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Wednesday, April 4, 2018

चित्रकथा - 62: हिन्दी फ़िल्मों के महिला गीतकार (भाग-1)

अंक - 62

हिन्दी फ़िल्मों के महिला गीतकार (भाग-1)

"अंबर की एक पाक सुराही..." 




’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार! फ़िल्म जगत एक ऐसा उद्योग है जो पुरुष-प्रधान है। अभिनेत्रियों और पार्श्वगायिकाओं को कुछ देर के लिए अगर भूल जाएँ तो पायेंगे कि फ़िल्म निर्माण के हर विभाग में महिलाएँ पुरुषों की तुलना में ना के बराबर रही हैं। जहाँ तक फ़िल्मी गीतकारों और संगीतकारों का सवाल है, इन विधाओं में तो महिला कलाकारों की संख्या की गिनती उंगलियों पर की जा सकती है। आज ’चित्रकथा’ में हम एक शोधालेख लेकर आए हैं जिसमें हम बातें करेंगे हिन्दी फ़िल्म जगत के महिला गीतकारों की, और उनके द्वारा लिखे गए यादगार गीतों की। आज का यह अंक समर्पित है महिला फ़िल्म गीतकारों को! 



गर यह पूछा जाए कि किस महिला गीतकार की रचनाएँ सबसे ज़्यादा फ़िल्मों में सुनाई दी हैं, तो
शायद इसका सही जवाब होगा मीराबाई। एक तरफ़ जहाँ यह एक सुन्दर और मन को शान्ति प्रदान करने वाली बात है, वहीं दूसरी ओर यह एक दुर्भाग्यजनक बात भी है कि जिस देश में मीराबाई जैसी कवयित्री हुईं हैं, उस देश में महिला गीतकारों की इतनी कमी है। हिन्दी सिने संगीत जगत की पहली महिला जिन्होंने गीतकारिता के लिए कलम उठाया था, वो हैं जद्दनबाई, जो फ़िल्म निर्माण के पहले दौर की एक गायिका, संगीतकार, अदाकारा और फ़िल्मकार रही हैं। 1892 में जन्मीं जद्दनबाई को भारतीय सिनेमा के अग्रदूतों में गिना जाता है। वो अभिनेत्री नरगिस की माँ थीं। 1935 की फ़िल्म ’तलाश-ए-हक़’ में संगीत देकर वो फ़िल्म जगत की पहली महिला संगीतकार बनीं। लेकिन इस फ़िल्म के गीतों के रिकॉर्ड के उपलब्ध ना होने की वजह से सरस्वती देवी को प्रथम महिला संगीतकार होने का गौरव मिला। इसके अगले ही साल 1936 में फ़िल्म ’मैडम फ़ैशन’ में एक गीत लिख कर जद्दनबाई बन गईं फ़िल्म जगत की प्रथम महिला गीतकार। गायक जुगल-किशोर की आवाज़ में जद्दनबाई की लिखी व स्वरबद्ध की हुई यह ग़ज़ल थी "यही आरज़ू थी दिल की कि क़रीब यार होता, और हज़ार जाँ से क़ुरबाँ मैं हज़ार बार होता"। इस फ़िल्म का निर्माण व निर्देशन भी उन्होंने ही किया था। इसके बाद उनकी कुछ और फ़िल्में आईं जैसे कि ’हृदय मंथन’, ’मोती का हार’ और ’जीवन स्वप्न’, लेकिन उनका लिखा कोई गीत इनमें नहीं था। 

सरोज मोहिनी नय्यर
1936 में जद्दनबाई के लिखे उस गीत के बाद एक लम्बे समय तक किसी महिला गीतकार की रचना सुनाई नहीं दी। 50 के दशक के शुरू शुरू में संगीतकार ओ.पी. नय्यर की धर्मपत्नी सरोज मोहिनी नय्यर ने एक गीत लिखा "प्रीतम आन मिलो" जो एक प्राइवेट गीत था। सी. एच. आत्मा की आवाज़ में ओ. पी. नय्यर द्वारा स्वरबद्ध यह गीत इतना कामयाब हुआ कि नय्यर साहब की गाड़ी चल पड़ी। लेकिन इस गीत की मक़बूलियत से सी. एच. आत्मा को जितनी प्रसिद्धी मिली, सरोज मोहिनी नय्यर और उनके पति ओ. पी. नय्यर को नहीं मिली। अपनी पत्नी के लिखे इस गीत को उसका हक़ दिलाने के लिए नय्यर साहब ने ’Mr. and Mrs. 55’ फ़िल्म में इस गीत को रखने का निश्चय किया। इस फ़िल्मी संस्करण को गीता दत्त ने गाया था। आगे चल कर इस गीत का एक पैरोडी संस्करण गुलज़ार ने अपनी फ़िल्म ’अंगूर’ में रखा जिसे सपन चक्रवर्ती ने गाया था। जानीमानी अभिनेत्री और माँ की भूमिका में सर्वाधिक चर्चित अभिनेत्री निरुपा रॉय ने भी अपने करियर में कम से कम एक गीत ज़रूर लिखा था। 
निरुपा रॉय
1958 की फ़िल्म ’सम्राट चन्द्रगुप्त’, जो संगीतकार कल्याणजी वीरजी शाह की शुरुआती फ़िल्मों में से थी, में एक गीत लिखा "मुझे देख चाँद शरमाए, घटा थम जाए..."। लता मंगेशकर ने इसे गाया था। फ़िल्म के बाकी गीत भरत व्यास, इंदीवर और हसरत जयपुरी ने लिखे। निरुपा रॉय ने इस फ़िल्म में नायिका के किरदार में थीं और इस तरह से संभव है कि उन्होंने कोई गीत लिखा हो और फ़िल्म के निर्माता/निर्देशक/संगीतकार को वह पसंद आ गया हो और फ़िल्म में रख लिया गया हो। 1969 में एक ’शतरंज’ नाम की फ़िल्म आई जिसमें शंकर जयकिशन का संगीत था। हसरत जयपुरी, इंदीवर और एस. एच. बिहारी जैसे नामी गीतकारों के साथ साथ एक गीत किरण कल्याणी का लिखा हुआ भी फ़िल्म में सुनाई दिया, और सबसे महत्वपूर्ण बात कि यह गीत ज़बरदस्त हिट हुआ। मोहम्मद रफ़ी, शारदा और महमूद की आवाज़ों में "बदकम्मा बदकम्मा..." अपने ज़माने का सुपरहिट गीत रहा है। किरण कल्याणी ने आगे चल कर भी जितना काम किया, शंकर जयकिशन के लिए ही किया। 1971 की फ़िल्म ’एक नारी एक ब्रह्मचारी’ में रफ़ी साहब की आवाज़ में उनका लिखा गीत था "चिराग़ किस के घर का है तू, लाल किस के घर का है, कमल है कौन ताल का, तू किस चमन का फूल है"। किशोर कुमार - शंकर जयकिशन - किरण कल्याणी का कॉम्बिनेशन अजीब-ओ-ग़रीब कॉम्बिनेशन सा प्रतीत होता है, लेकिन 1974 की फ़िल्म ’वचन’ में यह तिकड़ी एक साथ आकर एक मस्ती भरे गीत की रचना की थी "ऐ हबीबा ख़ुशनसीबा, यार के दिल के क़रीब आ..."। मध्य-एशियाई संगीत के अंदाज़ में रचा यह गीत एक आइटम गीत होने की वजह से और फ़िल्म के पिट जाने से इस गीत को सफलता नहीं मिली। किरण कल्याणी फिर इसके बाद किसी फ़िल्म में गीतकार के रूप में नज़र नहीं आईं। 

प्रभा ठाकुर
किरण कल्याणी की तरह एक और महिला गीतकार जिन्होंने शंकर जयकिशन के साथ काम किया, वो हैं प्रभा ठाकुर। प्रभा ठाकुर ना केवल एक गीतकार हैं बल्कि एक जानीमानी कवयित्री भी हैं और साथ ही गायिका के रूप में भी उन्होंने गीत गाए हैं। प्रभा ठाकुर ने फ़िल्मी गीत लेखन 1974 में शुरू की कल्याणजी-आनन्दजी के संगीतबद्ध फ़िल्म ’अलबेली’ से। सुमन कल्याणपुर और कंचन का गाया वह गीत है "तनिक तुम हमरी नजर पहचानो"। कम बजट की फ़िल्म, उस पर फ़्लॉप, कुल मिला कर गीत कहीं खो गया और प्रभा ठाकुर भी। इस फ़िल्म के तीन साल बाद 1977 में शंकर जयकिशन के संगीत में फ़िल्म ’दुनियादारी’ में उन्होंने एक गीत लिखा जिसे लता मंगेशकर और किशोर कुमार ने गाया। "प्यार करने से पहले ज़रूरी है ये, मैं तुझे जान लूँ, तू मुझे जान ले" गीत सुनने में बहुत मामूली लगता है, लेकिन ध्यान से पूरा गीत सुनने पर अहसास होता है कि कितने सीधे सरल शब्दों में प्रभा जी ने पते की बात बतायी हैं इस गीत में। और इस गीत से ख़ुश होकर ही तो शंकर जयकिशन की अगली फ़िल्म ’आत्माराम’ में भी उनसे एक और गीत लिखवाया गया। 1979 की इस फ़िल्म में प्रभा ठाकुर का लिखा गीत किशोर कुमार ने गाया - "चलते चलते इन राहों पर ऐसा भी कुछ हो जाता है, कोई अनचाहा मिल जाता है और मनचाहा खो जाता है..."। उनके अब तक के लिखे गीतों में यह सबसे अर्थपूर्ण गीत रहा है। शंकर-जयकिशन की एक और फ़िल्म ’पापी पेट का सवाल है’ (1984) में प्रभा ठाकुर ने एक गीत लिखा और उसे अपनी आवाज़ भी दी। लोक शैली में निबद्ध और हास्य रस लिए जया प्रदा पर फ़िल्माया यह गीत है "मोसे चटणी पिसावे, कैसा बेदर्दी समझे ना मेरे जी की बात..."। यह वह दौर था जब जयकिशन के बिना शंकर अकेले ही संगीत दे रहे थे। फ़िल्मों और फ़िल्म-संगीत के बदलते मिज़ाज की गति के आगे वो क्रमश: पीछे होते चले जा रहे थे और उनकी फ़िल्मों का संगीत उन कम बजट की फ़िल्मों की असफलता की वजह से ठंडे बस्ते में घुसते चले जा रहे थे। इसी दौरान 1983 में प्रभा ठाकुर ने उस दौर में अपना अन्तिम फ़िल्मी गीत लिखा कल्याणजी-आनन्दजी के लिए, फ़िल्म थी ’घुंघरू’। आशा भोसले की आवाज़ में यह मुजरा गीत है "तुम सलामत रहो यह है मेरी दुआ, मेरे दामन में है भी क्या दुआ के सिवा..."। प्रभा ठाकुर के लिखे इन सारे गीतों को ध्यान दें तो पता चलता है कि उनका लिखा हर गीत उनके लिखे पहले गीत से अलग है। उन्होंने कभी अपने गीतों को एक ही निर्दिष्ट शैली में बांधने की कोशिशें नहीं की। करीब 22 सालों तक फ़िल्म-संगीत से दूर रहने के बाद वर्ष 2006 में प्रभा ठाकुर के लिखे तीन गीत सुनाई दिए उत्तम सिंह के संगीतबद्ध फ़िल्म ’कच्ची सड़क’ में। पहला गीत है उदित नारायण और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में "इक तुमसे बात पूछूँ, बुरा नहीं मानो, पर यह बात जानो..."; और दूसरा गीत है उदित नारायण और विनोद राठौड़ की आवाज़ों में "हंगामा हंगामा"। तीसरे गीत के रूप में अदनान सामी की गायी मज़हबी क़व्वाली "ख्वाजा मेरे ख्वाजा" इन तीनों में से श्रेष्ठ रचना मानी जाएगी।

अमृता प्रीतम 
पंजाबी की पहली प्रसिद्ध महिला उपन्यासकार, लेखिका, कवयित्री और गीतकार के रूप में जो नाम सबसे पहले ध्यान में आता है, वह है अमृता प्रीतम का। पंजाबी भाषा की बीसवीं सदी की इस सशक्त कवयित्री को सरहद के दोनों तरफ़ से भरपूर मोहब्बत मिली। छह दशकों के करिअर में अमृता प्रीतम ने सौ से भी अधिक किताबें लिखीं, जिनमें पंजाबी लोक गीतों का संग्रह और उनकी आत्मकथा भी शामिल है जिसे कई भारतीय व विदेशी भाषाओं में अनुवाद किया गया है। उनकी लिखी कविता ’अज्ज आखां वारिस शाह नु’ (Today I invoke Waris Shah – "Ode to Waris Shah") कालजयी बन गई है जिसमें 1947 के बटवारे के मंज़र का मार्मिक वर्णन मिलता है। एक उपन्यासकार के रूप में ’पिंजर’ उनकी लिखी सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यास रही जो उन्होंने 1950 में प्रकाशित की थीं। इस उपन्यास में बटवारे के समय औरतों के साथ होने वाले अत्याचारों का वर्णन मिलता है। इसी उपन्यास पर 2003 में फ़िल्म बन चुकी है। इसकी चर्चा हम आगे करेंगे। बटवारे के बाद अमृता प्रीतम लाहौर से भारत आ गईं, लेकिन वो ता-उम्र पाक़िस्तान में ज़्यादा लोकप्रिय रहीं अपने समकालीन मोहन सिंह और शिव कुमार बटालवी की तुलना में। ’साहित्य अकादमी पुरस्कार’, ’ज्ञानपीठ पुरस्कार’, ’पद्मश्री’, ’पद्मविभूशण’ और ’साहित्य अकादमी फ़ेलोशिप’ जैसे उच्चस्तरीय पुरस्कारों से सम्मानित अमृता प्रीतम की लेखनी कुछ एक बार फ़िल्मों में भी सुनाई दी गीतों के रूप में। पहली बार उनका लिखा गीत आया 1975 की फ़िल्म ’डाकू’ में। बासु भट्टाचार्य निर्देशित इस फ़िल्म में संगीत था श्यामजी-घन्श्यामजी का। फ़िल्म के गीतों के लिए हसरत जयपुरी, चमन लाहोरी, रमेश्वर त्यागी, साजन दहल्वी और अमृता प्रीतम को चुना गया। अमृता प्रीतम के लिखे पहले गीत को गाया लता मंगेशकर ने - "तू आज अपने हाथ से कुछ बिगडई संवार दे, ऐ ख़ुदा मेरे जिस्म से मेरा साया उतार दे"। बच्चे के जन्म के बाद माँ के दिल की पुकार है इस गीत के शब्द। और गीत को सुन कर अहसास हो जाता है कि एक बहुत अच्छा लेखक ही ऐसा गीत लिख सकता/सकती हैं। इस फ़िल्म में अमृता प्रीतम का लिखा एक और गीत था रफ़ी साहब की आवाज़ में - "ये दुनिया थी दिल की जो हमने बसाई, ये दुनिया है दिल की जो हमने लुटाई..."। 1976 में एक फ़िल्म आई थी ’कादम्बरी’ जिसमें उस्ताद विलायत ख़ाँ का संगीत था। इसमें अमृता प्रीतम का लिखा आशा भोसले का गाया गीत "अंबर की एक पाक सुराही बादल का एक जाम उठा कर..." एक कालजयी रचना है। इस तरह की काव्यात्मक रचना हिन्दी फ़िल्मों में बहुत कम ही सुना दी है। इन दो फ़िल्मों के बाद अमृता प्रीतम ने फिर किसी हिन्दी फ़िल्म के लिए गीत नहीं लिखे। 2003 में जब उनकी उपन्यास ’पिंजर’ पर फ़िल्म बनी तो इसमें उनका लिखा एक गीत रखा गया "चरखा चलाती माँ, धागा बनाती माँ, बुनती है सपनों की केसरी..."। उत्तम सिंह के संगीत में इसे गाया प्रीति उत्तम ने। यह एक बेहद मार्मिक लोरी है जिसका एक एक शब्द सीधे कलेजे को चीर के रख देती है। अमृता प्रीतम की ही लिखी मशहूर कविता "अज्ज आखां वारिश शाह नु" को भी इस फ़िल्म में शामिल किया गया जिसे वडाली ब्रदर्स और प्रीति उत्तम ने गाया। "वारिस शाह, बजा अखा वाले शाह नू कितो करा विचो बोले, आज अखा वाले शाह नु वाह दिसाऊ, कित्तो कब्रा विचो बोले, थी आज किताबे इश्क़ दा कोई अगला वर्ग फूल..."। 

फ़िल्म ’कादम्बरी’ में अमृता प्रीतम के अलावा एक और महिला गीतकार का लिखा गीत शामिल था। ये हैं गीतांजलि सिंह। संगीतकार अजीत सिंह के संगीत में पत्नी गीतांजलि ने यह गीत लिखा जिसे अजीत सिंह ने ही गाया। "क्यों हम तुम रहें अकेले, क्यों ना बाहों में बाहें ले ले, देखो ज़िंदगी के मेले..."। यह एक नशे से भरा क्लब सॉंग् है, अमृता प्रीतम के लिखे "अंबर की एक पाक सुराही" से बिल्कुल विपरीत। अजीत सिंह ने इसके बाद कई फ़िल्मों में संगीत दिया है, लेकिन गीतांजलि सिंह के लिखे गीत इसके बाद सिर्फ़ एक ही फ़िल्म में सुनाई दी, और वह फ़िल्म है 1999 की ’होश’। दरसल फ़िल्म ’होश’ में दो गीतकार थे, दोनों महिलाएँ - एक तो गीतांजलि सिंह थीं ही, दूसरी थीं आशा रानी। संगीतकार अजीत सिंह के संगीत में इन दो गीतकारों ने मिला-जुला कर कुल आठ गीत लिखे जिन्हें अजीत सिंह और तान्या सिंह ने गाए। तान्या सिंह अजीत सिंह की बेटी हैं। गीतकार आशा रानी ने भी अजीत सिंह के संगीत में एक और फ़िल्म में गाने लिखीं। यह फ़िल्म है 1989 की ’पुरानी हवेली’। अनुराधा पौडवाल की आवाज़ में "कैसे मैं भुलाऊँ तेरा प्यार", सुरेश वाडकर की आवाज़ में "आता है मुझको याद तेरा प्यार" और "संगमर्मर सा था उसका बदन" आशा रानी की लिखी रचनाएँ हैं इस फ़िल्म की। 

महिला संगीतकारों में एक नाम शारदा राजन का रहा है। उनके द्वारा संगीतबद्ध 1976 की फ़िल्म ’ज़माने से पूछो’ में एक गीत शबनम करवारी का लिखा हुआ था। रफ़ी साहब की आवाज़ में यह गीत है "कहीं चमन खिला दिया, कहीं धुंआ उड़ा दिया, दिल में जो आय अपने किया पाप किया या पुण्य किया, हमसे ना पूछो, ज़माने से पूछो..."। इस तरह से फ़िल्म के शीर्षक गीत के गीतकार के रूप में शुरु हुई थी पारी महिला गीतकार शबनम करवारी की। 1979 में एक फ़िल्म बनी थी ’अरब का सोना: अबु कालिया’। जतिन-श्याम के संगीत निर्देशन में इस फ़िल्म के गीत ऐश कंवल और शबनम ने लिखे थे। फ़िल्म के गीतों में आवाज़ें थीं मोहम्मद रफ़ी, दिलराज कौर और नितिन मुकेश की। शबनम करवारी का लिखा और नितिन मुकेश का गाया एक गीत है "नेकी और बदी सब की एक दिन तोली जाएगी, पाप और पुण्य के पुस्तक सबकी एक दिन खोली जाएगी..."। इस सुंदर दार्शनिक गीत की ही तरह न जाने कितने गीत लोगों तक पहुँचने से वंचित रह गए होंगे सिर्फ़ इस वजह से कि ये फ़िल्में या तो सही तरीके से बन नहीं सकीं या फिर इन्हें प्रोमोट करने के लिए अर्थ का अभाव था।

यहाँ आकर पूरी होती है ’हिन्दी फ़िल्मों के महिला गीतकार’ का पहला भाग जिसमें हमने बातें की जद्दन बाई, सरोज मोहिनी नय्यर, निरुपा रॉय, किरण कल्याणी, प्रभा ठाकुर, अमृता प्रीतम, गीतांजलि सिंह, आशा रानी और शबनम करवारी की। इस लेख के दूसरे भाग में हम कुछ और महिला गीतकारों और उनके लिखे गीतों की जानकारी लेकर उपस्थित होंगे। तब तक के लिए अपने दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार!

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



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