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Saturday, October 22, 2016

"पिया मिलन को जाना...", जानिये कि कैसे नृत्य के बोल रूपान्तरित हो गए एक गीत में


एक गीत सौ कहानियाँ - 96
 

'पिया मिलन को जाना...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना
रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 96-वीं कड़ी में आज जानिए 1939 की फ़िल्म ’कपालकुंडला’ के प्रसिद्ध गीत "पिया मिलन को जाना..." के बारे में जिसे पंकज मल्लिक ने गाया था। गीत लिखा है आरज़ू लखनवी ने और संगीत दिया है पंकज मल्लिक ने। 

बंगाल के प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित एक प्रसिद्ध उपन्यास है ’कपालकुंडला’
बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय
जो 1866 में प्रकाशित हुई थी। यह जंगलों, तान्त्रिकों और ग्रामीण परिवेश में पली-बढ़ी लड़की कपालकुंडला की कहानी है जिसे एक शहरी लड़के नबकुमार से प्रेम हो जाता है। परन्तु नबकुमार से विवाह के पश्चात कपालकुंडला शहरी जीवन को अपना नहीं पाती। ’कपालकुंडला’ बंकिम चन्द्र के श्रेष्ठ कृतियों में से एक है जिसका अंग्रेज़ी, हिन्दी, गुजराती, तमिल, तेलुगू, संस्कृत और जर्मन भाषाओं में अनुवाद हुआ है। बांगला थिएटर के अग्रदूतों में से एक गिरिश चन्द्र घोष, तथा अतुल कृष्ण मित्र ने इस उपन्यास का नाटक-रूपान्तर किया। 1874 में बंकिम चन्द्र के एक आत्मीय दामोदर मुखोपाध्याय ने ’कपालकुंडला’ उत्तर-कृति (sequel) लिखा ’मृनमयी’ के शीर्षक से। ’कपालकुंडला’ का फ़िल्म रूपान्तर एकाधिक बार हुआ है। सबसे पहली बार प्रियनाथ गांगुली के निर्देशन में 1929 में मूक फ़िल्म बनी थी ’कपालकुंडला’; इसके बाद 1933 में प्रेमांकुर अतुर्थी ने इस उपन्यास पर बांगला सवाक फ़िल्म बनाई। इसके बाद आई 1939 की हिन्दी फ़िल्म ’कपालकुंडला’ जिसे नितिन बोस और फणी मजुमदार ने निर्देशित किया। बांगला में यह फ़िल्म दो बार और बनी - 1952 में अर्धेन्दु बनर्जी के निर्देशन में और 1981 में पिनाकी भूषण मुखर्जी के निर्देशन में। 1939 की हिन्दी फ़िल्म में पंकज मल्लिक का गाया "पिया मिलन को जाना" गीत बेहद लोकप्रिय हुआ था। इसे फ़िल्म-संगीत इतिहास का एक ट्रेण्डसेटर गीत भी माना जाता रहा है। शास्त्रीय संगीत और पाश्चात्य ऑरकेस्ट्रेशन के संगम से उत्पन्न एक हल्का-फुल्का गीत, जिसकी विशेषताएँ आगे चल कर फ़िल्म-संगीत की धारा बन गई।



दूरदर्शन के बांगला चैनल DD-7 पर बरसों पुराना रेकॉर्ड किया हुआ पंकज मल्लिक का एक बांगला में श्याम-
"पिया मिलन को जाना" गीत के दृश्य; बायीं ओर पंकज मल्लिक
श्वेत साक्षात्कार प्रसारित हुआ था जिसमें उन्होंने इस गीत के बनने की कहानी बताई थी। उसी बांगला में बताये कहानी का हिन्दी अनुवाद ये रहा - "पिया मिलन को जाना, इसके बनने की कहानी आपको शायद मालूम न हो, यह एक आश्चर्यजनक घटना थी। खेमचन्द प्रकाश जी, जिन्होंने बम्बई में ’तानसेन’ फ़िल्म की थी, खेमचन्द प्रकाश का असली परिचय था एक कोरियोग्राफ़र का। बहुत ही बेहतरीन नृत्य शिक्षक। बहुत ही बेहतरीन! और ख़ास तौर से कथक नृत्य में तो उनके जैसा कोई नहीं। ’कपालकुंडला’ में वो कोरिओग्राफ़र थे। उन्होंने कथक नृत्य का एक बोल अभिनेत्री कमलेश कुमारी को सिखाया था एक सीन के लिए। और ख़ुद तबला बजाना जानते थे, तो उन कथक के बोलों पर तबला बजा कर, कि नृत्य के बोल भी गा रहे हैं, तबले पर ताल भी पड़ रहे हैं, और कमलेश कुमारी नाच रही हैं, कुछ इस तरह का सीन था। तब मैंने खेमचन्द जी को कहा, खेमचन्द जी ’कपालकुंडला’ में मेरे सहयोगी थे, नहीं सहयोगी नहीं, सहकारी थे। ख़ैर, मैंने उनसे कहा कि अगर इस नृत्य के बोल के उपर एक गीत तैयार हो जाए तो कैसा हो? तब निर्देशक नितिन बोस जी बोले कि फिर तो बहुत ही अच्छी बात होगी! गाना तैयार हो सकता है क्या? मैंने कहा कि कोशिश करने में कोई हर्ज नहीं है, कोशिश करके देखते हैं। तब आरज़ू साहब लखनवी, जो कवि थे, उनसे पूछा गया कि क्या नृत्य के इन बोलों और तबले के इन तालों पर किसी गीत की रचना हो सकती है भला? मुझे वो ताल याद नहीं है, हाँ, फ़लाना फ़लाना राधा, पिया मिलन को जाना। तो "राधा" बन गया "जाना"। इस तरह से कथक नृत्य के बोलों को एक फ़िल्मी गीत के रूप में रूपान्तरित कर दिया गया था।" 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




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