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Sunday, July 10, 2016

राग मधुवन्ती : SWARGOSHTHI – 278 : RAG MADHUVANTI



स्वरगोष्ठी – 278 में आज

मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन – 11 : पुण्यतिथि पर सुरीला स्मरण

“रस्म-ए-उल्फ़त को निभाएँ तो निभाएँ कैसे...”



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ जारी है। अब हम श्रृंखला के समापन की ओर अग्रसर हैं। श्रृंखला की ग्यारहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का एक बार फिर हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का सहयोग लिया है। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर केन्द्रित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हम मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की चर्चा और फिर उस राग की उदाहरण सहित जानकारी दे रहे हैं। आगामी 14 जुलाई को मदन मोहन की पुण्यतिथि पड़ रही है। इस अवसर पर हम उनकी स्मृतियों को नमन करते है और उन्हीं के एक उल्लेखनीय गीत के माध्यम से उनका स्मरण कर रहे हैं। श्रृंखला की ग्यारहवीं कड़ी में आज हम आपको राग मधुवन्ती के स्वरों में पिरोये गए 1973 में प्रदर्शित फिल्म ‘दिल की राहें’ से एक सुमधुर गीत का रसास्वादन कराएँगे। इस राग आधारित गीत को स्वर दिया है, लता मंगेशकर ने। गीत से पहले स्वयं मदन मोहन की आवाज़ में हम उनका एक वक्तव्य भी सुनवा रहे हैं। संगीतकार मदन मोहन द्वारा राग मधुवन्ती के स्वरों पर आधारित इस गीत के साथ ही राग का यथार्थ स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम सुप्रसिद्ध वायलिन वादिका विदुषी एन. राजम्, उनकी सुपुत्री संगीता शंकर तथा दोनों नातिन, रागिनी और नंदिनी का समवेत रूप से बजाया राग मधुवन्ती की तीनताल में निबद्ध एक सुमधुर रचना भी दृश्य रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।


दन मोहन ने आज के इस गीत के बारे में एक बार कहा था - "मैं यह समझता हूँ कि हर फ़नकार का जज़्बाती होना ज़रूरी है, क्योंकि अगर उसमें इन्सानियत का जज़्बा नहीं है, तो वो सही फ़नकार नहीं हो सकता। भगवान ने कुछ फ़नकारों को ज़्यादा ही जज़्बाती बनाया है। यह गाना मुझे बहुत पसन्द है, बहुत ख़ूबसूरती से गाया गया है, सुन के कुछ एक अजीब सी कैफ़ियततारी होती है। दर्द भरा गाना है, पर दर्द भी इन्सान की ज़िन्दगी का हिस्सा है। इससे इन्सान कब तक दूर भाग सकता है?", ये शब्द निकले थे संगीतकार मदन मोहन के मुख से विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में फ़िल्म 'दिल की राहें' की ग़ज़ल "रस्म-ए-उल्फ़त को निभायें तो निभायें कैसे..." सुनवाने से पहले। मदन मोहन के फ़िल्मी गीतों व ग़ज़लों की बात करें तो ऐसा अक्सर हुआ कि वो फ़िल्में नहीं चली पर उन फ़िल्मों को आज तक अगर लोगों ने याद रखा तो सिर्फ़ और सिर्फ़ उनके गीतों की वजह से। केवल 70 के दशक की ही अगर बात करें तो 'महाराजा', 'दस्तक', 'माँ का आँचल', 'हँसते ज़ख़्म', 'मौसम' और 'दिल की राहें' कुछ ऐसी फ़िल्में हैं जो बॉक्स ऑफ़िस पर ज़्यादा कमाल नहीं दिखा सके, पर आज इन फ़िल्मों के ज़िक्र पर सबसे पहले इनके गानें याद आते हैं। मदन मोहन की मौसिक़ी और लता मंगेशकर की आवाज़ में जितनी भी ग़ज़लें बनीं हैं, वो सभी एक से बढ़ कर एक है, और उन्हें सुनते हुए ऐसा लगता है कि जैसे ये जन्नत में बन कर धरती पर उतारे गये हैं। इन ग़ज़लों का पूरा श्रेय मदन मोहन और लता जी को दे दें और इनके शायरों को याद न करें, यह बहुत बड़ी ग़लत बात जो जायेगी। राजा मेंहदी अली ख़ाँ, राजेन्द्र कृष्ण और मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे ग़ज़लों को मदन मोहन ने सबसे ज़्यादा स्वरबद्ध किया। पर 1973 में दो फ़िल्में ऐसी आयीं जिनमें बतौर गीतकार नक्श लायलपुरी साहब ने कमान सम्भाली। ये फ़िल्में थीं 'प्रभात' और 'दिल की राहें'। फ़िल्म 'प्रभात' में लता के गाये कई गीत थे जिनमें सबसे ज़्यादा उल्लेखनीय है मुजरा गीत "साक़िया क़रीब आ, नज़र मिला..." और फ़िल्म 'दिल की राहें' के गीतों और ग़ज़लों के तो क्या कहने। मन्ना डे और उषा मंगेशकर की युगल आवाज़ों में "अपने सुरों में मेरे सुरों को बसा लो, मेरा गीत अमर हो जाये..." और लता मंगेशकर की गायी फिल्म 'दिल की राहें' की दो श्रेष्ठ रचनाएँ थीं। इन दो फ़िल्मों के अलावा नक्श साहब ने मदन जी के साथ एक और फ़िल्म के लिए भी गीत लिखे पर वह फ़िल्म नहीं बनी।

"रस्म-ए-उल्फ़त को निभायें..." ग़ज़ल के बनने की कहानी चौंकाने वाली है। हुआ यूँ कि एक सिचुएशन पर गीत लिखने के लिए मदन मोहन ने नक्श लायलपुरी को एक धुन दे दी थी और नक्श साहब को गीत लिख कर रविवार की सुबह मदन जी के घर ले जाना था। और वह गीत अगले दिन (सोमवार) को रेकॉर्ड होना था क्योंकि लता जी ने डेट दे रखी थी। तो नक्श साहब गीत लिख कर मदन मोहन के घर पहुँचे रविवार सुबह 11 बजे। उनका लिखा हुआ गीत मदन जी ने पढ़ा और उनसे कहा कि फ़िल्म के निर्माता (सुल्तान एच. दुर्रानी और एस. कौसर) ने कहा है कि उन्हें अपनी फ़िल्म में मदन मोहन से एक ग़ज़ल चाहिये। अगर मदन मोहन के साथ ग़ज़ल नहीं बनायी तो फिर क्या काम किया, ऐसा निर्माता महोदय ने मदन मोहन से कहा है। तो अब मदन जी भी चाहते हैं कि उसी धुन पर नक्श साहब एक ग़ज़ल लिख दे। अब नक्श साहब मदन जी को ना भी नहीं कह सकते थे, वो दुविधा में पड़ गये। यह तनाव भी था कि अगले ही दिन रेकॉर्ड करना है, अगर लिख ना सके तो क्या होगा! लता जी की डेट बेकार हो जाएगी, वगेरह-वगेरह। ये सब सोचते-सोचते वो मदन जी के घर से बाहर निकल आये। उन्होंने घड़ी देखा, सुबह के 11 बज रहे थे। उन्होंने सोचा कि अगर वो पेडर रोड से मुलुंड वापस जाकर लिखेंगे तो काफ़ी समय बरबाद हो जायेगा, और फिर वापस भी आना है, इसलिए वो चौपाटी में फुटपाथ के एक कोने में जाकर बैठ गए और मन ही मन सोचने लगे कि इतने कम समय में लिखें तो लिखें कैसे, गीत को ग़ज़ल बनायें तो बनायें कैसे, इस मुसीबत से निकले तो निकले कैसे? और ये सब सोचते-सोचते उनके मुख से निकल पड़े कि रस्म-ए-उल्फ़त को निभायें तो निभायें कैसे। बस, कलम चलने लगी, कभी रुकती, कभी चलती, कभी वो सोचते, कभी मुस्कुराते, ऐसा करते-करते ग़ज़ल पूरी हो गई। और शाम 4 बजे नक्श साहब जा पहुँचे मदन मोहन जी के घर। अगले दिन ग़ज़ल रेकॉर्ड हो गई। लता और मदन मोहन जोड़ी के ग़ज़लों के बारे में तो सब जानते थे, इस बार नक्श साहब की भी ख़ूब तारीफ हुईं। नक्श साहब ने एक मुलाक़ात में बताया था कि बरसों बाद मदन मोहन जी की याद में मुम्बई के चेम्बुर में एक कार्यक्रम आयोजित हुआ था जिसमें नक्श साहब को भी आमन्त्रित किया गया था। जब इस ग़ज़ल को बजाया गया, तब किसी ने कहा कि "रस्म-ए-उल्फ़त..." के बाद और कोई गाना मत बजाना।

मदन मोहन के बारे में गीतकार और शायर नक्श लायलपुरी के क्या विचार हैं, उन्हीं के शब्दों में पढ़िये - "उनसे मिलने से पहले मैंने जो कुछ भी सुन रखा था मदन मोहन के बारे में, कि वो शॉर्ट-टेम्पर्ड हैं, वगेरह-वगेरह, वो सब ग़लत बातें हैं। वो ऐसे पहले संगीतकार थे जिन्होंने मेरे सर पर कभी पहाड़ नहीं रखा। वो गीतकारों और शायरों को छूट देते थे। वो किसी सिटिंग्‍ में ज़्यादा से ज़्यादा 20 मिनट बैठते और मुझे कभी भी किसी गीत को पूरा करने के लिए कभी समय की पाबन्दी नहीं दी। निर्माता जब किसी धुन को सिलेक्ट कर लेते थे, तब मदन जी मुझे बुलाते और समझाते। वो समय के बड़े पाबन्द थे और अगर कोई देर से आया तो वो ग़ुस्सा हो जाते थे। किसी गीत को कम्पोज़ करने के लिए वो 10 मिनट का समय लेते थे। लेकिन जब कोई निर्माता उन्हें साइन करवाने आते तो वो उनसे एक महीने का समय माँग लेते ताकि उन्हें अपना मनपसन्द स्टुडियो, मनपसन्द कलाकार और साज़िन्दों से डेट्स मिल जाये। इन सब चीज़ों के लिए वो किसी की ख़ुशामद करना बिल्कुल पसन्द नहीं करते थे। स्टुडियो, साज़िन्दे और गायक तय हो जाने पर वो पाँच-छह गीत एक के बाद एक रेकॉर्ड कर लेते, एक गीत प्रति दिन के हिसाब से।" नक्श लायलपुरी के उस मुलाक़ात में उन्होंने यह बताया कि मदन मोहन फ़िल्म 'लैला मजनूं' में नक्श साहब को बतौर गीतकार लेना चाहते थे। मदन मोहन साहिर लुधियानवी को नहीं लेना चाहते थे क्योंकि साहिर अपने गीतों में फेर-बदल बिल्कुल पसन्द नहीं करते और उधर मदन मोहन की आदत थी कि हर गीत में कुछ न कुछ फेर-बदल कर देते थे। पर 'लैला मजनूं' के निर्माता एच. एस. रवैल साहिर के पक्ष में थे, और मदन जी को झुकना पड़ा क्योंकि उन्हें उस वक़्त पैसों को सख़्त ज़रूरत थी अपने लोनावला के बंगले के निर्माण के लिए। 'लैला मजनूं' के रिलीज़ के बाद मदन मोहन जब नक्श लायलपुरी से मिले तो उनसे कहा कि वो 'लैला मजनूं' से भी बड़े फ़िल्म में नक्श साहब से गीत लिखवायेंगे, पर वह दिन आने से पहले ही मदन जी अचानक इस दुनिया को छोड़ कर चले गये। उसी मुलाक़ात में जब नक्श साहब से यह पूछा गया कि मदन जी का कौन सा गीत उन्हें सर्वाधिक पसन्द है, तो उन्होंने फ़िल्म 'अनपढ़' के "आपकी नज़रों ने समझा..." गीत की तरफ़ इशारा किया। नक्श साहब ने यह भी बताया कि इसी गीत के मीटर पर उन्होंने फ़िल्म 'दिल की राहें' में ही एक गीत लिखा था "आप की बातें करें या अपना अफ़साना कहें, होश में दोनो नहीं हैं किसको दीवाना कहें..."। पर "रस्म-ए-उल्फ़त" ही ज़्यादा मशहूर हुआ।


राग मधुवन्ती : “रस्म-ए-उलफत को निभाएँ तो निभाएँ कैसे...” : लता मंगेशकर : फिल्म – दिल की राहें



डॉ. एन. राजम् अपनी पुत्री संगीता शंकर और नातिनें नंदिनी और रागिनी के साथ
राग मधुवन्ती को तोड़ी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग की जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है, क्योंकि इसके आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इस राग में कोमल गान्धार, तीव्र मध्यम तथा शेष सभी शुद्ध स्वर प्रयोग होते हैं। आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर वर्जित है। राग मधुवन्ती का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। इसके गायन-वादन का उपयुक्त समय दिन का तीसरा प्रहर माना जाता है। यह राग कर्नाटक संगीत के 29वें मेलकर्त्ता राग धर्मावती के समतुल्य है। राग मधुवन्ती बहुत प्राचीन राग नहीं है। जानकारों के अनुसार इस राग की रचना मैहर घराने के विख्यात संगीतज्ञ उस्ताद अली अकबर खाँ ने की थी। स्वयं अली अकबर और पण्डित रविशंकर ने इस राग को ख्याति दिलाई। राग मुल्तानी के ऋषभ और धैवत स्वरों के कोमल रूप को शुद्ध स्वर में परिवर्तित कर देने से राग मधुवन्ती का स्वरूप बनता है। मुल्तानी के समान राग मधुवन्ती में मन्द्र निषाद से आगे बढ़ते समय गान्धार पर मध्यम स्वर का कण लेकर आगे बढ़ते हैं। राग मधुवन्ती के वादी-संवादी स्वरों और गायन समय में परस्पर विरोध है। वादी-संवादी स्वरों की दृष्टि से यह उत्तरांग प्रधान राग होना चाहिए, परन्तु गायन समय की दृष्टि से यह पूर्वांग प्रधान राग है। थाट की दृष्टि से यह राग दस थाट में से किसी भी थाट के उपयुक्त नहीं है। विद्वानो ने न जाने क्यों इसे तोड़ी थाट के अन्तर्गत मान लिया है। व्यांकटमखी द्वारा निर्धारित 72 मेल में से यह धर्मावती मेल के सर्वाधिक अनुकूल है। कुछ विद्वान इस राग को अम्बिका नाम से भी पुकारते हैं, किन्तु यह मधुवन्ती नामसे अधिक लोकप्रिय है। राग मधुवन्ती के यथार्थ स्वरूप का परिचय देने के लिए आज हमने वायलिन वाद्य को चुना है। वायलिन पर गायकी अंग में राग मधुवन्ती प्रस्तुत कर रही हैं, विश्वविख्यात विदुषी डॉक्टर एन. राजम् अपनी सुपुत्री संगीता शंकर और नातिने नन्दिनी और रागिनी के साथ। विदुषी एन. राजम् के गुरु पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर ग्वालियर घराने के थे, इसलिए स्वयं को इसी घराने की शिष्या मानतीं हैं। घरानॉ के सम्बन्ध में उनका मत है कि कलाकार को किसी एक ही घराने में बाँध कर नहीं रखा जा सकता। संगीत के कलाकार को हर घराने की अच्छाइयों का अनुकरण करना चाहिए। घरानों की प्राचीन परम्परा के अनुसार तीन पीढ़ियों तक यदि विधा की विशेषता कायम रहे तो प्रथम पीढ़ी के नाम से घराना स्वतः स्थापित हो जाता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो आने वाले समय में राजम् जी के नाम से भी यदि एक नए घराने का नामकरण हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं। डॉ. राजम् को प्रारम्भिक शिक्षा अपने पिता पण्डित नारायण अय्यर से मिली। उनके बड़े भाई पण्डित टी.एन. कृष्णन् कर्नाटक संगीत पद्यति के प्रतिष्ठित और शीर्षस्थ वायलिन-वादक रहे हैं। डॉ. राजम् की एक भतीजी विदुषी कला रामनाथ वर्तमान में विख्यात वायलिन-वादिका हैं। राजम् जी की सुपुत्री और शिष्या संगीता शंकर अपनी माँ की शैली में ही गायकी अंग में वादन कर रहीं हैं। यही नहीं संगीता की दो बेटियाँ अर्थात डॉ. राजम् की नातिनें- नन्दिनी और रागिनी भी अपनी माँ और नानी के साथ मंच पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रही हैं। अब हम आपको एक ही परिवार की इन चार कलाकारों का समवेत वायलिन वादन का वीडियो दिखाते हैं। आप इस वीडियो का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने देने की अनुमति दीजिए।


राग मधुवन्ती : गायकी अंग में वायलिन वादन : एन. राजम्, संगीता शंकर, नन्दिनी और रागिनी





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 278वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक बार पुनः संगीतकार मदन मोहन के संगीत से सजे एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 280वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन का आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत में पुरुष कण्ठ-स्वर को पहचानिए और हमे इस गायक का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 17 जुलाई, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 280वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 276 की संगीत पहेली में हमने आपको मदन मोहन के संगीत निर्देशन में बनी और 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘आशियाना’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – केदार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है – ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायक – तलत महमूद

इस बार की पहेली में छः प्रतिभागियों ने सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं - चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हमारे एक नये प्रतिभागी दिलीप देशपाण्डे। इन सभी विजेताओं ने दो-दो अंक अर्जित किये है। सभी विजेता प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में जारी हमारी श्रृंखला ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ की आज की कड़ी में आपने राग मधुवन्ती का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला में हम फिल्म संगीतकार मदन मोहन के कुछ राग आधारित गीतों को चुन कर आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। हमारी अगली श्रृंखला “वर्षा ऋतु के राग” विषय पर आधारित होगी। इस श्रृंखला के लिए आप अपने सुझाव या फरमाइश ऊपर दिये गए ई-मेल पते पर शीघ्र भेजिए। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


 


Sunday, July 3, 2016

राग केदार : SWARGOSHTHI – 277 : RAG KEDAR और विदुषी वीणा सहस्त्रबुद्धे को श्रद्धांजलि




स्वरगोष्ठी – 277 में आज

मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन – 10 : जब राज कपूर की आवाज़ बने तलत साहब

‘मैं पागल मेरा मनवा पागल, पागल मेरी प्रीत रे...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ जारी है। श्रृंखला की दसवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का एक बार फिर हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का सहयोग लिया है। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर केन्द्रित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हम मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की चर्चा और फिर उस राग की उदाहरण सहित जानकारी दे रहे हैं। गत 25 जून को हमने मदन मोहन का 93वाँ जन्मदिन मनाया। श्रृंखला की दसवीं कड़ी में आज हम आपको राग केदार के स्वरों में पिरोये गए 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘आशियाना’ से एक सुमधुर गीत का रसास्वादन कराएँगे। इस राग आधारित गीत को स्वर दिया है, तलत महमूद ने। संगीतकार मदन मोहन द्वारा राग केदार स्वरों पर आधारित इस गीत के साथ ही राग का यथार्थ स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी शुभा मुद्गल के स्वरों में राग केदार में निबद्ध तीनताल की एक सुमधुर बन्दिश भी प्रस्तुत कर रहे हैं।


मदन मोहन और तलत महमूद
"हालाँकि संगीत के सिद्धान्तों का ज्ञान और बुनियादी नियमों के बारे में जानना बहुत ज़रूरी है, पर यह ज़रूरी नहीं कि जिस किसी ने भी ये बातें सीख ली वो संगीत में मास्टर बन गया। संगीत को परम्परागत तरीके से किसी गुरु के चरणों में बैठ कर सीखा जाए यह ज़रूरी नहीं। मेरा ख़याल है कि संगीत कानों से भी सीखा जा सकता है अगर किसी में सीखने की मन से आकांक्षा हो तो। संगीत एक ऐसी कला है जिसे अनिच्छुक छात्रों के अन्दर ज़बरदस्ती प्रवेश नहीं कराया जा सकता किसी पाठ्यक्रम के माध्यम से। जो संगीत के लिए पागल है, वही इसमें महारथ हासिल कर सकता है। संगीत के दिग्गजों के साथ काम करने की वजह से मुझे संगीत शिक्षा को करीब से ग्रहण करने और इसे समझने का मौक़ा मिला। बहुत आसानी पर स्पष्ट तरीके से संगीत ने मुझे चारों ओर से जकड़ लिया। मुझे नहीं मालूम कब और कैसे मेरी कानों में संगीत की लहरियाँ प्रतिध्वनित होने लगी जो मैं रोज़ सुना करता था। और इसी तरीक़े से मैंने वास्तव में संगीत सीखा।" मदन मोहन के इन शब्दों का सार हम सब की समझ में आ गया होगा। आइए अब आते हैं आज के गीत पर। आज हमने चुना है तलत महमूद की आवाज़ में राग केदार पर आधारित और ताल कहरवा में निबद्ध फ़िल्म ’आशियाना’ का मशहूर गीत "मैं पागल मेरा मनवा पागल..."। मदन मोहन तलत साहब के ग़ज़ल गायकी से वाक़िफ़ थे और लखनऊ के अपने शुरुआती दिनों से ही एक दूसरे को जानते-पहचानते थे। मदन मोहन के फ़िल्म-संगीत सफ़र के शुरुआती सालों में तलत महमूद ने उनके लिए कई गीत गाए। यह सच है कि जब बाद के वर्षों में रफ़ी साहब की इण्डस्ट्री में बहुत ज़्यादा डिमाण्ड हो गई थी तब तलत साहब को उनकी तुलना में कम गाने मिलने लगे थे, तब फ़िल्म ’जहाँआरा’ के निर्देशक ने फ़िल्म के सभी गीत रफ़ी साहब की आवाज़ में रेकॉर्ड करने का सुझाव मदन मोहन को दिया। पर मदन मोहन इस बात पर अन्त तक अड़े रहे कि तलत इस फ़िल्म में कम से कम तीन गीत ज़रूर गाएँगे और बाक़ी गीत रफ़ी गाएँगे। इस बात पर उन्होंने स्वेच्छा से फ़िल्म छोड़ने का प्रस्ताव तक दे दिया निर्माता को। तब जाकर निर्माता ओम प्रकाश जी ने मदन जी को आश्वस्त किया, और मदन जी ने तलत साहब से "फिर वही शाम...", "तेरी आँख के आँसू..." और "मैं तेरी नज़र का सुरूर हूँ..." गवाया जो तलत साहब के करीअर में भी मील के पत्थर सिद्ध हुए।

तलत महमूद
अब बातें ’आशियाना’ की। 1951 में फ़िल्म ’आँखें’ के संगीत की सफलता ने उसी साल मदन मोहन को जे. बी. एच. वाडिया की एक फ़िल्म दिला दी। फ़िल्म थी ’मदहोश’। इस फ़िल्म ने उनके सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी। मदन जी के ही शब्दों में - "जब मैं ’मदहोश’ पर काम कर रहा था, एक दिन वाडिया साहब हाज़िर हुए एक सिचुएशन के साथ जिसके लिए वो एक प्रभावशाली गीत चाहते थे जो एक धोखा देने वाले प्रेमी के जज़्बात बयाँ करे। राजा मेंहदी अली ख़ाँ फ़िल्म ’मदहोश’ के गीत लिख रहे थे। इस सिचुएशन को सुनते ही उन्होंने कहा कि इस तरह के भाव पर उन्होंने कुछ समय पहले एक गीत लिखा है, अगर सबको ठीक लगे तो यह गीत लिया जा सकता है। उन्होंने अपनी नोटबूक निकाली और गीत पढ़ने लगे। पाँच मिनट में मैंने गीत की धुन तैयार कर दी और वाडिया साहब को सुनाया। वो बहुत ख़ुश हुए और गीत भी बड़ा पॉपुलर हुआ। वह गीत था "मेरी याद में तुम ना आँसू बहाना..."। यह मदन मोहन और तलत महमूद की जोड़ी का पहला सुपरहिट गीत था। इसके बाद "आँसू" शब्द वाले कई तलत-मदन गीत बने। ‘मदहोश’ बनने के अगले ही साल 1952 में बनी फिल्म ’आशियाना’ जिसमें राज कपूर और नरगिस की जोड़ी थी। इस फ़िल्म के संगीत ने मदन मोहन को अव्वल दर्जे के संगीतकारों की श्रेणी में ला खड़ा किया। मदन मोहन के अनुसार यह उनकी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में से एक है और ख़ास तौर से तलत महमूद का गाया "मैं पागल मेरा मनवा पागल..." उनके दिल के बहुत क़रीब है जिसे कम्पोज़ करने में उन्हें पूरा एक महीना लग गया था। संगीत की समझ रखने वाले राज कपूर भी ’आशियाना’ के गीत-संगीत से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कहा, "अगर मेरी फ़िल्मों में सिर्फ़ इस तरह का संगीत हो तो मैं अपनी फ़िल्मों को अनन्तकाल तक थिएटरों में चला सकता हूँ।" भले इस फ़िल्म के संगीत की बहुत तारीफ हुई, पर फ़िल्म बुरी तरह से पिट गई। बहुत वर्षों के बाद जब मदन मोहन की कुछ फ़िल्में दोबारा प्रद्रशित हुईं और अब की बार हिट हुईं, तब उन्हें शीर्ष के संगीतकार का दर्जा लोगों ने दिया। लीजिए, अब आप यही गीत सुनिए।


राग केदार : “मैं पागल मेरा मनवा पागल...” : तलत महमूद : फिल्म – आशियाना


शुभा मुद्गल
भक्तिरस की अभिव्यक्ति के लिए केदार एक समर्थ राग है। कर्नाटक संगीत पद्यति में राग हमीर कल्याणी, राग केदार के समतुल्य है। औड़व-षाड़व जाति, अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में छह स्वरों का प्रयोग होने वाला यह राग कल्याण थाट के अन्तर्गत माना जाता है। प्राचीन ग्रन्थकार राग केदार को बिलावल थाट के अन्तर्गत मानते थे, आजकल अधिकतर गुणिजन इसे कल्याण थाट के अन्तर्गत मानते हैं। इस राग में दोनों मध्यम का प्रयोग होता है। शुद्ध मध्यम का प्रयोग आरोह और अवरोह दोनों में तथा तीव्र मध्यम का प्रयोग केवल अवरोह में किया जाता है। आरोह में ऋषभ और गान्धार स्वर और अवरोह में गान्धार स्वर वर्जित होता है। कभी-कभी अवरोह में गान्धार स्वर का अनुलगन कण का प्रयोग कर लिया जाता है। राग केदार में तीव्र मध्यम आरोह में पंचम के साथ और शुद्ध मध्यम आरोह और अवरोह दोनों में प्रयोग किया जाता है। कभी-कभी अवरोह में धैवत से मध्यम को जाते समय मींड़ के साथ दोनों मध्यम एक साथ प्रयोग किया जाता है। यह प्रयोग रंजकता से परिपूर्ण होता है। राग हमीर के समान राग केदार में कभी-कभी अवरोह में मधुरता बढ़ाने के लिए कोमल निषाद विवादी स्वर के रूप में प्रयोग किया जाता है। राग का चलन वक्र होता है, किन्तु तानों में वक्रता का नियम शिथिल हो जाता है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इस दृष्टि से यह उत्तरांग प्रधान राग होगा, क्योंकि मध्यम स्वर उत्तरांग का और षडज स्वर पूर्वांग का स्वर होता है। मध्यम स्वर का समावेश सप्तक के पूर्वांग में नहीं हो सकता। राग का एक नियम यह भी है कि वादी-संवादी दोनों स्वर सप्तक के एक अंग में नहीं हो सकते। इस दृष्टि से यह राग उत्तरांग प्रधान तथा दिन के उत्तर अंग में अर्थात रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाना चाहिए। परन्तु राग केदार प्रचलन में इसके ठीक विपरीत रात्रि के पहले प्रहर में ही गाया-बजाया जाता है। राग केदार उपरोक्त नियम का अपवाद है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के पहले प्रहर में किया जाता है। राग केदार का स्पष्ट अनुभव करने के लिए अब हम आपको इस राग के स्वरों से अभिसिंचित एक सुमधुर बन्दिश सुनवा रहे हैं। यह खयाल रचना विख्यात गायिका विदुषी शुभा मुद्गल ने प्रस्तुत किया है। शुभा जी से आप तीनताल में निबद्ध राग केदार की यह रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग केदार : “काहे सुन्दरवा बोलो नाहिं...” : विदुषी शुभा मुद्गल




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 277वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक बार पुनः मदन मोहन के राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 280वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका की आवाज़ को पहचान रहे हैं? हमें उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 9 जुलाई, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 279वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 275 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1970 में प्रदर्शित फिल्म ‘दस्तक’ से राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – चारुकेशी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और सितारखानी तीसरे प्रश्न का उत्तर है- पार्श्वगायिका – लता मंगेशकर

इस बार की संगीत पहेली में पाँच प्रतिभागियों ने तीनों प्रश्नों का सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। ये विजेता हैं - वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। सभी पाँच विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

हार्दिक श्रद्धांजलि : विदुषी वीणा सहस्त्रबुद्धे


खयाल, टप्पा और भजन की सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी वीणा सहस्त्रबुद्धे का गत 29 जून को निधन हो गया। उनके निधन से ग्वालियर धराने की गायकी का एक सितारा अस्त हो गया। उनकी गायकी में ग्वालियर घराने के साथ-साथ जयपुर और किराना घराने की गायकी की झलक भी मिलती थी। उनका जन्म 14 सितम्बर 1948 को संगीतज्ञों के परिवार में हुआ था। उनके पिता पण्डित शंकर श्रीपाद बोड़स ग्वालियर घराने के विख्यात संगीतज्ञ और पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर के शिष्य थे। वीणा जी की संगीत-शिक्षा पहले अपने पिता से और बाद में अपने अग्रज पण्डित काशीनाथ बोड़स से प्राप्त हुई। आगे चल कर उन्हें वरिष्ठ संगीतज्ञों, पण्डित बलवन्तराव भट्ट, पण्डित वसन्त ठकार और पण्डित गजाननराव जोशी का मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ। वर्ष 1968 में वीणा जी ने कानपुर विश्वविद्यालय से संगीत, संस्कृत और अँग्रेजी विषय से स्नातक, 1969 में अखिल भारतीय गन्धर्व मण्डल से संगीत में स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण की। आगे चल कर 1979 में उन्होने कानपुर विश्वविद्यालय से संस्कृत में स्नातकोत्तर और 1988 में अखिल भारतीय गन्धर्व मण्डल से डॉक्ट्रेट की उपाधि अर्जित की। 1968 में उनका विवाह श्री हरि सहस्त्रबुद्धे से हुआ। वर्ष 1972 में वीणा जी को आकाशवाणी का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। 1993 में उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से अलंकृत किया गया। 2013 का केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी का पुरस्कार जब भारत के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने उन्हें प्रदान किया, उसी वर्ष वह एक असाध्य रोग से ग्रसित हो गई थीं। उन्हे पुरस्कार समारोह में व्हील चेयर पर ले जाया गया था। इसी रोग से ग्रसित होकर गत 29 जून को उनका निधन हो गया। निधन से लगभग दस दिन पूर्व ‘स्वरगोष्ठी’ के 275वें अंक का प्रकाशन 19 जून को किया गया था, जिसमें वीणा जी के स्वर में राग छायानट में निबद्ध खयाल प्रस्तुत किया गया था। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार विदुषी वीणा सहस्त्रबुद्धे की स्मृतियों को नमन करता है और उन्हे अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।
अगले रविवार को श्रृंखला की एक एक नई कड़ी के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।  

शोध एवं आलेख : सुजॉय चटर्जी 
 प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



Sunday, June 26, 2016

राग चारुकेशी : SWARGOSHTHI – 276 : RAG CHARUKESHI


स्वरगोष्ठी – 276 में आज


मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन – 9 : राष्ट्रीय पुरस्कार से अलंकृत संगीत


‘बइयाँ ना धरो ओ बलमा...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ जारी है। श्रृंखला की नौवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का एक बार फिर हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का सहयोग लिया है। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर केन्द्रित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हम मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की चर्चा और फिर उस राग की उदाहरण सहित जानकारी दे रहे हैं। गत 25 जून को हमने मदन मोहन का 93वाँ जन्मदिन मनाया। श्रृंखला की नौवीं कड़ी में आज हम आपको राग चारुकेशी के स्वरों में पिरोये गए 1970 में प्रदर्शित फिल्म ‘दस्तक’ से एक सुमधुर गीत का रसास्वादन कराएँगे। इस राग आधारित गीत को स्वर दिया है, लता मंगेशकर ने। संगीतकार मदन मोहन द्वारा राग चारुकेशी के स्वर में निबद्ध फिल्म ‘दस्तक’ के इस गीत के साथ ही राग का यथार्थ स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम सुप्रसिद्ध सारंगी वादक उस्ताद सुल्तान खाँ की सारंगी पर राग चारुकेशी का आलाप और एक विलम्बित रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं।


संगीतकार मदन मोहन के गीतों की बात चल रही हो और 1970 की फ़िल्म ’दस्तक’ के गीत-संगीत की चर्चा ना हो, तो शायद चर्चा अधूरी रह जाए। 70 का दशक मदन मोहन के संगीत सफ़र का अन्तिम अध्याय था। पिछले दो दशकों से उत्कृष्ट संगीत देने के बावजूद जब उन्हें कोई भी विशिष्ट पुरस्कार कहीं से नहीं मिला तो इस बात का अफ़सोस उन्हें ज़रूर था, ऐसा उनके परिवार वालों ने उनके वेबसाइट पर लिखा है। मदन जी को पुरस्कारों पर से ना केवल भरोसा उठ गया था बल्कि उनमें पुरस्कार प्राप्त करने में कोई इच्छा ही नहीं बची थी। इसलिए जब ’दस्तक’ के लिए उनका नाम राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए चुना गया तो उन्होंने दिल्ली जाकर उसे ग्रहण करने से साफ़ इनकार कर दिया। उनकी यह नाराज़गी जायज़ थी, पर राष्ट्रपति द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कार को ग्रहण करने से इनकार की बात सुन कर उनके परिवार वाले और फ़िल्म-जगत के उनके मित्र विक्षुब्ध हो उठे। बहुत लोगों ने उन्हें समझाया पर वो मानने के लिए तैयार नहीं। अन्त में अभिनेता संजीव कुमार, जिन्हें ’दस्तक’ फ़िल्म के लिए ही सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिल रहा था, ने उनसे कहा कि मैं भी दिल्ली जा रहा हूँ इसी फ़िल्म के लिए पुरस्कार ग्रहण करने, तब जाकर मदन जी राज़ी हुए साथ चलने को।

फ़िल्म ’दस्तक’ में कुल चार ही गीत थे - तीन लता की आवाज़ में और एक रफ़ी का गाया हुआ। "माई री मैं कासे कहूँ पीर अपने जिया की..." गीत फ़िल्म में लता जी की आवाज़ में है, पर मदन मोहन की आवाज़ में इसका एक संस्करण रेकॉर्ड पर उपलब्ध है। "हम हैं मताय-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह..." गीत के बारे में डॉ. अलका देव मारुलकर कहती हैं, "अभिजात संगीत, परिष्कृत संगीत, अमर्त्य संगीत की परिभाषा क्या है, यह हम नहीं जानते, लेकिन वैसा ही होगा जैसा मदन मोहन के गीत हैं, जिसे हम कहते हैं अभिरुचि सम्पन्न। ऐसा ही एक गीत है फ़िल्म ’दस्तक’ में। इस गीत में करूण विलाप है, बाज़ार में बिकनेवाली कला का करूण विलाप!"।  फ़िल्म ’दस्तक’ का तीसरा लता जी का गाया गीत है "ब‍इयाँ ना धरो ओ बलमा..." जिसे हमने आज के इस अंक के लिए चुना है। यह गीत राग चारुकेशी पर आधारित है। इस गीत की गायकी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि लता जी ने इसे अपने सबसे कम स्वरमान (lowest pitch) पर गाया है। लता जी के अधिकतर गीत ऊँची पट्टी पर गाये गए हैं, पर यह गीत बिल्कुल विपरीत है। इस गीत के साथ एक दिलचस्प घटना भी जुड़ी हुई है। इसे लता जी के अपने शब्दों में ही पढ़िए - "शायरी पर वो बहुत ज़ोर देते थे। जब तक शब्दों में गहराई न हो, गीतकार को गीत का आलेख वापस लौटा देते थे। फिर कोशिश कीजिए, जब दिल से बात निकलेगी तब असर करेगी। एक दिन मजरूह साहब का गीत रेकॉर्ड हुआ। बहुत अच्छा रेकॉर्ड हुआ। तर्ज़ तो थी ही अच्छी, कविता बहुत ही सुन्दर थी। रेकॉर्डिंग के बाद मदन भ‍इया इतने ज़्यादा ख़ुश थे कि फ़ौरन पहुँचे स्टुडियो में शाबाशी देने शायर को। आप जानते हैं किस तरह शाबाशी दी? बेचारे मजरूह साहब के पेट पर हल्के हल्के दर्जनों मुक्के बरसा दिए। मजरूह साहब ठहरे शायर, और वो भी सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश के, मरहबा का यह तरीक़ा उनके लिए यक़ीनन एक नया तजुर्बा था। पता नहीं पुरदर्द था या पुरकैफ़। मदन भ‍इया बोले घर चलिए मैं आपको अपने हाथ से पका कर खाना खिलाऊँगा। रस चाहे स्वर का हो या रसोई का, वो दोनों में माहिर थे।" आइए, राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म ‘दस्तक’ का यही गीत सुनते हैं।


राग चारुकेशी : “बइयाँ ना धरो ओ बलमा...” : लता मंगेशकर : फिल्म – दस्तक



राग चारुकेशी मूलतः दक्षिण भारतीय संगीत पद्यति का राग है। उत्तर भारतीय संगीत में इस राग का प्रचलन कर्नाटक संगीत से ही हुआ है। यह सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात आरोह और अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। राग चारुकेशी में धैवत और निषाद स्वर कोमल तथा शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। आरोह में – सा, रे, ग, म, प, ध(कोमल), नि(कोमल), सां तथा अवरोह में सां, नि(कोमल), ध(कोमल), प, म, ग, रे, सा स्वर होते हैं। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। राग चारुकेशी को दिन के दूसरे प्रहर में गाने-बजाने की परम्परा है। इस राग में यदि शुद्ध ऋषभ स्वर को कोमल ऋषभ स्वर में परिवर्तित कर दिया जाए तो यह राग बसन्त मुखारी की अनुभूति कराता है। इसी प्रकार यदि कोमल निषाद स्वर को शुद्ध निषाद स्वर में परिवर्तित कर दिया जाए तो राग नटभैरव का अनुभव होने लगता है। फिल्मों में राग चारुकेशी का सर्वाधिक प्रयोग संगीतकार कल्याणजी आनन्दजी ने किया है। राग चारुकेशी के यथार्थ स्वरूप को समझने के लिए अब हम इस राग में वाद्य-संगीत की एक रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। देश के सुविख्यात सारंगी वादक उस्ताद सुल्तान खाँ की सारंगी पर राग चारुकेशी का आलाप और एक विलम्बित रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं। आप वाद्य संगीत की इस रचना में फिल्म ‘दस्तक’ के गीत के स्वर तलाश करने का प्रयास कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति प्रदान कीजिए।


राग चारुकेशी : सारंगी पर आलाप और विलम्बित लय की एक रचना : उस्ताद सुल्तान खाँ





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 276वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक बार पुनः संगीतकार मदन मोहन के संगीत से सजे एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 280वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन का आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत के गायक को पहचान सकते हैं? हमे गायक का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 2 जुलाई, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 278वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 274 की संगीत पहेली में हमने आपको मदन मोहन के संगीत निर्देशन में बनी और 1964 में प्रदर्शित फिल्म ‘जहाँआरा’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – छायानट, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है – ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायक और गायिका – मोहम्मद रफी और सुमन कल्याणपुर

इस बार की पहेली में चार प्रतिभागियों ने सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं - वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। इन सभी विजेताओं ने दो-दो अंक अर्जित किये है। सभी विजेता प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में जारी हमारी श्रृंखला ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ की आज की कड़ी में आपने राग चारुकेशी का परिचय प्राप्त किया। इस श्रृंखला में हम फिल्म संगीतकार मदन मोहन के कुछ राग आधारित गीतों को चुन कर आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। हमारी अगली श्रृंखला “वर्षा ऋतु के राग” विषय पर आधारित होगी। इस श्रृंखला के लिए आप अपने सुझाव या फरमाइश ऊपर दिये गए ई-मेल पते पर शीघ्र भेजिए। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, June 19, 2016

राग छायानट : SWARGOSHTHI – 275 : RAG CHHAYANAT



स्वरगोष्ठी – 275 में आज

मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन – 8 : जन्मदिन पर विशेष प्रस्तुति

‘बाद मुद्दत के ये घड़ी आई, आप आए तो ज़िन्दगी आई...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ जारी है। श्रृंखला की आठवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का एक बार फिर हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का सहयोग लिया है। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर केन्द्रित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हम मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की चर्चा और फिर उस राग की उदाहरण सहित जानकारी दे रहे हैं। इस सप्ताह 25 जून को मदन मोहन का 93वाँ जन्मदिन है। इस उपलक्ष्य में हम श्रृंखला की आठवीं कड़ी में आज हम आपको राग छायानट के स्वरों में पिरोये गए 1964 में प्रदर्शित फिल्म ‘जहाँआरा’ से एक गीत का रसास्वादन कराएँगे। इस राग आधारित युगलगीत को स्वर दिया है, मोहम्मद रफी और सुमन कल्याणपुर ने। संगीतकार मदन मोहन द्वारा राग छायानट के स्वर में निबद्ध फिल्म ‘जहाँआरा’ के इस गीत के साथ ही राग का यथार्थ स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी वीणा सहस्त्रबुद्धे के स्वरों में राग छायानट की मध्यलय का एक खयाल भी प्रस्तुत कर रहे हैं। 



संगीतकार मदन मोहन का जन्म 25 जून, 1924 को हुआ था। इस तिथि के अनुसार आगामी 25 जून को उनका 93वाँ जन्मदिन है। इस अवसर के लिए आज हम मदन मोहन का राग छायानट में पिरोया एक गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। मदन मोहन द्वारा शास्त्रीय-संगीत पर आधारित फ़िल्मी गीतों की इस शृंखला की आठवीं कड़ी में आज बारी मोहम्मद रफ़ी और सुमन कल्याणपुर के गाए हुए एक युगल गीत की। फ़िल्म है ’जहाँआरा’। मदन मोहन को ’जहाँआरा’ के गीत-संगीत पर बहुत गर्व था। इस फ़िल्म को लेकर वो बहुत ज़्यादा उत्साहित थे। इस उत्साह का कारण यह था कि इस फ़िल्म में हर तरह के गीत रचने का उनके पास सुयोग था। ग़ज़ल, नज़्म, मुजरा, शास्त्रीय-संगीत आधारित गीत, प्यार भरा युगल गीत, ये सब फ़िल्म की कहानी के अनुरूप इस फ़िल्म में डाले जा सकते थे। इसलिए बड़े उत्साह के साथ मदन मोहन ने गीतकार राजेन्द्र कृष्ण के साथ इस फ़िल्म के गीत-संगीत पर काम करना शुरु किया। कुल नौ गीत बने, एक से बढ़ कर एक, एक से एक लाजवाब। इनमें से तीन गीत तलत महमूद की एकल आवाज़ में, दो गीत लता की एकल आवाज़ में, एक रफ़ी की एकल आवाज़ में, एक लता-तलत युगल, एक लता-आशा युगल और एक रफ़ी-सुमन युगल गीत थे। "वो चुप रहें तो मेरे दिल के दाग़ जलते हैं...", "फिर वही शाम वही ग़म वही तनहाई है...", "मैं तेरी नज़र का सुरूर हूँ...", "ऐ सनम आज यह क़सम खायें..." और "जब जब तुम्हे भुलाया तुम और याद आए..." जैसे गीतों ने धूम मचा दिये चारों तरफ़। इसी फ़िल्म के लिए मदन मोहन ने एक ऐसी क़व्वाली भी सोची थी जिसे वो चार मंगेशकर बहनों (लता, आशा, उषा, मीना) से गवा कर एक इतिहास रचना चाहते थे। मदन मोहन की पुत्री संगीता के अनुसार इस क़व्वाली की रेकॉर्डिंग् भी हुई थी, पर आश्चर्य की बात यह है कि ना तो इस अनोखी क़व्वाली को फ़िल्म में शामिल किया गया और ना ही इसे ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड पर उतारा गया, और आज कहीं भी इसकी कोई प्रति उपलब्ध नहीं है। रसिक श्रोताओं के लिए चार मंगेशकर बहनों की गाई एकमात्र फ़िल्मी क़व्वाली की क्या अहमियत है यह बताने की ज़रूरत नहीं। ख़ैर, मदन मोहन को लगा कि नौ गीतों से सजा यह अल्बम एक कम्प्लीट अल्बम है, विविधता और स्तर, दोनों क़ायम है एक एक गीत में। पर दुर्भाग्यवश इस फ़िल्म का वही हाल हुआ जो मदन मोहन की ज़्यादातर फ़िल्मों का हुआ करता था। ’जहाँआरा’ एक ही सप्ताह पूरी कर सिनेमाघरों से उतर गई। मदन मोहन को विश्वास था कि कम से कम इन गीतों के ज़रिए इस फ़िल्म को सफलता मिलेगी, पर ऐसा नहीं हुआ। वो बहुत निराश हुए थे।

सुमन कल्याणपुर और मुहम्मद रफी 
अब बात ’जहाँआरा’ के उस गीत की जिसे आज हमने चुना है। राग छायानट और कहरवा ताल पर आधारित मोहम्मद रफ़ी और सुमन कल्याणपुर की आवाज़ों में यह गीत है "बाद मुद्दत के यह घड़ी आई, आप आए तो ज़िन्दगी आई..."। यह उन चार-पाँच सालों का वह दौर था जब रॉयल्टी वाले मामले में मतभेद की वजह से रफ़ी साहब और लता जी साथ में नहीं गा रहे थे। इस बात को लेकर और ख़ास कर इस गीत को लेकर मदन मोहन दुविधा में पड़ गए कि अब क्या होगा, यह गीत तो उन्होंने इन दो गायकों को ध्यान में रख कर बनाया है, और वो अपने इन दो मनपसन्द गायकों से ही यह गीत गवाना चाहते थे। पर लता जी और रफ़ी साहब वाली बात इतनी बढ़ चुकी थी कि इनमें से कोई राज़ी नहीं थे एक दूसरे के साथ गाने के लिए। इस वजह से 60 के दशक के मध्य भाग के अधिकतर युगलगीत मदन मोहन ने दूसरे गायकों से गवाए। अगर लता किसी गीत के लिए अत्यावश्यक होती तो वो मन्ना डे, तलत महमूद या महेन्द्र कपूर को लेते (जैसा कि ’सुहागन’, ’वो कौन थी’, ’दुल्हन एक रात की’ और ’जहाँआरा’ में उन्होंने किया) और अगर रफ़ी साहब किसी गीत के लिए ज़रूरी होते तो गायिकाओं में आशा भोसले (’नीला आकाश’, ’नींद हमारी ख़्वाब तुम्हारे’) या सुमन कल्याणपुर (’ग़ज़ल’, ’जहाँआरा’) को लिया जाता। प्रस्तुत गीत में रफ़ी साहब के उपस्थिति की ज़रूरत के मद्देनज़र मदन जी ने लता जी से इस बात का ज़िक्र किया और उनकी जगह सुमन कल्याणपुर से इस गीत को गवाने का निर्णय लिया। सुमन कल्याणपुर की गायकी से मदन जी ख़ुश हुए और फ़िल्म ’गज़ल’ में भी उनसे गीत गवाया। लीजिए, अब आप वही युगलगीत सुनिए।


राग छायानट : ‘बाद मुद्दत के ये घड़ी आई...’ : मुहम्मद रफी और सुमन कल्याणपुर : फिल्म – जहाँआरा


वीणा सहस्त्रबुद्धे
राग छायानट का उल्लेख अनेक प्राचीन ग्रन्थों, जैसे- राग लक्षण, संगीत सारामृत, संगीत पारिजात आदि में मिलता है। परन्तु इन ग्राथों में राग छायानट का जो स्वरूप वर्णित किया गया है, वह आधुनिक छायानट से भिन्न है। अहोबल रचित ग्रन्थ ‘संगीत पारिजात’ में राग छायानट का जैसा स्वरूप दिया गया है वह आधुनिक छायानट के स्वरूप से थोड़ा समान है। राग छायानट का स्वरूप राग छाया और राग नट के मेल से बना है। इसमें सा रे, रे ग म प तथा सा रे सा, नट के और परे, रे ग म प, ग म रे सा, छाया राग के अंग हैं। परन्तु वर्तमान में छायानट का संयुक्त रूप इतना अधिक प्रचलित है कि बहुत कम संगीतज्ञों का ध्यान इसके दो मूल रागों पर जाता है। राग छायानट में इन दो रागों का मेल तो है ही, राग को गाते-बजाते समय कई अन्य रागों का आभास भी होता है, जैसे - अल्हैया बिलावल, कामोद और केदार। राग छायानट की उत्पत्ति कल्याण थाट से मानी जाती है। इस राग में दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग की जाति सम्पूर्ण-सम्पूर्ण होती है, अर्थात आरोह और अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में शुद्ध मध्यम और अवरोह शुद्ध और तीव्र, दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग होता है। राग छायानट का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। रात्रि के प्रथम प्रहर में इस राग का गायन-वादन सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। राग छायानट के स्वरूप को समझने के लिए अब हम इस राग में कण्ठ-संगीत की एक रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। देश की सुविख्यात गायिका विदुषी वीणा सहस्त्रबुद्धे राग छायानट में मध्यलय का खयाल प्रस्तुत कर रही हैं। रचना तीनताल में निबद्ध है, जिसके बोल हैं- ‘सन्देशवा पिया से मोरा कहियों जाय...’। आप इस खयाल रचना का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति प्रदान कीजिए।


राग छायानट : ‘सन्देशवा पिया से मोरा कहियों जाय...’ : विदुषी वीणा सहस्त्रबुद्धे




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 275वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक बार पुनः मदन मोहन के राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 280वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका की आवाज़ को पहचान रहे हैं? हमें उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 25 जून, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 277वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 273 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1966 में प्रदर्शित फिल्म ‘दुल्हन एक रात की’ से राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – पीलू, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- पार्श्वगायिका – लता मंगेशकर

इस बार की संगीत पहेली में चार प्रतिभागियों ने तीनों प्रश्नों का सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। ये विजेता हैं - वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल। सभी चारो विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आप हमारी श्रृंखला ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ का रसास्वादन कर रहे हैं। इस श्रृंखला में हम फिल्म संगीतकार मदन मोहन के कुछ राग आधारित गीतों को चुन कर आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। आज की इस कड़ी में हमने आपसे राग छायानट के बारे में चर्चा की। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में आप भी अपने सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते है। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को श्रृंखला की एक एक नई कड़ी के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 


Sunday, June 12, 2016

राग पीलू : SWARGOSHTHI – 274 : RAG PILU




स्वरगोष्ठी – 274 में आज

मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन – 7 : मदन मोहन और लता का सुरीला संगम

‘मैंने रंग ली आज चुनरिया, सजना तोरे रंग में...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ जारी है। श्रृंखला की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का एक बार फिर हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का सहयोग लिया है। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर केन्द्रित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हम मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की चर्चा और फिर उस राग की उदाहरण सहित जानकारी दे रहे हैं। श्रृंखला की सातवीं कड़ी में आज हम आपको राग पीलू के स्वरों में पिरोये गए 1966 में प्रदर्शित फिल्म ‘दुल्हन एक रात की’ से राग पीलू पर आधारित एक गीत का रसास्वादन कराएँगे। इस राग आधारित गीत को स्वर दिया है, मदन मोहन की मुहबोली बहन, सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका लता मंगेशकर ने। संगीतकार मदन मोहन द्वारा राग पीलू के स्वर में निबद्ध फिल्म ‘दुल्हन एक रात की’ के इस गीत के साथ ही राग का यथार्थ स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम विश्वविख्यात सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खाँ का सरोद पर बजाया राग पीलू की एक रसपूर्ण रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं। 


दन मोहन द्वारा स्वरबद्ध राग आधारित फ़िल्मी गीतों की इस श्रृंखला की आज की कड़ी में फिर एक बार लता मंगेशकर और मदन मोहन का सुरीला संगम प्रस्तुत है। अपने मदन भ‍इया को याद करती हुईं लता जी कहती हैं - "ज़रा यह सुनिए कि उनको संगीत की कितनी बड़ी देन थी। आमद का यह हाल था कि बस हारमोनियम लेकर बैठते और धुन चुटकियों में बन जाती। कभी मोटर चलाते हुए, कभी लिफ़्ट पर उपर या नीचे आते हुए भी उनकी धुन तैयार हो जाती। मदन भ‍इया एक दो साल मिलिटरी में थे, और शायद इसी वजह से उनके बरताव में एक उपरी सख़्ती हुआ करती थी। कई बार बड़े रफ़ से लगते थे। बातें खरी खरी मुँह पर सुना देते थे। प्यार भी उनका यूँ होता था कि बस हाथ उठाया और धम से मार दिया। मगर यह सख़्ती सिर्फ़ उपर की थी, अन्दर से तो वे बड़े भावुक थे और बड़े नर्म थे। यह नरमी, यह भावुकता कभी कभी अपनी झलक दिखला जाती थी दिल को छू लेने वाली धुनों में ढल कर। बड़े खुद्दार थे मदन भ‍इया। अपने आदर्शों को वो न किसी के सामने झुकने देते थे, न दबने देते थे। ’वो कौन थी’ के गीतों की सफलता पर मुमकिन था कि उन्हें एक बहुत बड़ा अवार्ड मिले। कुछ लोग उनके पास आए और उस अवार्ड के लिए उनसे सौदा करना चाहा। मदन भ‍इया ने साफ़ इनकार कर दिया। वह अवार्ड मदन भ‍इया को नहीं मिला और ना मिलने पर जब मैंने अफ़सोस ज़ाहिर किया तो वो कहने लगे कि मेरे लिए क्या यह कम अवार्ड है कि तुम्हे अफ़सोस हुआ!" आज हम लता और मदन मोहन जोड़ी की जिस रचना को प्रस्तुत कर रहे हैं उसे हमने चुना है 1966 की फ़िल्म ’दुल्हन एक रात की’ से - "मैंने रंग ली आज चुनरिया सजना तोरे रंग में..." जिसे लिखा था राजा मेंहदी अली ख़ाँ ने और फ़िल्माया गया था अभिनेत्री नूतन पर। गीत आधारित है राग पीलू पर और ताल है कहरवा।

आप सभी ने यह महसूस किया होगा कि मदन मोहन की अधिकतर रचनाओं में सितार के बेहद सुरीले टुकड़े सुनाई देते हैं, गीत के शुरुआत में या अन्तराल संगीत के दौरान। आज के प्रस्तुत गीत में भी सितार कई जगहों पर सुनाई देता है। ये तमाम सितार के टुकड़े इतने सुरीले क्यों न हो जब इन्हें बजाने वाले हों उस्ताद रईस ख़ाँ जैसे सितार वादक। मदन जी के गीतों में ख़ाँ साहब का सितार पहली बार सुनाई दिया था 1964 की फ़िल्म 'पूजा के फूल' के गीत "मेरी आँखों से कोई नींद लिए जाता है" में। ख़ाँ साहब उस्ताद विलायत ख़ाँ साहब के भतीजे थे। विलायत ख़ाँ साहब मदन जी के दोस्त हुआ करते थे। इस तरह से रईस ख़ाँ मदन मोहन के सम्पर्क में आये और मदन जी के गीतों को चार चाँद लगाया। "नैनों में बदरा छाए...", "रस्म-ए-उल्फ़त को निभाएँ..." जैसे कई गीतों में सितार बेहद ख़ूबसूरत बन पड़ा है। मदन मोहन सितार से इस तरह जज़्बाती रूप से जुड़े थे और ख़ास तौर से रईस ख़ाँ के साथ उनकी ट्यूनिंग कुछ ऐसी जमी थी कि 1974 में जब किसी ग़लतफ़हमी की वजह से एक दूसरे से दोनो अलग हो गये तब मदन मोहन ने अपने गीतों में सितार का प्रयोग ही बन्द कर दिया। वो इतने ही हताश हुए थे। इस वजह से मदन मोहन के अन्तिम दो वर्षों, अर्थात 1974 और 1975 में 'मौसम', 'साहिब बहादुर' आदि फ़िल्मों के गीतों में हमें सितार सुनने को नहीं मिले। यह भी उल्लेखनीय तथ्य है कि हाल ही में मदन मोहन की पुत्री संगीता जी ने मुझे स्वयं बताया कि बाद में मदन मोहन जी ने उस्ताद शमीम अहमद से ख़ुद सितार सीखा और अपनी आख़िर की कुछ फ़िल्मों में शमीम अहमद साहब से बजवाया। अब कुछ बातें इस गीत के गीतकार राजा मेंहदी अली ख़ाँ साहब की। राजा साहब और मदन जी की जोड़ी के बारे में मदन जी के छोटे पुत्र समीर कोहली बताते हैं, "राजा साहब भी पिताजी के बहुत अच्छे दोस्त थे। ’आँखें’ (1950, ’अदा’ (1951) और ’मदहोश’ (1951) के बाद एक लम्बे अरसे के बाद दोनों साथ में ’अनपढ़’ (1962) में काम कर रहे थे। ’अनपढ़’ से पहले राजा साहब ज़्यादातर हास्य गीत लिखा करते थे, पर ’अनपढ़’ के गीतों के बाद वो गम्भीर शायरी की वजह से मशहूर हो गए। बहुत जल्दी उनका निधन हो गया ’जब याद किसी की आती है’ (1966) का शीर्षक गीत लिखने के बाद ही। मदन जी का राजा साहब के लिए दिल में क्या जगह थी इसका पता चलता है एक घटना से। पिताजी समय के बड़े पाबन्द हुआ करते थे, फिर भी एक बार एक पत्रकार-सम्मेलन (press conference) में वो देर से पहुँचे। इस बात पर एक पत्रकार ने उनसे इस देरी का कारण पूछा तो उनका जवाब था कि मैं घर से समय पर ही चला था। रास्ते में मुझे राजा साहब की कब्र दिख गई और मैं अपने आप को रोक नहीं सका। मैं वहाँ दो मिनट के लिए रुका, उन्हें अपनी श्रद्धांजलि दी। इस वजह से मुझे देर हो गई, इसके लिए आप सब मुझे क्षमा करें।" अब आप राजा मेंहदी अली खाँ का लिखा, मदन मोहन का संगीतबद्ध किया और लता मंगेशकर का गाया, फिल्म ‘दुल्हन एक रात की’ का वही गीत सुनिए।


राग पीलू : ‘मैंने रंग ली आज चुनरिया, सजना तेरे रंग में...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – दुल्हन एक रात की


राग पीलू का सम्बन्ध काफी थाट से जोड़ा जाता है। आमतौर पर इस राग के आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर वर्जित किया जाता है। अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इसलिए राग की जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है, अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वर प्रयोग होते हैं। इस राग में ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वर के कोमल और शुद्ध, दोनों रूप का प्रयोग किया जाता है। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग के गायन-वादन का समय दिन का तीसरा प्रहर माना गया है। इस राग के प्रयोग करते समय प्रायः अन्य कई रागों की छाया दिखाई देती है, इसीलिए राग पीलू को संकीर्ण जाति का राग कहा जाता है। यह चंचल प्रकृति का और श्रृंगार रस की सृष्टि करने वाला राग है। इस राग में अधिकतर ठुमरी, दादरा, टप्पा, गीत, भजन आदि का गायन बेहद लोकप्रिय है। फिल्मी गीतों में भी इस राग का प्रयोग अधिक किया गया है। इस राग में ध्रुपद और विलम्बित खयाल का प्रचलन नहीं है। राग पीलू पूर्वांग प्रधान राग है। इसमे पूर्वांग के स्वर इतने प्रमुख रहते हैं कि प्रायः गायक या वादक मध्यम स्वर को अपना षडज मान कर गाते-बजाते हैं, जिससे मंद्र सप्तक के स्वरों में सरलता से विचरण किया जा सके। राग पीलू के गायन-वादन का समय यद्यपि दिन का तीसरा प्रहर निर्धारित किया गया है, किन्तु परम्परागत रूप से यह सार्वकालिक राग हो गया है। ठुमरी अंग का राग होने से किसी भी गायन-वादन की सभा के अन्त में पीलू की ठुमरी, दादरा या सुगम संगीत से कार्यक्रम के समापन की परम्परा बन गई है। अब आप विश्वविख्यात सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खाँ से सरोद पर राग पीलू की एक रसपूर्ण रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति प्रदान कीजिए।


राग पीलू : सरोद पर दादरा ताल की रचना : उस्ताद अमजद अली खाँ




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 274वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक बार पुनः संगीतकार मदन मोहन के संगीत से सजे एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 280वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन का आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत के गायक को पहचान सकते हैं? हमे गायक का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 18 जून, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 276वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 272 की संगीत पहेली में हमने आपको मदन मोहन के संगीत निर्देशन में बनी और 1950 में प्रदर्शित फिल्म ‘आँखें’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – पहाड़ी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है – ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायिका – मीना कपूर

इस बार की पहेली में चार प्रतिभागियों ने सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं - चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया। इन सभी विजेताओं ने दो-दो अंक अर्जित किये है। सभी विजेता प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में जारी हमारी श्रृंखला ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ की आज की कड़ी में आपने राग पीलू का परिचय प्राप्त किया। इस श्रृंखला में हम फिल्म संगीतकार मदन मोहन के कुछ राग आधारित गीतों को चुन कर आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। राग पीलू के बारे में कोटा, राजस्थान के तुलसी राम वर्मा ने हमसे अनुरोध किया था। आज के अंक में हमने श्री वर्मा के अनुरोध पर आपको राग पीलू की जानकारी दी। ‘स्वरगोष्ठी’ पर आप भी अपने सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते है। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी 
 प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



 

Sunday, June 5, 2016

राग पहाड़ी : SWARGOSHTHI – 273 : RAG PAHADI




स्वरगोष्ठी – 273 में आज

मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन – 6 : पहली फिल्म का पहला राग आधारित गीत

‘मोरी अटरिया पे कागा बोले...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ जारी है। श्रृंखला की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का सहयोग लिया है। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर केन्द्रित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हम मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की चर्चा और फिर उस राग की उदाहरण सहित जानकारी दे रहे हैं। श्रृंखला की छठी कड़ी में आज हम आपको राग पहाड़ी के स्वरों में पिरोये गए 1950 में प्रदर्शित फिल्म ‘आँखें’ के एक गीत का रसास्वादन कराएँगे। इस राग आधारित गीत को स्वर दिया है, तत्कालीन पार्श्वगायिका मीना कपूर ने। संगीतकार मदन मोहन द्वारा राग पहाड़ी के स्वर में निबद्ध फिल्म ‘आँखें’ के इस गीत के साथ ही राग का यथार्थ स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम सुविख्यात गायिका विदुषी परवीन सुलताना के स्वरों में राग पहाड़ी की एक मनभावन रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं।


दन मोहन के संगीत सफ़र के शुरुआत की कहानी में हम पिछले अंक में आ पहुँचे थे उस मुकाम पर जहाँ मदन जी सचिनदेव बर्मन और श्यामसुन्दर जैसे संगीतकारों के सहायक के रूप में काम करने लगे थे। वह 1948-49 का समय था। इसके एक साल के भीतर ही उन्हें मौक़ा मिल गया फ़िल्म में स्वतन्त्र रूप से संगीत देने का। फ़िल्म थी 1950 की ’आँखें’। पूरी टीम नई थी। फ़िल्म के नायक थे शेखर जो मदन जी के दिल्ली के मित्र थे। फ़िल्म के निर्देशक थे देवेन्द्र गोयल, और वो भी इस फ़िल्म से अपने पारी की शुरुआत कर रहे थे। देवेन्द्र गोयल फ़िल्म के निर्माता भी थे। बिल्कुल नई अनभिज्ञ टीम होने की वजह से मदन मोहन को इस फ़िल्म से ख़ास उम्मीद नहीं थी। यहाँ तक कि उन्हें लग रहा था कि फ़िल्म शायद पूरी भी नहीं हो सकेगी। मदन मोहन कुछ फ़िल्म वितरकों को जानते थे। उन्होंने एक तरीक़ा सोचा फ़िल्म को बेचने का। उन्होंने देवेन्द्र गोयल से कह कर उन वितरकों को चर्चगेट के एक रेस्तोराँ में चाय पर बुलवाया और वहाँ से चाय-पर्व समाप्त होने के बाद सब को लेकर मरीन ड्राइव के प्राचीर पर जा कर बैठे और वहाँ बैठे-बैठे उन्होंने उन सभी को इस फ़िल्म के लिए उनके बनाए गीतों को गा गा कर सुनाया। गीतों को सुन कर उन वितरकों को इतना अच्छा लगा कि उनमें से कई वितरकों ने अपने अपने इलाकों के लिए फ़िल्म वितरण के अधिकार के अनुबन्ध पर हस्ताक्षर कर दिए। इस तरह से ’आँखें’ का निर्माण पूरा हुआ। अपनी गायकी और संगीत का नमूना पेश करने की वजह से ही देवेन्द्र गोयल अपनी इस फ़िल्म को बेच सके, वरना फ़िल्म का क्या अंजाम होता कहना मुश्किल है।

मीना कपूर
फ़िल्म ’आँखें’ के गीतों के लिए मदन मोहन को भले मुकेश और मोहम्मद रफ़ी जैसे गायक मिले, पर उनकी तीव्र इच्छा थी कि लता मंगेशकर भी उनकी फ़िल्म में गाए। यही इच्छा लेकर मदन मोहन पहुँचे लता जी के घर। जैसा कि हम चर्चा कर चुके हैं कि मदन मोहन और लता का इससे पहले सामना हो चुका है फ़िल्म ’शहीद’ के गीत की रेकॉर्डिंग पर। इन तीन सालों में लता काफ़ी उपर जा चुकी थीं। मदन मोहन बताते हैं, "जब ’आँखें’ निर्माणाधीन थी, तब हर किसी ने उन्हें हतोत्साहित किया, स्टुडियो स्टाफ़ और इसी फ़िल्म के लिए काम कर रहे टेक्निशियन्स आदि ने भी। जब वो लता जी के पास पहुँचे तो लता जी ने मेरे लिए गाने से मना कर दिया। कुछ ऐसा हुआ था कि कुछ लोगों ने उनके कान भर दिए थे कि मैं ना तो कोई अच्छा संगीतकार हूँ और फ़िल्म भी बेकार है, इसलिए उन्हें इस फ़िल्म में नहीं गाना चाहिए।" मदन मोहन उस दिन लता जी को राज़ी करवाने में असमर्थ रहे। लेकिन जैसे ही इस फ़िल्म के गाने रेडियो पर बजने लगे, लता जी को यह अहसास हो गया कि वो ग़लत थीं। मदन मोहन की दूसरी फ़िल्म ’मदहोश’ से ही लता और उनका ऐसा रिश्ता जमा कि बाकी इतिहास है। ’मदहोश’ के गानें हिट होने के बाद लता जी ने मदन मोहन को ना सिर्फ़ बधाई दी बल्कि उनसे माफ़ी भी माँगी। और दोनों ने एक दूसरे से यह वादा किया कि हमेशा उनकी यह भाई-बहन की जोड़ी कायम रहेगी। ख़ैर, फ़िल्म ’आँखें’ के गीतों के लिए शमशाद बेगम का नाम चुना गया। पर एक गीत ऐसा था जिसमें राग पहाड़ी की छाया थी। इस गीत के लिए गायिका मीना कपूर को चुना गया जो उन दिनों कई फ़िल्मों में गीत गा रही थीं। इस तरह से फ़िल्म ’आँखें’ का यह गीत रेकॉर्ड हुआ। आगे चलकर मदन मोहन ने राग पहाड़ी पर कई गीत रचे, जैसे कि फ़िल्म ’हीर-राँझा’ का "दो दिल टूटे, दो दिल हारे..." या ’वो कौन थी’ का मशहूर गीत "लग जा गले कि फिर यह हसीं रात हो ना हो..."। पर फ़िल्म ’आँखें’ का यह गीत उनके लिए बहुत ख़ास रहा क्योंकि यह उनकी पहली फ़िल्म की पहली राग आधारित रचना थी।


राग पहाड़ी : ‘मोरी अटरिया पे कागा बोले...’ : मीना कपूर : फिल्म – आँखें



परवीन सुलताना
यह मान्यता है की प्रकृतिजनित, नैसर्गिक रूप से लोक कलाएँ पहले उपजीं, परम्परागत रूप में उनका क्रमिक विकास हुआ और अपनी उच्चतम गुणवत्ता के कारण ये शास्त्रीय रूप में ढल गईं। प्रदर्शनकारी कलाओं पर भरतमुनि प्रवर्तित ग्रन्थ 'नाट्यशास्त्र' को पंचमवेद माना जाता है। नाट्यशास्त्र के प्रथम भाग, पंचम अध्याय के श्लोक संख्या 57 में ग्रन्थकार ने स्वीकार किया है कि लोक जीवन में उपस्थित तत्वों को नियमों में बाँध कर ही शास्त्र प्रवर्तित होता है। श्लोक का अर्थ है कि इस चर-अचर में उपस्थित जो भी दृश्य-अदृश्य विधाएँ, शिल्प, गतियाँ और चेष्टाएँ हैं, वह सब शास्त्र रचना के मूल तत्त्व हैं। भारतीय संगीत के कई रागों का उद्गम लोक संगीत से हुआ है। इन्हीं में से एक है, राग पहाड़ी, जिसकी उत्पत्ति भारत के पर्वतीय अंचल में प्रचलित लोक संगीत से हुई है। यह राग बिलावल थाट के अन्तर्गत माना जाता है। राग पहाड़ी में मध्यम और निषाद स्वर बहुत अल्प प्रयोग किया जाता है। इसीलिए राग की जाति का निर्धारण करने में इन स्वरों की गणना नहीं की जाती और इसीलिए इस राग को औड़व-औड़व जाति का मान लिया जाता है। राग का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। इसका चलन चंचल है और इसे क्षुद्र प्रकृति का राग माना जाता है। इस राग में ठुमरी, दादरा, गीत, ग़ज़ल आदि रचनाएँ खूब मिलती हैं। आम तौर पर गायक या वादक इस राग को निभाते समय रचना का सौन्दर्य बढ़ाने के लिए विवादी स्वरों का उपयोग भी कर लेते हैं। मध्यम और निषाद स्वर रहित राग भूपाली से बचाने के लिए राग पहाड़ी के अवरोह में शुद्ध मध्यम स्वर का प्रयोग किया जाता है। मन्द्र धैवत पर न्यास करने से राग पहाड़ी स्पष्ट होता है। इस राग के गाने-बजाने का सर्वाधिक उपयुक्त समय रात्रि का पहला प्रहर माना जाता है। राग पहाड़ी के स्वरूप को स्पष्ट रूप से अनुभव करने के लिए अब आप इसी राग में सुनिए, कण्ठ संगीत की एक आकर्षक रचना। इसे प्रस्तुत कर रही हैं, सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी बेगम परवीन सुलताना। आप राग पहाड़ी की यह ठुमरी अंग की रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग पहाड़ी : ‘जा जा रे कगवा मोरा सन्देशवा पिया पास ले जा...’ : विदुषी परवीन सुलताना




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 273वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको फिर एक बार मदन मोहन के राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 280वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – इस गीतांश के स्वरों में आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका की आवाज़ को पहचान रहे हैं? हमें उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 11 जून, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 275वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 271 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1959 में प्रदर्शित फिल्म ‘चाचा ज़िन्दाबाद’ से राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – ललित, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- पार्श्वगायक – लता मंगेशकर और मन्ना डे

इस बार की संगीत पहेली में अधिकतर प्रतिभागियों ने तीनों प्रश्नों का सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। ये विजेता हैं - हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। पहेली के सभी पाँच विजेताओं को 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया'  की ओर  से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आप हमारी श्रृंखला ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ का रसास्वादन कर रहे हैं। इस श्रृंखला में हम फिल्म संगीतकार मदन मोहन के कुछ राग आधारित गीतों को चुन कर आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। आज की इस कड़ी में हमने आपसे राग पहाड़ी के बारे में चर्चा की। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारी एक पाठक और श्रोता मुंबई से शैलजा शितुत ने हमसे एक सवाल किया है-

Shailaja Shitut mukesh ji mujase rag hemavati kebareme jankari chahiye kaunsa that hai hindi gana jayeye ao kaha jate ho .ragka chalan aur kisragse najadik hai please batayeye muje gana bajana hai sitarpar aur rag bajana hai”

शैलजा जी के सवाल पर हमने राग हेमवती अथवा हेमावती के बारे में जानकारी एकत्र की है, जिसे आपके लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ।

राग हेमवती या हेमावती दक्षिण भारतीय कर्नाटक संगीत पद्यति का राग है। यह इसी नाम से प्रचलित 58वाँ मेलकर्ता राग है। इस राग में गान्धार और निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध लगते हैं। इसके आरोह के स्वर हैं – सा रे (कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह के स्वर हैं – सां नि(कोमल) ध प म (कोमल) रे सा। इस राग पर आधारित एक फिल्मी गीत का उल्लेख भी मिलता है। 1965 में प्रदर्शित फिल्म ‘मेरे सनम’ का गीत है- “जाइए आप कहाँ जाएंगे, ये नज़र लौट के फिर आएगी...”। गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी और संगीतकार ओ.पी. नैयर हैं। सुप्रसिद्ध सितार वादक उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र खाँ के अनुसार इस गीत में राग हेमवती के साथ राग ‘सिंहेन्द्र मध्यम’ और राग ‘सरस्वती’ का स्पर्श भी है। कुछ विद्वान इस गीत को राग ‘पीलू’ के निकट मानते हैं। राग हेमवती अथवा हेमावती का स्वरूप स्पष्ट करने के लिए निम्नलिखित वीडियो देखें। 




‘स्वरगोष्ठी’ पर आप भी अपने सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते है। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नई श्रृंखला के नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र



 

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