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Sunday, February 25, 2018

राग चन्द्रकौंस : SWARGOSHTHI – 358 : RAG CHANDRAKAUNS




स्वरगोष्ठी – 358 में आज


पाँच स्वर के राग – 6 : “सन सनन सनन जा री ओ पवन…”


प्रभा अत्रे से राग चन्द्रकौंस की बन्दिश और लता मंगेशकर से फिल्म का गीत सुनिए




डॉ. प्रभा अत्रे
लता मंगेशकर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पाँच स्वर के राग” की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनमें केवल पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। भारतीय संगीत में रागों के गायन अथवा वादन की प्राचीन परम्परा है। संगीत के सिद्धान्तों के अनुसार राग की रचना स्वरों पर आधारित होती है। विद्वानों ने बाईस श्रुतियों में से सात शुद्ध अथवा प्राकृत स्वर, चार कोमल स्वर और एक तीव्र स्वर; अर्थात कुल बारह स्वरो में से कुछ स्वरों को संयोजित कर रागों की रचना की है। सात शुद्ध स्वर हैं; षडज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद। इन स्वरों में से षडज और पंचम अचल स्वर माने जाते हैं। शेष में से ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वरों के शुद्ध स्वर की श्रुति से नीचे की श्रुति पर कोमल स्वर का स्थान होता है। इसी प्रकार शुद्ध मध्यम से ऊपर की श्रुति पर तीव्र मध्यम स्वर का स्थान होता है। संगीत के इन्हीं सात स्वरों के संयोजन से रागों का आकार ग्रहण होता है। किसी राग की रचना के लिए कम से कम पाँच और अधिक से अधिक सात स्वर की आवश्यकता होती है। जिन रागों में केवल पाँच स्वर का प्रयोग होता है, उन्हें औड़व जाति, जिन रागों में छः स्वर होते हैं उन्हें षाडव जाति और जिनमें सातो स्वर प्रयोग हों उन्हें सम्पूर्ण जाति का राग कहा जाता है। रागों की जातियों का वर्गीकरण राग के आरोह और अवरोह में लगने वाले स्वरों की संख्या के अनुसार कुल नौ जातियों में किया जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ ऐसे रागों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनके आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। ऐसे रागों को औड़व-औड़व जाति का राग कहा जाता है। श्रृंखला की छठी कड़ी में आज हम आपके लिए औड़व-औड़व जाति के राग चन्द्रकौंस का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही सुविख्यात गायिका विदुषी प्रभा अत्रे के स्वरों में राग चन्द्रकौंस की एक बन्दिश के माध्यम से राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। राग चन्द्रकौंस के स्वरों का फिल्मी गीतों में बहुत कम उपयोग किया गया है। राग चन्द्रकौंस के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1961 में प्रदर्शित फिल्म “सम्पूर्ण रामायण” से वसन्त देसाई का स्वरबद्ध किया एक गीत –“सन सनन सनन जा री ओ पवन…”, लता मंगेशकर के स्वर में सुनवा रहे हैं।



आज का राग “चन्द्रकौंस” है। इस राग में हम आपको दो रचनाएँ सुनवाएँगे। सबसे पहले आप 1961 में प्रदर्शित “सम्पूर्ण रामायण” फिल्म से राग चन्द्रकौंस पर आधारित एक मोहक गीत सुनेंगे। गीतकार भरत व्यास का लिखा और संगीतकार वसन्त देसाई का स्वरबद्ध किया यह गीत है। फिल्मी गीतों में रागों का प्रयोग और इस मामले में कभी भी समझौता न करने में संगीतकर वसन्त देसाई अग्रणी थे। फिल्म संगीत की बदलती प्रवृत्तियों के बावजूद उन्होने अपने शुरुआती दौर से लेकर वर्ष 1975 तक अपनी अन्तिम फिल्म “शक” तक अपने संगीत में रागों का साथ नहीं छोड़ा। इस प्रतिबद्धता के कारण लोकप्रियता को एक कसौटी के र्रोप में बहुत महत्वपूर्ण नहीं समझा गया और यही कारण है कि उनके लोकप्रिय गीतों की संख्या बहुत अधिक नहीं है। आज का गीत लता मंगेशकर का गाया हुआ है। परन्तु वसन्त देसाई कभी भी लता मंगेशकर पर आश्रित नहीं थे। लता मंगेशकर के बिना भी उनके राग आधारित संगीत के बल पर आठवें दशक की फिल्म “गुड्डी” का गीत –“बोले रे पपीहरा...” वाणी जयराम के स्वर में अत्यन्त लोकप्रिय हुआ था। ऐसे ही सिद्धान्तवादी, स्वाभिमानी और आत्मविश्वास से परिपूर्ण संगीतकार वसन्त देसाई द्वारा स्वरबद्ध राग चन्द्रकौंस पर आधारित गीत –“सन सनन सनन जा री ओ पवन...” लता मंगेशकर के स्वर में सुनिए।

राग चन्द्रकौंस : “सन सनन सनन जा री ओ पवन...” : लता मंगेशकर : फिल्म – सम्पूर्ण रामायण



रे प वर्जित, कोमल ग नि, औड़व कर विस्तार,
म स वादी-संवादी सों, चन्द्रकौंस तैयार।
राग चन्द्रकौंस को भैरवी थाट का जन्य राग माना जाता है। इस राग में गान्धार और धैवत स्वर कोमल लगाए जाते हैं। ऋषभ और पंचम स्वर पूर्णतः वर्जित होता है। केवल पाँच स्वर का राग होने से इस राग की जाति औड़व-औड़व होती है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग चन्द्रकौंस का गायन-वादन मध्यरात्रि के समय सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। राग मधुवन्ती की तरह यह भी आधुनिक राग है जिसकी रचना राग मालकौंस के कोमल निषाद को शुद्ध निषाद में परिवर्तित करने से हुई है। यह राग भैरवी थाट के अन्तर्गत माना जाता है, किन्तु सत्य तो यह है की राग चन्द्रकौंस पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे द्वारा प्रवर्तित दस थाट में से किसी भी थाट के अन्तर्गत नहीं आता। उच्चस्तर के कई राग हैं, जैसे अहीर भैरव, आनन्द भैरव, मधुवन्ती, चन्द्रकौंस आदि, जो दस थाट में से किसी भी थाट के अन्तर्गत नहीं आते। राग चन्द्रकौंस तीनों सप्तकों में समान रूप से प्रयोग किया जाता है और तीनों सप्तकों में खिलता है। इस राग में विलम्बित व द्रुत खयाल, तराना आदि गाया जाता है, किन्तु ठुमरी नहीं गायी जाती। इस राग को गाते-बजाते समय बीच-बीच में शुद्ध निषाद प्रयोग करने की आवश्यकता होती है, इससे एक ओर राग चन्द्रकौंस के स्वरूप की स्थापना होती है तो दूसरी ओर राग मालकौंस से बचाव भी होता रहता है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, विदुषी प्रभा अत्रे के स्वर में भक्तिरस से परिपूर्ण एक खयाल रचना। यह रचना एकताल में निबद्ध है। आप इस खयाल रचना का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग चन्द्रकौंस : “सगुण स्वरूप नन्दलाल...” : डॉ. प्रभा अत्रे


संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 358वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 360वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के प्रथम सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की झलक है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायक की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 3 मार्च, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 360वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 356वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1966 में प्रदर्शित फिल्म “दिल दिया दर्द लिया” के एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – वृन्दावनी सारंग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल व कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – आशा भोसले और मुहम्मद रफी

“स्वरगोष्ठी” की पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी चार प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” की छठी कड़ी में आपने राग चन्द्रकौंस का परिचय प्राप्त किया। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने लिए विदुषी डॉ. प्रभा अत्रे के स्वर में राग चन्द्रकौंस के एक द्रुत खयाल का रसास्वादन किया था। साथ ही आपने फिल्म “सम्पूर्ण रामायण” से राग चन्द्रकौंस के स्वरों में पिरोया एक मधुर गीत लता मंगेशकर के स्वर में सुना। पिछले अंक में संगीतकार चाँद परदेशी का चित्र हम सबके लिए उपलब्ध कराने वाले पाठक बीकानेर, राजस्थान के लक्ष्मीनारायण सोनी अब हमारे नियमित पाठक बन गए हैं। हमें विश्वास है कि श्री सोनी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। अगले अंक में पाँच स्वर के एक अन्य राग पर आपसे चर्चा करेंगे। इस नई श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, December 17, 2017

ठुमरी खमाज : SWARGOSHTHI – 348 : THUMARI KHAMAJ : पूरब अंग ठुमरी का रंग




स्वरगोष्ठी – 348 में आज

फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व – 5 : पूरब अंग ठुमरी का रंग

लोकरस से सराबोर ठुमरी - "नज़र लागी राजा तोरे बंगले पर..."




आशा भोसले
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” की इस पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पिछली श्रृंखला में हमने आपके लिए फिल्मों में पारम्परिक ठुमरी के साथ-साथ उसके फिल्मी प्रयोग को भी रेखांकित किया था। इस श्रृंखला में भी हम केवल फिल्मी ठुमरियों की चर्चा कर रहे हैं, किन्तु ये ठुमरियाँ पारम्परिक हों, यह आवश्यक नहीं हैं। इन ठुमरी गीतों को फिल्मों के प्रसिद्ध गीतकारों ने लिखा है और संगीतकारों ने इन्हें विभिन्न रागों में बाँध कर ठुमरी गायकी के तत्वों से अभिसिंचित किया है। हमारी इस श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” के शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल किये गए ऐसे गीत हैं जिनमे राग, भाव और रस की दृष्टि से उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी के तत्वों का उपयोग हुआ है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे पाँचवें और छठे दशक की ऐसी ही कुछ गैर-पारम्परिक चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात कर रहे हैं। आज हम आपको देव आनन्द और नलिनी जयवन्त अभिनीत 1958 की लोकप्रिय फिल्म "कालापानी" की ठुमरी -"नज़र लागी राजा तोरे बंगले पर...." सुनवा रहे हैं। यह ठुमरी गीत दरअसल एक मुजरा गीत है। इस ठुमरी गीत में आपको मजरुह सुल्तानपुरी के लोक-तत्वों से गूँथे शब्द, सचिनदेव बर्मन द्वारा निबद्ध राग खमाज के स्वर और ठुमकते हुए ताल दादरा की थिरकन का अनूठा संयोजन मिलेगा।


पिछले अंकों में हमने आपके साथ ठुमरी के प्रारम्भिक दौर की जानकारी बाँटी थी। यह भी चर्चा हुई थी कि उस दौर में ठुमरी कथक नृत्य का एक हिस्सा बन गई थी। परन्तु एक समय ऐसा भी आया जब ठुमरी की विकास-यात्रा में थोड़ा व्यवधान भी आया। इस शैली के पृष्ठ-पोषक नवाब वाजिद अली शाह को 1856 में अंग्रेजों ने अपनी साम्राज्यवादी नीतियों के कारण बन्दी बना लिया गया| नवाब को बन्दी बना कर कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) के मटियाबुर्ज नामक स्थान पर भेज दिया गया, नवाब यहाँ पर मृत्यु-पर्यन्त (1887) तक स्थायी रूप से रहे। नवाब वाजिद अली शाह के लखनऊ छूटने से पहले तक ठुमरी की जड़ें जमीन को पकड़ चुकी थीं। इस दौर में केवल संगीतज्ञ ही नहीं बल्कि शासक, दरबारी, सामन्त, शायर, कवि आदि सभी ठुमरी की रचना, गायन और उसके भावाभिनय में प्रवृत्त हो गए थे। वाजिद अली शाह के रिश्तेदार और बादशाह नासिरुद्दीन हैदर के पौत्र वजीर मिर्ज़ा बालाकदर, "कदरपिया" उपनाम से ठुमरियों के प्रमुख रचनाकार थे। आज भी कदरपिया की ठुमरी रचनाएँ संगीत जगत में प्रचलित है। इसके अलावा उस दौर के ठुमरी रचनाकारों और गायकों में उस्ताद सादिक अली, मुहम्मद बख्श, चाँद मियाँ, बिन्दादीन, रमजानी, मिर्ज़ा वहीद कश्मीरी, घूमन, हुसैनी, लज्जतबख्श आदि के नाम उल्लेखनीय है। नवाब वाजिद अली शाह के बन्दी बनाए जाने के बाद कई ठुमरी गायक-गायिकाएँ और नर्तक-नर्तकियाँ नवाब के साथ कोलकाता चले गए। लखनऊ के अन्य ठुमरी कलाकारों ने भी संगीत के अन्य केन्द्रों; बनारस (वर्तमान वाराणसी), गया, पटना, आदि की ओर रुख किया। लखनऊ की ठुमरी का बनारस पहुँचना ठुमरी के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ। दरअसल उस दौर में बनारस का संगीत परिवेश काफी विकसित अवस्था में था। तबला-पखावज वादन, ध्रुवपद और ख़याल गायन के साथ-साथ लोक संगीत की भी एक समृद्ध परम्परा बनारस के संगीत परिवेश में मौजूद थी। ऋतु आधारित लोक संगीत; कजरी, चैती आदि का प्रचलन था। ऐसे वातावरण में जब लखनऊ की ठुमरी बनारस पहुँची तो उसे हाथों-हाथ लिया गया।

बनारस के कई गायक-गायिकाओं ने ठुमरी को न केवल अपनाया बल्कि इस नई शैली को विकसित करने में भी अपना योगदान किया। शब्दों की कोमलता और स्वरों की नजाकत तो ठुमरी में पहले से ही मौजूद थी; बनारस के संगीतज्ञों, विशेष तौर पर तवायफों ने लोक-तत्वों का मिश्रण करते हुए ठुमरी गायन आरम्भ का दिया। यह ठुमरी के साथ एक अनूठा प्रयोग था जिसे रसिकों ने हाथों-हाथ लिया। लोक-रस में भीग कर ठुमरी का सौन्दर्य और अधिक निखरा। आगे चल कर बनारस की यह ठुमरी "पूरब अंग की ठुमरी" के नाम से प्रचलित हुई। बनारस में ठुमरी के साथ हुए प्रयोगों की चर्चा हम श्रृंखला के अगले अंक में जारी रखेंगे। इससे पहले थोड़ी चर्चा आज प्रस्तुत की जाने वाली ठुमरी के विषय में हो जाए। बनारस पहुँचने पर ठुमरी का लोक-रंग में जैसा श्रृंगार हुआ; कुछ उसी प्रकार की फ़िल्मी ठुमरी आज हम आपके लिए लेकर उपस्थित हुए हैं।

आज हम आपको 1958 में प्रदर्शित लोकप्रिय फिल्म "कालापानी" की ठुमरी - "नज़र लागी राजा तोरे बंगले पर..." सुनवा रहे हैं। इस ठुमरी गीत में आपको मजरुह सुल्तानपुरी के लोक- तत्वों से गूँथे शब्द, सचिनदेव बर्मन द्वारा निबद्ध राग "खमाज" के स्वर और ठुमकते हुए ताल दादरा की थिरकन का अनूठा संयोजन मिलेगा। राग खमाज इसी नाम से प्रचलित खमाज थाट से सम्बन्धित माना जाता है। खमाज थाट के स्वर होते हैं- सा, रे ग, म, प ध, नि॒ (कोमल)। अर्थात इस थाट में निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। इस थाट का आश्रय राग ‘खमाज’ कहलाता है। ‘खमाज’ राग में थाट के अनुकूल निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। यह षाड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात राग के आरोह में छः स्वर और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। राग खमाज के आरोह में सा, ग, म, प, ध नि सां और अवरोह में सां, नि (कोमल), ध, प, म, ग, रे, सा स्वरों का प्रयोग होता है। आरोह में ऋषभ स्वर नहीं लगता। राग में दोनों निषाद का प्रयोग होता है। आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद लगाया जाता है। वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग के गायन-वादन का समय रात्रि का दूसरा प्रहर होता है।

यह ठुमरी फिल्म में तवायफ के कोठे पर फिल्माया गया है। अभिनेत्री नलिनी जयवन्त ने इस ठुमरी पर नृत्य किया है। गीत में नायक के बंगले को लक्ष्य करके नायिका अपना समर्पण भाव व्यक्त करती है। दूसरे अन्तरे - "बरस रहती राजा..." के बाद अन्तराल संगीत में बर्मन दादा ने कथक का एक लुभावना तत्कार डाल कर ठुमरी को और भी आकर्षक रूप दे दिया है। बर्मन दादा ने इस गीत में एक और विशेषता उत्पन्न की है; उन्होंने ठुमरी का स्थायी और चारो अन्तरा राग खमाज में निबद्ध किया है, किन्तु अन्तराल संगीत राग विहाग में है। फिल्म "कालापानी" के नायक देवानन्द को फिल्मफेयर का श्रेष्ठ अभिनेता का और नलिनी जयवन्त को श्रेष्ठ सह अभिनेत्री का पुरस्कार प्राप्त हुआ था। फिल्म के इस दृश्य में राज कपूर, विमल रॉय और विजय आनन्द को अतिथि कलाकार के रूप में नलिनी जयवन्त के नृत्य का आनन्द लेते दिखाया गया है।

ठुमरी खमाज : "नज़र लागी राजा तोरे बंगले पर..." : आशा भोसले : फिल्म – कालापानी




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 348वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको 1959 में प्रदर्शित एक फिल्म से एक ठुमरी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक ही प्रश्न का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष के अन्तिम अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद महाविजेताओं की घोषणा भी की जाएगी।




1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 23 दिसम्बर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 350वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 346वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1953 में प्रदर्शित फिल्म “लड़की” से एक ठुमरी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – गीता दत्त

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे प्रतिभागी हैं – एक अन्तराल के बाद मिनिसोटा, अमेरिका से हमारे नियमित पाठक-श्रोता दिनेश कृष्ण जोइस ने पहेली प्रतियोगिता में भाग लिया और तीनों प्रश्नो का सही उत्तर दिया है। अन्य सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं - चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” की आज की कड़ी में आपने 1958 में प्रदर्शित फिल्म “कालापानी” के ठुमरी गीत का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ ऐसे फिल्मी गीतों पर चर्चा करेंगे जिसमें आपको ठुमरी शैली के दर्शन होंगे। आज आपने जो गीत सुना, उसमें राग पीलू का स्पर्श है। इस श्रृंखला में भी हम आपसे फिल्मी ठुमरियों पर चर्चा कर रहे हैं और शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर चर्चा भी करेंगे। हमारी वर्तमान और आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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