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Wednesday, July 27, 2016

"मुंबई आने के बाद मैं दस बारह साल बस युहीं भटकता रहा"- मोनीश रजा : एक मुलाकात ज़रूरी है

एक मुलाकात ज़रूरी है (21)

Monish Raza
घाटमपुर नाम के एक छोटे से कसबे से निकलकर माया नगरी मुंबई में आकर एक गीतकार बनने की जद्दो जहद से निकला एक काबिल और हुनरमंद कलमबाज़ मोनीश रजा, जो आज के हमारे ख़ास मेहमान है कार्यक्रम "एक मुलाकात ज़रूरी है" में. इमरान हाशमी अभिनीत फिल्म मिस्टर एक्स के लोकप्रिय गीत "तू जो है तो मैं हूँ" के लेखक मोनीश से हमारी इस ख़ास बातचीत का आनंद लें आज के इस एपिसोड में.... 



एक मुलाकात ज़रूरी है इस एपिसोड को आप यहाँ से डाउनलोड करके भी सुन सकते हैं, लिंक पर राईट क्लीक करें और सेव एस का विकल्प चुनें 

Friday, September 6, 2013

सब कुछ पुराना ही है नई जंजीर में

भी कभी समझना मुश्किल हो जाता है कि एक ऐसी फिल्म जिसे अपने मूल रूप में आज भी बड़े आनंद से देखा जा सकता है, उसका रिमेक क्यों बनाया जाता है. खैर रेमेकों की फेहरिश्त में एक नया जुड़ाव है जंजीर , वो फिल्म जिसने इंडस्ट्री को एंग्री यंग मैन के रूप अमिताभ बच्चन का तोहफा दिया था ७० के दशक में. जहाँ तक फिल्म के प्रोमोस् दिखे हैं नई जंजीर अपने पुराने संस्करण से हर मामले में अलग दिख रही है. ऐसे में इसके संगीत को भी अलग नज़रिए से सुना समझा जाना चाहिए. अल्बम में चार सगीत्कारों का योगदान है. चित्रान्तन भट्ट, आनंद राज आनंद, मीत ब्रोस अनजान और अंकित के सुरों से संवरी इस ताज़ा एल्बम में क्या कुछ है आईये एक नज़र दौडाएं.

मिका  की जोशीली आवाज़ में खुलता है एल्बम का पहला गीत मुम्बई के हीरो . बीच के कुछ संवाद तो बच्चन साहब की आवाज़ में है...भाई अगर उन्हीं की आवाज़ चाहिए थी तो फिर रिमेक की क्या ज़रूरत थी ये मेरी समझ से तो बाहर है.

एक बोरिंग गीत के बाद एक और जबरदस्ती का आईटम गीत सामने आ जाता है. ममता शर्मा की आवाज़ में पिंकी  अब तक सुनाई दिए आईटम गीतों से न तो कुछ अलग है न बेहतर. शब्द घिसे पिटे और धुन भी रूटीन है. एक और ठंडा गीत.

श्रीराम और श्यामली की युवा युगल आवाजों में ये लम्हा तेरा मेरा  सुनकर आखिरकार एल्बम से कुछ उम्मीदें जाग जाती है. बहुत ही सुरीला गीत जिसके साथ दोनों गायक कलाकारों ने भरपूर न्याय किया है.

अगला गीत एक कव्वाली है (पुराने संस्करण के क्लास्सिक यारी है ईमान मेरा  जैसा). मैं तुलना तो नहीं करूँगा पर सुनने में बुरा हरगिज़ नहीं है ये गीत भी. सुखविंदर की आवाज़ में जोश भरपूर है.

श्वेता पंडित का गाया कातिलाना  एक क्लब गीत है जिसकी धुन एक बार पुराने संस्करण के दिल जलों का दिल जला कर  से सीधी उठा ली गयी है. हंसी आती है ऐसे बेतुके प्रयागों पर.

अंतिम  गीत में श्रेया की सुरीली आवाज़ है शकीला बानो हिट हो गयी... शकीला का तो पता नहीं पर एल्बम केवल गीत संगीत के दम पर हिट हो जाए तो चमत्कार ही होगा. एल्बम निराश ही करती है.

सुनने लायक गीत  -  ये लम्हा तेरा मेरा
हमारी  रेटिंग - २ / ५

Friday, July 12, 2013

सुरीला है ये आग का दरिया - 'इस्सक' तेरा

प्रेम कहानियां और वो भी कालजयी प्रेम कथाएं फिल्मकारों को सदा से ही प्रेरित करती आईं है. हीर राँझा हो सोहनी महिवाल या फिर रोमियो जूलियट, इन अमर प्रेम कहानियों में कुछ तो ऐसा है जो दर्शक बार बार इन्हें देखने के लिए लालायित रहते हैं. रोमियो जूलियट शेक्सपियर की अमर कृति है, जिस पर अब तक ढेरों फ़िल्मी कहानियां आधारित रहीं है. एक बार फिर इस रचना का भारतीयकरण हुआ है मनीष तिवारी निर्देशित इस्सक  में जहाँ राँझना  के बाद एक बार फिर दर्शकों के देखने को मिलेगी बनारस की पृष्ठभूमि. खैर देखने की बात होगी बाद में फिलहाल जान लें कि इस इस्सक  में सुनने लायक क्या क्या है...

मोहित  चौहान की सुरीली आवाज़ ऐसे लगती है जैसे पहाड़ों में गूंजती हवा हो, और अगर गीत रोमानी हो तो कहना ही क्या, एल्बम की शुरुआत इसी रेशमी आवाज़ से होती है इस्सक तेरा  एक खूबसूरत प्रेम गीत है. जितने सुन्दर शब्द है मयूर पूरी के, सचिन जिगर की जोड़ी ने इसे उतने ही नर्मो नाज़ुक अंदाज़ में स्वरबद्ध किया है. एल्बम को एक दिलकश शुरुआत देता है ये गीत. 

अगले  गीत में रशीद खान की आवाज़ है, गहरी और मर्म को भेदती, झीनी रे झीनी  गीत के शब्दकार हैं निलेश मिश्रा और इस गीत को संगीत का जामा पहनाया है संगीतकार कृष्णा ने. तानु वेड्स मनु  में यादगार संगीत देने के बावजूद कृष्णा को बहुत अधिक काम मिल नहीं पाया है जो वाकई ताज्जुब की बात है. अब इस गीत को ही देखिये, ठेठ देसी स्वरों से इस प्रतिभाशाली संगीतकार ने इस गीत को यादगार बना दिया है. गीत में प्रतिभा भगेल की आवाज़ का सुन्दर इस्तेमाल हुआ है, पर फिर भी रशीद की आवाज़ गीत की जान है. 

बरसों  पहले एक गीत आया था शिवजी ब्याहने चले . शिव के महाविवाह पर इसके बाद शायद कोई गीत कम से कम बॉलीवुड में तो नहीं आया. इसी कमी को पूरा करता है अगला गीत भोले चले, हालाँकि ये गीत उस पुराने गीत की टक्कर का तो कहीं से भी नहीं है, पर आज की पीढ़ी के लिए इस महाआयोजन को गीत स्वरुप में पेशकर टीम ने कुछ अनूठा करने की कोशिश तो की ही है जिसकी तारीफ होनी चाहिए. इंडियन ओशन  के राहुल राम की आवाज़ में खासी ताजगी है और इस गीत के लिए शायद उनसे बेहतर कोई नहीं हो सकता था. गीत के संगीतकार है सचिन गुप्ता. 

रोक्क् गायकी में सबसे ताज़ा सनसनी बनकर उभरे हैं अंकित तिवारी आशिकी २   के बाद. अगला गीत आग का दरिया  हालाँकि उनकें पहले गीत जितना प्रभावी नहीं बन पाया है. अच्छे पंच के बावजूद गीत अपनी छाप छोड़ने में असफल रहा है. अगले गीत एन्ने उन्ने  में पोपोन की जबरदस्त आवाज़ है जिन्हें साथ मिला है कीर्ति सगाथिया और ममता शर्मा का. गीत में पर्याप्त विविधता है, गायकों ने भी जम कर अपने काम को अंजाम दिया है. एक बार फिर कृष्णा ने अच्छा संयोजन किया है.  

अगला  गीत भागन की रेखा  एक विदाई गीत है, बिना लाग लपेट के ये गीत शुद्ध भारतीय है. रघुबीर यादव और मालिनी अवस्थी की दमदार आवाज़ में ये गीत सुनने लायक है. बहुत दिनों बाद किसी बॉलीवुड फिल्म में इतना मार्मिक गीत सुनने को मिला है. शायद आज की पीढ़ी को ये कुछ अटपटा लगे पर यही तो है हमारी अपनी मिटटी के गीत.  पूरी टीम इस गीत के लिए बधाई की हकदार है. इसके आलावा एल्बम में इस्सक तेरा  और आग का दरिया  के कुछ अलग से संस्करण हैं. वास्तव में आग का दरिया  अपने अल्प्लगड संस्करण में कुछ हद तक बेहतर है. 

एल्बम से सबसे अच्छे गीत - इस्सक तेरा, झीनी रे झीनी  और भागन की रेखा
हमारी रेटिंग - ४.२/५

संगीत समीक्षा - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी 

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Monday, June 24, 2013

रिचा शर्मा के 'लेजी लेड' ताने से बिदके 'घनचक्कर'

मिर  और नो वन किल्ल्ड जस्सिका  के बाद एक बार फिर निर्देशक राजकुमार गुप्ता ने अपनी नई फिल्म के संगीत का जिम्मा भी जबरदस्त प्रतिभा के धनी अमित त्रिवेदी को सौंपा है. इमरान हाश्मी और विद्या बालन के अभिनय से सजी ये फिल्म है -घनचक्कर . फिल्म तो दिलचस्प लग रही है, आईये आज तफ्तीश करें कि इस फिल्म के संगीत एल्बम में श्रोताओं के लिए क्या कुछ नया है. 

पहला गीत लेजी लेड अपने आरंभिक नोट से ही श्रोताओं को अपनी तरफ आकर्षित कर लेता है. संगीत संयोजन उत्कृष्ट है, खासकर बीच बीच में जो पंजाबी शब्दों के लाजवाब तडके दिए गए हैं वो तो कमाल ही हैं. बीट्स भी परफेक्ट है. अमिताभ के बोलों में नयापन भी है और पर्याप्त चुलबुलापन भी. पर तुरुप का इक्का है रिचा शर्मा की आवाज़. उनकी आवाज़ और गायकी ने गीत को एक अलग ही मुकाम दे दिया है. एक तो उनका ये नटखट अंदाज़ अब तक लगभग अनसुना ही था, उस पर एक लंबे अंतराल से उन्हें न सुनकर अचानक इस रूप में उनकी इस अदा से रूबरू होना श्रोताओं को खूब भाएगा. निश्चित ही ये गीत न सिर्फ चार्ट्स पर तेज़ी से चढेगा वरन एक लंबे समय तक हम सब को याद रहने वाला है. बधाई पूरी टीम को. 

आगे बढ़ने से पहले आईये रिचा के बारे में कुछ बातें आपको बताते चलें. फरीदाबाद, हरियाणा में जन्मी रिचा ने गन्धर्व महाविद्यालय से गायन सीखा. उनकी पहचान कीर्तनों में गाकर बननी शुरू हुई, बॉलीवुड में उन्हें पहला मौका दिया रहमान ने फिल्म ताल  में. नि मैं समझ गयी  गीत बेहद लोकप्रिय हुआ. उनकी प्रतिभा के अलग अलग चेहरे हमें दिखे माहि वे (कांटे), बागबाँ रब है (बागबाँ), और निकल चली रे (सोच)  जैसे गीतों में. पर हमारी राय में उनकी ताज़ा गीत लेजी लेड  उनका अबतक का सबसे बहतरीन गीत बनकर उभरा है. 

वापस लौटते हैं घनचक्कर  पर. अगला गीत है अल्लाह मेहरबान  जहाँ गीत के माध्यम से बढ़िया व्यंग उभरा है अमिताभ ने, कव्वाली नुमा सेट अप में अमित ने धुन में विविधता भरी है. दिव्या कुमार ने अच्छा निभाया है गीत को. एक और कबीले तारीफ गीत. 

घनचक्कर बाबू  जैसा कि नाम से जाहिर है कि शीर्षक गीत है, एक बार फिर अमिताभ ने दिलचस्प अंदाज़ में फिल्म के शीर्षक किरदार का खाका खीचा है और उतने ही मजेदार धुन और संयोजन से अपना जिम्मा संभाला है.अमित ने. गीत सिचुएशनल है और परदे पर इसे देखना और भी चुटीला होगा. 

अंतिम गीत झोलू राम   से अमित बहुत दिनों बाद मायिक के पीछे लेकर आये हैं ९० के दशक में तुम तो ठहरे परदेसी  गाकर लोकप्रिय हुए अल्ताफ राजा को. हालाँकि ये प्रयोग उतना सफल नहीं रहा जितना रिचा वाला है, पर एक लंबे समय के अंतराल के बाद अल्ताफ को सुनना निश्चित ही अच्छा लगा, .पर गीत साधारण ही है जिसके कारण अल्ताफ की इस वापसी में अपेक्षित रंग नहीं उभर पाया. 

एल्बम के बहतरीन गीत - 
लेजी लेड, अल्लाह मेहरबान 

हमारी रेटिंग - ३.७   

संगीत समीक्षा - सजीव सारथी

आवाज़ - अमित तिवारी

 

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Monday, June 10, 2013

थोडा रोमांस तो थोडा मसाला, भैया रे भैया रमैया वस्तावैया

ताज़ा  सुर ताल - रमैया वस्तावैया

प्रभु देवा के निर्देशन से सजी रमैया वस्तावैया  शीर्षक को सुनते ही श्री ४२०  के उस हिट गीत की याद बरबस ही आ जाती है जिसमें रफ़ी, लता और मुकेश के स्वरों शंकर जयकिशन की धुन का सहारा मिला था, और जिसे गीत को आज भी संगीत प्रेमी चाव से सुनते हैं. तेलुगु भाषा में इस शब्द युग्म का अर्थ होता है -रमैया, क्या तुम आओगे ? यानी किसी प्रेमी के वापस लौटने का इन्तेज़ार, शायद यहाँ भी कहानी में कोई ऐसा ही पेच हो, खैर हम बात करते हैं फिल्म के संगीत एल्बम की, संगीत है सचिन जिगर का जिनके हाल ही में प्रदर्शित गो गोवा गोन  के दो गीतों की खासी लोकप्रियता हासिल हुई है. साथ ही चर्चा करेंगें हम गायक आतिफ असलम के संगीत सफर और सचिन जिगर के नए अंदाज़ की भी. 

पाकिस्तानी फनकार आतिफ असलम एक गायक होने के साथ साथ अभिनेता भी हैं, और उनकी फ़िल्मी शुरुआत भी एक गायक अभिनेता के रूप में फिल्म बोल  से हुई (अगर आपने ये फिल्म नहीं देखी हो तो अवश्य देखिये), हालाँकि इससे पहले वो अपनी एल्बम जलपरी से मशहूर हो चुके थे. और उनकी दूसरी एल्बम दूरी  और भी हिट साबित हुई थी. पिछले साल तेरे नाल लव हो गया  में उनका गाया पिया ओ रे पिया  बेहद लोकप्रिय हुआ था और हमारी टॉप लिस्ट में शामिल भी हुआ था. बहरहाल रमैया वस्तावैया  में प्रमुख पुरुष आवाज़ आतिफ असलम की है. आतिफ और श्रेया के गाए तीन युगल गीत हैं एल्बम में.

आतिफ की आवाज़ में एक सुरीला सा जादू है जो रोमांटिक गीतों में खास तौर पर उभर कर आता है, श्रेया के साथ उनकी गायिकी और भी निखर कर आई है. जीने लगा हूँ  एल्बम का सबसे बढ़िया गीत बनकर उभरता है तो वहीँ रंग लाग्यो  का सूफी अंदाज़ भी बेहद नशीला है, बैरिया  में भी इन दो गायक कलाकारों की जुगलबंदी खूब जमती है. सचिन जिगर के रचे ये तीनों ही रोमांटिक गीत एल्बम की जान कहे जा सकते हैं. इसके आलावा एक और गीत है जो बहुत ही खूबसूरत बन पड़ा है, मोहित चौहान की आवाज़ में 'पीछा  छूटे' एक रेट्रो अंदाज़ का गीत है जो किशोर कुमार के रोमानी अंदाज़ की बरबस याद दिला देता है

गुजराती पार्श्व से आये सचिन  जिगर ने शुरुआत की टेलिविज़न से, फिर जुड़े संगीत संयोजन से. जिगर ने राजेश रोशन के सहायक के रूप में 'क्रिश' से शुरुआत की. बाद में इनसे अमित त्रिवेदी भी जुड़े, अमित और जिगर में खासी छनती थी, दरअसल अमित ने ही जिगर को सचिन से मिलवाया जिसके बाद ये जोड़ी हमेशा के लिए एक हो गयी. दरअसल इस जोड़ी को संगीत सहायक से संगीतकार बनाने में प्रीतम दा की प्रेरणा भी बहुत फायेदमंद रही. फालतू  की सफलता में उनके हिट गीत चार बज गए  का भी बड़ा योगदान था. शोर इन द सिटी  में भी सायेबो  की धुन बेहद मधुर थी. गो गोवा गोन  के दो गीत स्लोली स्लोली  और बाबा जी की बूटी  में उनका अंदाज़ सबसे निराला रहा. वास्तव में इन दो गीतों में उनकी प्रतिभा की ताजगी खुलकर सामने आई है. चलिए सचिन जिगर से तो आपका परिचय हो गया . अब वापस आते हैं रमैया......पर 

एल्बम  में रोमांटिक गीतों से इतर भी कुछ झूमते थिरकते गीतों का भी एक अलग ट्रेक है जिसे संभाला है ऊर्जा से भरे मिका सिंह ने. हिप होप पम्मी  एक जबरदस्त डांस नंबर है जो सुनते ही जुबाँ पे चढ जाता है. मोनाली ठाकुर की आवाज़ मिका के रुआब में कहीं दबी सी लगती है. लेकिन नेहा ठाकुर ने एक अन्य आइटम गीत जादू की झप्पी  में मिका को बराबर की टक्कर दी है. पर जादू की झप्पी गीत का शीर्षक जितना अच्छा है गीत उस कसौटी पर खरा नहीं उतरता. 

एल्बम के बहतरीन गीत -
जीने लगा हूँ, रंग लाग्यो, हिप होप पम्मी , पीछा  छूटे

हमारी रेटिंग - 2.7  

संगीत समीक्षा - सजीव सारथी

आवाज़ - अमित तिवारी

 

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Monday, June 3, 2013

राम संपथ सफल रहे 'फुकरों' संग एक बार फिर कुछ नया करने में

ताज़ा  सुर ताल - फुकरे

मित त्रिवेदी की ही तरह राम सम्पंथ भी एक और ऐसे संगीतकार जिनके काम से हमेशा ही नयेपन की उम्मीद रहती है. राम की नयी एल्बम है फिल्म फुकरे  का संगीत. आईये आज की इस महफ़िल में चर्चा करें इसी एल्बम की. यहाँ गीतकार हैं विपुल विग और मुन्ना धिमान. गौरतलब है कि विपुल फिल्म के स्क्रीन लेखक भी हैं. 

शीर्षक गीत की रफ़्तार, राम के रचे डी के बॉस  जैसी है, यहाँ भी भूत  है जो लँगोटी लेके भाग  रहा है, पर शाब्दिक रूप से गीत का फ्लेवर काफी अलग है. एक नए गायक अमजद भगडवा की ताज़ी ताज़ी आवाज़ में है ये गीत और शीर्षक गीत अनुरूप पर्याप्त मसाला है गीत में. अमजद की आवाज़ प्रभावी है. 

क्लिंटन सेरेजो की दमदार आवाज़ में है अगला गीत रब्बा, जो शुरू तो होता है बड़े ही नर्मो नाज़ुक अंदाज़ में होता है जिसके बाद गीत का रंग ढंग पूरी तरह से बदल जाता है, शब्द बेहद ही खूबसूरत है, और संगीत संयोजन में विविधता भरपूर है जिससे श्रोता पूरे समय गीत से जुड़ा ही रहता है 

संगीत  संयोजन की यही विविधता ही अगले गीत जुगाड  की भी शान है, जहाँ धुन कव्वाली नुमा है और बेहद सरल है. जुबान पर चढ़ने में सहज है और तीन अंतरे का ये गीत भी पूरे समय श्रोताओं की दिलचस्पी बरकरार रखता है. शब्द एकदम सामयिक हैं, वास्तव में यही आज की तस्वीर भी है, बेहद सरल शब्दों में गीतकार बहुत कुछ कह गए हैं यहाँ. जुगाड  के इस काल में ये गीत किसी एंथम से कम नहीं है. और हाँ गायक के रूप में कैलाश खेर से बेहतर चुनाव और कौन हो सकता था, कीर्ति सगाथिया ने भी उनका अच्छा साथ निभाया है.

आंकड़ों की बात की जाए तो मिका  सिंह का कोई तोड़ नहीं है, शायद ही उनका कोई गीत कम चर्चित रह जाता होगा. अगले गीत में मिका के साथ हैं खुद राम सम्पंथ और तरन्नुम मलिक. बेडा  पार  नाम के इस गीत में भी राम ने विविधता से सजाया है, पर गीत उतना प्रभावी नहीं बन पाया. गीत का कैच भी उतना जबरदस्त नहीं है जितना उपरोक्त दो गीतों में था. 

लग  गयी लॉटरी  एक और मजेदार गीत हैं, राम संपथ और तरन्नुम मालिक के युगल स्वरों में ये गीत अपनी सरल धुन के चलते जुबाँ पे चढ़ने लायक है. गीत बहुत लंबा नहीं है इसलिए विविधताओं के अभाव में भी गीत बढ़िया लगता है. 

राम संपथ की एल्बम हो और सोना महापात्रा की आवाज़ में कोई गीत न हो कैसे संभव है ? अम्बर सरिया  (अमृतसर के मुंडे ) को संबोधित ये गीत बेहद मधुर है. हालाँकि धुन कुछ कुछ हिमेश के रचे नमस्ते  लन्दन  के रफ्ता रफ्ता  गीत से काफी हद तक मिलती जुलती है पर फिर भी सोना ने इसे एक अलग ही रूप दे डाला है. मुन्ना धिमान के पंजाबी जुबान की चाशनी में डूबे शब्द इसकी मधुरता में जरूरी इजाफा करते हैं.  एल्बम का सबसे बढ़िया गीत है ये और राम के बहतरीन गीतों में से निश्चित ही एक.

हमारी राय में एल्बम के बहतरीन गीत -

जुगाड, रब्बा , और अम्बर सरिया 

हमारी रेटिंग - ३.७ / ५  

संगीत समीक्षा - सजीव सारथी

आवाज़ - अमित तिवारी

 

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Monday, April 29, 2013

सिनेमा के शानदार 100 बरस को अमित, स्वानंद और अमिताभ का संगीतमय सलाम

प्लेबैक वाणी -44 - संगीत समीक्षा - बॉम्बे टा'कीस


सिनेमा के १०० साल पूरे हुए, सभी सिने प्रेमियों के लिए ये हर्ष का समय है. फिल्म इंडस्ट्री भी इस बड़े मौके को अपने ही अंदाज़ में मना या भुना रही है. १०० सालों के इस अद्भुत सफर को एक अनूठी फिल्म के माध्यम से भी दर्शाया जा रहा है. बोम्बे  टा'कीस  नाम की इस फिल्म को एक नहीं दो नहीं, पूरे चार निर्देशक मिलकर संभाल रहे हैं, जाहिर है चारों निर्देशकों की चार मुक्तलिफ़ कहानियों का संकलन होगी ये फिल्म. ये चार निर्देशक हैं ज़ोया अख्तर, करण जोहर, अनुराग कश्यप और दिबाकर बैनर्जी. अमित त्रिवेदी का है संगीत तथा गीतकार हैं स्वानंद किरकिरे और अमिताभ भट्टाचार्य. चलिए देखते हैं फिल्म की एल्बम में बॉलीवुड के कितने रंग समाये हैं. 

पहला  गीत बच्चन  हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े सुपर स्टार अमिताभ बच्चन को समर्पित है...जी हाँ सही पहचाना वही जो रिश्ते में सबके बाप  हैं. शब्दों में अमिताभ भट्टाचार्य ने सरल सीधे मगर असरदार शब्दों में हिंदी फिल्मों पर बच्चन साहब के जबरदस्त प्रभाव को बखूबी बयाँ किया है. अमित की तो बात ही निराली है, गीत का संगीत संयोजन कमाल का है. एकतारा का जबरदस्त प्रयोग गीत को वाकई इस दशक में पहुंचा देता है जब हिंदी सिनेमा का पर्याय ही अमिताभ बच्चन हुआ करते थे. बीच बीच में उनके मशहूर संवादों से गीत का मज़ा दुगुना हो जाता है. सुखविंदर की आवाज़ में बहुत दिनों बाद ऐसा दमदार गीत निकला है. खैर हम भी इस गीत के साथ अपनी इडस्ट्री और बच्चन साहब की ऊंची शख्सियत को सलाम करते हैं, और आगे बढते हैं अगले गीत की तरफ.

अक्कड बक्कड बोम्बे बो, अस्सी नब्बे पूरे सौ, सौ बरस का हुआ, ये खिलाड़ी न बूढा हुआ.....वाह स्वानंद साहब ने खूब बयाँ किया है सिनेमा के सौ बरसों का किस्सा. हालाँकि अमित की धुन इंग्लिश विन्गलिश  के कैसे जाऊं मैं पराये देश  से कुछ मिलती जुलती लगती है शुरुआत में, पर धीरे धीरे गीत अपनी लय पकड़ लेता है, सबसे बढ़िया बात ये है कि गीत अपनी रवानी में कहीं भी कमजोर नहीं पड़ता, और श्रोताओं को झूमने की वजह देता रहता है. मोहित की आवाज़ भी खूब जमी है गीत में....

मुर्रब्बा  गीत के दो संस्करण हैं, आमतौर पर अमित के इन ट्रेडमार्क गीतों में शिल्प राव की आवाज़ जरूरी सी होती है, पर इस गीत में महिला स्वर है कविता सेठ की जिनका साथ दिया है खुद अमित ने. छोटा सा मगर बेहद प्रभावी गीत है ये भी. एक बार फिर संगीत संयोजन गीत की जान है. गीत ऐसा नहीं है जो जुबाँ पर चढ जाए पर अच्छा सुनने के शौक़ीन इसे अवश्य पसंद करेंगें .गीत का एक संस्करण जावेद बशीर की आवाज़ में भी है. 

शीर्षक गीत बोम्बे टा'कीस  एक बार फिल्मों के प्रति दर्शकों की दीवानगी को समर्पित है.कैलाश खेर और रिचा शर्मा की आवाजों में ये एक रेट्रो गीत है. स्वानंद के शब्द दिलचस्प हैं. पर मुझे इसका दूसरा संस्करण जिसमें ढेरों गायकों की आवाज़ समाहित है. शान और उदित की आवाजों के साथ कुछ अन्य गीतों की झलक में मिला जुला ये संस्करण अधिक फ़िल्मी लगता है. 

वाकई इन सौ बरसों में फिल्मों के कितने चेहरे बदले पर सौ बरसों के बाद आज भी लगता है जैसे बस अभी तो शुरुआत ही है. फिल्मों का ये कारवाँ यूहीं चलता चले और मनोरंजन के इस अद्भुत लोक में दर्शकों को भरपूर आनंद मिलता रहे यही हम सब की कामना है. एल्बम को रेडियो प्लेबैक दे रहा है ४ की रेटिंग ५ में से. 

एक सवाल श्रोताओं के लिए -
प्रस्तुत एल्बम में एक गीत एक फ़िल्मी नायक को समर्पित है, क्या आपको कोई अन्य गीत याद आता है जो किसी फ़िल्मी व्यक्तित्व पर केंदित है ?


संगीत समीक्षा
 - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी
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Monday, March 18, 2013

‘रंगरेज’ की कूची में अपेक्षित रंगों का अभाव मगर सुर सटीक

प्लेबैक वाणी -37 - संगीत समीक्षा - रंगरेज


निर्माता वाशु भगनानी अपने बेटे जैकी को फिल्म जगत में स्थापित करने में कोई कसर छोडना नहीं चाहते. तभी तो उन्होंने भी रिमेक के इस दौर में एक और हिट तमिल फिल्म नाडोडीगल का हिंदी संस्करण बनाने की ठानी और निर्देशन का भार सौंपा रिमेक एक्सपर्ट प्रियदर्शन के कंधों पर. फिल्म तेलुगु, मलयालम और कन्नडा संस्करण पहले ही बन चुके हैं. जैकी अभिनीत इस फिल्म को शीर्षक दिया गया है रंगरेज. 

इस फिल्म की एक और खासियत ये है कि इस फिल्म के लिए निर्देशक प्रियदर्शन और छायाकार संतोष सिवन १५ साल के अंतराल के बाद फिर एक साथ टीमबद्ध हुए हैं. फिल्म का अधिकतर हिस्सा एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती के रूप में मशहूर मुंबई के धारावी इलाके में शूट हुआ है, इसी कारण फिल्म की टीम ने इसका संगीत भी जनता के समक्ष रखा इसी धारावी के दिल से. फिल्म में संगीत है साजिद वाजिद का जिन्हें साथ मिला है दक्षिण के संगीतकार सुन्दर सी बाबू का, जिन्होंने मूल तमिल संस्करण में भी संगीत दिया था. आईये देखें इस रंगरेज की कूची में कितने रंगों के गीत हैं श्रोताओं के लिए.

पहला गीत है राहत फ़तेह अली खान और हिराली के स्वरों में दिल को आया सुकूँ. गीत का कलेवर दबंग के तेरे मस्त मस्त दो नैन जैसा ही है. समीर के शब्द सुरीले हैं. साजिद वाजिद की धुन भी मधुर है, विशेषकर पहले अंतरे के बाद इश्क इश्क अल्लाह अल्लाह वाला हिस्सा खासा दिल को छूता है. कुछ नया न देकर भी गीत सुनने लायक अवश्य है. हिराली ने राहत का बढ़िया साथ निभाया है.

अगला गीत गोविंदा आला रे अपने नाम के अनुरूप ही दही हांडी का गीत है. पारंपरिक धुन है और शब्द भी अनुरूप ही हैं. दरअसल इन परिस्थियों पे पहले ही इतने गीत बन चुके हैं कि कुछ नए की उम्मीद भी नहीं की जा सकती. अभी हाल ही में ओह माई गोड  के गो गो गोविंदा के बाद अगर इस गीत को कुछ अंतराल के बाद लाया जाता तो बेहतर रहता, खैर फ़िल्मी परिस्तिथियों में इन सब बातों पर कोई नियंत्रण नहीं रखा जा सकता. बहरहाल गीत मस्ती भरा है. प्रमुख आवाज़ वाजिद की है जिनकी आवाज़ में गजब की उर्जा है.

मूल तमिल संस्करण से रूपांतरित है अगला गीत शम्भो शिव शम्भो जिसमें आवाज़ की ताकत भरी है सुखविंदर है. सिचुएशन जनित इस गीत में सटीक शब्द जड़े हैं समीर ने, गीत मध्य भाग में सरगम बेहद प्रभावी लगती है. इसी गीत का मूल संस्करण है शंकर महादेवन की आवाज़ में, सुखविंदर के प्रति समस्त सम्मान के साथ कहना चाहूँगा कि मुझे व्यक्तिगत रूप से शंकर का संस्करण अधिक पसंद आया. ये रचना सुन्दर सी बाबू की है. बम बम भोले  का स्वरनाद है ये जोशीला गीत

सलीम सुलेमान के सलीम मर्चेंट इन दिनों एक गायक के रूप में भी चर्चा पा रहे हैं विशेषकर ऐसे गीत जो जोश भरने वाले हों मगर लो टोन में हों उनके लिए अन्य संगीतकार भी अब उन्हें तलब करने लगे हैं. यारों ऐसा है एक ऐसा ही गीत है. गीत अच्छा है पर दोस्ती के थीम पर बने अन्य गीतों जितना दिल में गहरे उतरने वाला नहीं है हालाँकि संगीत संयोजन में जमकर मेहनत की गयी है.

फिल्म के संगीत को कुछ और मसालेदार बनाने के लिए जैकी और उनकी टीम द्वारा पी एस वाई के जबरदस्त हिट गीत गंगम स्टाईल को भी अधिकारिक रूप से एल्बम का हिस्सा बनाया जा रहा है. यानी अब दर्शकों को पिछले साल के सबसे बड़े अंतर्राष्ट्रीय हिट गीत पर थिरकने के लिए भारतीय स्टाइल के स्टेप्स भी मिल जायेंगें.

खैर एल्बम बुरी नहीं है, और कुछ बहुत नया न देकर भी श्रोताओं को ठीक ठाक मनोरंजन देने में सक्षम है. रेडियो पी आई दे रहा है इस एल्बम को ३.९ की रेटिंग.       

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Monday, March 11, 2013

बंद कमरे की राजनीति में संगीत का तडका

प्लेबैक वाणी -36 - संगीत समीक्षा - साहेब बीबी और गैंगस्टर रिटर्न्स


तिग्मांशु धुलिया की सफल साहेब बीवी और गैंगस्टर में शयनकक्ष के भीतर का जिस्मानी खेल कैमरे की जद में था, और संगीत के नाम पर एक जुगनी का ही जोर था. खैर एक बार फिर तिग्मांशु लौटे है और वापसी हुई है गैंगस्टर की, नए संस्करण में गैंगस्टर बने हैं इरफ़ान. आजकल बॉलीवुड में पुरानी फिल्मों के रिमेक और ताज़ा हिट फिल्मों में द्रितीय तृतीय संस्करणों के अलावा शायद कुछ नही हो रहा है...खैर आज बात करते हैं साहेब बीबी और गैंगस्टर रिटर्न्स के संगीत के बारे में.

जहाँ पहले संस्करण में संगीतकारों की लंबी फ़ौज मौजूद थी नए संस्करण का पूरा जिम्मा बेहद प्रतिभाशाली संदीप चौठा ने उठाया है. शुद्ध हिंदी और कुछ संस्कृत शब्दों को जड़ कर रचा गया हैछल कपट गीत. जिसे गाया है पियूष मिश्रा ने. पियूष का ये  नाटकीय अंदाज़ एक अलग जोनर बनकर आजकल फिल्मों में छाया हुआ है. गुलाल और गैंग्स ऑफ वासेपुर की ही तरह यहाँ भी शब्दों की प्रमुखता अधिक है, धुन और संयोजन के मामले में कोई खास नयापन नहीं है. शब्द निश्चित ही अच्छे हैं और कपट और स्वार्थ की जटिलताओं को बेहद उत्कृष्ट रूप से उजागर करता है.

इधर गिरे एक क्लब नंबर है जो परिणीता के कैसी पहेली गीत की याद दिला देता है सोम्या रूह की आवाज़ में वो जरूरी तत्व हैं जो इस गीत को पर्याप्त सेंशुअल अंदाज़ प्रदान कर देता है, कौसर मुनीर के शब्द सटीक हैं. सेक्सोफोन का प्रयोग इस तरह के गीतों में लाजमी रहता है. पर गीत कुछ ऐसे नहीं है जो इसे अलग सी मकबूलियत प्रदान कर सके.

जुगनी का एक नया संस्करण यहाँ भी उपलब्ध है. जैजी बी की आवाज़ का जोश और तेज रिदम का कमाल कदम अवश्य थिरकाते हैं पर एक बार फिर संगीत प्रेमियों के लिए कुछ चौंकाने वाली बात यहाँ नहीं है.

एल्बम का सबसे बढ़िया गीत इसका आईटम गीत खुले आम कह दूं ही बनकर सामने आता है. परोमा दासगुप्ता की आवाज़ में लचीलापन है और उत्तेजना भी. संदीप नाथ के शब्द नए तेवर के साथ राजनीति और मीडिया के रिश्तों की पोल खोलते हैं, अंतरे खास तौर पे देसी अंदाज़ के चलते प्रभावित करते हैं.

देवीकी पंडित की आवाज़ में मखमली गज़लें सबने सुनीं होंगीं, एल्बम के अंतिम गीत में उनकी आवाज़ में गीत है कोना कोना दिल का. गीत की खासियत है इसका संयोजन जहाँ एक बीट स्किप कर स्वर के साथ जोड़ा गया है, ये प्रयोग ख़ासा लुभावना है, दूसरे अंतरे से पहले वेस्टर्न ओपरा का स्पर्श गीत को और भी खास बना देता है. ये गीत एक धीमे नशे की तरह है जिसे बार बार सुनकर भी आप को लुफ्त आएगा.

बहरहाल एल्बम में कुछ बहुत नया नहीं है संगीत प्रेमियों के लिए, और ऐसा भी कुछ नहीं जो आम श्रोता को आकर्षित कर सके. रेडियो प्लेबैक दे रहा एल्बम को ३.२ की रेटिंग.       

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Sunday, February 17, 2013

मर्डर ३ में फिर ले आया दिल प्रीतम और सैयद को एक साथ.

प्लेबैक वाणी -34 - संगीत समीक्षा - मर्डर ३



भट्ट कैम्प की फिल्मों के बारे में हम पहले भी ये कह चुके हैं कि ये एक ऐसा बैनर है जो कहानी की जरुरत के हिसाब से एल्बम में गीतों को सजाता है, जबरदस्ती का कोई आईटम नहीं, कोई गैर जरूरी ताम झाम नहीं. ये एक ऐसा बैनर है जहाँ आज भी मेलोडी और शाब्दिक सौन्दर्य को ही तरजीह दी जाती है. 

आईये इस बैनर की नई पेशकश ‘मर्डर ३’ के संगीत के बारे में जानें. ‘मर्डर’ के पहले दो संस्करणों का संगीत बेहद सफल और मधुर रहा हैं, विशेषकर अनु मालिक का रचे पहले संस्करण के गीतों को श्रोता अब तक नहीं भूले हैं. ‘मर्डर ३’ के संगीतकार हैं प्रीतम और गीतकार हैं सैयद कादरी.


रोक्सेन बैंड के मुस्तफा जाहिद की आवाज़ में है “हम जी लेंगें”. मुस्तफा की आवाज़ अन्य रोक् गायकों से कुछ अलग नहीं है, पर शब्दों से सैयद ने गीत को दिलचस्प बनाये रखा है – ‘किसको मिला संग उम्र भर का यहाँ, वो हो रुलाये दिल चाहे जिसको सदा...’, गीत युवा दिलों को ख़ासा आकर्षित करेगा क्योंकि प्रेम और दिल टूटने के अनुभव से गुजर चुके सभी दिल इस गीत से खुद को जोड़ पायेंगें.


जहाँ पहले गीत में गीतकार का असर ज्यादा था, वहीँ ‘जाता है तुझ तक’ में प्रीतम का चिर परिचित जैज अंदाज़ खूब सुहाना लगता है. आवाज़ की दुनिया में नई सनसनी ‘निखिल डी’सूजा’ की दमदार आवाज़ में गीत स्वाभाविक ही दिल तक पहुँच जाता है. ये गीत ऐसे हैं जिन्हें सुनते हुए आप कोई भी काम कर सकते हैं, यक़ीनन ऐसे गीत रेडियो सुनने वालों को खासे पसंद आते हैं, ये रेल्क्सिंग रिदम का गीत लोकप्रिय न हो तो हैरत ही होगी.    

अगले गीत की शुरूआती वोइलेन पीस कमाल का है, ‘मत आजमा रे’ है मेरे पसंदीदा के के की आवाज़ में, शब्द और धुन बेहद सही तरीके से घुल मिल गए हैं, ‘हसरतें बार बार बार बार यार की करो’, वाकई इस गीत को बार बार सुनने का मन करता है. एक बार फिर ये गीत उस जेनर का है जिसका हम जिक्र पहले कर चुके है. थकी हुई जेहन की नसों को मसर्रत के पल देता ये गीत भी श्रोताओं का दिल जीत लेगा. वोइलेन पीस और के के की गायकी तो है ही असरदायक.

एक बात खास गैरतलब है, भट्ट कैम्प की इन फिल्मों में पुरुष गायकों का ही दबदबा रहता है, किसी अभिनेत्री पर फिल्माए गीत को भी पुरुष गायक द्वारा ही गाया जाता है, ये ‘राज़’ क्या है कोई समझाए, बहरहाल मर्डर ३ के सभी ४ गीतों को भी पुरुष गायकों ने ही गाया है, अंतिम गीत ‘तेरी झुकी नज़र’ को गाया है शफकत अमानत अली ने. फिर वही चिर परिचित रोमांटिक अंदाज. सैयद लगातार भट्ट कैम्प के साथ अच्छा काम कर रहे हैं.

मर्डर ३ का संगीत कुछ नया पेश न कर के भी पुरानी चीज़ों को सुनने लायक रूप में पेश करते हुए श्रोताओं को कुछ सुरीली सौगातें दे जाता हैं. रेडियो प्लेबैक दे रहा है इस एल्बम को ३.६ की रेटिंग. 

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Monday, January 28, 2013

प्रीतम के संगीत की रेस रेडिओ प्लेबैक इंडिया पर

प्लेबैक वाणी -31 -संगीत समीक्षा - रेस - 2  



रेस का पहला संस्करण २००८ में प्रदर्शित हुआ था, जिसे दर्शकों ने हाथों हाथ लिया. करीब ४ साल बाद अब्बास मस्तान लाये हैं इसका नया संस्करण जिसमें एक बार फिर संगीत है प्रीतम दादा का. रेस का संगीत भी फिल्म की रफ़्तार के मुताबिक तेज धुन पर थिरकाने वाला था, जहाँ शीर्षक गीत के अलावा ख्वाब देखे और जरा जरा जैसे मादक गीत भी खासे लोकप्रिय साबित हुए थे. ऐसे में रेस २ से भी यही उम्मीद रखी जायेगी कि इसका संगीत भी क़दमों को थिरकने पर मजबूर करने वाला होगा.
एल्बम की शुरुआत ही काफी धमाकेदार है जहाँ गीत का शीर्षक ही पार्टी ऑन माई माईन्ड हो वहाँ रिदम का तूफानी होना लाजमी है. गीत धीमे धीमे जोश में चढ़ता है.शेफाली अल्विरास की मादक आवाज़ में आगाज़ अच्छा होता है जिसे के के की जोशीली आवाज़ का साथ मिलता है जल्दी ही. ताज़ा चलन के अनुरूप यो यो हनी सिंह का रैप भी है तडके के लिए. डिस्को नाईट्स और पार्टियों के लिए एक परफेक्ट गीत है ये.
आतिफ असलम और सुनिधि चौहान की आवाज़ में अगला गीत बे इन्तेहाँ एक रूमानी गीत है. मयूर पुरी ने कैच शब्द के आस पास सारा ताना बाना बुना है पर शब्द अपेक्षित असर नहीं कर पाते. हालाँकि गायकों ने अपने चिर परिचित अंदाज़ में गीत को सँभालने की भरपूर कोशिश की है. प्रीतम कुछ नया करते हुए प्रतीत नहीं होते.
लत लग गयी एक बार फिर नाचने को मजबूर करने वाला गीत है. रिदम काफी तेज है और यहाँ शब्द संगीत का तालमेल भी बढ़िया मुझे तो तेरी लत लग गयी, जमाना कहे लत ये गलत लग गयी..... बेनी दयाल की आवाज़ में काफी संभावना है और शामली खोलगडे की आवाज़ का नशा दिन बा दिन बढ़ता सा महसूस हो रहा है. इन दो युवा आवाजों में ये गीत एल्बम का सबसे बहतरीन गीत साबित होता है.
शीर्षक गीत वही है जो पहले था, यानी अल्लाह दुहाई है मगर कुछ गायकों की टीम में नयापन है और इसके ढांचे में प्रीतम ने कुछ बदलाव कर इसे और भी कातिलाना बना दिया है. आतिफ की आवाज़ इस असर को और बढ़ा देती है, साथ में विशाल ददलानी और अनुष्का भी पूरे फॉर्म में सुनाई दिए हैं.      
कुल मिलाकर रेस २ का संगीत अपनी अपेक्षाओं पर तो खरा उतरता है मगर कुछ नया लेकर नहीं आता. रेडियो प्लेबैक डे रहा है इसे ३.३ की रेटिंग.                   

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