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Sunday, September 14, 2008

आज हिन्दी पर 3:30 घण्टे ऑनलाइन चर्चा हुई

आज यानी १४ सितम्बर २००८ को हिन्द-युग्म ने एक ऑनलाइन परिचर्चा का आयोजन किया जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ॰ श्याम सखा 'श्याम' ने की। हिन्द-युग्म ने स्काइपी (Skype) पर ऑनलाइन परिचर्चा करके इस दिशा में अनूठी पहल की। परिचर्चा के लिए सुबह १० से शाम ४ बजे तक का समय निर्धारित था। लेकिन चूँकि पहला प्रयास था, बहुत से लोगों के माइक में समस्याएँ थीं, सरल ट्यूटोरियल उपलब्ध कराने के बाद भी लोग स्काइपी का ठीक तरह से इस्तेमाल नहीं कर पा रहे थे, इसलिए हम परिचर्चा को सुबह १० बजकर ५० मिनट से दोपहर २ बजकर ३० मिनट तक करा पाये। चूँकि हमने इसकी शुरूआत हिन्दी दिवस से की, इसलिए चर्चा के केन्द्र में 'हिन्दी का वर्तमान और भविष्य' रहा। दिल्ली में बम ब्लॉस्ट होने और रविवार की छुट्टी होने की वजह बहुत से ऐसे परिचर्चाकार भी नहीं आ पाये जिन्होंने आवेदन फॉर्म भरकर भाग लेने की पुष्टि की थी।

हमने वाराणसी की डॉ॰ शीला सिंह, दिल्ली से सुनीता शानू, दिल्ली से ही सजीव सारथी, शैलेश भारतवासी और रोहतक से डॉ॰ श्याम सखा 'श्याम' के साथ इस कार्यक्रम की शुरूआत की।

फिर हमसे अमेरिका से रिपुदमन पचौरी, दिल्ली से अविनाश वाचस्पति और राजीव तनेजा जुड़े। कुछ देर के बाद बोकारो से पारूल और जौनपुर से शिखा मिश्रा का परिचर्चा में पर्दापण हुआ। लेकिन इसी बीच तकनीकी कारणों से सुनीता शानू, रिपुदमन पचौरी केवल हमें सुन पा रहे थें, हम उनकी बातें नहीं सुन पा रहे थे। शैलेश भारतवासी उनके लिखित संदेशों को गौष्ठी में पढ़कर सुनाते रहे।

फरीदाबाद से शोभा महेन्द्रू काफी देर तक इस कार्यक्रम में बनी रहीं। अमेरिका से बिस्वजीत भी इस परिचर्चा में शामिल हुए। कुछ देर के लिए पुणे से अनिरूद्ध शर्मा और सतीश सक्सेना का कार्यक्रम में जुड़ना हुआ।

शैलेश भारतवासी ने ईमेल द्वारा प्राप्त सभी संदेशों को (जो परिचर्चा और हिन्दी के संदर्भ में थीं, पढ़कर सुनाया और उपस्थित टिप्पणीकारों के विचार लिए)। हमें उमेश चतुर्वेदी, जय नारायण त्रिपाठी, अमर चंद, विवेक रंजन श्रीवास्तव, राजेश कुमार पर्वत, शैलेश जमलोकि, मयंक सक्सेना, नरेन्द्र कुमार चक्रवर्ती, वीणा, ब्रह्मनाथ त्रिपाठी, गुलशन सुखलाल, शशिकांत शर्मा, शौएब, कमलप्रीत सिंह, प्रभा पी॰ शर्मा, डॉ॰ मानधाता सिंह, शालिनी गुप्ता, प्रदीप मानोरिया, देवेन्द्र कुमार मिश्रा, आलोक सिंह साहिल, राजेश आदि के आवेदन पत्र और सवाल तथा विचार प्राप्त हुए थे।

अनुभूति-अभिव्यक्ति की संपादिका पूर्णिमा वर्मन भी इस गोष्ठी में शामिल होना चाहती थीं, लेकिन उनके शहर में स्काइपी ब्लॉक्ड होने से वो सम्मिलित नहीं हो सकीं। उन्होंने टेक्स्ट चैट द्वारा अपना संदेश भेजा।

हमने परिचर्चा कि रिकॉर्ड करने की कोशिश की। टुकड़ों में रिकॉर्ड कर पाये हैं कुल २ घण्टे ३० मिनट की रिकॉर्डिंग तीन खण्डों में आपके लिए यहाँ लगा रहे हैं।

भाग-1


भाग-2


भाग-3


यह तय हुआ कि इस गोष्ठी को साप्ताहिक या पाक्षिक आयोजित किया जाय (१ से २ घण्टे के लिए) ताकि ज्वलंत मुद्दों पर बहस हो सके।

हम परिचर्चा में भाग लेने सभी विद्वानों का धन्यवाद करते हैं चाहे उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से हिस्सा बने या अप्रत्यक्ष रूप से।

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