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Sunday, January 13, 2013

स्वरगोष्ठी : दिन के दूसरे प्रहर के चटकीले राग


स्वरगोष्ठी – 104 में आज

राग और प्रहर – 2
‘कान्हा रे मुरली काहे ना तू बजाये...’



स्वरगोष्ठी के एक नये अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार पुनः सभी संगीत-प्रेमियों की इस बैठक में उपस्थित हूँ। पिछले अंक से हमने ‘राग और प्रहर’ शीर्षक से एक नई लघु श्रृंखला शुरू की है, जिसकी दूसरी कड़ी में आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं, दिन के दूसरे प्रहर के कुछ राग। दूसरे प्रहर में गाये-बजाये जाने वाले इन रागों को आम तौर पर प्रातः 9 बजे से मध्याह्न 12 बजे के बीच प्रयोग किया जाता है। आज के इस अंक में हम आपके लिए प्रस्तुत करेंगे, दूसरे प्रहर के रागों में से क्रमशः गान्धारी, विलासखानी तोड़ी, गुर्जरी तोड़ी और अल्हैया बिलावल।

श्रृंखला की पिछली कड़ी में हमने आपसे यह चर्चा की थी कि संगीत के विविध रागों को समय-चक्रों और ऋतु-चक्रों में बाँटा गया है। दिन और रात के चौबीस घण्टे विभिन्न आठ प्रहरों में विभाजित किये गए हैं और रागों को भी इन्हीं आठ प्रहरों में परम्परागत रूप से विभाजित कर गाया-बजाया जाता है। राग और प्रहर के अन्तर्सम्बन्धों के विषय में हमने कुछ संगीत-साधकों से जब चर्चा की तो एक अलग आयाम सामने आया। जाने-माने इसराज और मयूरवीणा वादक पं. श्रीकुमार मिश्र ने ‘राग और प्रहर’ के अन्तर्सम्बन्धों के बारे में चर्चा करते हुए कहा- ‘रागों का सम्बन्ध समय की अपेक्षा मानव के क्रिया-कलाप और अनुभूतियों से कहीं अधिक है। प्रत्येक राग के स्वरसमूह से अलग-अलग भावों की सृष्टि होती है। ये भाव जब हमारी शारीरिक और मानसिक प्रवृत्तियों से मेल खाते हैं तो वह राग हमें उस विशेष समय पर अच्छा लगने लगता है’।

तीसरे प्रहर के रागों के अन्तर्गत आज सबसे पहले हम आपको एक लगभग अप्रचलित राग ‘गान्धारी’ सुनवाएँगे। इस राग के विषय में जानकारी देते हुए श्रीकुमार जी ने बताया कि षाडव-सम्पूर्ण जाति का यह राग आसावरी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। आरोह में गान्धार स्वर का प्रयोग नहीं होता। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी गान्धार होता है। धैवत स्वर और उत्तरांग प्रधान चलन होने से इस राग की प्रस्तुति में ओज, पुकार और जागृति का भाव उत्पन्न होता है। आरोह में जौनपुरी की छाया परिलक्षित होती है किन्तु भैरवी और कोमल आसावरी की स्वर संगतियों के प्रयोग से वह छाया तिरोहित भी हो जाती है। आज हम आपको राग ‘गान्धारी’ की तीनताल में निबद्ध एक दुर्लभ बन्दिश सुनवाते हैं, जिसे गत शताब्दी के सुप्रसिद्ध शास्त्रज्ञ प्रोफेसर बी.आर. देवधर ने प्रस्तुत किया है।


राग ‘गान्धारी’ : ‘जियरा लरजे मोरा...’ : प्रोफेसर बी.आर. देवधर



आज का दूसरा राग है ‘विलासखानी तोड़ी’। यह मान्यता है कि तानसेन के पुत्र विलास खाँ ने इस राग का सृजन किया था। तोड़ी थाट, षाड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग में सभी स्वर कोमल लगते हैं और आरोह में मध्यम का प्रयोग नहीं होता। इस राग का वादी धैवत और संवादी गान्धार होता है। पं. श्रीकुमार जी के अनुसार इस राग की प्रकृति पूर्वांग में गम्भीर होती है परन्तु उत्तरांग में इसका गाम्भीर्य समाप्त हो जाता है। इसकी स्थिति डूबते-उतराते मन जैसी है। इस राग को थाट का होते हुए भी तोड़ी का एक प्रकार मानते हैं, इस गुण के कारण इसे यदि तोड़ी के आंशिक चलन से युक्त भैरवी कहा जाए तो अनुपयुक्त न होगा। राग विलासखानी तोड़ी की एक आकर्षक रचना अब हम आपको सुविख्यात गायक बन्धु पण्डित राजन और साजन मिश्र के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं।

राग ‘विलासखानी तोड़ी’ : ‘कान्हा रे मुरली काहे ना बजाए...’ : पण्डित राजन और साजन मिश्र



दिन के दूसरे प्रहर में गाया-बजाया जाने वाला एक और अत्यन्त मधुर राग है, ‘अल्हैया बिलावल’। बिलावल थाट के अन्तर्गत माना जाने वाला यह एक प्राचीन राग है। षाड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में मध्यम स्वर नहीं लगाया जाता तथा अवरोह में दोनों निषाद का प्रयोग होता है। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। इस राग के स्वर-समूह से शिकवा-शिकायतों का भाव प्रभावी ढंग से उभरता है। आज के अंक में हम आपको इस राग का एक समृद्ध आलाप सुरबहार पर सुनवाते हैं। वर्तमान में सुरबहार वाद्य एक अप्रचलित वाद्य का रूप ले चुका है। सुरबहार पर राग ‘अल्हैया बिलावल’ की अवतारणा कर रहे हैं, सितार और सुरबहार के यशस्वी वादक उस्ताद इमरत खाँ। 17 नवम्बर, 1935 को कोलकाता में संगीत-समृद्ध परिवार में इमरत खाँ का जन्म हुआ था। उन्नीसवीं शताब्दी में मुगल दरबार के सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद इमदाद खाँ के पौत्र, उस्ताद इनायत खाँ के पुत्र और सितार वादक उस्ताद विलायत खाँ के अनुज उस्ताद इमरत खाँ सुरबहार पर प्रस्तुत कर रहे हैं, राग ‘अल्हैया बिलावल’ का आलाप। इस आलाप में आपको ध्रुवपद अंग और इमदादखानी बाज की झलक मिलेगी।

राग ‘अल्हैया बिलावल’ : ध्रुवपद अंग में आलाप : उस्ताद इमरत खाँ



‘राग और प्रहर’ श्रृंखला की इस दूसरी कड़ी में अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, एक बेहद मोहक और प्रचलित राग, गूजरी तोड़ी। तोड़ी थाट और षाड़व-षाड़व जाति के इस राग में पंचम स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता और मध्यम तीव्र प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा ऋषभ, गान्धार और धैवत स्वर कोमल, जबकि निषाद स्वर शुद्ध लगता है। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। राग तोड़ी यूँतो पूर्वांग प्रधान होता है, किन्तु गूजरी तोड़ी उत्तरांग प्रधान राग होता है। इस राग में मानव के मन की वेदना को उभारने की क्षमता भी होती है। आइए, अब हम आपको इसी राग की एक रचना सुनवाते हैं जिसे 1991 में बनी फिल्म ‘लेकिन’ में शामिल किया गया था। तीनताल में निबद्ध इस गीत की संगीत रचना हृदयनाथ मंगेशकर ने की है और अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर के साथ युगल रूप में गाया भी है। स्पष्ट गूजरी तोड़ी के स्वरों में निबद्ध इस गीत का आप रसास्वादन करें और मुझे इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग ‘गूजरी तोड़ी’ : फिल्म ‘लेकिन’ : ‘जा जा रे ऐ पथिकवा...’ : हृदयनाथ और लता मंगेशकर



आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक की पहेली में हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के 110वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 - इस गीत के संगीतकार कौन हैं?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 106वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 102वें अंक में हमने आपको 1956 में प्रदर्शित विख्यात फ़िल्मकार राज कपूर की महत्वाकांक्षी फिल्म ‘जागते रहो’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरव और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- संगीतकार सलिल चौधरी। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जबलपुर की क्षिति तिवारी, बैंगलुरु के पंकज मुकेश और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से बधाई।

झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनो लघु श्रृंखला ‘राग और प्रहर’ जारी है। आगामी अंक में हम आपके साथ दिन के तीसरे प्रहर अर्थात मध्याह्न 12 बजे के बाद से लेकर अपराह्न लगभग 3 बजे के मध्य प्रस्तुत किये जाने वाले रागों पर चर्चा करेंगे। प्रत्येक रविवार को प्रातः साढ़े नौ बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ उपस्थित होते हैं। आप सब संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि इस सांगीतिक अनुष्ठान में आप भी हमारे सहभागी बनें। आपके सुझाव और सहयोग से हम इस स्तम्भ को और अधिक उपयोगी स्वरूप प्रदान कर सकते हैं।

कृष्णमोहन मिश्र


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