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Monday, November 2, 2009

हमारे यहाँ के नेताओं का कोई भी बयान किसी व्यंग से कम नहीं होता....पठकथा और संवाद लेखक आर डी तैलंग से एक ख़ास बातचीत

ताजा सुर ताल TST (33)

दोस्तों, ताजा सुर ताल यानी TST पर आपके लिए है एक ख़ास मौका और एक नयी चुनौती भी. TST के हर एपिसोड में आपके लिए होंगें तीन नए गीत. और हर गीत के बाद हम आपको देंगें एक ट्रिविया यानी हर एपिसोड में होंगें ३ ट्रिविया, हर ट्रिविया के सही जवाब देने वाले हर पहले श्रोता की मिलेंगें २ अंक. ये प्रतियोगिता दिसम्बर माह के दूसरे सप्ताह तक चलेगी, यानी 5 अक्टूबर से १४ दिसम्बर तक, यानी TST के ४० वें एपिसोड तक. जिसके समापन पर जिस श्रोता के होंगें सबसे अधिक अंक, वो चुनेगा आवाज़ की वार्षिक गीतमाला के 60 गीतों में से पहली 10 पायदानों पर बजने वाले गीत. इसके अलावा आवाज़ पर उस विजेता का एक ख़ास इंटरव्यू भी होगा जिसमें उनके संगीत और उनकी पसंद आदि पर विस्तार से चर्चा होगी. तो दोस्तों कमर कस लीजिये खेलने के लिए ये नया खेल- "कौन बनेगा TST ट्रिविया का सिकंदर"

TST ट्रिविया प्रतियोगिता में अब तक-

पिछले एपिसोड में एक बार फिर वही कहानी दोहराई गयी सीमा जी ने दो सही जवाब दिए तो तनहा जी ने एक सही जवाब देकर बाज़ी समाप्त की. सीमा जी हैं २६ अंकों पर, और तनहा जी हैं १२ अंकों पर....देखते हैं क्या होता है

सजीव - सुजॉय, आज एक बार फिर से 'ताज़ा सुर ताल' एक नया मोड़ ले रहा है। अब यह शृंखला साप्ताहिक हो चुकी है, लेकिन इसका स्वरूप वही रहेगा, लेकिन गानें ज़्यादा संख्या में बजेंगे। साथ ही ग़ैर फ़िल्मी ऐल्बम्स के गीतों को भी समान प्राथमिकता दी जाएगी।

सुजॉय - आशा है हमारे श्रोताओं को भी अच्छा लगेगा। हर ताज़े सप्ताह की शुरुआत ताज़े गीतों के साथ हम करेंगे, और जहाँ तक दो दिन की जगह एक दिन का सवाल है, तो वैसे भी हम 'आवाज़' के अन्य स्तंभों के माध्यम से हर रोज़ ही अपने पाठकों और श्रोताओं से मिलते ही रहते हैं।

सजीव - बिल्कुल सही है। और आज इस बदले हुए TST की पहली कड़ी को और भी ज़्यादा ख़ास बनाने में हमारे नियमित साथी शरद तैलंग जी ने एक ज़बरदस्त भूमिका निभाई है।

सुजॉय - जी हाँ। जिन श्रोताओं को मालूम नहीं है उनकी जानकारी के लिए हम बता दें कि शरद तैलंग जी के छोटे भाई हैं आर. डी. तैलंग, जो एक जानेमाने संवाद व पटकथा लेखक हैं। छोटे पर्दे पर उन्होने कैसी कैसी लोकप्रिय कार्यक्रमों के लिये स्क्रीप्ट लिखे हैं ये तो आप नीचे उनकी इंटरव्यू को पढ़कर जान ही लेंगे, यहाँ बस इतना बताते हैं कि तैलंग जी ने आनेवाली फ़िल्म 'अजब प्रेम की ग़ज़ब कहानी' के संवाद और पटकथा लिखे हैं राजकुमार संतोषी के साथ।

सजीव - सुजॉय, हमने इस फ़िल्म के दो गानें तो सुनवा चुके हैं, और आज भी तीन गानें सुनवाएँगे, लेकिन आज इस फ़िल्म के गानों से भी ख़ास है आर. डी. तैलंग साहब की इंटरव्यू।

सुजॉय - निस्संदेह! और वैसे भी इस फ़िल्म के गीत संगीत से जुड़ी बातें तो हम उन दो गीतों के साथ बता ही चुके हैं आज तो तैलंग जी की ही बातें करते हैं। आर. डी. तैलंग जी का जन्म मध्यप्रदेश के मंडला में एक छोटे से गाँव में हुआ था, ये एक ऐसा प्रदेश हैं जहाँ से मुख्य सड़क तक पहुँचने के लिए इन्हें २० कि.मी. पैदल चलना पड़ता था। इस तरह के परिवेश से निकलकर आज तैलंग जी मुंबई की चकाचौंध तक आ पहुँचे हैं। इस सफ़र के दौरान इनके कौन कौन से मुख्य पड़ाव रहे हैं, वो आप उन्ही से जानेंगे उनके साक्षात्कार से।

सजीव - इस मुलाक़ात को अपने पाठकों तक पहुँचाने से पहले हम शरद जी का शुक्रिया अदा करते हैं जिनके सहयोग से हमें आर. दी. तैलंग जी से बातचीत करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। लेकिन सबसे पहले सुनते हैं अजब प्रेम की गज़ब कहानी का ये शानदार गीत नीरज श्रीधर और सुजान डीमेलो की आवाज़ में, तब तक तैलंग साहब भी आ ही जायेंगें...

प्रेम की नैय्या (अजब प्रेम की गजब कहानी)
आवाज़ रेटिंग - ***



TST ट्रिविया # 22- कैटरिना कैफ पर फिल्माए किस दोगने से सुजान को मकबूलियत मिली थी. इस मशहूर फिल्म में "खिलाडी" के नाम से मशहूर एक्टर की शीर्षक भूमिका थी.

सजीव - तैलंग जी आपका स्वागत है TST में. सबसे पहले तो अपनी इस पहली फिल्म लिए बधाईयाँ स्वीकार कीजिये.

तैलंग जी - बहुत बहुत धन्यवाद सजीव जी

सजीव - छोटे परदे से बड़े परदे की ये दूरी कैसे तय की आपने. बॉलीवुड में अपने अब तक के सफ़र पर हमारे श्रोताओं को कुछ बताईये ?

तैलंग जी - सजीव जी में यही कहूँगा कि बस कुछ किस्मत और कुछ मेहनत. मैंने अपने करियर की शुरुआत की पत्रकारिता से. मैं मुम्बई में एक संध्या दैनिक "दोपहर" में कार्टून्स बनाता था.. और साथ ही अपने अखबार के लिए reporting भी करता था, यहीं से धीरे धीरे लेखन की ओर रुझान हुआ. उस समय हमारे देश में टेलीविजन क्रांति की शुरुआत हुई ही थी. प्राइवेट चैनल्स धीरे धीरे खुल रहे थे.. इसलिए मेरा भी इस नयी टेक्नोलॉजी की तरफ आकर्षित होना स्वाभाविक था, इसलिए मैंने प्लुस चॅनल नामक प्रोडक्शन हाउस में नौकरी कर ली, और वहां पर चित्रहार, मिर्च मसाला जैसे कई प्रोग्राम दूरदर्शन के लिए बनाये.. उसके बाद मैंने जी टीवी में बतौर सहायक निर्देशक नौकरी कर ली...मगर कुछ दिनों में ही महसूस होने लगा कि शायद नौकरी करने कि मेरी फितरत नहीं है.. और मुझे कुछ ऐसा करना चाहिए जिसमें मुझे खुद को संतोष मिले, और जो करूँ वो करने में मुझे आनंद आये. लेखन में रूचि पहले से ही थी.. इसलिए लेखन को ही अपना व्यवसाय और आय का मुख्य जरिया बनाने का निर्णय किया और सबसे पहला प्रोग्राम मिला "स्टार यार कलाकार"... जिससे फरीदा जलाल प्रस्तुत करती थीं. उसके बाद एक बहुत ही सफल प्रोग्राम से जुड़ने का मौका मिला जिसका नाम था " मूवर्स एंड शेकर्स"... यह अपने देश में पहला ऐसा शो था जो राजनीती पे तीखे व्यंग करता था.. और स्टैंड अप कॉमेडी का भारत में पहला प्रयोग था. बस उसके बाद तो लेखन का सिलसिला शुरू हो गया. उसकी अगली कड़ी था अमिताभ बच्चन द्वारा प्रस्तुत "कौन बनेगा करोड़पति" जिसके दोनो भाग मैंने लिखे, उसके बाद अमिताभ बच्चन कि जगह देश के दूसरे सुपर स्टार शाहरुख़ खान ने उसकी बागडोर सम्हाली, तो उसमें भी मुझे लिखने का मौका मिला.. मुझे गर्व है कि मैंने देश के दो बड़े महानायकों के लिए लिखा है.. उसके बाद शाहरुख़ के लिए ही "क्या आप पांचवी पास से तेज़ हैं" और अमिताभ बच्चन के लिए बिग बॉस जैसे शो लिखे.. इन बड़े बड़े महानायकों के लिए काम करने का सीधा फायदा यह हुआ कि फिल्म जगत में थोडा नाम हो गया, और उसी के चलते, प्रसिद्ध निर्देशक राजकुमार संतोषी ने मुझे फिल्म "अशोक" के संवाद लिखने बुलाया. वो फिल्म बनने में तो अभी समय है.. लेकिन उस से पहले " अजब प्रेम कि ग़ज़ब कहानी" की तैयारियां चल रही थी, तो उन्होंने मुझे इस फिल्म में भी पटकथा और संवाद लिखने कि जिम्मेवारी दे दी. इस तरह से मेरा थोडी किस्मत और थोडी मेहनत के सहारे फिल्मों में प्रवेश हो गया.

सुजॉय - तैलंग जी, मूवर्स एंड शेखर एक ऐसा प्रोग्राम था जिसे देखने के बाद बहुत अच्छी नींद आती थी, कहाँ से लाते थे इतने बढ़िया पंच ?

तैलंग जी- सुजोय जी इस बात को शायद आपने भी महसूस किया होगा कि छोटे शहरों और मध्यम वर्गीय वातावरण में पलने बढ़ने के कारण व्यक्ति में अपने आसपास कि चीज़ों को देखने का बहुत ही मजेदार नज़रिया विकसित हो जाता है, जिसमें हास्य भी होता है, व्यंग भी होता है, यही कारण ही कि हमें प्रेमचंद, हरिशंकर परसाई, शरद जोशी जैसे कई लेखकों कि रचनाओं में हास्य के साथ साथ समाज पर एक तीखा प्रहार भी देखने को मिलता है.. और हमारे देश कि, राजनीति कि स्थिति यह है कि या तो आप इस पे झल्ला सकते हैं, दुखी हो सकते हैं, या फिर इस पर हंस सकते हैं... मैंने हंसने का काम किया.. और जहाँ तक पंच का सवाल है, हमारे यहाँ के नेताओं का कोई भी बयान किसी व्यंग से कम नहीं होता...तभी तो कहते हैं, कि जब नेता कानून बनता है तो वो मजाक बन के रह जाता है, और जब वो मजाक बनाता है..तो वो कानून बन जाता है...

सजीव - जी सही कहा आपने ...चलिए अब आते है APKGK पर. राज कुमार संतोषी ने "अंदाज़ अपना अपना" जैसी क्लासिक कॉमेडी दी है. जाहिर है दर्शकों की उम्मीदें इस फिल्म से बहुत होंगी, अब फिल्म बन चुकी है, आप बताएं क्या हम हंस हंस कर लोटपोट होने के लिए तैयार रहें या फिर उम्मीदें कुछ कम रखें :)

तैलंग - जी हाँ उम्मीदें बहुत हैं, और होनी भी चाहिए, अगर उम्मीद एक अच्छे निर्देशक से नहीं लगायेंगे तो किस से लगायेंगे.. में तो यही कहूँगा कि आप पूरी उम्मीद लेकर सिनेमा हाल में आयें..क्यों कि यह हमारे लिए भी एक चुनौती होगी कि हम आपकी उम्मीदों पे खरे उतरें...

सुजॉय - तैलंग जी मुझे और सजीव और हमारे सभी श्रोताओं को इस शुर्कवार का इंतज़ार रहेगा...फिलहाल हम ताजा सुर ताल में आज का दूसरा गीत APKGK से सुनवा देते हैं, ये एक मस्ती भर गीत है जिसे मिका और सूंधी चौहान ने गाया है, "कमीने" के आजा आजा दिल निचोड़े गीत में भी जिस तरह एक मशहूर रोजमर्रा की धुन का सितेमाल किया गया था, इस गीत में भी एक ऐसी धुन को पंच बनाया गया है, जिसके बजते ही शादी का ख़याल जेहन में आ जाता है....

सजीव - सुजॉय....शादी....?

सुजॉय - अरे मैं अपनी नहीं, इस गाने की बात कर रहा था, सुनिए -

ओह बाय गोड (अजब प्रेम की गजब कहानी)
आवाज़ रेटिंग - ***



TST ट्रिविया # 23- किस हालिया फिल्म में मिका ने अभिनय किया है ?

सुजॉय - तैलंग जी, कहते हैं कॉमेडी सबसे मुश्किल कला है. ये भी सुना है की इस तरह की फिल्मों में आर्टिस्ट खुद भी अपनी तरह से इन्नोवेशअंस करते हैं. कैसी टुनिंग होनी चाहिए एक कॉमिक फिल्म में संवाद लेखक और आर्टिस्ट के बीच, और प्रस्तुत फिल्म में आर्टिस्टों के साथ आपका अनुभव कैसा रहा.

तैलंग जी - देखिये सिर्फ कॉमेडी ही क्यों, अच्छा लेख्नन ही मुश्किल काम है चाहे वोः हास्य हो या गंभीर लेखन..आपने सही कहा कि आर्टिस्ट अपनी तरह से प्रस्तुत करते हैं.. लेकिन इसमें सबसे ध्यान देने वाली बात यह है कि यदि कलाकार का योगदान उस दृश्य को या संवाद को बेहतर बना रहा है, तब तो उस योगदान का स्वागत किया जाना चाहिए, अन्यथा लेखन से छेड़छाड़ से जितना बच सको उतना बचना चाहिए. जहाँ तक लेखक और कलाकार के बीच तालमेल का सवाल है, लेखक को इस बात का ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है कि वो जिस कलाकार या चरित्र के लिए संवाद लिख रहा है..वो संवाद उस के लगने चाहिए न कि लेखक के, और जहाँ तक कलाकार का सवाल है.. उसे इस बात का ज्ञान होना बहुत आवश्यक है कि अगर लेखन के कोई शब्द लिखा है तो क्यों लिखा है.. किस शब्द को इस तरह और कितनी अहमियत के साथ बोलना है यह अच्छे कलाकार का गुण है.. बस दोनों इसी बात का ध्यान रख लें तो इस से बढ़िया कोई बात नहीं हो सकती. रणवीर और कैटरीना के साथ मेरा अनुभव बहुत अच्छा रहा, क्योंकि दोनों ही मंझे हुए कलाकार हैं ऊपर से राजकुमार संतोषी जैसे निर्देशक, उनके बारे में कहा जाता है कि वो कलाकार के अन्दर से वो अभिनय निकलवा लेते हैं जिसका ज्ञान खुद उस कलाकार को भी नहीं होता.. मेरे लिए सौभाग्य कि बात है कि मुझे पहली ही फिल्म में इतने बड़े लोगों का साथ मिला..

सजीव - हमारी हिंदी फिल्मों में संगीत अहम् भूमिका अदा करता है. इस फिल्म का संगीत भी इन दिनों काफी हिट हो चुका है, आपकी राय क्या है इस फिल्म के संगीत पर और कौन सा है आपका सबसे पसंदीदा गीत और क्यों ?

तैलंग जी - इसका संगीत वाकई बहुत बढ़िया है, क्योंकि इसमें आधुनिक पीढी का पूरा ध्यान रखा गया है, क्योंकि वही पीढी है जो आज के संगीत को लोकप्रिय बनाते हैं, क्योंकि उनकी संख्या बहुत ज्यादा है इसलिए कोई भी संगीत निर्देशक इस वर्ग को नज़रंदाज़ नहीं कर सकता...लेकिन साथ ही साथ इसमें कहीं कहीं जगह पर सूफियाना अंदाज़ भी है जो संगीत प्रेमियों के दिल को भी छू लेगा... मुझे इसमें "कैसे बताएं दिल को यारा, तू जाने न" बहुत अच्छा लगता है..

सुजॉय - और चलते चलते हिंद युग्म के सभी रचनात्मक लोगों के नाम आपका कोई सन्देश ...

तैलंग जी - देखिये कोई भी भाषा तभी प्रगति कर सकती है जब कि उस को नयी पीढी अपनाए. और नयी पीढ़ी किसी भी चीज़ को तभी अपनाती है जब वोः उसी के नए अंदाज़ में प्रस्तुत कि जाये. हिंदी को भी प्रगति करना है तो उसे पुस्तकालयों कि अलमारियों से निकल कर कंप्यूटर और इन्टरनेट जैसे मंच पे आना होगा. हिंद युग्म को देख के मैं अचंभित हो गया...क्योंकि जब हम इन्टरनेट जैसे माध्यम कि बातें करते हैं तो हमें लगता है कि यहाँ हिंदी का कोई काम नहीं..हिंद युग्म को देख कर एक ख़ुशी मिश्रित आश्चर्य हुआ, कि आपके माध्यम से हिंदी के क्षेत्र में इतना कुछ हो रहा है, यह बहुत ही स्वागत योग्य कदम है...और ये अपने ही देश में उपेक्षित भाषा को लोकप्रिय बनाने का बहुत ही उत्तम प्रयास है. मैं इसकी सराहना करता हूँ. हिंदी मैं आज भी अपार संभावनाएं हैं, व्यावसायिक तौर पर भी और सांस्कृतिक तौर पर भी, आपके माध्यम से नयी नयी प्रतिभाएं उभर कर सामने आएँगी जिनकी हिंदी को बहुत आवश्यकता है. हिन्दयुग्म के सभी रचनात्मक पाठकों को मेरी ओर से शुभ जीवन की शुभकामनायें.

सजीव - तैलंग जी धन्येवाद आपका, चलिए अब हमारे श्रोताओं को हम सुनवाते हैं इस फिल्म से आपकी पसदं का ये गीत -

तू जाने न (अजब प्रेम की गज़ब कहानी)
आवाज़ रेटिंग -***1/2



TST ट्रिविया # 24-प्रीतम की बतौर स्वतंत्र संगीतकार पहली फिल्म कौन सी थी ?

फिल्म के अन्य गीतों को यहाँ सुनें -
तेरा होने लगा हूँ...
मैं तेरा धड़कन तेरी....
अजब प्रेम की गज़ब कहानी संगीत एल्बम को आवाज़ की ओवरऑल रेटिंग ***

आवाज़ की टीम ने इन गीतों को दी है अपनी रेटिंग. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसे लगे? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीतों को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

शुभकामनाएँ....



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

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