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Sunday, July 3, 2016

राग केदार : SWARGOSHTHI – 277 : RAG KEDAR और विदुषी वीणा सहस्त्रबुद्धे को श्रद्धांजलि




स्वरगोष्ठी – 277 में आज

मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन – 10 : जब राज कपूर की आवाज़ बने तलत साहब

‘मैं पागल मेरा मनवा पागल, पागल मेरी प्रीत रे...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ जारी है। श्रृंखला की दसवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का एक बार फिर हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का सहयोग लिया है। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर केन्द्रित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हम मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की चर्चा और फिर उस राग की उदाहरण सहित जानकारी दे रहे हैं। गत 25 जून को हमने मदन मोहन का 93वाँ जन्मदिन मनाया। श्रृंखला की दसवीं कड़ी में आज हम आपको राग केदार के स्वरों में पिरोये गए 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘आशियाना’ से एक सुमधुर गीत का रसास्वादन कराएँगे। इस राग आधारित गीत को स्वर दिया है, तलत महमूद ने। संगीतकार मदन मोहन द्वारा राग केदार स्वरों पर आधारित इस गीत के साथ ही राग का यथार्थ स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी शुभा मुद्गल के स्वरों में राग केदार में निबद्ध तीनताल की एक सुमधुर बन्दिश भी प्रस्तुत कर रहे हैं।


मदन मोहन और तलत महमूद
"हालाँकि संगीत के सिद्धान्तों का ज्ञान और बुनियादी नियमों के बारे में जानना बहुत ज़रूरी है, पर यह ज़रूरी नहीं कि जिस किसी ने भी ये बातें सीख ली वो संगीत में मास्टर बन गया। संगीत को परम्परागत तरीके से किसी गुरु के चरणों में बैठ कर सीखा जाए यह ज़रूरी नहीं। मेरा ख़याल है कि संगीत कानों से भी सीखा जा सकता है अगर किसी में सीखने की मन से आकांक्षा हो तो। संगीत एक ऐसी कला है जिसे अनिच्छुक छात्रों के अन्दर ज़बरदस्ती प्रवेश नहीं कराया जा सकता किसी पाठ्यक्रम के माध्यम से। जो संगीत के लिए पागल है, वही इसमें महारथ हासिल कर सकता है। संगीत के दिग्गजों के साथ काम करने की वजह से मुझे संगीत शिक्षा को करीब से ग्रहण करने और इसे समझने का मौक़ा मिला। बहुत आसानी पर स्पष्ट तरीके से संगीत ने मुझे चारों ओर से जकड़ लिया। मुझे नहीं मालूम कब और कैसे मेरी कानों में संगीत की लहरियाँ प्रतिध्वनित होने लगी जो मैं रोज़ सुना करता था। और इसी तरीक़े से मैंने वास्तव में संगीत सीखा।" मदन मोहन के इन शब्दों का सार हम सब की समझ में आ गया होगा। आइए अब आते हैं आज के गीत पर। आज हमने चुना है तलत महमूद की आवाज़ में राग केदार पर आधारित और ताल कहरवा में निबद्ध फ़िल्म ’आशियाना’ का मशहूर गीत "मैं पागल मेरा मनवा पागल..."। मदन मोहन तलत साहब के ग़ज़ल गायकी से वाक़िफ़ थे और लखनऊ के अपने शुरुआती दिनों से ही एक दूसरे को जानते-पहचानते थे। मदन मोहन के फ़िल्म-संगीत सफ़र के शुरुआती सालों में तलत महमूद ने उनके लिए कई गीत गाए। यह सच है कि जब बाद के वर्षों में रफ़ी साहब की इण्डस्ट्री में बहुत ज़्यादा डिमाण्ड हो गई थी तब तलत साहब को उनकी तुलना में कम गाने मिलने लगे थे, तब फ़िल्म ’जहाँआरा’ के निर्देशक ने फ़िल्म के सभी गीत रफ़ी साहब की आवाज़ में रेकॉर्ड करने का सुझाव मदन मोहन को दिया। पर मदन मोहन इस बात पर अन्त तक अड़े रहे कि तलत इस फ़िल्म में कम से कम तीन गीत ज़रूर गाएँगे और बाक़ी गीत रफ़ी गाएँगे। इस बात पर उन्होंने स्वेच्छा से फ़िल्म छोड़ने का प्रस्ताव तक दे दिया निर्माता को। तब जाकर निर्माता ओम प्रकाश जी ने मदन जी को आश्वस्त किया, और मदन जी ने तलत साहब से "फिर वही शाम...", "तेरी आँख के आँसू..." और "मैं तेरी नज़र का सुरूर हूँ..." गवाया जो तलत साहब के करीअर में भी मील के पत्थर सिद्ध हुए।

तलत महमूद
अब बातें ’आशियाना’ की। 1951 में फ़िल्म ’आँखें’ के संगीत की सफलता ने उसी साल मदन मोहन को जे. बी. एच. वाडिया की एक फ़िल्म दिला दी। फ़िल्म थी ’मदहोश’। इस फ़िल्म ने उनके सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी। मदन जी के ही शब्दों में - "जब मैं ’मदहोश’ पर काम कर रहा था, एक दिन वाडिया साहब हाज़िर हुए एक सिचुएशन के साथ जिसके लिए वो एक प्रभावशाली गीत चाहते थे जो एक धोखा देने वाले प्रेमी के जज़्बात बयाँ करे। राजा मेंहदी अली ख़ाँ फ़िल्म ’मदहोश’ के गीत लिख रहे थे। इस सिचुएशन को सुनते ही उन्होंने कहा कि इस तरह के भाव पर उन्होंने कुछ समय पहले एक गीत लिखा है, अगर सबको ठीक लगे तो यह गीत लिया जा सकता है। उन्होंने अपनी नोटबूक निकाली और गीत पढ़ने लगे। पाँच मिनट में मैंने गीत की धुन तैयार कर दी और वाडिया साहब को सुनाया। वो बहुत ख़ुश हुए और गीत भी बड़ा पॉपुलर हुआ। वह गीत था "मेरी याद में तुम ना आँसू बहाना..."। यह मदन मोहन और तलत महमूद की जोड़ी का पहला सुपरहिट गीत था। इसके बाद "आँसू" शब्द वाले कई तलत-मदन गीत बने। ‘मदहोश’ बनने के अगले ही साल 1952 में बनी फिल्म ’आशियाना’ जिसमें राज कपूर और नरगिस की जोड़ी थी। इस फ़िल्म के संगीत ने मदन मोहन को अव्वल दर्जे के संगीतकारों की श्रेणी में ला खड़ा किया। मदन मोहन के अनुसार यह उनकी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में से एक है और ख़ास तौर से तलत महमूद का गाया "मैं पागल मेरा मनवा पागल..." उनके दिल के बहुत क़रीब है जिसे कम्पोज़ करने में उन्हें पूरा एक महीना लग गया था। संगीत की समझ रखने वाले राज कपूर भी ’आशियाना’ के गीत-संगीत से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कहा, "अगर मेरी फ़िल्मों में सिर्फ़ इस तरह का संगीत हो तो मैं अपनी फ़िल्मों को अनन्तकाल तक थिएटरों में चला सकता हूँ।" भले इस फ़िल्म के संगीत की बहुत तारीफ हुई, पर फ़िल्म बुरी तरह से पिट गई। बहुत वर्षों के बाद जब मदन मोहन की कुछ फ़िल्में दोबारा प्रद्रशित हुईं और अब की बार हिट हुईं, तब उन्हें शीर्ष के संगीतकार का दर्जा लोगों ने दिया। लीजिए, अब आप यही गीत सुनिए।


राग केदार : “मैं पागल मेरा मनवा पागल...” : तलत महमूद : फिल्म – आशियाना


शुभा मुद्गल
भक्तिरस की अभिव्यक्ति के लिए केदार एक समर्थ राग है। कर्नाटक संगीत पद्यति में राग हमीर कल्याणी, राग केदार के समतुल्य है। औड़व-षाड़व जाति, अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में छह स्वरों का प्रयोग होने वाला यह राग कल्याण थाट के अन्तर्गत माना जाता है। प्राचीन ग्रन्थकार राग केदार को बिलावल थाट के अन्तर्गत मानते थे, आजकल अधिकतर गुणिजन इसे कल्याण थाट के अन्तर्गत मानते हैं। इस राग में दोनों मध्यम का प्रयोग होता है। शुद्ध मध्यम का प्रयोग आरोह और अवरोह दोनों में तथा तीव्र मध्यम का प्रयोग केवल अवरोह में किया जाता है। आरोह में ऋषभ और गान्धार स्वर और अवरोह में गान्धार स्वर वर्जित होता है। कभी-कभी अवरोह में गान्धार स्वर का अनुलगन कण का प्रयोग कर लिया जाता है। राग केदार में तीव्र मध्यम आरोह में पंचम के साथ और शुद्ध मध्यम आरोह और अवरोह दोनों में प्रयोग किया जाता है। कभी-कभी अवरोह में धैवत से मध्यम को जाते समय मींड़ के साथ दोनों मध्यम एक साथ प्रयोग किया जाता है। यह प्रयोग रंजकता से परिपूर्ण होता है। राग हमीर के समान राग केदार में कभी-कभी अवरोह में मधुरता बढ़ाने के लिए कोमल निषाद विवादी स्वर के रूप में प्रयोग किया जाता है। राग का चलन वक्र होता है, किन्तु तानों में वक्रता का नियम शिथिल हो जाता है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इस दृष्टि से यह उत्तरांग प्रधान राग होगा, क्योंकि मध्यम स्वर उत्तरांग का और षडज स्वर पूर्वांग का स्वर होता है। मध्यम स्वर का समावेश सप्तक के पूर्वांग में नहीं हो सकता। राग का एक नियम यह भी है कि वादी-संवादी दोनों स्वर सप्तक के एक अंग में नहीं हो सकते। इस दृष्टि से यह राग उत्तरांग प्रधान तथा दिन के उत्तर अंग में अर्थात रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाना चाहिए। परन्तु राग केदार प्रचलन में इसके ठीक विपरीत रात्रि के पहले प्रहर में ही गाया-बजाया जाता है। राग केदार उपरोक्त नियम का अपवाद है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के पहले प्रहर में किया जाता है। राग केदार का स्पष्ट अनुभव करने के लिए अब हम आपको इस राग के स्वरों से अभिसिंचित एक सुमधुर बन्दिश सुनवा रहे हैं। यह खयाल रचना विख्यात गायिका विदुषी शुभा मुद्गल ने प्रस्तुत किया है। शुभा जी से आप तीनताल में निबद्ध राग केदार की यह रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग केदार : “काहे सुन्दरवा बोलो नाहिं...” : विदुषी शुभा मुद्गल




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 277वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक बार पुनः मदन मोहन के राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 280वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका की आवाज़ को पहचान रहे हैं? हमें उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 9 जुलाई, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 279वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 275 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1970 में प्रदर्शित फिल्म ‘दस्तक’ से राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – चारुकेशी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और सितारखानी तीसरे प्रश्न का उत्तर है- पार्श्वगायिका – लता मंगेशकर

इस बार की संगीत पहेली में पाँच प्रतिभागियों ने तीनों प्रश्नों का सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। ये विजेता हैं - वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। सभी पाँच विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

हार्दिक श्रद्धांजलि : विदुषी वीणा सहस्त्रबुद्धे


खयाल, टप्पा और भजन की सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी वीणा सहस्त्रबुद्धे का गत 29 जून को निधन हो गया। उनके निधन से ग्वालियर धराने की गायकी का एक सितारा अस्त हो गया। उनकी गायकी में ग्वालियर घराने के साथ-साथ जयपुर और किराना घराने की गायकी की झलक भी मिलती थी। उनका जन्म 14 सितम्बर 1948 को संगीतज्ञों के परिवार में हुआ था। उनके पिता पण्डित शंकर श्रीपाद बोड़स ग्वालियर घराने के विख्यात संगीतज्ञ और पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर के शिष्य थे। वीणा जी की संगीत-शिक्षा पहले अपने पिता से और बाद में अपने अग्रज पण्डित काशीनाथ बोड़स से प्राप्त हुई। आगे चल कर उन्हें वरिष्ठ संगीतज्ञों, पण्डित बलवन्तराव भट्ट, पण्डित वसन्त ठकार और पण्डित गजाननराव जोशी का मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ। वर्ष 1968 में वीणा जी ने कानपुर विश्वविद्यालय से संगीत, संस्कृत और अँग्रेजी विषय से स्नातक, 1969 में अखिल भारतीय गन्धर्व मण्डल से संगीत में स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण की। आगे चल कर 1979 में उन्होने कानपुर विश्वविद्यालय से संस्कृत में स्नातकोत्तर और 1988 में अखिल भारतीय गन्धर्व मण्डल से डॉक्ट्रेट की उपाधि अर्जित की। 1968 में उनका विवाह श्री हरि सहस्त्रबुद्धे से हुआ। वर्ष 1972 में वीणा जी को आकाशवाणी का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। 1993 में उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से अलंकृत किया गया। 2013 का केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी का पुरस्कार जब भारत के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने उन्हें प्रदान किया, उसी वर्ष वह एक असाध्य रोग से ग्रसित हो गई थीं। उन्हे पुरस्कार समारोह में व्हील चेयर पर ले जाया गया था। इसी रोग से ग्रसित होकर गत 29 जून को उनका निधन हो गया। निधन से लगभग दस दिन पूर्व ‘स्वरगोष्ठी’ के 275वें अंक का प्रकाशन 19 जून को किया गया था, जिसमें वीणा जी के स्वर में राग छायानट में निबद्ध खयाल प्रस्तुत किया गया था। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार विदुषी वीणा सहस्त्रबुद्धे की स्मृतियों को नमन करता है और उन्हे अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।
अगले रविवार को श्रृंखला की एक एक नई कड़ी के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।  

शोध एवं आलेख : सुजॉय चटर्जी 
 प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



Sunday, July 26, 2015

जयन्त और देस मल्हार : SWARGOSHTHI – 229 : JAYANT AND DES MALHAR



स्वरगोष्ठी – 229 में आज

रंग मल्हार के – 6 : राग जयन्त मल्हार और देस मल्हार

‘ऋतु आई सावन की...’ और ‘सावन की रातों में...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी लघु श्रृंखला ‘रंग मल्हार के’। श्रृंखला की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा कर रहे हैं। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत कर रहे हैं। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। श्रृंखला की इस छठी कड़ी में आज हम वर्षा ऋतु के दो ऐसे रागों पर चर्चा करेंगे जो सार्वकालिक राग हैं, किन्तु मल्हार अंग के मेल से इनका सृजन किया गया है। राग जयजयवन्ती एक स्वतंत्र और पूर्ण राग है। मल्हार अंग के मेल से राग जयन्त मल्हार अथवा जयन्ती मल्हार का सृजन होता है। इसी प्रकार राग देस और मल्हार का मेल होता है तो यह देस मल्हार कहलाता है। आज के अंक में हम इन्हीं दो रागों पर चर्चा करेंगे और इनमें पगी कुछ रचनाओं का आस्वादन भी करेंगे।

र्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों में राग जयन्त मल्हार या जयन्ती मल्हार एक प्रमुख राग है। राग के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि यह राग जयजयवन्ती और मल्हार अंग के मेल से बनता है। वैसे राग जयजयवन्ती स्वतंत्र रूप से भी वर्षा ऋतु के परिवेश को रचने में समर्थ है। परन्तु जब राग जयजयवन्ती के साथ मल्हार अंग का मेल हो जाता है तब इस राग से अनुभूति और अधिक मुखर हो जाती है। यह काफी थाट का राग माना जाता है। इसमें दोनों गान्धार और दोनों निषाद का प्रयोग होता है। इसका वादी ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। राग के आरोह के स्वर हैं- सा, रे प, म प नि(कोमल) ध नि सां, तथा अवरोह के स्वर हैं- सां ध नि(कोमल) म प, प म ग रे (कोमल) रे सा। इसराज और मयूरवीणा के सुप्रसिद्ध वादक पं. श्रीकुमार मिश्र के अनुसार राग जयन्त मल्हार के दोनों रागों का कलात्मक और भावात्मक मिश्रण क्लिष्ट व विशेष प्रक्रिया है। पूर्वांग में जयजयवन्ती का करुण व विनयपूर्ण भक्तिभाव परिलक्षित होता है, जबकि उत्तरांग में मियाँ की मल्हार, वर्षा के तरल भावों के साथ समर्पित, पुकारयुक्त व आनन्द से परिपूर्ण भावों का सृजन करने में सक्षम होता है। इस राग में मध्यलय की रचनाएँ अच्छी लगती हैं। आपको सुनवाने के लिए हमने राग जयन्त मल्हार की एक प्राचीन किन्तु मोहक बन्दिश का चयन किया है। अपने समय के बहुआयामी संगीतज्ञ पण्डित विनायक राव पटवर्धन ने इस रचना को स्वर दिया है। पण्डित पटवर्धन ने न केवल रागदारी संगीत के क्षेत्र में, बल्कि सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर में अपना अनमोल योगदान किया था। लीजिए, राग जयन्त मल्हार की तीनताल में निबद्ध यह रचना आप भी सुनिए।


राग जयन्त मल्हार : ‘ऋतु आई सावन की...’ : पण्डित विनायक राव पटवर्धन




आज हम राग जयन्त मल्हार पर आधारित एक मोहक फिल्मी गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। यह गीत 1976 में प्रदर्शित फिल्म ‘शक’ से लिया गया है। विकास देसाई और अरुणा राजे द्वारा निर्देशित इस फिल्म के संगीत निर्देशक बसन्त देसाई थे। बसन्त देसाई ने मल्हार अंग के रागों पर आधारित सर्वाधिक गीतों की रचना की थी। इस श्रृंखला में बसन्त देसाई द्वारा संगीतबद्ध किया यह तीसरा गीत है। ‘शक’ जिस दौर की फिल्म है, उस अवधि में बसन्त देसाई का रुझान फिल्म संगीत से हट कर शिक्षण संस्थाओं में संगीत के प्रचार-प्रसार की ओर अधिक हो गया था। फिल्म संगीत का मिजाज़ भी बदल गया था। परन्तु बसन्त देसाई ने बदले हुए दौर में भी अपने संगीत में रागों का आधार नहीं छोड़ा। फिल्म ‘शक’ उनकी अन्तिम फिल्म साबित हुई। फिल्म के प्रदर्शित होने से पहले ही एक लिफ्ट दुर्घटना में उनका असामयिक निधन हो गया। राग जयन्ती अथवा जयन्त मल्हार के स्वरों पर आधारित फिल्म ‘शक’ का जो गीत हम सुनवाने जा रहे हैं, उसके गीतकार हैं गुलज़ार और इस गीत को स्वर दिया है आशा भोसले ने। आइए सुनते हैं यह रसपूर्ण गीत।


राग जयन्त मल्हार : ‘मेहा बरसने लगा है आज...’ : आशा भोसले : फिल्म – शक




आज का दूसरा राग देस मल्हार है। राग देस, भारतीय संगीत का अत्यन्त मनोरम और प्रचलित राग है। प्रकृति का सजीव चित्र उपस्थित करने में यह पूर्ण सक्षम राग है। यदि इस राग में मल्हार अंग का मेल हो जाए तो फिर 'सोने पर सुहागा' हो जाता है। आज हम आपको राग देस मल्हार का संक्षिप्त परिचय देते हुए इस राग पर आधारित फिल्म ‘प्रेमपत्र’ का एक गीत लता मंगेशकर और तलत महमूद की आवाज़ में प्रस्तुत करेंगे। राग देस मल्हार के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि यह स्वतंत्र राग देस और मल्हार अंग के मेल से निर्मित राग है। राग देस अत्यन्त प्रचलित और सार्वकालिक होते हुए भी स्वतंत्र रूप से वर्षा ऋतु के परिवेश का चित्रण करने में समर्थ है। एक तो इस राग के स्वर संयोजन ऋतु के अनुकूल है, दूसरे इस राग में वर्षा ऋतु का चित्रण करने वाली रचनाएँ बहुत अधिक संख्या में मिलती हैं। राग देस औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है, जिसमें कोमल निषाद के साथ सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग होता है। राग देस मल्हार में देस का प्रभाव अधिक होता है। दोनों का आरोह-अवरोह एक जैसा होता है। इसमे दोनों गान्धार और दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। रें नी(कोमल) ध प, ध म ग रे स्वरों से देस की झलक मिलती है। इसके बाद जब रे प (कोमल) (कोमल) म रे सा और उत्तरांग में म प नी(कोमल) (ध) नी सां के प्रयोग से राग मियाँ मल्हार की झलक मिलती है। मल्हार अंग के चलन और म रे प, रे म, स रे स्वरों के अनेक विविधता के साथ किये जाने वाले प्रयोग से राग विशिष्ट हो जाता है। राग देस की तरह राग देस मल्हार में भी कोमल गान्धार का अल्प प्रयोग किया जाता है। राग का यह स्वरुप पावस के परिवेश को जीवन्त कर देता है। परिवेश की सार्थकता के साथ यह मानव के अन्तर्मन में मिलन की आतुरता को यह राग बढ़ा देता है।

राग देस मल्हार पर आधारित आज प्रस्तुत किया जाने वाला फिल्मी गीत हमने 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘प्रेमपत्र’ से लिया है। फिल्म के संगीतकार सलिल चौधरी थे, जिनके आजादी से पहले के संगीत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष का स्वर मुखरित होता था तो आजादी के बाद सामाजिक और आर्थिक शोषण के विरुद्ध आवाज़ बुलन्द हुआ करता था। सलिल चौधरी भारतीय शास्त्रीय संगीत, बंगाल और असम के लोक संगीत के जानकार थे तो पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत का भी उन्होंने गहन अध्ययन किया था। उनके संगीत में इन संगीत शैलियों का अत्यन्त सन्तुलित और प्रभावी प्रयोग मिलता है। आज प्रस्तुत किये जाने वाले गीत- ‘सावन की रातों में ऐसा भी होता है...’ में उन्होने राग देस मल्हार के स्वरों का प्रयोग कर उन्होंने राग के स्वरुप का सहज और सटीक चित्रण किया है। इस गीत को परदे पर अभिनेत्री साधना और नायक शशि कपूर पर फिल्माया गया है। फिल्म के निर्देशक हैं विमल रोंय, गीतकार हैं गुलज़ार तथा झपताल में निबद्ध गीत को स्वर दिया है लता मंगेशकर और तलत महमूद ने। इस गीत में सितार का अत्यन्त मोहक प्रयोग किया गया है। लीजिए आप इस गीत का आनन्द लीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम सेने की अनुमति दीजिए।


राग देस मल्हार : ‘सावन की रातों में...’ : लता मंगेशकर और तलत महमूद : फिल्म - प्रेमपत्र





संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 229वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्षा ऋतु में ही गाये जाने वाले एक विशेष शैली के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इस गीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 230 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा। 



1 – गीत के इस अंश को सुन कर बताइए कि यह भारतीय संगीत की कौन सी शैली है?

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गायिका की आवाज़ को पहचान सकते हैं? यदि हाँ, तो उनका नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 1 अगस्त, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 231वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 227वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको भारतीय संगीत के यशस्वी गायक उस्ताद अमीर खाँ के कण्ठ-स्वर में राग रामदासी मल्हार के खयाल का एक अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग रामदासी मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल द्रुत तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक उस्ताद अमीर खाँ। 

इस बार की पहेली में आपको राग रामदासी मल्हार का अंश सुनवाया गया था। राग रामदासी और मीरा मल्हार में बहुत समानता होती है। दोनों रागों के थाट, जाति, वादी और संवादी स्वर समान होते हैं। राग मीरा मल्हार में दोनों गान्धार, दोनों धैवत और दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है, जबकि रामदासी मल्हार में दोनों गान्धार और दोनों निषाद के साथ केवल शुद्ध धैवत स्वर का प्रयोग किया जाता है, शेष सभी स्वर दोनों रागों में समान होते हैं। इस कारण पहेली के जिस प्रतिभागी ने राग की पहचान मीरा मल्हार के रूप में की है, उस उत्तर को भी हमने सही माना है। सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं, पेंसिवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और जबलपुर से क्षिति तिवारी। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। 


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी लघु श्रृंखला ‘रंग मल्हार के’ जारी है। अगले अंक में हम वर्षा ऋतु में गायी जाने वाली एक विशेष शैली का परिचय और गीत प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए आप अपने पसन्द के गीत, संगीत और राग की फरमाइश कर सकते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




Saturday, November 8, 2014

इसकी टोपी उसके सर - प्रसिद्ध ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड कलेक्टर वी. एस. दत्ता बता रहे हैं पुराने ज़माने के कुछ इन्स्पायर्ड गीतों के बारे में




स्मृतियों के स्वर - 12

प्रसिद्ध ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड कलेक्टर वी. एस. दत्ता बता रहे हैं पुराने ज़माने के कुछ इन्स्पायर्ड गीतों के बारे में

इसकी टोपी उसके सर





'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों से साक्षात्कार करवाये जाते थे और जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत के इन हस्तियों की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकिया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर, महीने के हर दूसरे और चौथे शनिवार को इसी ख़ज़ाने में से मैं निकाल लाता हूँ कुछ अनमोल मोतियाँ हमारे इस स्तम्भ में, जिसका शीर्षक है - स्मृतियों के स्वर। इस स्तम्भ के अन्तर्गत हम और आप साथ मिल कर गुज़रते हैं स्मृतियों के इन हसीन गलियारों से। आज हम आपकी मुलाक़ात करवा रहे हैं प्रसिद्ध ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड कलेक्टर वी. एस. दत्ता से। दत्ता साहब बता रहे हैं गुज़रे ज़माने के कुछ ऐसे मशहूर गीतों के बारे में जो प्रेरित थे अन्य फ़िल्मी गीतों से ही। यानी कि इसकी टोपी उसके सर। आनन्द लीजिये, ऐसे गीतों के साथ।





सूत्र: जुबिली झंकार, विविध भारती, 3 सितंबर 2008


1. "लेके पहला पहला प्यार, भरके आँखों में ख़ुमार..." (सी.आई.डी. 1956)

देखिये, यह तो नौशाद साहब ने आपको 'विविध भारती' में ही बताया था कि वो जो गाना है "जादू नगरी से आया है कोई जादूगर", उसकी ट्यून मेरे गीत से नकल की हुई है। वह जो एक उनकी फ़िल्म आयी थी 'नमस्ते', शायद 1943 में, उसमें एक गाना था "दिल ना लगे मोरा, जिया ना लगे, मन ना लगे, नेक-टाई वाले बाबू को बुलाते कोई रे..."। इस गीत की धुन हू-ब-हू "जादू नगरी से आया है कोई जादूगर" जैसा है। तो यह 'नमस्ते' फ़िल्म आई थी 1942-43 में, और 'CID' आयी थी 1956 में, यानी इसके 13 साल बाद। तो नय्यर साहब ने नौशाद की धुन को उठा लिया। लीजिए, पहले आप फिल्म सी. आई. डी. का और फिर फिल्म 'नमस्ते' का गाना सुनिए। 


फिल्म - सी. आई. डी. : 'लेके पहला पहला प्यार भरके आँखों में खुमार...' : शमशाद बेगम और मोहम्मद रफी : संगीत - ओ. पी. नैयर




फिल्म - नमस्ते : 'दिल न लगे मोरा जिया न लगे...' : संगीत - नौशाद : गीत - दीनानाथ मधोक




2. "आये भी अकेला जाये भी अकेला" (दोस्त, 1954)

तलत महमूद साहब का फ़िल्म 'दोस्त' का गीत "आये भी अकेला जाये भी अकेला, दो दिन की ज़िन्दगी है दो दिन का मेला" एक बहुत मशहूर गीत है, आपने सुना होगा। हंसराज बहल का संगीत था। इसका जो है पंजाबी फ़िल्म 'लच्छी' (1949) से लिफ़्ट किया गया था। सिर्फ़ धुन ही नहीं बल्कि बोल भी। और 'लच्छी' में जो है इसको मोहम्मद रफ़ी साहब ने गाया था, और बेहतरीन गाना था, "जगवाला मेला यारों थोड़ी देर दा, हँस दे या रात लंगी पता नहीं सवेर दा..."। यह गाना पीछे रह गया और वह गाना आगे निकल गया। यह संगीतकार शार्दूल क्वात्रा के करीयर का शुरुआती गीत था; उस समय वो हंसराज बहल साहब के सहायक हुआ करते थे। मतलब बहल साहब ने अपने सहायक की धुन को बाद में इस्तेमाल किया अपने गीत में। कहा जाता है कि एक बार हंसराज बहल बम्बई से बाहर गये थे, तब गीतकार नाज़िम पानीपती ने क्वात्रा को एक गीत की धुन बनाने को कहा, और तभी उन्होंने इस गीत की धुन बनाई थी। अब आप इन इन दोनों गीतों को सुनिए।


फिल्म - दोस्त : 'आए भी अकेला जाए भी अकेला...' : तलत महमूद : संगीत - हंसराज बहल




फिल्म - लच्छी (पंजाबी) : 'जगवाला मेला यारों थोड़ी देर दा...' : मोहम्मद रफी : संगीत शार्दूल क्वात्रा 


 
3. "ख़ुशी का ज़माना गया रोने से अब काम है" (छोटी भाभी, 1950)

इसी तरह से और भी गाने थे जो पंजाबी में थे। एक गाना था जिसे नूरजहाँ ने गाया था, "हूक मेरी क़िस्मत सो गई जागो हुज़ूर रे...", इसे फिर फ़िल्म 'छोटी भाभी' में हुस्नलाल-भगतराम ने लिफ़्ट किया और बना दिया "ख़ुशी का ज़माना गया रोने से अब काम है, प्यार इसका नाम था जुदाई इसका नाम है..." जिसे रफ़ी साहब और लता जी ने गाया। तो ऐसे लोग धुन एक दूसरे की लिफ़्ट करते आये हैं और यह परम्परा आज भी जारी है। नूरजहाँ का गाया गीत उपलब्ध नहीं पाया है, फ़िल्म 'छोटी भाभी' का गीत अब आप सुनें।


फिल्म - छोटी भाभी : 'खुशी का जमाना गया रोने से अब काम है...' : मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर : संगीत - हुस्नलाल भगतराम 



4. "तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा" (आख़िरी दाव, 1958)

आज इसको लेकर काफ़ी चर्चा होती है, कानून तक में जाने की भी बात भी होती रहती है, लेकिन उस वक़्त तो कितना अनायास होता था और इस बात को लेकर कोई किसी से कुछ कहता तक नहीं था। पर एक गाना था जिसके लिफ़्ट करने पर सज्जाद हुसैन काफ़ी बिगड गये थे मदन मोहन पर। तलत महमूद का जो गाना था ना "ये हवा ये रात ये चांदनी", फ़िल्म 'संगदिल' का, इसके आधार पर मदन मोहन साहब ने गाना बना दिया "तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा...", इसमें क्या हुआ कि सज्जाद साहब जिन्होंने "ये हवा ये रात" बनाया था, वो बिगड़ गये थे मदन मोहन पे, "तुमने कैसे मेरे गाने से लिफ़्ट किया?" मदन मोहन ने कहा कि हुज़ूर, मैंने सोचा कि उसी धुन को थोड़ा सा बदलकर देखें तो कैसा लगेगा। पर उसके बाद मदन मोहन ने कहा कि मैंने ऐसी गुस्ताख़ी फिर कभी नहीं की।


फिल्म - आखिरी दाव : 'तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा...' मोहम्मद रफी : संगीत - मदन मोहन : गीत मजरूह सुल्तानपुरी




फिल्म - संगदिल : 'ये हवा ये रात ये चाँदनी...' : तलत महमूद : संगीत - सज्जाद हुसैन



5. "हमारी गली आना" (मेमसाहिब, 1956)

एक 'शुक्रिया' फ़िल्म आयी थी, जिसमें एक गाना था "हमारी गली आना अच्छा जी, हमें ना भुलाना अच्छा जी...", जिसे बाद में 'मेमसाहिब' फ़िल्म में तलत महमूद और आशा भोसले ने गाया। इसको 'मेमसाहिब' में बिल्कुल सेम टू सेम लिफ़्ट किया गया है संगीतकार मदन मोहन ने। लेकिन ऑरिजिनल 'शुक्रिया' फ़िल्म का गाना था, पुराना, 1944 की फ़िल्म, जिसमें रमोला हीरोइन थीं, पर वह वाला गाना हिट नहीं हो पाया। इसके संगीतकार थे जी. ए. चिश्ती। इन दोनों गीतों को आप सुनिए और अन्तर खोजिए।


फिल्म - मेमसाहिब : 'हमारी गली आना अच्छा जी...' : तलत महमूद और आशा भोसले : संगीत - मदन मोहन 




फिल्म - शुक्रिया : 'हमारी गली आना अच्छा जी...' : नसीम अख्तर और अमर : संगीत - जी.ए. चिश्ती 




कॉपीराइट: विविध भारती



तो दोस्तों, आज बस इतना ही। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आयी होगी। अगली बार ऐसे ही किसी स्मृतियों की गलियारों से आपको लिए चलेंगे उस स्वर्णिम युग में। तब तक के लिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार! इस स्तम्भ के लिए आप अपने विचार और प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में व्यक्त कर सकते हैं, हमें अत्यन्त ख़ुशी होगी।


प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 





Sunday, May 25, 2014

तालवाद्य घटम् पर एक चर्चा


स्वरगोष्ठी – 169 में आज

संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला – 7

एक सामान्य मिट्टी का घड़ा, जो लोक मंच के साथ ही शास्त्रीय मंच पर भी सुशोभित हुआ 



 
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी ‘संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला’ की सातवीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, अपने साथी स्तम्भकार सुमित चक्रवर्ती के साथ सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ कम प्रचलित, लुप्तप्राय अथवा अनूठे संगीत वाद्यों की चर्चा कर रहे हैं। वर्तमान में शास्त्रीय या लोकमंचों पर प्रचलित अनेक वाद्य हैं जो प्राचीन वैदिक परम्परा से जुड़े हैं और समय के साथ क्रमशः विकसित होकर हमारे सम्मुख आज भी उपस्थित हैं। कुछ ऐसे भी वाद्य हैं जिनकी उपयोगिता तो है किन्तु धीरे-धीरे अब ये लुप्तप्राय हो रहे हैं। इस श्रृंखला में हम कुछ लुप्तप्राय और कुछ प्राचीन वाद्यों के परिवर्तित व संशोधित स्वरूप में प्रचलित वाद्यों का भी उल्लेख कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे एक ऐसे लोकवाद्य पर चर्चा करेंगे जो अवनद्ध वर्ग का वाद्य है और संगीत में ताल देने के लिए उपयोग किया जाता है। एक सामान्य मिट्टी का घड़ा पहले लोकवाद्य के रूप में ही प्रयोग किया जाता था, किन्तु कुछ कलासाधकों की साधना के बल पर आज ‘घटम्’ के रूप में शास्त्रीय मंचों पर प्रतिष्ठित है। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हमारे साथी सुमित चक्रवर्ती इस अनूठे तालवाद्य पर चर्चा कर रहे हैं। 
 



भारतीय संगीत में ताल की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण मानी गयी है। ताल किसी भी तालवाद्य से निकलने वाली ध्वनि का वह समयबद्ध चक्र है जो किसी भी गीत अथवा राग को गाते समय गायक को सुर लगाने के सही समय का बोध कराता है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में जहाँ कुछ ताल बहुत सहज हैं वहीं कुछ ताल बहुत ही जटिल भी हैं। तालों के लिए कई प्रकार के वाद्‍यों का प्रयोग किया जाता है, जिनमें तबला, ढोलक, पखावज, मृदंगम्, घटम्, आदि कुछ सर्वाधिक प्रचलित नाम हम सब जानते हैं।
घटम् मूलतः दक्षिण भारत के कर्नाटक संगीत में प्रयोग किया जाने वाला तालवाद्य है। राजस्थान के लोक संगीत में इसी के दो अनुरूप मड्गा तथा सुराही के नामों से प्रचलित हैं। यह एक मिट्टी का बरतन है जिसे वादक अपनी उँगलियो, अँगूठे, हथेलियों व हाथ के किनारों से घड़े के बाहरी सतह पर प्रहार कर बजाते हैं। इसके मुख पर खुले हाथों से प्रहार कर गूँज की ध्वनि उत्पन्न की जाती है जिसे 'गुमकी' कहते हैं। कभी-कभी वादक कलाकार घड़े के मुख को अपने नग्न पेट दबाकर एक गहरी गुमकी की ध्वनि भी उत्पन्न करते हैं। घटम् के अलग-अलग हिस्सों पर प्रहार करने पर भिन्न-भिन्न ध्वनियाँ उत्पन्न की जाती हैं। वर्तमान में देश के सबसे लोकप्रिय घटम वादक टी.एच. विक्कु विनायकराम हैं। इनके व्यक्तित्व और कृतित्व की चर्चा से पहले आइए, इनका घटम् वादन सुनते हैं। इस प्रस्तुति में विक्कु जी तालमाला का वादन कर रहे हैं।


घटम् वादन : तालमाला : वादक - टी.एच. विक्कु विनायकराम




वर्तमान में सबसे प्रसिद्ध घटम् वादकों में सबसे पहला नाम आता है, श्री थेटकुड़ी हरिहर विनायकराम का, जिन्हें संगीतप्रेमी प्यार से विक्कु विनायकराम कह कर सम्बोधित करते हैं। इस अनोखे तालवाद्य की कला को बचाने, शिखर तक पहुँचाने तथा इसे विश्वप्रसिद्ध करने में इनका योगदान उल्लेखनीय है। विक्कु जी का जन्म सन् 1942 में तत्कालीन मद्रास में हुआ था। उनके पिता श्री कलईमणि टी.आर. हरिहर शर्मा प्रसिद्ध संगीतज्ञ तथा संगीत के प्राध्यापक थे। विक्कु जी ने सात वर्ष की अल्पायु में ही घटम् वादन का प्रशिक्षण प्रारम्भ कर दिया था। 1955 में रामनवमी उत्सव के दौरान मात्र 13 वर्ष की आयु में उन्होने अपना आरंगेत्रम (प्रथम सार्वजनिक प्रस्तुति) दिया था। इस आरंगेत्रम से सम्बन्धित एक रोचक घटना भी जुड़ी है, वह यह कि जब विक्कु अपना अरंगेत्रम देने मंच पर जा रहे थे, तब गणेश नामक एक बच्चे ने उनका घटम् तोड़ दिया। इस घटना को वे आज भी अपने करियर के लिए शुभ मानते हैं। उन्होंने स्वयं को इतनी कम उम्र में इस प्रकार सिद्ध कर दिया कि शीघ्र ही वे एम. बालमुरलीकृष्ण, जी.एन. बालासुब्रह्मणियम, मदुरई मणि अय्यर और एम.एस. शुभलक्ष्मी जैसे कर्नाटक संगीत के दिग्गजों के साथ वादन करने लगे। विक्कु जी का अन्तर्राष्ट्रीय सफ़र शुरु हुआ 70 के दशक में कोलम्बिया (अमेरिका) से, जहाँ 'शक्ति' नामक बैण्ड से जुड़े जिसमें मुख्य सदस्य थे जॉन मक्लॉफ़्लिन तथा उस्ताद ज़ाकिर हुसैन। इसके बाद उनकी ख्याति में और वृद्धि हुई वर्ष 1992 में जब उन्हें 'प्लैनेट ड्रम' नामक एक अन्तर्राष्ट्रीय संगीत अल्बम के लिए विश्व के सर्वाधिक प्रतिष्ठित 'ग्रेमी पुरस्कार' से सम्मानित किया गया।
 
तालवाद्य के रूप में घड़े अथवा घटम् का प्रयोग 40 और 50 के दशक की एकाध फिल्मों में किया गया था। फिल्मी गीतों में घड़े का सम्भवतः सबसे पहला प्रयोग संगीतकार नौशाद ने 1942 में प्रदर्शित ए.आर. कारदार की फिल्म 'शारदा' के एक गीत- 'पंछी जा पीछे रहा है बचपन मेरा...' में किया था। यह गीत सुरैया ने गाया था। आगे चल कर अभिनेत्री और पार्श्वगायिका बेबी सुरैया का पदार्पण 1942 में कारदार की बनाई दो फिल्मों से हुआ था। इनमें पहली फिल्म 'नई दुनिया' और दूसरी 'शारदा' थी। इसी प्रकार 1955 में प्रदर्शित फिल्म ‘बारादरी’ के एक गीत में ताल के लिए घड़े का अत्यन्त प्रभावी उपयोग किया गया था। संगीतकार नाशाद का संगीतबद्ध यह लोकप्रिय गीत तलत महमूद की आवाज़ में है। गीत के बोल हैं- 'तस्वीर बनाता हूँ तस्वीर नहीं बनती...’। राग पहाड़ी का स्पर्श लिये इस गीत में घड़े के माध्यम से कहरवा ताल का अनूठा सृजन किया गया है। आप इस गीत का आनन्द लीजिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने अनुमति दीजिए।



फिल्म – बारादरी : ‘तस्वीर बनाता हूँ, तस्वीर नहीं बनती...’ : तलत महमूद : संगीत – नाशाद 





आज की पहेली


 ‘स्वरगोष्ठी’ के 169वें अंक की संगीत पहेली में आज आपको लोक संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 170वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत के इस अंश को सुन कर इस स्वरवाद्य को पहचानिए और हमें उसका नाम लिख भेजिए।

2 – यह किस प्रदेश का लोक संगीत है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 171वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 167वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1954 में प्रदर्शित फ़िल्म 'नागिन' के एक बेहद लोकप्रिय गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- बीन अथवा पुंगी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- फिल्म नागिन। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी और चंडीगढ़ के हरकीरत सिंह ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’के मंच पर जारी श्रृंखला ‘संगीत वाद्य परिचय’ के अन्तर्गत आज हमने आपका परिचय एक अनूठे तालवाद्य ‘घटम्’ से कराया। अगले अंक में हम आपसे एक और लोकवाद्य पर चर्चा करेंगे। आप भी यदि ऐसे किसी संगीत वाद्य की जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पते पर भेज दें। अपने पाठको / श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित / प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।  



आलेख : सुमित चक्रवर्ती 
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Tuesday, March 6, 2012

६ मार्च- आज का गाना


गाना: अंधे जहान के अंधे रास्ते


चित्रपट:पतिता
संगीतकार:शंकर - जयकिशन
गीतकार:शैलेन्द्र
स्वर: तलत महमूद





अंधे जहान के अंधे रास्ते, जाएं तो जाएं कहाँ
दुनिया तो दुनिया, तू भी पराया, हम यहाँ ना वहाँ

जीने की चाहत नहीं, मर के भी राहत नहीं
इस पार आँसू, उस पार आहें, दिल मेरा बेज़ुबां
अंधे जहान के ...

हम को न कोई बुलाए, ना कोई पलकें बिछाए
ऐ ग़म के मारों, मंज़िल वहीं है, दम ये टूटे जहाँ
अंधे जहान के ...

आग़ाज़ के दिन तेरा अंजाम तय हो चुका
जलते रहें हैं, जलते रहेंगे, ये ज़मीं आसमां
अंधे जहान के ...



Monday, July 19, 2010

जीवन है मधुबन....इस गीत की प्रेरणा है मशहूर के सरा सरा गीत की धुन

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 442/2010/142

अंग्रेज़ी में एक कहावत है - "1% inspiration and 99% perspiration makes a man successful". अर्थात् परिश्रम के मुक़ाबले प्रेरणा को बहुत कम महत्व दिया गया है। यह कहावत दूसरे क्षेत्रों में भले ही कारगर साबित हो, लेकिन जहाँ तक फ़िल्म संगीत के क्षेत्र में ज़्यादातर ऐसा देखा गया है कि विदेशी धुनों से प्रेरीत गीत जल्दी ही लोगों की ज़ुबान पर चढ़ जाते हैं, यानी कामयाब हो जाते हैं। इन गीतों में उपर्युक्त कहावत की सार्थकता दूर दूर तक नज़र नहीं आता। लेकिन हमारे फ़िल्म जगत में कुछ बहुत ही गुणी संगीतकार भी हुए हैं, जिन्होने अपने संगीत सफ़र में विदेशी धुनों का ना के बराबर सहारा लिया और अगर एक आध गीतों में लिया भी है तो उनमें उन्होने अपना भी भरपूर योगदान दिया और उसका पूरी तरह से भारतीयकरण कर दिया, जिससे कि गीत बिलकुल देसी बन गया। ऐसे ही एक बेहद प्रतिभावान संगीतकार रहे अनिल बिस्वास, जिन्हे फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के संगीतकारों का भीष्म पितामह भी कहा जाता है। युं तो अनिल दा के गानें मुख्य रूप से भारतीय शास्त्रीय संगीत और देश के विभिन्न प्रांतों के लोक संगीत पर आधारित रहा है, लेकिन कम से कम एक गीत उनका ऐसा ज़रूर है जिसमें उन्होने भी एक विदेशी मूल धुन का सहारा लिया। आज 'गीत अपना धुन पराई' शृंखला में अनिल दा के उसी गीत की बारी। यह गीत है फ़िल्म 'जासूस' का, जिसके बोल हैं "जीवन है मधुबन, तू इसमें फूल खिला, कांटों से ना भर दामन, अब मान भी जा"। तलत महमूद की मख़मली आवाज़ और गीतकार हैं इंदीवर। और जिस विदेशी धुन से यह गीत प्रेरीत है वह है डॊरिस डे का मशहूर गीत "के सरा सरा सरा सरा व्हाटेवर विल बी विल बी (que sera sera sera sera whatever will be will be)"| अमीन सायानी साहब ने एक बार इस गीत के बारे में यह कहा था कि अनिल बिस्वास ने अपनी एक धुन एक वेस्टर्ण हिट गीत की धुन के आधार पर ज़रूर बनाई थी फ़िल्मी दुनिया को यह बताने के लिए कि किसी और धुन से प्रेरणा पाना चाहो तो भई पाओ मगर सीधी कॊपी ना करो, जैसे कि आज खुले-आम हो रहा है। फ़िल्म 'जासूस' सन् १९५७ की एक कम बजट की फ़िल्म थी जिसके मुख्य कलाकार थे कामरान, नीरू और कुमकुम, और फ़िल्म के निर्देशक थे आर. डी. राजपूत।

आइए आपको "के सरा सरा" गीत के बारे में कुछ बताया जाए। यह गीत पहली बार पब्लिश हुआ था सन् १९५६ में जिसे लिखा था जे लिविंग्स्टन और रे ईवान्स की टीम ने। इस गीत को पहली बार इस्तेमाल किया गया था १९५६ की ही ऐल्फ़्रेड हिचकॊक की फ़िल्म 'दि मैन हू न्यु टू मच' में जिसके मुख्य कलाकार थे डॊरिस डे और जेम्स स्टीवार्ट। डॊरिस ने यह गीत गाया था जिसे कोलम्बिआ रेकार्ड्स ने जारी किया था। यह गीत बेहद मक़बूल हुआ, अमेरिका में भी और इंगलैण्ड में भी। इस गीत को १९५६ में सर्वश्रेष्ठ मौलिक गीत का 'अकाडेमी अवार्ड', यानी कि ऒस्कर मिला था। इस धुन का इस्तेमाल १९६८ से लेकर १९७३ तक डॊरिस डे की कॊमेडी शो 'दि डॊरिस डे शो' के थीम सॊंग् के रूप में किया गया था। लिविंग्स्टन और ईवान्स का यह तीसरा ऒस्कर था, इससे पहले इन्होने १९४८ और १९५० में यह पुरस्कार जीता था। इस फ्रेज़ "के सरा सरा" की मूल भाषा को लेकर थोड़ा सा संशय है। वैसे तो ये स्पैनिश बोल हैं, लेकिन व्याकरण के लिहाज से स्पैनिश नहीं हो सकते। कहते हैं कि लिविंग्स्टन ने १९५४ की फ़िल्म 'दि बेयरफ़ूट कण्टेसा' देखी, जिसमें एक इटालियन परिवार का मोटो होता है "Che sarà sarà" जो एक पत्थर पर खुदाई किया रहता है उनकी पुरानी पूर्वजों की हवेली में। तभी लिविंग्स्टन ने यह फ़्रेज़ नोट कर लिया था और फिर स्पैनिश के अक्षरों में इसे परिवर्तित कर दिया। तो दोस्तों, ये तो थी "के सरा सरा" के बारे में जानकारी। आपको फ़िल्म 'पुकार' में माधुरी दीक्षित और प्रभुदेवा पर फ़िल्माया गीत भी याद आ ही गया होगा अब तक! उस गीत में और अनिल दा के इस गीत में ज़मीन आसमान का अंतर है। लीजिए आप ख़ुद ही सुनिए और महसूस कीजिए।



क्या आप जानते हैं...
कि अभी हाल ही में, साल २००९ में, एक थाई लाइफ़ इन्श्योरैंस कंपनी ने अपने विज्ञापन में "के सरा सरा" के मूल गीत का इस्तेमाल किया था जिसे कुछ विकलांग बच्चों द्वारा गाते हुए दिखाया गया था उस विज्ञापन में।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. खुद गायिका के भाई हैं इस "प्रेरित" गीत के संगीतकार, नाम बताएं- ३ अंक.
२. प्रदीप कुमार और माला सिन्हा अभिनीत इस फिल्म का नाम बताएं - १ अंक.
३. हैरी बेलाफ़ोण्ट के "जमाइकन फ़ेयरवेल" पर आधारित ये गीत किसने लिखा है - २ अंक.
४. कौन है गायिका इस दर्द भरे गीत की - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
हा हा हा ...सच बहुत दिनों बाद इतना मज़ा आया, हाँ गाना वाकई बहुत मुश्किल था, उज्जवल जी को सही गायक पहचानने के लिए हम १ अंक अवश्य देंगें, खैर दिग्गजों को आज की पहेली के लिए शुभकामनाएं :)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, June 23, 2010

मोहब्बत तर्क की मैंने गरेबाँ सी लिया मैंने.. दिल पर पत्थर रखकर खुद को तोड़ रहे हैं साहिर और तलत

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #८९

"सना-ख़्वाने-तक़दीसे-मशरिक़ कहां हैं?" - मुमकिन है कि आपने यह पंक्ति पढी या सुनी ना हो, लेकिन इस पंक्ति के इर्द-गिर्द जो नज़्म बुनी गई थी, उससे नावाकिफ़ होने का तो कोई प्रश्न हीं नहीं उठता। यह वही नज़्म है, जिसने लोगों को गुरूदत्त की अदायगी के दर्शन करवाएँ, जिसने बर्मन दा के संगीत को अमर कर दिया, जिसने एक शायर की मजबूरियों का हवाला देकर लोगों की आँखों में आँसू तक उतरवा दिए और जिसने बड़े हीं सीधे-सपाट शब्दों में "चकला-घरों" की हक़ीकत बयान कर मुल्क की सच्चाई पर पड़े लाखों पर्दों को नेस्तनाबूत कर दिया... अभी तक अगर आपको इस नज़्म की याद न आई हो तो जरा इस पंक्ति पर गौर फरमा लें- "जिसे नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं?" पूरी की पूरी नज़्म वही है, बस एक पंक्ति बदली गई है और वो भी इसलिए क्योंकि फिल्म और साहित्य में थोड़ा फर्क होता है.. फिल्म में हमें अपनी बात खुलकर रखनी होती है। जहाँ तक मतलब का सवाल है तो "सना-ख़्वाने..." में पूरे पूरब का जिक्र है, वहीं "जिसे नाज़ है..." में अपने "हिन्दुस्तान" का बस। लेकिन इससे लफ़्ज़ों में छुपा दर्द घट नहीं जाता.... और इस दर्द को उकेरने वाला शायर तब भी घावों की उतनी हीं गहरी कालकोठरी में जब्त रहता है। इस शायर के बारे में और क्या कहना जबकि इसने खुद कहा है कि "ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?" ... जिसे दुनिया का मोह नहीं ,उससे ज़ीस्त और मौत के सवाल-जवाब करने से क्या लाभ! इस शायर को तो अपने होने का भी कोई दंभ, कोई घमंड, कोई अना नहीं है.. वो तो सरे-आम कहता है "मैं पल-दो पल का शायर हूँ..... मुझसे पहले कितने शायर आए और आ कर चले गए....

कल और आएंगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले,
मुझसे बेहतर कहने वाले, तुमसे बेहतर सुनने वाले ।
कल कोई मुझ को याद करे, क्यों कोई मुझ को याद करे
मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यों वक़्त अपना बरबाद करे ॥


इस शायर से मेरा लगाव क्या है, यह मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकता। मुझे लिखने का शौक़ है और आज-कल थोड़े गाने भी लिख लेता हूँ... गाना लिखने वालों के बारे में लोग यही ख्याल पालते हैं (लोग क्या... खुद गीतकार भी यही मानते हैं) कि गानों में मतलब का कुछ लिखने के लिए ज्यादा स्कोप, ज्यादा मौके नहीं होते.. लेकिन जब भी मैं इन शायर को पढता हूँ तो मुझे ये सारे ख्याल बस बहाने हीं लगते हैं... लगता है कि कोई अपनी लेखनी से बोझ हटाने के लिए दूसरों के सर पर झूठ का पुलिंदा डाल रहा है। अब अगर कोई शायर अपने गाने में यह तक लिख दे कि

कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है

कि ज़िन्दगी तेरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाँव में
गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी
ये तीरगी जो मेरी ज़ीस्त का मुक़द्दर है
तेरी नज़र की शुआओं में खो भी सकती थी


और लोग उसके कहे हरेक लफ़्ज़ को तहे-दिल से स्वीकार कर लें तो इससे यह साबित हो जाता है कि मतलब का लिखने के लिए मौकों की जरूरत नहीं होती बल्कि यह कहिए कि बेमतलब लिखने के लिए मौके निकालने होते हैं। यह शायर मौके नहीं ढूँढता, बल्कि आपको मौके देता है अपनी अलसाई-सी दुनिया में ताकने का.. उसे निखरने का, उसे निखारने का। आप पशेमान होते हो तो आपसे कहता है

तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले
अपने पे भरोसा है तो ये दाँव लगा ले


ना मुंह छिपा के जियो और ना सर झुका के जियो
गमों का दौर भी आए तो मुस्कुरा के जियो ।


फिर आप संभल जाते हो... लेकिन अगले हीं पल आप इस बात का रोना रोते हो कि आपको वह प्यार नहीं मिला जिसके आप हक़दार थे। यह आपको समझाता है, आप फिर भी नहीं समझते तो ये आपके हीं सुर में सुर मिला लेता है ताकि आपके ग़मों को मलहम मिल सके

जाने वो कैसे लोग थे, जिनके प्यार को प्यार मिला ?
हमने तो जब कलियाँ मांगीं, काँटों का हार मिला ॥


आपको प्यार हासिल होता है, लेकिन आप "बेवफ़ाईयो" का शिकार हो जाते हैं। आपको उदासियों के गर्त्त में धँसता देख यह आपको ज़िंदगी के पाठ पढा जाता है:

तारुफ़ रोग हो जाए तो उसको भूलना बेहतर,
ताल्लुक बोझ बन जाए तो उसको तोड़ना अच्छा ।
वो अफ़साना जिसे अन्जाम तक लाना न हो मुमकिन,
उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा ॥


इतना सब करने के बावजूद यह आपसे अपना हक़ नहीं माँगता.. यह नहीं कहता कि मैंने तुम्हें अपनी शायरी के हज़ार शेर दिए, तुम्हें तुम्हारी ज़िंदगी के लाखों लम्हें नसीब कराए... यह तो उल्टे सारा श्रेय आपको हीं दे डालता है:

दुनिया ने तजुर्बातो हवादिस की शक्ल में
जो कुछ मुझे दिया है वो लौटा रहा हूं मैं


यह शायर, जिसके एक-एक हर्फ़ में तसव्वुरात की परछाईयाँ उभरती हैं.. अपने चाहने वालों के बीच "साहिर" के नाम से जाना जाता है। इनके बारे में और कुछ जानने के लिए चलिए हम "विकिपीडिया" और "प्रकाश पंडित" के दरवाजे खटखटाते हैं।

साहिर लुधियानवी का असली नाम अब्दुल हयी साहिर है। उनका जन्म ८ मार्च १९२१ में लुधियाना के एक जागीरदार घराने में हुआ था। माता के अतिरिक्त उनके पिता की कई पत्नियाँ और भी थीं। किन्तु एकमात्र सन्तान होने के कारण उसका पालन-पोषण बड़े लाड़-प्यार में हुआ। मगर अभी वे बच्चा हीं थे कि पति की ऐय्याशियों से तंग आकर उनकी माता पति से अलग हो गई और चूँकि ‘साहिर’ ने कचहरी में पिता पर माता को प्रधानता दी थी, इसलिए उनके बाद पिता से और उसकी जागीर से उनका कोई सम्बन्ध न रहा और उन्हें गरीबी में गुजर करना पड़ा। साहिर की शिक्षा लुधियाना के खालसा हाई स्कूल में हुई। सन् १९३९ में जब वे गव्हर्नमेंट कालेज के विद्यार्थी थे अमृता प्रीतम से उनका प्रेम हुआ जो कि असफल रहा । कॉलेज़ के दिनों में वे अपने शेरों के लिए ख्यात हो गए थे और अमृता उनकी प्रशंसक । लेकिन अमृता के घरवालों को ये रास नहीं आया क्योंकि एक तो साहिर मुस्लिम थे और दूसरे गरीब । बाद में अमृता के पिता के कहने पर उन्हें कालेज से निकाल दिया गया।

सन् १९४३ में साहिर लाहौर आ गये और उसी वर्ष उन्होंने अपनी पहली कविता संग्रह ’तल्खियाँ’ छपवायी। सन् १९४५ में वे प्रसिद्ध उर्दू पत्र अदब-ए-लतीफ़ और शाहकार (लाहौर) के सम्पादक बने। बाद में वे द्वैमासिक पत्रिका सवेरा के भी सम्पादक बने और इस पत्रिका में उनकी किसी रचना को सरकार के विरुद्ध समझे जाने के कारण पाकिस्तान सरकार ने उनके खिलाफ वारण्ट जारी कर दिया। १९४९ में वे दिल्ली आ गये। कुछ दिनों दिल्ली में रहकर वे बंबई आ गये जहाँ पर व उर्दू पत्रिका शाहराह और प्रीतलड़ी के सम्पादक बने। फिल्म आजादी की राह पर (१९४९) के लिये उन्होंने पहली बार गीत लिखे किन्तु प्रसिद्धि उन्हें फिल्म नौजवान, जिसके संगीतकार सचिनदेव बर्मन थे, के लिये लिखे गीतों से मिली।

शायर की हैसियत से ‘साहिर’ ने उस समय आँख खोली जब ‘इक़बाल’ और ‘जोश’ के बाद ‘फ़िराक़’, ‘फ़ैज़’, ‘मज़ाज़’ आदि के नग़्मों से न केवल लोग परिचित हो चुके थे बल्कि शायरी के मैदान में उनकी तूती बोलती थी। कोई भी नया शायर अपने इन सिद्धहस्त समकालीनों से प्रभावित हुए बिना न रह सकता था। अतएव ‘साहिर’ पर भी ‘मजाज़’ और ’फ़ैंज़’ का ख़ासा प्रभाव पड़ा। लेकिन उनका व्यक्तिगत अनुभव जो कि उनके पिता और उनकी प्रेमिका के पिता के प्रति घृणा और विद्रोह की भावनाओं से ओत-प्रोत था, उनके लिए कामगर साबित हुआ। लोगों ने देखा कि फ़ैज़’ या ‘मजाज़’ का अनुकरण करने के बजाय ‘साहिर’ की रचनाओं पर उसके व्यक्तिगत अनुभवों की छाप है और उसका अपना एक अलग रंग भी है।

‘साहिर’ मौलिक रूप से रोमाण्टिक शायर है। प्रेम की असफलता ने उसके दिलो-दिमाग़ पर इतनी कड़ी चोट लगाई कि जीवन की अन्य चिन्ताएँ पीछे जा पड़ी। बस एक प्रेम की बात हो तो कोई सह भी ले, लेकिन उन्हें तो जीवन में दो प्रेम असफलता मिली - पहला कॉलेज के दिनों में अमृता प्रीतम के साथ और दूसरी सुधा मल्होत्रा से। वे आजीवन अविवाहित रहे तथा उनसठ वर्ष की उम्र में २५ अक्टूबर १९८० को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया ।

’साहिर’ की ग़ज़लें बहुत कुछ ऐसा कह जाती हैं, जिसे आप अपनी आँखों में रोककर रखे होते हैं.. न चाहते हुए भी, मन मसोसकर आप उन जज्बातों को पीते रहते हैं। आपको बस एक ऐसे आधार की जरूरत होती है, जहाँ आप अपने मनोभावों को टिका सकें। यकीन मानिए.. बस इसी कारण से, बस यही उद्देश्य लेकर हम आज की गज़ल के साथ हाज़िर हुए हैं। ’साहिर’ के लफ़्ज़ और क्या करने में सक्षम हैं, यह तो आपको गज़ल सुनने के बाद हीं मालूम पड़ेगा.... सोने पे सुहागा यह है कि आपके अंदर घर कर बैठी कड़वाहटों को मिटाने के लिए "तलत महमूद" साहब की आवाज़ की "मिश्री" भी मौजूद है। तो देर किस बात की... पेश-ए-खिदमत है आज की गज़ल:

मोहब्बत तर्क की मैंने गरेबाँ सी लिया मैंने
ज़माने अब तो ख़ुश हो ज़हर ये भी पी लिया मैंने

अभी ज़िंदा हूँ लेकिन सोचता रहता हूँ ये दिल में
कि अब तक किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैंने

तुझे अपना नहीं सकता मगर इतना भी क्या कम है
कि कुछ घड़ियाँ तेरे ख़्वाबों में खो कर जी लिया मैंने

बस अब तो मेरा _____ छोड़ दो बेकार उम्मीदो
बहुत दुख सह लिये मैंने बहुत दिन जी लिया मैंने




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "सितम" और शेर कुछ यूँ था-

भूल जाता हूँ मैं सितम उस के
वो कुछ इस सादगी से मिलता है

पिछली महफ़िल की शान बने "नीरज रोहिल्ला" जी। एक-एक करके महफ़िल में और भी कई सारे मेहमान (मेरे हिसाब से तो आप स्ब घर के हीं है.. मेहमान कहकर मैं महफ़िल की रस्म-अदायगी कर रहा हूँ..बस) शामिल हुए। जहाँ शन्नो जी ने हमारी गलती सुधारी वहीं सुमित जी हर बार की तरह बाद में आऊँगा कहकर निकल लिए। जहाँ सीमा जी ने पहली मर्तबा अपने शेरों के अलावा कुछ शब्द कहे (भले हीं उन शेरों का मतलब बताने के लिए उन्हें अतिरिक्त शब्द महफ़िल पर डालने पड़े, लेकिन उनकी तरफ़ से कुछ अलग पढकर सुखद आश्चर्य हुआ :) ) ,वहीं अवनींद्र जी के शेर अबाध गति से दौड़ते रहें। मंजु जी और नीलम जी ने महफ़िल के अंतिम दो शेर कहे... इन दोनों में एक समानता यह थी कि जहाँ मंजु जी अपनी हीं धुन में मग्न थीं तो वहीं नीलम जी शन्नो जी की धुन में।

इस तरह से एक सप्ताह तक हमारी महफ़िल रंग-बिरंगे लोगों से सजती-संवरती रही। इस दरम्यान ये सारे शेर पेश किए गए:

दुनिया के सितम याद ना अपनी हि वफ़ा याद
अब मुझ को नहीं कुछ भी मुहब्बत के सिवा याद । (जिगर मुरादाबादी)

तकदीर के सितम सहते जिन्दगी गुजर जाती है
ना हम उसे रास आते हैं ना वो हमें रास आती है. (शन्नो जी)

तुम्हारी तर्ज़-ओ-रविश, जानते हैं हम क्या है
रक़ीब पर है अगर लुत्फ़, तो सितम क्या है? (ग़ालिब)

भरम तेरे सितम का खुल चुका है
मैं तुझसे आज क्यों शर्मा रहा हूँ (फ़िराक़ गोरखपुरी)

कितनी शिद्दत से ढाये थे सितम उसने
अब मैं रोया तो ये इश्क मैं रुसवाई है (अवनींद्र जी)

फूल से दिल पे उसका ये सितम देखो
तोड़ के अपनी किताबों मैं सजाया उसने (अवनींद्र जी)

शफा देता है ज़ख्मो को तुम्हारा मरहमी लहजा ,
मगर दिल को सताते हैं वो सितम भी तुम्हारे हैं (अवनींद्र जी)

जिंदगी को याद आ रहे तेरे सितम ,
धड़कने भुलाने की दे रही हैं कसम . (मंजु जी)

सितम ये है कि उनके ग़म नहीं,
ग़म ये है कि उनके हम नहीं (नीलम जी)

और अब एक महत्वपूर्ण सूचना:

हम टिप्पणियों पे नियंत्रण (टिप्पणियों का "मोडरेशन") नहीं करना चाहते, इसलिए हम आपसे अपील करते हैं कि महफ़िल-ए-ग़ज़ल पर शायराना माहौल बनाए रखने में हमारी मदद करें। दर-असल कुछ कड़ियों से महफ़िल पे ऐसी भी टिप्पणियाँ आ रही हैं, जिनका इस आलेख से कोई लेना-देना नहीं होता। उन्हें पढकर लगता है कि लिखने वाले ने बिना ग़ज़ल सुने, बिना आलेख पढे हीं अपनी बातें कह दी हैं। हमारे कुछ मित्रों ने महफ़िल की इस बिगड़ी स्थिति पर आपत्ति व्यक्त की है। इसलिए हम आप सबसे यह दरख्वास्त करते हैं कि अपनी टिप्पणियों को यथा-संभव इस आलेख/गज़ल/शायर/संगीतकार/गुलूकार/शेर तक हीं सीमित रखें। इसका अर्थ यह नहीं है कि आप टिप्पणी देना या फिर महफ़िल में आना हीं बंद कर दें.. तब तो दूसरे मित्र आराम से जान जाएँगे कि हम किनकी बात कर रहे थे :)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, May 26, 2010

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, वहशत-ए-दिल क्या करूँ...मजाज़ के मिजाज को समझने की कोशिश की तलत महमूद ने

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #८५

कुछ शायर ऐसे होते है, जो पहली मर्तबा में हीं आपके दिल-औ-दिमाग को झंकझोर कर रख देते हैं। इन्हें पढना या सुनना किसी रोमांच से कम नहीं होता। आज हम जिन शायर की नज़्म लेकर इस महफ़िल में दाखिल हुए है, उनका असर भी कुछ ऐसा हीं है। मैंने जब इनको पहली बार सुना, तब हीं समझ गया था कि ये मेरे दिमाग से जल्द नहीं उतरने वाले। दर-असल हुआ यूँ कि एक-दिन मैं यू-ट्युब पर ऐसे हीं घूमते-घूमते अली सरदार ज़ाफ़री साहब के "कहकशां" तक पहुँच गया। वहाँ पर कुछ नामीगिरामी शायरों की गज़लें "जगजीत सिंह" जी की आवाज़ में सुनने को मिलीं। फिर मालूम चला कि "कहकशां" बस गज़लों का एक एलबम या जमावड़ा नहीं है, बल्कि यह तो एक धारावाहिक है जिसमें छह जानेमाने शायरों की ज़िंदगियाँ समेटी गई हैं। इन शायरों में से जिनपर मेरी सबसे पहले नज़र गई, वो थे "मजाज़ लखनवी"। इनपर सात या आठ कड़ियाँ मौजूद थीं(हैं)..मैं एक हीं बार में सब के सब देख गया.. और फिर आगे जो हुआ.... आज का आलेख, आज की महफ़िल-ए-गज़ल उसी का एक प्रमाण-मात्र है। मजाज़ के बारे में मैं खुद कुछ कहूँ, इससे अच्छा मैं यह समझता हूँ कि प्रकाश पंडित जी(जो कि मजाज़ को निजी तौर पे जानते थे) के शब्दों का सहारा ले लिया जाए (अब तक मजाज़ के बारे में मैं इतना कुछ जान चुका हूँ कि मैं खुद हीं कुछ कहना चाहता हूँ, लेकिन यह छोटी मुँह बड़ी बात होगी):

" ‘मजाज़’ उर्दू शायरी का कीट्स है।"
" ‘मजाज़’ शराबी है।"
" ‘मजाज़’ बड़ा रसिक और चुटकुलेबाज़ है।"
" ‘मजाज़’ के नाम पर गर्ल्स कालिज अलीगढ़ में लाटरियां डाली जाती थीं कि ‘मजाज़’ किसके हिस्से में पड़ता है। उसकी कविताएं तकियों के नीचे छुपाकर आंसुओं से सींची जाती थीं और कुंवारियां अपने भावी बेटों का नाम उसके नाम पर रखने की क़समें खाती थीं।" (उर्दू की मशहूर अफ़साना निगार इस्मत चुगताई ने भी अपनी आत्मकथा में इस बात का ज़िक्र किया है)

" ‘मजाज़’ के जीवन की सबसे बड़ी ट्रेजिडी औरत है।"

‘मजाज़’ से मिलने से पूर्व मैं ‘मजाज़’ के बारे में तरह-तरह की बातें सुना और पढ़ा करता था और उसका रंगारंग चित्र मैंने उसकी रचनाओं में भी देखा था, विशेष रूप से उसकी नज़्म ‘आवारा’ (आज की नज़्म) में तो मैंने उसे साक्षात् रूप से देख लिया था। लेकिन उससे मिलने का मुझे मौका तब मिला जब मैं और साहिर लाहौर छोड़ने के बाद दिल्ली में घर लेने की जुगत में थे। तो एक रात की बात है। मैं और साहिर रात के १०-११ बजे एक गली से गुजर रहे थे तभी एक दुबला-पतला व्यक्ति अपने शरीर की हड्डियों के ढांचे पर शेरवानी मढ़े बुरी तरह लड़खड़ाता और बड़बड़ाता मेरे सामने आ खड़ा हुआ।

"अख़्तर शीरानी मर गया-हाय अख़्तर! तू उर्दू का बहुत बड़ा शायर था-बहुत बड़ा !"

वह बार-बार यही वाक्य दोहरा रहा था। हाथों से शून्य में उल्टी-सीधी रेखाएं बना रहा था और साथ-साथ अपने मेज़बान को कोसे जा रहा था जिसने घर में शराब होने पर भी से और शराब पीने को न दी थी और अपनी मोटर में बिठाकर रेलवे पुल के पास छोड़ दिया था। ज़ाहिर है कि इस ऊटपटांग-सी मुसीबत से मैं एकदम बौखला गया। मैं नहीं कह सकता कि उस समय उस व्यक्ति से मैं किस तरह पेश आता कि ठीक उसी समय कहीं से ‘जोश’ मलीहाबादी निकल आए और मुझे पहचानकर बोले, "इसे संभालो, प्रकाश ! ‘मजाज़’ है।"

‘मजाज़’ को संभालने की बजाय उस समय आवश्यकता यद्यपि अपने-आपको संभालने की थी लेकिन ‘मजाज़’ का नाम सुनते ही मैं एकदम चौंक पड़ा और दूसरे ही क्षण सब कुछ भुलाते हुए मैं इस प्रकार उससे लिपट गया मानो वर्षों पुरानी मुलाक़ात हो। उस समय तो मेरी ’मजाज़’ से पहचान न थी, लेकिन आगे चलकर हमारी अच्छी दोस्ती हो गई। उन दिनों ’मजाज़’ लगभग एक महीने हमारे साथ रहा। शराब छुड़ाने की हमने बहुत कोशिश की, लेकिन उसके शराबी दोस्तों ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा। ’मजाज़’ को खाने की कोई चिंता न थी, कपड़े फट गए हैं या मटमैले हैं, इसकी भी उसे कोई परवाह न थी। यदि कोई धुन थी तो बस यही कि कहां से, कब और कितनी मात्रा में शराब मिल सकती है ! दिन-रात निरन्तर शराबनोशी का परिणाम नर्वस ब्रेकडाउन के सिवा और क्या हो सकता था जो हुआ। किसी प्रकार पकड़-धकड़ कर रांची मैण्टल हस्पताल में पहुंचाया, लेकिन स्वस्थ होते ही यह सिलसिला फिर से शुरू हो गया; और यह सिलसिला ६ दिसम्बर, १९५५ ई. को बलरामपुर हस्पताल, लखनऊ में उस समय समाप्त हुआ जब कुछ मित्रों के साथ ‘मजाज़’ ने नियमानुसार बुरी तरह शराब पी। मित्र तो अपने-अपने घरों को सिधार गए लेकिन ‘मजाज़’ रात-भर की नस फट गई।

‘मजाज़’ की ज़िन्दगी के हालात बड़े दुःखद थे। कभी पूरी अलीगढ़ यूनिवर्सिटी, जहां से उसने बी.ए. किया था, उस पर जान देती थी। गर्ल्स कालिज में हर ज़बान पर उसका नाम था। लेकिन लड़कियों का वही चहेता शायर जब १९३६ ई. में रेडियो की ओर से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ’आवाज़’ का सम्पादक बनकर दिल्ली आया तो एक लड़की (मजाज़ जिस लड़की को चाहते थे वो शादीशुदा थी) के ही कारण उसने दिल पर ऐसा घाव खाया जो जीवन-भर अच्छा न हो सका। एक वर्ष बाद ही नौकरी छोड़कर जब वह अपने शहर लखनऊ को लौटा तो उसके सम्बन्धियों के कथनानुसार वह प्रेम की ज्वाला में बुरी तरह फुंक रहा था और उसने बेतहाशा, पीनी शुरू कर कर दी थी। इसी सिलसिले में १९४० ई. में उस पर नर्वस ब्रेकडाउन का पहला आक्रमण हुआ। १९५४ ई. में उस पर पागलपन का दूसरा हमला हुआ। अब वह स्वयं ही अपनी महानता के राग अलापता था। शायरों के नामों की सूची तैयार करता था और ‘ग़ालिब’ और इक़बाल’ के नाम के बाद अपना नाम लिखकर सूची समाप्त कर देता था।

आधुनिक उर्दू शायरी का यह प्रिय दयनीय शायर सन् १९०९ ई. में अवध के एक प्रसिद्ध क़सबे रदौली में पैदा हुआ। पिता सिराजुलहक़ रदौली के पहले व्यक्ति थे ‘जिन्होंने ज़मींदार होते हुए भी उच्च शिक्षा प्राप्त की और ज़मींदारी पर सरकारी नौकरी को प्राथमिकता दी। यों असरारुल हक़ ’मजाज़’ का पालन-पोषण उस उभरते हुए घराने में हुआ जो एक ओर जीवन के पुराने मूल्यों को छाती से लगाए हुए था और दूसरी ओर नए मूल्यों को भी अपना रहा था। बचपन में, जैसाकि उसकी बहन ‘हमीदा’ ने एक जगह लिखा है, ‘मजाज़’ बड़े सरल स्वभाव तथा विमल हृदय का व्यक्ति था। जागीरी वातावरण में स्वामित्व की भावना बच्चे को मां के दूध के साथ मिलती है लेकिन वह हमेशा निर्लिप्त तथा निःस्वार्थ रहा। दूसरों की चीज़ को अपने प्रयोग में लाना और अपनी चीज़ दूसरों को दे देना उसकी आदत रही। इसके अतिरिक्त वह शुरू से ही सौन्दर्य-प्रिय भी था। कुटुम्ब में कोई सुन्दर स्त्री देख लेता तो घंटों उसके पास बैठा रहता। खेल-कूद, खाने-पीने किसी चींज़ की सुध न रहती। प्रारम्भिक शिक्षा लखनऊ के अमीनाबाद हाई स्कूल में प्राप्त कर जब वह आगरा के सेंट जोन्स कालिज में दाखिल हुआ तो कालिज में मुईन अहसन ‘जज़्बी’ और पड़ोस में ‘फ़ानी’ ऐसे शायरों की संगत मिली और यहीं से ‘मजाज़’ की उस ज्योतिर्मय शायरी का प्रादुर्भाव हुआ जिसकी चमक आगरा, अलीगढ़ और दिल्ली से होती हुई समस्त भारत में फैल गई। ‘मजाज़’ की शायरी का आरम्भ बिलकुल परम्परागत ढंग से हुआ और उसने उर्दू शायरी के मिजाज़ का सदैव ख़याल रखा।

"मजाज़ को शामिल किए बग़ैर पिछले ६० सालों का उर्दू शायरी का कोई भी संचयन पूरा नहीं हो सकता। उर्दू साहित्य में योगदान के लिए २०वीं सदी में जिन दो शायरों को सबसे ज़्यादा शोहरत मिली उनमें भारत से मजाज़ हैं और पाकिस्तान से फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ हैं।" - ये कथन हैं श्री गोपीचंद नारंग के.... तो उर्दू के सुप्रसिद्ध शायर स्वर्गीय "असर" लखनवी ने एक बार लिखा था: "उर्दू में एक कीट्स पैदा हुआ था लेकिन इन्क़िलाबी भेड़िए उसे उठा ले गए।" जानकारी के लिए बता दूँ कि मजाज़ का एक हीं कविता-संग्रह प्रकाशित हुआ है - "आहंग" और बस इसी संग्रह के दम पर मजाज़ को उर्दू का कीट्स कहा जाता है। इस बात से जान पड़ता है कि मजाज़ की लेखनी में कितना दम था। प्रमाण के लिए यह शेर मौजूद है:

अपने दिल को दोनों आलम से उठा सकता हूँ मैं
क्या समझती हो कि तुमको भी भुला सकता हूँ मैं


मजाज़ के बारे में कहने को अभी बहुत कुछ बाकी है, लेकिन एक हीं आलेख में सब कुछ समेटा नहीं जा सकता। इसलिए आज बस इतना हीं। वैसे क्या आपको यह मालूम है कि मजाज़ की बहन का निकाह जांनिसार अख्तर से हुआ था, यानि कि मजाज़ "जावेद अख्तर" के मामा थे। नहीं मालूम था ना आपको? खैर कोई बात नहीं.. हम किस मर्ज़ की दवा हैं। चलिए तो अब आज की नज़्म की ओर रूख करते हैं। आज की नज़्म "ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ"/"आवारा" को अपनी आवाज़ से सजाया है तलत महमूद साहब ने। हम नज़्म तो आपको सुनवा हीं देंगे, लेकिन आपके लिए दो प्रश्न हैं:
१) तलत साहब की आवाज़ में यह नज़्म हमने किस फिल्म से ली है?
२) आज से सात साल पहले आई एक फिल्म में पूरा का पूरा एक गाना मजाज़ को समर्पित था। उस गाने में "आवारा" नज़्म की ये पंक्तियाँ थीं: "जी में आता है मुर्दा सितारे नोंच लूँ.."। हम किस गाने की बात कर रहे हैं और वह फिल्म कौन-सी थी?
सही जवाब देने वा्लों को भविष्य में जरूर फायदा होगा, मैं इसका विश्वास दिलाता हूँ। खैर, अभी तो यह नज़्म पेश-ए-खिदमत है:

शहर की रात और मैं, नाशाद-ओ-नाकारा फिरूँ
जगमगाती जागती, सड़कों पे आवारा फिरूँ
ग़ैर की बस्ती है, कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

ये रुपहली छाँव, ये आकाश पर तारों का जाल
जैसे ___ का तसव्वुर, जैसे आशिक़ का ख़याल
आह लेकिन कौन समझे, कौन जाने जी का हाल
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

रास्ते में रुक के दम लूँ, ये मेरी आदत नहीं
लौट कर वापस चला जाऊँ, मेरी फ़ितरत नहीं
और कोई हमनवा मिल जाये, ये क़िस्मत नहीं
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "जुगनू" और शेर कुछ यूँ था-

सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं

जुगनू की चमक के साथ महफ़िल में सबसे पहले हाज़िर हुईं सीमा जी। आपने इन शेरों से महफ़िल को रौशन कर दिया:

यही अंदाज़ है मेरा समन्दर फ़तह करने का
मेरी काग़ज़ की कश्ती में कई जुगनू भी होते हैं (बशीर बद्र)

बाहर सहन में पेड़ों पर कुछ जलते-बुझते जुगनू थे
हैरत है फिर घर के अन्दर किसने आग लगाई है (क़तील शिफ़ाई)

शाहनवाज़ जी! वाह.. क्या बात कही आपने। अपनी आमद महफ़िल में ऐसे हीं बनाए रखिएगा:

देख के मेरे घर का रस्ता "जुगनू" भी छुप जाता है.
आसमान का हर तारा घर झांक के तेरे आता है.

शन्नो जी, आप हमेशा हीं यही सोच बैठती हैं कि कोई न कोई(ज्यादातर मैं हीं) आपसे नाराज़ हैं। जबकि ऐसा कभी नहीं होता। अंतर्जाल की इस दुनिया में लोग पल भर को मिलते हैं और अगर इस दौरान कोई नाराज़ हीं हो जाए, तो फिर मिलने-मिलाने का मज़ा तो जाता रहेगा। इसलिए आगे से अपने दिमाग में यह वहम पैदा मत होने दीजिएगा। और खुलकर शेर शेयर करते रहिएगा, जैसे कि आज किया है:

फूलों और पातों में आकर छिप जाते हैं
ये जुगनू रोशनी देकर खुद जल जाते हैं.

शरद जी, इस बार आपका शेर कुछ ढीला रह गया। मुझे आपसे एक जबर्दस्त शेर की उम्मीद थी। खैर फिर कभी:

अंधेरा जब भी गहराता है जुगनू याद आते है
चमक दिखला के वो हमको पता अपना बताते हैं । (स्वरचित)

हमें शौक जुगनू पकड़ने का था,
अंधेरों के यूँ हीं सफ़र कट गए। (शकूर अनवर)

अवध जी, आपका किन लफ़्ज़ों में शुक्रिया अदा करूँ। दर-असल गलती मेरी हीं थी, मुझे कुछ और शोध कर लेना चाहिए था, फिर मैं "चचा-जान" की जगह "रिश्तेदार" नहीं लिखता। आप जैसे सुधि-पाठक हों तो लिखने का मज़ा दूना हो जाता है।

अवनींद्र जी, आपने तो पूरी की पूरी गज़ल हीं लिख डालीं। अब मैं तो उस गज़ल से अपने काम का हीं शेर लूँगा :)

ये चांदनी पत्तों पे ढल रही है या
तेरी याद का जुगनू चमक रहा है !

सुमित जी, फिर से वही जल्दी-बाजी। शायर का नाम तो डालते जाते:

मैं ना जुगनू हूँ, दिया हूँ , ना कोई तारा हूँ,
रोशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यूँ हैं।

मस्त-कलंदर जी, महफ़िल में खाली हाथ नहीं आते :) अगली बार, आपसे एक शेर की उम्मीद रहेगी।

नीलम जी, वल्लाह! आपके इस शेर के क्या कहने। वैसे शायर कौन है? :)

मेरी झोली में जुगनुओं कि वो सौगात लाता
यूँ ही नहीं उसकी किस्मत में अहबाब आता

मंजु जी, यादों के जुगनू आपने भी पकड़े हैं शायद.... तभी तो ये खयाल हैं:

तेरे यादों के जुगनू ने रूला दिया,
बिन सावन के बरसात को बुला लिया।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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