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Sunday, March 25, 2012

फिल्म और सुगम संगीत के रंग में रँगी चैती

स्वरगोष्ठी – ६३ में आज

‘यही ठइयाँ मोतिया हेरा गइलीं रामा...’

पिछले अंक में आपने उपशास्त्रीय संगीत के गायक-वादकों के माध्यम से चैती गीतों का आनन्द प्राप्त किया था। आज हम चैती गीतों के, ग्रामोफोन रिकार्ड, फिल्म और सुगम संगीत के अन्य माध्यमों में किये गए प्रयोग पर चर्चा करेंगे।

शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक और फिल्म संगीत की चर्चाओं पर केन्द्रित हमारी-आपकी इस अन्तरंग साप्ताहिक गोष्ठी में मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार पुनः आपका स्वागत करता हूँ। आप सब पाठको/श्रोताओं को शुक्रवार से आरम्भ हुए भारतीय नववर्ष के उपलक्ष्य में हमारी ओर से हार्दिक बधाई। अपने पिछले अंक से हमने चैत्र मास में गायी जाने वाली लोक संगीत की शैली ‘चैती’ पर चर्चा आरम्भ की थी। यूँ तो चैती लोक संगीत की शैली है, किन्तु ठुमरी अंग में ढल कर यह और भी रसपूर्ण हो जाती है। पिछले अंक में हमने आपको शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत के कलाकारों से कुछ चैती गीतों का रसास्वादन कराया था। आज हम आपसे पुराने ग्रामोफोन रिकार्ड और फिल्मों में चैती के प्रयोग पर चर्चा करेंगे।

भारत में ग्रामोफोन रिकार्ड के निर्माण का आरम्भ १९०२ से हुआ था। पहले ग्रामोफोन रिकार्ड में उस समय की मशहूर गायिका गौहर जान की आवाज़ थी। संगीत की रिकार्डिंग के प्रारम्भिक दौर में ग्रामोफोन कम्पनी को बड़ी कठिनाई से गायिकाएँ उपलब्ध हो पातीं थीं। प्रारम्भ में व्यावसायिक गायिकाएँ ठुमरी, दादरा, कजरी, चैती आदि रिकार्ड कराती थीं। १९०२ से गौहर जान ने जो सिलसिला आरम्भ किया था, १९१० तक लगभग ५०० व्यावसायिक गायिकाओं ने अपनी आवाज़ रिकार्ड कराई। इन्हीं में एक किशोर आयु की गायिका अच्छन बाई भी थीं, जिनके गीत १९०८ में ग्रामोफोन कम्पनी ने रिकार्ड किये थे। अच्छन बाई के रिकार्ड की उन दिनों धूम मच गई थी। उस दौर में अच्छन बाई के स्वर में बने रिकार्ड में से आज मात्र तीन रिकार्ड उपलब्ध हैं, जिनसे उनकी गायन-प्रतिभा का सहज ही अनुभव हो जाता है। इन तीन रिकार्ड में से एक में अच्छन बाई ने पुराने अंदाज़ की मोहक चैती गायी थी। आज हम आपको एक शताब्दी से अधिक पुरानी शैली की उसी चैती का रसास्वादन कराते हैं। गायिका ने चैती के एक अन्तरे में उर्दू के शे’र भी कहे हैं।

प्राचीन चैती : ‘कौने बनवा रे फूलेला...’ : स्वर – अच्छन बाई


भारतीय फिल्मों में चैती धुन का प्रयोग तो किया गया है, किन्तु धुन के साथ-साथ अनुकूल साहित्य का प्रयोग कुछ गिनी-चुनी फिल्मों में ही हुआ है। 1963 में मुंशी प्रेमचन्द की कालजयी कृति ‘गोदान’ पर इसी नाम से फिल्म बनी थी। इस फिल्म के संगीतकार विश्वविख्यात सितार वादक पण्डित रविशंकर थे, जिन्होंने फिल्म के गीतों को अवधी और भोजपुरी क्षेत्र की प्रचलित लोकधुनों में निबद्ध किया था। लोकगीतों के विशेषज्ञ गीतकार अनजान ने फिल्म के कथानक, परिवेश और चरित्रों के अनुरूप गीतों की रचना की थी। इन्हीं गीतों में एक चैती गीत भी था, जिसे मुकेश के स्वर में रिकार्ड किया गया था। ग्रीष्म ऋतु के आरम्भिक परिवेश का इस गीत में अत्यन्त आकर्षक चित्रण हुआ है। गीत के बोल हैं- ‘हिया जरत रहत दिन रैन हो रामा...’

आपको यह गीत सुनवाने से पहले हम अपने एक नियमित पाठक-श्रोता पंकज मुकेश द्वारा प्रेषित इस गीत से जुड़े एक रोचक संस्मरण की चर्चा करना चाहते है। फिल्म ‘गोदान’ की अधिकांश शूटिंग वाराणसी के सारनाथ और उसके आसपास के सिंहपुर और हवेलिया गाँव में हुई थी। पंकज जी मूल रूप से सिंहपुर ग्राम के रहने वाले हैं। १९६३ में जब सिंहपुर ग्राम में अभिनेता राजकुमार के साथ इस चैती गीत की शूटिंग चल रही थी तब पंकज जी के पिता राम प्रसाद जी ने अपने ही गाँव में होने वाली पूरी शूटिंग देखी थी। इस गीत के फिल्मांकन के चश्मदीद राम प्रसाद जी ने बताया कि गीत के दौरान अभिनेता राजकुमार, १३ रिटेक देने के बाद किसी प्रकार निर्देशक को सन्तुष्ट कर पाए थे। उन्होने यह भी बताया कि एक अन्तरा- ‘आस अधूरी सूनी डगरिया...’ के फिल्मांकन के दौरान शूटिंग के दर्शकों पर राजकुमार बुरी तरह झुँझला भी गए थे। अपने पिता का यह संस्मरण भेजने के लिए हम पंकज जी को धन्यवाद देते हुए अब आपको फिल्म ‘गोदान’ की यह चैती सुनवाते हैं।

फिल्म – गोदान : ‘हिया जरत रहत दिन रैन...’ : गायक – मुकेश


यह मान्यता है की प्रकृतिजनित, नैसर्गिक रूप से लोक कलाएँ पहले उपजीं, परम्परागत रूप में उनका क्रमिक विकास हुआ और अपनी उच्चतम गुणवत्ता के कारण ये शास्त्रीय रूप में ढल गईं। प्रदर्शनकारी कलाओं पर भरतमुनि का ग्रन्थ- 'नाट्यशास्त्र' को पंचमवेद माना जाता है। नाट्यशास्त्र के प्रथम भाग, पंचम अध्याय के श्लोक ५७ में ग्रन्थकार ने स्वीकार किया है कि लोक जीवन में उपस्थित तत्वों को नियमों में बाँध कर ही शास्त्र प्रवर्तित होता है। श्लोक का अर्थ है- "इस चर-अचर और दृश्य-अदृश्य जगत की जो विधाएँ, शिल्प, गतियाँ और चेष्टाएँ हैं, वह सब शास्त्र रचना के मूल तत्त्व हैं।" चैती गीतों के लोक-रंजक-स्वरुप तथा स्वर और ताल पक्ष के चुम्बकीय गुण के कारण ही उपशास्त्रीय संगीत में यह स्थान पा सका। लोक परम्परा में चैती १४ मात्राओं के चाँचर ताल में गायी जाती है, जिसके बीच-बीच में कहरवा ताल का प्रयोग होता है। पूरब अंग के बोल-बनाव की ठुमरी भी १४ मात्राओं के दीपचन्दी ताल में निबद्ध होती है और गीत के अन्तिम हिस्से में कहरवा की लग्गी का प्रयोग होता है। सम्भवतः चैती के इन्हीं गुणों ने ही उपशास्त्रीय गायक-वादकों को इसके प्रति आकर्षित किया होगा। 


आइए अब हम आपको एक ऐसी चैती सुनवाते हैं, जिसे अपने समय की सुप्रसिद्ध उपशास्त्रीय गायिका निर्मला देवी ने स्वर दिया है। निर्मला देवी ने संगीत-मंचों पर ही नहीं बल्कि फिल्मी पार्श्वगायन के क्षेत्र में भी खूब यश प्राप्त किया था। आज के विख्यात अभिनेता गोविन्दा गायिका निर्मला देवी (आहूजा) के सुपुत्र हैं। उनकी गायी इस चैती में आपको लोक और शास्त्रीय, दोनों रंग की अनुभूति होगी। आप इस मधुर चैती का आनन्द लीजिए और मुझे आज के इस अंक से यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।

चैती : ‘यही ठइयाँ मोतिया हेरा गइलीं रामा...’ : स्वर – निर्मला देवी


आज की पहेली
आज की ‘संगीत-पहेली’ में हम आपको सुनवा रहे हैं, एक भोजपुरी फिल्म ‘बिदेशिया’ से लिये गए चैती गीत का अंश, जिसकी संगीत-रचना संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी ने की थी। संगीत के इस अंश को सुन कर आपको हमारे दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ७०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले पाठक-श्रोता हमारी दूसरी श्रृंखला के ‘विजेता’ होंगे।



१ – संगीत के इस अंश में कौन सी ताल का वादन हुआ है? ताल का नाम बताइए।

२ – यह गीत किस गायिका के स्वर में है? गायिका का नाम बताइए।


आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ६५वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com अथवा admin@radioplaybackindia.com पर भी अपना सन्देश भेज सकते हैं।

आपकी बात

‘स्वरगोष्ठी’ के ६१वें अंक में हमने आपको भारतीय संगीत के दो दिग्गज कलाकारों- उस्ताद विलायत खाँ (सितार) और उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ (शहनाई) की जुगलबन्दी के अन्तर्गत एक चैती धुन का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- सितार और शहनाई तथा दूसरे प्रश्न का उत्तर है- चैती धुन। दोनों प्रश्न का सही उत्तर इन्दौर की क्षिति तिवारी ने और केवल पहले प्रश्न का सही उत्तर पटना की अर्चना टण्डन ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर हार्दिक बधाई। हमारे इस होली अंक के विषय में अनेक संगीतकारों और संगीत-प्रेमियों ने मुक्तकण्ठ सराहना की है। संतूर वादक किरणपाल सिंह, विदुषी स्वरगन्धा शिवकुमार, संगीत शिक्षक विकास तैलंग, संगीत समीक्षक डॉ. मुकेश गर्ग, ध्रुवपद गायक रमाकान्त गुंडेचा सहित मुम्बई के चित्रकार रविशेखर, झारखण्ड के यू.पी. ओझा, मीरजापुर, उ.प्र. के डॉ. पी.के. त्रिपाठी, वाराणसी के अभिषेक मिश्र आदि पाठकों-श्रोताओं ने इस होली अंक को खूब सराहा है। इन सभी संगीतविदों और संगीत-प्रेमियों का हम आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होने ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक को पसन्द किया।

झरोखा अगले अंक का

‘स्वरगोष्ठी’ पर चल रही चैती गीतों की यह श्रृंखला हम अगले अंक में भी जारी रखेंगे। इस अंक में हम आपको चैती गीतों के दूसरे प्रकार- चैता और घाटो पर चर्चा करेंगे। चैती के यह दोनों प्रकार विशुद्ध लोक शैली में प्रस्तुत किये जाते हैं। साथ ही हम इन गीतों के साहित्य पर भी आपसे चर्चा करेंगे। पूर्व की भाँति रविवार की सुबह ९-३० बजे हम आपसे ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में पुनः मिलेंगे। तब तक के लिए हमें विराम लेने की अनुमति दीजिए।

कृष्णमोहन मिश्र

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