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Sunday, June 21, 2020

राग मालगुंजी : SWARGOSHTHI – 467 : RAG MALGUNJI








स्वरगोष्ठी – 467 में आज

काफी थाट के राग – 11 : राग मालगुंजी

उस्ताद अलाउद्दीन खाँ की वायलिन पर राग मालगुंजी और लता मंगेशकर से फिल्म का एक गीत सुनिए






उस्ताद अलाउद्दीन खान 
लता मंगेशकर 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “काफी थाट के राग” की ग्यारहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार उस समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से सातवाँ थाट काफी है। इस श्रृंखला में हम काफी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम काफी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की ग्यारहवीं कड़ी में आज हमने काफी थाट के राग मालगुंजी को चुना है। श्रृंखला की आज की इस कड़ी में राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए हमने राग मालगुंजी चुना है। श्रृंखला की इस कड़ी में आपको आज हम सबसे पहले राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझाने के लिए उस्ताद अलाउद्दीन खाँ का वायलिन पर बजाया राग मालगुंजी सुनवाएँगे। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार 1961 में प्रदर्शित फिल्म “छोटे नवाब” से इसी राग में पिरोया एक मधुर गीत लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत करेंगे।



राग मालगुंजी के मुख्य स्वर हैं; रे, नि॒, सा, रे, ग, म। इनसे इस राग का प्रारम्भिक दर्शन हो जाता है। इस राग को राग रागेश्वरी और राग बागेश्री का मिश्रण माना जाता है। आरोह में कहीं-कहीं रागेश्वरी तो अवरोह में कहीं-कहीं बागेश्री का आभास होता है। संगीत मार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के मतानुसार इस राग की प्रकृति न गम्भीर है और न तरल है। वैचारिक अन्तर्द्वन्द्व, उलझन की स्थितियों में इस राग के स्वर संवेदनात्मक रूप में प्रेरणा तथा मनोबल को सुदृढ़ करने के साथ-साथ उन कष्टदायक स्थितियों का समाधान करने में सहयोगी सिद्ध हो सकते हैं। उलझनों तथा मानसिक अन्तर्द्वन्द्व की स्थितियों के साथ-साथ इनके प्रभावानुसार उत्पन्न मनोभौतिक समस्याओं; उच्चरक्तचाप का बढ़ना, भूंख न लगना, अनिद्रा आदि का उपचार इस राग से सम्भव हो सकता है। राग मालगुंजी के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम आपके लिए मैहर घराने के संस्थापक उस्ताद अलाउद्दीन खाँ का वायलिन वादन प्रस्तुत कर रहे हैं। यू-ट्यूब के सौजन्य से प्रस्तुत इस दुर्लभ वीडियो का अब आप रसास्वादन करें।

राग मालगुंजी : वायलिन वादन : उस्ताद अलाउद्दीन खाँ


राग मालगुंजी का सम्बन्ध काफी थाट से माना जाता है। इसमें दोनों गान्धार और दोनों निषाद प्रयोग किये जाते हैं। शुद्ध निषाद का प्रयोग अति अल्प किया जाता है। अन्य स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। आरोह में पंचम स्वर वर्जित होता है और अवरोह में सातो स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इसलिए यह षाडव-सम्पूर्ण जाति का राग है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इस राग के गायन-वादन का अनुकूल समय रात्रि का दूसरा प्रहर है। सामान्यतः आरोह में शुद्ध गान्धार और शुद्ध निषाद तथा अवरोह में कोमल गान्धार और कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। शुद्ध निषाद का अति अल्प प्रयोग केवल तार सप्तक के साथ आरोह में किया जाता है। मन्द्र सप्तक के आरोहात्मक और अवरोहात्मक दोनों प्रकार के स्वरों में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। कुछ विद्वान केवल कोमल निषाद प्रयोग करते हैं, शुद्ध निषाद लगाते ही नहीं। पंचम स्वर आरोह में वर्जित है और अवरोह में अल्प है। धैवत से मध्यम को आते समय पंचम का कण लिया जाता है। शुद्ध निषाद का अल्पत्व, कोमल निषाद की अधिकता, मध्यम स्वर का बहुत्व और पंचम स्वर का अल्पत्व तथा लगभग राग बागेश्री के समान चलन होने के कारण इसे बागेश्री अंग का राग कहा जाता है। राग मालगुंजी का वादी-संवादी क्रमशः मध्यम और षडज होने के कारण इसे रात्रि 12 बजे के बाद गाना-बजाना चाहिए, किन्तु इसे रात्रि 12 बजे से पूर्व गाया-बजाया जाता है। अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं; राग मालगुंजी पर आधारित एक फिल्मी गीत। इसे हमने वर्ष 1961 में प्रदर्शित फिल्म “छोटे नवाब” से लिया है। लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत उस गीत के संगीतकार राहुलदेव बर्मन हैं। “हिन्दी सिने राग इनसाइक्लोपीडिया” के ग्रन्थकार के.एल. पाण्डेय के अनुसार इस गीत में राग मालगुंजी के साथ राग खमाज का स्पर्श भी हुआ है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग मालगुंजी : “घर आ जा घिर आई बदरा...” : लता मंगेशकर : फिल्म – छोटे नवाब




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 467वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1966 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित लोकप्रिय गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के दूसरे सत्र अर्थात 470वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें वर्ष के द्वितीय सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस युगलगीत में किन गायको के स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 27 जून, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 469 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 465 वें अंक में हमने आपको 1971 में प्रदर्शित फिल्म “शर्मीली” के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – पटदीप, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – रूपक तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, खण्डवा, मध्यप्रदेश से रविचन्द्र जोशी, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ईमेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


संवाद


मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अन्य समर्थ देशों की तुलना में हमारे प्रयास सराहनीय रहे हैं। अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “ स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “काफी थाट के राग” की ग्यारहवीं कड़ी में आज आपने काफी थाट के जन्य राग मालगुंजी का परिचय प्राप्त किया। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद अलाउद्दीन खाँ का वायलिन पर बजाया राग मालगुंजी सुना। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार 1961 में प्रदर्शित फिल्म “छोटे नवाब” से इसी राग में पिरोया एक मधुर गीत लता मंगेशकर के स्वर में हमने प्रस्तुत किया। इस गीत के गीतकार शैलेंद्र और संगीतकार राहुलदेव बर्मन हैं। कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट   http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग मालगुंजी : SWARGOSHTHI – 467 : RAG MALGUNJI : 21 जून, 2018



Sunday, May 19, 2019

राग खमाज : SWARGOSHTHI – 420 : RAG KHAMAJ






स्वरगोष्ठी – 420 में आज

खमाज थाट के राग – 1 : राग खमाज

उस्ताद निसार हुसैन खाँ से इस राग में खयाल और मन्ना डे से फिल्मी गीत सुनिए




उस्ताद निसार हुसैन खाँ
मन्ना डे
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से आरम्भ हो रही हमारी नई श्रृंखला “खमाज थाट के राग” की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट, रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से तीसरा थाट खमाज है। इस श्रृंखला में हम खमाज थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा करेंगे। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आज के अंक में खमाज थाट के आश्रय अथवा जनक राग “खमाज” पर चर्चा करेंगे। आज के अंक में हम आपको सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद निसार हुसैन खाँ के स्वर में इस राग का एक आकर्षक खयाल सुनवाएँगे। साथ ही 1971 में प्रदर्शित फिल्म “बुड्ढा मिल गया” से राग खमाज पर आधारित एक मोहक गीत मन्ना डे और अर्चना के स्वरों में सुनवाएँगे।



आज से आरम्भ हो रही है हमारी श्रृंखला, “खमाज थाट के राग”। खमाज थाट के स्वर होते हैं - सा, रे ग, म, प ध, नि॒। अर्थात इस थाट में निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। इस थाट का आश्रय राग ‘खमाज’ कहलाता है। ‘खमाज’ राग में थाट के अनुकूल निषाद कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। यह षाड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात राग के आरोह में छः स्वर और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। राग खमाज के आरोह में सा, ग, म, प, ध नि सां और अवरोह में सां, नि, ध, प, म, ग, रे, सा स्वरों का प्रयोग होता है। आरोह में ऋषभ स्वर नहीं लगता। राग में दोनों निषाद का प्रयोग होता है। आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद लगाया जाता है। वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग के गायन-वादन का समय रात्रि का दूसरा प्रहर होता है। राग खमाज का उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए हमने रामपुर सहसवान घराने के प्रमुख स्तम्भ उस्ताद निसार हुसैन खाँ (1909-1993) द्वारा प्रस्तुत एक दुर्लभ बन्दिश का चुनाव किया है। राग खमाज की यह अनमोल रचना 1929 में रिकार्ड की गई थी। उस्ताद निसार हुसेन खाँ को अपने पिता और गुरु उस्ताद फिदा हुसेन खाँ से संगीत विरासत में प्राप्त हुआ था। बहुत छोटी आयु में उन्हें बड़ौदा के महाराज सयाजी राव गायकवाड़ के दरबारी संगीतज्ञ होने का गौरव प्राप्त हुआ था। आगे चलकर खाँ साहब ‘आकाशवाणी’ से भी जुड़े। 1977 में उन्हें आई.टी.सी. संगीत रिसर्च अकादमी, कोलकाता में प्रधान गुरु नियुक्त किया गया। यहाँ रह कर उन्होने उस्ताद राशिद खाँ सहित अनेक योग्य शिष्यो को तैयार किया। भारत सरकार द्वारा 1970 में उन्हें ‘पद्मभूषण’ सम्मान से विभूषित किया गया। इसके अलावा खाँ साहब को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, तानसेन सम्मान सहित गन्धर्व महाविद्यालय से डाक्टरेट की उपाधि से भी नवाजा गया था। आइए गायकी के इस शिखर-पुरुष की आवाज़ में सुनते हैं, राग खमाज की यह बन्दिश।

राग खमाज : ‘कोयलिया कूक सुनावे...’ : उस्ताद निसार हुसेन खाँ


आज के अंक में राग खमाज पर आधारित जिस फिल्मी गीत का रसास्वादन करा रहे हैं, उसके बारे में फिल्मी गीतों के सुप्रसिद्ध इतिहासकार सुजॉय चटर्जी लिखते हैं; ठुमरी उपशास्त्रीय संगीत की एक लोकप्रिय शैली है जो मुख्यतः राधा और कृष्ण का प्रेमगीत है। ठुमरी केवल गायक-गायिकाएँ ही नहीं गाती हैं बल्कि इस पर कथक शैली में नृत्य भी किया जाता है। श्रृंगार रस, यानी कि प्रेम रस की एक महत्वपूर्ण मिसाल है ठुमरी। ठुमरी को कई रागों में गाया जा सकता है। राग खमाज में एक बेहद मशहूर ठुमरी है "कौन गली गयो श्याम..."। समय-समय पर इसे अनेक गायक-गायिकाओं ने गाया है। फिल्म में भी इसे जगह मिली है। जैसे कि कमाल अमरोही ने अपनी महत्वकांक्षी फिल्म "पाकीजा" में परवीन सुल्ताना से यह ठुमरी गवायी थी। आज के अंक में हम आपको एक पारम्परिक ठुमरी से प्रेरित एक लोकप्रिय फिल्मी गीत सुनवा रहे हैं फिल्म "बुड्ढा मिल गया" से। 1971 में बनी फिल्म "बुड्ढा मिल गया" में राहुल देव बर्मन का संगीत था। इस फिल्म में "रात कली एक ख्वाब में आई" और "भली भली सी एक सूरत" जैसे गाने बेहद मशहूर हुए थे, लेकिन इसमें मन्ना डे और अर्चना का गाया ठुमरी के रंग में ढाला हुआ "आयो कहाँ ते घनश्याम, रैना बिताई किस धाम" भी काफ़ी चर्चित हुआ था। शास्त्रीय संगीत पर आधारित गीत को आम लोगों में लोकप्रिय बनाने में जिन संगीतकारों को महारत हासिल थी उनमें से एक पंचम भी थे। यूँ तो राग खमाज पर कई लोकप्रिय गीत बने हैं जैसे कि "अमर प्रेम" फिल्म का "बडा नट्खट है रे कृष्ण कन्हैया...", इसी फिल्म से "कुछ तो लोग कहेंगे...", "काला पानी" फिल्म का "नज़र लागी राजा तोरे बंगले पर...", और फिर वो प्रसिद्ध भजन "वैष्णवा जन तो तेने कहिए...", और भी कई गीत हैं, लेकिन "बुड्ढा मिल गया" फिल्म का यह गीत भी अपने आप में अनूठा है, बेजोड़ है। यूँ तो पूरे गीत में मन्ना डे की आवाज़ है, बस आखिर में अर्चना, जो की इस फिल्म की अभिनेत्री भी हैं, एक लाइन गाती हैं और गीत समाप्त हो जाता है. तो लीजिए पेश है "आयो कहाँ ते घनश्याम..."

राग खमाज : “आयो कहाँ ते घनश्याम...” : मन्ना डे और अर्चना : फिल्म – बुड्ढा मिल गया



संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के 420वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1985 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस अंक की पहेली का उत्तर आने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किन युगलगायकों के स्वर हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 25 मई, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 422 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 418वें अंक की पहेली में हमने आपसे वर्ष 1972 में प्रदर्शित फिल्म “बावर्ची” के एक गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – अल्हैया बिलावल, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल व सितारखानी और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मन्ना डे, लक्ष्मी शंकर और निर्मला देवी

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

“हिन्दी सिने राग इन्साइक्लोपीडिया”  भाग -3 का मुखपृष्ठ
मित्रों, पिछले दो सप्ताह से हम आपका परिचय भारतीय संगीत के एक ऐसे अध्येता से करा रहे हैं, जिन्होने अथक परिश्रम कर अब तक 5700 फिल्मों के लगभग 17000 गीतों में प्रयुक्त विविध रागों का अध्ययन और विश्लेषण किया है। भारतीय संगीत के इस पारखी का नाम कन्हैया लाल पाण्डेय (के.एल. पाण्डेय) है। 4 नवम्बर, 1954 को उत्तर प्रदेश के हरदोई जनपद में इनका जन्म हुआ था। हरदोई के ही तत्कालीन संगीत-गुरु पण्डित सुखदेव बहादुर सिंह और पण्डित विद्यासागर सिंह से संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की। वर्ष 1974 में लखनऊ विश्वविद्यालय से जीव रसायन विषय से स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की। 1978 में उन्होने रेल यातायात सेवा में पदभार ग्रहण किया। सिविल सेवा की तैयारियों और रेल सेवा में अधिकारी पद पर रहते हुए संगीत से नाता जुड़ा रहा। सेवाकाल के दौरान देश के विभिन्न स्थानों पर अनेक गुणी संगीतज्ञों से सम्पर्क हुआ और फिल्मी गीतों का संकलन और विश्लेषण का कार्य जारी रहा। वर्तमान में श्री पाण्डेय के पास लगभग 2000 फिल्मों और 2 लाख रिकार्डिंग का संकलन है। 1931 में बनी फिल्म “आलम आरा” से फिल्मों ने बोलना सीख लिया था। तब से लेकर 2017 तक की फिल्मों के लगभग 5700 फिल्मों के 17000 गीतों में रागों का विश्लेषण पाण्डेय जी कर चुके हैं। विश्लेषित गीतों का वर्णक्रमानुसार तीन खण्डों में प्रकाशन भी हो चुका है। इस विशाल संकलन का शीर्षक “हिन्दी सिने राग इन्साइक्लोपीडिया” रखा गया है। तृतीय खण्ड में एन से ज़ेड वर्ण से शुरू होने वाले गीतों को 629 पृष्ठों में शामिल किया गया है। इस खण्ड के मुखपृष्ठ का चित्र यहाँ दिया जा रहा है। श्री पाण्डेय के संगीत विषयक अन्य ग्रन्थों की जानकारी आगामी अंकों में दी जाएगी। संगीत-प्रेमियों और संगीतकारों को पुस्तक के तीनों खण्डों को रियायती मूल्य पर घर बैठे उपलब्ध कराया जाएगा। विस्तृत जानकारी प्राप्त करने के लिए आप kanhayaabha@gmail.com अथवा swargoshthi@gmail.com पर सन्देश भेज सकते हैं।

‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर नई श्रृंखला “खमाज थाट के राग” की पहली कड़ी में आज आपने खमाज थाट के जनक राग “खमाज” का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद निसार हुसैन खाँ द्वारा प्रस्तुत एक खयाल रचना का रसास्वादन किया। इसके बाद इसी राग पर आधारित फिल्म “बुड्ढा मिल गया” से एक ठुमरीनुमा मोहक गीत मन्ना डे और अर्चना के स्वरों में सुनवाया। संगीतकार राहुलदेव बर्मन ने इस गीत को राग खमाज के स्वरों में पिरोया है। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग खमाज : SWARGOSHTHI – 420 : RAG KHAMAJ : 19 मई, 2019 

Thursday, November 24, 2016

"सातों बार बोले बंसी" और "जाने दो मुझे जाने दो" जैसे नगीनों से सजी है आज की "गुलज़ार-आशा-पंचम"-मयी महफ़िल



कहकशाँ - 24
गुलज़ार, पंचम और आशा ’दिल पड़ोसी है’ में  
"दिल पड़ोसी है, मगर मेरा तरफ़दार नहीं..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है गुलज़ार, राहुल देव बर्मन और आशा भोसले की तिकड़ी के सुरीले संगम से निकले दो नगमें 'दिल पड़ोसी है’ ऐल्बम से।



बाद मुद्दत के फिर मिली हो तुम,
ये जो थोड़ी-सी भर गई हो तुम,
ये वज़न तुम पर अच्छा लगता है..

अभी कुछ दिनों पहले ही भरी-पूरी फिल्मफेयर की ट्रॉफ़ी स्वीकार करते समय गुलज़ार साहब ने जब ये पंक्तियाँ कहीं तो उनकी आँखों में गज़ब का एक आत्म-विश्वास था, लहजे में पिछले ४८ सालों की मेहनत की मणियाँ पिरोई हुई-सी मालूम होती थीं और बालपन वैसा ही जैसे किसी पाँचवे दर्जे के बच्चे को सबसे सुंदर लिखने या सबसे सुंदर कहने के लिए "इन्स्ट्रुमेंट बॉक्स" से नवाज़ा गया हो। उजले कपड़ों में देवदूत-से सजते और जँचते गुलज़ार साहब ने अपनी उम्र का तकाज़ा देते हुए नए-नवेलों को खुद पर गुमान करने का मौका यह कह कर दे दिया कि "अच्छा लगता है, आपके साथ-साथ यहाँ तक चला आया हूँ।" अब उम्र बढ़ गई है तो नज़्म भी पुरानी होंगी साथ-साथ, लेकिन "दिल तो बच्चा है जी", इसलिए हर दौर में वही "छुटभैया" दिल हर बार कुछ नया लेकर हाज़िर हो जाता है। यूँ तो यह दिल गुलज़ार साहब का है, लेकिन इसकी कारगुजारियों का दोष अपने मत्थे नहीं लेते हुए, गुलज़ार साहब "विशाल" पर सारा दोष मथ देते हैं और कहते हैं कि "इस नवजवान के कारण ही मैं अपनी नज़्मों को जवान रख पाता हूँ।" अब इसे गुलज़ार साहब का बड़प्पन कहें या छुटपन, लेकिन जो भी हो, इतना तो मानना पड़ेगा कि लगभग पचास सालों से चल रही इनकी लेखनी अब भी दवात से लबालब है। अब भी दिल पर वही सुंदर-से "हस्ताक्षर" रचती रहती है, वही गोल-गोल अक्षर, गोल-गोल अंडा, मास्टर-जी का डंडा, बकड़ी की पूँछ, मास्टर-जी की मूँछ, और लो बन गया "क"। ऐसे ही प्यारे-प्यारे तरीकों से और कल्पना की उड़ानों के सहारे गुलज़ार साहब हमारे बीच की ही कोई चीज हमें सौंप जाते हैं, जिसका तब तक हमें पता हीं नहीं होता। ८ सितम्बर १९८७ को भी यही बात हुई थी। उस दिन जब गुलज़ार साहब ने हमें "दिल" का अड्डा बताया, तभी हमें मालूम हुआ कि यह नामुराद कोई और नहीं "हमारा पड़ोसी है", यह ऐसा पड़ोसी है जो "हमारे ग़म उठा लेता है, लेकिन हमारे ग़मों को दूर नहीं करता" तभी तो गुलज़ार साहब कहते हैं:

हाँ मेरे ग़म तो उठा लेता है, ग़मख्वार नहीं,
दिल पड़ोसी है, मगर मेरा तरफ़दार नहीं..

("ये जो थोड़ी-सी भर गई हो तुम..." यह सुनकर आपको नहीं लगता कि शायर ने किसी ख़ास के लिए ये अल्फ़ाज़ कहे हैं। अलग बात है कि फिल्मफेयर की ब्लैक-लेडी पर भी ये पंक्तियाँ सटीक बैठती हैं, लेकिन पवन झा जी की मानें तो गुलज़ार साहब ने कुछ सालों पहले "एक ख़ास" के लिए यह नज़्म लिखी थी.. वह ख़ास कौन है? यह पूछने की ज़रूरत भी है क्या? :) )

हाँ तो हम गुलज़ार साहब और "दिल पड़ोसी है" की बातें कर रहे थे। इस एलबम के एक-एक गीत को गुलज़ार साहब ने इतनी शिद्दत से लिखा है (वैसे ये हर गीत को उतनी ही मेहनत, शिद्दत और हसरत से रचते हैं) कि मुझसे अपनी पसंद के एक या दो गाने चुनते नहीं बन रहे। "कोयले से हीरे को ढूँढ निकाला जा सकता है, लेकिन जहाँ हीरे ही हीरे हो वहाँ पारखी का सर घूम न जाए तो कहना।" वैसे मैं अपने आप को पारखी नहीं मानता लेकिन हीरों के बीच बैठा तो ज़रूर हूँ। शायद एक-एक हीरा परखता चलूँ तो कुछ काम बने। अब ज़रा इसे देखिए:

चाँद पेड़ों पे था,
और मैं गिरजे में थी,
तूने लब छू लिए,
जब मैं सजदे में थी,
कैसे भूलूँगी मैं, वो घड़ी गश की थी,
ना तेरे बस की थी, ना मेरे बस की थी.. (रात क्रिसमस की थी)

या फिर इसे:

माँझी रे माँझी, रमैया माँझी,
मोइनी नदी के उस पार जाना है,
उस पार आया है जोगी,
जोगी सुना है बड़ा सयाना है..

शाम ढले तो पानी पे चलके पार जाता है,
रात की ओट में छुपके रसिया मोहे बुलाता है,
सोना सोना, जोगी ने मेरा
जाने कहाँ से नाम जाना है.. (माँझी रे माँझी) 

यहाँ पर माँझी और मोइनी नदी के बहाने "माया-मोह" की दुनिया के उस पार बसे "अलौकिक" संसार की बात बड़े ही खूबसूरत और सूफ़ियाना तरीके से गुलज़ार साहब ने कह दी है। ऐसी ही और भी कई सारी नज़्में हैं इस एलबम में जिसमें गुलज़ार, पंचम और आशा की तिकड़ी की तूती गूँज-गूँज कर बोलती है। जिस तरह हमने पिछली कड़ी में खुद इन दिग्गजों से ही इनकी पसंद-नापसंद और गानों के बनने की कहानी सुनी थी, उसी तरह आज भी क्यों न वह बागडोर इन्हीं को सौंप दी जाए।

आशा: "सातों बार बोले बंसी"

पंचम: इसके बारे में गुलज़ार, तुम बताओ।

गुलज़ार: "सातों बार बोले बंसी, एक हीं बार बोले ना.. तन की लागी सारी बोले, मन की लागी खोले ना".. ये गाने में खास बात ये है कि बांसुरी को "पर्सोनिफ़ाई" करके देखिए आप।

पंचम: कैसे?

गुलज़ार: जितनी फूंक तन पे लगती है, उतनी हीं बार बोलती है लेकिन अंदर की बात नहीं बताती। उसके सुर सात हैं, सातों बोलते हैं, जो चुप रहती है जिस बात पे, वो नहीं बोलती।

आशा: वाह!

गुलज़ार: उसमें खूबसूरत बात ये है कि उसको "पर्सोनिफ़ाई" करके देखिए। किस तरह से वो उठके कृष्णा के मुँह लगती है, मुँह लगी हुई है, मुँह चढी हुई है, और वो सारी बातें कहती है, एक जो उसका अपनापन है, वो चुप है, वो नहीं बोलती, उन सात सुरों के अलावा। उसके सारी "इलस्ट्रेशन" जितनी है, वो बाँसुरी के साथ "पर्सोनिफ़ाई" करके देखिए आप।

पंचम: ये गाने में थोड़ा लयकारी भी किया था, सरगम भी किए थे, बड़ा अच्छा था।

आशा: और उसमें बाँसुरी साथ में बोल रही है, और आवाज़ भी आ रही है, तो समझ में नहीं आ रहा कि बाँसुरी बोल रही है कि राधा बोल रही है।

गुलज़ार: हाँ, वही, उसमें "परसोनिफ़िकेशन" है सारी की सारी। फूंक पे बोलती है और वो फूंक पे हीं बोलती है बाँसुरी।

अब चूँकि गुलज़ार साहब ने इस गाने को बड़ी ही बारीकी से समझा दिया है, इसलिए मुझे नहीं लगता है मुझे कुछ और कहने की ज़रुरत पड़ेगी। तो चलिए पढते और सुनते हैं यह गाना:

सातों बार बोले बंसी,
एक ही बार बोले ना,
तन की लागी सारी बोले,
मन की लागी खोले ना..

चुपके सुर में भेद छुपाये,
फूँक-फूँक बतलाये,
तन की सीधी मन की घुन्नी,
पच्चीस पेंचे खाए,
हो.. हाँ बोले ना बोले ना,
हाँ बोले ना बोले ना..

प्रीत की पीड़ा जाने मुई,
छाती छेद पड़े, 
उठ-उठ के फिर मुँह लगती है,
कान्हा संग लड़े,
हो.. हाँ बोले ना बोले ना,
हाँ बोले ना बोले ना..




नियम से तो हमें बस एक ही गाने तक अपनी महफ़िल को सीमित रखना चाहिए था, लेकिन बात जब इस "स्वर्णिम" तिकड़ी की हो रही हो तो एक से किसका मन भरता है! यूँ भी हम जितना इनके गाने सुनेंगे, उतना ही हमें संगीत की बारीकियाँ जानने को मिलेंगी। पंचम दा की यही तो ख़ासियत रही थी कि वे संगीत को बस "ट्रेडिशनल" एवं "कन्वेशनल" वाद्य-यंत्रों तक घेरकर नहीं रखते थे, बल्कि "बोल" के हिसाब से उसमे "रेलगाड़ी की सीटी", "मुर्गे की बाँग", "जहाज का हॉर्न" तक डाल देते थे। तभी तो सुनने वाला इनके संगीत की ओर खुद-ब-खुद खींचा चला आता था। जहाँ तक आशा ताई की बात है, तो इनके जैसा "रेंज" शायद ही किसी गायिका के पास होगा। ये जितने आराम से "दिल चीज़ क्या है" गाती हैं, उतनी ही सहूलियत से "दम मारो दम" को भी निभा जाती हैं। अब जहाँ ये तीनों अलग-अलग इतने करामाती हैं तो फिर साथ आ जाने पर "क़यामत" तो आनी ही है। आशा जी "दिल पड़ोसी है" को अपना सर्वश्रेष्ठ एलबम मानती है, तभी तो गुलज़ार साहब को उनके जन्मदिवस पर बधाई-संदेश भी इसी के रंग में रंगकर भेज डालती हैं: "भाई जन्म-दिन मुबारक। पंचम, आप और मैं खंडाला में, दिल पड़ोसी है के दिन, मैं जिंदगी में कभी नहीं भूलूंगी।" हम भी इस तिकड़ी को कभी नहीं भूलेंगे। इसी वादे और दावे के साथ चलिए अगली बातचीत और अगले गाने का लुत्फ़ उठाते हैं:

आशा(गाती हैं): "जेते दाओ आमाए डेको ना... "

गुलज़ार: वाह!

पंचम: ये तो आप बंगाली में गा रही हैं.. "प्रोग्राम" का हिन्दी गानों का है।

आशा: हिन्दी हो, पंजाबी हो, चाहे टिम्बकटु की ज़बान हो, गाना सुर जहाँ अच्छे, मतलब जहाँ अच्छा, वो गाना अच्छा होता है।

गुलज़ार: सच में आशा जी, मैंने इसके कई बंगाली गाने चुराए हैं।

आशा: अच्छा?

गुलज़ार: हाँ, बहुत बार। ये पूजा के लिए जो गाने करते हैं, तो मैं पास बैठे हुए, कई बार धुन बहुत अच्छी लगी, जैसे एक, उसके पूरे बंगाली के बोल मुझे याद नहीं, और गौरी दा "फ़ेमस पोयट फ़्रॉम बंगाल"

आशा: गौरी शंकर मजुमदार

गुलज़ार: जी हाँ, और इनके बोल चल रहे थे पूजा के गाने के "आस्थे आमार देरी होबे"

पंचम: आ हा हा

गुलज़ार: उसपे वो गाना लिखा था उस ट्युन पर.. "तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा तो नहीं"

पंचम: ये उसी का गाना?

गुलज़ार: हाँ, आँधी में। और ये भी उसी तरह का गाना इनका, जिसपे आप अभी गा रहीं थीं, "जेते दाव आमाय"

आशा: "दिल पड़ोसी है" में.. (गाती हैं) "जाने दो मुझे जाने दो"।

और ये रहे उस गाने के बोल:

जाने दो मुझे जाने दो
रंजिशें या गिले, वफ़ा के सिले
जो गये जाने दो
जाने दो मुझे जाने दो

थोड़ी ख़लिश होगी, थोड़ा सा ग़म होगा,
तन्हाई तो होगी, अहसास कम होगा
गहरी ख़राशों की गहरी निशानियाँ हैं
चेहरे के नीचे कितनी सारी कहानियाँ हैं
माज़ी के सिलसिले, जा चुके जाने दो 
ना आ आ..

उम्मीद-ओ-शौक़ सारे लौटा रही हूँ मैं,
रुसवाई थोड़ी-सी ले जा रही हूँ मैं
बासी दिलासों की शब तो गुज़ार आये
आँखों से गर्द सारी रोके उतार आये
आँखों के बुलबुले बह गये, जाने दो 
ना आ आ..




’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्वदीपक ’तन्हा’
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Saturday, February 20, 2016

"सदियों से दुनिया में यही तो क़िस्सा है....", इस गीत के बनने की कहानी से श्रद्धांजलि स्वर्गीय निदा फ़ाज़ली को!


एक गीत सौ कहानियाँ - 76
 

'सदियों से दुनिया में यही तो क़िस्सा है...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 76-वीं कड़ी में आज श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं जानेमाने शायर और फ़िल्मी गीतकार निदा फ़ाज़ली को जिनका 8 फ़रवरी 2016 को निधन हो गया। बताने जा रहे हैं उनके लिखे वर्ष 1981 की फ़िल्म ’बीवी ओ बीवी’ के लोकप्रिय गीत "सदियों से दुनिया में यही तो क़िस्सा है..." के बारे में जिसे किशोर कुमार ने गाया था। संगीत राहुल देव बर्मन का। 

8 फ़रवरी चले गए निदा फ़ाज़ली अपनी अन्तिम यात्रा पर। और पीछे रह गईं उनकी लिखी ग़ज़लें, गीत, शायरी
Nida Fazli
जो किसी धरोहर से कम नहीं। जब एक बार किसी रेडियो कार्यक्रम के उद्‍घोषक ने निदा साहब से मुलाक़ात के सवालात शुरू करना चाहा, तब निदा साहब ने अपनी शायराना अंदाज़ में कहा, "एक साथ बहुत सारे सवालात, और उन सब सवालातों का जवाब एक शेर - अब जहाँ भी हैं वहीं तक लिखो रुदाद-ए-सफ़र, हम तो निकले थे कहीं और ही जाने के लिए। किसी मंज़र पर बहुत देर तक आँख को ठहरने की इजाज़त वक़्त ने नहीं दी, इनमें मंज़रों का क़सूर नहीं है, क़सूर उस सुलूग का है जो ज़िन्दगी ने मेरे साथ किया।" आज निदा साहब के गुज़र जाने के बाद उनकी कही ये बातें याद आ गईं। यूं तो निदा साहब ने एक से एक अच्छा गीत लिखा है हिन्दी फ़िल्मों के लिए, जिस गीत के बनने की कहानी आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं, वह है कमचर्चित हास्य फ़िल्म ’बीवी ओ बीवी’ से। यह फ़िल्म इस बात के लिए महत्वपूर्ण थी कि इसे निर्माता थे शोमैन राज कपूर। हालाँकि फ़िल्म को निर्देशित उन्होंने नहीं बल्कि राहुल रवैल ने किया था। संजीव कुमार, रणधीर कपूर, पूनम ढिल्लों अभिनीत यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर बुरी तरह से असफल रही। फ़िल्म के गीतों की वजह से फिर कुछ हद तक राज कपूर की मान बची रही। किशोर कुमार की एकल आवाज़ में "गोरी हो काली हो या नख़रेवाली हो...", "वक़्त से पहले क़िस्मत से ज़्यादा..." और "सदियों से दुनिया में यही तो क़िस्सा है..." जैसे गीत उस दौर युवाओं के होठों पर चढ़ गया था। "मेरी बुलबुल यूं ना हो गुल इस क़दर..." (किशोर - लता) और "पैसे का खेल निराला..." (रफ़ी - आशा) फ़िल्म के दो युगल गीत थे जो लोगों के दिलों को छू नहीं सके। राज कपूर की फ़िल्मों में संगीत का क्या महत्व और स्तर होता है, इससे हम वाक़िफ़ हैं, पर इस फ़िल्म के गीत-संगीत को सुन कर राज कपूर की उपस्थिति नज़र नहीं आती।


ख़ैर, हम याद कर रहे हैं निदा फ़ाज़ली साहब को। इस फ़िल्म में उनका लिखा "सदियों से दुनिया में..." गीत ख़ूब
The Musical Team of 'Biwi O Biwi' (Photo Courtesy: K C Pingle)
लोकप्रिय हुआ था। इसी गीत के बनने की कहानी उन्हीं की ज़ुबानी पढ़िए। "मुझे याद है कि मैं राहुल देव बर्मन के साथ एक गाना लिख रहा था। गाना तैयार हो चुका था और फ़िल्म का नम था ’बीवी ओ बीवी’। फ़ाइनल रिहर्सल हो रहा था और अगले ही दिन गाना रेकॉर्ड होने वाला था। तो क्या देखते हैं कि दोपहर के दो बजे राज कपूर साहब हाथ में भेजपुरी लेकर अन्दर दाख़िल हुए और अपने स्टाइल में बैठ कर गाने की तारिफ़ की। जब रिहर्सल ख़त्म हो गया तो उन्होंने मुझे अपने क़रीब बुलाया। पूछा कि आपको यह सिचुएशन किसने बताई थी? मैंने कहा रणधीर कपूर ने। कहने लगे कि बहुत अच्छे! फिर कहने लगे कि कल अगर आपको फ़ुरसत हो तो हमारे कॉटेज में आ जाइए चेम्बुर में, मैं आपको एक सिचुएशन सुनाना चाहता हूँ। आर. डी. ने मुझे आँख मारी, बताना चाहा कि यह गाना ख़त्म हो गया, ट्युन तुम्हारे ज़हन में है और तुम जा रहे हो कल। अगर तुम वहाँ पर एक्स्टेम्पोर गाना लिख दो तो यह गाना रेकॉर्ड होगा वरना नहीं होगा। राज कपूर ने कम से कम आधा घंटा तो अपने नॉस्टल्जिया में सर्च किया कि व्यजयन्तीमाला ये थीं, और नरगिस ये थीं, फ़लानी ये थीं और उनसे ये हुआ वो हुआ, वगेरह वगेरह वगेरह वगेरह। और फिर आख़िर में तीन लाइन उन्होंने बोली, कि भाई सिचुएशन तो इतनी सी है, अंग्रेज़ी में बोलने लगे कि there is a girl, there is a boy, there will be a girl, there will be a boy, there was a girl, there was a boy, and that is the whole life। मेरे ज़हन में ट्युन थी, मैंने बोला कि राज साहब, आपने तो पूरा गाना ही बोल दिया! बोले, "वो कैसे जी?" मैंने कहा "सदियों से दुनिया में यही तो क़िस्सा है, एक ही तो लड़की है, एक ही तो लड़का है, जब भी ये मिल गए प्यार हो गया"। कहने लगे "यही हमें चाहिए था जी!" उसी दिन यह गाना पूरा होकर रेकॉर्ड हुआ और सभी को पसन्द आया।" लीजिए, अब आप इसी गीत का वीडियो देखिए। 


फिल्म - बीवी ओ बीवी : "सदियों से दुनिया में..." : किशोर कुमार : गीतकार - निदा फाजली


अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Saturday, January 17, 2015

"महबूबा महबूबा...", जानिए कि कैसे सच साबित हुई पंचम के मामा के दिल की पुकार!


एक गीत सौ कहानियाँ - 50
 

‘महबूबा महबूबा, गुलशन में गुल खिलते हैं!’




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह लोकप्रिय स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 50वीं कड़ी में आज जानिये हिन्दी सिनेमा की माइलस्टोन फ़िल्म 'शोले' के राहुल देव बर्मन के गाये मशहूर गीत "महबूबा महबूबा, गुल्शन में गुल खिलते हैं..." से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें। 


15 अगस्त 1975 के दिन प्रदर्शित हुई फ़िल्म 'शोले' हिन्दी सिनेमा के इतिहास का एक सुनहरा पन्ना है। 1999 में BBC ने 'शोले' को 'Film of the Millenium' की उपाधि दी तो शेखर कपूर ने कहा - “There has never been a more defining film on the Indian screen. Indian film history can be divided into Sholay BC and Sholay AD." अनुपमा चोपड़ा ने अपनी किताब 'Sholay: The Making of a Classic' में इस फ़िल्म को हिन्दी सिनेमा का सुनहरा स्तर कहा है। एक तरफ़ तो 'शोले' को अपार लोकप्रियता और मकबूलियत हासिल हुई, और दूसरी तरफ़ उस वर्ष फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों में 'शोले' कुछ ख़ास कमाल नहीं दिखा सकी। इस फ़िल्म को केवल एक पुरस्कार मिला 'बेस्ट एडिटिंग' का। आश्चर्य की बात है, क्यों? 'शोले' एक ऐसी फ़िल्म थी जिसकी सफलता के लिए उसे अपने गीत-संगीत पर निर्भर नहीं रहना पड़ा। दूसरे शब्दों में 'शोले' के गाने अच्छे तो थे पर इतने भी अच्छे नहीं कि जो फ़िल्म की कामयाबी को निश्चित कर सके। वैसे इस फ़िल्म के गानें कामयाब ज़रूर हुए। फ़िल्म का होली गीत "होली के दिन दिल खिल जाते हैं..." आज भी होली पर रेडियो के विशेष कार्यक्रमों में सुनाई दे जाता है। "कोई हसीना जब रूठ जाती है तो..." और "जब तक है जान जाने जहान मैं नाचूंगी..." की भी अपनी जगह है रसिकों के दिलों में। दोस्ती पर बनने वाले गीतों में "ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे..." गीत की ख़ास जगह है। कहा जाता है कि इस गीत को शूट करने में 21 दिन लग गए थे। और पाँचवाँ गीत है "महबूबा महबूबा, गुलशन में गुल खिलते है..." की तो बात ही क्या है! अपनी तरह का इकलौता गीत; फिर इसके बाद कोई भी गीत इस तरह का नहीं बन पाया। आज के दौर के आइटम गीत बनाने वालों को "महबूबा महबूबा" से सबक लेनी चाहिए कि आइटम गीत होता क्या है! मेरे ख़याल से फ़िल्म संगीत इतिहास के श्रेष्ठ आइटम गीतों में से एक है "महबूबा महबूबा"

"महबूबा महबूबा" के बनने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। शुरू शुरू में इस गीत को गाने के लिए किशोर की आवाज़ तय हुई थी, पर किस तरह से यह गीत पंचम की झोली में आ गई, यही एक दिलचस्प कहानी है बताने लायक। हुआ यूँ कि एक बार राहुल देव बर्मन के मामा श्री निर्मल कुमार दासगुप्ता अपनी बहन यानी राहुल देव बर्मन की माँ मीरा देव बर्मन से मिलने मुम्बई आये हुए थे। पंचम और उनके मामा के बीच में बहुत प्यार था; पंचम अपने मामाजी को मोनी दादू कह कर बुलाते थे तो मामाजी अपने भांजे को टुबलू बुलाया करते। तो निर्मल जी मार्च 1975 को बम्बई अपनी बहन मीरा जी से मिलने आए। उन दिनों 'शोले' के गीतों की रेकॉर्डिंग चल रही थी। तो एक दिन शाम को 'शोले' के संगीतकार पंचम एक गीत का स्क्रैच रेकॉर्ड करके घर पहुँचे और उस स्क्रैच को अपने मामाजी को सुनवाने के लिए व्याकुल थे। माँ से पता चला कि मामाजी उपर छत पर चाय पी रहे हैं। तो पंचम सारा ताम-झाम लेकर छत पर ही पहुँच गए और अपने मोनी दादू को वह स्क्रैच सुनवाया। वह स्क्रैच था "महबूबा महबूबा" गाने का। स्क्रैच उस ज़माने में कोई भी डबिंग आर्टिस्ट या संगीतकार ही गा दिया करता था, मुख्य गायक-गायिका को इसके लिए नहीं बुलाते थे। इसलिए किशोर कुमार की आवाज़ में रेकॉर्ड होने वाले इस गीत का स्क्रैच पंचम ख़ुद अपनी आवाज़ में रेकॉर्ड कर लाए थे। पंचम के मामाजी ने जैसे ही यह स्क्रैच सुना तो तुरन्त अपने भांजे से कहा कि अरे, यह तो तुम्हारी आवाज़ में भी बहुत अच्छा लग रहा है, इसे किशोर कुमार से गवाने की क्या ज़रूरत है? पंचम ने कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया था, वो तो अपने मामाजी को सिर्फ़ गीत की कम्पोज़िशन सुनवाना चाहते थे। इसलिए वो हँस पड़े और मामाजी की बात को टाल दिया। बात वहीं पर ख़त्म हो गई। फिर कुछ दिनों बाद गीत की फ़ाइनल रेकॉर्डिंग की बारी आई। पर किशोर कुमार किसी वजह से स्टुडियो नहीं पहुँच सके। सारा इन्तज़ाम हो चुका था, म्युज़िशियन्स आ चुके थे, रेकॉर्डिंग रद्द करने का मतलब माली नुकसान था। तो उस दिन भी किशोर कुमार का इन्तज़ार करते हुए पंचम साज़िन्दों को लेकर यह गीत खुद ही गा गए। उनकी आवाज़ में इस गीत को सुनते ही रमेश सिप्पी उछल पड़े। कहने लगे कि अब यह गीत आप ही गाओगे! यह फ़िल्म के किसी नायक पर नहीं फ़िल्माया जा रहा, इसलिए ज़रूरी नहीं कि इसे किशोर से गवाया जाये; क्योंकि यह जलाल आग़ा पर फ़िल्माया जाना है और आपकी आवाज़ में बड़ा ही असरदार लग रहा है, इसलिए इसे अब आप ही गाओगे। अपने मामाजी की बात भी पंचम को याद आ गई, और सबकी सहमति पर पंचम ने अपनी ही आवाज़ में यह गीत रेकॉर्ड करवाया। बाद में जब किशोर कुमार ने यह गीत सुना तो उन्होंने भी यह स्वीकार किया कि  इस तरह से तो वो भी नहीं गा पाते इस गीत को, और उनका उस दिन रेकॉर्डिंग पर ना पहुँचना ही इस गीत के लिए बेहतर सिद्ध हुआ।

राहुल देव बर्मन और संतूर सम्राट पंडित शिव कुमार शर्मा के बीच गहरी दोस्ती थी। पंडित जी ने पंचम के कई गीतों में संतूर बजाए हैं, और 'शोले' का यह गीत भी उन्हीं में से एक है। पर इस गीत में वाद्य भारतीय संतूर नहीं बल्कि इरानी संतूर था। इस बारे में विविध भारती के 'संगीत सरिता' कार्यक्रम में एक बार पंडित जी ने विस्तार से बताया था, उन्हीं के वो शब्द यहाँ उद्धृत कर रहे हैं - "अभी पंचम का जब ज़िक्र कर रहे हैं हम लोग, तो जैसा कहते हैं न बहुत जिद्दत की बात सोचते रहते थे वो; कुछ ऐसी बात कि इस बात में से नया क्या निकाले। तो उसी की मैं आपको एक मिसाल बताऊँगा कि फ़िल्म बन रही थी 'शोले'। उसमें वो म्युज़िक दे रहे थे। और एक, जैसा मैंने कहा, जिद्दत कुछ न कुछ करते रहते थे, तो अपने गाने में भी कुछ आवाज़ ऐसी बनाते थे कि अलग अंदाज़ का एक गाना, एक अलग स्टाइल क्रिएट किया। "महबूबा महबूबा" में उन्होंने ईरानी संतूर इस्तेमाल किया। ईरानी संतूर हमारे संतूर से टोनल क्वालिटी में अलग है, शेप भी अलग है, सिस्टम वही है, और यह मेरे पास कैसे आया कि 1969 में मैं इरान गया था 'शिराज़ फ़ेस्टिवल' में बजाने के लिए। इन्टरनैशनल फ़ेस्टिवल हुआ था वहाँ तो वहाँ की सरकार ने मुझे एक गिफ़्ट दिया था। तो पंचम ने क्या किया कि इरानी संतूर को, अब सोचिए कि यह ईलेक्ट्रॉनिक म्युज़िक तो आज हुआ है, 'शोले' कभी की आई थी, राजकमल स्टुडियो में उन्होंने अपनी तरह से एक एक्स्पेरीमेण्ट करके उसकी टोन में कुछ बदलाव किया और एक अलग अंदाज़ का टोन बनाया जो उस गाने के मूड को सूट करे। बड़ा ही प्रॉमिनेण्ट पीस था जो गीत में कई बार सुनने को मिलता है, मुखड़े के दो बार "महबूबा महबूबा" के बीच में यह पीस है और अन्य कई जगहों पर भी है।"

और अब एक और महत्वपूर्ण बात। "महबूबा महबूबा" की धुन पंचम की रचना नहीं है। यह धुन प्रेरित है ग्रीक गायक डेमिस रुसोस के गीत "say you love me" की धुन से। यह गीत जारी हुआ था साल 1974 में, यानी कि 'शोले' के ठीक एक साल पहले। पर मज़े की बात तो यह है कि डेमिस रुसोस की भी यह मूल रचना नहीं है। रुसोस भी प्रेरित हुए थे एक अन्य गीत से। वह गीत था ग्रीक गायक मिकैलिस विओलरिस का गाया "ta rialia" जो बना था साल 1973 में। इस तरह से 1973 में "ta rialia", 1974 में "say you love me" और 1975 में "महबूबा महबूबा" एक ही धुन पर बना और तीनों ही गाने बेहद कामयाब रहे। तो दोस्तों, 'शोले' फ़िल्म से जुड़ी न जाने कितनी कहानियाँ है, न जाने कितने क़िस्से हैं, रेकॉर्ड्स हैं, इतिहास है, पर "महबूबा महबूबा" गीत की दास्तान बस इतनी सी ही है, और अब आप वही चर्चित गीत सुनिए।

फिल्म शोले : 'महबूबा महबूबा गुलशन में गुल खिलते हैं...' : गायक और संगीतकार - राहुल देव बर्मन 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।



खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, December 28, 2014

‘हमें तुमसे प्यार कितना...’ : SWARGOSHTHI – 200 : RAG BHAIRAVI




स्वरगोष्ठी – 200 में आज

शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत – 9 : राग भैरवी


विदुषी परवीन सुल्ताना से सुनिए भैरवी के स्वरों में पिरोया गीत- ‘हमें तुमसे प्यार कितना ये हम नहीं जानते...’ 




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के 200वें अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। वर्ष 2014 के इस समापन अंक के साथ ही शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक और फिल्म संगीत पर केन्द्रित हमारे साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ की चार वर्षों की यात्रा पूर्ण होती है। हमारी इस यात्रा में असंख्य संगीतानुरागी सहयात्री बने। उन सभी का नामोल्लेख इस एक अंक में सम्भव नहीं है। हमारे कुछ श्रोता और पाठक समय-समय पर अपने सुझावों और फरमाइशों से अवगत कराते रहते हैं। आपके सुझावों के आधार पर ही हम आगामी अंकों की रूपरेखा निर्धारित करते हैं। वर्ष 2014 में लगभग 12 संगीत प्रेमियों ने हमारी संगीत पहेली में भाग लिया, जिनमें से 4-5 प्रतिभागी तो नियमित थे। ‘स्वरगोष्ठी’ के इस 200वें अंक के माध्यम से हम सभी पाठको, श्रोताओं, सुझाव देने वालों और पहेली में भाग लेने वाले प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। आइए, अब आज के इस अंक की प्रस्तुतियों पर कुछ चर्चा करते हैं। इन दिनों ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी लघु श्रृंखला, ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत’। यह इस लघु श्रृंखला की समापन कड़ी है। इस श्रृंखला में आप फिल्मों के ऐसे गीत सुन रहे हैं जो रागों पर आधारित हैं और इन्हें किसी फिल्मी पार्श्वगायक या गायिका ने नहीं बल्कि समर्थ शास्त्रीय गायक या गायिका ने गाया है। आज का गीत नौवें दशक के शुरुआती दौर अर्थात 1981 में प्रदर्शित फिल्म ‘कुदरत’ से लिया गया है। यह गीत राग भैरवी पर आधारित है और इसे सुप्रसिद्ध गायिका परवीन सुल्ताना ने गाया है। इसके साथ ही राग भैरवी के एक अलग रंग का अनुभव करने के लिए हम आपको विदुषी एन. राजम् की वायलिन पर एक दादरा भी प्रस्तुत कर रहे हैं।



नौवें दशक के आरम्भिक वर्ष अर्थात वर्ष 1981 में फिल्म ‘कुदरत’ प्रदर्शित हुई थी। इसके संगीतकार राहुलदेव बर्मन थे। उन्होने फिल्म के एक प्रसंग के लिए राग भैरवी के स्वरों में एक गीत की धुन बनाई। फिल्म में यह गीत दो भिन्न प्रसंगों में और दो भिन्न आवाज़ों में शामिल किया गया है। गीत का एक संस्करण पार्श्वगायक किशोर कुमार की आवाज़ में है तो दूसरा संस्करण विदुषी परवीन सुल्ताना की आवाज़ में है। आज हम आपको परवीन जी की आवाज़ में राग भैरवी के स्वरों में पिरोया वही गीत सुनवाते हैं। बेगम परवीन सुल्ताना का नाम देश की शीर्षस्थ गायिकाओं में शामिल है। उनका जन्म नौगाँव, असम में 10 जुलाई 1950 को एक संगीतप्रेमी परिवार में हुआ था। बचपन में ही उन्हें संगीत की शिक्षा अपने दादा मोहम्मद नजीब खाँ से मिली। बाद में बंगाल के जाने-माने संगीतज्ञ पण्डित चिन्मय लाहिड़ी से विधिवत प्रशिक्षण प्राप्त किया। पटियाला घराने की परम्परागत गायकी का मार्गदर्शन उन्हें उस्ताद दिलशाद खाँ ने प्रदान किया। बाद में उस्ताद दिलशाद खाँ से ही उनका विवाह हुआ। दोनों का पहला सार्वजनिक जुगलबन्दी गायन का प्रदर्शन अफगानिस्तान के जाशीन समारोह में हुआ था। परवीन जी का पहला एकल गायन का प्रदर्शन 1962 में मात्र 12 वर्ष की आयु में हुआ था और 1965 से ही उनके संगीत की रिकार्डिंग होने लगी थी। भारत सरकार ने उन्हें 1976 में ‘पद्मश्री’ सम्मान और इसी वर्ष यानी 2014 में ‘पद्मभूषण’ सम्मान प्रदान किया है। इसके अलावा 1986 में देश के प्रतिष्ठित ‘तानसेन पुरस्कार’ और 1999 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार’ से भी अलंकृत किया जा चुका है। परवीन सुल्ताना जी ने खयाल, ठुमरी, भजन के साथ ही कुछ फिल्मों में भी गीत गाये हैं। फिल्म ‘कुदरत’ के अलावा ‘दो बूँद पानी’, ‘पाकीजा’ और ‘गदर’ जैसी फिल्मों के गीत गाये हैं। आज की ‘स्वरगोष्ठी’ में फिल्म कुदरत का जो गीत हम प्रस्तुत कर रहे हैं, उसके बोल हैं- ‘हमें तुमसे प्यार कितना ये हम नहीं जानते...’। जैसा कि हमने पूर्व में उल्लेख किया है, इस गीत का एक और संस्करण पार्श्वगायक किशोर कुमार की आवाज में है। उस वर्ष के फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए गीत के दोनों संस्करण नामित हुए थे, किन्तु पुरस्कार मिला, महिला वर्ग में परवीन जी के गाये इसी गीत को। इसके अलावा फिल्म के लेखक और निर्देशक सुप्रसिद्ध फ़िल्मकार चेतन आनन्द को सर्वश्रेष्ठ लेखन का फिल्मफेयर पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था। इस गीत के संगीतकार राहुलदेव बर्मन और गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी हैं। परदे पर यह गीत सुप्रसिद्ध अभिनेत्री अरुणा ईरानी पर फिल्माया गया है। लीजिए, आप यह गीत सुनिए।


राग भैरवी : ‘हमें तुमसे प्यार कितना...’ : फिल्म – कुदरत : विदुषी परवीन सुल्ताना




अभी आपने जो गीत सुना, उसमें राग भैरवी के स्वर लगे हैं। स्वरों के माध्यम से प्रत्येक रस का सृजन करने में राग भैरवी सर्वाधिक उपयुक्त राग है। संगीतज्ञ इसे सदा सुहागिन राग तथा सदाबहार राग के विशेषण से अलंकृत करते हैं। सम्पूर्ण जाति का यह राग भैरवी थाट का ही आश्रय राग माना जाता है।

कोमल सबही सुर भले, मध्यम वादी बखान,
षडज जहाँ संवादी है, ताहि भैरवी जान।

राग भैरवी में ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद सभी कोमल स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग भैरवी के आरोह स्वर हैं, सा, रे॒ (कोमल), ग॒ (कोमल), म, प, ध॒ (कोमल), नि॒ (कोमल), सां तथा अवरोह के स्वर, सां, नि॒ (कोमल), ध॒ (कोमल), प, म (कोमल), रे॒ (कोमल), सा होते हैं। यूँ तो इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल, सन्धिप्रकाश बेला में है, किन्तु आम तौर पर इसका गायन-वादन किसी संगीत-सभा अथवा समारोह के अन्त में किये जाने की परम्परा बन गई है। ‘भारतीय संगीत के विविध रागों का मानव जीवन पर प्रभाव’ विषय पर अध्ययन और शोध कर रहे लखनऊ के जाने-माने मयूर वीणा और इसराज वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र से जब मैंने राग भैरवी पर चर्चा की तो उन्होने स्पष्ट बताया कि भारतीय रागदारी संगीत से राग भैरवी को अलग करने की कल्पना ही नहीं की जा सकती। यदि ऐसा किया गया तो मानव जाति प्रातःकालीन ऊर्जा की प्राप्ति से वंचित हो जाएगा। राग भैरवी मानसिक शान्ति प्रदान करता है। इसकी अनुपस्थिति से मनुष्य डिप्रेशन, उलझन, तनाव जैसी असामान्य मनःस्थितियों का शिकार हो सकता है। प्रातःकाल सूर्योदय का परिवेश परमशान्ति का सूचक होता है। ऐसी स्थिति में भैरवी के कोमल स्वर- ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद, मस्तिष्क की संवेदना तंत्र को सहज ढंग से ग्राह्य होते है। कोमल स्वर मस्तिष्क में सकारात्मक हारमोन रसों का स्राव करते हैं। इससे मानव मानसिक और शारीरिक विसंगतियों से मुक्त रहता है। भैरवी के विभिन्न स्वरों के प्रभाव के विषय में श्री मिश्र ने बताया कि कोमल ऋषभ स्वर करुणा, दया और संवेदनशीलता का भाव सृजित करने में समर्थ है। कोमल गान्धार स्वर आशा का भाव, कोमल धैवत जागृति भाव और कोमल निषाद स्फूर्ति का सृजन करने में सक्षम होता है। भैरवी का शुद्ध मध्यम इन सभी भावों को गाम्भीर्य प्रदान करता है। धैवत की जागृति को पंचम स्वर सबल बनाता है। इस राग के गायन-वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है। भैरवी के स्वरों की सार्थक अनुभूति कराने के लिए अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, वायलिन पर इस राग का भावपूर्ण वादन। विश्वविख्यात वायलिन-साधिका विदुषी एन. राजम् प्रस्तुत कर रही हैं, गायकी अंग में एक भावपूर्ण दादरा। आप इस दादरा के माध्यम से भैरवी के रस का अनुभव कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भैरवी : वायलिन पर गायकी अंग में परम्परागत दादरा : विदुषी एन. राजम्





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 200वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको दो महान कलासाधकों की वाद्य संगीत जुगलबन्दी का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा तथा वर्ष 2014 में सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले प्रतिभागी को वार्षिक विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि आपको किस राग की अनुभूति हो रही है?

2 – इस जुगलबन्दी में कौन से स्वरवाद्यों का प्रयोग हुआ है? वाद्यों के नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार 3 जनवरी, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। इस श्रृंखला और पहेली के वार्षिक विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 202वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 198वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1985 में प्रदर्शित फिल्म ‘सुर संगम’ के लिए पण्डित राजन मिश्र और एस. जानकी के स्वरों में एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भटियार और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल अद्धा तीनताल अथवा सितारखानी अथवा पंजाबी ठेका। पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मों गीत’ की यह समापन कड़ी थी। ‘स्वरगोष्ठी’ का अगला अंक नये वर्ष 2015 के पहले रविवार को प्रस्तुत किया जाएगा। इस अंक में हम आपको परिवेश के अनुकूल संगीत का रसास्वादन कराएँगे। आगामी श्रृंखलाओं के बारे में आपके सुझाव सादर आमंत्रित हैं। नए वर्ष से ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के अन्तर्गत आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हैं, हमे आविलम्ब लिखें। अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  








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