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Monday, May 20, 2013

औरंगजेब - सपनों के लिए चुकाई अपनों की कीमत

प्लेबैक वाणी - 46 - संगीत समीक्षा - औरंगजेब

इश्क्जादे फिल्म से अपने करियर की शुरुआत करने वाले अर्जुन कपूर की दूसरी बहुप्रतीक्षित फिल्म औरंगजेब इस सप्ताह प्रदर्शित हुई है. इस फिल्म में ऋषि कपूर, जैकी श्रोफ और पृथ्वीराज प्रमुख भूमिकाओं में हैं. आज देखते हैं कि इस फिल्म का संगीत कैसा है. इस फिल्म के गानों को संगीतबद्ध करा है विपिन मिश्रा और अमर्त्य रोहत ने. गानों के बोल लिखे हैं विपिन मिश्रा, पुनीत शर्मा और मनोज कुमार नाथ ने.

इस एल्बम का पहला गाना है बरबादियाँ. यह गाना काफी सुना जा रहा है आजकल. इसे गाया है मशहूर पाकिस्तानी गायिका सलमा आगा की बेटी साशा आगा ने जो खुद भी इस फिल्म से अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत कर रही हैं. साशा का साथ दिया है राम संपथ ने. यह गाना पार्टियों में खूब बजने वाला है.

जिगरा फकीरा इस एल्बम का दूसरा गाना है. इसे आवाज़ दी है कीर्थी सगाथिया ने. इस गाने में गिटार का इस्तेमाल अच्छे से किया गया है. पंजाबी शब्दों का भरपूर इस्तेमाल करा गया है. यह गाना थोड़ा धीमा जरूर है पर कीर्थी ने इसके साथ पूरा न्याय करा है.

बरबादी के मोहन की आवाज़ में है. गाना काफी धीमा है पर ऑंखें बंद करके सुना जाये तो एक नशे का आभास देता है. यह बहुत ही मधुर गाना है.

अगला गाना औरंगजेब उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाता. यह गाना भी काफी धीमा है. यह गाना औरंगजेब की कहानी को बयां करता है. यह गाना थोड़ा बेहतर हो सकता था

अगला गाना है औरंगजेब का रौक संस्करण. जैसा कि नाम से लगता है यह गाना काफी तेज है जिसे विपिन मिश्रा ने खुद गाया है और संगीतबद्ध करा है. यह गाना औसत है.

इस एल्बम में 4 इंस्ट्रूमेंटल भी हैं. कुल मिलकर यह एल्बम ठीक ठाक है. रेडिओ प्लेबैक इंडिया इसे दे रहा है 3 की रेटिंग 5 में से.
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Monday, April 29, 2013

सिनेमा के शानदार 100 बरस को अमित, स्वानंद और अमिताभ का संगीतमय सलाम

प्लेबैक वाणी -44 - संगीत समीक्षा - बॉम्बे टा'कीस


सिनेमा के १०० साल पूरे हुए, सभी सिने प्रेमियों के लिए ये हर्ष का समय है. फिल्म इंडस्ट्री भी इस बड़े मौके को अपने ही अंदाज़ में मना या भुना रही है. १०० सालों के इस अद्भुत सफर को एक अनूठी फिल्म के माध्यम से भी दर्शाया जा रहा है. बोम्बे  टा'कीस  नाम की इस फिल्म को एक नहीं दो नहीं, पूरे चार निर्देशक मिलकर संभाल रहे हैं, जाहिर है चारों निर्देशकों की चार मुक्तलिफ़ कहानियों का संकलन होगी ये फिल्म. ये चार निर्देशक हैं ज़ोया अख्तर, करण जोहर, अनुराग कश्यप और दिबाकर बैनर्जी. अमित त्रिवेदी का है संगीत तथा गीतकार हैं स्वानंद किरकिरे और अमिताभ भट्टाचार्य. चलिए देखते हैं फिल्म की एल्बम में बॉलीवुड के कितने रंग समाये हैं. 

पहला  गीत बच्चन  हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े सुपर स्टार अमिताभ बच्चन को समर्पित है...जी हाँ सही पहचाना वही जो रिश्ते में सबके बाप  हैं. शब्दों में अमिताभ भट्टाचार्य ने सरल सीधे मगर असरदार शब्दों में हिंदी फिल्मों पर बच्चन साहब के जबरदस्त प्रभाव को बखूबी बयाँ किया है. अमित की तो बात ही निराली है, गीत का संगीत संयोजन कमाल का है. एकतारा का जबरदस्त प्रयोग गीत को वाकई इस दशक में पहुंचा देता है जब हिंदी सिनेमा का पर्याय ही अमिताभ बच्चन हुआ करते थे. बीच बीच में उनके मशहूर संवादों से गीत का मज़ा दुगुना हो जाता है. सुखविंदर की आवाज़ में बहुत दिनों बाद ऐसा दमदार गीत निकला है. खैर हम भी इस गीत के साथ अपनी इडस्ट्री और बच्चन साहब की ऊंची शख्सियत को सलाम करते हैं, और आगे बढते हैं अगले गीत की तरफ.

अक्कड बक्कड बोम्बे बो, अस्सी नब्बे पूरे सौ, सौ बरस का हुआ, ये खिलाड़ी न बूढा हुआ.....वाह स्वानंद साहब ने खूब बयाँ किया है सिनेमा के सौ बरसों का किस्सा. हालाँकि अमित की धुन इंग्लिश विन्गलिश  के कैसे जाऊं मैं पराये देश  से कुछ मिलती जुलती लगती है शुरुआत में, पर धीरे धीरे गीत अपनी लय पकड़ लेता है, सबसे बढ़िया बात ये है कि गीत अपनी रवानी में कहीं भी कमजोर नहीं पड़ता, और श्रोताओं को झूमने की वजह देता रहता है. मोहित की आवाज़ भी खूब जमी है गीत में....

मुर्रब्बा  गीत के दो संस्करण हैं, आमतौर पर अमित के इन ट्रेडमार्क गीतों में शिल्प राव की आवाज़ जरूरी सी होती है, पर इस गीत में महिला स्वर है कविता सेठ की जिनका साथ दिया है खुद अमित ने. छोटा सा मगर बेहद प्रभावी गीत है ये भी. एक बार फिर संगीत संयोजन गीत की जान है. गीत ऐसा नहीं है जो जुबाँ पर चढ जाए पर अच्छा सुनने के शौक़ीन इसे अवश्य पसंद करेंगें .गीत का एक संस्करण जावेद बशीर की आवाज़ में भी है. 

शीर्षक गीत बोम्बे टा'कीस  एक बार फिल्मों के प्रति दर्शकों की दीवानगी को समर्पित है.कैलाश खेर और रिचा शर्मा की आवाजों में ये एक रेट्रो गीत है. स्वानंद के शब्द दिलचस्प हैं. पर मुझे इसका दूसरा संस्करण जिसमें ढेरों गायकों की आवाज़ समाहित है. शान और उदित की आवाजों के साथ कुछ अन्य गीतों की झलक में मिला जुला ये संस्करण अधिक फ़िल्मी लगता है. 

वाकई इन सौ बरसों में फिल्मों के कितने चेहरे बदले पर सौ बरसों के बाद आज भी लगता है जैसे बस अभी तो शुरुआत ही है. फिल्मों का ये कारवाँ यूहीं चलता चले और मनोरंजन के इस अद्भुत लोक में दर्शकों को भरपूर आनंद मिलता रहे यही हम सब की कामना है. एल्बम को रेडियो प्लेबैक दे रहा है ४ की रेटिंग ५ में से. 

एक सवाल श्रोताओं के लिए -
प्रस्तुत एल्बम में एक गीत एक फ़िल्मी नायक को समर्पित है, क्या आपको कोई अन्य गीत याद आता है जो किसी फ़िल्मी व्यक्तित्व पर केंदित है ?


संगीत समीक्षा
 - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी
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Monday, April 22, 2013

क्या प्यार की मदहोशियाँ और सुरीली सरगोशियाँ लौटेगीं ‘आशिकी’ के नए दौर में

प्लेबैक वाणी -43 - संगीत समीक्षा - आशिकी 2



महेश भट्ट और गुलशन कुमार ने मिलकर जब आशिकी की संकल्पना की थी नब्बे के दशक में, तो शायद ये अपने तरह की पहली फिल्म थी जिसके लिए गीतों का चयन पहले हुआ और फिर उन गीतों को माला में पिरोकर एक प्रेम कहानी लिखी गयी. फिल्म के माध्यम से राहुल रॉय और अनु अग्रवाल का फिल्म जगत में पदार्पण हुआ. ये कैसेट्स क्रांति का युग था जिसके कर्णधार खुद गुलशन कुमार थे. गुलशन कुमार हीरों के सच्चे पारखी थे, जिन्होंने चुना कुमार सानु, अलका याग्निक, अनुराधा पौडवाल और नितिन मुकेश को पार्श्वगायन के लिए, संगीत का जिम्मा सौंपा नदीम श्रवण को और गीतकार चुना समीर को. ये सभी कलाकार अपेक्षाकृत नए थे, मगर इस फिल्म के संगीत की सफलता के बाद ये सभी घर घर पहचाने जाने लगे. ये विज़न था गुलशन कुमार और महेश भट्ट का, जिसने तेज रिदम संगीत के सर चढ कर बोलते काल में ऐसे सरल, सुरीले और कर्णप्रिय संगीत को मार्केट किया. फिल्म के पोस्टर्स तक बेहद रचनात्मक रूप से रचे गए थे, जिसमें बेहद सफाई से युवा नायक और नायिका का चेहरा उजागर होने से बचाया गया था. ये आत्मविश्वास था उस निर्माता निर्देशक टीम का जिन्होंने साबित कर दिया कि चमकते सितारों के चेहरों के परे भी संगीत का वजूद संभव है.

हिंदी फिल्म संगीत के सफर में आशिकी एक मील का पत्थर था, लगभग दो दशक बाद गुलशन कुमार के सुपत्र भूषण ने फिर एक बार वही आशिकी का दौर लौटने की सोची फिर एक बार महेश भट्ट के मार्गदर्शन में. पर जाहिर है दौर बदल चुका है, दो दशकों में देश की दिशा, दशा और सोच सब कुछ बदल चुका है. तो यक़ीनन बहुत कुछ आशिकी २  में भी बदलना लाजमी है. नई आशिकी के निर्देशक हैं मोहित सूरी, संगीत का जिम्मा आजकल के चलन अनुरूप सीमित हाथों में न होकर एक पूरी टीम ने मिल बाँट कर संभाला है. रोक्क् संगीत ने मेलोडी की जगह भर दी है, पर बहुत कुछ ऐसा है जो नहीं बदला है यहाँ भी संगीत नामी गिरामी चेहरों का मोहताज नहीं है, किसी भी आईटम गीत का जबरदस्ती का दखल नहीं है और सबसे बढ़कर, ये आशिकी भी संगीत प्रेमियों के दिलो-जेहन में अच्छे और सच्चे संगीत के प्रति आस्था और उम्मीद का संचार करता है, चलिए एक नज़र डालें एल्बम के गीतों पर

बर्फी के फिर ले आया दिल की मधुरता को सुनकर ही सही पर भूषण ने अरिजीत सिंह को प्रमुख गायक के रूप में चुनकर अपने पिता के हुनर को (सही घोड़े पर दांव लगाने के) एक कदम आगे ही बढ़ाया है. अरिजीत की मखमली और जूनून से भरी आवाज़ में तुम ही हो सुनकर आनंद आ जाता है. गिटार का क्या खूब इस्तेमाल किया है संगीतकार मिथुन ने. शब्द सरल और बेहद रोमानियत से भरपूर है. ये गीत जवां दिलों को धड्कायेगा और मासूम आशिकी का सुनहरा दौर फिर से लौटा लाएगा यक़ीनन.

सुन रहा है न तू के संगीतकार गायक हैं अंकित तिवारी. गीत सोफ्ट सूफी रोक्क् जोनर का है, जहाँ गीतकार संदीप नाथ शब्दों के मानों को लेकर कुछ उलझन में सुनाई देते हैं मंजिलें रुसवा हैं और करम की अदाएं जैसे फ्रेस अपने नए थीम के बावजूद शाब्दिक रूप से गीत को कमजोर बना देते हैं, पर कुछ गीत ऐसे होते हैं जिनमें किसी एक पक्ष के कमजोर होने पर भी अन्य पक्षों की उत्कृष्टता उन कमियों को छुपा से देते हैं, ये शानदार गीत भी उसी श्रेणी का है. अंत में कोरस का प्रयोग गीत को और जानदार बना देता है

चाहूँ मैं आना और हम मर जायेंगें में अल्बम रोक्क् जोनर से निकल कर मेलोडी में प्रवेश करने की एक हल्की सी कोशिश करती है. गीत बुरे नहीं है, पर ये आज के दौर के श्रोताओं को लुभा पायेगा या नहीं ये कहना जरा मुश्किल है. अगला गीत मेरी आशिकी दरअसल तुम ही हो का फेमेल संस्करण है जिसमें अरिजीत के साथ आवाज़ मिलायी है पलक मुछल ने.

पिया आये न,  के के और तुलसी कुमार की आवाज़ में नयेपन से भरपूर है, वहीँ सुन रहा है न तू का भी एक फेमेल संस्करण है जिसे श्रेया घोषाल ने भी बहुत खूब निभाया है. ये संस्करण भारतीय जोनर में है जिसमें बाँसुरी और संतूर को भी जोड़ा गया है, गीत बढ़िया है पर व्यक्तिगत तौर पर मुझे अंकित का खुद का संस्करण अधिक दमदार लगा.

जीत गंगुली का स्वरबद्ध किया और संजय मासूम का लिखा भुला देना, पाकिस्तानी गायक मुस्तफा जाहिद की आवाज़ में है. यानी भट्ट कैम्प का ये टोटका भी सही काम कर गया. वहीँ आसान नहीं यहाँ में इरशाद को गीतकार चुनकर भूषण ने एक सटीक दांव खेला है पर मिलने है मुझेसे आई एक सामान्य सा गीत है

कुल मिलकार आशिकी २ एक धीमा नशा है, जिसका असर धीरे धीरे श्रोताओं पर चढेगा. अब भूषण के मार्केटिंग स्किल्स गुलशन कुमार के विज़न की कितनी बराबरी कर पाते हैं ये देखना दिलचस्प होगा. बहरहाल हम तो चाहेंगें कि आशिकी २ का संगीत फिर से माहौल में प्रेम की सरगोशियाँ बढ़ा दे और संगीत का माधुर्य फिर एक बार सर चढ कर बोले. रेडियो प्लेबैक दे रहा है इस एल्बम को ४.३ की रेटिंग.    


संगीत समीक्षा
 - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी
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Monday, April 15, 2013

एक डायन जो डराती नहीं, सुरीली तान छेड़ माहौल खुशगवार बनाती है!

प्लेबैक वाणी -42 - संगीत समीक्षा - एक थी डायन

इस साल की शुरुआत विशाल और गुलज़ार की टीम रचित मटरू की बिजिली का मंडोला से हुई थी. यही सदाबहार जोड़ी एक बार फिर श्रोताओं के समक्ष है इस बार एक डायन की कहानी के बहाने. जी हाँ एक थी डायन के संगीत एल्बम के साथ वापसी कर रही है विशाल की पूरी की पूरी टीम. चलिए मिलते हैं इस संगीतमय डायन से आज.  

सूरज से पहले जगायेंगें, और अखबार की सारी सुर्खियाँ पढ़ के सुनायेंगें...मुँह खुली जम्हायीं पर हम बजायेंगें चुटकियाँ....बड़े ही अनूठे अंदाज़ से खुलता है ये गीत, जहाँ पहली पंक्ति से ही गुलज़ार साहब श्रोताओं के कान खड़े कर देते हैं. हालाँकि विशाल की धुन में कहीं कहीं सात खून माफ केओ मामा की झलक मिलती है, पर सच मानिये शब्दों का नयापन सारी खामियों को भर देता है, उस पर सुनिधि की आवाज़ जादू सा असर करती है. हालाँकि क्लिंटन की आवाज़ भी उनका भरपूर साथ देती है.

सपने में मिलती है में खनकती सुरेश वाडकर की आवाज़ आज भी दिल को गुदगुदा जाती है. संजीदा आवाज़ वाले सुरेश से मस्ती वाले ऐसे गीत विशाल बखूबी गवा सकते हैं. तोते उड़ गए एक ऐसा ही गाना है. हरी हरी जो लागे, घास नहीं है काई....गुलज़ार साहब एक बार फिर पूरे फॉर्म में हैं यहाँ. गीत के तीन हिस्से हैं, सुरेश की आवाज़ के बाद रेखा कमान संभालती है और उनकी जुगलबंदी को कुछ और शरारत और देसी अंदाज़ से रोशन करते हैं सुखविंदर. विशाल की धुन जुबाँ पे चढ़ने वाली है और आजकल के आईटम गीतों पर ये मिटटी से जुडा मगर कदम थिरकाता गीत भारी पड़ता है.

अगला गीत काली काली आँखों का एक सुरीला आश्चर्य लेकर आता है. क्लिंटन की आवाज़ एकदम सही इस्तेमाल किया है विशाल ने. उनकी लो टोन का असर गजब का है उस पर गुलज़ार साहब के शब्द श्रोताओं को एक और ही दुनिया में पहुंचा देते हैं. विशाल का एक और मास्टर पीस है ये गीत. सुन्दर संयोजन और सरल धुन इस गीत को लंबे समय तक श्रोताओं के जेहन में ताज़ा रखेगा.

जब बात डायन की हो तो कुछ हौन्टिंग गीत का होना लाजमी है. विशाल मूड बनाते है गूंजते सन्नाटों और पायल की हल्की हल्की झंकारों से. लौटूंगी मैं तेरे लिए रेखा की आवाज़ में कशिश भरा अवश्य है, पर कहीं कहीं धुन और संयोजन में माचिस के याद न आये कोई की झलक है. फिल्म के मूड और थीम के हिसाब से सही लगता है गीत, पर शायद ये और थोडा असरकारक हो सकता था.

बारह साल के पद्मनाभ गायकवाड की आवाज़ में है अंतिम गीत सपना रे सपना. पद्मनाभ सारेगामापा लिटटल चैम्प का हिस्सा थे. भूरे भूरे बादलों के भालू, लोरियाँ सुनाये ला ला लू, तारों के कंचों से रात भर खेलेंगें....वाह, कहाँ सुनने को मिलते हैं है ऐसे काव्यात्मक गीत इन दिनों. एक मधुरतम गीत जिसमें बाँसुरी का पीस लाजवाब है. और पद्मनाभ की आवाज़ वाकई में एक खोज है. एक यादगार गीत. शुक्रिया गुलज़ार साहब और विशाल इस अनूठे तोहफे के लिए.

बहरहाल एक थी डायन का संगीत मधुर भी है और सुरीला भी. शब्दों की गहराई इसे हर मायने में एक शानदार एल्बम बनाती है. रेडियो प्लेबैक दे रहा है इसे ४.५ की रेटिंग.   

संगीत समीक्षा
 - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी
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Monday, April 8, 2013

सुनने वालों को ‘हूकां’ मार पुकारता है ‘नौटकी साला’ का संगीत

प्लेबैक वाणी -41 - संगीत समीक्षा - नौटंकी साला



सीमित संसाधनों का इस्तेमाल कर कम बजट की फिल्मों का चलन इन दिनों बॉलीवुड में जोरों पर है. इन फिल्मों में अक्सर अनोखी कहानियाँ के तजुर्बे होते हैं और अगर इन फिल्मों में संगीत जोरदार हो तो मज़ा कई गुना बढ़ जाता है. आज हम एक ऐसी ही फिल्म के संगीत की चर्चा करेंगे जिसमें सभी कलाकार अपेक्षाकृत नए या कम चर्चित हैं और जहाँ गीत संगीत का जिम्मा भी किसी एक बड़े संगीतकार गीतकार ने नहीं बल्कि नए और उभरते हुए कलाकारों की पूरी टीम ने मिलकर संभाला है. फिल्म है ‘नौटंकी साला’ जिसके संगीत की चर्चा आज हम करेंगें ताजा सुर ताल के इस साप्ताहिक स्तंभ में.

बेहद प्रतिभाशाली फलक शबीर ने अपने ही लिखे और स्वरबद्ध गीत को अपनी आवाज़ दी है मेरा मन गीत में. हालाँकि ये उनका कोई नया गीत नहीं है, उनकी एक पुरानी प्रसिद्ध एल्बम का मशहूर गीत था ये, पर अधिकतर भारतीय श्रोताओं के ये काफी हद तक अनसुना ही है, यही कारण है कि ये गीत तेज़ी से इन दिनों लोकप्रिय हुआ जा रहा है. इस सरल मधुर रोमांटिक गीत में युवा धडकनों को धड़काने का पर्याप्त माद्दा है.

अपने पहले ही गीत पानी द रंग से लोकप्रियता की ऊंचाईयों को छूने वाले आयुष्मान खुराना का दूसरा गीत भी उनके पहले ही गीत की तरह दीवाना बना देने वाला है. साड्डी गली आजा में उनके साथ आवाज मिलाई है उभरती हुई गायिका नीति मोहन ने. शब्द बेहद सरल सीधे मन में उतर जाने वाले हैं, विशेषकर हूकां शब्द का चयन और उच्चारण बेहद प्रभावशाली बन पड़ा है. धुन मधुर होने के साथ साथ बार बार सुनने पर भी मन को आकर्षित करने वाली है. यक़ीनन ये गीत वर्ष २०१३ के श्रेष्ठ गीतों में शुमार होने वाला है. आयुष्मान की आवाज़ में एक सादगी है और सच्चाई भी जो स्वाभाविक ही श्रोताओं को बेहद भा जाती है.

आयुष्मान की ही आवाज़ में तू ही तू भी उतना ही लाजवाब है पर ये सड्डी गली जैसा सर चढ़ने वाला तो बिल्कुल नहीं है. कौसर मुनीर के शब्द और मिकी मेक्लेरी का संगीत मनभावन है.

गीत सागर का गाया ड्रामेबाज फिल्म के थीम के अनुरूप है – मजेदार, और चूँकि आज कल के चलन के अनुरूप एक सूफी रोक् गीत जरूरी है तो राहत साहब की आवाज़ में सपना मेरा टूटा भी मौजूद है. गीत दर्द भरा है. इसके अलावा फिल्म में सो गया ये जहाँ (मूल तेज़ाब फिल्म से, संगीत -लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, गीत – जावेद अख्तर) और धक् धक् करने लगा (मूल फिल्म – बेटा, संगीत – आनंद मिलिंद, गीत – समीर) का रीमिक्स संस्करण भी मौजूद है, जो शायद उस पीढ़ी को पसंद आ सकते हैं जिन्होंने इनके मूल संस्करण नहीं सुने हैं.

वैसे एल्बम में एक और गीत है जिसे एक नगीना कहा जा सकता है, ये गीत भी एक अभिनेत्री से गायिका बनी सबा आज़ाद की अनूठी आवाज़ में है और यही आवाज़ इस गीत की सबसे बड़ी विशेषता भी है. दिल की तो लग गयी को मिकी ने सुन्दर संगीत संयोजन से संवारा है और कौसर के शब्द भी अनूठे हैं. नयेपन से सराबोर ये गीत एल्बम के सबसे बेहतरीन गीतों में से एक है.

एल्बम में सभी खास गीतों के कई कई संस्करण मौजूद हैं जिनकी जरुरत क्यों है, समझ से बाहर है. साड्डी गली, दिल की तो लग गयी, तू ही तू और मेरा मन जैसे ताजगी से भरे गीतों ने एल्बम को औसत से ऊपर ही रखा है रेडियो प्लेबैक इण्डिया दे रहा है इसे ४.१ की रेटिंग ५ में से.                  

संगीत समीक्षा - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी


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संगीत समीक्षा - नौटंकी साला


Monday, April 1, 2013

संगीत की सुरीली बयार – अमन की आशा

प्लेबैक वाणी -40 - संगीत समीक्षा - अमन की आशा

दोस्तों, आज हम चर्चा करेंगें एक और एल्बम की, अमन की आशा के पहले भाग को श्रोताओं ने हाथों हाथ लिया तो इस सफलता ने टाईम्स म्यूजिक को प्रेरित किया कि इस अनूठे प्रयास को एक कदम और आगे बढ़ाया जाए. आज के इस दौर में जब फ़िल्मी संगीत में नयेपन का अभाव पूरी तरह हावी है, अमन की आशा सरीखा कोई एल्बम संगीत प्रेमियों की प्यास को कुछ हद तक तृप्त करने कितना कामियाब है आईये करें एक पड़ताल.

एल्बम में इतने बड़े और नामी कलाकारों की पूरी फ़ौज मौजूद है कि पहले किसका जिक्र करें यही तय नहीं हो पाता, बहरहाल शुरुआत करते हैं आबिदा परवीन की रूहानी सदा से. गुलज़ार साहब फरमाते हैं कि ये वो आवाज़ है जो सीधे खुदा से बात करती है, वाकई उनके तूने दीवाना बनाया तो मैं दीवाना बना...को सुनकर इस बात का यकीन हो ही जाता है. इस कव्वाली को जब आबिदा मौला की सदा से उठाती है तभी से श्रोताओं को अपने साथ लिए चलती है और होश वालों की दुनिया से दूर हम एक ऐसे नशीले से माहौल में पहुँच जाते हैं जहाँ ये आवाज़ हमें सीधे मुर्शिद से जोड़ देती है....बहतरीन...बहतरीन...आबिदा की आवाज़ का जादू इस एल्बम में आप तीन बार और सुन सकते हैं प्रीतम मत परदेस जा और बुल्ले नुं सम्झावां भी उतने ही असरकारक हैं, जब आवाज़ ही ऐसी हो कोई क्या करे, पर तूने दीवाना बनाया की बात तो कुछ और ही है.

चलिए अब बात राहत साहब की करें. फ़िल्मी गीतों में बेशक बेहद लोकप्रिय है इन दिनों पर जब एस तरह की एल्बम के लिए वो तान खींचते हैं तो यकीं मानिये उनकी आवाज़ की कशिश कई गुना बढ़ जाती है. वो नुसरत साहब के नक़्शे कदम पर चलते सानु एक पल चैन न आवे गाते हैं तो वहीँ मैं तैनू समझावा की में तो जैसे वो कहर ढा देते हैं. इस गीत में इतना ठहराव है कि आप आँखें मूँद कर सुनते जाईये और गीत खत्म होते होते आपकी पलकें भी नम हो उठेगीं. यही असर है इस बेमिसाल गीत का.

तीन दिग्गज अपनी आवाज़ का हुस्न बखेर कर मौहोल को सुर गुलज़ार कर देते हैं, तीनों के मूड अलग अलग हैं पर हर अंदाज़ अपने आप में दिलकश दिलनशीं. नुसरत साहब की कव्वाली अली द मलंग झूमने को मजबूर कर देगा तो अब के हम बिछड़े में मेहदी हसन साहब, एहमद फ़राज़ के शब्दों में जान फूंकते मिलते हैं, तो वहीँ गुलाम अली साहब दिल में एक लहर सी उठी है अभी में अपनी चिर परिचित मुस्कान होंठों पर लिए सुनने वालों के दिलों की लहरों में हलचल मचाते सुनाई देते हैं.

अत्ता उल्लाह खान साहब की आवाज़ इस एल्बम में एक सुखद आश्चर्य है, जिस तरह मुकेश की आवाज़ में शब्दों में छुपा दर्द और गहराई से उभर कर आता है उसी तरह अत्ता उल्लाह की आवाज़ में छुपी दर्द की टीस को श्रोता शिद्दत से महसूस कर पाते हैं ये कैसा हम पे उमर इश्क का जूनून है....

चलिए अब बात करें भारतीय फनकारों की. छाप तिलक का पारंपरिक अंदाज़ पूरी तरह से नदारद मिलता है कविता सेठ के गाये संस्करण में, मुझे तो मज़ा नहीं आया. पर इस कमी को हरिहरण साहब पूरी तरह से पूरी करते नज़र आते हैं. जब भी मैं एक आधुनिक भजन है जिसमें सुन्दर शुद्ध हिंदी के शब्दों में कवि ने सुन्दर चित्र रचा है और हरी की आवाज़ ने गीत की सुंदरता को बरकरार रखते हुए भरपूर न्याय किया है.

रशीद खान के स्वरों में राजस्थानी लोक रस का माधुर्य झलकता है सतरंगी मोरे अंगना में पधारो में, नूरजहाँ की दिलकश आवाज़ पहले संस्करण की तरह यहाँ भी मौजूद है, पर लता जी की जगह ले ली है आशा ताई ने. इनके अलावा वाडली बंधू भी अपनी मौजूदगी से श्रोताओं को सराबोर करते सुनाई देते हैं. अजब तेरा कानून देखा खुदाया में फिर एक बार शब्द और स्वरों की दिलकश अदायगी का उत्कृष्ट संगम सुनने को मिलता है. दोस्तों पहले संस्करण की भांति ये एल्बम भी हर संगीत प्रेमी के लिए संग्रहनीय है. रेडियो प्लेबैक दे रहा है इस नायाब एल्बम को ४.९ की रेटिंग ५ में से.          

संगीत समीक्षा - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी


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संगीत समीक्षा - अमन की आशा


Monday, March 25, 2013

युवाओं को एक नए भारत की सृष्टि के लिए आन्दोलित करता एक संगीतमय प्रयास

प्लेबैक वाणी -38 - संगीत समीक्षा - बीट ऑफ इंडियन यूथ


संगीत केवल मनोरंजन की वस्तु नहीं है। इसका मूल उद्देश्य इंसान के मनोभावों को एक कैनवास, एक प्लेटफॉर्म देना है। इसकी कोशिश यह होनी चाहिए कि समय-समय पर डूबती उम्मीदों को तिनके भर का हीं सही लेकिन सहारा मिलता रहे। आज अपने देश में हालात यह हैं कि हर इंसान या तो डरा हुआ है या बुझा हुआ है। युवा पीढी रास्ते में या तो भटक रही है या रास्ते को हीं दुलाती मार रही है। इस पीढी की आँखें खोलने के लिए संगीत की कमान थामे कुछ फ़नकार आगे आए हैं। उन्हीं फनकारों की संगीतमय कोशिश का नाम है ’बीट ऑफ इंडियन यूथ’। इस एलबम में कुल ९ भाषाओँ के १३ गाने हैं, जो कि एक विश्व रिकॉर्ड है. एल्बम गिनिस बुक ऑफ रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज कराने की कगार पर है. एलबम की एक और प्रमुख खासियत यह है कि इसे डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम का साथ और आशिर्वाद हासिल है। पहला गाना इन्हीं ने लिखा है।

कम साज़ों के साथ शुरू होता ’द वीज़न’ बच्चे की मासूमियत में घुले हुए डॉ कलाम के शब्दों के सहारे खड़ा होता है और फिर सजीव सारथी के शुद्ध हिन्दी के शब्द इसके असर को कभी ठहराव तो कभी गति देते हैं। राष्ट्र को सुखी, समृद्ध एवं स्वावलंबी बनाने की बातें कही गई हैं और यह तभी हो सकता है जब सब मिलकर आगे बढें। इस एलबम की सोच भी यही है, यही वीज़न है। संगीतकार कृष्णा राज और आवाज़ के तीनों हीं फ़नकारों (उन्नी, श्रीराम एवं मीरा) के सपने शब्द-शिल्पियों के जैसे हीं हैं। इसीलिए गाने में संदेश उभरकर आया है। बस मुझे यह लगा कि भावुकता खुलकर आई है, लेकिन जोश में थोड़ी कमी रह गई। शायद ’परकशन इंस्ट्रुमेंट्स’ थोड़े और जोड़े जा सकते थे।

अगला गाना है ’असतो मा सद्गमय’। अक्षि उपनिषद की यह पंक्ति जो शांति मंत्र के रुप में जानी जाती है, एक प्रार्थना है, एक दुआ है। ये शब्द बढने की प्रेरणा देते हैं। लॉयड ऑस्टिन ने इन्हीं शब्दों की नींव पर कोंकणी की इमारत खड़ी की है। संगीत सुलझा हुआ है। रोशन डिसुज़ा संस्कृत और कोंकणी के ट्रांजिशन में अपनी पकड़ कमजोर नहीं होने देते। प्रकाश महादेवन की भी मैं इसी खासियत के लिए तारीफ करूँगा। उनकी आवाज़ में ज़रूरी मात्रा में खनक है, खरापन है, खुलापन है। कोरस का इस्तेमाल बढिया है। कुल मिलाकर यह गीत खुद को बरसों तक जीवित रखने में सफल हुआ जाता है।

’थीम सांग’.. यह नाम है तीसरे गाने का। धुन जितनी मुश्किल है, उतनी हीं आसानी से सजीव सारथी ने इस पर बोल गढे हैं। एक जोश है शब्दों में और गाने की ताल सच में ताथैया करती है। उम्मीद है कि आसमान छूने को प्रेरित करता यह गीत सुनने वालों को झूमने पर भी बाध्य कर देगा। उन्नी की आवाज़ में मधुरता है और कुहू की आवाज़ में हल्का मर्दानापन। इसे अनुपात से संतुलित किया जा सकता था या फिर शायद यह जानबूझकर किया गया है। खैर.. इन बातों से गाने का असर ज़रा भी नहीं बिगड़ता।

भांगड़ा पंजाबियत की पहचान है, एक उत्सव है, अपना दिल खोलकर रखने की एक कवायद है। ’इंडिया सानु’ गाने में अमनदीप अपनी आवाज़ और शब्दों के साथ यही कोशिश करते हैं। संगीत है प्रभजोत सिंह का। हिन्दुस्तान को अपनी जान कहने की यह कोशिश थोड़ी कामयाब भी है, लेकिन गाने के तीनों हीं पक्ष पारंपरिक तरीके के लगते हैं। नीयत सही जगह पर है, लेकिन गाने में उतनी जान नहीं आ पाई। जिस नयेपन की दरकार थी, वह कहीं रह-सी गई है, ऐसा लगता है।

इलेक्ट्रॉनिक गिटार एक गजब की शय है। शांत बैठे हुई साँसों को भी हवा में उड़ाने लगता है। “वा वा जय कलाम” में कलाम की शख्सियत यूँ तो की बोर्ड पर गढी गई है, लेकिन उनकी ऊँचाई नज़र आती है गिटार के परवाज़ से हीं। विष्णु की आवाज़ है और हरेश के बोल। परंतु इस गाने की यू एस पी, इस गाने की जान हैं जिबिन जॉर्ज। संगीत की दृष्टि से यह गाना जितना ज़रूरी है, उतनी हीं इसकी महत्ता राष्ट्रभक्ति और मोटिवेशन के लहजे से है। इस गीत के साथ मैं भी डॉ कलाम को नमन करता हूँ।

बांग्ला भाषा मेरे दिल के करीब है। एक शीतलता, एक सौम्यता दिखती है इसमें। कहते हैं कि जब ज़बान मीठी हो, तो ख्याल, शब्द, संगीत, रिश्ते सब कुछ मीठे हो जाते हैं। ऐसे में अगर ये रिश्ते दूर होने लगें तो दर्द गहरा होगा। इलेक्टॉनिक साजों पर सजा यह गीत अंदर के गुबार को बाहर लाने के लिए आवाज़ में भारीपन का सहारा तो लेता है, लेकिन भीतर छुपी कोई चोट अंत होते-होते मधुरता और भावुकता में तब्दील हो हीं जाती है। शेखर गुप्ता की आवाज़ ऐसे गानों के लिए “टेलर मेड” है। श्रृजा सिन्हा तेज धुन पर साफ सुनाई नहीं देतीं, लेकिन धुन मद्धम होते हीं अपनी रवानी पर आ जाती हैं। जे एम सोरेन का प्रयास दिखता है। हाँ सुमंता चटर्जी से बस यह जानना चाहूँगा कि “मोने पोरे” बहुत हीं कॉमन एक्स्प्रेशन है क्या बंगाल में? 

घोर निराशा में उतरा यह दिल आशा की खिड़की तक देख नहीं पाता। ऐसे में डेसमंड फरनांडीज का यह कहना कि ’हेवेनली फादर.. यू टेक अवे माई पेन’ बहुत हीं खास मायने रखता है। आवाज़ में खुद को जगाने की जो जद्दोजहद है, वह बड़ी हीं काबिले-तारीफ है। संगीत सधा हुआ है। शब्द उड़ने के लिए आमंत्रित करते हैं और जैसे हीं ’आई फ्लाई’ का उद्घोष होता है, मन होता है कि सारी बेड़ियाँ कुतर दी जाएँ। गाना जो आधा सफर तय कर चुका होता है तब एक धुन कई बार दुहराई गई है। मुझे यह धुन कुछ सुनी-सुनी-सी लगी या फिर हो सकता है कि इस धुन का असर “देजा वु” की तरह हो। फिर भी मुझे लगा कि इस धुन पर जोशीले शब्द गढे जा सकते थे, जो गीतकार से छूट-से गए। डेसमंड मेरी इस राय से शायद इत्तेफाक रखते हों। खैर…. मुझे पिछले ७ गानों में सबसे ज्यादा इसी ने प्रभावित किया।

अगला गाना है “लफ़्ज़ नहीं मिलते”। यह गाना एलबम में मिसफिट-सा मालूम होता है। बोल कमज़ोर हैं तो वहीं गायक की मेहनत भी कहीं कहीं कन्नी काटकर निकलने जैसी लगती है। ऐसा नहीं है कि आवाज़ में कहीं कोई खामी है, लेकिन दो-चार जगहों पर जबरदस्ती की गई तुकबंदी गायक को शब्द चबाने पर मजबूर कर गई है। संगीत आज के बॉलीवुड गानों जैसा है इसलिए ज़ेहन पर चढ तो जाता है लेकिन नयापन गैरमौजूद है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि तीनों हीं पहलुओं पर अनुदत्त और श्रीधर को और ध्यान देने की ज़रूरत थी। गाने का निराशावादी होना भी मुझे खटक गया। 

कह नहीं सकता कि जे एम सोरेन की मीठी आवाज़ का कमाल है या फिर संथाली भाषा हीं शक्कर-सी मीठी है कि ’जोनोम देशोम’ दिल में एकबारगी हीं उतर जाता है। साजों का इस्तेमाल जरूरत के हिसाब से किया गया है, जिससे एक वृत्त में घूमते नृतकों और वाद्य-यंत्रों का माहौल तैयार हो रहा है। शायद मादल है। कहीं कहीं एकतारा-सा भी बजता मालूम होता है। हिमालय, हिन्द महासागर, हिन्दुस्तान और इसके गाँवों की सुंदरता का बखान इससे बेहतर तरीके से शायद हीं हो सकता था। लाउस हंसदक का लिखा यह गाना मुझे बरसों याद रहेगा… यकीनन।

बॉलीवुड में सईद कादरी कई सालों से लिख रहे हैं और हिट पे हिट गाने दिये जा रहे हैं। फिर भी मुझे उनके गानों में एक कमी खटकती है और वह है कुछ नया कहने की जद्दोजहद, जिद्द। “क्या यही प्यार है”.. यह बात न जाने कितनी बार हमें सुनाई जा चुकी है। इसलिए हम किसी अलहदा एक्सप्रेशन की खोज में रहते हैं। “मुझसे दिल” गाने में श्रीधर भी उसी ढर्रे पर चलते नज़र आ रहे हैं। हाँ यहाँ पर संगीतकार अनुदत्त अपनी तरफ से सफल कहे जा सकते हैं। साजों का प्रयोग बेहतर है और उनकी आवाज़ में एक तरलता, एक प्रवाह भी है। फिर भी एक बदलाव के तौर पर प्रोफेशनल गायक का इस्तेमाल किया जा सकता था। शायद शेखर गुप्ता अच्छे चुनाव होते।

एलबम का अगला गाना है ’गेलुवा बा’। यह ’वा वा जय कलाम’ का कन्नड़ संस्करण है, इसलिए संगीत के लिहाज से वहीं ठहरता है जहाँ मूल तमिल गाना था। शब्द सूर्य प्रकाश के हैं। चूँकि मुझे इस भाषा की कोई जानकारी नहीं ,इसलिए मैं कथ्य पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकता। तमिल के बरक्स इस गाने में आवाज़ खुद जिबिन जॉर्ज की है। ’वा वा कलाम’ में विष्णु सी सलीम खुले गले से गाते मालूम हो रहे थे, लेकिन यहाँ जिबिन की आवाज़ कुछ दबी-सी है और यही इस गाने का कमजोर पक्ष है। 

आतंकवाद और इसकी जड़ में छुपे आत्मघाती दस्ते हिन्दुस्तान के इतिहास के लिए नए नहीं हैं। इसलिए दरकार है कि आज की युवा पीढी इनके दुष्परिणामों से परिचित रहे। सजीव सारथी अपने लिखे ’मानव बम’ में यही प्रयास करते दिखते हैं। किसी जन्नत की ख्वाहिश में दुनिया को जहन्नुम करने चले ये मौत के सौदागर कहीं और से तो नहीं आए, यही जन्मे है और यही गढे गए हैं। संदेश साफ है। फिर भी ’है धोखा जैसे खौफ़ का’ जैसी पंक्तियों से बचा जा सकता था। कोशिश तुकबंदी की है, लेकिन न अर्थ खुल रहा है और न हीं धुन सज रही है। रोडर की आवाज़ में एक मासूमियत है, जिसमें जोश पूरा नहीं उतर पाया है। हाँ जे एम सोरेन सौ फीसदी सही रास्ते पर हैं। जॉनर रॉक है, इसलिए लाइव कंसर्ट जैसी फीलिंग है। बस एक फाईनल ड्राफ्ट हो जाता तो यह गाना इस एलबम का बेस्ट साँग होता।

’टु रु टु रु टु रु टु रु’… वाह.. यह सुनते हीं दिल खुद-ब-खुद गाने में डूब जाता है। ऐसा हीं जादू है ’नी एन्निल’ गाने का। बोल मलयालम के हैं, जिसे खुद संगीतकार राकेश ने जिबिन के साथ मिलकर रचा है। वैसे यह गाना पूरा का पूरा राकेश केशव का हीं है। इनकी आवाज़ रेशम की तरह फ्री फ्लोविंग है और हर ठहराव अपनी नियत जगह पर है। संगीत और साजों का इस्तेमाल गाने के मूड को परफेक्टली सूट करते हैं। बाकी यह कहना तो मुश्किल है कि ऐसा कौन-सा तड़का है इस गाने में जो इसे खास बनाता है। कुछ तो है जो बस महसूस किया जा सकता है, शब्दों में उतारा नहीं जा सकता। 

तो यह था ’बीट ऑफ इंडियन यूथ’ एलबम के गानो का रिव्यू। मेरी कोशिश थी कि एक संतुलित और ईमानदार राय दे सकूँ। आप भी सुनिए और अपनी राय हमसे शेयर कीजिए। हमें इंतज़ार रहेगा।       

संगीत समीक्षा - विश्व दीपक 
आवाज़ - अमित तिवारी


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संगीत समीक्षा - बीट ऑफ इंडियन यूथ


Monday, March 18, 2013

‘रंगरेज’ की कूची में अपेक्षित रंगों का अभाव मगर सुर सटीक

प्लेबैक वाणी -37 - संगीत समीक्षा - रंगरेज


निर्माता वाशु भगनानी अपने बेटे जैकी को फिल्म जगत में स्थापित करने में कोई कसर छोडना नहीं चाहते. तभी तो उन्होंने भी रिमेक के इस दौर में एक और हिट तमिल फिल्म नाडोडीगल का हिंदी संस्करण बनाने की ठानी और निर्देशन का भार सौंपा रिमेक एक्सपर्ट प्रियदर्शन के कंधों पर. फिल्म तेलुगु, मलयालम और कन्नडा संस्करण पहले ही बन चुके हैं. जैकी अभिनीत इस फिल्म को शीर्षक दिया गया है रंगरेज. 

इस फिल्म की एक और खासियत ये है कि इस फिल्म के लिए निर्देशक प्रियदर्शन और छायाकार संतोष सिवन १५ साल के अंतराल के बाद फिर एक साथ टीमबद्ध हुए हैं. फिल्म का अधिकतर हिस्सा एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती के रूप में मशहूर मुंबई के धारावी इलाके में शूट हुआ है, इसी कारण फिल्म की टीम ने इसका संगीत भी जनता के समक्ष रखा इसी धारावी के दिल से. फिल्म में संगीत है साजिद वाजिद का जिन्हें साथ मिला है दक्षिण के संगीतकार सुन्दर सी बाबू का, जिन्होंने मूल तमिल संस्करण में भी संगीत दिया था. आईये देखें इस रंगरेज की कूची में कितने रंगों के गीत हैं श्रोताओं के लिए.

पहला गीत है राहत फ़तेह अली खान और हिराली के स्वरों में दिल को आया सुकूँ. गीत का कलेवर दबंग के तेरे मस्त मस्त दो नैन जैसा ही है. समीर के शब्द सुरीले हैं. साजिद वाजिद की धुन भी मधुर है, विशेषकर पहले अंतरे के बाद इश्क इश्क अल्लाह अल्लाह वाला हिस्सा खासा दिल को छूता है. कुछ नया न देकर भी गीत सुनने लायक अवश्य है. हिराली ने राहत का बढ़िया साथ निभाया है.

अगला गीत गोविंदा आला रे अपने नाम के अनुरूप ही दही हांडी का गीत है. पारंपरिक धुन है और शब्द भी अनुरूप ही हैं. दरअसल इन परिस्थियों पे पहले ही इतने गीत बन चुके हैं कि कुछ नए की उम्मीद भी नहीं की जा सकती. अभी हाल ही में ओह माई गोड  के गो गो गोविंदा के बाद अगर इस गीत को कुछ अंतराल के बाद लाया जाता तो बेहतर रहता, खैर फ़िल्मी परिस्तिथियों में इन सब बातों पर कोई नियंत्रण नहीं रखा जा सकता. बहरहाल गीत मस्ती भरा है. प्रमुख आवाज़ वाजिद की है जिनकी आवाज़ में गजब की उर्जा है.

मूल तमिल संस्करण से रूपांतरित है अगला गीत शम्भो शिव शम्भो जिसमें आवाज़ की ताकत भरी है सुखविंदर है. सिचुएशन जनित इस गीत में सटीक शब्द जड़े हैं समीर ने, गीत मध्य भाग में सरगम बेहद प्रभावी लगती है. इसी गीत का मूल संस्करण है शंकर महादेवन की आवाज़ में, सुखविंदर के प्रति समस्त सम्मान के साथ कहना चाहूँगा कि मुझे व्यक्तिगत रूप से शंकर का संस्करण अधिक पसंद आया. ये रचना सुन्दर सी बाबू की है. बम बम भोले  का स्वरनाद है ये जोशीला गीत

सलीम सुलेमान के सलीम मर्चेंट इन दिनों एक गायक के रूप में भी चर्चा पा रहे हैं विशेषकर ऐसे गीत जो जोश भरने वाले हों मगर लो टोन में हों उनके लिए अन्य संगीतकार भी अब उन्हें तलब करने लगे हैं. यारों ऐसा है एक ऐसा ही गीत है. गीत अच्छा है पर दोस्ती के थीम पर बने अन्य गीतों जितना दिल में गहरे उतरने वाला नहीं है हालाँकि संगीत संयोजन में जमकर मेहनत की गयी है.

फिल्म के संगीत को कुछ और मसालेदार बनाने के लिए जैकी और उनकी टीम द्वारा पी एस वाई के जबरदस्त हिट गीत गंगम स्टाईल को भी अधिकारिक रूप से एल्बम का हिस्सा बनाया जा रहा है. यानी अब दर्शकों को पिछले साल के सबसे बड़े अंतर्राष्ट्रीय हिट गीत पर थिरकने के लिए भारतीय स्टाइल के स्टेप्स भी मिल जायेंगें.

खैर एल्बम बुरी नहीं है, और कुछ बहुत नया न देकर भी श्रोताओं को ठीक ठाक मनोरंजन देने में सक्षम है. रेडियो पी आई दे रहा है इस एल्बम को ३.९ की रेटिंग.       

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Monday, March 11, 2013

बंद कमरे की राजनीति में संगीत का तडका

प्लेबैक वाणी -36 - संगीत समीक्षा - साहेब बीबी और गैंगस्टर रिटर्न्स


तिग्मांशु धुलिया की सफल साहेब बीवी और गैंगस्टर में शयनकक्ष के भीतर का जिस्मानी खेल कैमरे की जद में था, और संगीत के नाम पर एक जुगनी का ही जोर था. खैर एक बार फिर तिग्मांशु लौटे है और वापसी हुई है गैंगस्टर की, नए संस्करण में गैंगस्टर बने हैं इरफ़ान. आजकल बॉलीवुड में पुरानी फिल्मों के रिमेक और ताज़ा हिट फिल्मों में द्रितीय तृतीय संस्करणों के अलावा शायद कुछ नही हो रहा है...खैर आज बात करते हैं साहेब बीबी और गैंगस्टर रिटर्न्स के संगीत के बारे में.

जहाँ पहले संस्करण में संगीतकारों की लंबी फ़ौज मौजूद थी नए संस्करण का पूरा जिम्मा बेहद प्रतिभाशाली संदीप चौठा ने उठाया है. शुद्ध हिंदी और कुछ संस्कृत शब्दों को जड़ कर रचा गया हैछल कपट गीत. जिसे गाया है पियूष मिश्रा ने. पियूष का ये  नाटकीय अंदाज़ एक अलग जोनर बनकर आजकल फिल्मों में छाया हुआ है. गुलाल और गैंग्स ऑफ वासेपुर की ही तरह यहाँ भी शब्दों की प्रमुखता अधिक है, धुन और संयोजन के मामले में कोई खास नयापन नहीं है. शब्द निश्चित ही अच्छे हैं और कपट और स्वार्थ की जटिलताओं को बेहद उत्कृष्ट रूप से उजागर करता है.

इधर गिरे एक क्लब नंबर है जो परिणीता के कैसी पहेली गीत की याद दिला देता है सोम्या रूह की आवाज़ में वो जरूरी तत्व हैं जो इस गीत को पर्याप्त सेंशुअल अंदाज़ प्रदान कर देता है, कौसर मुनीर के शब्द सटीक हैं. सेक्सोफोन का प्रयोग इस तरह के गीतों में लाजमी रहता है. पर गीत कुछ ऐसे नहीं है जो इसे अलग सी मकबूलियत प्रदान कर सके.

जुगनी का एक नया संस्करण यहाँ भी उपलब्ध है. जैजी बी की आवाज़ का जोश और तेज रिदम का कमाल कदम अवश्य थिरकाते हैं पर एक बार फिर संगीत प्रेमियों के लिए कुछ चौंकाने वाली बात यहाँ नहीं है.

एल्बम का सबसे बढ़िया गीत इसका आईटम गीत खुले आम कह दूं ही बनकर सामने आता है. परोमा दासगुप्ता की आवाज़ में लचीलापन है और उत्तेजना भी. संदीप नाथ के शब्द नए तेवर के साथ राजनीति और मीडिया के रिश्तों की पोल खोलते हैं, अंतरे खास तौर पे देसी अंदाज़ के चलते प्रभावित करते हैं.

देवीकी पंडित की आवाज़ में मखमली गज़लें सबने सुनीं होंगीं, एल्बम के अंतिम गीत में उनकी आवाज़ में गीत है कोना कोना दिल का. गीत की खासियत है इसका संयोजन जहाँ एक बीट स्किप कर स्वर के साथ जोड़ा गया है, ये प्रयोग ख़ासा लुभावना है, दूसरे अंतरे से पहले वेस्टर्न ओपरा का स्पर्श गीत को और भी खास बना देता है. ये गीत एक धीमे नशे की तरह है जिसे बार बार सुनकर भी आप को लुफ्त आएगा.

बहरहाल एल्बम में कुछ बहुत नया नहीं है संगीत प्रेमियों के लिए, और ऐसा भी कुछ नहीं जो आम श्रोता को आकर्षित कर सके. रेडियो प्लेबैक दे रहा एल्बम को ३.२ की रेटिंग.       

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Sunday, February 24, 2013

दोस्ती के तागों में पिरोये नाज़ुक से ज़ज्बात -"काई पो छे"

प्लेबैक वाणी -35 - संगीत समीक्षा - काई पो छे


रूठे ख्वाबों को मना लेंगें,
कटी पतंगों को थामेगें,
सुलझा लेंगें उलझे रिश्तों का मांजा...
गिटार के पेचों से खुलता है ये गीत, सारंगी के मांजे में परवाज़ चढ़ाता है, और अमित के सुरों से जब उन्हीं के स्वर मिलते हैं तो एक सकारात्मक उर्जा का संचार होता है. स्वानंद के शब्दों में बात है रिश्तों की, दोस्ती की और जिंदगी को जीत की दहलीज तक पहुंचा देने वाले ज़ज्बे के. अमित त्रिवेदी ने दिया है श्रोताओं को एक बेशकीमती तोहफा इस गीत के माध्यम से, मुझे जो सबसे अधिक प्रभावित करती है वो है वाध्यों का उनका चुनाव, हर गीत को किन किन गहनों से सजाना है ये अमित बखूबी जानते हैं. मुझे यकीन है कि मेरी ही तरह बहुत से श्रोताओं को उनकी हर नई पेशकश का बेसब्री से इन्तेज़ार रहता है. 

आज हम जिक्र कर रहे हैं काई पो छे के संगीत की. उलझे रिश्तों को सुलझाते हुए आईये आगे बढते हैं अमित के संगीतबद्ध इस एल्बम में सजे अगले गीत की तरफ.
अगला गीत भी दोस्ती के इर्द गिर्द है, मिली नायर की आवाज़ में गजब की ताजगी है, जैसे शबनम के मोती हों सुनहरी धूप में लिपटे. यहाँ धूप का काम करती है अमित की सुरीली आवाज़. स्वानंद के शब्द खुल कर साँस लेते हैं अमित की धुनों में. गीत सोफ्ट रोक् अंदाज़ का है जहाँ बीच बीच में वाध्यों का भारीपन गीत को जरूरी उतार चढ़ाव देता है, बार बार सुने जाने लायक गीत, खास तौर पर अगर आप एक लंबी ड्राईव पर निकलें हों तो मूड को खुश्गवार बनाये रखेंगीं ये मीठी बोलियाँ.
आपको बताते चलें कि ये फिल्म चेतन भगत के लोकप्रिय उपन्यास द थ्री मिस्टेक्स ऑफ माई लाईफ पर आधारित है. एल्बम में कुल ३ ही गीत हैं, अंतिम गीत एक गरबा है जिसमें एक बार फिर वही दोस्ती, जिंदगी और सपनों की बातें ही उभर कर आती हैं. शुभारंभ में ढोल और शहनाई का सुन्दर इस्तेमाल हुआ है. ख्वाबों के बीज कच्ची जमीन पे हमको बोना हैआशा के मोती सांसों की माला में पिरोना है..स्वानंद के शब्द एक बार फिर गीत को गहराई देते हैं. श्रुति पाठक ने गरबे वाला हिस्सा अच्छे से निभाया है. एक दिलचस्प और खूबसूरत गीत.
काई पो छे एक छोटा मगर बेहद सुरीला कैप्सूल है संगीत प्रेमियों के लिए. अमित त्रिवेदी और स्वानंद एक बार फिर उम्मीदों पर खरा उतरे हैं, रेडियो प्लेबैक दे रहा है इस एल्बम को ४.६ की रेटिंग.  

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Sunday, February 17, 2013

मर्डर ३ में फिर ले आया दिल प्रीतम और सैयद को एक साथ.

प्लेबैक वाणी -34 - संगीत समीक्षा - मर्डर ३



भट्ट कैम्प की फिल्मों के बारे में हम पहले भी ये कह चुके हैं कि ये एक ऐसा बैनर है जो कहानी की जरुरत के हिसाब से एल्बम में गीतों को सजाता है, जबरदस्ती का कोई आईटम नहीं, कोई गैर जरूरी ताम झाम नहीं. ये एक ऐसा बैनर है जहाँ आज भी मेलोडी और शाब्दिक सौन्दर्य को ही तरजीह दी जाती है. 

आईये इस बैनर की नई पेशकश ‘मर्डर ३’ के संगीत के बारे में जानें. ‘मर्डर’ के पहले दो संस्करणों का संगीत बेहद सफल और मधुर रहा हैं, विशेषकर अनु मालिक का रचे पहले संस्करण के गीतों को श्रोता अब तक नहीं भूले हैं. ‘मर्डर ३’ के संगीतकार हैं प्रीतम और गीतकार हैं सैयद कादरी.


रोक्सेन बैंड के मुस्तफा जाहिद की आवाज़ में है “हम जी लेंगें”. मुस्तफा की आवाज़ अन्य रोक् गायकों से कुछ अलग नहीं है, पर शब्दों से सैयद ने गीत को दिलचस्प बनाये रखा है – ‘किसको मिला संग उम्र भर का यहाँ, वो हो रुलाये दिल चाहे जिसको सदा...’, गीत युवा दिलों को ख़ासा आकर्षित करेगा क्योंकि प्रेम और दिल टूटने के अनुभव से गुजर चुके सभी दिल इस गीत से खुद को जोड़ पायेंगें.


जहाँ पहले गीत में गीतकार का असर ज्यादा था, वहीँ ‘जाता है तुझ तक’ में प्रीतम का चिर परिचित जैज अंदाज़ खूब सुहाना लगता है. आवाज़ की दुनिया में नई सनसनी ‘निखिल डी’सूजा’ की दमदार आवाज़ में गीत स्वाभाविक ही दिल तक पहुँच जाता है. ये गीत ऐसे हैं जिन्हें सुनते हुए आप कोई भी काम कर सकते हैं, यक़ीनन ऐसे गीत रेडियो सुनने वालों को खासे पसंद आते हैं, ये रेल्क्सिंग रिदम का गीत लोकप्रिय न हो तो हैरत ही होगी.    

अगले गीत की शुरूआती वोइलेन पीस कमाल का है, ‘मत आजमा रे’ है मेरे पसंदीदा के के की आवाज़ में, शब्द और धुन बेहद सही तरीके से घुल मिल गए हैं, ‘हसरतें बार बार बार बार यार की करो’, वाकई इस गीत को बार बार सुनने का मन करता है. एक बार फिर ये गीत उस जेनर का है जिसका हम जिक्र पहले कर चुके है. थकी हुई जेहन की नसों को मसर्रत के पल देता ये गीत भी श्रोताओं का दिल जीत लेगा. वोइलेन पीस और के के की गायकी तो है ही असरदायक.

एक बात खास गैरतलब है, भट्ट कैम्प की इन फिल्मों में पुरुष गायकों का ही दबदबा रहता है, किसी अभिनेत्री पर फिल्माए गीत को भी पुरुष गायक द्वारा ही गाया जाता है, ये ‘राज़’ क्या है कोई समझाए, बहरहाल मर्डर ३ के सभी ४ गीतों को भी पुरुष गायकों ने ही गाया है, अंतिम गीत ‘तेरी झुकी नज़र’ को गाया है शफकत अमानत अली ने. फिर वही चिर परिचित रोमांटिक अंदाज. सैयद लगातार भट्ट कैम्प के साथ अच्छा काम कर रहे हैं.

मर्डर ३ का संगीत कुछ नया पेश न कर के भी पुरानी चीज़ों को सुनने लायक रूप में पेश करते हुए श्रोताओं को कुछ सुरीली सौगातें दे जाता हैं. रेडियो प्लेबैक दे रहा है इस एल्बम को ३.६ की रेटिंग. 

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Monday, February 11, 2013

एनी बडी कैन डांस - इसका संगीत है ही नाचने के लिए

प्लेबैक वाणी -33 -संगीत समीक्षा - ए बी सी डी - एनी बडी कैन डांस



विश्व सिनेमा में डांस म्युसिकल्स की पारंपरिक श्रृखलाएं रहीं हैं जो बेहद कामियाब भी साबित हुई है. भारत में इस ट्रेंड को बहुत अधिक परखा नहीं गया कभी. पर अब रेमो डीसूजा प्रभु देवा के साथ मिलकर अपने इस ख्वाब रुपी फिल्म को अमली जामा पहना चुके हैं, फिल्म थ्री डी में है इसमें देश के सबसे उन्दा डांसर्स दर्शकों को एक साथ नज़र आयेंगें. चलिए आज बात करते हैं इसी संगीतमय फिल्म के संगीत की, जिसे संवारा है सचिन जिगर ने.

शंकर महादेवन और विशाल दादलानी के स्वरों में शभु सुतया से बेहतर और क्या शुरुआत हो सकती थी एल्बम की. पारंपरिक ढोल रिदम के साथ ये नृत्य प्रार्थना कहीं कहीं शिव के नटराज रूप की भी झलक देती है. गीत के अंतिम हिस्से में शंकर अपने चिर परिचित अंदाज़ में श्रोताओं का दिल जीत ले जाते हैं.

बेजुबान एक नृत्य प्रेमी की भावनाओं को स्वर देता गीत है, जिसमें सफलता से दूर रहने की कुंठा और हर हाल में कामियाब होने की लगन दोनों बखूबी झलकते हैं. मोहित चौहान के साथ ढेरों अन्य गायक भी हैं पर मोहित की आवाज़ ही इस गीत की जान है. गीतकारा प्रीती पंचाल की भी आवाज़ है गीत में. एक शानदार ट्रेक जो लंबे समय तक श्रोताओं को याद रहेगा.

अगला गीत सायिको रे एक मस्त अंदाज़ का गीत है. दक्षिण भारतीय शहनाई के फ्लेवर में मिका के पंजाबी तडके का जबरदस्त कोकटेल है ये गीत. उदित नारायण बहुत दिनों बाद फॉर्म में सुनाई दिये हैं. बीच बीच में रैप और संवाद भी दिलचस्प हैं.

अनुष्का मनचंदा की आवाज़ में है मन बसियो संवारियो. गायिकी को छोड़ दिया जाए तो गीत कुछ खास प्रभावी नहीं है. शब्द भी सामान्य हैं.

गायकों की एक फ़ौज है अगले गीत चंदू की गर्लफ्रेंड में. ये गीत देखने में बढ़िया लग सकता है पर सुनने में कुछ खास असरदायक नहीं है. इस ढर्रे के बहुत से गीत बन चुके हैं और ये गीत विशेष कुछ खास पेश नहीं करता.

माधव कृष्णा की दमदार आवाज़ में अगला गीत दुहाई है बेहद जबरदस्त है, बेजुबान की ही तरह ये गीत भी एक कलाकार के सफर और सफलता की अंधी दौड में आती धूप छांव को सहेजता से रेखांकित करता है ये नगमा. शब्द और गायिकी में भी गीत अन्य गीतों पर भारी है, एल्बम का एक बहतरीन ट्रेक.

अपने बीट्स और तेज रिदम के कारण अगला गीत सॉरी सॉरी सुनने लायक बन गया है. शब्द दिलचस्प हैं और पंजाबी अंदाज़ का संगीत संयोजन गीत को लोकप्रिय बना सकता है.

सूरज जगन की आवाज़ है कर जा रे या मर जा रे में. शायद ये फिल्म का क्लाईमेक्स गीत है. बहुत ऊर्जा है गीत में. यक़ीनन ये गीत परदे पर बहुत रंग जामने वाला है. गा गा गा गणपति को हार्ड कोर ने एक सोलिड बेस दिया है. एक और धमाकेदार गीत. कुल १० गीतों से सजी इस संगीतमय एल्बम को रेडियो प्लेबैक दे रहा है ४.१ की रेटिंग.                   

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