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Saturday, February 4, 2017

चित्रकथा - 5: गुलज़ार के गीतों में विरोधाभास


अंक - 5

गुलज़ार के गीतों में विरोधाभास

“एक पल रात भर नहीं गुज़रा...”



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं है। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। हमारी दिलचस्पी का आलम ऐसा है कि हम केवल फ़िल्में देख कर या गाने सुनने तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखते, बल्कि फ़िल्म संबंधित हर तरह की जानकारियाँ बटोरने का प्रयत्न करते रहते हैं। इसी दिशा में आपके हमसफ़र बन कर हम आ रहे हैं हर शनिवार ’चित्रकथा’ लेकर। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ के पहले अंक में आपका हार्दिक स्वागत है। 

गुलज़ार एक ऐसे गीतकार हैं जिन्होंने अपने गीतों में हिन्दी व्याकरण के अलंकारों का बहुतायात में प्रयोग किया है। रूपक और उपमा के के प्रयोगों से उन्होंने हमेशा अपने श्रोताओं को चमत्कृत तो किया ही है, कई बार उन्होंने ’विरोधाभास’ का भी प्रयोग अपने गीतों में किया है। आइए आज ’चित्रशाला’ में गुलज़ार के लिखे उन गीतों की चर्चा करें जिनमें विरोधाभास की झलक मिलती है।




 जिस तरह से अलंकार नारी की शोभा और गरिमा को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, उसी
तरह से हिन्दी काव्य और साहित्य में भी कुछ अलंकार चिन्हित हैं जिनसे भाषा और अभिव्यक्ति की शोभा बढ़ती है। अनुप्रास, उपमा, रूपक, यमक, श्लेष, उत्प्रेक्षा, अन्योक्ति, अतिशयोक्ति, संदेह, उभय और दृष्टान्त हिन्दी व्याकरण के प्रमुख अलंकार हैं। एक और अलंकार है जिसे कई बार अलंकारों की श्रेणी में शामिल किया जाता है और वह है विरोधाभास अलंकार, यानी कि विरोध का आभास कराने वाला। विरोधाभास जिसे अंग्रेज़ी में contradiction या contradictory कह सकते हैं। तो इस विरोधाभास से भी भाषा को अलंकृत किया जा सकता है। जब किसी काव्य या गद्य में कही गई दो बातें आपस में प्रतिवाद करे या एक दूसरे का विरोध करे, एक दूसरे को contradict करे, उसे विरोधाभास अलंकार कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, साहित्य में एक विरोधमूलक अर्थालंकार जिसमें वस्तुतः विरोध का वर्णन न होने पर भी विरोध का आभास होता है, उसे विरोधाभास कहते हैं। उदाहरण के रूप में, "या अनुरागी चित्त की गति समझें नहीं कोइ, ज्यों-ज्यों बूडै स्याम रंग त्यों-त्यों उज्ज्वल होइ।", यहाँ स्याम रंग (काले रंग) में डूबने पर भी उज्ज्वल (सफ़ेद) होने की बात कही गई है, इसलिए इसमें विरोधाभास है।

गीतकार गुलज़ार के अनेक गीतों में विरोधाभास के उदाहरण सुने जा सकते हैं। कुछ विरोधाभास तो ऐसे हैं जिनका उन्होंने एकाधिक बार प्रयोग किया है। इनमें से एक है "ख़ामोशियों की गूंज"। ख़ामोशी यानी चुप्पी, यानी जिसकी कोई आवाज़ नहीं, भला ख़ामोशी कैसे पुकार सकती है, ख़ामोशी कैसे गूंज सकती है, ख़ामोशी कैसे गुनगुना सकती है? इस विरोधाभास का प्रयोग गुलज़ार साहब ने पहली बार सम्भवत: 1969 की फ़िल्म ’ख़ामोशी’ के ही गीत में किया था। "हमने देखी है उन आँखों की महकती ख़ुशबू" गीत के अन्तरे में वो लिखते हैं "प्यार कोई बोल नहीं, प्यार आवाज़ नहीं, एक ख़ामोशी है सुनती है कहा करती है"। ख़ामोशी कह रही है, इसमें विरोधाभास है। इसके बाद 1975 की फ़िल्म ’मौसम’ के गीत "दिल ढूंढ़ता है" के अन्तरे में उन्होंने कहा "वादी में गूंजती हुई ख़ामोशियाँ सुने"। यहाँ गूंजती हुई ख़ामोशियाँ में विरोधाभास है। 1978 की फ़िल्म ’घर’ के गीत "आपकी आँखों में कुछ" में एक जगह वो कहते हैं "आपकी ख़ामोशियाँ भी आपकी आवाज़ है"। ख़ामोशियों की आवाज़ में विरोधाभास है। गुलज़ार के इस विरोधाभास का प्रयोग गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने कई साल बाद 2001 में आई फ़िल्म 'वन टू का फ़ोर’ के गीत "ख़ामोशियाँ गुनगुनाने लगी, तन्हाइयाँ मुसुकुराने लगी" के शुरु में किया था। इसमें तो दो दो विरोधाभास हैं - ख़ामोशियाँ के गुनगुनाने में और तन्हाइयों के मुस्कुराने में। तन्हाई दर्द का प्रतीक है, ये मुस्कुरा कैसे सकती है भला!! तन्हाई से संबंधित एक और विरोधाभास गुलज़ार ने दिया 1980 की फ़िल्म ’सितारा’ के गीत "ये साये हैं ये दुनिया है" में जब वो कहते हैं कि "भरी भीड़ में ख़ाली तन्हाइयों की" और फिर "बड़ी नीची राहें हैं ऊँचाइयों की"। 

गुलज़ार के गीतों में विरोधाभास का बहुत ही सुन्दर प्रयोग देखने/सुनने को मिलता है। एक और विरोधाभास जिसका उन्होंने एकाधिक बार प्रयोग किया है, वह है पल, समय, वक़्त को लेकर। "जाने क्या सोच कर नहीं गुज़रा, एक पल रात भर नहीं गुज़रा" (’किनारा’, 1977- इसमें विरोधाभास को किस ख़ूबसूरती से दर्शाया गया है ज़रा महसूस कीजिए। एक पल जो एक ही पल में गुज़र जाना चाहिए, उसे गुलज़ार साहब रात भर रोके रखते हैं। 1996 की फ़िल्म ’माचिस’ के मशहूर गीत "छोड़ आए हम वो गलियाँ" में गुलज़ार लिखते हैं "इक छोटा सा लम्हा है जो ख़त्म नहीं होता"। ’किनारा’ और ’माचिस’ के इन दो उदाहरणों में समानता स्पष्ट है। ये तो रही पल या लम्हे के ना गुज़रने का विरोधाभास। इसी संदर्भ में रात के ना गुज़रने को भी कई बार दर्शाया है उन्होंने। "दो नैनों में आँसू भरे हैं, निन्दिया कैसे समाये" गीत में एक पंक्ति है "ज़िन्दगी तो काटी ये रात कट जाए"। फ़िल्म ’आंधी’ के मशहूर गीत "तुम आ गए हो नूर आ गया है" में पंक्ति है "दिन डूबा नहीं रात डूबी नहीं जाने कैसा है सफ़र"; इसी फ़िल्म के अन्य गीत "तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई" में पंक्ति है "तुम जो कहदो तो आज की रात चाँद डूबेगा नहीं, चाँद को रोक लो"। इन सभी उदाहरणों में विरोधाभास का एक वलय इन्हें घेर रखा है। फ़िल्मा ’लिबास’ के "सिलि हवा छू गई" में "जितने भी तय करते गए, बढ़ते गए ये फ़ासले" में भी कुछ कुछ इसी तरह का विरोध है; तय करने पर फ़ासला कम होना चाहिए, ना कि बढ़ना चाहिए!

गुलज़ार के गीतों में विरोधाभास की फ़ेहरिस्त इतनी लम्बी है कि सबका ज़िक्र करने लगे तो पूरी की पूरी किताब बन जाएगी। फ़िल्म ’गृहप्रवेश’ के गीत "पहचान तो थी पहचाना नहीं" में तीन विरोधाभास के उदाहरण मिलते हैं। मुखड़ा ही विरोधाभास से भरा हुआ है -"पहचान तो थी पहचाना नहीं, मैं अपने आप को जाना नहीं"। पहचान होते हुए भी ना पहचानना और अपने आप को ही नहीं जानना विरोध का आभास कराता है। पहले अन्तरे की पहली पंक्ति है "जब धूप बरसती है सर पे"। बरसने का अर्थ आम तौर पर बारिश होता है। धूप जो बारिश के बिलकुल विपरीत है, वह भला कैसे बरस सकती है? बारिश से याद आया फ़िल्म ’उसकी कहानी’ के गीत "मेरी जाँ मुझे जाँ ना कहो मेरी जाँ" में एक पंक्ति है "सूखे सावन बरस गए, इतनी बार आँखों से"। यहाँ एक ही उदाहरण में दो दो विरोधाभास है। पहला यह कि सावन सूखा कैसे हो सकता है? और दूसरा यह कि अगर सावन सूखा है तो बरस कैसे सकता है? वापस आते हैं ’गृह प्रवेश’ के गीत पर। इसके दूसरे अन्तरे में कहा गया - "मैं जागी रही कुछ सपनों में, और जागी हुई भी सोई रही"। विरोधाभास से कैसा सुन्दर बन पड़ा है यह अभिव्यक्ति!

1959 की फ़िल्म ’कागज़ के फूल’ में कैफ़ी आज़मी ने लिखा था "वक़्त ने किया क्या हसीं सितम"। "हसीं सितम" के इस विरोधाभास का गुलज़ार ने भी प्रयोग किया था फ़िल्म ’किनारा’ के ही एक अन्य गीत में। "नाम गुम जाएगा, चेहरा यह बदल जाएगा" में वो कहते हैं कि "वक़्त के सितम कम हसीं नहीं"। सितम के बाद आते हैं बेवफ़ाई पर। 1980 में जब इसमाइल श्रॉफ़ की फ़िल्म ’थोड़ी सी बेवफ़ाई’ में गीत लिखने का मौक़ा गुलज़ार को मिला, तो उन्होंने इस फ़िल्म के शीर्षक गीत के रूप में एक ऐसे गीत की रचना कर डाली जो फ़िल्म की पूरी कहानी का निचोड़ बन कर रह गया। और बोल भी ऐसे चुने कि सुनने वाला वाह किए बिना न रह सके! "हज़ार राहें मुड़ के देखीं कहीं से कोई सदा न आई, बड़ी वफ़ा से निभाई तुमने हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई"। बरसों पहले राजेन्द्र कृष्ण ने लिखा था "हमसे आया ना गया, तुमसे बुलाया ना गया, फ़ासला प्यार में दोनों से मिटाया ना गया"। कुछ कुछ इसी तरह का भाव था ’थोड़ी से बेवफ़ाई’ के गीत में भी, पर बोल और भी ज़्यादा असरदार। "वफ़ा" और "बेवफ़ा" एक दूसरे के विपरीत शब्द हैं। तो फिर बड़ी वफ़ा से बेवफ़ाई को निभाना आख़िर विरोधाभास नहीं तो और क्या है!

गुलज़ार के गीतों में पैरों के नीचे कभी ज़मीन बहने लगती है तो कभी सर से आसमान उड़ जाता है। चाहे कितना भी विरोधाभास क्यों न हो, कितनी ही असंगति क्यों न हो, हर बार गुलज़ार अपने श्रोताओं को चमत्कृत कर देते हैं ऐसे ऐसे विरोधाभास देकर कि जिसकी कल्पना इससे पहले किसी ने नहीं की होगी। ’नमकीन’ फ़िल्म के गीत "राह पे रहते हैं, यादों पे बसर करते हैं" में वो लिखते हैं "उड़ते पैरों के तले जब बहती है ज़मीं"। इससे उनका इशारा है कि एक ट्रक ड्राइवर जो अपनी ट्रक दौड़ाए जा रहा है, पाँव उसका ज़मीन पर नहीं है (ट्रक पर है), मतलब वो ज़मीन से उपर है या उड़ रहा है, और चलते हुए ट्रक से नीचे देखा जाए तो प्रतीत होता है कि ज़मीं पीछे सरक रही है। भावार्थ में चाहे विरोधाभास ना हो पर शाब्दिक अर्थ को देखा जाए तो इस पंक्ति में विरोध का आभास ज़रूर है। ’बण्टी और बबली’ का गीत "चुप चुपे के" तो विरोधाभास और रूपक से भरा हुआ है। "देखना मेरे सर से आसमाँ उड़ गया है", "देखना आसमाँ के सिरे खुल गए हैं ज़मीं से", "देखना क्या हुआ है, ये ज़मीं बह रही है", "पाँव रुकने लगे, राह चलने लगी", "देखना आसमाँ ही बरसने लगे ना ज़मीं पे" - इन सभी में कहीं न कहीं विरोधाभास है।

गुलज़ार के विरोधाभास से सजे कुछ और गीत गिनवाए जाएँ। "तुम पुकार लो, तुम्हारा इन्तज़ार है" में पंक्ति है "रात ये क़रार की बेक़रार है"; ’माचिस’ के गीत "भेजे कहार" में "ठंडी नमी जलती रही"; "दो दीवाने शहर में" के गीत में "जब तारे ज़मीं पर चलते हैं, आकाश ज़मीं हो जाता है"; ’रुदाली’ के गीत "समय ओ धीरे चलो" में साँस जो जीवन का आधार है उसे ही ज़हर करार देते हुए गुलज़ार लिखते हैं "ज़हर ये साँस का पीया ना पीया"। इसी तरह से "यारा सीली सीली" में पंक्ति है "पैरों में ना साया कोई सर पे ना साईं रे, मेरे साथ जाए ना मेरी परछाईं रे"। परछाई का साथ में न जाना एक विरोधाभास है। इस तरह से ध्यानपूर्वक गुलज़ार के गीतों को सुनने पर और भी बहुत से विरोधाभास के उदाहरण मिल जाएँगे इसमें कोई संदेह नहीं है। जिस ख़ूबसूरती से गुलज़ार ने विरोधाभास से अपने गीतों को सजाया है, शायद ही किसी अन्य गीतकार ने ऐसा किया हो। और यही वजह है कि गुलज़ार के गीतों से सिर्फ़ मनोरंजन ही नहीं होता, भाषा और साहित्य का अध्ययन भी होता है।

आपकी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!


शोध, आलेख, प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, January 7, 2017

चित्रकथा - 1: उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ का हिन्दी फ़िल्म-संगीत में योगदान


अंक - 1

उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ का हिन्दी फ़िल्म-संगीत में योगदान

“मधुबन में राधिका नाची रे...”



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं है। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। हमारी दिलचस्पी का आलम ऐसा है कि हम केवल फ़िल्में देख कर या गाने सुनने तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखते, बल्कि फ़िल्म संबंधित हर तरह की जानकारियाँ बटोरने का प्रयत्न करते रहते हैं। इसी दिशा में आपके हमसफ़र बन कर हम आ रहे हैं हर शनिवार ’चित्रकथा’ लेकर। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ के पहले अंक में आपका हार्दिक स्वागत है। 

4 जनवरी 2017 को सुप्रसिद्ध सितार वादक उस्ताद अब्दुल हालीम जाफ़र ख़ाँ साहब के निधन से भारतीय शास्त्रीय संगीत जगत का एक उज्ज्वल नक्षत्र अस्त हो गया। पद्मभूषण, पद्मश्री, और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कारों से सम्मानित हलीम जाफ़र ख़ाँ साहब का शास्त्रीय-संगीत जगत के साथ-साथ फ़िल्म-संगीत जगत में भी योगदान स्मरणीय है। आइए आज ’चित्रकथा’ के माध्यम से याद करें कुछ ऐसे प्रसिद्ध गीतों को जिन्हें ख़ाँ साहब के सितार ने चार चाँद लगा दिए।





"बहुत गुणी सितार वादक उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ साहब का आज देहान्त हुआ। मुझे बहुत दुख हुआ, हमने साथ में बहुत काम किया है। ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे! मेरी उनको भावभीनी श्रद्धांजली।"
-- लता मंगेशकर
4 जनवरी 2017


भारतीय सिने संगीत को समृद्ध करने में जितना योगदान संगीतकारों, गीतकारों और गायक-
गायिकाओं का रहा है, उतना ही अमूल्य योगदान रहा है शास्त्रीय संगीत के महान कलाकारों का, जिन्होंने अपने संगीत ज्ञान और असामान्य कौशल से बहुत से फ़िल्मी गीतों को बुलन्दी प्रदान किए हैं, जो अच्छे संगीत रसिकों के लिए किसी अमूल्य धरोहर से कम नहीं। उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ के निधन से सितार जगत का एक चमकता सितारा डूब गया। अब्दुल हलीम साहब का जन्म इन्दौर के पास जावरा ग्राम में सन् 1929 में हुआ था। कुछ समय बाद इनका परिवार बम्बई स्थानान्तरित हो गया। अब्दुल हलीम के पिता उस्ताद जाफ़र खाँ भी सितार के अच्छे ज्ञाता थे। बचपन से ही सांगीतिक वातावरण मिलने के कारण हलीम साहब का संगीत के प्रति लगाव हो जाना स्वाभाविक था। उनकी प्रारंभिक सितार-शिक्षा प्रसिद्ध बीनकार उस्ताद बाबू खाँ से शुरू हुई। उसके बाद उस्ताद महबूब खाँ साहब से सितार की उच्चस्तरीय शिक्षा प्राप्त की। अच्छी शिक्षा और अपने आप में लगन, धैर्य और समर्पण से उन्होंने जल्दी ही अपनी कला में पूरी दक्षता प्राप्त कर ली।

फ़िल्मों में उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ साहब का प्रवेश उनकी इच्छा नहीं बल्कि उनकी ज़रूरत थी। पिता की मृत्यु के कारण उनके सामने आर्थिक समस्या आन पड़ी, और घर का चुल्हा जलता रहे, इस उद्येश्य से उन्हें फ़िल्म जगत में जाना ही पड़ा। कलाकार में कला हो तो वो किसी भी क्षेत्र में कामयाब होता है। हलीम साहब को फ़िल्म-संगीत में कामयाबी मिली और पूरे देश में लोग उन्हें जानने लगे, फ़िल्मी गीतों में उनके बजाए सितार के टुकड़ों को सुन कर भाव-विभोर होने लगे। कहा जाता है कि फ़िल्मों में उन्हें लाने का श्रेय संगीतकार ख़्वाजा ख़ुरशीद अनवर को जाता है जिन्होंने 1947 की फ़िल्म ’परवाना’ के गीतों में उन्हें सितार के टुकड़े बजाने का मौका दिया। यह फ़िल्म पहले सिंगिंग् सुपरस्टार कुन्दन लाल सहगल की अन्तिम फ़िल्म थी। सहगल साहब की आवाज़ में "मोहब्बत में कभी ऐसी भी हालत पायी जाती है" और "टूट गए सब सपने मेरे" गीतों और इस फ़िल्म के कुछ और गीतों में हलीम साहब का सितार सुनाई दिया।

1952 में ख़्वाजा ख़ुरशीद अनवर के पाक़िस्तान स्थानान्तरित हो जाने के बाद हलीम साहब और
संगीतकार वसन्त देसाई ने साथ में ’राजकमल कलामन्दिर’ के लिए काफ़ी काम किया। मधुरा पंडित जसराज की पुस्तक ’V. Shantaram - The Man who changed Indian Cinema' में हलीम जाफ़र ख़ान को फ़िल्मों में लाने का श्रेय संगीतकार वसन्त देसाई को दिया है। इस पुस्तक में प्रकशित शब्दों के अनुसार - "Vasant Desai travelled across North India and familiarized himself with many folk styles of singing and music. He invited to Bombay tabla maestro Samta Prasad from Benaras, Sudarshan Dheer from Calcutta to play the Dhol, Ustad Abdul Haleem Jafar Khan, a virtuoso with the sitar, and many more musicians." 1951 में ’राजकमल’ की मराठी फ़िल्म ’अमर भोपाली’ में संगीत देकर वसन्त देसाई को काफ़ी ख्याति मिली। 1955 में शान्ताराम ने बनाई एक महत्वाकांक्षी फ़िल्म ’झनक झनक पायल बाजे’, जिसके लिए उन्होंने पूरे देश भर में घूम-घूम कर एक से एक बेहतरीन संगीतज्ञों का चयन किया। संगीत-नृत्य प्रधान इस फ़िल्म के लिए उन्होंने शामता प्रसाद (तबला), शिव कुमार शर्मा (संतूर) और अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ (सितार) को चुना। अभिनेत्री संध्या और विख्यात नृत्यशिल्पी गोपी कृष्ण के जानदार अभिनय और नृत्यों से, शान्ताराम की प्रतिभा से तथा वसन्त देसाई व शास्त्रीय संगीत के उन महान दिग्गजों की धुनों से इस फ़िल्म ने एक इतिहास की रचना की। बताना ज़रूरी है कि केवल इस फ़िल्म के गीतों में ही नहीं बल्कि फ़िल्म के पूरे पार्श्वसंगीत में भी हलीम साहब ने सितार बजाया है।

वसन्त देसाई के यूं तो बहुत से गीतों में हलीम साहब ने सितार बजाए हैं, पर जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण फ़िल्म रही वह थी 1959 की ’गूंज उठी शहनाई’। यह फ़िल्म एक शहनाई वादक के जीवन की कहानी है और इस फ़िल्म के गीतों और पार्श्वसंगीत में शहनाई बजाने वाले और कोई नहीं ख़ुद उस्ताद बिस्मिलाह ख़ाँ साहब थे। ऐसे में सितार के लिए अब्दुल हलीम साहब को लिया गया। यही नहीं इस फ़िल्म में ख़ास तौर से एक जुगलबन्दी रखी गई इन दो महान फ़नकारों की। शहनाई और सितार की ऐसी जुगलबन्दी और वह भी ऐसे दो बड़े कलाकारों की, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था किसी फ़िल्म में। यह जुगलबन्दी राग चाँदनी केदार पर आधारित थी।

संगीतकार सी. रामचन्द्र के गीतों को भी अपनी सुरीली सितार के तानों से सुसज्जित किया अब्दुल हलीम साहब ने। इसका श्रेष्ठ उदाहरण है 1953 की प्रसिद्ध फ़िल्म ’अनारकली’ के सर्वाधिक लोकप्रिय गीत "ये ज़िन्दगी उसी की है जो किसी का हो गया"। यह गीत लता मंगेशकर के पसन्दीदा गीतों में शामिल है। लता जी का ही चुना हुआ एक और पसन्दीदा गीत है सलिल चौधरी के संगीत में "ओ सजना बरखा बहार आई"। इस लोकप्रिय गीत में उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ साहब के सितार के कहने ही क्या! कुछ गीत ऐसे होते हैं जिनमें बजने वाले म्युज़िकल पीसेस याद रह जाते हैं। और जब जब ऐसे गीतों को गाया जाता है, तो इस म्युज़िकल पीसेस को भी साथ में गुनगुनाया जाता है, वरना गीत अधूरा लगता है। इस पूरे गीत में हलीम साहब का सितार ऐसा गूंजा है कि इसके तमाम पीसेस श्रोताओं के दिल-ओ-दिमाग़ में रच बस गए हैं। ज़रा याद कीजिए लता जी के मुखड़े में "ओ सजना" गाने के बाद बजने वाले सितार के पीस को। 1960 की इस फ़िल्म ’परख’ के इस गीत के बारे में बताते हुए लता जी ने हलीम साहब को भी याद किया था - "मुझे इस गीत से प्यार है। सलिल ने बहुत सुन्दरता से इसकी धुन बनाई है और शैलेन्द्र जी के बोलों को बहुत सुन्दर तरीके से इसमे मिलाया है। बिमल रॉय का साधना पर कैमरा वर्क और बारिश का कोज़-अप अपने आप में अद्भुत है। इस गीत की मेलडी अविस्मरणीय इस कारण से भी है कि इसे अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ साहब जैसे गुणी कलाकार ने सितार के सुन्दर संगीत से सजाया है।"

शास्त्रीय संगीत को अपने फ़िल्मी गीतों में उच्चस्तरीय जगह देने में संगीतकार नौशाद का कोई सानी
नहीं। नौशाद साहब ने भी हलीम साहब के सितार का कई महत्वपूर्ण फ़िल्मों में प्रयोग किया। ’मुग़ल-ए-आज़म’ जैसी महत्वपूर्ण फ़िल्म के समूचे पार्श्वसंगीत में सितार बजाने का दायित्व हलीम साहब को देकर के. आसिफ़ ने अपनी फ़िल्म को इज़्ज़त बख्शी। नौशाद साहब के ही शब्दों में - "उन्होंने (हलीम साहब ने) ना केवल फ़िल्म-संगीत को समृद्ध किया बल्कि मेरे गीतों को इज़्ज़त बक्शी"। 1960 की ही एक और फ़िल्म थी ’कोहिनूर’ जिसमें नौशाद का संगीत था। इस फ़िल्म का मशहूर गीत "मधुबन में राधिका नाची रे" हलीम साहब के सितार के लिए भी जाना जाता है। इस गीत से जुड़ा एक रोचक प्रसंग का उल्लेख किया जाए! नौशाद साहब के शब्दों में, "राग हमीर पर फ़िल्म ’कोहिनूर’ का एक गाना था जिसमें दिलीप साहब सितार बजाते हैं। दिलीप साहब एक दिन मुझसे कहने लगे कि यह क्या पीस बनाया है आपने, मैं फ़िल्म में कैसे अपनी उंगलियों को म्युज़िक के साथ मिला पायूंगा? मैंने कहा कि घबराइए नहीं, क्लोज़-अप वाले शॉट्स में उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ साहब की उंगलियों के क्लोज़-अप ले लेंगे, किसी को पता नहीं चलेगा। तो दिलीप साहब ने कहा कि फिर आप ऐक्टिंग् भी उन्हीं से करवा लीजिए! फिर कहने लगे कि मैं ख़ुद यह शॉट दूंगा। फिर वो ख़ुद सितार सीखने लग गए हलीम जाफ़र साहब से। वो तीन-चार महीनों तक सीखे, उन्होंने कह रखा था कि ये सब क्लोज़-अप शॉट्स बाद में फ़िल्माने के लिए। तो जिस दिन यह फ़िल्माया गया मेहबूब स्टुडियो में, शूटिंग् के बाद वो मुझसे आकर कहने लगे कि चलिए साथ में खाना खाते हैं। मैंने कहा बेहतर है। मैंने देखा कि उनके हाथ में टेप बंधा हुआ है। मैंने पूछा कि क्या हुआ, तो बोले कि आप की ही वजह से यह हुआ है, इतना मुश्किल पीस दे दी आपने, उंगलियाँ कट गईं मेरी शॉट देते देते। तो साहब, ऐसे फ़नकारों की मैं क्या तारीफ़ करूँ!" तो इस तरह से हलीम साहब ने दिलीप कुमार को सितार की शिक्षा दी, और रफ़ी साहब और उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब की आवाज़ों में यह कालजयी रचना रेकॉर्ड हुई।

इन्टरनेट पर प्रकाशित कुछ सूत्रों में हलीम साहब द्वारा संगीतकार मदन मोहन के गीतों में सितार बजाए जाने की बात कही गई है जो सत्य नहीं है। मदन मोहन जी की सुपुत्री संगीता गुप्ता जी से पूछने पर पता चला कि मदन मोहन जी के गीतों में अधिकतर उस्ताद रईस ख़ाँ, उस्ताद विलायत ख़ाँ, और बाद के बरसों में शमिम अहमद ने सितार बजाए।

उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ सितार के एक किंवदन्ती हैं। उनकी मृत्यु से शास्त्रीय संगीत जगत के सितार के क्षेत्र में जो शून्य पैदा हुई है उसे भर पाना मुश्किल है। फ़िल्म-संगीत के रसिक आभारी रहेंगे हलीम साहब के जिन्होंने अपने सितार के जादू से फ़िल्मी गीतों को एक अलग ही मुकाम दी।


आपकी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!


शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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