िल्म को आज भी भारत के लोकप्रियतम ऐनिमेटेड फ़िल्मों में गिना जाता है। अनगिनत लघु फ़िल्म, वृत्तचित्र, टीवी सीरीज़, और ऐनिमेटेड फ़िल्मों के साथ-साथ भीमसेन ने दो बॉलीवूड फ़िल्मों का भी निर्माण किया - 1977 में ’घरौंदा’ और 1979 में ’दूरियाँ’। 16 राष्ट्रपति प्रदत्त राष्ट्रीय पुरस्कारों व कई अन्तराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित भीमसेन भारतीय फ़िल्म-निर्माण के एक लौहस्तंभ रहे हैं। आइए आज ’चित्रकथा’ में बातें करें फ़िल्म ’घरौंदा’ की। 40 वर्ष पूर्व निर्मित यह फ़िल्म आज के दौर में भी पूरी तरह से प्रासंगिक है। आज के ’चित्रकथा’ का यह अंक समर्पित है स्वर्गीय भीमसेन की पुण्य स्मृति को!



ज जब भी हम ऊंचे-ऊंचे निर्माणाधीन हाउसिंग् कॉमप्लेक्स के सामने से गुज़रते हैं, या जब भी अपना नया फ़्लैट ख़रीदने के बारे में सोचते हैं, तो यकायक हमें फ़िल्म ’घरौंदा’ याद आ जाती है। जहाँ अपने जीवन की सारी जमा पूंजी लगा देनी हो, वहाँ सावधानी बरतना बहुत ज़रूरी होता है। शायद इसीलिए फ़िल्म ’घरौंदा’ का वह दृश्य आँखों के सामने आ जाता है जिसमें बिल्डर फ़्लैट ख़रीदारों के सारे पैसे लेकर फ़रार हो जाता है और जिस वजह से कई ख़रीदार आत्महत्या भी कर लेते हैं। इस दृश्य का ख़याल आते ही जैसे पूरे शरीर में एक कंपन सी दौड़ जाती है। 40 साल पहले, 1977 में यह फ़िल्म बनी थी, उस समय यह फ़िल्म जितनी प्रासंगिक थी, शायद आजे के समय में इसकी प्रासंगिकता और भी ज़्यादा बढ़ गई है। आज इस फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक भीमसेन हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनके जाने के बाद उनकी यह फ़िल्म बार बार याद आ रही है और आज की शहरी ज़िन्दगी की सच्चाई से हमारा एक बार फिर से परिचय करवा रही है।

’घरौंदा’ कहानी है मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुख़ रखने वाले एक लड़के और एक लड़की की। सुदीप (अमोल पालेकर) और छाया (ज़रीना वहाब) मुंबई में एक ही दफ़्तर में नौकरी करते हैं। छाया अपनी एक रूम के फ़्लैट में अपने छोटे भाई और बड़े भाई व भाभी के साथ रहती हैं। सुदीप तीन और लोगों के साथ एक भाड़े के कमरे में रहते हैं। सुदीप और छाया एक दूसरे से प्यार करते हैं और जल्दी ही शादी करके अपनी अलग नई दुनिया बसाना चाहते हैं। वो अपने नए घर का सपना देखने लगते हैं। अपनी अपनी तंख्वा से पैसे काट काट कर पैसे जमाते हैं और एक दिन दोनों मिल कर एक निर्माणाधीन बिल्डिंग् में अपने बजट के अनुसार एक फ़्लैट ख़रीद लेते हैं। जब जब वो अपने निर्माणाधीन फ़्लैट को देखने जाते हैं तो उसमें उन्हें अपना सुन्दर छोटा सा घर-संसार नज़र आने लगता है। लेकिन क़िस्मत को कुछ और ही मंज़ूर होता है। सारे ख़रीदारों के पैसे लेकर बिल्डर (या जाली बिल्डर) फ़रार हो जाता है। इस हादसे से सदमे में सुदीप के एक रूम पार्टनर (जिसने वहाँ फ़्लैट ले रखी थी) आत्महत्या कर लेता है। ना वो बिल्डिंग् बन पाती है और ना ही किसी को घर मिल पाता है। सुदीप और छाया हताश हो जाते हैं, उन्हें समझ नहीं आता कि अब क्या करें। इतने सारे पैसे डूब जाने के बाद फिर से शुरू से शुरू करना उनके लिए संभव नहीं। शादी के सपने को सपना ही रख कर वो फिर से अपनी अपनी नौकरी में लग जाते हैं। उन्हीं दिनों उनके दफ़्तर के मालिक मिस्टर मोदी (श्रीराम लागू) छाया की तरफ़ आकर्षित होते हैं और उन्हें विवाह का प्रस्ताव देते हैं। मोदी एक अमीर और अधेड़ उम्र के विधुर हैं, जो एक दिल के मरीज़ भी हैं। छाया को शादी का यह प्रस्ताव बिल्कुल अच्छा नहीं लगा, लेकिन सुदीप को इसमें एक बहुत बड़ी संभावना नज़र आई। सुदीप छाया को समझाते हैं कि मोदी दिल के गंभीर मरीज़ होने की वजह से उनकी आयु अब कुछ ही महीने की है। उनकी मृत्यु के बाद सुदीप और छाया शादी कर लेंगे और मोदी की सारी सम्पत्ति के मालिक भी बन जाएंगे। अपनी अनिच्छा के बावजूद छाया सुदीप की बात मान लेती हैं इस वजह से भी कि इससे उसे अपने भाई को स्थापित करने में मदद मिलेगी। छाया मोदी से विवाह कर लेती हैं। जल्द ही छाया एक ज़िम्मेदार पत्नी के रूप में उभर आती हैं। उधर सुदीप भी लगातार छाया से मिलते रहते हैं और मोदी के स्वास्थ्य की भी ख़बर रखते हैं। उसे धक्का पहुँचता है जब मोदी को वो स्वस्थ होते हुए देखता है। छाया से शादी के बाद मोदी ख़ुश रहने लगते हैं और इस वजह से उनकी शारीरिक बीमारी भी ठीक होने लगती है। लेकिन एक दिन जब छाया और सुदीप में बहस हो रही होती है, मोदी उनकी बात सुन लेते हैं और सदमे से उन्हें दिल का दौरा पड़ जाता है। इससे सुदीप ख़ुश हो जाता है लेकिन छाया बड़े प्यार और अपनी पत्नी की ज़िम्मेदारी निभाते हुए मोदी को स्वस्थ कर देती हैं। छाया सुदीप को समझा देती है कि वो मोदी को धोखा नहीं दे सकती। सुदीप अपनी अलग राह पर चल निकलता है। बस इतनी सी है ’घरौंदा’ की कहानी।

1977 के गृष्मकाल में कई बड़े बैनरों की फ़िल्में प्रदर्शित हुई थीं। ’अमर अकबर ऐन्थनी’, ’परव्रिश’, ’हम किसी से कम नहीं’, ’चाचा भतीजा’, ’आदमी सड़क का’, ’दुल्हन वही जो पिया मन भाये’ और ’दूसरा आदमी’ जैसी चर्चित फ़िल्में धूम मचा रही थीं। समानान्तर सिनेमा में भी उस साल सत्यजीत रे की ’शतरंज के खिलाड़ी’ और श्याम बेनेगल की ’भूमिका’ जैसी फ़िल्में आ चुकी थीं। इन सब फ़िल्मों के बीच बड़ी ख़ामोशी से आई भीमसेन की फ़िल्म ’घरौंदा’। अख़्बारों और फ़िल्मी पत्र-पत्रिकाओं ने भी ज़्यादा ग़ौर नहीं किया इस फ़िल्म पर। लेकिन फ़िल्म के प्रदर्शित होते ही दर्शकों की संख्या सिनेमाघरों में बढ़ने लगी और इस फ़िल्म 50 दिन (और फिर 100 दिन) पूरे किए। समीक्षकों ने इस फ़िल्म को "a realistic romance in urban India" कह कर संबोधित किया, या यूं कहें कि भीमसेन को सम्मानित किया। भीमसेन ने यह दिखा दिया कि बिना बड़े सितारों के, बिना बड़े निर्देशक के, और बिना बड़े संगीतकार के भी किस तरह से किसी फ़िल्म को आम दर्शकों में ख़ास बनाया जा सकता है! शहरीकरण और शहरी जीवन की कई समस्याओं को इस फ़िल्म में जगह दी गई जैसे कि बेरोज़गारी, अपने नए घर का सपना, पैसे कमाने के लिए नैतिक मूल्यों को भूल जाना, और सबकुछ गंवा कर आत्महत्या कर लेना। फ़िल्म के गीतों की बात करें तो इसमें बस तीन ही गाने थे लेकिन तीनों असरदार। सुदीप और छाया के घर ढूंढ़ने और अपनी नई दुनिया के सपने देखने को गुलज़ार ने बड़ी ख़ूबसूरती से "दो दीवाने शहर में, रात में और दोपहर में..." गीत के ज़रिए उभारा है। "आब-ओ-दाना" (पानी और रोटी/खाद्य) के फ़िल्मी गीत में इस पहले इस्तमाल से गीत में एक चमक आई है। इसी गीत का निराश संस्करण "एक अकेला इस शहर में..." सुदीप के अकेलेपन और हताशा को ज़ाहिर करता है। इस गीत में गुलज़ार लिखते हैं - "जीने की वजह तो कोई नहीं, मरने का बहाना ढूंढ़ता है..." जो कुछ हद तक शहरयार के लिखे "सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यों है, इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यों है" से मिलता-जुलता है जो अगले ही साल (1978 में) फ़िल्म ’गमन’ के लिए लिखा गया था। तीसरा गीत नक्श ल्यालपुरी का लिखा हुआ है - "तुम्हें हो ना हो मुझको तो इतना यकीं है...", जो सुदीप और छाया की दोस्ती से लेकर प्यार तक की दूरी को मिटाने का काम करता है। जयदेव के संगीत में भूपेन्द्र और रुना लैला के गाए ये तीन गीत आज सदाबहार बन चुके हैं। वैसे ’घरौंदा’ के गीत फ़िल्म की कथानक के विपरीत भी सुनाई देते हैं। फ़िल्म के बाहर अगर इन गीतों को सुना जाए तो फ़िल्म के बारे में एक अलग ही धारणा बनती है। भीमसेन ने इस गीतों के लिए फ़िल्म में एक आसान सा रवैया रखा जिसमें कोई नाटकीयता नहीं, कोई आंत संबंधी अर्थ नहीं। 

’घरौंदा’ फ़िल्म की पूरी टीम पर ग़ौर करें तो यह ’छोटी सी बात’ और ’रजनीगंधा’ क़िस्म की फ़िल्म प्रतीत होती है। जिस फ़िल्म में अमोल पालेकर और ज़रीना वहाब हों, उस फ़िल्म से दर्शकों को एक "feel-good entertainment" की उम्मीद रहती है, जबकि ’घरौंदा’ की कहानी इसके विपरीत है। हाँ, फ़िल्म का पार्श्व ज़रूर ’छोटी सी बात’ या ’रजनीगंधा’ जैसा शहरी है, लेकिन कहानी बिल्कुल अलग। यह फ़िल्म वास्तविकता से हमारा परिचय कराता है, और यह बताता है कि यह दुनिया सिर्फ़ अच्छे लोगों से ही नहीं बना है, बल्कि अच्छे लोगों के भी  बुरे ख़यालात हो सकते हैं। शहर के लोग किस तरह से अपने आप को असुरक्षित महसूस करते हुए भी महत्वाकांक्षी हो सकते हैं, या फिर भयभीत होते हुए भी क्रूर हो सकते हैं, यही सीख इस फ़िल्म से हमें मिलती है। दूसरों की ज़िन्दगी की परवाह किए बिना सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने बारे में सोचना, शायद यही आज शहरों की रवायत हो गई है। मुंबई जैसे एक बड़े आधुनिक शहर में क्रूर मानव इच्छाओं और जल्दी से कुछ बड़ा करने की उम्मीद करने वालों की एक अंधकार व निराशावादी कहानी है ’घरौंदा’ जो हमें श्याम बेनेगल या गोविन्द निहलानी जैसे फ़िल्मकारों की फ़िल्मों की याद दिला जाती है।

’घरौंदा’ फ़िल्म में बहुत सी चीज़ें अपरम्परागत हैं। फ़िल्म के नायक सुदीप का चरित्र भी मिला-जुला है। यह सच है कि वो छाया से सचमुच प्यार करता है, लेकिन उसका चरित्र धूध का धुला हुआ नहीं है। वो जिस कमरे में रहता है, उसका एक रूम-मेट आय दिन उस कमरे में वेश्या ले आता है। सुदीप भी जब पहली बार छाया को उस कमरे में ले आया था, तब उसके इरादे भी कुछ ख़ास नेक नहीं थे। उधर अधेड़ उम्र के मोदी का छाया के प्रति नज़रिया भी आपत्तिजनक माना जा सकता है इसलिए कि छाया उनकी बेटी की उम्र की लड़की है। ऐसा आमतौर पर नहीं देखा जाता हमारे समाज में। छाया का मोदी से विवाह के बाद सुदीप का पूरी दुनिया से मतभेद और अपने आप की उपेक्षा भी किसी साधारण हिन्दी फ़िल्मी नायक की छवि के विपरीत है। देवदास का शहरी संस्करण बने सुदीप और वेश्याओं के पास भी उसके जाने का उल्लेख फ़िल्म में मिलता है। उधर छाया का अपने पिता के उम्र के पति से इतनी जल्दी मित्रता और बिना किसी शिकायत के एक आदर्श पत्नी बन जाना भी फ़िल्म की कहानी की वास्तविकता पर प्रश्नचिन्ह लगाती है। इस तरह से फ़िल्म के तीनों मुख्य चरित्र संदिग्ध हैं और शायद यही वजह है जो इस फ़िल्म को अपने समय की एक अनोखी फ़िल्म बनाती है। सुदीप की भूमिका में अमोल पालेकर ने इस तरह का नकारात्मक चरित्र पहली बार निभा रहे थे, इसलिए दर्शकों को हज़म करने में थोड़ी दिक्कत हुई। फ़िल्म समालोचकों ने यह भी कहा कि ज़रीना वहाब की जगह शबाना आज़्मी छाया का किरदार बेहतर निभा सकती थीं। इसी तरह से लोगों का कहना था कि श्रीराम लागू की जगह संजीव कुमार या अमजद ख़ान मोदी के चरित्र को बेहतर साकार कर पाते। ख़ैर, ये होता तो ऐसा होता, वो होता तो वैसा होता, ये सब अब कोई मायने नहीं रखती। बस सच्चाई यही है कि भीमसेन ने ’घरौंदा’ के रूप में फ़िल्म जगत को एक अनमोल भेंट दी है जो आनेवाले समय में भी समानान्तर या बेहतर शब्दों में "middle of the road" सिनेमा के शौकीनों को चमत्कृत करती रहेगी और फ़िल्मकारों को अच्छी वास्तविक जीवन की फ़िल्में बनाने के लिए प्रेरित करती रहेगी। ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ करती है स्वर्गीय भीमसेन को सलाम!

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, April 23, 2017

श्रद्धांजलि : SWARGOSHTHI – 314 : A TRIBUTE



स्वरगोष्ठी – 314 में आज

विशेष अंक : किशोरी ताई को भावभीनी श्रद्धांजलि

फिल्म “भिन्न षडज” के माध्यम से विदुषी किशोरी अमोनकर की स्मृतियों को सादर नमन



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ के विशेष अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, आज के इस अंक में हम भारतीय संगीत जगत की सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। विगत 3 अप्रैल 2017 को शास्त्रीय संगीत की सुप्रसिद्ध गायिका पद्मविभूषण किशोरी अमोनकर का 84 वर्ष की आयु में देहावसान हो जाने से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत जगत को गहरी क्षति पहुँची है। शास्त्रीय संगीत जगत में किशोरी जी का जो स्थान रिक्त हुआ है, उसकी पूर्ति हो पाना सम्भव नहीं है। संयोग से निधन के अगले सप्ताह सोमवार 10 अप्रैल को किशोरी जी का जन्मदिवस था। आज के इस विशेष अंक में हम किशोरी अमोनकर जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर निर्मित एक फिल्म का प्रदर्शन आपके लिए कर रहे हैं। सुप्रसिद्ध फ़िल्मकार अमोल पालेकर और संध्या गोखले द्वारा निर्देशित इस फिल्म को हम ‘यू-ट्यूब’ से साभार प्रस्तुत कर रहे हैं।

'Bhinna Shadja', a film on the unparalleled contributions of Ganasaraswati Padmavibhushan Kishori Amonkar (fondly known as Tai) to Indian classical music, is also an exploration of larger debates on the nature of art itself. Often criticised for experimenting with classical traditions of the Japiur-Atrauli Gharana, Tai nonetheless strove in her passionate resolve to emphasise evocation of moods over an orthodox rendition of ragas. This vilification by conservatives however did not deter her audiences and other contemporary artists from appreciating her transcendental aesthetics. The film explores some of these questions as not just pertaining to her own life but as artistic dilemmas that resonate in many other contexts. Tai's apprehension that with age her music might begin to elude her is also one of the most fundamental predicaments that artists face.

Release year – 2011

Running time - 1:09:34

Language – Marathi

Directors - Amol Palekar and Sandhya Gokhale


Category - Documentary

License - Standard YouTube License


फिल्म – भिन्न षडज : विदुषी किशोरी अमोनकर के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केन्द्रित वृत्तचित्र




अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के इस विशेष अंक में आज हमने विदुषी किशोरी अमोनकर की स्मृतियों को श्रद्धांजलि अर्पित की है। आगामी अंक में हम एक नई श्रृंखला आरम्भ करेंगे। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम फिल्म जगत के महान संगीतकार रोशन के राग आधारित गीतो पर चर्चा करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 







Saturday, March 25, 2017

चित्रकथा - 11: 1997 की तीन फ़िल्मों में तीसरे लिंग का सकारात्मक चित्रण


अंक - 11

1997 की तीन फ़िल्मों में तीसरे लिंग का सकारात्मक चित्रण

अपने देस में हम हैं परदेसी कोई ना पहचाने...



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 

हिन्दी फ़िल्मों में तीसरे लिंग का चित्रण दशकों से होता आया है। अफ़सोस की बात है कि ऐसे चरित्रों को सस्ती कॉमेडी के लिए प्रयोग में लाये जाते हैं या फिर घृणा की नज़रों से देखा जाता है। बार-बार वही घिसा-पिटा रूढ़ीबद्ध रूप दिखाया गया है। फ़िल्मी गीतों में भी उनका मज़ाक उड़ाया गया है। कई बार तो सामान्य चरित्र किन्नर/हिजड़े जैसा मेक-अप लेकर दर्शकों को हँसाने की कोशिशें करते रहे हैं। समय के साथ-साथ इस तरह का बेहुदा हास्य कम हुआ है और तीसरे लिंग का मज़ाक उड़ाया जाना फ़िल्मों में कम हुआ है। पिछले कुछ दशकों में कुछ संवेदनशील फ़िल्मकारों ने तीसरे लिंग का सकारात्मक चित्रण अपनी फ़िल्मों में किया है, जिनकी वजह से आज हमारे समाज में तीसरे लिंग की स्वीकृति को काफ़ी हद तक बढ़ावा मिला है। आइए आज ’चित्रकथा’ में चर्चा करें 1997 में प्रदर्शित तीन फ़िल्मों की जिनमें हमें मिलता है तीसरे लिंग का सकारात्मक चित्रण।




स दुनिया में यह रवायत है कि जो संख्यलघु में आता है, उसे दुनिया अलग-थलग कर देती है। तीसरे
लिंग के व्यक्तियों के साथ भी यही हुआ। सामाजिक स्वीकृति न मिलने की वजह से ये लोग अपनी अलग की समुदाय बना ली। हमारी फ़िल्मों की कहानियों में अक्सर तीसरे लिंग को पैसा वसूली करते हुए, शादी-व्याह और बच्चे के जनम पर नाचते-गाते हुए या फिर किसी हास्यास्पद तरीके से दिखाया जाता है। लेकिन कुछ संवेदनशील फ़िल्मकार ऐसे हुए हैं जिन्होंने इस विषय को गंभीरता और संवेदनशीलता से अपनी फ़िल्मों में साकार किया। आज बातें 1997 की तीन ऐसी ही फ़िल्मों की। सबसे पहले बातें फ़िल्म ’तमन्ना’ और निर्देशक महेश भट्ट की। इस फ़िल्म में हिजड़ा-संस्कृति के विभिन्न पहलुओं का चित्रण किया गया है। यह फ़िल्म सहानुभूति और सकारात्मक नज़रिए से देखती है तीसरे लिंग को, और इस फ़िल्म ने ऐसी सीमाएँ पार की जो इससे पहले भारतीय सिनेमा ने नहीं की थी। किसी भी फ़िल्मकार ने इससे पहले इस तरह के विषय पर फ़िल्म बनाने की नहीं सोची थी। ’तमन्ना’ एक सत्य घटना और सत्य कहानी पर आधारित फ़िल्म है। कहानी परेश रावल अभिनीत हिजड़ा चरित्र पर केन्द्रित है और इसमें इस समुदाय द्वारा झेले जाने वाले तमाम समस्याओं पर रोशनी डाली गई है। 1975 के पार्श्व की यह कहानी तमन्ना नामक एक लड़की की कहानी है जिसे टिकू नामक हिजड़ा पाल पोस कर बड़ा करता है। टिकू औरतों जैसी पोशाक नहीं पहनता और ना ही हिजड़ा समुदाय में रहता है, बल्कि वो पुरुषों से भरे समाज में ही रहता है। इस तरह से महेश भट्ट ने यह साबित करने की कोशिश की कि तीसरे लिंग के लोग भी ’साधारण’ लोगों के बीच रह सकते हैं। टिकू अपने सबसे अच्छे दोस्त सलीम के साथ रहता है जिसे वो भाई कह कर बुलाता है। टिकू और सलीम के बीच किसी तरह का यौन संबंध ना दिखा कर भट्ट साहब ने यह सिद्ध किया कि आम तौर पर हिजड़ों द्वारा किसी पुरुष को अपने पास रखने के पीछे यौन संबंध होने का कारण समझने का कोई वजूद नहीं है। टिकू एक भावुक इंसान है और कई बार उसका नारीत्व उभर कर सामने आता है। उदाहरण के तौर पर टिकू तमन्ना को एक पिता की तरह नहीं बल्कि माँ की तरह पालता है। एक दृश्य में टिकू नन्ही तमन्ना के लिए लड़कियों की तरह नृत्य करता दिखाई देता है। वैसे तमन्ना टिकू को अब्बु कह कर ही बुलाती है। टिकू एक मेक-अप आर्टिस्ट है और वो अपने समुदाय के दूसरे लोगों की तरह शादी-ब्याह या बच्चे के जनम पर पैसे माँगने नहीं जाता और ना ही वेश्यावृत्ति करता है। बस फ़िल्म के अन्त में टिकू को आर्थिक मजबूरी के कारण हिजड़े के पारम्परिक रूप में सज कर नृत्य करना पड़ता है।

फ़िल्म का एक महत्वपूर्ण दृश्य है जब तमन्ना को पता चलता है कि टिकू एक हिजड़ा है। हिजड़ों के प्रति जो आम सामाजिक मान्यताएँ हैं, वो सब तमन्ना के मन में भी घर की हुई है। उसे यह पता है कि अगर हिजड़ा किसी को आशिर्वाद दे सकता है तो वो अभिषाप भी दे सकता है। यह समाज मानता है कि हिजड़ों के अभिषाप से व्यक्ति बांझ या नामर्द बन सकता है। ऐसी मानसिकता की वजह से जब तमन्ना को टिकू के बारे में पता चला तो उसके मन में टिकू के लिए घृणा उत्पन्न हुई और वो भूल गई कि किस तरह से लाड़-प्यार से टिकू ने उसे पाल-पोस कर बड़ा किया है। हिजड़े की जो छवि तमन्ना के दिल में बसी हुई है, उससे वो बाहर नहीं निकल सकी। महेश भट्ट ने इस फ़िल्म में हिजड़ों के प्रचलित रूप को दर्शाने के लिए हिजड़ों के एक दल को रंगीन साड़ियों और ज़ेवरों में तालियाँ बजाते, नृत्य करते दिखाया है, और साथ में यह भी दिखाया है कि टिकू इन जैसा नहीं है। फ़िल्म में यह भी दिखाया गया है कि बाकी हिजड़े किस तरह से टिकू का मज़ाक उड़ाते हैं यह कहते हुए कि आम समाज में रहने से वो सामान्य इंसान नहीं बन जाएगा और ना ही वो अपने लैंगिक भिन्नता वाले वजूद को भूला या मिटा पाएगा। महेश भट्ट ने हिजड़ों के प्रति रूढ़ीवादी नज़रिए को तोड़ने का साहस किया। भट्ट साहब ने समाज को दिखाया कि एक हिजड़ा एक अच्छा अभिभावक और एक अच्छा मित्र भी हो सकता है, और वो एक बच्चे को पाल पोस कर बड़ा कर सकता है। भले वो ख़ुद गर्भ धारण नहीं कर सकते पर प्यार लुटाने की क्षमता रखते हैं।

1997 में ही अमोल पालेकर लेकर आए ’दाएरा’ जो एक सुन्दर कहानी पर बनी फ़िल्म थी जिसमें प्रेम,
वासना और लिंग को बड़े सुन्दर तरीके से उभारा गया। पालेकर साहब के साहसिक और समझ की दाद देनी पड़ेगी कि तीसरे लिंग का इतना सुन्दर चित्रण इस फ़िल्म में उन्होंने किया। स्वर्गीय निर्मल पाण्डेय ने इस चरित्र को इतनी सरलता से उभारा कि फ़िल्म के अन्त तक आपके मन में उस चरित्र के लिए भावनाएँ जाग उठेंगी। ’दाएरा’ हमें एक भावुक यात्रा पर ले जाती है क्योंकि इस फ़िल्म के तमाम चरित्र भी एक जटिल यात्रा के सहयात्री होते हैं जो पारम्परिक लैंगिकता, सामाजिक रवैये और प्रचलित फ़िल्मी परम्परा को धराशायी कर देते हैं। इस फ़िल्म के लिए अमोल पालेकर को कई पुरस्कार मिले हैं। फ़िल्म की कहानी एक अभिनेता (निर्मल पाण्डे) जो एक तीसरे लिंग का व्यक्ति है। एक रात वो एक लड़की (सोनाली कुलकर्णी) को बचाता है जिसका शादी से पहले अपहरण और बलात्कार हो जाता है। आगे की कहानी इन दोनों के संबंध के इर्द-गिर्द घूमती है। मानव लैंगिकता पर इस फ़िल्म की पहुँच सशक्त है और नारीशक्ति को सकारात्मक दृष्टि से दिखाया गया है। और तो और यह फ़िल्म उन अल्पसंख्यक लोगों के अधिकारों का भी मंथन करती है जो समाज के मुख्यधारा का अंग नहीं हैं, जैसे कि समलैंगिक स्त्री-पुरुष। यह फ़िल्म ऐसे लोगों के मन की गहराई तक जाता है जिन्हें इस समाज से सिर्फ़ तिरस्कार ही मिलते हैं बिना कोई गुनाह किए।

1997 में तो तीसरे लिंग पर आधारित सकारात्मक फ़िल्मों की कतार ही लग गई थी। ’तमन्ना’ और
’दाएरा’ के बाद इसी वर्ष प्रदर्शित हुई ’दर्मियाँ’। कल्पना लाजमी एक ऐसी फ़िल्मकार हैं जिन्होंने समय समय पर ऐसे ऐसे मुद्दों पर फ़िल्में बनाई हैं जिन मुद्दों पर दूसरे फ़िल्मकार फ़िल्म बनाने से पहले सौ बार सोचते होंगे। ’दर्मियाँ’ में उन्होंने एक पैदाइशी हिजड़ा लड़के की कहानी को केन्द्र में रख कर एक ऐसी फ़िल्म बनाई है जो सीधे दिल को छू जाती है। ’दर्मियाँ’ कहानी है सिंगिंग् स्टार ज़ीनत बेगम (किरोन खेर) की। यह 40 के दशक का पार्श्व है। इन्डस्ट्री की सबसे महँगी स्टार होने के अलावा वो एक नाजायज़ रिश्ते से उत्पन्न एक बच्चे की माँ भी है। इम्मी नाम का वह बच्चा जन्म से हिजड़ा है। शर्म से कहिए या स्टार होने की वजह से कहिए, ज़ीनत समाज के सामने यह स्वीकार नहीं करती कि इम्मी उसका बेटा है, वो उसे अपना भाई कह कर दुनिया के सामने पेश करती है। नन्हे इम्मी को इस बात का पता है कि ज़ीनत उसकी बड़ी बहन नहीं बल्कि माँ है पर वो किसी से कुछ नहीं कहता। वो अपनी नानी को ही माँ कहता है। ज़ीनत और इम्मी एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं। तभी तो जब उस इलाके की हिजड़ा समुदाय की नेत्री चम्पा (सायाजी शिन्डे) इम्मी को उसे सौंप देने के लिए ज़ीनत और उसकी माँ पर ज़ोर डालती है तो ज़ीनत उसे धक्के मार कर घर से बाहर निकाल देती है। इम्मी भी उसके साथ नहीं जाना चाहता। जब चम्पा कहती है कि एक हिजड़ा केवल अपने समुदाय में ही इज़्ज़त से जी सकता है और ज़ीनत के साथ रहने पर इम्मी कहीं का नहीं रहेगा, तब ज़ीनत यह स्वीकारने से भी मना कर देती है कि उसका बेटा हिजड़ा है। नन्हे इम्मी के मन में अपने वजूद को लेकर कश्मकश चलती रहती है। दिन गुज़रते जाते हैं, इम्मी एक युवक (आरिफ़ ज़कारिया) में परिवर्तित होता है और वो ज़ीनत के साथ शूटिंग् पे जाता है, उसके साथ-साथ रहता है। ज़ीनत बेगम शोहरत और कामयाबी की बुलन्दी पर पहुँचती है, उसे एक युवा अभिनेता इन्दर कुमार भल्ला (शहबाज़ ख़ान) से प्यार हो जाता है, पर समय बदलते देर नहीं लगती। ज़ीनत का करियर ढलान पर आ जाता है, और इन्दर कुमार भी एक नई अदाकारा चित्रा (तब्बु) से प्यार करने लगता है। ज़ीनत अपने आप को शराब और जुए में डुबो कर सब कुछ हार जाती है। उसका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है। ज़ीनत के बरबाद हो जाने पर उधर इम्मी के साथ भी लोग बदतमीज़ी से पेश आते, उसे उसके वजूद को लेकर भला-बुरा कहते। अपने और अपनी माँ का पेट पालने के लिए इम्मी को आख़िर चम्पा के पास जाना पड़ता है। हिजड़े का पोशाक पहन कर इम्मी भी नाचता है, और जब एक रात वो एक वेश्या बन कर किसी अमीर आदमी के घर जाता है, तब वहाँ मौजूद उस आदमी के दोस्त लोग उसका बलात्कर कर उसे ज़ख़्मी बना देते हैं। इम्मी चम्पा के वहाँ से भाग जाता है। वो समझ जाता है कि वो ना आम समाज में जी सकता है और ना ही हिजड़ा समाज में। 

घर की तरफ़ लौटते हुए उसे वीराने में एक नवजात शिशु मिलता है, जिसे वो घर ले आता है और ज़ीनत
को दिखाता है। मानसिक संतुलन खोने की वजह से ज़ीनत उस बच्चे को नन्हा इम्मी समझती है और उसके लिंग को देख कर चिल्ला-चिल्ला कर कहती है कि उसका इम्मी हिजड़ा नहीं है, उसका इम्मी हिजड़ा नहीं है। खुशी से वो नाचने लगती है। बरसों से एक हिजड़ा को जन्म देने का जो दर्द ज़ीनत के मन में पलता रहा है, वह बाहर आ जाता है। इम्मी को भी उस बच्चे में अपने जीने का मक़सद नज़र आता है। उसका नाम वो मुराद रखता है। उसे पाल पोस कर बड़ा करना ही इम्मी के जीवन का मकसद बन जाता है। पर समाज को यह भी मनज़ूर कहाँ? जैसे ही चम्पा को इसका पता चलता है, वो बच्चे को चुरा कर ले जाती है और उसे हिजड़ा बनाने का अनुष्ठान शुरु कर देती है। लेकिन ऐन वक़्त पर इम्मी वहाँ पहुँच जाता है और बच्चे को बचा लेता है। साथ ही पहली बार एक हिजड़े की तरह चम्पा को बद-दुआ देता है कि "मैं एक पैदाइशी हिजड़े की ताक़त से तुझे बद दुआ देता हूँ चम्पा कि तू हर जनम हिजड़ा ही जन्मेगी"। यह सुन कर चम्पा टूट जाती है, विध्वस्त हो जाती है और चीख उठती है यह कहते हुए, "अपनी काली ज़ुबान से फिर हिजड़ा पैदा होने की बद-दुआ मत दे मुझे। एक बार हिजड़ा होके बड़ी मुश्किल से कटी है यह ज़िन्दगी, नफ़रत की कड़वी घूंट पी के, सबसे लड़ के, अपने आप जैसे तैसे ज़िन्दा रही हूँ मैं, फिर से हिजड़ा बनने की ताकत नहीं है मुझमें, मुझे हिजड़ा बनना नहीं है, मुझे हिजड़ा बनना नहीं है।" उधर इम्मी को समझ आ जाती है कि उसके लिए उस बच्चे को पालना नामुमकिन है। और यह भी समझ जाता है कि वो अब ना तो आम समाज का है और ना ही हिजड़ा समाज का। वो उस बच्चे को लेकर अपने जैविक पिता के जायज़ संतान, यानी अपने भाई के पास जाता है, पर वो उस बच्चे को नहीं अपनाता और उसे अपमानित कर बाहर निकाल देता है। तब वो आख़िरी उम्मीद के साथ इन्दर कुमार और चित्रा के पास जाते हैं। नर्म दिल और ज़ीनत को इज़्ज़त करने वाली चित्रा से इम्मी कहता है, "देखिए चित्रा जी, इस बच्चे की तरफ़, इसे भी जीने का हक़ है ना? जब मुझे यह बच्चा मिला, तब मैंने इसमें अपने आप को देखा, पर अब आपको इसे मुझसे दूर ही रखना है। मैं एक पैदाइशी हिजड़ा हूँ पता है आपको? मुराद मेरे जैसा नहीं है चित्रा जी, वो मेरे जैसा नहीं है। मुझे तो हमेशा से बस यही सिखाया गया था कि एक हिजड़ा सबसे अलग होता है, वो कभी बाकियों की तरह ज़िन्दगी नहीं गुज़ार सकता।" आरिफ़ ज़कारिया के जानदार और अद्वितीय अभिनय ने इस सीन को ऐसा अनजाम दिया है कि कोई भी दर्शक अपनी आँसू नहीं रोक सकता। चित्रा इम्मी से कहती है कि वो और इन्दर मिल कर इम्मी और ज़ीनत की ज़िन्दगी को बसा देंगे। जवाब में इम्मी कहता है, "मेरी ज़िन्दगी अब कोई मायने नहीं रखती चित्रा जी, मैं तो बस यह चाहता हूँ कि मुराद को ज़िन्दगी में वो तमाम ख़ुशियाँ हासिल हो जो मुझे कभी ना मिल पायी। पता है एक हिजड़े की ज़िन्दगी होती ही मनहूस है चित्रा जी। आपा को मेरे पैदा होते ही हिजड़ों को दे देना चाहिए था, पर अब ना तो मेरी जगह इस दुनिया में है, न ही हिजड़ों की दुनिया में। दोनों के दर्मियाँ हूँ मैं! दोनों के दर्मियाँ हूँ मैं!" इन्दर कुमार के ना करने की बावजूद चित्रा बच्चे को अपना लेती है। इम्मी वहाँ से चला जाता है यह कहते हुए कि वो चित्रा की ज़िन्दगी में फिर कभी नहीं आएगा। घर वापस आकर वो ज़हर पी लेता है अपनी माँ को भी पिला देता है। अन्तिम दृश्य में इम्मी ज़ीनत से (जिसे वो ज़िन्दगी भर आपा कहता आया है) कहता है, "हम आप से बहुत प्यार करते हैं अम्मी जान"! ज़ीनत के मुंह से निकलता है "मेरा बेटा!" चारों तरफ़ ख़ामोशी। दोनों चले गए हमेशा के लिए।

’दर्मियाँ’ एक ऐसी फ़िल्म है जिसे देख कर दिल उदास हो जाता है, तीसरे लिंग के लोगों के लिए मन सहानुभूति से भर उठता है। कल्पना लाजमी ने हिजरा समाज और फ़िल्म के मुख्य पात्र इम्मी का जो चित्र प्रस्तुत किया है, उससे हिजड़ों के प्रति जो आमतौर पर दुर्व्यवहार होता आया है, निस्सन्देह लोगों के दिलों में उनके लिए आदर ना सही पर सहानुभूति ज़रूर उत्पन्न होगी। ’दर्मियाँ’ में जावेद अख़्तर ने बेहद दिल को छू लेने वाला गीत लिखा है जो फ़िल्म का सार भी है और तीसरे लिंग के लोगों के दिल की पुकार भी। भूपेन हज़ारिका के संगीत और आवाज़ में यह गीत दिल को चीर कर रख देता है। गीत के बोल पेश कर रहे हैं...

भाग-1:

(दृश्य: दोस्तों द्वारा चिढ़ाने और चम्पा के डराने के बाद बालक इम्मी अपनी आपा (हक़ीक़त में माँ) के गोदी में सर छुपा कर रो रहा है। और माँ लाचार है, उसके पास कोई जवाब नहीं, किसी से कुछ नहीं कह सकती। अपने बेटे को बेटा नहीं कह सकती।)

कैसा ग़म है क्या मजबूरी है, पास है जो उनसे भी दूरी है
दिल यूं धड़के जैसे कोई गूंगा बोलना चाहे, लेकिन सब हैं अनजाने
अपने देस में हम हैं परदेसी, कोई न पहचाने
दुनिया परायी लोग यहाँ बेगाने
दिल पर जो बीते वो दिल ही जाने

भाग-2:

(दृश्य: मानसिक रूप से विध्वस्त ज़ीनत अपने बहनोई से यह चुनौती ले लेती है कि उसका बेटा हिजड़ा नहीं है, और अपने बात को साबित करने के लिए वो एक वेश्या लड़की को अपने बेटे के कमरे में भेज देती है। वेश्या को जैसे ही पता चलता है कि इम्मी हिजड़ा है, वो उसका अपमान कर चली जाती है। युवा इम्मी अपनी माँ के पास आकर रोने लगता है।)

कोई बता दे हम क्यों ज़िन्दा हैं, हम क्यों ख़ुद से भी शर्मिन्दा हैं
अपनी ही आँखों से गिरे हैं बनके हम एक आँसू, माने कोई या नहीं माने
अपने देस में हम हैं परदेसी, कोई न पहचाने
दुनिया परायी लोग यहाँ बेगाने
दिल पर जो बीते वो दिल ही जाने

भाग-3:

(दृश्य: बलात्कार से ज़ख़्मी होकर हिजड़ा समाज को हमेशा के लिए छोड़ आते समय जब मौत के अलावा इम्मी के लिए कुछ और नहीं बचा, तभी उसे एक अनाथ शिशु मिला, जिसे गोद में लेकर उसमें उसे अपने जीने का बहाना दिखा।)

कोई तो जीने का बहाना हो, कोई वादा हो जो निभाना हो
कोई सफ़र कोई तो रस्ता कोई तो मंज़िल हो, सुन ले ऐ दिल दीवाने
अपने देस में हम हैं परदेसी, कोई न पहचाने
दुनिया परायी लोग यहाँ बेगाने
दिल पर जो बीते वो दिल ही जाने

भाग-4:

(दृश्य: अन्तिम दृश्य में ख़ुद ज़हर पी कर अपनी माँ को ज़हर पिला रहा है इम्मी।)

सोचा है अब दूर चले जाएँ, अपने सपनों की दुनिया पाएँ
उस दुनिया में प्यार के फूल और ख़ुशियों के मोती हैं जो न दिए इस दुनिया ने
अपने देस में हम हैं परदेसी, कोई न पहचाने
दुनिया परायी लोग यहाँ बेगाने
दिल पर जो बीते वो दिल ही जाने

1997 के तीन फ़िल्मों की चर्चा हमने की। ये फ़िल्में हमें यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि क्यों हम इतने उदासीन हैं तीसरे लिंग के प्रति? क्यों हम उनका सामाजिक तिरस्कार करते हैं? ईश्वर के लिए सभी जीव-जन्तु समान हैं, जब हम जानवरों से प्यार कर सकते हैं, तो ये तो इंसान हैं हमारी आपकी तरह। क्या हम इन्हें थोड़ा सा प्यार, थोड़ी सी स्वीकृति नहीं दे सकते? क्या यह वाक़ई इतना कठिन है? मु तो नहीं लगता, और आपको?


आपकी बात

’चित्रकथा’ के पिछले अंक में हमने "मेरा रंग दे बसन्ती चोला" गीत के इतिहास से आपको अवगत करवाया था। हमारी एक पाठिका काव्या सरिता जी ने इस गीत के हमारे दिए बोलों में एक ग़लती ढूंढ़ निकाला और हमें सूचित किया। हमने इस ग़ौर किया और अपने आलेख में सुधार कर ली। काव्या जी को हमारा धन्यवाद। आप सभी इतने मनोयोग से हमारा आलेख पढ़ते हैं, यह देख कर हमें बेहद ख़ुशी हुई। हमारे एक और नियमित पाठक श्री पंकज मुकेश ने टिप्पणी की है - "प्रस्तुत लेख द्वारा आगामी शहीद दिवस 23 मार्च 2017 पर देश के तीन वीरों को सच्ची श्रद्धांजलि है। अमर शहीद!!!" बिल्कुल सही कहा आपने पंकज जी। और इस अंक की अब तक की कुल रीडरशिप 165 है। आगे भी आप सब बने रहिए ’चित्रकथा’ के साथ। धन्यवाद!


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Wednesday, November 26, 2008

षड़ज ने पायो ये वरदान - एक दुर्लभ गीत


येसू दा का जिक्र जारी है, सलिल दा के लिए वो "आनंद महल" के गीत गा रहे थे, उन्हीं दिनों रविन्द्र जैन साहब भी अभिनेता अमोल पालेकर के लिए एक नए स्वर की तलाश में थे. जब उन्होंने येसू दा की आवाज़ सुनी तो लगा कि यही एक भारतीय आम आदमी की सच्ची आवाज़ है, दादा(रविन्द्र जैन) ने बासु चटर्जी जो कि फ़िल्म "चितचोर" के निर्देशक थे, को जब ये आवाज़ सुनाई तो दोनों इस बात पर सहमत हुए कि यही वो दिव्य आवाज़ है जिसकी उन्हें अपनी फ़िल्म के लिए तलाश थी. उसके बाद जो हुआ वो इतिहास बना. चितचोर के अविस्मरणीय गीतों को गाकर येसू दा ने राष्टीय पुरस्कार जीता और उसके बाद दादा और येसू दा की जुगलबंदी ने खूब जम कर काम किया.

वो सही मायनों में संगीत का सुनहरा दौर था. जब पूरे पूरे ओर्केस्ट्रा के साथ हर गीत के लिए जम कर रिहर्सल हुआ करती थी, जहाँ फ़िल्म के निर्देशक भी मौजूद होते थे और गायक अपने हर गीत में जैसे अपना सब कुछ दे देता था. येसू दा और रविन्द्र दादा के बहाने हम एक ऐसे ही गीत के बनने की कहानी आज आपको सुना रहे हैं. येसू दा की माने तो ये उनका हिन्दी में गाया हुआ सबसे बहतरीन गीत है. पर दुखद ये है कि न तो ये फ़िल्म कभी बनी न ही इसके गीत कभी चर्चा में आए.

राजश्री वाले एक फ़िल्म बनाना चाहते थे संगीत सम्राट तानसेन के जीवन पर आधारित, चूँकि पुरानी तानसेन काफी समय पहले बनी थी राजश्री ७०-८० के दशक के दर्शकों के लिए तानसेन को फ़िर से जिन्दा करना चाहते थे और उनके पास "तुरुप का इक्का" संगीतकार रविन्द्र जैन भी थे, तो काम असंभव नही दिखता था. बहरहाल काम शुरू हुआ. रविन्द्र जी ने गीत बनाया "षड़ज ने पायो ये वरदान" और सबसे पहले रफी साहब से स्वर देने का आग्रह किया. रफी साहब उन दिनों अपने चरम पर थे, तो हो सकता है बात समय के अभाव की रही हो पर उन्होंने दादा से बस यही कहा "रवि जी,मोहमद रफी इस जीवन काल में तो कम से कम ये गीत नही गा पायेगा...". दादा आज भी मानते हैं कि ये उनका बड़प्पन था जो उन्होंने ऐसा कहा. हेमंत दा से भी बात की गई पर काम कुछ ऐसा मुश्किल था कि हेमंत दा भी पीछे हट गए, यह कहकर कि इस गीत को गाने के बारे में सोचकर ही मैं तनावग्रस्त हो जाता हूँ. तब जाकर दादा ने येसू दा से इसे गाने के लिए कहा. दोनों महान कलकारों ने पूरे दो दिन यानी कुल ४८ घंटें बिना रुके, बिना भोजन खाए और बिना पानी का एक घूँट पिये काम करते हुए गीत की रिकॉर्डिंग पूरी की. ५९ वीं बार के "टेक" में जाकर गीत "ओके" हुआ. सुनने में असंभव सी लगती है बात, पर सच्चे कलाकारों का समर्पण कुछ ऐसा ही होता है.

फ़िल्म क्यों नही बनी और इसके गीत क्यों बाज़ार में नही आए इन कारणों के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नही है, पर येसू दा अपने हर कंसर्ट में इस गीत का जिक्र अवश्य करते हैं, १९८६ में दुबई में हुए एक कार्यक्रम में उन्होंने इसे गाया भी जिस की रिकॉर्डिंग आज हम आपके लिए लेकर आए हैं....हमारे सुधि श्रोताओं के नाम येसू दा और रविन्द्र जैन "दादा" का का ये नायाब शाहकार -




दादा इन दिनों वेद् और उपनिषद के अनमोल बोलों को धुन में पिरोने का काम कर रहे हैं. और वो इस कोशिश में येसू दा को नए रूप में आज के पीढी के सामने रखेंगें. संगीत के कद्रदानों के लिए इससे बेहतर तोहफा भला क्या होगा. सोमवार को हम लौटेंगे और बात करेंगे रविन्द्र जैन साहब के बारे में, विस्तार से. बने रहिये आवाज़ पर.

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