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Saturday, October 25, 2008

मैं हर एक पल का शायर हूँ....साहिर लुधियानवी

अमर शायर / गीतकार साहिर लुधायनवी की २८वीं बरसी

आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वरना ये रात आज के संगीन दौर की
डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें

ये ख़्वाब ही तो अपनी जवानी के पास थे
ये ख़्वाब ही तो अपने अमल के असास थे
ये ख़्वाब मर गये हैं तो बे-रंग है हयात
यूँ है कि जैसे दस्त-ए-तह-ए-संग है हयात

आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते

साहिर ने जब लिखना शुरू किया तब इकबाल, जोश, फैज़, फ़िराक, वगैरह शायरों की तूती बोलती थी, पर उन्होंने अपना जो विशेष लहज़ा और रुख अपनाया, उससे न सिर्फ उन्होंने अपनी अलग जगह बना ली बल्कि वे भी शायरी की दुनिया पर छा गये। प्रेम के दुख-दर्द के अलावा समाज की विषमताओं के प्रति जो आक्रोश हमें उनकी शायरी में मिलता है, एक ऐसा शायर जो खरा बोलता है दो टूक पर ख्वाब देखने की भी हिम्मत रखता है. जो तल्खियों को सीने में समेटे हुए भी कहता है कि आओ कोई ख्वाब बुनें. साहिर के शब्दों में अगर कहें तो -

दुनिया के तजुरबातो-हवादिस की शक्ल में
जो कुछ मुझे दिया है, लौटा रहा हूँ मैं


अब्दुलहयी ‘साहिर’ 1921 ई. में लुधियाना के एक जागीरदार घराने में पैदा हुए । उनकी माँ के अतिरिक्त उनके वालिद की कई पत्नियाँ और भी थीं। किन्तु एकमात्र सन्तान होने के कारण उसका पालन-पोषण बड़े लाड़-प्यार में हुआ। मगर अभी वह बच्चा ही था कि सुख-वैभव के जीवन के दरवाज़े एकाएक उस पर बन्द हो गए। पति की ऐयाशियों से तंग आकर उसकी माता पति से अलग हो गई और चूँकि ‘साहिर’ ने कचहरी में पिता पर माता को प्रधानता दी थी, इसलिए उसके बाद पिता से और उसकी जागीर से उनका कोई सम्बन्ध न रहा और इसके साथ ही जीवन की ताबड़तोड़ कठिनाइयों और निराशाओं का दौर शुरू हो गया। ऐशो-आराम का जीवन छिन तो गया पर अभिलाषा बाकी रही। नौबत माता के ज़ेवरों के बिकने तक आ गई, पर दम्भ बना रहा और चूँकि मुक़दमा हारने पर पिता ने यह धमकी दे दी थी कि वह ‘साहिर’ को मरवा डालेगा या कम से कम माँ के पास न रहने देगा, इसलिए ममता की मारी माँ ने रक्षक क़िस्म के ऐसे लोग ‘साहिर’ पर नियुक्त कर दिए जो क्षण-भर को भी उसे अकेला न छोड़ते थे। इस तरह घृणा-भाव के साथ-साथ उसके मन में एक विचित्र प्रकार का भय भी पनपता रहा।

साहिर की शिक्षा लुधियाना के खालसा हाई स्कूल में हुई। सन् 1939 में जब वे गवर्नमेंट कालेज के विद्यार्थी थे अमृता प्रीतम से उनका प्रेम हुआ जो कि असफल रहा । कॉलेज़ के दिनों में वे अपने शेरों के लिए ख्यात हो गए थे और अमृता इनकी प्रशंसक । लेकिन अमृता के घरवालों को ये रास नहीं आया क्योंकि एक तो साहिर मुस्लिम थे और दूसरे गरीब । बाद में अमृता के पिता के कहने पर उन्हें कालेज से निकाल दिया गया। जीविका चलाने के लिये उन्होंने तरह तरह की छोटी-मोटी नौकरियाँ कीं।

कॉलेज से निकाले जाने के बाद साहिर ने अपनी पहली क़िताब पर काम शुरू कर दिया। 1943 में उन्होंने ‘तल्ख़ियां’ नाम से अपनी पहली शायरी की किताब प्रकाशित करवाई। ‘तल्ख़ियां’ से साहिर को एक नई पहचान मिली। इसके बाद साहिर ‘अदब़-ए-लतीफ़’, ‘शाहकार’ और ‘सवेरा’ के संपादक बने। साहिर प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन से भी जुड़े रहे थे। ‘सवेरा’ में छपे कुछ लेख से पाकिस्तान सरकार नाराज़ हो गई और साहिर के ख़िलाफ वारंट जारी कर दिया दिया। 1949 में साहिर दिल्ली चले आए। कुछ दिन दिल्ली में बिताने के बाद साहिर मुंबई में आ बसे।

फिल्मों में उनकी शुरुआत हुई १९४८ में आई फ़िल्म "आजादी की राह पर" से, यह फ़िल्म असफल रही और उसके गीत भी, साहिर को प्रसिद्धी मिली १९५१ में आई फ़िल्म "नौजवान" के गीत "ठंडी हवाएं लहराके आए ..." से. संगीतकार थे एस डी बर्मन साहब, मगर जिस फ़िल्म ने उन्हें इंडस्ट्री में स्थापित किया वो थी गुरुदत्त के निर्देशन की पहली फ़िल्म "बाज़ी". यहाँ भी संगीत बर्मन साहब का था, इस फ़िल्म के सभी गीत बेहद मकबूल हुए. साहिर और बर्मन साहब की जोड़ी भी चल निकली, याद कीजिये "ये रात ये चांदनी फ़िर कहाँ..." (जाल), "जाए तो जाए कहाँ...(टैक्सी ड्राईवर), "जीवन के सफर में राही..." (मुनीमजी), और १९५७ में आई फ़िल्म प्यासा के एक से बढ़कर एक गीत. मगर न जाने इस फ़िल्म के बाद दोनों के बीच कैसी गलतफहमियां पैदा हुईं कि दोनों ने अपनी अपनी अलग राह पकड़ ली.

साहिर ने सबसे अधिक काम संगीतकार एन दत्ता के साथ किया. दत्ता साहब साहिर के जबरदस्त प्रशंसक थे. १९५५ में आई मिलाप के बाद मेरिन ड्राइव, लाईट हाउस, भाई बहन, साधना, धूल का फूल, धरम पुत्र और दिल्ली का दादा जैसी फिल्मों में इस जोड़ी ने "तंग आ चुके हैं कश्मकशे जिंदगी से हम...", "मेरे नदीम, मेरे हमसफ़र उदास न हो...", "तू न हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा...", और "औरत ने जन्म दिया मर्दों को..." जैसे बेमिसाल गीत रचे. ७० के दशक में उनका काम यश चोपड़ा कैंप तक सीमित रहा. फ़िल्म कभी-कभी से उन्होंने शानदार वापसी की. फ़िल्म ताजमहल के बाद इस फ़िल्म ने दिलाया उन्हें उनका दूसरा फ़िल्म फेयर अवार्ड.

साहिर बेहद संवेदनशील होने साथ ही बेहद स्वाभिमानी भी थे। वे अक्सर इस बात पर अड़ जाते थे कि पहले मैं गाने लिखूंगा उसके बाद गाने के आधार पर धुन बनाई जाएगी। साहिर ने फिल्म इंडस्ट्री में गीतकारों को एक नई जगह दिलाई। साहिर की लोकप्रियता काफी थी और वे अपने गीत के लिए लता मंगेशकर को मिलने वाले पारिश्रमिक से एक रुपया अधिक लेते थे। इसके साथ ही ऑल इंडिया रेडियो पर होने वाली घोषणाओं में गीतकारों का नाम भी दिए जाने की मांग साहिर ने की जिसे पूरा किया गया। इससे पहले किसी गाने की सफलता का पूरा श्रेय संगीतकार और गायक को ही मिलता था।

साहिर ने शादी नहीं की और उनकी जिंदगी बेहद तन्हा रही। साहिर का साथ किसी ने नहीं दिया मगर वे नगमों से लोगों की वाहवाहियां लूटते रहे। तन्हाई और प्रेम के अभाव में साहिर का स्वभाव विद्रोही हो गया था। पहले अमृता प्रीतम के साथ प्यार की असफलता और इसके बाद गायिका और अभिनेत्री सुधा मल्होत्रा के साथ भी एक असफल प्रेम से जमीन पर सितारों को बिछाने की हसरत अधूरी रह गई। इसका जिक्र साहिर के इस गाने में पूरी तरह उभरता है ‘तुम अगर साथ देने का वादा करो... ‘ मैं अकेला बहुत देर चलता रहा, अब सफर ज़िंदगानी का कटता नहीं’। साहिर अपने अकेलेपन और फिक्र को शराब और सिगरेट के धुंए में उड़ाते चले गए। अंतत: 25 अक्टूबर 1980 को हार्ट अटैक होने से साहिर लुधियानवी हमेशा के लिए इस दुनिया को अलविदा कह गए।

आइये याद करें साहिर साहब को उनके कुछ यादगार गीतों को सुनकर -


Friday, September 26, 2008

बेकरार कर के हमें यूँ न जाइए, आप को हमारी कसम लौट आइए

हेमंत कुमार की 19वीं बरसी पर अनिता कुमार की ख़ास पेशकश


आज 26 सितम्बर, हेमंत दा की 19वीं पुण्यतिथि। बचपन की यादों के झरोंखों से उनकी सुरीली मदमाती आवाज जहन में आ-आ कर दस्तक दे रही है। पचासवें दशक के किस बच्चे ने 'गंगा-जमुना' फ़िल्म का उनका गाया ये गीत कभी न कभी न गाया होगा!
"इंसाफ़ की डगर पे बच्चों दिखाओ चल के, ये देश है तुम्हारा"।

हेमंत कुमार
हेमंत कुमार मुखोपाध्य जिन्हें हम हेमंत दा के नाम से जानते हैं, 16 जून 1920 को वाराणसी के साधारण से परिवार में जन्में लेकिन बचपन में ही बंगाल में स्थानातरित हो लिए। उनके बड़े भाई कहानीकार थे, माता पिता ने सपना देखा कि कम से कम हेमंत इंजीनियर बनेगें। लेकिन नियति ने तो उनकी तकदीर में कुछ और ही लिखा था। औजारों की टंकार उनके कवि हृदय को कहां बाँध पाती, कॉलेज में आते न आते वो समझ गये थे कि संगीत ही उनकी नियति है और महज तेरह वर्ष की आयु में 1933 में ऑल इंडिया रेडियो के लिए अपना पहला गीत गा कर उन्होंने गीतों की दुनिया में अपना पहला कदम रखा और पहला फ़िल्मी गीत गाया एक बंगाली फ़िल्म 'निमयी संयास' के लिए।

1943 में आये बंग अकाल ने उस समय के हर भारतीय पर अपनी अमिट छाप छोड़ी थी। रबींद्र संगीत का ये महारथी उससे कैसे अछूता रहता। 1948 में उसी अकाल से प्रेरित होकर उन्होंने सलिल चौधरी का लिखा एक गैर फ़िल्मी गीत गाया "गणयेर बधु" । इस गाने से हेमंत दा और सलिल चौधरी जी को बंगाल में इतनी प्रसिद्धी मिली कि फिर कभी पीछे मुड़ कर न देखा, बंगाली फ़िल्मों में बतौर गायक उन्हें टक्कर देने वाला कोई न था।

1951 में उनके मित्र हेमेन गुप्ता बंगाल से बम्बई की ओर चल दिये हिन्दी फ़िल्मों में अपना हाथ आजमाने। हेमेन ने "आनंदमठ" बनाने का फ़ैसला किया और जब उसमें संगीत देने की बात आयी तो उन्होंने हेमंत दा को याद किया। उनके इसरार पर हेमंत दा कलकत्ता से बम्बई आ गये और पहली बार किसी फ़िल्म का संगीत दिया।

सुजलाम-सुफलाम सुनें
देश प्रेम पर आधारित ये फ़िल्म तो इतनी ज्यादा न चली लेकिन लता जी से गवाया हेमंत दा का गाना "सुजलाम सुफलाम…" कौन भूल सकता है। समय के साथ नयी पीढ़ी के संगीत की बदलती रुचि के चलते ये गाना अब रेडियो में भी इतना नहीं बजता। कुछ महीने पहले जब यूनूस जी ने अपने ब्लोग पर इस गाने का जिक्र किया और इसे अपने ब्लोग पर सुनवाया तो इस गाने को वहां से उठाये बिना रह न सके और आज भी अक्सर ये गीत हमारी शामों का साथी बनता है। जितने अच्छे बोल हैं उतना ही मधुर संगीत, और लता जी की आवाज गीत की आत्मा बन गयी।

गीत सुनें

छुपा लो यूँ दिल में


इंसाफ की डगर पे


बेक़रार करके हमें


ज़रा नज़रों से कह दो जी


तुम पुकार लो


ना तुम हमें जानो


जाने वो कैसे लोग थे


तेरी दुनिया में जीने से


या दिल की सुनो
वो कहते हैं न बम्बई है ही ऐसा मायाजाल, जो एक बार आया वो फ़िर जिन्दगी भर मुम्बई का ही हो कर रह जाता है। हेमंत दा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। आनंदमठ से बतौर संगीतकार शुरु हुआ सफ़र कब गायकी की तरफ़ मुड़ गया पता ही न चला। हेमंत दा उस समय के बहुचर्चित हीरो देवानंद की आवाज बन गये। सचिन देव बर्मन के संगीत में पगी उनकी आवाज हर रंग बिखरा सकती थी।
'बीस साल बाद' फ़िल्म के शोख गाने

"बेकरार कर के हमें यूं न जाइए, आप को हमारी कसम लौट आइए"और

" जरा नज़रों से कह दो जी"
आज भी दिल को गुदगुदा देते हैं तो दूसरी तरफ़ 'खामोशी' फ़िल्म में धर्मेंद्र की आवाज बन वहीदा से इसरार " तुम पुकार लो" ,

'ममता' फिल्म का लता मंगेशकर के साथ गाया मेलोडियस गीत 'छुपा लो यूँ दिल में प्यार मेरा' हर एक की जुबान पर है।

'बात रात की' फ़िल्म से "न तुम हमें जानो न हम तुम्हें जानें मगर लगता है कुछ ऐसा मेरा हमदम मिल गया"
इश्क और रोमांस की पराकाष्ठा है।
गुरुदत्त की प्यासा में "जाने वो कैसे लोग थे जिनको…"
या फ़िर हाऊस नं॰ 44 का गीत
"तेरी दुनिया में जीने से तो बेहतर है कि मर जाएं"
सुनते-सुनते किस के मुंह से आह न निकलेगी.

और 'अनुपमा' का 'या दिल की सुनो दुनिया वालों॰॰' धीर-गंभीर मगर मधुर गीत के जिक्र के बिना यह आलेख तो अधूरा ही रहेगा।

गीता दत्त के साथ
जहां बम्बई में आनंदमठ के बाद अनुपमा, जाग्रती, मां-बेटा, मंझली दीदी,साहब बीबी और गुलाम, नागिन जैसी फ़िल्मों में हिट संगीत दे कर हेमंत दा संगीतकार और देवानंद, धर्मेंद्र जैसे कई चोटी के नायकों की आवाज बन सफ़ल गीतकार बन गये थे वहीं उन्होनें बंगाली फ़िल्मों में भी अपनी जादुई आवाज से धूम मचा रखी थी। 1955 में जहां उन्हें हिन्दी फ़िल्मों में बतौर संगीतकार पहला फ़िल्म फ़ेअर अवार्ड मिला, वहीं उसी साल बंगाल के मशहूर नायक उत्तम कुमार के लिए पाशर्व गायक बन उन्होनें एक नयी साझेदारी की नींव रखी जो लंबे दशक तक चली। उनके गैर फ़िल्मी गीत भी उतने लोकप्रिय हुए जितने फ़िल्मी गीत। उनका परचम बंगाली और हिन्दी दोनों फ़िल्म जगत में समान रूप से लहराया। पर हेमंत दा को कहां चैन था। 1959 में उन्होंने अपनी पहली बंगाली फ़िल्म "नील अकशेर नीचे" फ़िल्म बना कर फ़िल्म प्रोडकशन में हाथ आजमाया। कहानी कलकत्ता में रह रहे चीनी फ़ेरीवालों की मुसीबतों पर आधारित थी। पहली ही पिक्चर राष्ट्रपति स्वर्ण पदक से सम्मानित हुई। फ़िर तो उन्होंने हिन्दी में भी कई यादगार फ़िल्में बनायी जैसे बीस साल बाद, कोहरा, बीबी और मकान, फ़रार, राहगीर, और खामोशी, बालिका-वधू। पर हर शह और हर शक्स जो आता है उसे जाना होता है, अस्सी के दशक में उन्हें पहला दिल का दौरा पड़ा। इस दिल के दौरे ने कइयों का दिल तोड़ दिया। हेमंत दा की आवाज पर इस दौरे का गहरा असर पड़ा। इसके बावजूद वो कई एलबम निकालते रहे, म्यूजिक कॉन्सर्टस में भाग लेते रहे लेकिन स्वास्थय उनका साथ नहीं दे रहा था और 26 सितम्बर 1989 को संगीत की दुनिया का ये चमकता हुआ सितारा सदा के लिए लुप्त हो गया और छोड़ गया पीछे यादें। उनके गये 19 साल हो गये लेकिन आज भी ग्रामोफ़ोन कंपनी उनके गाये गीतों की नयी एलबम हर साल निकालती है और हाथों हाथ लपकी जाती है।
हेमंत दा शारीरिक रूप से अब हमारे बीच नहीं है पर उनकी आवाज हमारे दिलों पर आज भी राज करती है। कितने ही गाने हैं जो यहां जोड़ नहीं पाये लेकिन वो मेरी यादों में हिलोरे ले रहे हैं। साहब बीबी गुलाम के गाने कोई भूल सकता है क्या?

----अनिता कुमार


हेमंत कुमार- संक्षिप्त परिचय


हेमंत दा
हिन्दी फ़िल्म जगत में बहु प्रतिभाशाली (multi talented) कलाकारों के नामों की सूचि में हेमंत कुमार या हेमंतदा का नाम सम्मान से लिया जाता है| बंगाली परिवार में जन्मे हेंमत कुमार का नाम हेमंत कुमार मुखोपाध्याय था| अभियात्रिकी (engineering) की पढ़ाई छोड़ संगीत की दुनिया को जानने निकले हेमंत पूरी तरह से संगीत के लिए ही बने रहे | १९३३ से आल इंडिया से शुरुवात करके हेमंत दा ने विदेशों तक सफर तय किया| शुरुवाती बरसों में केवल बंगाली भाषा कि फिल्मों के लिए ही काम करते रहे| गीत गाये, संगीत बनाया| गैर बंगाली फिल्मों में लोकप्रियता इतनी थी कि मशहूर संगीत कंपनी Grampphone Company Of India (GCI) प्रति वर्ष उनका एक गीतों का संग्रह प्रस्तुत करती रही| यह उनके ना रहने के कई सालों तक होता रहा |

बंगला का कोई गायक भला रविन्द्र संगीत से अनछुया कैसे रह सकता है? हेमंत दा ने भी इसके गीत गाये| बंगला फिल्मो में भी गाये| खासकर बंगला के गीत-संगीत के लिए वे मशहूर रहे| बतौर संगीतकार उन्होंने १९४७ में बंगला फ़िल्म 'अभियात्री' में काम किया| १०० से अधिक बंगला फिल्मों में उन्होंने गीत-संगीत के लिए काम किए| बंगाल के इस अनोखे रत्न ने हिन्दी फिल्मो में भी प्रयोग किए|

कुछ अमर कृतियाँ -
प्यासा का गीत - जाने वो कैसे लोग थे ..... या फ़िर ये गीत - ये नयन डरे डरे .... ये जाम भरे भरे ....खामोशी का गीत 'तुम पुकार लो॰॰तुम्हारा इंतज़ार है' । हिन्दी फ़िल्म नागीन (१९५१) में उन्हें संगीत के लिए फ़िल्म फेयर पुरस्कार मिला| उन्होंने सलील चौधरी , सचिन देव बर्मन, गुरुदत्त, देव आनद आदि प्रसिद्ध कलाकारों के साथ काम किया| बंगला गायिका बेला जी के साथ शादी की| उनकी दो संतानें भी संगीत से ही जुड़ी रहीं| अपने जीवन के अन्तिम कुछ बरसों में उन्होंने देश-विदेश में स्टेज शो किए, दूरदर्शन और रेडियो पर अपने कार्यक्रम प्रतुत किए| २६ सितम्बर १९८९ को इस सफल कलाकार ने हमसे विदाई ली |
आज के इस दिन पर हम उनको अपनी भाव पूर्ण श्रद्धाँजली देते हैं|

हिन्दी फिल्मों जिनमें संगीत कार के रूप में काम किए -
खामोशी, गर्ल फ्रेंड, हमारा वतन, नागिन, जागृति, बंदिश, साहिब बीबी और गुलाम , एक झलक , फरार, आनंद मठ, अनजान, अनुपमा, इंसपेक्टर, लगान, पायल, रहीर, सहारा, ताज, उस रात के बाद, यहूदी की लड़की, दो दिल, दो दुनी चार, एक ही रास्ता, फेर्री, इन्साफ कहाँ है, हिल स्टेशन, फैशन, चाँद, चम्पाकली, बंधन, बंदी, सम्राट , सन्नाटा आदि।

अवनीश एस॰ तिवारी की पेशकश

Wednesday, September 17, 2008

गए दिनों का सुराग लेकर...आशा जी और गुलाम अली

पूरे कायनात की मौसिकी यहां इस परिवार में बसती है...

चूँकि इस पूरे माह हम बात कर रहे हैं मंगेशकर बहनों की, जिनकी दिव्य आवाजों ने हिन्दी फ़िल्म संगीत का आकाश सजाया है. इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए आज आवाज़ पर, दिलीप कवठेकर आयें हैं, आशा जी के गुलाम अली साहब के साथ बनी एल्बम "मेराज़-ए-ग़ज़ल" की रिकॉर्डिंग के समय का एक संस्मरण लेकर, पढ़ें और आनंद लें इस बेमिसाल सी ग़ज़ल का.

मेरा बचपन का मित्र है, दीपक भोरपकर.इन्दौर में बचपन में साथ साथ गाना बजाना करते थे. वह तबला बजाता था, मै गाना.

बडे दिनों बाद लगभग २५ वर्षों बाद पुनर्मिलन हुआ तो पता चला की जनाब मुंबई में है, और हृदयनाथ मंगेशकर के साथ कार्यक्रम में बजाते भी है. यह भी पता चला की वो लताजी और आशा जी को तबले पर रियाज़ भी करवाता है.वे दोनो लगभग रोज़ रियाज़ करती थी उन दिनों में भी.

उन दिनों आशा जी का गुलाम अली साहब के साथ जो एलबम निकल रहा था उस के लिए रियाज़ चल रहा था. दीपक उसी में बहुत व्यस्त था. दुर्भाग्यवश ,संभव होते हुए भी मेरा वहां जाने का संयोग नही बन पाया. लेकिन बातों बातों में उन दिनों का यह ताज़ा संस्मरण उसने सुनाया जो आप के लिये प्रस्तुत है.

"गये दिनों का सुराग लेकर, किधर से आया, किधर गया वो..."

इस गज़ल की बंदिश गुलाम अली जी नें आशा जी को पहली बार सुनाई. इसमें सुर संयोजन बडा ही क्लिष्ट है, हरकतें और मुरकीयां भी काफ़ी उतार चढाव में. गुलाम अली जी नें पहले थोडी सादी ही धुन दी यह सोच कि आशाजी को कठिनाई होगी गाने में. बाद में जमा तो थोडी हरकतें बढा देंगे. तो आशाजी नें बडे विनय से कहा कि आपकी जो भी बंदिश होगी मुझे गाने में कोई तकलीफ़ नही होगी. वैसे भी मेरे भाई भी इस तरह की ही धुनें बनाया करते है. मै मेहनत करूंगी ,आप मुझे एक दिन दें बस.


दूसरे दिन जब गुलाम अली वापिस आये तो पाया की आशाजी नें उनकी धुन में ना सिर्फ़ प्रवीणता हासिल कर ली थी, मगर अपनी तरफ़ से कुछ और खास 'चीज़ें' डाल दी, जिससे ग़ज़ल में और जान आ गयी थी. गुलाम अली साहब बेहद खुश हुए. वो भी इस महान गायिका की गायन प्रतिभा के कायल हुए बिना नही रह सके.

उसके बाद जब गुलाम अली जी नें हृदयनाथ मंगेशकर से मिल कर उनसे उनकी कुछ खास धुनें सुनी तो वे उनके भी कायल हो गये.कहने लगे, कि पूरे कायनात की मौसिकी यहां इस परिवार में बसती है!!

गुलाम अली साहब ग़लत नही थे, इस बात की एक बार फ़िर पुष्टि करती है ये ग़ज़ल आशा जी की सुरीली आवाज़ में. आप भी सुनें -



प्रस्तुति- दिलीप कवठेकर

Thursday, September 4, 2008

लता संगीत उत्सव ( १ ) - पंकज सुबीर

रूह की वादियों में बह रही दिलरुबा नदी

ख़ैयाम साहब ने जितना भी संगीत दिया है वो भीड़ से अलग नज़र आता है । उनके गीत अर्द्ध रात्रि का स्वप्न नहीं हो कर दोपहर की उनींदी आंखों का ख्वाब हैं जो नींद टूटने के बाद कुछ देर तक अपने सन्नाटे में डुबोये रखते हैं । आज जिस गीत की बात हो रही है ये गीत फ़िल्म "शंकर हुसैन" का है । "शंकर हुसैन" जितना विचित्र नाम उतने ही मधुर गीत । दुर्भाग्य से फ़िल्म नहीं चली और बस गीत ही चल कर रह गये । फ़िल्म में ''कैफ भोपाली'' का लिखा गीत जो लता मंगेशकर जी ने ही गाया था ''अपने आप रातों में '' भी उतना ही सुंदर था जितना कि ये गीत है, जिसकी आज चर्चा होनी है । हम आगे कभी ''अपने आप रातों में '' की भी बातें करेंगें लेकिन आज तो हमको बात करनी है ''आप यूं फासलों से ग़ुज़रते रहे दिल से क़दमों की आवाज़ आती रही'' की । लता जी की बर्फानी आवाज़, जांनिसार अख्तर ( जावेद जी के पिताजी) के शबनम के समान शब्दों को, खैयाम साहब की चांदनी की पगडंडी जैसी धुन पर इस तरह बिखेरती हुई गुज़र जाती है कि समय भी उस आवाज़ के पैरों की मधुर आहट में उलझा अपनी चाल भूलता नज़र आता है ।

इस गीत के भावों को पहचानना सबसे मुश्किल कार्य है कभी यह करुण रस में भीगा होता है तो अगले ही अंतरे में रहस्यवाद की छांव में खड़ा हो जाता है, या एक पल में ही सम्‍पूर्ण श्रृंगार और कुछ भी नहीं । चलिये हम भी लताजी, खैयाम साहब और जांनिसार अख्तर साहब के साथ एक मधुर यात्रा पर चलें । सुनतें हैं ये गीत -



इसकी शुरूआत होती है लता जी के मधुर आलाप के साथ जो शत प्रतिशत कोयल की कूक समेटे है और रूह को आम्र मंजरियों के मौसम का एहसास कराता है । मुखड़े के शुरूआत में एक रहस्य है जो मैं केवल इसलिये नहीं सुलझा पा रहा हूं कि मैंने फ़िल्म नहीं देखी है । रहस्य ये है कि ''आप यूं '' कहते समय लता जी ने हल्‍की सी हंसी का समावेश किया है । खनकती हंसी से शुरू होते हुए मुखड़े की बानगी देखिये -

''( हंसी) आप यूं फ़ासलों से ग़ुज़रते रहे...2
दिल से क़दमों की आवाज़ आती रही
आहटों से अंधेरे चमकते रहे
रात आती रही रात जाती रही
आप यूं ....''

शायद आपको भी इस रहस्यवाद में गुलज़ार साहब की मौज़ूदगी का एहसास हो रहा होगा । जांनिसार अख्तर साहब ने आहटों से अंधेरों को कुछ वैसे ही चमकाया है जैसे गुलज़ार साहब ने आंखों की महकती खुशबू को देखा था । ''आप यूं फ़ासलों से ग़ुज़रते रहे. दिल से क़दमों की आवाज़ आती रही'' में ताने उलाहने का भाव है, या शिकायत है किंतु फिर उस हंसी का क्या ? जो मुखड़े को शुरू करती है और अगले ही क्षण ''आहटों से अंधेरे चमकते रहे रात आती रही रात जाती रही'' में रहस्यवाद का घना कुहासा छा जाता है मानो महादेवी वर्मा का उर्दू रूपांतरण हो गया हो।

लता जी की हल्‍की सी गुनगुनाहट के बाद पहला अंतरा आता है

''गुनगुनाती रहीं मेरी तनहाईयां...2
दूर बजती रहीं कितनी शहनाईयां
जिंदगी जिंदगी को बुलाती रही
आप यूं ( हंसी) फ़ासलों से ग़ुज़रते रहे
दिल से क़दमों की आवाज़ आती रही
आप यूं....

शायद ये दर्द ही है जो अपनी तनहाईयों के गुनगुनाने की आवाज़ को सुन रहा है । क्‍योंकि दूर से आती शहनाईयों की आवाज़ पीड़ा के एहसास को और गहरा कर देती है । जिंदगी ख़ुद को बुला रही है, या अपने सहभागी को कुछ स्पष्ट नहीं है । आप जब तक पीड़ा के मौज़ूद होने के निर्णय पर पहुंचते हैं, तब तक वापस मुखड़े के फासलों शब्द में फिर वही हंसी मौज़ूद नज़र आती है आपके निर्णय का उपहास करती ।

अगला अंतरा गुलज़ार साहब की उदासी और महादेवी वर्मा के सन्नाटों का अद्भुत संकर है

कतरा कतरा पिघलता रहा आसमां ...2
रूह की वादियों में न जाने कहां इक नदी....
हक नदी दिलरुबा गीत गाती रही
आप यूं फ़ासलों से ग़ुज़रते रहे
दिल से क़दमों की आवाज़ आती रही
आप यूं....( हंसी)

आज तक कोई नहीं समझ पाया के आसमान जब शबनम के रूप में पिघलता है तो इसमें करुणा होती है या कोई ख़ुशी? यहां भी आसमां के कतरा कतरा पिघलने पर अधिक व्यक्ख्या नहीं की गई है क्‍योंकि अगले ही क्षण लता जी की आवाज़ आपका हाथ थाम कर रूह की वादियों में उतर जाती है । वैसे इस गाने को आंख बंद कर आप सुन रहे हैं तो पूरे समय आप रूह की वादियों में ही घूमते रहेंगें । और वो दिलरुबा नदी ? निश्चित रूप से लता जी की आवाज़ । मुखड़े के दोहराव के बाद आये ''आप यूं '' के बाद फिर एक सबसे स्पष्ट हंसी ....?

तीसरा अंतरा गीत का सबसे ख़ूबसूरत अंतरा है ।

आपकी नर्म बांहों में खो जायेंगे..2
आपके गर्म ज़ानों पे सो जायेंगे--सो जायेंगे
मुद्दतों रात नींदे चुराती रही
आप यूं फ़ासलों से ग़ुज़रते रहे
दिल से क़दमों की आवाज़ आती रही
आप यूं....( हंसी) आप यूं ....

शायद किसी भटकती हुई आत्मा के अपने पुनर्जन्‍म पाए हुए प्रेमी से पुर्नमिलन के लिये ही ये गीत लिखा गया है । उसका प्रेमी अभी सोलह साल का किशोर ही है जो उसके होने का एहसास भी नहीं कर पा रहा है । चंदन धूप के धुंए की तरह उड़ती वो रूह उस किशोर की नर्म बांहों के आकाश या गर्म ज़ानों ( कंधे) की धरती पर अपनी मुक्ति का मार्ग ढूँढ रही है । थकी सी आवाज़ में लताजी जब इन शब्दों को दोहराती हैं ''सो जायेंगे, सो जायेंगे'' तो जन्मों जन्मों की थकान को स्पष्ट मेहसूस किया जो सकता है । अचानक आवाज़ रुक जाती है संगीत थम जाता है । ऐसा लगता है मानो उस आत्मा को अपने हल्‍की हल्‍की मूंछों वाले किशोर प्रेमी के गर्म ज़ानों पर मुक्ति मिल ही गई है, किंतु क्षण भर में ही सन्नाटा टूट जाता है और पीड़ा अपनी जगरातों भरी रातों का हिसाब देने लगती है ''मुद्दतों रात नींदे चुराती रही '' । फिर वही मुखड़ा और ''आप यूं '' में फिर वही हंसी । और सब कुछ ग़ुज़र जाता है । रह जाते हैं आप ठगे से, लता जी, खैयाम साहब और जां निसार अख्तर साहब तीन मिनट में आपको सूफी बना जाते हैं ।

1975 में ये फ़िल्म 'शंकर हुसैन" आई थी, और आज लगभग 33 साल बीत गये हैं किंतु इस गीत के आज भी उतने ही दीवाने हैं जो 33 साल पहले थे. अंत में इस गीत को सुनने के बाद इसके दीवानों की जो अवस्था होती है उसको शंकर हुसैन का लता जी का दूसरा गीत अच्छी तरह से परिभाषित करता है -

''अपने आप रातों में चिलमनें सरकती हैं

चौंकते हैं दरवाज़े सीढि़यां धड़कती हैं ''


प्रस्तुति - पंकज सुबीर

Monday, September 1, 2008

मासिक टॉप 10 पन्ने

पाठकों का रूख क्या है? यह जानने के लिए यह टेबल उपयोगी है। हम डायरेक्ट विजीट के आधार पर प्रत्येक माह के शीर्ष १० पोस्टों को प्रदर्शित कर रहे हैं।

आवाज़ पर जुलाई २००८ के टॉप १० पन्ने

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1बढ़े चलो452818
2संगीत दिलों का उत्सव है404772
3आवारादिल400583
4तेरे चेहरे पे263422
5अलविदा इश्मित158179
6पॉडकास्ट कवि सम्मेलन155210
7सीखिए गायकी के गुर130160
8मानसी का साक्षात्कर107172
9नैना बरसे रिमझिम-रिमझिम98163
10झूमो रे दरवेश76118

Stats from 1 July 2008 to 31 July 2008
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आवाज़ पर अगस्त २००८ के टॉप १० पन्ने

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1मैं नदी366612
2मेरे सरकार265410
3चले जाना263448
4जीत के गीत225452
5बे-इंतहा170312
6ऑनलाइन काव्यपाठ और अभिनय का मौका140208
7आसाम के लोकसंगीत का ज़ादू132170
8वो खंडवा का शरारती छोरा130199
9सूफी संगीत भाग दो112151
10लौट चलो पाँव पड़ूँ तोरे श्याम83124

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आवाज़ पर सितम्बर २००८ के टॉप १० पन्ने

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1कहने को हासिल सारा जहाँ था304351
2चलो एक बार फिर से265329
3अहमद फ़‌राज़ की शायरी279321
4दोस्तों ने निभा दी दुश्मनी प्यार से254288
5प्रेमचंद की कहानी 'प्रेरणा'237264
6ओ मुनिया216234
7कोई ना रोको दिल की उड़ान को॰॰157178
8गाइए गणपति जगवंदन135168
9हाहाकार और बालिका-वधू122148
10सच बोलता है मुँह पर120136

Stats from 1 September 2008 to 30 September 2008
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आवाज़ पर अक्टूबर २००८ के टॉप १० पन्ने

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1करवाचौथ पर कविता तथा संगीतबद्ध गीत310367
2राकेश खंडेलवाल की पुस्तक का विमोचन222271
3ऐसा नही कि आज मुझे चाँद चाहिए221265
4डरना-झुकना छोड़ दे191247
5माह का पॉडकास्ट कवि सम्मेलन179210
6जी॰बी॰ रोड पर एक फिल्म195208
7सूरज, चंदा और सितारें158186
8आखिरी बार बस, तेरा दीदार160185
9सांसों की माल में सिमरूँ मैं94118
10बेकरार कर के हमें यूँ न जाइए89102

Stats from 1 October 2008 to 31 October 2008
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आवाज़ पर नवम्बर २००८ के टॉप १० पन्ने

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1छठ-पर्व विशेष पृष्ठ226269
2हुस्न205237
3उड़ता परिंदा169192
4पाकिस्तानी बैंड गीत-माहिया119134
5तू रूबरू89130
6प्रेमचंद की कहानी 'देवी'95116
7सुनीता यादव का साक्षात्कार91106
8पर्यावरण बचाओ- Go Green86102
9षड़ज ने पायो ये वरदान6488
10प्रेमचंद की कहानी 'वरदान'7186

Stats from 1 October 2008 to 31 October 2008
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Sunday, August 10, 2008

लौट चलो पाँव पड़ूँ तोरे श्याम-रफ़ी साहब का एक नायाब ग़ैर फ़िल्मी गीत

विविध भारती द्वारा प्रसारित किया जाने वाला ग़ैर-फ़िल्मी यानी सुगम संगीत रचनाओं का कार्यक्रम रंग-तरंग सुगम संगीत की रचनाओं को प्रचारित करने में मील का पत्थर कहा जाना चाहिये. इस कार्यक्रम के ज़रिये कई ऐसी रचनाएं संगीतप्रेमियों को सुनने को मिलीं हैं जिनके कैसेट अस्सी के दशक में बड़ी मुश्किल से बाज़ार में उपलब्ध हो पाते थे. ख़ासकर फ़िल्म जगत की कुछ नायाब आवाज़ों मो.रफ़ी, लता मंगेशकर, आशा भोसले, गीता दत्त, सुमन कल्याणपुरकर, मन्ना डे, महेन्द्र कपूर, उषा मंगेशकर, मनहर, मुबारक बेगम आदि के स्वर में निबध्द कई रचनाएं रंग-तरंग कार्यक्रम के ज़रिये देश भर में पहुँचीं.

संगीतकार ख़ैयाम साहब ने फ़िल्मों में कम काम किया है लेकिन जितना भी किया है वह बेमिसाल है. उन्होंने हमेशा क्वॉलिटी को तवज्जो दी है. ख़ैयाम साहब ने बेगम अख़्तर, मीना कुमारी और मोहम्मद रफ़ी साहब को लेकर जो बेशक़ीमती रचनाएं संगीत जगत को दीं हैं उनमें ग़ज़लें और गीत दोनो हैं. सुगम संगीत एक बड़ी विलक्षण विधा है और हमारे देश का दुर्भाग्य है कि फ़िल्म संगीत के आलोक में सुगम संगीत की रचनाओं को एक अपेक्षित फ़लक़ नहीं मिल पाया है.

संगीतकार ख़ैयाम
ख़ैयाम साहब की संगीतबध्द और रफ़ी साहब के स्वर में रचा ये गीत (क्षमा करें! मैं इसे भजन नहीं कह सकता) गोपी भाव की पराकाष्ठा को व्यक्त कर रहा है. राजस्थानी जी ने कृष्ण के विरह को जो शब्द दिये हैं वह मन को छू जाते हैं, और कम्पोज़िशन देखिये , सारे स्वर ऐसे चुने हैं ख़ैयाम नें कि अपने आप ही कविता की सार्थकता समृध्द हो गई है. रफ़ी साहब शब्द को अपने कंठ से ख़ुद की आत्मा में उतार लेते हैं...गोया स्वयं गोपी बन गए हों और ब्रज की गलियों में अपने कान्ह कदंब के नीचे बैठ भीगी आँखों से टेर लगा रहे हों....पत्ती-पत्ती,फूल-फूल और कूल-कूल (ठंडा ठंडा नहीं, जमुना का किनारा) में कृष्ण को देखते रफ़ी ब्रज के कण कण से प्रार्थित हैं..... लौट चलो...पाँव पडूँ तोरे श्याम.

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